तीसरी आंख

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रविवार, फ़रवरी 08, 2026

जादूगरों को अक्षय घट का शो दिखाने का ख्याल कहां से आया?

आपने जादूगरों के शो में देखा होगा कि उनके पास एक अक्षय घट होता है, जिसमें भरा जल बार बार खाली करने पर भी फिर भर जाता है। जाहिर तौर पर वह कोई चमत्कार नहीं है। वह एक वैज्ञानिक तकनीक है। सवाल यह उठता है कि जादूगरों को अक्षय घट बनाने का ख्याल कहां से आया? असल में पुराणों में उल्लेखित है कि अक्षय पात्र प्राचीन ऋषि-मुनियों के पास हुआ करता था। अक्षय का अर्थ जिसका कभी क्षय या नाश न हो। दरअसल, एक ऐसा पात्र जिसमें से कभी भी अन्न और जल समाप्त नहीं होता। जब भी उसमें हाथ डालो तो खाने की मनचाही वस्तु निकाली जा सकती है। अक्षय पात्र संबंधित एक स्त्रोत भी है। 

महाभारत में अक्षय पात्र से संबंधित एक कथा है। जब पांचों पांडव द्रौपदी के साथ 12 वर्ष के लिए अज्ञात वास में जंगल में रहने चले गए थे, तब उनकी मुलाकात कई तरह के साधु-संतों से होती है। कुटिया बनाकर रहने के बाद उनके यहां भ्रमणशील साधु-संतों के जत्थे के जत्थे उनसे मिलने के लिए या कुटिया में प्रवास करने के लिए आते थे। अब पांचों पांडवों सहित द्रौपदी के समक्ष यही प्रश्न होता था कि वे 6 प्राणी अकेले भोजन कैसे करें और उन सैकड़ों-हजारों के लिए भोजन कहां से आए? तब पुरोहित धौम्य उन्हें सूर्य की 108 नामों के साथ आराधना करने के लिए कहते हैं। युधिष्ठिर इन नामों का बड़ी आस्था के साथ जाप करते हैं। अंत में भगवान सूर्य प्रसन्न होकर युधिष्ठिर के पास प्रकट होकर पूछते हैं कि इस पूजा-अर्चना का आशय क्या है? युधिष्ठिर कहते हैं कि हे प्रभु! मैं हजारों लोगों को भोजन कराने में असमर्थ हूं। मैं आपसे अन्न की अपेक्षा रखता हूं। किस युक्ति से हजारों लोगों को खिलाया जाए, ऐसा कोई साधन मांगता हूं। तब सूर्यदेव एक ताम्बे का पात्र देकर उन्हें कहते हैं- युधिष्ठिर! तुम्हारी कामना पूर्ण हो। मैं 12 वर्ष तक तुम्हें अन्नदान करूंगा। यह ताम्बे का बर्तन मैं तुम्हें देता हूं। तुम्हारे पास फल, फूल, शाक आदि 4 प्रकार की भोजन सामग्रियां तब तक अक्षय रहेंगी, जब तक कि द्रौपदी परोसती रहेगी। कथा के अनुसार द्रौपदी हजारों लोगों को परोस कर ही भोजन ग्रहण करती थी, जब तक वह भोजन ग्रहण नहीं करती, पात्र से भोजन समाप्त नहीं होता था। 

वनवास के दिनों में पाण्डवों को हर दिन अनेक अतिथियों के भोजन की व्यवस्था करनी होती थी। एक दिन अत्यन्त विचित्र परिस्थिति उत्पन्न हुई। दुर्योधन ने दुर्वासा ऋषि को पाण्डवों के पास भेजकर उन्हें संकट में डालने की योजना बनाई। दुर्वासा अपने शिष्यों के साथ अचानक पाण्डवों के आश्रम पहुंचे और भोजन की इच्छा जताई। समस्या यह थी कि उस दिन द्रौपदी भोजन कर चुकी थीं, जिसका अर्थ था कि अक्षय पात्र में भोजन समाप्त हो चुका था। द्रौपदी अत्यंत व्याकुल होकर श्रीकृष्ण को स्मरण करती हैं। श्रीकृष्ण तत्काल प्रकट होते हैं। द्रौपदी अपनी व्यथा कहते हुए रो पड़ती हैं कि “प्रभु! पात्र खाली है। अतिथि बाहर प्रतीक्षा कर रहे हैं। मेरी लाज बचाइए।” श्रीकृष्ण मुस्कुराते हैं और कहते हैं, “पहले मुझे भूख लगी है, मुझे भोजन दो!” द्रौपदी निराशा में कहती हैं, पात्र बिलकुल खाली है। कृष्ण स्वयं अक्षय पात्र उठाते हैं और उसमें देखते हैं। पात्र के किनारे पर उन्हें चावल का एक छोटा-सा दाना और सब्जी का अंश चिपका हुआ मिलता है। श्रीकृष्ण उसे उठाकर ग्रहण करते हैं और प्रसन्न होकर कहते हैं, “अब यह संसार तृप्त हो गया है।” उसी समय, नदी में स्नान करते हुए दुर्वासा ऋषि और उनके शिष्य अचानक अत्यधिक तृप्ति का अनुभव करने लगते हैं, मानो उन्होंने राजभोग कर लिया हो। उन्हें भय होता है कि यदि बिना भूख के भोजन के लिए लौटे, तो उनका अपमान हो जाएगा। इसलिए वे चुपचाप लौटने के बजाय वहां से चले जाते हैं। जनश्रुति के अनुसार इसी तरह का अक्षय पात्र आज भी हिमालय के साधुओं के पास है। यह पात्र सूर्य की साधना से ही प्राप्त होता है।