तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

रविवार, जुलाई 12, 2026

चिता में लकडी समर्पित क्यों की जाती है?

आप जानते हैं कि किसी भी व्यक्ति के अंतिम संस्कार का समापन मौजूद लोगों की ओर से लकडी के समर्पण से होता है। हर व्यक्ति पूरी श्रद्घा से चिता में लकडी डालता है। लेकिन आपने कभी विचार किया है कि ऐसा क्यों किया जाता है। यह केवल ईंधन नहीं, बल्कि अंतिम सहभागिता का प्रतीक है कि मैं भी इस विदाई का साक्षी और सहभागी हूँ।

धार्मिक दृष्टि से यह माना जाता है कि लकड़ी देना पितृ ऋण से मुक्त होने का संकेत है। मृतक के प्रति अंतिम कर्तव्य (अंत्येष्टि -संस्कार) में सहभागिता है। लोकभावना में यह भी था कि जिसने लकड़ी दी, उसने मृतात्मा के कष्ट को थोड़ा कम किया।

आज अधिकतर श्मशानों में यह दृश्य मिलता है कि लकड़ी का एक ही टुकड़ा रखा जाता है। सभी लोग उसे छूकर या आगे बढ़ा कर प्रतीकात्मक रूप से लकड़ी देने की प्रक्रिया को पूरा कर लेते हैं। यह बदलाव अचानक नहीं, बल्कि व्यावहारिक कारणों से आया है। असल में शहरीकरण के चलते स्थान की कमी है। शहरों में श्मशान सीमित हैं। ऐसे में सैकड़ों लकड़ियां रखना अव्यवहारिक हो गया। लकड़ी की अत्यधिक खपत पर सवाल भी उठते हैं, इसलिए प्रतीकात्मक अर्पण की परंपरा बनी रहे और प्रकृति पर बोझ भी न बढ़े।  महामारी और संक्रमण के अनुभवों के बाद कम वस्तुओं का साझा उपयोग अधिक सुरक्षित माना जाता है। सवाल उठता है कि क्या इससे परंपरा का महत्व कम हुआ? 

नहीं। यह समझना जरूरी है कि संस्कार का भाव प्रधान है, वस्तु नहीं। शास्त्रों में भी कहा गया है भावेन देवाः तुष्यन्ति

(देवता और संस्कार भावना से तृप्त होते हैं)। यदि मन में श्रद्धा है, तो एक लकड़ी छूना भी सौ लकड़ियाँ देने के बराबर माना जा सकता है। कुल मिला कर लकड़ी देने की परंपरा समाप्त नहीं हुई, केवल उसका रूप बदला है।


शनिवार, जुलाई 11, 2026

छछुंदर के सिर पर चमेली का तेल

लोकजीवन की सबसे बड़ी ताकत उसकी कहावतें हैं। बिना भाषण दिए, बिना तर्कों का बोझ लादे, वे पूरी बात कह जाती हैं। ऐसी ही एक तीखी, व्यंग्य से भरी कहावत है “छछुंदर के सिर पर चमेली का तेल।” यह कहावत जितनी साधारण दिखती है, उतनी ही गहरी सामाजिक टिप्पणी अपने भीतर समेटे हुए है।

छछुंदर लोकमानस में बदबू, अराजकता और असभ्यता का प्रतीक है। वह न सौंदर्य को समझता है, न सुगंध का मोल जानता है। दूसरी ओर चमेली का तेल भारतीय संस्कृति में कोमलता, शृंगार और सौंदर्य का प्रतीक रहा है। जब लोकबुद्धि ने इन दोनों को एक ही वाक्य में पिरो दिया, तो व्यंग्य अपने चरम पर पहुँच गया। कहावत मानो पूछती है, जिसे गंध और सौंदर्य की पहचान ही नहीं, उसके सिर पर इत्र मलने का क्या अर्थ?

यह कहावत केवल किसी व्यक्ति पर टिप्पणी नहीं करती, बल्कि पूरे सामाजिक व्यवहार पर प्रश्नचिह्न लगाती है। अयोग्य हाथों में अधिकार सौंप देना, समझ से परे लोगों पर संसाधन लुटा देना, और जहाँ कद्र नहीं वहाँ सम्मान उड़ेल देना। इन सब स्थितियों के लिए यह कहावत सटीक बैठती है। समाज अक्सर ऐसी मूर्खताओं पर खुलकर बहस नहीं करता, बल्कि एक वाक्य में सब कह देता है, यह तो छछुंदर के सिर पर चमेली का तेल है।

आज के समय में यह कहावत और भी प्रासंगिक हो गई है। जब पद योग्यता से नहीं, सिफारिश से मिलते हैं। जब ज्ञान का मूल्य समझ से नहीं, दिखावे से आँका जाता है, और जब संस्कृति को केवल सजावट बना दिया जाता है, तब चमेली का तेल खूब बहता है, पर बदबू जस की तस रहती है। वस्तुतः लोक कहावतें हमें आईना दिखाती हैं। वे बताती हैं कि हर चीज हर जगह शोभा नहीं देती। सम्मान, साधन और सौंदर्य, तीनों तभी सार्थक हैं, जब उन्हें ग्रहण करने वाला उसके योग्य हो। अन्यथा समाज को बस इतना ही कहना पड़ता है, इतनी मेहनत, इतना खर्च, और नतीजा? छछुंदर के सिर पर चमेली का तेल।


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सोमवार, जुलाई 06, 2026

हमारा हमजाद हमसे भी अधिक ताकतवर होता है?

क्या आपको पता है कि हमारी ही फोटोकॉपी, हमारा ही प्रतिरूप, हमारा ही प्रतिबिंब, हमारी ही छाया या उसे क्लोन की भी संज्ञा दे सकते हैं, हमारे साथ हर वक्त मौजूद है? इतना ही नहीं, वह हमसे भी अधिक ताकतवर होता है। हम चूंकि शरीर में कैद हैं, इस कारण हमारी सीमा है, मगर हमारा हमजाद अनेक प्रकार की सीमाएं लांघ कर काम कर सकता है।

इस विषय पर चर्चा से पहले मैं बात करना चाहता हूं, मेरे पूर्व के एक ब्लॉग के बारे में, जिसमें मैंने सवाल रखा था कि दर्पण में दिखाई देने वाले प्रतिबिंब का वजूद क्या है? वह आखिर है क्या? जब तक हम दर्पण के सामने खड़े रहते हैं, तब तक वह दिखाई देता है और हटते ही वह भी हट जाता है। तो जो दिखाई दे रहा था, वह क्या था? हटते ही वह कहां खो जाता है? यह सही है कि उसका अपने आप में कोई वजूद नहीं, मगर वह कुछ तो है। 

आपको जानकारी होगी कि ज्योतिषी व तांत्रिक बताते हैं कि तेल, विशेष रूप से सरसों के तेल में अपना प्रतिबिंब देख कर उस तेल को दान करने से शनि का प्रकोप कम होता है। अर्थात प्रतिबिंब अपने साथ हमारी कुछ ऊर्जा, जिसे नकारात्मक ऊर्जा कह सकते हैं, ले जाता है। प्रतिबिंब का कितना महत्व है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सामुद्रिक शास्त्र में बताया जाता है कि अगर पानी में हमारा प्रतिबिंब दिखाई देना बंद हो जाए तो जल्द ही मृत्यु हो जाती है। अर्थात मृत्यु से पहले प्रतिबिंब बनना बंद हो जाता है।

हमारे यहां तो परंपरा है कि छोटे बच्चे को उसका चेहरा दर्पण में नहीं दिखाया जाता। मुंडन के बाद ही बच्चे को उसका चेहरा दर्पण में दिखाने की छूट होती है। इसकी वजह क्या है, यह खोज का विषय है। ऐसी भी परंपरा है कि दूल्हा जब तोरण मारने आता है तो उसे दुल्हन को सीधे नहीं दिखाया जाता। उनको एक दूसरे के दर्शन पहले दर्पण में कराए जाते हैं। इसका भी कारण जाना चाहिए। 

आज हम बड़ी आसानी से दर्पण में अपना चेहरा देख पाते हैं, लेकिन जब इसका अविष्कार नहीं हुआ था, तब ठहरे हुए पानी में चेहरा देखा जाता था। 

इसके बाद एक अन्य ब्लॉग में लिखा था कि छाया का अपना कोई अलग अस्तित्व नहीं। वह हमारी अथवा किसी वस्तु की परछाई मात्र है। उसका भला क्या महत्व हो सकता है? बात ठीक भी लगती है। मगर हमारी संस्कृति में इस पर भी बहुत काम हुआ है। शिव स्वरोदय के अनुसार सूर्य के प्रकाश में पीठ करके खड़े होने पर बनने वाली छाया पर ध्यान केन्द्रित किया  जाता है। साधना पूरी होने पर छाया की आकृतियों के अनेक निहितार्थ होते हैं। 

जिन लोगों ने तंत्र विद्या के बारे में पढ़ा अथवा सुना है, उनकी जानकारी में होगा कि तांत्रिक लक्षित परिणाम पाने के लिए पर छाया का प्रयोग करते हैं। आपने ये भी सुना होगा कि ऐसे सिद्ध भी हैं, जो आपके पीछे चलते हुए  आपकी छाया को अपने वश में कर लेते हैं और इच्छित काम आपसे करवाते हैं। 

अब चर्चा करते हैं मूल विषय पर। आखिर ये छाया पुरुष या हमजाद है क्या, है कौन? जानकार लोग बताते हैं कि हमारे शरीर में अनेक प्रकार की शक्तियां विद्यमान हैं, मगर सोयी हुई अवस्था में। हमजाद भी एक प्रकार की शक्तिशाली व मायावी शक्ति है। यदि हम उसे जागृत कर लें तो वह हमारे आदेश पर अनेक प्रकार के असंभव कार्य भी कर सकती है। ठीक उसी तरह, जैसे किस्से-कहानियों में कहा जाता है कि वश में किया हुआ जिन्न हमारे हुक्म की तामील करने को तत्पर रहता है। जैसे वह सामने वाले के पर्स में रखे रुपयों तक की जानकारी दे सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि तांत्रिक इसी शक्ति का उपयोग कर हमें चमत्कृत करते हैं। किसी दूरस्थ शिष्य की मदद के लिए उसके गुरू का संकट के समय उपस्थित होना, कदाचित इसी शक्ति का प्रयोग है।

जानकार लोग बताते हैं कि हमजाद को जागृत करने के लिए चालीस दिन की साधना की जाती है। इसके लिए या तो दर्पण में अपने प्रतिबिंब पर त्राटक किया जाता है, या फिर दीपक की ओर पीठ करने पर बनने वाली छाया पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है। इसमें अनेक प्रकार की सावधानियां रखनी होती हैं।

विशेष रूप से इस्लाम में हमजाद पर बहुत काम हुआ है। हमजाद का अमल बुलाने के लिए रोजाना ये पंक्ति 777 बार पढ़ी जाती है- लाइल्लाहा इल्ला अनता सुभानल्लाह इन्नि कुंतु मिन्ज ज़वू यावाल्लिन। यह दुआ पढऩे से पहले और बाद में दुरूद इब्राहिम पढऩा होता है।

आज के वैज्ञानिक युग में हमजाद कोरी कल्पना लग सकती है, मगर जानकार लोग बताते हैं कि हमजाद का न केवल वजूद है, बल्कि वह बहुत सारे असंभव काम कर सकता है।


शनिवार, जुलाई 04, 2026

नेत्रहीन स्मृति कैसे संग्रहित करते हैं?

नेत्रहीन स्मृति को कैसे संग्रहित करते हैं, आम तौर पर यह प्रश्न लोगों के जेहन में उठता है। इस बारे में चैट जीपीटी से सवाल किया गया तो उसका कहना था कि यह मनोविज्ञान, तंत्रिका-विज्ञान और दर्शन, तीनों से जुड़ा हुआ है। नेत्रहीन व्यक्ति के मस्तिष्क में भी चित्र बनते हैं, लेकिन उनका स्वरूप इस बात पर निर्भर करता है कि वह जन्म से नेत्रहीन है या बाद में दृष्टि खोई है। जो व्यक्ति जन्म से ही कभी देख नहीं पाया, उसके मस्तिष्क में दृश्य चित्र वैसे नहीं बनते जैसे दृष्टिवान लोगों के मन में बनते हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप लाल गुलाब सोचते हैं तो आपके मन में उसका रंग और आकार उभर सकता है। जन्मजात नेत्रहीन व्यक्ति के लिए गुलाब की स्मृति उसकी सुगंध, स्पर्श, आकार, कांटों और उससे जुड़े अनुभवों के रूप में होती है। अर्थात् उसकी मानसिक दुनिया ध्वनि, स्पर्श, गंध, स्वाद और स्थानिक अनुभवों पर आधारित होती है।

यदि कोई व्यक्ति जीवन के किसी चरण में देखने के बाद नेत्रहीन हुआ है, तो उसके मस्तिष्क में पहले से संचित दृश्य स्मृतियां बनी रहती हैं। वह वर्षों बाद भी अपने घर, परिवार या प्राकृतिक दृश्यों की कल्पना कर सकता है। कई लोग सपनों में भी चित्र देखते रहते हैं। आधुनिक न्यूरो साइंस के अनुसार स्मृति किसी फोटो एलबम की तरह नहीं रखी जाती। मस्तिष्क विभिन्न अनुभवों को न्यूरॉन्स के नेटवर्क में संग्रहित करता है। नेत्रहीन व्यक्ति भी स्मृतियों को उसी प्रकार संग्रहीत करता है, लेकिन उनमें दृश्य सूचनाओं के स्थान पर अन्य इंद्रियों से प्राप्त सूचनाएं अधिक होती हैं। उदाहरण के लिए, वह किसी व्यक्ति को उसके कदमों की आहट, आवाज, बोलने के ढंग, हाथ मिलाने के स्पर्श, या किसी विशेष सुगंध से पहचान सकता है।

अनुसंधानों से पता चला है कि जन्मजात नेत्रहीनों के मस्तिष्क का दृश्य प्रांतस्था जो सामान्यतः देखने के काम आती है, निष्क्रिय नहीं रहती। वह ब्रेल पढ़ने, ध्वनियों की पहचान करने और स्थानिक जानकारी को समझने में सहायता करने लगती है। यानी मस्तिष्क स्वयं को पुनर्गठित कर लेता है।

यह प्रश्न हमें यह भी सोचने पर विवश करता है कि चित्र वास्तव में क्या है। क्या चित्र केवल आंखों से देखा गया दृश्य है, या अनुभवों का कोई भी आंतरिक रूप? यदि दूसरा उत्तर सही है, तो नेत्रहीन व्यक्ति भी अपने मन में संसार की उतनी ही समृद्ध छवियां रचता है, बस उनका माध्यम दृष्टि नहीं, बल्कि स्पर्श, ध्वनि और अनुभूति होती है। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि नेत्रहीन व्यक्ति के मन में चित्र नहीं बनते, ऐसा नहीं है, बल्कि उसके चित्र हमारी दृश्य कल्पनाओं से भिन्न प्रकार के होते हैं।


शुक्रवार, जून 26, 2026

क्या शुभ मुहूर्त बेमानी है?

भारतीय संस्कृति में सभी कार्य शुभ मुहूर्त में ही करने की परंपरा है। ऐसा कार्य की सफलता के लिए किया जाता है। इसके प्रति लोगों में गहरी आस्था है। विवाह, भवन निर्माण, दुकान के उद्घाटन इत्यादि बड़े कार्यों में तो शुभ मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा ही जाता है, कई लोग छोटे-छोटे कार्य भी चोघडिय़ा देख कर करते हैं। यह तो हुआ तस्वीर का एक रुख। दूसरा रुख ये है कि शुभ मुहूर्त में काम आरंभ करने पर भी कई बार असफलता हाथ लगती है। यह सर्वविदित है कि लगभग हर विवाह शुभ मुहूर्त में ही होता है, कुंडलियों का मिलान किया जाता है, बावजूद इसके गृह क्लेश और संबंध विच्छेद की घटनाएं होती हैं। शुभ मुहूर्त में दुकान का आरंभ करने पर भी कई बार दुकान नहीं चलती या फिर घाटा होने पर बंद करनी पड़ती है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या शुभ मुहूर्त बेमानी है?

किसी सज्जन ने हाल ही एक पोस्ट सोशल मीडिया पर डाली, जिसका सारांश आपकी नजर पेश है- राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त में किए गए, फिर भी न वैवाहिक जीवन सफल हुआ, न ही राज्याभिषेक। जब मुनि वसिष्ठ से इसका जवाब मांगा गया तो उन्होंने साफ कह दिया-

सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेहूं मुनिनाथ। 

लाभ हानि, जीवन मरण, यश-अपयश विधि हाथ।

इसका तात्पर्य ये है कि विधि ने जो निर्धारित कर रखा है, वही होता है, चाहे आप कोई भी कार्य शुभ मुहूर्त में आरंभ करें। 

विशेष रूप से मरण के मामले में हमारा कोई दखल नहीं। वह अवश्यंभावी है। उसे टाला नहीं जा सकता। बेशक चिरंजीवी होने का वरदान तो होता है, मगर कभी न मरने का वरदान कभी किसी को नहीं मिला। यदि कोई मृत्यु से बचने के अनेक प्रकार के वरदान किसी के पास थे तो भी विधि ने उसकी मृत्यु का युक्तिसंगत रास्ता निकाल दिया। पितामह भीष्म को भले ही इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था, मगर उन्हें भी एक दिन मरना था। बस फर्क इतना था कि वे अपनी मृत्यु को टाल सकते थे। 

उस पोस्ट में यह भी लिखा है कि भगवान राम व भगवान कृष्ण को विधि अनुसार ही फल भोगने पड़े। इसी प्रकार शिव जी सती की मृत्यु को नहीं टाल सके, जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है। इसी प्रकार रामकृष्ण परमहंस भी अपने कैंसर को न टाल सके। न साईं बाबा अपनी मृत्यु को और न ईसा मसीह अपने पीड़ादायक मृत्यु को। रावण व कंस बहुत शक्ति संपन्न थे, मगर उनका अंत भी विधि ने तय कर रखा था।

प्रश्न ये उठता है कि जब सब कुछ विधि के ही हाथ है तो मुहूर्त निकलवाने की जरूरत क्या है?

ऐसा प्रतीत होता है कि विधि का विधान तो काम करता ही है, मगर किसी भी कार्य की सफलता में कई फैक्टर काम करते हैं। वस्तुतः विधि अपनी ओर से कुछ भी निर्धारित नहीं करती। वह हमारे कर्मों, काम के प्रति समर्पण, लगन, मेहनत आदि से ही गणना कर निर्धारण करती है। कदाचित पूर्व जन्म के कर्म व संस्कार भी भूमिका अदा करते हैं। शुभ समय में काम आरंभ करना भी एक फैक्टर है, मगर अकेले इससे काम नहीं चलता, अन्य फैक्टर भी काम करते हैं। इसी कारण शुभ मुहूर्त में कार्यारंभ करने पर भी कई बार असफलता हाथ लगती है। 

एक और बात ये भी लगती है कि जीवन के सोलह संस्कार व अन्य बड़े काम पूर्व कर्मों के आधार पर पहले से निर्धारित होते हैं, मगर दैनिक दिनचर्या से जुड़े छोटे-मोटे कार्य में शुभ मुहूर्त अपनी भूमिका निभाता है। इसका आप स्पष्ट अनुभव भी कर सकते हैं। चूंकि शुभ मुहूर्त का अस्तित्व माना गया है, इस कारण यह जानते हुए भी कि होगा वही जो मंजूरे खुदा होगा, हम शुभ मुहूर्त निकलवाते हैं। और सफलता नहीं मिलने पर हम यह मान कर अपने आप को संतुष्ट करते हैं कि हमारी किस्मत में नहीं था, या फिर हमसे कोई त्रुटि हो गई होगी।


बुधवार, जून 24, 2026

क्या भूत-प्रेत के पैर उलटे होते हैं?

लोकविश्वासों और कथाओं में भूत-प्रेत के पैर उलटे होने की धारणा बहुत प्रचलित है, लेकिन इसे समझना जरूरी है कि यह आस्था और लोककथा का विषय है, वास्तविकता या विज्ञान का नहीं। उत्तर भारत, राजस्थान, सिंधी लोकविश्वास और बंगाल की कथाओं में कहा जाता है कि डायन, चुड़ैल या प्रेत के पैर आगे से नहीं, पीछे की ओर मुड़े होते हैं। माना जाता है कि यह उनकी पहचान छिपाने का तरीका है, ताकि देखने वाला धोखा खा जाए। कई लोककथाओं में बताया जाता है कि यदि किसी सुंदर स्त्री के पैरों की दिशा उलटी दिखे, तो वह साधारण मनुष्य नहीं होती। वस्तुतः उलटे पैर प्रकृति-विरोध का प्रतीक हैं, यानी जो सामान्य व्यवस्था से बाहर हो। मनोवैज्ञानिक रूप से यह डर पैदा करने की एक युक्ति है, क्योंकि मनुष्य को असामान्यता से भय लगता है। समाज में यह कथा अक्सर रात, सुनसान रास्तों और अज्ञात भय से जुड़ी है।

राजस्थानी में कहा जाता है कि “जिण रात जी खामोशी में, सुंदर नारीं मिलै, ता पहिंजां पग जरूर देखिजे।” मरुधरा में कहते हैं, रात का रास्ता और औरत की मुस्कान,

दोनों पर भरोसा मत करना। राजस्थानी में कथा है कि एक बार राणावत जी देर रात खेत से लौट रहे थे। पीपल के नीचे एक गोरी-सी बाई बैठी रो रही थी। उससे पूछा “बाईसा, क्यां बात है?” वह बोली, “घर सूं बिछुड़ गई हूँ, थोड़ो साथ दे दो।” आवाज में ऐसा जादू,

कि राणावत जी आगे बढ़ गए। पर जैसे ही चाँद बादलों से निकला, नजर नीचे गई, पांव की एड़ी आगे थी, उँगलियाँ पीछे।

राणावत जी चिल्लाए, “जय माताजी!”

सिंधी में कथा है कि एक व्यापारी लखूमल ऊंटों का कारवां लेकर उजैन से लौट रहा था। रात पड़ गई। दूर एक दीपक जलता दिखा। वहीं एक स्त्री खड़ी थी। लंबे केश, काजल भरी आंखें, स्वर मीठा जैसे सिंधु की धारा। उसने कहा, “पानी पिलायो, मुसाफिर”। लखूमल का मन पिघल गया।

ज्यों ही उसने मशक नीचे रखी, नजर पैरों पर पड़ी। पैर आगे नहीं, पीछे की ओर मुड़े थे। उसके मुंह से अनायास निकला, “सांईं सच्चो!” 

तस्वीर का दूसरा पहलु यह है कि हिंदू शास्त्रों, उपनिषदों, गीता या पुराणों में कहीं भी भूत-प्रेत के उलटे पैरों का वर्णन नहीं मिलता। यह धारणा पूरी तरह लोकपरंपरा और कथाओं से आई है। जहां तक वैज्ञानिक दृश्टिकोण का सवाल है तो आज तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि किसी प्राणी के पैर उलटे हों और वह मनुष्य जैसा दिखे।


शुक्रवार, जून 19, 2026

नंगे पैर रहने से अनेकानेक लाभ

नंगे पैर रहने या चलने के कई शारीरिक, मानसिक और पारंपरिक लाभ माने गए हैं। कुछ विज्ञान से जुड़े हैं, कुछ अनुभव और संस्कृति से। नंगे पैर रहने से पैरों की मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं। जूते पैरों को सहारा देते हैं, जबकि नंगे पैर चलने से प्राकृतिक संतुलन बनता है और मांसपेशियाँ सक्रिय रहती हैं। इसके अतिरिक्त रक्त संचार बेहतर होता है। तलवों में अनेक नर्व पॉइंट्स होते हैं। जमीन से सीधा संपर्क रक्त प्रवाह को उत्तेजित करता है। साथ ही पैरों की बनावट सुधरती है। लंबे समय तक जूते पहनने से अंगुलियाँ दबती हैं। नंगे पैर रहने से पैर अपनी प्राकृतिक आकृति में रहते हैं। नंगे पैर रहने से घुटनों और कमर पर दबाव कम पडता है। सही मुद्रा बनती है, जिससे जोड़ों पर अनावश्यक तनाव घटता है। एक महत्वपूर्ण बात। मानसिक व तंत्रिका लाभ होता है। तनाव कम होता है। घास, मिट्टी या रेत पर नंगे पैर चलना (जिसे ग्राउंडिंग या अर्थिंग कहा जाता है) मन को शांत करता है। एक लाभ यह भी है कि इससे एकाग्रता बढ़ती है। शरीर और मस्तिष्क का तालमेल बेहतर होता है, जिससे ध्यान और सजगता बढ़ती है। भारतीय परंपरा में माना जाता है कि नंगे पैर रहने से शरीर की नकारात्मक ऊर्जा पृथ्वी में चली जाती है। मंदिरों में नंगे पैर जाना विनम्रता और आत्म-नियंत्रण का प्रतीक माना गया है। ध्यान रखने योग्य बातें यह हैं। बहुत गरम, ठंडी या गंदी सतह पर नंगे पैर न चलें। 

कुछ शोधों में पाया गया है कि जब शरीर के तलवे पृथ्वी की सतह से सीधे संपर्क में आते हैं, तो इससे कुछ एंटीऑक्सिडेंट- जैसे इलेक्ट्रॉनों का प्रभाव शरीर में बढ़ सकता है, जिससे सूजन से जुड़े बायोमार्कर कम होते हैं, जो शरीर में जलन और दर्द को घटा सकते हैं। एक अध्ययन में पाया गया कि ग्राउंडिंग के एक सत्र (लगभग 1 घंटे) के बाद रक्त की मोटाई कम हो सकती है। इसका मतलब बेहतर रक्त प्रवाह और संभावित रूप से दिल पर सकारात्मक असर पडता है। कुछ शोध बताते हैं कि पृथ्वी के संपर्क से कॉटिसोल (तनाव-हार्मोन) का स्तर संतुलित हो सकता है और स्लीप-वेक चक्र में सुधार हो सकता है, जिससे नींद बेहतर होती है।