तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

शुक्रवार, जून 26, 2026

क्या शुभ मुहूर्त बेमानी है?

भारतीय संस्कृति में सभी कार्य शुभ मुहूर्त में ही करने की परंपरा है। ऐसा कार्य की सफलता के लिए किया जाता है। इसके प्रति लोगों में गहरी आस्था है। विवाह, भवन निर्माण, दुकान के उद्घाटन इत्यादि बड़े कार्यों में तो शुभ मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा ही जाता है, कई लोग छोटे-छोटे कार्य भी चोघडिय़ा देख कर करते हैं। यह तो हुआ तस्वीर का एक रुख। दूसरा रुख ये है कि शुभ मुहूर्त में काम आरंभ करने पर भी कई बार असफलता हाथ लगती है। यह सर्वविदित है कि लगभग हर विवाह शुभ मुहूर्त में ही होता है, कुंडलियों का मिलान किया जाता है, बावजूद इसके गृह क्लेश और संबंध विच्छेद की घटनाएं होती हैं। शुभ मुहूर्त में दुकान का आरंभ करने पर भी कई बार दुकान नहीं चलती या फिर घाटा होने पर बंद करनी पड़ती है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या शुभ मुहूर्त बेमानी है?

किसी सज्जन ने हाल ही एक पोस्ट सोशल मीडिया पर डाली, जिसका सारांश आपकी नजर पेश है- राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त में किए गए, फिर भी न वैवाहिक जीवन सफल हुआ, न ही राज्याभिषेक। जब मुनि वसिष्ठ से इसका जवाब मांगा गया तो उन्होंने साफ कह दिया-

सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेहूं मुनिनाथ। 

लाभ हानि, जीवन मरण, यश-अपयश विधि हाथ।

इसका तात्पर्य ये है कि विधि ने जो निर्धारित कर रखा है, वही होता है, चाहे आप कोई भी कार्य शुभ मुहूर्त में आरंभ करें। 

विशेष रूप से मरण के मामले में हमारा कोई दखल नहीं। वह अवश्यंभावी है। उसे टाला नहीं जा सकता। बेशक चिरंजीवी होने का वरदान तो होता है, मगर कभी न मरने का वरदान कभी किसी को नहीं मिला। यदि कोई मृत्यु से बचने के अनेक प्रकार के वरदान किसी के पास थे तो भी विधि ने उसकी मृत्यु का युक्तिसंगत रास्ता निकाल दिया। पितामह भीष्म को भले ही इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था, मगर उन्हें भी एक दिन मरना था। बस फर्क इतना था कि वे अपनी मृत्यु को टाल सकते थे। 

उस पोस्ट में यह भी लिखा है कि भगवान राम व भगवान कृष्ण को विधि अनुसार ही फल भोगने पड़े। इसी प्रकार शिव जी सती की मृत्यु को नहीं टाल सके, जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है। इसी प्रकार रामकृष्ण परमहंस भी अपने कैंसर को न टाल सके। न साईं बाबा अपनी मृत्यु को और न ईसा मसीह अपने पीड़ादायक मृत्यु को। रावण व कंस बहुत शक्ति संपन्न थे, मगर उनका अंत भी विधि ने तय कर रखा था।

प्रश्न ये उठता है कि जब सब कुछ विधि के ही हाथ है तो मुहूर्त निकलवाने की जरूरत क्या है?

ऐसा प्रतीत होता है कि विधि का विधान तो काम करता ही है, मगर किसी भी कार्य की सफलता में कई फैक्टर काम करते हैं। वस्तुतः विधि अपनी ओर से कुछ भी निर्धारित नहीं करती। वह हमारे कर्मों, काम के प्रति समर्पण, लगन, मेहनत आदि से ही गणना कर निर्धारण करती है। कदाचित पूर्व जन्म के कर्म व संस्कार भी भूमिका अदा करते हैं। शुभ समय में काम आरंभ करना भी एक फैक्टर है, मगर अकेले इससे काम नहीं चलता, अन्य फैक्टर भी काम करते हैं। इसी कारण शुभ मुहूर्त में कार्यारंभ करने पर भी कई बार असफलता हाथ लगती है। 

एक और बात ये भी लगती है कि जीवन के सोलह संस्कार व अन्य बड़े काम पूर्व कर्मों के आधार पर पहले से निर्धारित होते हैं, मगर दैनिक दिनचर्या से जुड़े छोटे-मोटे कार्य में शुभ मुहूर्त अपनी भूमिका निभाता है। इसका आप स्पष्ट अनुभव भी कर सकते हैं। चूंकि शुभ मुहूर्त का अस्तित्व माना गया है, इस कारण यह जानते हुए भी कि होगा वही जो मंजूरे खुदा होगा, हम शुभ मुहूर्त निकलवाते हैं। और सफलता नहीं मिलने पर हम यह मान कर अपने आप को संतुष्ट करते हैं कि हमारी किस्मत में नहीं था, या फिर हमसे कोई त्रुटि हो गई होगी।


बुधवार, जून 24, 2026

क्या भूत-प्रेत के पैर उलटे होते हैं?

लोकविश्वासों और कथाओं में भूत-प्रेत के पैर उलटे होने की धारणा बहुत प्रचलित है, लेकिन इसे समझना जरूरी है कि यह आस्था और लोककथा का विषय है, वास्तविकता या विज्ञान का नहीं। उत्तर भारत, राजस्थान, सिंधी लोकविश्वास और बंगाल की कथाओं में कहा जाता है कि डायन, चुड़ैल या प्रेत के पैर आगे से नहीं, पीछे की ओर मुड़े होते हैं। माना जाता है कि यह उनकी पहचान छिपाने का तरीका है, ताकि देखने वाला धोखा खा जाए। कई लोककथाओं में बताया जाता है कि यदि किसी सुंदर स्त्री के पैरों की दिशा उलटी दिखे, तो वह साधारण मनुष्य नहीं होती। वस्तुतः उलटे पैर प्रकृति-विरोध का प्रतीक हैं, यानी जो सामान्य व्यवस्था से बाहर हो। मनोवैज्ञानिक रूप से यह डर पैदा करने की एक युक्ति है, क्योंकि मनुष्य को असामान्यता से भय लगता है। समाज में यह कथा अक्सर रात, सुनसान रास्तों और अज्ञात भय से जुड़ी है।

राजस्थानी में कहा जाता है कि “जिण रात जी खामोशी में, सुंदर नारीं मिलै, ता पहिंजां पग जरूर देखिजे।” मरुधरा में कहते हैं, रात का रास्ता और औरत की मुस्कान,

दोनों पर भरोसा मत करना। राजस्थानी में कथा है कि एक बार राणावत जी देर रात खेत से लौट रहे थे। पीपल के नीचे एक गोरी-सी बाई बैठी रो रही थी। उससे पूछा “बाईसा, क्यां बात है?” वह बोली, “घर सूं बिछुड़ गई हूँ, थोड़ो साथ दे दो।” आवाज में ऐसा जादू,

कि राणावत जी आगे बढ़ गए। पर जैसे ही चाँद बादलों से निकला, नजर नीचे गई, पांव की एड़ी आगे थी, उँगलियाँ पीछे।

राणावत जी चिल्लाए, “जय माताजी!”

सिंधी में कथा है कि एक व्यापारी लखूमल ऊंटों का कारवां लेकर उजैन से लौट रहा था। रात पड़ गई। दूर एक दीपक जलता दिखा। वहीं एक स्त्री खड़ी थी। लंबे केश, काजल भरी आंखें, स्वर मीठा जैसे सिंधु की धारा। उसने कहा, “पानी पिलायो, मुसाफिर”। लखूमल का मन पिघल गया।

ज्यों ही उसने मशक नीचे रखी, नजर पैरों पर पड़ी। पैर आगे नहीं, पीछे की ओर मुड़े थे। उसके मुंह से अनायास निकला, “सांईं सच्चो!” 

तस्वीर का दूसरा पहलु यह है कि हिंदू शास्त्रों, उपनिषदों, गीता या पुराणों में कहीं भी भूत-प्रेत के उलटे पैरों का वर्णन नहीं मिलता। यह धारणा पूरी तरह लोकपरंपरा और कथाओं से आई है। जहां तक वैज्ञानिक दृश्टिकोण का सवाल है तो आज तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि किसी प्राणी के पैर उलटे हों और वह मनुष्य जैसा दिखे।


शुक्रवार, जून 19, 2026

नंगे पैर रहने से अनेकानेक लाभ

नंगे पैर रहने या चलने के कई शारीरिक, मानसिक और पारंपरिक लाभ माने गए हैं। कुछ विज्ञान से जुड़े हैं, कुछ अनुभव और संस्कृति से। नंगे पैर रहने से पैरों की मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं। जूते पैरों को सहारा देते हैं, जबकि नंगे पैर चलने से प्राकृतिक संतुलन बनता है और मांसपेशियाँ सक्रिय रहती हैं। इसके अतिरिक्त रक्त संचार बेहतर होता है। तलवों में अनेक नर्व पॉइंट्स होते हैं। जमीन से सीधा संपर्क रक्त प्रवाह को उत्तेजित करता है। साथ ही पैरों की बनावट सुधरती है। लंबे समय तक जूते पहनने से अंगुलियाँ दबती हैं। नंगे पैर रहने से पैर अपनी प्राकृतिक आकृति में रहते हैं। नंगे पैर रहने से घुटनों और कमर पर दबाव कम पडता है। सही मुद्रा बनती है, जिससे जोड़ों पर अनावश्यक तनाव घटता है। एक महत्वपूर्ण बात। मानसिक व तंत्रिका लाभ होता है। तनाव कम होता है। घास, मिट्टी या रेत पर नंगे पैर चलना (जिसे ग्राउंडिंग या अर्थिंग कहा जाता है) मन को शांत करता है। एक लाभ यह भी है कि इससे एकाग्रता बढ़ती है। शरीर और मस्तिष्क का तालमेल बेहतर होता है, जिससे ध्यान और सजगता बढ़ती है। भारतीय परंपरा में माना जाता है कि नंगे पैर रहने से शरीर की नकारात्मक ऊर्जा पृथ्वी में चली जाती है। मंदिरों में नंगे पैर जाना विनम्रता और आत्म-नियंत्रण का प्रतीक माना गया है। ध्यान रखने योग्य बातें यह हैं। बहुत गरम, ठंडी या गंदी सतह पर नंगे पैर न चलें। 

कुछ शोधों में पाया गया है कि जब शरीर के तलवे पृथ्वी की सतह से सीधे संपर्क में आते हैं, तो इससे कुछ एंटीऑक्सिडेंट- जैसे इलेक्ट्रॉनों का प्रभाव शरीर में बढ़ सकता है, जिससे सूजन से जुड़े बायोमार्कर कम होते हैं, जो शरीर में जलन और दर्द को घटा सकते हैं। एक अध्ययन में पाया गया कि ग्राउंडिंग के एक सत्र (लगभग 1 घंटे) के बाद रक्त की मोटाई कम हो सकती है। इसका मतलब बेहतर रक्त प्रवाह और संभावित रूप से दिल पर सकारात्मक असर पडता है। कुछ शोध बताते हैं कि पृथ्वी के संपर्क से कॉटिसोल (तनाव-हार्मोन) का स्तर संतुलित हो सकता है और स्लीप-वेक चक्र में सुधार हो सकता है, जिससे नींद बेहतर होती है।


गुरुवार, जून 18, 2026

नाम में बहुत कुछ रखा है

कर्म प्रधान लोगों को आपने अमूमन यह कहते हुए देखा होगा कि नाम में क्या रखा है, काम ही महत्वपूर्ण है। जो कर्मठ हैं, उनकी यह सोच बिलकुल सही है। वे काम इसलिए करते हैं कि इससे उनको आत्म संतोष मिलता है, सुकून मिलता है। उन्हें इस बात की कोई फिक्र नहीं होती कि उनका नाम हो रहा है या नहीं। लोग वाहवाही कर रहे हैं या नहीं। उन्हें तो अपने कर्तव्य पालन से ही मतलब होता है। आपने यह भी देखा होगा कि कई लोग प्रसिद्धि की चाह के बिना परोपकार करते हैं। ये नहीं देखते कि कोई देख भी रहा है या नहीं। हमारे यहां तो यह तक कहा जाता है कि एक हाथ से दान दें तो दूसरे हाथ को पता नहीं लगना चाहिए, वही असली दान है। इसके विपरीत अधिसंख्य लोग प्रसिद्धि की चाह में ही काम करते हैं। तभी तो कहा जाता है कि संन्यस्थ हो कर वन को प्रस्थान कर जाने वाले भी लोकेषणा से मुक्त नहीं हो पाते। गृहस्थी छोड़ कर एकांत में जा कर रहने वाले भले ही भौतिक सुख से परे हो जाते हों, मगर जंगल में भी उनका आत्मिक पोषण इससे होता है कि उनके शिष्य कितने हैं। उनका नाम कितना हो रहा है। इसको लेकर संतों के बीच प्रतिस्पर्द्धा तक होती है।

वस्तुतः प्रथम महिमा काम की ही है। तभी तो कहते हैं कि काम बोलता है। बोलता है अर्थात नाम की स्थापना करता है। यानि कि काम का बाय प्रोडक्ट है नाम। मगर इसका ये भी अर्थ नहीं कि नाम का कोई महत्व नहीं। भले ही दूसरे नंबर पर हो, मगर नाम की भी भारी महिमा है। विद्वान कहते हैं कि कलियुग में भगवान अवतार रूप में तो हैं नहीं, ऐसे में उनके नाम की ही महिमा है। राम से बड़ा राम का नाम। उनका नाम लेने व स्मरण करने मात्र से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। भगवान राम के नाम का कितना चमत्कार है, इसका उल्लेख यह बताते हुए कहा जाता है कि लंका विजय के लिए जाते समय समुद्र को लांघने के लिए जो पुल बनाया गया, उनमें इस्तेमाल किए गए पत्थरों पर राम नाम लिखा गया और वे पानी में तैरने लगे।

नाम की महिमा का दूसरा उदाहरण देखिए। जब गुरू द्रोणाचार्य ने एकलव्य को शिष्य बनाने से इंकार कर दिया तो उसने एकांत में उनके नाम से एक प्रतिमा बनाई और उसी के सामने धनुर्विद्या सीखी। एकनिष्ठ भाव के कारण वह अर्जुन से भी अधिक योग्य धनुर्धर बना।

नाम स्मरण का एक चमत्कार यह भी माना जाता है कि कोई शिष्य जब एकाग्रता के साथ दिवंगत गुरू का नाम स्मरण करता है तो वे सशरीर तो आ नहीं सकते, मगर गंध के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं।

कल्याण नामक पत्रिका में मैने एक दृष्टांत पढ़ा था। वह इस प्रकार है। एक बार हनुमानजी का एक भक्त, जो कि शिक्षक था, प्रातरूकाल हनुमानजी की आराधना में इतना तल्लीन हो गया कि उसे स्कूल पहुंचने में देर हो गई। वह भागता-भागता स्कूल पहुंचा और प्रधानाध्यापक से क्षमा याचना की कि वह विलंब से आया है। इस पर प्रधानाध्यापक ने कहा कि क्यों मजाक करते हो, आप तो समय पर आ गए थे। हनुमानजी का भक्त चकित रह गया। वह समझ गया कि उसकी जगह हनुमानजी ने उपस्थिति दर्ज करवाई है।

हालांकि दुराचार के मामले में आसाराम बापू आजकल जेल में हैं, मगर जब वे प्रसिद्धि के चरमोत्कर्ष पर थे, तब उनकी सभाओं में उनके अनुयायी अपना अनुभव बताते थे कि संकट के समय उन्होंने आसाराम बापू को याद किया और वे किसी न किसी रूप में वहां मौजूद हुए और उन्हें संकट से उबारा।

जरा और विस्तार में जाएं तो आपने देखा होगा कि कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करने से पहले गुरू के नाम का स्मरण करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इससे उनके गुरू की शक्ति उनमें प्रविष्ठ कर जाती है। मैने ऐसी कई महिलाओं को देखा है, जो कोई व्यंजन विशेष बनाने से पहले उसको याद किया करती हैं, जिनसे उन्होंने वह व्यंजन बनाना सीखा था। मैने स्वेटर की बुनाई शुरू करते वक्त महिलाओं को अपनी गुरू को याद करते हुए देखा है। कई रसोइये भी अपने गुरू का नाम स्मरण करके रसोई बनाना आरंभ करते हैं। हो सकता है ऐसा सम्मान देने या कृतज्ञता प्रकट करने के लिए किया जाता हो, मगर माना यही जाता है कि नाम का स्मरण करने से शक्ति मिलती है।

नाम के एक मायने ब्रांड भी होता है। नाम स्थापना के लिए बाकायदा ब्रांडिंग की जाती है। कई प्रॉडक्ट ब्रांडिंग के कारण ही मार्केट में छाये हुए हैं। इसका एक उदाहरण बाबा रामदेव हैं। उनकी ब्रांडिंग इतनी तगड़ी है कि पतंजलि के नाम से उनके प्रॉडक्ट धड़ल्ले से बिकते हैं। ठीक इसी प्रकार मोदी भी एक नाम है, जो कि ब्रांड बन गया है। इसके लिए ढ़ेर सारे जतन किए गए थे। उनके नाम से भाजपा की नैया पार लग गई। भाजपा सरकार के दुबारा प्रचंड बहुमत से सत्ता में आने का सारा श्रेय मोदी ब्रांड को ही जाता है।

इन सभी उदाहरणों से यह सिद्ध होता है कि नाम की वाकई महिमा है। किसी का नाम लेकर काम करने से उनकी शक्ति भी काम करती है। जो इंसान सिद्ध, साहसी, धार्मिक या शुभ-फलदायी हो, उसका नाम लेने से उसके गुण काम में उतरते हैं। किसी मुश्किल काम से पहले बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि फलाँ का नाम लेके जा, काम बन जाएगा।


रविवार, जून 07, 2026

देवी-देवताओं के वाहन पशु-पक्षी

देवी और देवता 33 प्रकार के होते हैं। प्रत्येक देवी और देवता का एक वाहन होता है। देवी-देवताओं ने अपने वाहन के रूप में कुछ पशु या पक्षियों को चुना है, तो इसके पीछे उनकी विशिष्ठ योग्यता ही रही है। अध्यात्मिक, वैज्ञानिक और व्यवहारिक कारणों से भारतीय मनीषियों ने भगवानों के वाहनों के रूप में पशु-पक्षियों को जोड़ा है। यह भी माना जाता है कि देवताओं के साथ पशुओं को उनके व्यवहार के अनुरूप जोड़ा गया है। अगर पशुओं को भगवान के साथ नहीं जोड़ा जाता तो शायद पशु के प्रति हिंसा का व्यवहार और ज्यादा होता। भारतीय मनीषियों ने प्रकृति और उसमें रहने वाले जीवों की रक्षा का एक संदेश दिया है। हर पशु किसी न किसी भगवान का प्रतिनिधि है, उनका वाहन है, इसलिए इनकी हिंसा नहीं करनी चाहिए।

ग्रंथों के अनुसार विष्णु का वाहन गरुड़ है। माना जाता है कि गिद्धों (गरुड़) की एक ऐसी प्रजाति थी, जो बुद्धिमान मानी जाती थी और उसका काम संदेश को इधर से उधर ले जाना होता था, जैसे कि प्राचीनकाल से कबूतर भी यह कार्य करते आए हैं। प्रजापति कश्यप की पत्नी विनता के 2 पुत्र हुए- गरुड़ और अरुण। गरुड़जी विष्णु की शरण में चले गए और अरुणजी सूर्य के सारथी हुए। सम्पाती और जटायु इन्हीं अरुण के पुत्र थे।

मां लक्ष्मी का वाहन उल्लू है। पश्चिमी मान्यता अनुसार किस व्यक्ति को मूर्ख बनाना अर्थात उल्लू बनाना कहा जाता है। इसका यह मतलब कि मूर्ख व्यक्ति को उल्लू समझा जाता है, लेकिन यह धारणा गलत है। उल्लू सबसे बुद्धिमान निशाचारी प्राणी होता है। उल्लू को भविष्य का ज्ञान पहले से ही हो जाता है। उल्लू को भारतीय संस्कृति में शुभता और धन संपत्ति का प्रतीक माना जाता है। 

मां सरस्वती का वाहन हंस है। हंस पवित्र, जिज्ञासु और समझदार पक्षी होता है। इसकी खासियत हैं कि यह अन्य पक्षियों की अपेक्षा सबसे ऊंचाई पर उड़ान भरता है और लंबी दूरी तय करने में सक्षम होता है। जो ज्ञानी होते हैं वे हंस के समान ही होते हैं और जो बुद्धत्व प्राप्त कर लेते हैं, उनको परमहंस कहा गया है। मां सरस्वती का हंस पर विराजमान होना यह बताता है कि ज्ञान से ही जिज्ञासा को शांत किया जा सकता है। ज्ञान से ही जीवन में पवित्रता, नैतिकता, प्रेम और सामाजिकता का विकास होता है।

शिव का वाहन नंदी बैल है। शिव के एक गण का नाम है नंदी। प्राचीनकालीन किताब कामशास्त्र, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और मोक्षशास्त्र में से कामशास्त्र के रचनाकार नंदी ही थे। विश्व की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं में बैल को महत्व दिया गया है। जिस तरह गायों में कामधेनु श्रेष्ठ है उसी तरह बैलों में नंदी श्रेष्ठ है। वह बल और शक्ति का भी प्रतीक है। बैल को मोह-माया और भौतिक इच्छाओं से परे रहने वाला प्राणी भी माना जाता है। यह सीधा-साधा प्राणी जब क्रोधित होता है तो सिंह से भी भिड़ लेता है। यही सभी कारण रहे हैं, जिसके कारण भगवान शिव ने बैल को अपना वाहन बनाया। शिवजी का चरित्र भी बैल समान ही माना गया है। मां पार्वती का वाहन बाघ है, तो मां दुर्गा का वहन शेर। माता दुर्गा को शेरावाली कहा जाता है।

स्कंद पुराण के तमिल संस्करण कांडा पुराणम में उल्लेख है कि देवासुर संग्राम में भगवान शिव के पुत्र मुरुगन (कार्तिकेय) ने दानव तारक और उसके दो भाइयों सिंहामुखम एवं सुरापदम्न को पराजित किया था। अपनी पराजय पर सिंहामुखम माफी मांगी तो मुरुगन ने उसे एक शेर में बदल दिया और अपना माता दुर्गा के वाहन के रूप में सेवा करने का आदेश दिया। 

यमराज का वाहन भैंसा है। भैंसे का रूप जिस तरह से भयानक होता है उसी तरह यमराज का रूप भी भयानक है। अतः यमराज उसको अपने वाहन के तौर पर प्रयोग करते हैं।

देवी गंगा का वाहन मगरमच्छ है। सिंधु, गंगा, नर्मदा, ब्रह्मपुत्र, कावेरी आदि नदियों में जल में विचरण करने वाला प्रमुख प्राणी मगरमच्छ ही है।

बहुत कम लोगों को पता होगा कि शनिदेव की सवारी कौवा या गिद्ध ही नहीं बल्कि पूरे 9 सवारी शनिदेव की है। जैसे- गिद्ध, घोड़ा, गधा, कुत्ता, शेर, सियार, हाथी, मोर और हिरण हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि शनिदेव जिस वाहन पर सवार होकर जिसके पास भी जाते हैं, वह व्यक्ति उसी के हिसाब से फल का उत्तरदायी होता है। हालांकि कौवे को उनकी मुख्य सवारी माना जाता है।

भगवान भैरव का वाहन कुत्ता माना जाता है। हालांकि भगवान भैरव ने इसे अपना वाहन तो नहीं बनाया, लेकिन वे हमेशा इसे अपने साथ रखते हैं। मान्यता है कि कुत्ते को भोजन देने से भैरव महाराज प्रसन्न होते हैं और हर तरह के आकस्मिक संकटों से वे भक्त की रक्षा करते हैं। हनुमानजी पिशाच को अपना आसन बनाकर उस पर बैठते हैं।

गणेष जी का वाहन मूषक अर्थात चूहा है। इसकी विशेषता है कि वह हर चीज को कुतर डालता है। वह यह नहीं देखता की वस्तु आवश्यक है या अनावश्यक। इसी प्रकार कुतर्की भी यह विचार नहीं करते की यह कार्य शुभ है या अशुभ। श्रीगणेश बुद्धि एवं ज्ञान के देवता हैं तथा कुतर्क मूषक है, जिसे गणेशजी ने अपने नीचे दबा कर अपनी सवारी बना रखा है। कार्तिकेय का वाहन मयूर है। इंद्र ने अपना वाहन ऐरावत नामक एक हाथी को बनाया। समुद्र मंथन के दोरान 14 रत्नों में से एक ऐरावत की भी उत्पत्ति हुई थी। हाथी शांत, समझदार और तेज बुद्धि का प्रतीक है।


शनिवार, जून 06, 2026

पीछे से आवाज क्यों नहीं दी जाती?

हम सब जानते हैं कि जब भी कोई किसी काम से रवाना होता है तो जाते समय उसको पीछे से आवाज नहीं दिया करते। इसे अपशकुन माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि पीछे से आवाज देने पर उस कार्य के संपन्न होने में संशय उत्पन्न हो जाता है, जिसके लिए वह निकला है। इसके अतिरिक्त इसे किसी अनिष्ट की आशंका का संकेत भी माना जाता है। सलाह यही दी जाती है कि रवाना होने की बजाय कुछ पल ठहर लिया जाए। उस वक्त को टाल दिया जाए। यानि कि घर आ कर कुछ पल वापस पलंग या कुर्सी पर बैठा जाए या फिर पानी का एक गिलास पी लिया जाए। उसके बार रवाना हुआ जाए।

जरा गहराई में जाएं तो पाएंगे कि यकायक पीछे से आवाज देने का भाव हमारे मन में प्रकृति ही पैदा करती है। अर्थात जिस पल में वह भाव उत्पन्न होता है, वह किसी काम के निकलने के लिए उचित नहीं होता। प्रकृति उसे टाले जाने की सलाह दे रही होती है। अगर हम उसे अनसुना करते हैं तो उसका परिणाम विपरीत आ जाता है।

अगर इसको अंध विश्वास भी मान लें तो भी काम की सफलता इस कारण संदिग्ध हो जाती है, क्यों कि हमारे मन में यह धारणा पहले से बैठी हुई है कि पीछे से आवाज आई है, यानि कि कुछ गड़बड़ होगी ही, हमारी आत्मशक्ति में कुछ कमजोरी आ जाती है। हम वह कार्य उतने मनोयोग से नहीं कर पाते, जितने से किये जाने की जरूरत होती है। और वाकई काम ठीक से पूरा नहीं होता।

कई बार ऐसा भी होता है कि जैसे ही कोई रवाना होता है, और यकायक हमारे मन में उसे किसी बात की याद दिलाने का ख्याल आता है, मगर चूंकि हम मानते हैं कि पीछे से आवाज देना ठीक नहीं है, हम अपने आपको रोक लेते हैं और व्यक्ति को जाने देते हैं और पाते हैं कि वह स्वतः ही कुछ पल बाद वापस चला आता है, चूंकि तब तक टेलीपैथी से उसके मस्तिष्क में हमारा मस्तिष्क लौटने का संकेत भेज चुका होता है। ऐसा भी होता है कि भले ही हमने अपने आप को टोकने से रोक लिया हो फिर भी काम बिगड़ जाता है। इसका सीधा अर्थ है कि प्रकृति ने तो हमें संकेत दिया था, मगर हमने ही या तो अनसुना कर दिया या फिर बलात खुद को रोक दिया।

ऐसा नहीं कि केवल अन्य व्यक्ति के मन में ही पीछे से आवाज देने का भाव आता है, कई बार हम खुद काम के लिए निकलते हुए महसूस करते हैं कि पीछे से आवाज आ रही है, कुछ अधूरा-अधूरा सा है, या फिर हम कुछ भूल रहे हैं। कई बात तो दिमाग पर जोर डालने पर पकड़ लेते हैं कि हम क्या भूल रहे हैं, मगर कई बार ऐसा नहीं हो पाता। मजे की बात ये है कि क्या भूल रहे हैं, यह घर के भीतर जा कर उसी स्थान पर खड़े होने पर ही याद आता है, जहां से हमारे विचार या दृश्य की शृंखला टूटी है। ऐसा भी होता है कि लाख याद करने पर भी हमें याद नहीं आता तो हम काम के लिए रवाना हो जाते हैं और गन्तव्य स्थान पर पहुंचने के बाद ही पता लगता है कि अमुक चीज भूल गए।

सच में प्रकृति ने हमें मस्तिष्क नामक गजब का सुपर कंप्यूटर दिया है, जो अपने आस-पास से संकेत ग्रहण करता है और संकेत प्रेषित भी करता है। वैज्ञानिक भी इसे स्वीकार करने लगे हैं। हालांकि वे इसका वैज्ञानिक विवेचन नहीं कर पाते, मगर इसे टेली रेस्पोंस पॉवर के नाम से संबोधित करते हैं। टेली रेस्पोंस पॉवर के अनेक सफल प्रयोग हो चुके हैं। यह पूर्ण प्रमाणिक विज्ञान नहीं है, चूंकि यह हमारी मानसिक शक्ति पर निर्भर करता है। यह हमारे संदेश प्रसारण की क्षमता व संदेश ग्रहण करने की पात्रता पर निर्भर करता है। टेली रेस्पोंस पॉवर पर फिर कभी विस्तार से चर्चा करेंगे।

इस संदर्भ में चैट जीपीटी बताता है कि पीछे से किसी को आवाज देना असभ्यता माना जाता है, सामने से बुलाना सम्मान और शालीनता का प्रतीक है। पीछे से पुकारना ऐसे लगता है जैसे आदेश दिया जा रहा हो, अनुरोध नहीं। बुजुर्गों, गुरुओं या सम्मानित व्यक्तियों को पीछे से आवाज देना विशेष रूप से अनुचित माना गया है।

मनोवैज्ञानिक दृश्टि से पीछे से अचानक आवाज आने पर व्यक्ति चौंक सकता है। भय, असहजता या भ्रम पैदा हो सकता है। यह असुरक्षा की भावना जगाता है। कई परंपराओं में पीछे से आवाज देने को अशुभ या अमंगल संकेत माना गया है। कुल मिला कर पीछे से आवाज देना सिर्फ एक आदत नहीं, बल्कि असभ्यता, असावधानी और अशिष्ट व्यवहार का प्रतीक माना गया है, इसलिए कहा गया है कि “पीछे से आवाज नहीं दी जाती।”