वस्तुतः कम पूजित मूर्ति प्रायः पुराने मंदिरों में, गांव के कोने में या उपेक्षित स्थानों पर होती है। वहां जाने वाला व्यक्ति अक्सर सच्ची मजबूरी या आंतरिक पुकार लेकर जाता है, उसमें औपचारिकता नहीं होती। कम पूजित मूर्ति के सामने जाने वाला भक्त सामान्यतः दिखावे से मुक्त होता है। भीड़ और प्रतिस्पर्धा से दूर होता है। उसका भाव अधिक निजी और गहरा होता है। इसलिए फल अधिक अनुभूत होता है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से जहाँ पूजा कम होती है, वहां अपेक्षा नहीं होती, प्रचार नहीं होता, चमत्कार की अफवाह नहीं होती, इससे मन अहंकार और सौदेबाजी से मुक्त रहता है। ऐसा मन जब प्रार्थना करता है, तो वह भीतर तक उतरती है।
तांत्रिक और भक्ति परंपरा में कई साधना-मार्गों में कहा गया है कि उपेक्षित देवता शीघ्र प्रसन्न होते हैं, क्योंकि वहां जाने वाला व्यक्ति फल नहीं, संबंध चाहता है। नाम नहीं, शरण चाहता है।
गूढ़ सत्य ये है कि ईश्वर को पूजा की संख्या नहीं, निष्ठा की तीव्रता आकर्षित करती है। भीड़ में भक्ति अक्सर सामाजिक होती है, परंपरागत होती है, जबकि अकेले में भक्ति आत्मिक होती है, मौन होती है, सत्य होती है। कम पूजित मूर्ति की पूजा से अधिक फल इसलिए मिलता है क्योंकि वहां श्रद्धा अधिक शुद्ध होती है, अहंकार कम होता है, संबंध सीधा होता है।
इस बारे में एक कहानी है। गांव के बाहर, पीपल और खेजड़ी के बीच एक पुरानी सी मूर्ति खड़ी थी। न नक्काशी, न रंग, बस पत्थर पर उकेरी एक आकृति। लोग उसे कहते थे बूढ़ा देव। यहां न पुजारी था, न प्रसाद की दुकान। सिर्फ धूप, चुप्पी और हवा की सरसराहट। एक बार गाँव में सूखा पड़ा। लोग बड़े मंदिर गए। मन्नतें मानीं, नारियल चढ़ाए, लंबी कतारें लगीं। सूखा वैसे का वैसे रहा। उसी गांव की एक विधवा थी धन्नो। उसके पास न चढ़ावा था, न मन्नत के शब्द। वह चुपचाप उस बूढ़े देव के पास गई। एक लोटा पानी रखा, और बोली, “मैं बहुत कुछ नहीं जानती, बस इतना जानती हूँ कि तू भी अकेला है, मैं भी।” फिर रोई नहीं। बस बैठी रही। तीसरे दिन बादल आए। पहले उसी कोने में बरसे, जहां बूढ़ा देव खड़ा था। फिर धीरे-धीरे पूरे गांव में। लोग चकित थे। किसी ने कहा संयोग है। किसी ने कहा कि बरसात का मौसम था। पर धन्नो कुछ नहीं बोली। वह जानती थी कि देवता को शब्द नहीं, साथ अच्छा लगता है। तब से गाँव में एक कहावत चल पड़ी, जिस देव के पास भीड़ नहीं, उसके पास भगवान बैठा होता है। और लोग समझ गए कि कम पूजित मूर्ति जल्दी फल देती है, क्योंकि वहां न दिखावा होता है, न सौदा, सिर्फ मन होता है।
सूफी कहते हैं कि खुदा को तलााशने के लिए दरगाह नहीं, दिल चाहिए। सिंध की धरती पर एक फकीर रहता था लाल शाह। उसकी कब्र न मशहूर थी, न उस पर चादरें चढ़ती थीं। रेत में दबी, कंटीली झाड़ियों के बीच, बस एक टूटा हुआ पत्थर था। लोग कहते, यहां कौन जाता है? न करामात है, न शोर। एक दिन एक मुसाफिर आया। बहुत भटका हुआ, बहुत थका हुआ। वह बड़े दरबारों से होकर आया था। हर जगह भीड़, हर जगह मांग। वह इस टूटी कब्र के पास बैठ गया। न फातिहा पढ़ी, न दुआ माँगी। बस बोला, “अगर तू वाकई दोस्त है, तो चुप बैठने दे।” सूफी कहते हैं कि यहीं से मुलाकात शुरू होती है। रात को मुसाफिर को नींद आई। ख्वाब में लाल शाह बोले, “जहां सवाल नहीं होते, वहीं जवाब उतरते हैं।” सुबह वह मुसाफिर बदला हुआ था। उसकी परेशानी बाहर से नहीं, अंदर से हल हो चुकी थी। लोग पूछने लगे, “तुझे वहां क्या मिला, जहां कुछ भी नहीं था?” वह मुस्कराया, “वहां खुुदा था, इसलिए कुछ नहीं था।” सूफियाना हिकमत कहती है, जो दर मशहूर हो जाता है, वहां अक्सर अल्लाह छुप जाता है। और जो दर गुमनाम रहे, वहां अल्लाह खुद बैठा रहता है। इसलिए सूफी कहते हैं कि कम पूजी जाने वाली मूरत, या गुमनाम कब्र जल्दी असर करती है, क्योंकि वहां दिल खाली होकर पहुंचता है।



