व्यावहारिक जीवन में जोड़ी का अर्थ केवल विवाह नहीं, बल्कि जब ये संतुलन में हों, तभी जीवन फलता है। सिंधी लोक परंपरा में जोड़ी केवल पति-पत्नी का संबंध नहीं, बल्कि धर्म, भाग्य और लोक मर्यादा का संयुक्त स्वरूप है। तभी तो कहते हैं कि जोडियां भगवान बनाता है। यानि जोड़ी को ईश्वर की लिखावट माना जाता है, जिसे बदला नहीं, निभाया जाता है। लोकगीत कहते हैं, लाड़ी बिना लाड़ो अधूरो, लाड़े बिना लाड़ी लाचार।
तीसरी आंख
सोमवार, अगस्त 10, 2026
जोडी का क्या महत्व है?
शुक्रवार, अगस्त 07, 2026
शव यात्रा देखने को शुभ क्यों माना जाता है?
यह तो हुई मान्यता की बात, मगर शव यात्रा सामने से आने पर उसे शुभ क्यों माना जाता है, इस बारे में शास्त्रों बहुत पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है। यानि कि यह तथ्य अनुभव के आधार पर स्थापित किया गया है। कुछ जानकार लोग मानते हैं कि शिव शिव का उच्चारण करने और मृत आत्मा की शांति की प्रार्थना करने से वह प्रसन्न होती है और अपने साथ उस प्रणाम करने वाले व्यक्ति के सभी कष्टों, दुखों और अशुभ लक्षणों को अपने साथ ले जाती है।
प्रसंगवश शव यात्रा से जुड़ी यह मान्यता भी ख्याल में आती है कि जब किसी बुजुर्ग का निधन होने पर उसकी शव यात्रा के दौरान उस पर सिक्के उछाले जाते हैं। उन सिक्कों को लोग लूटते हैं या जमीन पर गिर जाने पर उठाते हैं। मान्यता है कि ऐसे सिक्कों को तिजोरी में रखने पर वह सदा भरी रहती है। इसका भी कोई तार्किक आधार मौजूद नहीं है। यह मात्र आस्था है, जो कदाचित अनुभव के आधार पर कायम हुई है।
सोमवार, अगस्त 03, 2026
काबा शरीफ की परिक्रमा एंटी क्लॉक वाइज होती है
मुसलमान जब मक्का शरीफ में उमरा या हज के दौरान तवाफ करते हैं, तो वे काबा के चारों ओर बाएं कंधे को काबा की तरफ रखते हुए घड़ी की सुइयों के उलटे यानि एंटी क्लॉक वाइज दिशा में सात चक्कर लगाते हैं। यह क्रम पैगम्बर हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और हजरत मुहम्मद की सुन्नत से चला आ रहा है।
एंटी-क्लॉक वाइज तवाफ करने के पीछे कारण यह भी माना जाता है कि पूरी कायनात में ग्रह-नक्षत्र सूर्य के चारों ओर,
इलेक्ट्रॉन परमाणु के नाभिक के चारों ओर और खगोलीय पिंड अपने केंद्र के चारों ओर इसी दिशा में घूमते हैं।
यानी यह दिशा फितरत यानि प्रकृति के नियमों से भी मेल खाती है। ग्रहों की गति के बारे में वैज्ञानिक तथ्य इस प्रकार हैंः- सौर मंडल के अधिकतर ग्रह जैसे पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, वरुण आदि सूर्य की परिक्रमा एंटी-क्लॉकवाइज दिशा में करते हैं। यह दिशा खगोलशास्त्र में प्रोगेड मोषन कहलाती है। इसी तरह अधिकतर ग्रह अपनी धुरी पर भी एंटी-क्लॉकवाइज घूमते हैं, जैसे पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है। कुछ अपवाद भी हैं।
शुक्र अपनी धुरी पर क्लॉकवाइज घूमता है। अरुण का घूर्णन अक्ष लगभग 98° झुका हुआ है, इसलिए उसका घूमना भी असामान्य प्रतीत होता है।
786 का मतलब व महत्व क्या है?
सवाल उठता है कि 786 की उत्पत्ति कैसे हुई? परंपरागत रूप से अरबी में प्रत्येक अक्षर को एक संख्या का मूल्य प्रदान कर दिया गया है। बिस्मिल्लाह-हिर्रहमा-निर्रहीम लिखने में इसमें जो अक्षर आते हैं, उनका अंकीय मूल्य कुल मिला कर 786 होता है।
ज्ञातव्य है कि कुछ लोग जब कोई चीज रिकार्ड करते हैं अथवा पत्र में बिस्मिल्लाह लिखना चाहते हैं तो वह पूरी दुआ लिखने की बजाए केवल 786 लिख देते हैं। इस्लाम में इसे कोई धार्मिक महत्व प्राप्त नहीं है। यह मात्र एक साहित्यिक परम्परा है, जो अरबी साहित्य में जारी है। कुछ अंधविश्वासों ने आधुनिक रूप अपना लिया है। इसी तरह 786 भी एक आधुनिक हथियार बन गया है। कुछ धनवान मुसलमान यह चाहते हैं कि उनकी कारों के लिए एक ऐसा रजिस्ट्रेशन नम्बर मिल जाए, जिसके आखिरी अंक 786 हों। कुछ लोग चाहते हैं कि उनके मोबाइल फोन के अन्तिम अंक 786 हों। वे इसके लिए अच्छा-खासा धन खर्च करने के लिए तैयार होते हैं। सिनेमा उद्योग भी इस संख्या के भावनात्मक आकर्षण का शोषण करना चाहता है, जिसे बॉलीवुड की सफलतम फिल्म वीर जारा में शाहरुख खान को लाहौर जेल में कैदी संख्या 786 के रोल में देखा जा सकता है।
आपको याद होगा कि फिल्म दीवार में अमिताभ के सीने पर गोली लगती है और उन्हें कुछ नहीं होता। गोली उनके बिल्ला नम्बर 786 से टकरा कर बेकार हो जाती है। अमिताभ फिल्म कुली में वही चमत्कारी बिल्ला नंबर 786 लगाते हैं।
शनिवार, जुलाई 25, 2026
क्या है मन्त्रों का वैज्ञानिक आधार?
मंत्र विज्ञान का सच यही है कि यह वाणी की ध्वनि के विद्युत रूपान्तरण की अनोखी विधि है। हमारा हमारा शरीर और सम्पूर्ण ब्रह्मांण जिस उर्जा के सहारे काम करता है, उसके सभी रूप प्रकारान्तर में विद्युत के ही विविध रूप हैं। मंत्र-विद्या में प्रयोग होने वाले अक्षरों की ध्वनि यानि उच्चारण की प्रकृति, अक्षरों का दीर्घ या अर्धाक्षर, विराम, अर्धविराम आदि मात्राओं, इनके सूक्ष्म अंतर प्रत्यन्तर मंत्र-विद्या के अन्तर-प्रत्यन्तरों के अनुरूप ही प्रभावित व परिवर्तित किये जा सकते हैं। मंत्र-विज्ञान के अक्षर जो मनुष्य की वाणी की ध्वनि, जो शरीर की विभिन्न नाडिय़ों के कम्पन से पैदा होते हैं तथा जो कि मानव के ध्यान एवं भाव के संयोग से ही विशेष प्रकार कि विद्युत धारा उत्पन्न करते हैं, वही जैव-विद्युत आन्तरिक या बाह्य वातावरण को अपने अनुसार ही प्रभावित करके परिणाम उत्पन्न करती है।
पदार्थ जगत में विस्फोट होता है। उर्जा की प्राप्ति के लिये पदार्थ को तोडऩा पड़ता है, परन्तु चेतना जगत में मंत्र एवं मात्रिकाओं का विस्फोट किया जाता है। शारीरिक रोग उत्पन्न होने का कारण भी यही है कि जैव-विद्युत के चक्र का अव्यवस्थित हो जाना। जैव-विद्युत की लयबद्धता का लडख़ड़ा जाना ही रोग की अवस्था है। जब हमारे शरीर में उर्जा का स्तर निम्न हो जाता है तब अकर्मण्यता आती है। मंत्र जप के माध्यम से ब्रह्मांणीय उर्जा-प्रवाह को ग्रहण-धारण करके अपने शरीर के अन्दर की उर्जा का स्तर ऊंचा उठाया जा सकता है और अकर्मण्यता को उत्साह में बदला जा सकता है। चूंकि संसार के प्राणी एवं पदार्थ सब एक ही महत चेतना के अंशधर है, इसलिये मन में उठे संकल्प का परिपालन पदार्थ चेतना आसानी से करने लगती है। जब संकल्प शक्ति क्रियान्वित होती है तो फिर इच्छानुसार प्रभाव एवं परिवर्तन भी आरम्भ हो जाता है। मंत्र साधना से मन, बुद्धि, चित अहंकार में असाधारण परिवर्तन होता हे। विवेक, दूरदर्शिता, तत्वज्ञान और ऋतम्भरा बुद्धि के विशेष रूप से उत्पन्न होने के कारण अनेक अज्ञान जन्य दुखों का निवारण हो जाता है।
शनिवार, जुलाई 18, 2026
सवाये का क्या महत्व है?
आप देखिए न कि हम यदि भगवान को प्रसाद चढ़ाने का संकल्प लेते हैं या प्रसाद चढ़ाते हैं तो तब भी सवाये का ख्याल रखते हैं। अब तो पचीस पैसे अर्थात चवन्नी चलन से बाहर हो गई, मगर किसी जमाने में सवा रुपया या सवाल ग्यारह रुपए चढ़ाए जाते थे। जब चवन्नी बंद हो गई तो भी राउंड फिगर से एक रुपया ज्यादा का चलन आया। ग्यारह, इक्कीस, इक्यावन। लेकिन चूंकि कई बार एक रुपए का सिक्का जेब में नहीं होता है, इस कारण गिफ्ट वाले ऐसे लिफाफे आ गए हैं, जिनमें एक रुपया पहले से चिपका हुआ होता है। मकसद सिर्फ ये है यदि हम उसमें सौ रुपये या दो सौ रुपए डालें तो एक रुपया स्वतरू जुड़ जाए। यह भी सवाये का ही रूप है। अर्थात हम पूर्णांक से एक अंक ज्यादा को प्राथमिकता देते हैं।
वस्तुतरू सनातन धर्म में सवा (एक और एक चौथाई) का महत्व है और इसी क्रम में सवा, ग्यारह, इक्कीस, इक्यावन को शुभ माना जाता है। अर्थात् सबसे छोटी प्राकृत संख्या जो शुभ मानी जाती है, वह 11 ही है। इसी से जुड़े तथ्य रोचक हैं। जैसे अपोलो 11, चन्द्रमा पर भेजा गया पहला मानवयुक्त अन्तरिक्ष यान था। बहुत से खेलों में 11 खिलाड़ी मैदान पर उतरते हैं, जैसे क्रिकेट, फुटबॉल आदि।
शायद आपकी जानकारी में हो कि ज्योतिषी कोई भी काम करते वक्त सवाये की सलाह देते हैं। जैसे नौ, दस, ग्यारह बजे, या जो भी, वे कहते हैं कि पूर्णांक की बजाय कुछ ज्यादा मिनट होने पर ही काम की शुरुआत करनी चाहिए। वे पौने से बचने की राय देते हैं, अर्थात पौ नौ, पौने दस या पौने ग्यारह बजे काम शुरू करने से बचने की कहते हैं, क्योंकि वह पूर्ण से कम है, इस कारण उस वक्त शुरू किए गए काम के पूर्ण होने में संशय हो सकता है।
कुल मिला कर यह स्थापित तथ्य है कि हमारे जीवन में सवाये का बड़ा महत्व है। लेकिन तथ्य स्थापित होने के पीछे क्या कारण है, इसके बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। जहां तक मेरी समझ है, इसके पीछे कहीं न कहीं अध्यात्म है। दर्शन को गहराई जानने वाले कहते हैं कि पूर्ण और शून्य में कोई अंतर नहीं। दोनों एक ही सिक्के के पहलु हैं। जैसे ही पूर्णता आती है, उसी के साथ शून्य आ कर खड़ा हो जाता है। कदाचित इसीलिए पूर्णांक की बजाय उसमें सवाया जोड़ा जाता है।
गुरुवार, जुलाई 16, 2026
योगी को पसीना कम क्यों आता है?
योगी चूंकि नाड़ी शोधन, शीतली, शीतकारी जैसे प्राणायाम करते हैं, इस कारण वे शरीर की ऊष्मा संतुलित करते हैं व स्वेद यानि पसीना की मात्रा घटाते हैं। योग ग्रंथों में अत्यधिक पसीने को
प्राण-क्षय का संकेत माना गया है।
सामान्य व्यक्ति क्रोध, भय, उत्तेजना, घबराहट में रहता है, जो कि “मानसिक गर्मी” पैदा करते हैं। योगी का चित्त शांत होने से
तनाव जन्य पसीना स्वतः कम हो जाता है। चूंकि योगी का आहार सादा, सात्त्विक व कम मसालेदार होता है, इस कारण शरीर की उष्णता और पसीने की मात्रा कम रहती है। वैसे योगी को पसीना न आए, यह सिद्धि नहीं है। गर्मी, श्रम या कठिन आसन में योगी को भी पसीना आता है।
योगशास्त्र कहता है “न अति स्वेदः, न अति शैत्यं कृ समत्व।”
निष्कर्ष यह है कि नियमित योगाभ्यास करने वाले व्यक्ति को
सामान्यतः पसीना कम आता है।यह देह के नहीं, प्राण और चित्त के संतुलन का फल है। योग का लक्ष्य पसीना रोकना नहीं,
स्वाभाविक संतुलन प्राप्त करना है। लोक कथाओं में कहा गया है कि जो भीतर से शीतल हो, उसे बाहर की गर्मी नहीं सताती। यह कथन देह से अधिक चेतना की बात करता है।
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