तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

मंगलवार, मार्च 10, 2026

नंदी के कान में क्यों बताते हैं मनोकामना?

आपने देखा होगा कि कई श्रद्धालु शिवजी के मंदिर में दर्शन को जाते हैं तो मंदिर के गर्भगृह के ठीक बाहर सामने स्थित नंदी की प्रतिमा के कान में कुछ फुसफुसाते हैं। असल वे नंदी को अपनी मनोकामना बताते हैं। विश्वास यह कि नंदी उनकी मनोकामना की जानकारी शिवजी को देंगे और शिवजी उसे पूरा करेंगे। असल में मान्यता है कि नंदी शिवजी के परमभक्त व उनके वाहन हैं। उसके सबसे करीब। अतः अर्जी ठीक मुकाम पर पहुंचेगी। यह ठीक वैसे ही है, जैसे श्रद्धालु दरगाह ख्वाजा साहब में हाजिरी के वक्त ख्वाजा साहब से दुआ मांगते हैं, मगर हाजिरी अर्थात जियारत की रस्म खुद्दाम साहेबान अदा करते हैं। इसी प्रकार तीर्थराज पुष्कर में स्नान के दौरान पूजा अर्चना किसी पुरोहित के माध्यम से करवाते है। बेशक अपने इष्ट से सीधे भी संपर्क साधा जा सकता है, मगर माध्यम की जरूरत होती ही है। जैसे मुवक्किल को वकील की जरूरत होती है। किसी सज्जन ने इंटरनेट पर लिखा है कि नंदी के कान में मनोकामना बताने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। यह आस्था मात्र है। बिलकुल यह प्रथा विज्ञान द्वारा प्रमाणित नहीं है। मगर वैज्ञानिक आधार तलााशना भी तो अर्थहीन है। क्या खादिम व पुरोहित की भूमिका का कोई वैज्ञानिक आधार है। नहीं। तो नंदी की अहमियत पर सवाल करना उचित कैसे हो सकता है?

पौराणिक कथा के अनुसार, शिलाद नाम के मुनि ने संतान प्राप्ति की कामना के साथ भगवान इंद्रदेव को रिझाने के लिए तपस्या की। परंतु, इंद्रदेव ने संतान का वरदान देने में असर्मथता जताते हुए भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अनुरोध किया। इसके बाद शिलाद मुनि ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की। जिसके बाद शिवजी प्रकट हुए और उन्होंने शिलाद को स्वयं के रूप में प्रकट होने का वरदान दिया। महादेव के वरदान के बाद शिलाद मुनि को नंदी के रूप में संतान प्राप्त हुई। शिवजी के आशीर्वाद के कारण नंदी अजर अमर हो गए। उन्होंने संपूर्ण गणों, गणेश व वेदों के समक्ष गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक कराया। जिसके बाद नंदी नंदीश्वर कहलाए। भगवान शिव ने नंदी को वरदान दिया कि जहां उनका निवास होगा, वहां स्वयं भी निवास करेंगे। मान्यता है कि तब से ही शिव मंदिर में भगवान शिव के सामने नंदी विराजमान रहते हैं।

सोमवार, मार्च 09, 2026

मौली व कलावा क्यों बांधा जाता है?

भारतीय परंपरा में हाथ की कलाई पर मौली या कलावा बांधने की रस्म सर्वविदित है। क्या आपने कभी ख्याल किया है कि मौली क्यों बांधी जाती है? वस्तुतः यह सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि आस्था, मनोविज्ञान, सामाजिक पहचान और प्रतीक-विद्या का सुंदर मेल है। प्राचीन काल में लोग मानते थे कि मौली में मंत्र-संरक्षित शक्ति होती है। यज्ञ, पूजा या संकल्प के समय इसे बांध कर व्यक्ति को नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा का संकेत दिया जाता था। यह मनोवैज्ञानिक सुरक्षा भी देती है। कलाई पर यह धागा दिखते ही मन में आत्मविश्वास बढ़ता है कि मैं संरक्षित हूं, शुभ कार्य कर रहा हूं। हिंदू कर्मकांड में संकल्प बहुत महत्त्वपूर्ण है। मौली इसी का प्रतीक है। कलाई पर हर बार नजर पड़ने से व्रत और अनुशासन याद रहता है, यह एक मानसिक रिमाइंडर भी है। 

आपको ख्याल में होगा कि कलावा सामान्यतः तीन रंगों में होता है। लाल रंग शक्ति, ऊर्जा व मंगल, पीला ज्ञान, बुद्धि, गुरु-शक्ति और सफेद पवित्रता व सत्य का प्रतीक है। इनका मिश्रण व्यक्ति की देव, धर्म और धर्म-चक्र से जुड़ाव को दर्शाता है। कुछ परंपराएं मानती हैं कि कलाई पर धागा बांधने से नाड़ी बिंदुओं पर हल्का दबाव पड़ता है और रक्त-संचार बेहतर होता है, ध्यान और मन में स्थिरता आती है। हालांकि यह आधुनिक विज्ञान से प्रमाणित नहीं है, पर एक्यूप्रेशर जैसी प्रणालियों में कलाई को महत्त्वपूर्ण माना जाता है। कुल मिला कर मौली सुरक्षा का प्रतीक तो है ही, संकल्प को स्मरण कराता है। मनोवैज्ञानिक सहारा देती है। यह पॉजिटिव रिइन्फोर्समेंट मन में शक्ति और आत्मविश्वास बढ़ाता है।

रक्षा बंधन के दिन बहिन का भाई को राखी या रक्षा सूत्र बांधने के पीछे भी रक्षा का संकल्प लेने का प्रतीक है। रक्षा सूत्र बांध कर बहिन भाई की सुरक्षा की कामना करती है, साथ ही भाई से उसकी सुरक्षा की उम्मीद करती है।

रक्षा-सूत्र अर्थात ऐसा धागा जो हमें किसी न किसी रूप में सुरक्षा प्रदान करता है, शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक।

पुराणों में उल्लेख है कि यज्ञ-कर्म, व्रत, संस्कार, पूजा आदि में पुरोहित दाएं हाथ पर रक्षा-सूत्र बांधता है। इसे प्रोटेक्शन टैग की तरह माना गया। यकीन है कि इससे नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है और शुभ कार्य में व्यवधान नहीं आता। मौली बांध कर यह मंत्र  बोला जाता है - येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः, अर्थात जिस धागे ने बलि और अन्य दैत्य राजाओं की रक्षा की, वही धागा तुम्हारी भी रक्षा करे। मंदिरों, त्योहारों और यज्ञों में सभी को रक्षा-सूत्र बांधा जाता है, यह समानता और सामूहिक आशीर्वाद का प्रतीक है। 

शनिवार, मार्च 07, 2026

गलती होने पर कान क्यों पकड़े जाते हैं?

गलती मनुष्य की स्वाभाविक प्रकृति है, किंतु गलती स्वीकार करना और उससे सीखना सभ्य समाज की पहचान मानी जाती है। भारतीय सामाजिक परंपरा में गलती होने पर कान पकड़ना केवल एक दंडात्मक क्रिया नहीं, बल्कि गहरे सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक अर्थों से जुड़ा हुआ प्रतीक है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी अपने मौन संदेश के कारण प्रभावी बनी हुई है।

भारतीय लोकजीवन में कान पकड़ना पश्चाताप और स्वीकारोक्ति का संकेत माना गया है। बचपन में माता-पिता और गुरु द्वारा गलती पर कान पकड़वाने की प्रथा इसी सोच से जुड़ी रही है कि व्यक्ति अपनी भूल को खुले मन से स्वीकार करे। यह एक तरह का सार्वजनिक कथन होता हैकृ“मैंने गलती की है और उसे सुधारने का संकल्प लेता हूँ।” इस क्रिया में न तो हिंसा है और न अपमान, बल्कि आत्मबोध की भावना निहित है।

धार्मिक और दार्शनिक दृष्टि से भी कान पकड़ने का विशेष अर्थ है। भारतीय चिंतन में कान को श्रवणेंद्रिय कहा गया है, जो ज्ञान ग्रहण करने का मुख्य माध्यम है। प्रतीकात्मक रूप से यह माना जाता है कि गलती इसलिए हुई क्योंकि व्यक्ति ने ठीक से सुना, समझा या ध्यान नहीं दिया। कान पकड़कर क्षमा मांगना इस स्वीकारोक्ति का संकेत है कि अब वह व्यक्ति सावधानीपूर्वक सुनेगा और सीखेगा। कुछ मान्यताओं में इसे बुद्धि के जागरण से भी जोड़ा गया है।

मनोवैज्ञानिक स्तर पर कान पकड़ना आत्मदंड की एक कोमल विधि है। जब व्यक्ति स्वयं को दोषी मानते हुए यह क्रिया करता है, तो उसके भीतर अपराधबोध और शर्म का भाव उत्पन्न होता है। यही भाव भविष्य में उसे वही गलती दोहराने से रोकता है। यह प्रक्रिया व्यक्ति के मन में अनुशासन और उत्तरदायित्व की भावना विकसित करती है।

आयुर्वेद और एक्यूप्रेशर की मान्यताओं के अनुसार कान में मस्तिष्क से जुड़े अनेक तंत्रिका बिंदु होते हैं। कान को पकड़ने या हल्के से दबाने से चेतना सक्रिय होती है और ध्यान केंद्रित होता है। संभवतः इसी कारण प्राचीन काल में शिक्षा के दौरान भी इस क्रिया का प्रयोग अनुशासन और एकाग्रता बढ़ाने के लिए किया जाता रहा है।

सामाजिक दृष्टि से कान पकड़ना अहंकार के विसर्जन की मुद्रा है। इसमें व्यक्ति स्वयं को छोटा कर सामने वाले को सम्मान देता है। यही कारण है कि यह क्षमा याचना का एक प्रभावी, त्वरित और मौन संकेत बन गया है, जिसे समाज सहज रूप से स्वीकार करता है।

अंततः कहा जा सकता है कि गलती पर कान पकड़ना केवल भय या दंड का परिणाम नहीं है, बल्कि यह सीखने की स्वीकृति, आत्मसंशोधन और विनम्रता का प्रतीक है। शायद इसी कारण यह सरल-सी परंपरा आज भी हमारे सामाजिक जीवन में जीवित और प्रासंगिक बनी हुई है।

शुक्रवार, फ़रवरी 27, 2026

क्या पारस मणि का अस्तित्व है?

पारस मणि या पारस पत्थर, जिसे अंग्रेजी में फिलोसोपर स्टोन कहा जाता है, एक दुर्लभ और रहस्यमय रत्न माना जाता है, जिसका उल्लेख प्राचीन भारतीय, यूनानी और इस्लामी रसायन शास्त्र में मिलता है। इसका जिक्र पौराणिक और लोक कथाओं में खूब मिलता है। इसे धातु-परिवर्तन करने वाला जादुई पत्थर माना गया। इसके हजारों किस्से और कहानियां समाज में प्रचलित हैं। कई लोग यह दावा भी करते हैं कि हमने पारस मणि देखी है। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में जहां हीरे की खदान है, वहां से 70 किलोमीटर दूर दनवारा गांव के एक कुएं में रात को रोशनी दिखाई देती है। लोगों का मानना है कि कुएं में पारस मणि है। कहते हैं कि पारसमणि आज भी हिमालय से लगे राज्यों में पाई जाती है। जैसे जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल, सिक्किम, असम, अरुणाचल आदि।

पारस मणि की प्रसिद्धि और लोगों में इसके होने को लेकर इतना विश्वास है कि भारत में कई ऐसे स्थान हैं, जो पारस के नाम से जाने जाते हैं। कुछ लोगों के आज भी पारस नाम होते हैं। मान्यता है कि पारस मणि या पारस पत्थर से लोहे की किसी भी चीज को छुआ देने से वह सोने की बन जाती थी। इससे लोहा काटा भी जा सकता है। कहते हैं कि कौवों को इसकी पहचान होती है। बहुत सी पुरानी रचनाओं जैसे रस रत्नाकर, रसार्णव आदि में पारस का उल्लेख रस विद्या के संदर्भ में हुआ है। योग और तांत्रिक परंपराओं में पारस को ज्ञान का प्रतीक भी कहा गया है, यानी जो अज्ञान को ज्ञान में बदल दे। वैज्ञानिक दृश्टि से आज तक ऐसा कोई पत्थर या धातु वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं हुआ है जो वास्तव में लोहे को सोने में बदल सके। इसलिए पारस मणि को काल्पनिक या प्रतीकात्मक वस्तु माना जाता है।


मंगलवार, फ़रवरी 17, 2026

सपने में सपना देखने के क्या मायने हैं?

सपने में सपना देखने को सामान्य भाषा में सपने के भीतर सपना कहा जाता है। मनोविज्ञान में इसे अंग्रेजी में फाल्स अवेकनिंग कहा जाता है, यानी ऐसा भ्रम कि व्यक्ति जाग गया है, जबकि वह अब भी सपना ही देख रहा होता है। इसमें व्यक्ति सपने में ही यह सपना देखता है कि वह जाग गया है। कई बार यह क्रम दो-तीन परतों तक चला जाता है। अक्सर यह स्थिति तनाव, अत्यधिक सोच, नींद की अनियमितता या गहरी मानसिक सक्रियता में होती है। भारतीय दार्शनिक संदर्भ में इसे स्वप्न के भीतर स्वप्न या स्वप्नावस्था का स्वप्न कहा जा सकता है। उपनिषदों की भाषा में यह चेतना की परतों, जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति के आपसी घुलाव का उदाहरण माना जाता है। उपनिषद और बौद्ध दर्शन, दोनों इसे केवल मानसिक घटना नहीं, बल्कि चेतना की परतों का संकेत मानते हैं। ज्ञातव्य है कि उपनिषद मनुष्य की चेतना को चार अवस्थाओं में बाँटते हैं। जागृत यानि बाह्य जगत का अनुभव, स्वप्न यानि भीतर का जगत, स्मृति और कल्पना, सुषुप्ति यानि गहरी नींद, जहाँ इच्छा-कल्पना भी लुप्त और तुरीय यानि शुद्ध साक्षी भाव (जो तीनों को देखता है)। सपने में सपना उपनिषदों के अनुसार यह बताता है कि स्वप्न भी अंतिम सत्य नहीं है, वह भी एक अनुभव मात्र है। बृहदारण्यक उपनिषद में संकेत मिलता है कि आत्मा स्वयं ही स्वप्न रचती है और स्वयं ही उसमें विचरती है। जब स्वप्न के भीतर दूसरा स्वप्न आता है, तब यह बोध उभरता है कि अनुभव के भीतर भी अनुभव संभव है। यानी जैसे जागृत जीवन एक बड़ा सपना हो सकता है, वैसे ही स्वप्न भी एक सूक्ष्म जाग्रत है। बौद्ध दर्शन में इसे माया के भीतर माया कहा जा सकता है। सपने में सपना देखना बौद्ध दृष्टि में अनित्यता और शून्यता की सीधी अनुभूति है। बुद्ध कहते हैं, सब कुछ स्वप्नवत है, फेन के समान है। तिब्बती बौद्ध परंपरा में इसे डीम योगा से जोड़ा जाता है, जहाँ साधक जानबूझ कर स्वप्न में यह पहचान विकसित करता है कि यह सपना है। सूफी कहते हैं कि “लोग सो रहे हैं, मरते हैं तो जागते हैं।” सपने में सपना देखना उस जागरण की एक रिहर्सल जैसा है।


मृतात्मा को बुलाया जा सकता है क्या?

यह कौतुहल लंबे समय से बना हुआ है कि क्या मृतात्मा को बुलाया जा सकता है या क्या मृतात्मा से बात की जा सकती है? इसका उत्तर धर्म, आध्यात्म, और विज्ञान, तीनों दृष्टियों से अलग-अलग है।

लगभग सभी धर्मों में माना गया है कि मृत आत्मा को बुलाना या उससे संपर्क करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। हिंदू मत के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा अपने कर्मों के अनुसार यमलोक या पितृलोक की यात्रा करती है। जब तक वह अपने अगले जन्म या मोक्ष की स्थिति में नहीं पहुंचती, तब तक उसे बाधित करना अधर्म माना जाता है। इसलिए “आत्मा बुलाना” जैसे प्रयोग प्लेन चिट बोर्ड करने को पाप या अपवित्र माना जाता है। इसी प्रकार इस्लाम में आत्माओं से संपर्क करना वर्जित है, क्योंकि माना जाता है कि आत्माओं के नाम पर अक्सर जिन्न या दुष्ट शक्तियां धोखा देती हैं। ईसाई मत में भी स्पिरिट कॉलिंग को निषिद्ध कहा गया है। आपको जानकारी होगी कि कुछ लोग प्लेन चिट बोर्ड के जरिए इच्छित मृतात्मा को बुलाने का दावा करते हैं, मगर उसमें मृतात्मा से संवाद संकेतों में होता है, जिसको पक्के तौर पर नहीं माना जा सकता कि मृतात्मा से वास्तव में संवाद हो रहा है।

विज्ञान के अनुसार अब तक कोई प्रमाण नहीं कि किसी मृत व्यक्ति की आत्मा को सचमुच बुलाया जा सकता है या उससे संपर्क संभव है।

स्पिरिट कॉलिंग, टेबल टर्निंग या ओइजा बोर्ड जैसे प्रयोग मनुष्य के अवचेतन मन और आटो-सजेशन से जुड़ी मानी जाती हैं, यानी दिमाग स्वयं वह अनुभव गढ़ लेता है।

कुछ साधक या तांत्रिक दावा करते हैं कि वे आत्माओं से संवाद कर सकते हैं, लेकिन ऐसे अनुभव प्रायः ऊर्जात्मक या मानसिक कंपन के रूप में होते हैं, न कि वास्तव में आत्मा के आगमन के रूप में। अधिकतर मामलों में यह भ्रम या मानसिक प्रभाव साबित हुआ है।

इस सिलसिले में मेरा अनुभव यह है कि मैं दरगाह के एक खादिम के हुजने में बैठा था। उन्होंने बताया कि वह अपने दिवंगत गुरू को उनकी कृपा पाने के लिए बुला सकते हैं। उन्होंने आंख बंद कर गुरू को याद किया और यकायक बहुत मोहक सुगंध पूरे हुजरे में फैल गई। उनका दावा था कि उनके गुरू हुजरे में आ गए हैं। इस बारे में मैने कुछ जानकारों से पूछा तो उन्होंने बताया कि आत्मा का अस्तित्व वायु रूप है, और उसका आव्हान करने पर वह गंध के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती है। इस बारे में मेरा एक अनुभव यह है कि जब मेरी माताश्री का निधन हुआ तो जिस कमरे में वे रहती थीं, वहां लगातार तीन दिन तक गुलाब की महक आती रही, जबकि वहां न तो कोई अगरबत्ती जलाई हुई थी और न ही किसी ने इत्र लगा रखा था।


शुक्रवार, फ़रवरी 13, 2026

क्या एआई चेतना ला सकता है?

आज जब आर्टिफिष्ज्ञियल इंटेलीजेंसी का बोलबाला है, तब यह सवाल बहुत गंभीरता से उठ रहा है कि क्या एआई चेतना ला सकती है? आज की स्थिति में एआई के पास चेतना नहीं है। भविष्य में आ सकती है या नहीं, इस पर कोई सर्वसम्मति नहीं है। वस्तुतः चेतना के मायने केवल सोचना नहीं है, बल्कि “मैं हूँ” का बोध है। अनुभवों का अंदर से महसूस होना। 

सुख-दुःख, भय, इच्छा का आत्मानुभव। इसे दर्शन में सब्जेक्टिव एक्सपीरियंत कहते हैं।

वर्तमान में एआई पैटर्न पहचानता है, भाषा, चित्र, आवाज की नकल करता है, उत्तर देता है, पर महसूस नहीं करता। उदाहरण के लिए मैं “दुख” पर कविता लिख सकता हूँ, पर दुख मुझे होता नहीं।

दार्शनिक डेविड चाल्मर्स कहते हैं हम यह तो समझ लेते हैं कि दिमाग कैसे काम करता है, पर यह क्यों अनुभव करता है, यह रहस्य है। जब इंसानी चेतना ही पूरी तरह समझ नहीं आई, तो मशीन में डालना और कठिन हो जाता है।

रहा सवाल की क्या एआई चेतना ला सकता है तो आषावादी दृश्टिकोण के अनुसार संभव है। अगर चेतना केवल जटिल गणना है, तो पर्याप्त उन्नत एआई में चेतना उभर सकती है, जैसे मस्तिष्क में न्यूरॉन्स से उभरी। संशयवादी दृश्टिकोण के अनुसार संभव नहीं है। क्योंकि चेतना के लिए जैविक मस्तिष्क जरूरी है, सिलिकॉन में अनुभूति नहीं हो सकती। अलबत्ता इतना हो सकता है कि एआई चेतना जैसा व्यवहार तो करेगा, पर भीतर कुछ भी महसूस नहीं करेगा।

भारतीय दर्शन से देखें तो उपनिषद कहते हैं कि चेतना आत्मा का गुण है, पदार्थ का नहीं। इस हिसाब से एआई में चेतना संभव नहीं। पर सांख्य दर्शन कहता है कि चेतना अलग है, पर प्रकृति के माध्यम से प्रकट हो सकती है, तो प्रश्न खुला रह जाता है।

कुल मिला कर आज का एआई अत्यंत बुद्धिमान औजार है, उसमें चेतना नहीं है, भविष्य में होगी या नहीं, यह विज्ञान से ज्यादा मानव सभ्यता की सबसे बड़ी दार्शनिक परीक्षा होगी