तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

सोमवार, अगस्त 10, 2026

जोडी का क्या महत्व है?

यह जगत द्वैत है। दो तत्वों से मिल कर बना है। दोनों का महत्व है। किसी एक को छोडा नहीं जा सकता। इसलिए जोडी की महत्ता है। जोड़ी का महत्व अलग-अलग संदर्भों में अलग अर्थ रखता है। आपको ख्याल में होगा कि सनातन धर्म में यज्ञ-हवन पूर्ण तभी होता है, जब यजमान जोडी में हो। इसका सबसे बडा उदाहरण है कि जब ब्रम्हाजी ने पुश्कर में सृश्टि यज्ञ किया तो उनकी पत्नी सावित्री के विलम्ब से आने पर मुहूर्त न टले, इसके लिए एक युवती गायत्री को साथ बैठा कर यज्ञ पूरा किया गया। लोकजीवन में जोड़ी केवल दो व्यक्तियों का साथ नहीं, बल्कि संतुलन का प्रतीक है। इसलिए कहा जाता है कि अकेला दीप हवा में बुझ जाता है, दो दीप साथ हों तो उजाला टिकता है। वस्तुतः जोड़ी जीवन की कठिनाइयों को साझा करने की शक्ति देती है। सामाजिक जीवन में इसकी अहमियत है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि पति-पत्नी, दो दोस्त, गुरु-शिष्य व भाई-बहिन की जोडी है। इन सब रिश्तों में जोड़ी पूरकता का भाव दर्शाती है, एक की कमी दूसरा पूरी करता है। हिंदू दर्शन में शिव-शक्ति, प्रकृति-पुरुष, सूर्य-चंद्र यह बताता है कि सृष्टि द्वैत से चलती है। अकेला तत्व अधूरा है। इसी संदर्भ में रात-दिन, सुख-दुख का जिक्र किया जा सकता है। सूफी नजरिये में जोड़ी इश्क का प्रतीक है। बंदा और खुदा। यहां जोड़ी बाहरी नहीं, अंतर्मन की यात्रा है। कई कथाओं में कहा जाता है कि जो अकेला चलता है, वह जल्दी थकता है। जो जोड़ी में चलता है, वह दूर तक जाता है। इसलिए जोड़ी को भाग्य का सहारा माना गया।

व्यावहारिक जीवन में जोड़ी का अर्थ केवल विवाह नहीं, बल्कि जब ये संतुलन में हों, तभी जीवन फलता है। सिंधी लोक परंपरा में जोड़ी केवल पति-पत्नी का संबंध नहीं, बल्कि धर्म, भाग्य और लोक मर्यादा का संयुक्त स्वरूप है। तभी तो कहते हैं कि जोडियां भगवान बनाता है। यानि जोड़ी को ईश्वर की लिखावट माना जाता है, जिसे बदला नहीं, निभाया जाता है। लोकगीत कहते हैं, लाड़ी बिना लाड़ो अधूरो, लाड़े बिना लाड़ी लाचार।

शुक्रवार, अगस्त 07, 2026

शव यात्रा देखने को शुभ क्यों माना जाता है?

हमारे यहां लोग शगुन को बहुत महत्व देते हैं। यदि आप घर से कहीं जा रहे हैं तो सामने पानी से भरा घड़ा सिर पर रख कर लाती महिला, झाड़ू लगाती हरिजन महिला, गाय आदि आने पर शुभ माना जाता है। मान्यता है कि ऐसा होने पर आप जिस काम से जा रहे हैं, उसके पूर्ण होने की संभावना बढ़ जाती है। कई लोग तो शुभ कार्य के लिए घर से बाहर जाते वक्त बाकायदा घड़ा या कलश सिर पर लिए हुए घर की ही किसी महिला को खड़ा कर देते हैं। इसी प्रकार जाते समय मार्ग में सामने से किसी की शव यात्रा आती दिखाई दे तो भी यह पक्के तौर पर माना जाता है कि हम जिस कार्य के लिए निकले हैं, वह जरूर पूर्ण होगा। रुके हुए काम पूरे होंगे। यह एक ऐसी मान्यता है, जो कि आम तौर पर चलन में भी है। लोग शव यात्रा देखने पर हाथ जोड़ कर खड़े हो जाते हैं। यदि किसी वाहन में हैं तो उससे उतर कर खड़े हो कर हाथ जोड़ते हैं और शव यात्रा के निकल जाने तक रुकते हैं। कदाचित श्रद्धा के भाव से। कई लोग शिव-शिव का उच्चारण करते हैं। इसके साथ ही मृतात्मा की शांति के लिए प्रार्थना भी करते हैं। ज्ञातव्य है कि शिव का मतलब होता है मुक्ति, इसलिए शव को देखकर शिव का नाम लेना अच्छा माना जाता है।

यह तो हुई मान्यता की बात, मगर शव यात्रा सामने से आने पर उसे शुभ क्यों माना जाता है, इस बारे में शास्त्रों बहुत पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है। यानि कि यह तथ्य अनुभव के आधार पर स्थापित किया गया है। कुछ जानकार लोग मानते हैं कि शिव शिव का उच्चारण करने और मृत आत्मा की शांति की प्रार्थना करने से वह प्रसन्न होती है और अपने साथ उस प्रणाम करने वाले व्यक्ति के सभी कष्टों, दुखों और अशुभ लक्षणों को अपने साथ ले जाती है।

प्रसंगवश शव यात्रा से जुड़ी यह मान्यता भी ख्याल में आती है कि जब किसी बुजुर्ग का निधन होने पर उसकी शव यात्रा के दौरान उस पर सिक्के उछाले जाते हैं। उन सिक्कों को लोग लूटते हैं या जमीन पर गिर जाने पर उठाते हैं। मान्यता है कि ऐसे सिक्कों को तिजोरी में रखने पर वह सदा भरी रहती है। इसका भी कोई तार्किक आधार मौजूद नहीं है। यह मात्र आस्था है, जो कदाचित अनुभव के आधार पर कायम हुई है।


सोमवार, अगस्त 03, 2026

काबा शरीफ की परिक्रमा एंटी क्लॉक वाइज होती है

क्या आप जानते हैं कि काबा शरीफ की परिक्रमा, जिसे तवाफ कहा जाता है, एंटी-क्लॉकवाइज होती है।

मुसलमान जब मक्का शरीफ में उमरा या हज के दौरान तवाफ करते हैं, तो वे काबा के चारों ओर बाएं कंधे को काबा की तरफ रखते हुए घड़ी की सुइयों के उलटे यानि एंटी क्लॉक वाइज दिशा में सात चक्कर लगाते हैं। यह क्रम पैगम्बर हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और हजरत मुहम्मद की सुन्नत से चला आ रहा है।

एंटी-क्लॉक वाइज तवाफ करने के पीछे कारण यह भी माना जाता है कि पूरी कायनात में ग्रह-नक्षत्र सूर्य के चारों ओर,

इलेक्ट्रॉन परमाणु के नाभिक के चारों ओर और खगोलीय पिंड अपने केंद्र के चारों ओर इसी दिशा में घूमते हैं।

यानी यह दिशा फितरत यानि प्रकृति के नियमों से भी मेल खाती है। ग्रहों की गति के बारे में वैज्ञानिक तथ्य इस प्रकार हैंः- सौर मंडल के अधिकतर ग्रह जैसे पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, वरुण आदि सूर्य की परिक्रमा एंटी-क्लॉकवाइज दिशा में करते हैं। यह दिशा खगोलशास्त्र में प्रोगेड मोषन कहलाती है। इसी तरह अधिकतर ग्रह अपनी धुरी पर भी एंटी-क्लॉकवाइज घूमते हैं, जैसे पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है। कुछ अपवाद भी हैं। 

शुक्र अपनी धुरी पर क्लॉकवाइज घूमता है। अरुण का घूर्णन अक्ष लगभग 98° झुका हुआ है, इसलिए उसका घूमना भी असामान्य प्रतीत होता है।

786 का मतलब व महत्व क्या है?

 786 की संख्या अरबी भाषा में बिस्मिल्लाह-हिर्रहमा-निर्रहीम का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्रयोग की जाती है। यह एक छोटी सी दुआ है, जो कुरआन के प्रत्येक अध्याय के आरम्भ में लिखी जाती है। इसका मतलब है अल्लाह के नाम से, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है। इस्लाम धर्म में कोई भी काम शुरू करते समय “बिस्मिल्लाह-हिर्रहमा-निर्रहीम” पढते हैं।

सवाल उठता है कि 786 की उत्पत्ति कैसे हुई? परंपरागत रूप से अरबी में प्रत्येक अक्षर को एक संख्या का मूल्य प्रदान कर दिया गया है। बिस्मिल्लाह-हिर्रहमा-निर्रहीम लिखने में इसमें जो अक्षर आते हैं, उनका अंकीय मूल्य कुल मिला कर 786 होता है।

ज्ञातव्य है कि कुछ लोग जब कोई चीज रिकार्ड करते हैं अथवा पत्र में बिस्मिल्लाह लिखना चाहते हैं तो वह पूरी दुआ लिखने की बजाए केवल 786 लिख देते हैं। इस्लाम में इसे कोई धार्मिक महत्व प्राप्त नहीं है। यह मात्र एक साहित्यिक परम्परा है, जो अरबी साहित्य में जारी है। कुछ अंधविश्वासों ने आधुनिक रूप अपना लिया है। इसी तरह 786 भी एक आधुनिक हथियार बन गया है। कुछ धनवान मुसलमान यह चाहते हैं कि उनकी कारों के लिए एक ऐसा रजिस्ट्रेशन नम्बर मिल जाए, जिसके आखिरी अंक 786 हों। कुछ लोग चाहते हैं कि उनके मोबाइल फोन के अन्तिम अंक 786 हों। वे इसके लिए अच्छा-खासा धन खर्च करने के लिए तैयार होते हैं। सिनेमा उद्योग भी इस संख्या के भावनात्मक आकर्षण का शोषण करना चाहता है, जिसे बॉलीवुड की सफलतम फिल्म वीर जारा में शाहरुख खान को लाहौर जेल में कैदी संख्या 786 के रोल में देखा जा सकता है।

आपको याद होगा कि फिल्म दीवार में अमिताभ के सीने पर गोली लगती है और उन्हें कुछ नहीं होता। गोली उनके बिल्ला नम्बर 786 से टकरा कर बेकार हो जाती है। अमिताभ फिल्म कुली में वही चमत्कारी बिल्ला नंबर 786 लगाते हैं।