राजस्थानी में कहा जाता है कि “जिण रात जी खामोशी में, सुंदर नारीं मिलै, ता पहिंजां पग जरूर देखिजे।” मरुधरा में कहते हैं, रात का रास्ता और औरत की मुस्कान,
दोनों पर भरोसा मत करना। राजस्थानी में कथा है कि एक बार राणावत जी देर रात खेत से लौट रहे थे। पीपल के नीचे एक गोरी-सी बाई बैठी रो रही थी। उससे पूछा “बाईसा, क्यां बात है?” वह बोली, “घर सूं बिछुड़ गई हूँ, थोड़ो साथ दे दो।” आवाज में ऐसा जादू,
कि राणावत जी आगे बढ़ गए। पर जैसे ही चाँद बादलों से निकला, नजर नीचे गई, पांव की एड़ी आगे थी, उँगलियाँ पीछे।
राणावत जी चिल्लाए, “जय माताजी!”
सिंधी में कथा है कि एक व्यापारी लखूमल ऊंटों का कारवां लेकर उजैन से लौट रहा था। रात पड़ गई। दूर एक दीपक जलता दिखा। वहीं एक स्त्री खड़ी थी। लंबे केश, काजल भरी आंखें, स्वर मीठा जैसे सिंधु की धारा। उसने कहा, “पानी पिलायो, मुसाफिर”। लखूमल का मन पिघल गया।
ज्यों ही उसने मशक नीचे रखी, नजर पैरों पर पड़ी। पैर आगे नहीं, पीछे की ओर मुड़े थे। उसके मुंह से अनायास निकला, “सांईं सच्चो!”
तस्वीर का दूसरा पहलु यह है कि हिंदू शास्त्रों, उपनिषदों, गीता या पुराणों में कहीं भी भूत-प्रेत के उलटे पैरों का वर्णन नहीं मिलता। यह धारणा पूरी तरह लोकपरंपरा और कथाओं से आई है। जहां तक वैज्ञानिक दृश्टिकोण का सवाल है तो आज तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि किसी प्राणी के पैर उलटे हों और वह मनुष्य जैसा दिखे।