तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

सोमवार, मार्च 13, 2017

उत्तर प्रदेश में मोदी सुनामी का असर राजस्थान पर भी पड़ेगा?

उत्तर प्रदेश में भाजपा की प्रचंड जीत से जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  और मजबूत हुए हैं, वहीं अनुमान है कि उसका असर राजस्थान पर भी पड़ सकता है। हालांकि राजनीति में जोड़ बाकी गुणा भाग का योग आखिर में क्या निकलेगा, इस बारे में पहले से कुछ नहीं कहा जा सकता, मगर कयासों से कुछ कुछ इशारे तो मिल ही जाते हैं। जैसे ही जीत का ऐलान हुआ, उसके दूसरे ही दिन बधाई के होर्डिंग्स में मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ ओम प्रकाश माथुर का फोटो चस्पा दिखाई दिया। संभव है यह कृत्य माथुर के निजी समर्थकों का हो, मगर इसी के साथ इस चर्चा को बल मिला है कि राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है। माथुर के एक पक्के समर्थक ने तो बाकायदा वाट्स ऐप पर यह चर्चा छेड़ दी है कि रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को गोवा का मुख्यमंत्री बनाया जा रहा है और उनके स्थान पर राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को भेजा जाएगा व राजस्थान के मुख्यमंत्री ओम प्रकाश माथुर होंगे। हो सकता है कि यह अफवाह ही हो, मगर भाजपा में कुछ न कुछ पक रहा है, इसके संकेत तो मिल ही रहे हैं।
हालांकि राजस्थान विधानसभा चुनाव में अभी तकरीबन दो साल बाकी हैं, मगर उत्तर प्रदेश में चली मोदी लहर राजस्थान पर क्या असर डालेगी, राजनीतिक पंडित इस पर नजर जमाए हुए हैं। कोई माने या न माने, मगर भाजपा खेमे में एक कौतुहल तो बना हुआ ही है कि क्या अगला चुनाव वसुंधरा के ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा? यद्यपि खुद वसुंधरा राजे ने अपनी सरकार के तीन साल पूरे होने पर मनाए जा रहे जश्र के दौरान साफ इशारा किया कि अगला चुनाव भी उनके ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा, मगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व उनके बीच जिस तरह की कैमेस्ट्री है, उसे देखते हुए कम से कम राजनीतिक प्रेक्षक तो इस बात में संशय ही मानते हैं कि भाजपा उनके चेहरे पर दाव खेलेगी।
हालांकि यह कहना बिलकुल अनुचित होगा कि वसुंधरा राजे का मौजूदा कार्यकाल असफल रहा है, मगर यह एक आम धारणा सी बनती जा रही है कि राजस्थान में वसुंधरा राजे के साथ भाजपा की लोकप्रियता का ग्राफ गिरा है। कम से कम इतना तो तय है कि जनता ने कांग्रेस की सत्ता पलट कर भाजपा को जिस तरह का बंपर समर्थन दिया, उसके अनुरूप यह सरकार खरी नहीं उतरी है। समझा जा सकता है कि जिस मतदाता ने कांग्रेस को हाशिये पर ला खड़ा किया, भाजपा से कितनी अधिक उम्मीदें रही होंगी। हालात जस के तस हैं, सुराज जैसा कुछ कहीं नजर नहीं आता। स्वयं भाजपा के कार्यकर्ता भी मौन स्वीकृति देते दिखाई देते हैं कि वसुंधरा का यह कार्यकाल उनके पिछले कार्यकाल से बेहतर नहीं है। उसकी एक बड़ी वजह भी है। वो यह कि पिछली बार वे अपने आकर्षक चेहरे के दम पर भाजपा को सत्ता में लेकर आई थीं, इस कारण उनके कदमों व निर्णयों में स्वच्छंदता दिखाई देती थी। भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व उन पर हावी नहीं था। उलटा ये कहना ज्यादा उचित रहेगा कि वे ही हावी थीं। सर्वविदित है कि जब कुछ कारणों से वे सत्ता च्युत हुईं और उन पर दबाव बनाया गया कि नेता प्रतिपक्ष का पद छोड़ दें तो उन्होंने एकाएक उस निर्देश को मानने से इंकार कर दिया था। बमुश्किल पद छोड़ा। और ऐसा छोड़ा कि उस पद पर किसी को बैठाया ही नहीं जा सका। फिर जब चुनाव नजदीक आए तो विकल्प के अभाव में भाजपा को फिर से उन्हीं को नेतृत्व सौंपना पड़ा।
समझा जा सकता है कि तब वे कितनी ताकतवर थीं।  मगर अब स्थिति उलट है। केन्द्र में भाजपा सत्ता में है और वह भी नरेन्द्र मोदी जैसे चमत्कारिक नेतृत्व के साथ, ऐसे में हर राजनीतिक फैसले से पहले वसुंधरा को केन्द्र की ओर ताकना पड़ता है। स्वाभाविक रूप से वे इस बार स्वच्छंदता के साथ काम नहीं कर पाई हैं। हालांकि इस बार वे जबदस्त बहुमत के साथ सत्ता में हैं, मगर ये माना जाता है कि यह चमत्कार मोदी लहर की वजह से हुआ। लोकसभा चुनाव में भी जब पच्चीस की पच्चीस सीटें भाजपा ने जीतीं और उसका श्रेय वसुंधरा ने लेने की कोशिश की तो नरेन्द्र मोदी को यह नहीं सुहाया था। केन्द्रीय मंत्रीमंडल में राजस्थान को प्रतिनिधित्व दिलाने में भी वसुंधरा की नहीं चली। बताया जाता है कि तब से ही दोनों के बीच ट्यूनिंग बिगड़ी हुई है। सच क्या है ये तो पार्टी नेतृत्व ही जानें, मगर चर्चाएं तो यहां तक होने लगीं थीं कि मोदी उनके स्थान पर किसी और को मुख्यमंत्री पद की कमान सौंपना चाहते हैं।
इस सिलसिले में वरिष्ठ भाजपा नेता ओमप्रकाश माथुर का नाम प्रमुखता से लिया जाता रहा है। उत्तर प्रदेश के परिणामों ने एक बार फिर चर्चा को गरम कर दिया है। यूं भूपेन्द्र सिंह यादव का भी नाम चर्चा में आया है। सिक्के का दूसरा पहलु ये है कि वसुंधरा को हटाना इतना आसान भी नहीं, जितना कहना आसान है। वस्तुस्थिति ये है कि ग्राउंड पर वसुंधरा ने अपनी पकड़ बना रखी है। हालांकि उनका चेहरा अब पहले की तुलना में निस्तेज हुआ है, मगर फिर भी उनके मुकाबले किसी और चेहरे में चमक नहीं है। बताया जाता है कि बावजूद इसके वसुंधरा के रूप में क्षेत्रीय क्षत्रप की मौजूदगी मोदी को पसंद नहीं। पार्टी की भी यही सोच है कि चुनाव तो मोदी के नाम पर ही लड़ा जाना चाहिए। और ऐसा तभी संभव है जब किसी और को जो कि मोदी का नजदीकी हो, उसे आगे लाया जाए।
इन हालातों के बीच जब पिछले दिनों जब वसुंधरा राजे ने यह कहा कि आगामी विधानसभा चुनाव भी उनके ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा तो यह किसी दुस्साहस से कम नहीं था। आज भी जो फेस वैल्यू वसुंधरा की है, वैसी किसी और भाजपा नेता की नहीं। यह बात खुद वसुंधरा भी जानती हैं और इसी कारण बड़ी हिम्मत के साथ कह दिया। हो सकता है कि उन्होंने ऐसा कंकर फैंक कर उठने वाली लहर को नापने के लिए किया हो, मगर फिलहाल मोदी खेमे से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। अलबत्ता रूठे भाजपा नेता घनश्याम तिवाड़ी ने आपत्ति की, मगर उस पर किसी ने गौर नहीं किया। बेशक, फिलवक्त शांति है, मगर आगे कुछ भी हो सकता है।
-तेजवानी गिरधर
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बुधवार, मार्च 08, 2017

पकड़ ढ़ीली होती जा रही है वसुंधरा की?

किसी समय में भाजपा हाईकमान से भिड़ जाने वाली प्रदेश की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की पकड़ क्या अब कमजोर पड़ती जा रही है? पिछले कुछ समय की घटनाओं से तो यही आभास होता है। वे समझौते दर समझौते कर रही हैं। ऐसे में सवाल ये भी उठता है कि ये परिवर्तन आया कैसे और ये भी कि उनको परेशानी में डालने व चुनौती देने वालों को किस का सपोर्ट है?
जरा पीछे मुड़ कर देखिए। जब राज्य में भाजपा पराजित हुई तो हार की जिम्मेदारी लेने के तहत उनको हाईकमान ने नेता प्रतिपक्ष का पद छोडऩे के निर्देश दिए, जिसे उन्होंने मानने से साफ इंकार कर दिया। बिफर कर उन्होंने न केवल पार्टी की नींव रखने में अहम भूमिका निभाने वाली अपनी मां राजमाता विजयाराजे सिंधिया की याद दिलाई, अपितु विधायकों को लामबंद कर हाई कमान को लगभग चुनौती दे दी। बाकायदा हस्ताक्षर अभियान चलाया। बाद में बमुश्किल मानीं तो ऐसी कि लंबे समय तक यह पद खाली ही पड़ा रहा। जब चुनाव नजदीक आए तो हाईकमान को उनको विकल्प के अभाव में फिर से प्रदेश की कमान सौंपनी पड़ी। प्रदेश पर अपनी पकड़ को उन्होंने बंपर जीत दर्ज करवा कर साबित भी कर दिया। यह दीगर बात है कि इसका श्रेय मोदी लहर को भी दिया गया। वे कितनी प्रभावशाली नेता रही हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राजस्थान का एक ही सिंह कहलाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत को पूरी तरह से नकार दिया। वसुंधरा का इतना खौफ था कि पार्टी के कार्यकर्ता व नेता शेखावत के नजदीक तक फटकने से कतराने लगे थे।
खैर, ताजा हालात पर नजर डालें तो पार्टी में ही रह कर लगातार पर बगावती सुर अलापने वाले घनश्याम तिवाड़ी बेलगाम हो चुके हैं, मगर वसुंधरा चुप हैं। वसुंधरा राजे की हां में हां मिला कर चलने वाले प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी भी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। स्पष्ट है कि वसुंधरा में उनके खिलाफ कार्यवाही करने की आत्मशक्ति नहीं है। पार्टी की ब्राह्मण लॉबी के बगावत कर देने का खतरा बना हुआ है। बीकानेर के दिग्गज राजपूत नेता देवी सिंह भाटी ने भी समय पर अपने वजूद का अहसास कराया है। हाल ही उन्होंने सक्रिय राजनीति से अलग होकर आमजन के साथ आंदोलन शुरू करने की घोषणा की है। उनका कहना है कि कंपनी राज की तरह चल रही वर्तमान प्रजातांत्रिक व्यवस्था से मैं संतुष्ट नहीं हूं। भविष्य में किसी तरह का चुनाव नहीं लडूंगा, न ही किसी तरह के राजनीतिक दल का गठन करूंगा। मैं सात बार एमएलए रहा, बेटा सांसद रहा और कुछ नहीं चाहिए। जब ये पूछा गया कि पार्टी में आपके पास दायित्व रहा है, फिर भी आंदोलन करने जा रहे हैं, इस पर वे कहते हैं कि प्रदेश कार्यकारिणी में दायित्व था, लेकिन वहां सिर्फ मूकदर्शक बनकर रहना पड़ता था। जैसे पिछली बार भूपेंद्र यादव को राज्यसभा के चुनाव के दौरान मैंने पूछ लिया- ये कौन है? तो नेतृत्व की मुझ पर भौंहें तन गईं। वैसे अभी स्वदेशी जागरण मंच से जुड़ा हूं। परदे के पीछे काम नहीं करूंगा। समझा जा सकता है कि वे वसुंधरा के लिए कितना बड़ा सिरदर्द हैं।
एक और उदाहरण देखिए। कभी उनकी ही लॉबी में माने जाने वाले श्रीचंद कृपलानी को जब उन्होंने यूआईटी चेयरमैन बनाने के आदेश दे दिए, तो उन्होंने वह पद लेने से साफ इंकार कर दिया। वे इस बात से नाराज थे कि उन्हें उनके कद के हिसाब से मंत्री क्यों नहीं बनाया गया। काफी जद्दोजहद के आखिरकार मंत्रीमंडल विस्तार में उन्हें केबिनेट मंत्री बनाना पड़ा। मजेदार बात देखिए कि जिसे मात्र यूआईटी के अध्यक्ष के योग्य माना गया, वे राज्यभर के सभी स्थानीय निकायों का मंत्री बन कर माने। हालांकि इसके पीछे का गणित कुछ और लगता है। वो ये कि वे सिंधी कोटे के राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी को हटाना चाहती थीं, मगर संघ का इतना दबाव था कि उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाईं। ऐसे में देवनानी की टक्कर में दूसरा सिंधी नेता खड़ा करने के लिए कृपलानी को मंत्री पद दे कर उपकृत किया। दूसरे सिंधी विधायक को राजी किया तो तीसरे सिंधी विधायक ज्ञानदेव आहूजा पसर गए। उन्होंने मंत्री न बनाए जाने से नाराज हो कर विधानसभा की सभी समितियों से इस्तीफा दे दिया है।
कुल मिला कर लगता है कि शेरनी की उपमा से अलंकृत वसुंधरा का प्रभामंडल कुछ फीका होता जा रहा है। बेशक इस प्रकार के बगावती तेवर उभरने के पीछे कुछ तो राज है। अनुमान है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व संघ लॉबी उनको अंडर प्रेशर रख रही है।
-तेजवानी गिरधर
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गुरुवार, मार्च 02, 2017

सत्ता पक्ष के विधायकों का गुस्सा, यानि जनाक्रोष की घंटी

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी को संतुष्ट नहीं किया जा सकता। इस कारण कोई भी सरकार कितना भी जनहित का ध्यान रखे, असंतोष बना ही रहता है। रहा सवाल विपक्ष का तो वह उद्देश्य विशेष से भी विरोध कर सकता है, जो जनाक्रोष मान लिया जाता है, लेकिन अगर सत्ता पक्ष ही विपक्ष की भूमिका अदा करने लगे तो यह शर्तिया मान लिया जाना चाहिए कि जनता में वाकई असंतोष है। राजस्थान विधानसभा सत्र में प्रश्नकाल के दौरान सत्ता पक्ष के ही विधायकों का मंत्रियों का घेरना इसका ताजा उदाहरण है।
असल में सत्ता पक्ष के विधायक आम तौर पर अनुशासन के कारण चुप रहते हैं। यदि कोई विशेष अपेक्षा है भी तो संबंधित मंत्री से व्यक्तिगत रूप से मिल कर उसका समाधान करवा लेते हैं। चूंकि विपक्ष का तो धर्म ही है सरकार को घेरना तो वे हंगामा करते ही हैं। लेकिन जब सत्ता पक्ष के विधायक पार्टी की नैतिक लाइन तोड़ कर सरकार पर आक्रमण करते हैं, इसका अर्थ ये है कि जनता में इतना गुस्सा है कि उन्हें बोलना पड़ ही रहा है। आखिरकार जिस क्षेत्र से चुन कर आते हैं, वहां की जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं। आगामी चुनाव में दो साल से भी कम समय रह गया है। ऐसे में विधायक अपने अपने क्षेत्र में सक्रिय हो गए हैं। जाहिर तौर पर जनआंकांक्षाएं उनकी नजर में आ रही हैं। जनता में पेठ रखने के लिए वे विधानसभा में सक्रिय दिखाई देना चाहते हैं। वे जानते हैं कि अगर जनता की आवाज नहीं उठाई तो चुनाव में जनता उलाहना देगी कि आपने हमारी फिक्र क्यों नहीं की। एक ओर पार्टी लाइन है तो दूसरी ओर जनता में दुबारा जाने पर होने वाली परेशानी। स्वाभाविक रूप से उन्हें जनता की अपेक्षाओं को तवज्जो देनी पड़ रही है। इसका परिणाम ये है कि जनता का गुस्सा वे विधानसभा में निकाल रहे हैं। प्रश्रकाल में भाजपा के ही विधायकों का अपने मंत्रियों से सवाल जवाब करना इस बात का सबूत है कि वे मजबूर हैं कि जनता की आवाज बन कर सामने आएं। इसका यह सीधा सा अर्थ है कि जनता में सरकार के प्रति असंतोष है। इसे मुख्यमंत्री व भाजपा संगठन को समझना होगा। बेशक अपने ही विधायकों के इस रवैये से सरकार को तकलीफ हो रही होगी, मगर उसे यह भी समझना होगा कि वे खतरे की घंटी बजा रहे हैं। अगर सरकार ने अपने कामकाज को नहीं सुधारा तो भाजपा को आगामी चुनाव में दिक्कत पेश आ सकती है।
इस विषय का एक पहलु ये है कि चूंकि वर्तमान में राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस के विधायकों की संख्या बहुत कम है, इस कारण उनकी आवाज में वह दम नहीं आ पाता, जो कि होना चाहिए। दूसरी ओर चूंकि इस बार भाजपा बंपर बहुमत के साथ विधानसभा में मौजूद है, इस कारण उन्हीं में से कुछ का रवैया ऐसा होने लगा है, मानो वे विपक्ष की भूमिका में हैं। उसकी एक खास वजह है। वो ये कि किसी भी मुख्यमंत्री के लिए इतने सारे पार्टी विधायकों को संतुष्ट रख पाना नितांत मुश्किल है। जैसे हर प्रभावशाली विधायक मंत्री बनना चाहता है, मगर चूंकि मंत्रीमंडल में सदस्यों की संख्या अनुपात के हिसाब से तय है, ऐसे में मंत्री नहीं बन पाए ऐसे विधायक नाराज चलते हैं। इसके अतिरिक्त हर विधायक को बजट अथवा राजनीतिक नियुक्ति के मामले में संतुष्ट नहीं किया जा सकता, ऐसे में वंचित विधायक भी रुष्ठ रहते हैं। वर्तमान में विधानसभा में कमोबेश स्थिति यही है। मुख्यमंत्री अनेक राजनीतिक नियुक्तियां तीन साल बाद भी नहीं कर पाई हैं, जिनमें विधायकों की सिफारिशें लगी हुई हैं। वे सभी विधायक नाराज हैं।
-तेजवानी गिरधर

बुधवार, जनवरी 25, 2017

वसुंधरा के दुस्साहस को दाद देनी होगी

आज जब कि भाजपा में मोदी युग चल रहा है, जहां लालकृष्ण आडवाणी जैसे हाशिये पर धकेल दिए गए हैं, ऐसे में राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे का यह कहना कि आगामी विधानसभा चुनाव भी उनके ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा तो यह किसी दुस्साहस से कम नहीं है। आपको याद होगा कि ये वही जिगर वाली नेत्री है, जिसने राजनाथ सिंह के राष्ट्रीय भाजपा अध्यक्ष रहते राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद से इस्तीफा देने से इंकार कर दिया था। बाद में दिया तो भी ऐसा दिया कि वह खाली ही रहा, अगला चुनाव आने से कुछ माह पहले न केवल बहुत गरज करवा कर फिर कब्जा किया, अपितु चुनाव भी उनके ही नेतृत्व में लड़े जाने का ऐलान करवाया।
जब चुनाव में भारी बहुमत से जीत दर्ज की तो स्वाभाविक रूप से उसका श्रेय उनके ही खाते में गिना जाना चाहिए था, मगर चूंकि मोदी लहर के चलते अप्रत्याशित सीटें हासिल हुईं तो उनका यह श्रेय लेना मोदी को नागवार गुजरा। समझ लीजिए, तभी से दोनों के बीच एक ऐसी रेखा खिंच गई, जो कि आज भी नजर आती है। अघोषित टकराव का खामियाजा राजस्थान की जनता भुगत रही है। वसुंधरा उतनी स्वतंत्रता से काम नहीं कर पा रहीं, जितना पिछले कार्यकाल में सीमित बहुमत के बाद भी किया था। पांच में से तीन साल गुजरने के बाद भी कई महत्वपूर्ण राजनीतिक पद खाली ही पड़े हुए हैं। गिनाने को योजनाएं और आंकड़े तो बहुत हैं, मगर धरातल का सच क्या है, ये भाजपाई भी जानते हैं। और यही वजह है कि वे स्वयं समझ रहे हैं कि अगला चुनाव जीतना मुश्किल होगा।
बात भाजपा के अंदरखाने की करें तो ये बात कई बार उठी है कि मोदी किसी न किसी बहाने वसुंधरा की जगह किसी और को मुख्यमंत्री बनाने की फिराक में है, मगर न तो उन्हें उचित मौका मिल पा रहा है और न ही वसुंधरा उन्हें दाव दे रही हैं। एकबारगी वे हिम्मत करके हटा भी दें, मगर समस्या ये है कि उनके पास वसुंधरा का विकल्प नहीं है। आज भी जो फेस वैल्यू वसुंधरा की है, वैसी किसी और भाजपा नेता की नहीं। ऐसे में मोदी चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहे। यह बात खुद वसुंधरा भी जानती हैं और इसी कारण हाल ही जब उनकी सरकार के तीन साल पूरे हुए तो उन्होंने बड़ी हिम्मत के साथ कह दिया कि अगला चुनाव भी उनके नेतृत्व में लड़ा जाएगा। इस पर रूठे भाजपा नेता घनश्याम निवाड़ी ने आपत्ति भी की, मगर ये सच है कि भाजपा में ही बड़ी तादात ऐसे नेताओं की है, जिनकी निष्ठा वसुंधरा में है। समझा जा सकता है कि मोदी जैसे तानाशाही नेता को ये सुन कर कैसा लगा होगा।
वस्तुत: राजस्थान में दो तरह की भाजपा है। एक संघ निष्ठ और दूसरी वसुंधरा निष्ठ। बेशक राष्ट्रीय स्तर पर संघ के हाथ में रिमोट कंट्रोल है, मगर राजस्थान में दोनों के बीच एक संतुलन बैठाया हुआ है, जिसमें वसुंधरा का पलड़ा भारी है। संघ सत्ता में अपना हिस्सा जरूर झटक लेता है, मगर अपर हैंड वसुंधरा का ही रहता है। भला ऐसे में उनमें अगला चुनाव भी उनके ही नेतृत्व में लड़े जाने के ऐलान का दुस्साहस आ जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हां, ये बात जरूर है कि पिछली बार ही तुलना में इस शेरनी की दहाड़ कुछ कमजोर है। देखते हैं, चुनाव आते आते समीकरणों में क्य बदलाव आता है।
-तेजवानी गिरधर
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मंगलवार, जनवरी 24, 2017

गहलोत के बाद अब डूडी की चुनौति के मायने?

राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी के निवास पर जनसुनवाई के दौरान उनके समर्थकों की ओर से अगला मुख्यमंत्री बनाने संबंधी नारे लगने के बाद इसकी चर्चा राजनीतिक हलकों सहित सोशल मीडिया पर खूब है। कुछ लोग इसे आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार सचिन पायलट के लिए चुनौति मानते हैं तो कुछ इसे महज अचानक हुई एक घटना मात्र, तो कुछ जाट रणनीति का एक हिस्सा। यहां उल्लेखनीय है कि सचिन के लिए पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी एक चुनौति के रूप में माने जाते हैं। कांग्रेस का एक खेमा उन्हें अब भी अगला मुख्यमंत्री बनाए जाने के लिए सजीव बनाए हुए है।
सवाल ये उठता है कि क्या गहलोत व डूडी की इन चुनौतियों में गंभीरता कितनी है या फिर ये मात्र शोशेबाजी? असल में कांग्रेस में वही होता है, होता रहा है, जो कि हाईकमान ने चाहा है। बेशक स्थानीय क्षत्रप समय समय पर सिर उठाते हैं, मगर आखिरकार हाईकमान के फैसले के आगे सभी नतमस्तक हो जाते हैं। उसकी वजह ये है कि आमतौर पर क्षत्रपों का खुद का वजूद नहीं होता। वे जो कुछ होते हैं, पार्टी के बलबूते। ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे, जो यह साफ दर्शाते हैं कि चाहे कोई कितना भी बड़ा नेता क्यों न हो, मगर कांग्रेस हाईकमान के विपरीत जाते ही हाशिये पर आ जाता है। ऐसे में अगर हाईकमान अगर चाहता है कि बहुमत आने पर सचिन को ही मुख्यमंत्री बनाना है तो किसी में इतनी ताकत नहीं कि उसे चुनौति दे सके। बेशक दबाव जरूर बना सकते हैं, जैसा कि गहलोत की ओर से बनाया जा रहा है, या फिर अब डूडी के समर्थक बना रहे हैं।
जहां तक गहलोत की ओर से दबाव बनाए जाने का सवाल है तो वह इस वजह से कि वे दो बार मुख्यमंत्री और एक बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके हैं। जाहिर तौर पर इस दौरान उन्होंने हजारों समर्थकों को निजी लाभ पहुंचाया होगा। वे गहलोत के गुण गाएंगे ही। यूं उनका कार्यकाल अच्छा ही रहा है, मगर कुछ बड़ी राजनीतिक भूलों और मोदी लहर के चलते पार्टी चौपट हो गई। ऐसे में पार्टी ने कार्यकर्ताओं में नई जान फूंकने के लिए सचिन को प्रदेश अध्यक्ष बनाया और इस प्रकार का संदेश भी दिया कि उनके नेतृत्व में ही अगला चुनाव लड़ा जाएगा। स्वाभाविक रूप से पूर्व में स्थापित नेताओं को यह नागवार गुजरा होगा। गहलोत समर्थकों को तो कुछ ज्यादा ही, क्योंकि इससे उनको अपने वजूद का भी खतरा महसूस होने लगा। उसे बचाने कर खातिर वे लामबंद हैं। यही वजह है गहलोत एक चुनौति के रूप में देखे जाते हैं। गहलोत भी भला क्यों नहीं चाहेंगे कि उन्हें फिर से मुख्यमंत्री बनने का मौका मिले, अत: वे यह कह कर अपनी संभावनाओं को सुरक्षित कर लेते हैं कि मुख्यमंत्री का फैसला निर्वाचित विधायक करते हैं। मगर वे स्वयं भी जानते हैं कि अगर हाईकमान की रुचि सचिन में रही तो वे कुछ नहीं कर पाएंगे। कांग्रेस हाईकमान भी ऐसे संकेत देता रहा है कि गहलोत का उपयोग राजस्थान की बजाय दिल्ली या संगठन में किया जाएगा। हाल ही उन्हें उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में स्क्रीनिंग कमेटी का चेयरमैन बनाया गया है। रहा सवाल राजस्थान में उनके दखल तो संभावना यही है कि आगामी विधानसभा चुनाव में उनके समर्थकों के लिए भी कुछ सीटें रिजर्व रखी जाएंगी। यानि कि हिस्सेदारी उनकी भी होगी। जैसे जब वे मुख्यमंत्री थे तो सी पी जोशी अपनी हिस्सेदारी बनाए हुए थे।
बात अगर डूडी के निवास पर हुई घटना का करें तो यह डूडी से कहीं अधिक किसी जाट को मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग से जुड़ा हुआ है। डूडी इतने बड़े या सर्वमान्य नेता नहीं कि मुख्यमंत्री पद की दावेदारी कर दें। वस्तुत: किसी जाट को मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग अरसे से की जाती रही है। वर्तमान चूंकि डूडी नेता प्रतिपक्ष हैं तो वे ही मांग के केन्द्र में नजर आ सकते हैं। यह सच है कि राजस्थान में जाटों का वर्चस्व रहा है, मगर एक बार भी किसी जाट को मुख्यमंत्री बनने का मौका नहीं मिला। यहां तक कि खांटी नेता परसराम मदेरणा को भी विधानसभा अध्यक्ष तक ही संतुष्ट रहना पड़ा। वे प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। इसी प्रकार डॉ. चंद्रभान व नारायण सिंह को भी प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। जब प्रदेश अध्यक्ष गुर्जर नेता सचिन पायलट को बनाया तो डूडी को नेता प्रतिपक्ष बना दिया गया। यानि कि जाटों को नकारा नहीं गया, संतुलन बनाए रखा गया, मगर सत्ता का शीर्ष पद नहीं सौंपा गया। इसके पीछे का क्या गणित है, वो तो पार्टी ही जाने। अगर डूडी के बहाने जाटों ने और दबाव बनाया तो होगा इतना ही कि टिकट वितरण के दौरान वे कुछ ज्यादा झटक लेंगे, इससे ज्यादा कुछ होता नजर नहीं आ रहा।
-तेजवानी गिरधर
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रविवार, जनवरी 22, 2017

सफाई क्यों देनी पड़ी मनमोहन वैद्य को?

संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने आखिर खुद ही सफाई देते हुए कहा है कि संघ आरक्षण के खिलाफ नहीं है, मगर ये सवाल तो सवाल ही बना रह गया कि आखिर उनके बयान पर विवाद हुआ ही क्यों कर? क्या मीडिया ने उनके पहले दिए बयान को समझने में गलती की? क्या वे अपने पहले दिए बयान में बात ठीक से कह नहीं पाए, इस कारण मीडिया ने ये अर्थ निकाला कि संघ आरक्षण के खिलाफ है? या फिर मीडिया ने जानबूझकर उनके बयान का गलत अर्थ निकाल कर विवाद पैदा किया, जैसा कि कुछ संघनिष्ठ लोग मान रहे हैं?
यह बात ठीक है कि वैद्य ने बाद में जो बयान दिया है, उसमें उन्होंने अपनी बात को तफसील से समझाया है कि संघ आरक्षण का पक्षधर है। इसकी वजह ये बताई है कि चूंकि एक वर्ग सामाजिक भेदभाव की वजह से पिछड़ा हुआ है, उसे आरक्षण की जरूरत महसूस की गई और चूंकि सामाजिक भेदभाव अब भी जारी है, इस कारण आरक्षण भी जारी रहना चाहिए।
अब जरा उनके पहले दिए बयान पर गौर करें तो उसमें उनका कहना था कि आरक्षण को खत्म करना चाहिए और इसकी जगह ऐसी व्यवस्था लाने की जरूरत है, जिसमें सबको समान अवसर और शिक्षा मिले। वैद्य ने कहा कि अगर लंबे समय तक आरक्षण जारी रहा तो यह अलगाववाद की तरफ ले जाएगा। उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र में हमेशा के लिए ऐसे आरक्षण की व्यवस्था का होना अच्छी बात नहीं है। सबको समान अवसर और शिक्षा मिले।
उनकी इस बात ये तो स्पष्ट है कि संघ सिद्धांतत: आरक्षण के पक्ष में नहीं, मगर चूंकि सामाजिक भेदभाव जारी है, इस कारण यह लागू ही रहना चाहिए। समझा जा सकता है कि विवाद हुआ ही इसलिए कि उन्होंने जितनी स्पष्टता के साथ बाद में बयान दिया, अगर वैसा ही पहले भी कह देते तो विवाद होता ही नहीं। अव्वल तो ऐन चुनाव के वक्त इस विवादास्पद विषय पर बोलते ही नहीं। अगर सवाल का उत्तर देना बहुत जरूरी ही था तो ठीक वैसा ही बोलते, जैसा कि बाद में कहा। जरा देखिए, उन्होंने कितने साफ शब्दों में स्पष्ट किया है कि आरक्षण जरूरी है:-
https://youtu.be/LIic-Nx8JYg
असल में विवाद ने इसलिए तूल पकड़ा क्योंकि इस वक्त उत्तरप्रदेश सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। यह बात वैद्य भी जानते रहे होंगे, मगर उनसे यह चूक कैसी हुई, यह समझ से परे है। हालांकि माहौल बिगड़ता देख उन्होंने तुरंत सफाई दी, मगर तब तक पिछड़े तबके में तो यह संदेश चला ही गया कि संघ आरक्षण के खिलाफ है। वह इसलिए भी कि इससे पहले भी बिहार चुनाव के वक्त संघ प्रमुख मोहन भागवत कुछ इसी तरह का बयान दे चुके हैं, जिसका खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ा।
-तेजवानी गिरधर
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सुमेधानंद क्या, वसुंधरा तक लाचार हैं संघ के आगे?

सीकर से भाजपा के सांसद सुमेधानन्द सरस्वती का एक कथित ऑडियो सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर वायरल हुआ है, जिसमें सांसद सुमेधानन्द सरस्वती संघ के आगे लाचार होते सुनाई दे रहे हैं। इतना ही नहीं, ऑडियो में सांसद ने यहां तक कह डाला कि संघ के आगे तो राज्य की मुख्यमंत्री तक भी नतमस्तक है। यह ऑडियो में एक कॉलेज लेक्चरर श्रीधर शर्मा और सांसद सुमेधानन्द सरस्वती के बीच हुई बातचीत का बताया जा रहा है, जिसमें श्रीधर शर्मा अपने स्थानांतरण को लेकर सांसद से बात करते हुए सुनाई दे रहे हैं।
ऑडियो की सच्चाई क्या है अथवा क्या वह सुमेधानंद की ही आवाज है, इस पर न जाते हुए विषय वस्तु को देखें तो वह ठीक ही प्रतीत होती है। सुमेधानंद क्या, वसुंधरा राजे तक संघ के आगे नतमस्तक हैं। दिलचस्प बात ये है कि सुमेधानंद न केवल अपनी लाचारी बताई, अपितु वसुंधरा की स्थिति का भी बयान कर दिया। संयोग से चंद दिन पहले ही यह सुस्थापित हो गया था कि वसुंधरा का रिमोट कंट्रोल भी संघ के ही हाथ है। किसी समय राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से संबंधों को सिरे से नकारने वाली भाजपा को संघ ही संचालित करता है, इसका ताजा उदाहरण अजमेर में देखने को मिला। भले ही आधिकारिक तौर पर न तो भाजपा ने कुछ कहा, न ही संघ की ओर से कोई बयान आया, मगर सारे अखबार इसी बात से अटे पड़े थे कि संघ के यहां हुए कैंप में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने हाजिरी दी। यहां आ कर उन्हें सरकार के तीन साल के कामकाज का ब्यौरा दिया। इतना ही नहीं उन्हें यहां सरकार की खामियों को भी गिनाया गया। यानि की यह पूरी तौर से साफ हो गया कि संघ इतनी बड़ी ताकत है, जिसके आगे एक राज्य के मुख्यमंत्री को भी पेश होना पड़ता है। निश्चित रूप से इससे मुख्यमंत्री पद की गरिमा गिरी है, भाजपा व संघ चाहे इसे स्वीकार करें या नहीं।
चलो, ये संघ और भाजपा के आपसी संबंधों और समझ का मामला है, उनका आतंरिक मामला है, मगर क्या इस घटना से मुख्यमंत्री जैसे गरिमा वाले पद की संघ के आगे कितनी बिसात है, यह उजागर नहीं हुआ है? संघ चाहता तो जयपुर में ही किसी गुप्त स्थान पर वसुंधरा राजे को बुला कर उनसे सरकार की परफोरमेंस पूछ सकता था। गोपनीय स्थान पर दिशा-निर्देश दे सकता था। क्या उसके लिए अजमेर में आयोजित हुए कैंप में बुलाना जरूरी था।? संघ और भाजपा के पास सफाई देने को हालांकि कुछ है नहीं, मगर ये कह सकते हैं कि कौन कहता है कि मुख्यमंत्री की हाजिरी लगवाई गई। मगर जब पूरा मीडिया एक स्वर से यह कह रहा था कि मुख्यमंत्री को जवाब तलब किया गया, तो क्या उनकी ओर से उसका खंडन नहीं किया जाना चाहिए था। कहीं ऐसा तो नहीं कि ऐसा जानबूझकर किया गया, ताकि भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं में यह संदेश जाए कि संघ ही उनका आला कमान है। हालांकि भाजपा नेता व कार्यकर्ता तो अच्छी तरह से जानते हैं कि किस प्रकार संघ का पार्टी में दखल है, मगर यही तथ्य जब सार्वजनिक होता है तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि संघ को भाजपा का रिमोट कंट्रोल कहे जाने पर दोनों को क्यों ऐतराज होता है?
अजमेर में हुई इस घटना का एक पहलू ये भी है कि जब से केन्द्र में भाजपा की स्पष्ट बहुमत वाली सरकार आई है, संघ पर शिंकजा और कस गया है। किसी जमाने में सीधे हाई कमान से टक्कर लेने वाली वसुंधरा राजे अब कितनी कमजोर हैं, यह साफ परिलक्षित होता है। और यही वजह है कि जैसा कार्यकाल पिछला रहा, उसकी तुलना में मौजूदा कार्यकाल कमतर माना जा रहा है। सच तो ये है कि सरकार में राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर संघ का इतना दखल है कि तीन साल बीत जाने के बाद भी कई महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्यिां अटकी हुई हैं। ऐसे में भला सरकार का परफोरमेंस कैसे बेहतर रह सकता है, यह अपने आप स्पष्ट हो जाता है।
बात अगर सुमेधानंद के वायलर हुए ऑडियो की करें तो उससे यह तक उजागर हो रहा है कि राजनीतिक नियुक्तियां क्या, पोस्टिंग तक में संघ की चलती है। ऑडियो की बातचीत में श्रीधर शर्मा ने सांसद को अपनी पीड़ा सुनाई तो सांसद ने कहा कि संघ जिसको चाहता है, वहीं मनमाफिक पोस्टिंग मिलती है, बिना संघ के इस जमाने में स्थानांतरण और मनमाफिक पोस्टिंग नहीं ली जा सकती।
-तेजवानी गिरधर
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