तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

सोमवार, अप्रैल 27, 2026

एक ही जगह व समय पर होने वाले बच्चों का भाग्य अलग क्यों?

एक ही अस्पताल, एक ही वार्ड, यहां तक कि एक ही समय पर जन्म लेने वाले बच्चों का भाग्य बिल्कुल अलग क्यों होता है, यह प्रश्न सदियों से ज्योतिष, दर्शन और मनोविज्ञान में चर्चा का विषय है। वस्तुतः कुंडली समय व स्थान के आधार पर बनाई जाती है, ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो जन्म-क्षण एक जैसा होने पर भी लग्न भिन्न हो सकती है। उसकी वजह यह है कि जन्म का सटीक समय सेकंड तक रिकॉर्ड नहीं होता। एक दो मिनट का अंतर भी लग्न, नवांश आदि में बड़ा अंतर ला देता है। लग्न हर 2-2.5 घंटे में बदलता है, नवांश चार्ट हर 13-14 मिनट में बदलता है। इससे दोनों के जीवनपथ, संघर्ष, अवसर, मानसिकता सब बदल जाते हैं। सटीक जन्मस्थान बराबर होने पर भी ‘जन्म-पार्थिव कारक’ अलग होते हैं। ज्योतिष में केवल ग्रह ही नहीं, बल्कि

कुल-परिवार, वातावरण, संस्कार, कर्मसंचय भी महत्वपूर्ण होते हैं। दो बच्चों का जन्मस्थान एक हो सकता है, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति, शिक्षा का माहौल, पालन-पोषण अलग होने से भाग्यफल पूरी तरह बदल जाता है।

वेदांत और पारंपरिक ज्योतिष कहता है कि प्रत्येक जीव अपने पूर्व जन्म के संस्कार लेकर आता है। इसलिए भले ही दो लोग एक ही समय पर जन्में, उनके पूर्व जन्म के कर्मसंचय अलग होते हैं। इससे एक को अवसर जल्दी मिलता है, एक को संघर्ष ज्यादा, एक का मन रचनात्मक होता है और दूसरा साहसवादी होता है। ये सब ग्रहों की एक ही स्थिति होने पर भी फल को अलग बना देते हैं, क्योंकि कर्मसंस्कार अलग होते हैं।

एक बात और। दो बच्चों की महादशाएं तो समान हो सकती हैं, परंतु 

अंतर्दशा, प्रत्यंतर, सूक्ष्म दशा का प्रारंभ कुछ सेकंडों के अंतर से बदल जाता है। इससे पूरे जीवन में घटनाओं के समय अलग-अलग हो जाते हैं और यहीं से भाग्य का अंतर शुरू हो जाता है।

भले ही सामान्य जन्मपत्री समान लगे, परंतु चंद्र लग्न, सूर्य लग्न, अष्टकवर्ग के अंक, भिन्न ग्रहों का बल, भाव के अंष्ज्ञ, इनमें छोटा सा अंतर भी पूरी भविष्यवाणी बदल देता है। केपी और नाड़ी ज्योतिष में सेकंड के स्तर तक अंतर माने जाते हैं। व्यक्तित्व जन्म के बाद के परिवेश से बनता है। अवसरों की उपलब्धता भाग्य को बदल देती है। सोच और प्रतिक्रियाएं एक ही घटना को दो लोग अलग तरह से लेते हैं।

कुल जमा भाग्य समान नहीं, सम्भावनाएं समान होती हैं। जन्म केवल शुरुआती ढांचा देता है, लेकिन मनुष्य का चुनाव, कर्म, दिशा भाग्य को आकार देते हैं। संक्षेप में एक ही समय पर जन्मे बच्चों का भाग्य अलग होता है क्योंकि जन्म का समय सूक्ष्म रूप से अलग होता है, लग्न एवं विभाजित कुंडलियाँ बदल जाती हैं, पूर्व-जन्म कर्मसंस्कार अलग होते हैं, पालन-पोषण और परिवेश अलग होता है, दशाएं-उपदशाएं अलग-अलग समय पर चलती हैं, ग्रहों का बल और अंश सूक्ष्म रूप से भिन्न होता है। परिवार और वातावरण अलग होते हैं, भले ही जन्म समय समान हो, पर एक बच्चा संपन्न परिवार में जा रहा है, दूसरा संघर्षशील परिवार में, किसी के माता-पिता का स्वभाव अलग है, किसी को शिक्षा, अवसर, पोषण अलग मिलेगा। किसे कितना प्रेम मिला, किसे कितनी सुरक्षा मिली, किस पर कितना अनुशासन या स्वतंत्रता हुई, ये सब भविष्य पर गहरा असर डालते हैं।

इसे यूं भी समझा जा सकता है कि दो पेड़ एक ही दिन लगाए जा सकते हैं, लेकिन मिट्टी, पानी और धूप अलग हो तो उनकी बढ़त भी अलग हो जाती है। इसी प्रकार पास-पास पैदा हुए दो नवजात शिशुओं की जीवन यात्रा दो नदियों की तरह अपनी-अपनी दिशा पकड़ लेती है।


शुक्रवार, अप्रैल 24, 2026

क्या है चरण स्पर्श करने की कीमिया?

भारतीय परंपरा में प्राचीनकाल से माता-पिता, गुरुओं, बडे बुजुर्गों आदि के चरण स्पर्श करने का चलन है। ऐसी मान्यता है कि कोई भी व्यक्ति कितना ही क्रोधी स्वभाव का हो, अपवित्र भावनाओं वाला हो, यदि उसके भी चरण स्पर्श किये जाते हैं, तो उसके मुख से आषीर्वाद, दुआएं, सदवचन ही निकलता है। वस्तुतः मनुष्य के शरीर में उत्तरी ध्रुव यानि सिर से सकारात्मक ऊर्जा प्रवेश कर दक्षिणी धु्रव यानी पैरों में ऊर्जा का केंद्र बन जाता है। हाथों और पैरों की अंगुलियों और अंगूठों के पोरों में यह ऊर्जा सर्वाधिक रूप से रहती है। सामान्य तौर पर जब हम किसी का चरण स्पर्श करते हैं, उसके हाथ सजह ही हमारे सिर पर जाते हैं और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है, जिससे ज्ञान, बुद्धि और विवेक का विकास सहज होने लगता है। आपकी जानकारी में होगा कि जब भी हम मंदिर जाते हैं, तो वहां ताम्रपात्र में रखा तुलसी दल, केसर, चंदन से बना चरणामृत प्रसाद के रूप में पाते हैं। भगवान का चरणामृत वह तत्व है जो ऊर्जा, उत्साह, शक्ति और दीर्घायु प्रदान करता है। चरणों की महिमा देखिए, गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या श्राप के कारण पत्थर की मूरत बन गई थी और भगवान के चरण स्पर्श से शाप मुक्त होकर वापिस मानव रूप में आ गई। 

आपको ख्याल में होगा कि प्राचीन समय में जब ऋषि, मुनि या संतजन किसी राज दरबार में आते थे तो राजा महाराजा पहले शुद्ध जल से उनके पैर धोते थे। उसके बाद ही चरण स्पर्श की परंपरा पूर्ण करते थे। चरण स्पर्श से पहले चरण धोने के पीछे संभवत, यह वैज्ञानिक कारण रहा होगा कि चरण में एकत्रित विद्धुत चुंबकीय उर्जा चल कर आने से अत्यधिक तीव्रता से प्रवाहित और गर्म होती है। शीतल जल से धोने से यह सामान्य अवस्था में आ जाती है। एक बात और। किसी के पैर छूने का मतलब है, उसके प्रति समर्पण भाव जगाना। जब मन में समर्पण का भाव आता है, तो अहंकार खत्म हो जाता है। पैर छूना या प्रणाम करना, केवल एक परंपरा नहीं है। यह एक वैज्ञानिक क्रिया है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ी है। पैर छूने से केवल बड़ों का आशीर्वाद ही नहीं मिलता बल्कि बड़ों के स्वभाव की अच्छी बातें भी हमारे अंदर उतर जाती है।

पैर छूने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे शारीरिक कसरत होती है। झुक कर पैर छूने से हमारी कमर और रीढ़ की हड्डी को आराम मिलता है। घुटने के बल बैठकर पैर छूने से हमारे शरीर के जोड़ों पर बल पड़ता है, जिससे जोड़ों के दर्द में राहत मिलती है। साष्टांग प्रणाम की विधि में शरीर के सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए सीधे तन जाते हैं, जिससे शरीर का स्ट्रेस दूर होता है। इसके अतिरिक्त झुकने से सिर का रक्त प्रवाह व्यवस्थित होता है, जो हमारी आंखों के साथ ही पूरे शरीर के लिए लाभदायक है।


गुरुवार, अप्रैल 23, 2026

पेन को पकडने का सही तरीका क्या है?

 मनोवैज्ञानिकों में यह सवाल चर्चा का मुद्दा रहा है कि पेन पकडने का सही तरीका क्या है? ज्योतिष व सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार लिखते समय पेन को चारों अंगुलियां व अंगूठा स्पर्श करना चाहिए। इससे आपकी लेखनी में सभी ग्रहों का सहयोग होता है और उसमें पूर्णता आती है। यह एक आदर्श स्थिति है। वैसे मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि अगर पेन या पेंसिल पकड़ते समय आपका अंगूठा आपकी तर्जनी अंगुली के ऊपर आता है तो यह दर्शाता है कि आप बहुत कलात्मक हैं। बहुत छोटी-छोती बातें आपको परेशान या खुश करती है। अंगूठे के तर्जनी अंगुली को ढकने की मुद्रा का अर्थ यह है कि आप अपने जीवन में असामान्य इच्छाएं रखते हैं। आपको खुश रहने के लिए दूसरों की जरूरत पड़ती है, आप अकेले नहीं रह सकते। ऐसे लोग बहुत ज्यादा सोचने वाले होते हैं।

तर्जनी और अध्यमा अंगुली के बीच पेन पकडने वाले लोग अपने सामाजिक जीवन का बहुत लाभ उठाते हैं। मांफ करना, भूलना और फिर अपने रास्ते पर आगे बढना, यही इनका मूलमंत्र है। ये किसी के साथ कोई ईर्ष्या या द्वेष नहीं रखते। सच्चा और ईमानदार इंसान होना आपकी खूबी भी है और खामी भी। इसके अलावा आपके भीतर जो जिज्ञासा है उसे शांत करना भी बहुत मुश्किल है। आपको सबकुछ जानना है, चाहे उसका आपसे संबंध हो या नहीं। वैसे तो आप बहुत बातूनी हैं, अपनी बात दिल में नहीं रखते, लेकिन जब किसी से दिल की बात कहनी होती है तो आप अपनी भावनाओं को दबाकर रखना ही सही मानते हैं।

अंगूठे के ऊपर अंगुलिया रखकर लिखने वाले लोग बहुत चुस्त और सचेत होते हैं, इस खूबी की वजह से ये अपनी अलग पहचान भी रखते हैं। ये अपनी वास्तविक भावनाएं किसी को नहीं बता पाते।

यदि अंगूठा सभी अंगुलियों को ढकता है तो इसका अर्थ है कि आप अत्यधिक टैलेंटेड हैं, आपके भीतर एक अलग सा आकर्शण है, जो दूसरों को आपकी ओर खींच लाता है। 

एक समय था जब अलग-अलग तरह के पेन होते थे और तो और सभी पेन को पकडने का तरीका भी उतना ही अलग हुआ करता था। 

एक मान्यता यह भी है कि यदि पेन पकडते समय तर्जनी अंगुली पृथक होती है तो परिवार की एकता टूटती है, उसमें बंटवारे की स्थिति उत्पन्न होती है। इस मान्यता के अनुसार कोई भी वस्तु पकडते वक्त अंगुली अलग नहीं होनी चाहिए। कदाचित यह मान्यता सामुद्रिक शास्त्र से आई है।


मंगलवार, अप्रैल 21, 2026

क्या भगवान के नाम पर नाम रखना गुनाह है?

आजकल बच्चों के नाम अलग तरह से रखे जाने लगे हैं। कोई संस्कृत भाषा का नाम तलाशता है तो कोई अंग्रेजीदां। कोई महाभारत कालीन या रामायण कालीन पात्रों के नाम रखता है तो कोई अत्याधुनिक अंग्रेजी नाम रखता है। जैसे भीष्म, कुन्ती, कर्ण, युधिष्ठिर, भीम, नकुल, कौस्तुभ या अर्जुन और दशरथ, सीताराम, लक्ष्मण, हनुमान इत्यादि। कुछ साल पहले रमेश, वैभव, अनिल, मुकेश टाइप के नाम रखे जाते थे। नए चलन में आदि, अयान, आर्यन इत्यादि टाइप के नाम रखे जाने लगे हैं। कुछ पीछे चलें तो अमूमन भगवान के नामों में से कोई नाम रखा जाता था। जैसे राम लाल, राम दास, राम चन्द्र, गणेशी लाल, कृपाशंकर इत्यादि। अर्थात भगवान के नाम के साथ लाल या दास जोड़ा जाता था। हालांकि कुछ लोग गोविंद, सुरेन्द्र जैसे नाम भी रखते रहे हैं। जहां तक भगवान के नामों में से कोई नाम रखने की परंपरा का सवाल है, उसके पीछे कारण ये रहता होगा कि किसी को पुकारने के बहाने भगवान का नाम तो उच्चारण में आएगा। सोच यह भी रहती होगी कि ऐसा करने भगवान का स्मरण आने से उनके गुण हमारे में भी आ जाएंगे। हालांकि हकीकत ये है कि जब भी हम किसी को भगवान के किसी नाम से पुकारते हैं, तो वह केवल हमारी जुबान पर होता है, उसका उच्चारण करते वक्त भगवान की छवि हमारे जेहन में नहीं होती। 

इस बारे में एक दिलचस्प जानकारी आयतुल कुर्सी से मिली। आयतुल कुर्सी कुरान की एक आयत है, जो भूत-प्रेत आदि को भगाने या उससे बचाव के लिए पढ़ी जाती है। उसके दूसरे जुमले में कहा गया है कि वही हमेशा जिंदा और बाकी रहने वाला है। हय्य के मानी अरबी ज़ुबान में जिसको कभी मौत न आये, हमेशा जिंदा रहने वाला और कय्यूम के माने हैं, जो खुद कायम रहे और दूसरों को भी कायम रखता और संभालता हो और कय्यूम अल्लाह तआला की ख़ास सिफत है, जिसमें कोई भी उस का शरीक नहीं क्योंकि जो चीज़ें अपने बाक़ी रहने में दूसरे की मोहताज हों, वो किसी दूसरे को क्या संभाल सकती हैं। इसलिए किसी इंसान को क़य्यूम कहना जायज़ नहीं, बल्कि अब्दुल कय्यूम अर्थात कय्यूम का बंदा कहना चाहिए। जो लोग अब्दुल कय्यूम की जगह सिर्फ कय्यूम बोलते हैं, वे गुनाहगार होते हैं। यही वजह है कि खुदा की ओर संकेत करने वाले नामों के साथ कोई न कोई लफ्ज जरूर जोड़ा जाता है।

इसका मतलब ये है कि इस्लाम में खुदा की किसी खासियत वाले नाम को रखने की मनाही है। मकसद यही है कि खुदा के नाम की मर्यादा या पाकीजगी के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ न हो। ठीक इसी तरह जो लोग राम दास, राम लाल आदि नाम रखते थे, उसके पीछे वजह ये रहती होगी कि अकेले भगवान के नाम पर नाम रखने की बजाय उसका दास या लाल कहा जाए। वाकई यह सोच बहुत ही गहरी है। हम भला भगवान के बराबर कैसे हो सकते हैं।


शनिवार, अप्रैल 18, 2026

कपूर में छिपे हैं चमत्कारी गुण

कपूर हमें एक सामान्य सा पदार्थ लगता है। यह हर घर में होता है। खासकर घर के मंदिर में। लेकिन इसमें चमत्कारी गुण मौजूद हैं। कर्पूर या कपूर उडऩशील दिव्य वानस्पतिक द्रव्य है। कर्पूर जलाने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। इसे अक्सर आरती के बाद या आरती करते वक्त जलाया जाता है, जिससे वातावरण में सुगंध फैल जाती है और मन एवं मस्तिष्क को शांति मिलती है। कपूर को संस्कृत में कर्पूर, फारसी में काफूर और अंग्रेजी में कैंफर कहते हैं। वास्तु एवं ज्योतिष शास्त्र में भी कपूर का बहुत महत्व और उपयोग के बारे में बताया गया है। मान्यता है कि देवी-देवताओं के समक्ष कर्पूर जलाने से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। अतः प्रतिदिन सुबह और शाम घर में संध्या वंदन के समय कपूर जरूर जलाएं। वस्तुतः कपूर जलाने से सकारात्मक उर्जा उत्पन्न होती है। यदि आप चाहते हैं कि घर में सकारात्मक उर्जा और शांति-समृद्धि बनी रहे तो प्रतिदिन सुबह और शाम कर्पूर को घी में भिगोकर जलाएं और संपूर्ण घर में उसकी खुशबू फैलाएं। ऐसा करने से घर की नकारात्मक उर्जा नष्ट हो जाएगी। दुःस्वप्न नहीं आएंगे और घर में अमन शांति बनी रहेगी है।

इससे देवदोष व पितृदोष का शमन होता है। अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि हमें शायद पितृदोष है या काल सर्पदोष है। दरअसल, यह राहु और केतु का प्रभाव मात्र है। इसको दूर करने के लिए घर के वास्तु को ठीक करें। यदि ऐसा नहीं कर सकते तो प्रतिदिन सुबह, शाम और रात्रि को तीन बार घी में भिगोया हुआ कर्पूर जलाएं। घर के शौचालय और बाथरूम में कर्पूर की 2-2 टिकियां रख दें। बस इतना उपाय ही काफी है।

ज्योतिश षास्त्र के अनुसार आकस्मिक घटना या दुर्घटना का कारण राहु, केतु और शनि होते हैं। इसके अलावा हमारी तंद्रा और क्रोध भी दुर्घटना का कारण बनते हैं। इसके लिए रात्रि में हनुमान चालीसा का पाठ करने के बाद कर्पूर जलाएं। प्रतिदिन सुबह और शाम जिस घर में कर्पूर जलता रहता है, उस घर में किसी भी प्रकार की आकस्मिक घटना और दुर्घटना नहीं होती। रात्रि में सोने से पूर्व कर्पूर जलाकर सोना तो और भी लाभदायक है।

वैज्ञानिक शोधों द्वारा यह भी ज्ञात हुआ है कि इसकी सुगंध से जीवाणु, विषाणु आदि बीमारी फैलाने वाले जीव नष्ट हो जाते हैं, जिससे वातावरण शुद्ध हो जाता है तथा बीमारी होने का भय भी नहीं रहता। यदि घर के किसी स्थान पर वास्तु दोष निर्मित हो रहा है तो वहां कर्पूर की 2 टिकियां रख दें। जब वह टिकियां गलकर समाप्त हो जाए तब दूसरी दो टिकिया रख दें। इस प्रकार बदलते रहेंगे तो वास्तुदोष निर्मित नहीं होगा।

सलाह दी जाती है कि पानी में कर्पूर के तेल की कुछ बूंदों को डाल कर नहाएं। यह आपको तरोताजा तो रखेगा ही आपके भाग्य को भी चमकाएगा। यदि इस में कुछ बूंदें चमेली के तेल की भी डाल लेंगे तो इससे राहु, केतु और शनि का दोष नहीं रहेगा।

 


https://youtu.be/1bqmmsc0PgY

शुक्रवार, अप्रैल 17, 2026

भूत होते हैं या नहीं?

मानव जाति ने बहुत विकास किया है। हम बहुत ज्ञानी और सुशिक्षित हो गए हैं, मगर एक गुत्थी ऐसी है, जिसे आज भी पक्के तौर पर सुलझाया नहीं जा सका है। वो है- भूत होते हैं या नहीं? पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। इसको लेकर खूब बहस होती रहती है। कुछ लोगों का दावा होता है कि उन्होंने भूत देखा है, उसकी झलक देखी है या उसके वजूद को महसूस किया है। इसके अनेक प्रकरण संज्ञान में आए हैं। चूंकि भूत को वैज्ञानिक नजरिये से साबित नहीं किया जा सका है, इस कारण अधिसंख्य लोग ऐसे हैं, जो ये कहते हैं कि भूत कोरा वहम है, उसको कोई अस्तित्व नहीं है। यदि हम मान भी लें कि भूत नहीं होते हैं, तो भी इस बात को तो स्वीकार करते हैं कि अमुक स्थान पर जाने पर भय प्रतीत होता है। वह क्या है? समझा जाता है कि ऐसा वहां उपस्थित नेगेटिव एनर्जी की वजह से होता है।

इसी बीच इस मुद्दे पर विज्ञान ने भी काम आरंभ कर दिया है। अब तक के अध्ययन के अनुसार नकारात्मक एनर्जी को भूत कहा जा सकता है। बाकायदा एक तकनीकी डिवाइस बना ली गई है, जो नेगेटिव एनर्जी का पता लगा लेती है। यह डिवाइस इलैक्टोमेग्नेटिव फोर्स को डिटेक्ट करती है। वस्तुतः डिवाइस को मोबाइल फोन से कनैक्ट करके एक ऐप के जरिए उस दिशा में चला जाता है, जिस में ऐसा प्रतीत होता है कि वहां कुछ अज्ञात हरकत हो रही होती है। एप रेडिएशन को पकड लेता है। डिजिटल रिकॉर्डर को अईवीपी मशीन भी कहा जाता है। भूत खोजने वाले इसे भूतों वाली जगहों पर रहस्यमयी आवाजें सुनने के लिए इस्तेमाल करते हैं। कई इन्वेस्टिगेटर्स का मानना है कि इस डिजिटल रिकॉर्डर की आवाज से आत्माओं को फॉलो किया जा सकता है। कई व्लॉगर्स ने इस पर काम किया है। 

वैज्ञानिकों ने ईएमएफ मीटर बनाया है, जो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड और आत्माओं की एक्टिविटी को ट्रेस कर सकती है। पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर्स का कहना है कि परालौकिक शक्तियों में मैग्नेटिक फील्ड को बदलने की ताकत होती है। मैग्नेटिक फील्ड के बदलते ही ये ईएमएफ मीटर इसे ट्रैक कर लेता है। पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर्स के बीच ये डिवाइस काफी फेमस है। वैज्ञानिकों ने घोस्ट बॉक्स बनाया है, जिसे फ्रैंक बॉक्स भी कहा जाता है। वह एक तरह का पोर्टेबल रेडियो है। इससे एमएम और एफएम बैंड भी कनेक्ट होता है। माना जाता है कि कई रहस्यमयी ताकतें ऑडियो संकेतों की मदद से अपना मैसेज देती हैं। इस डिवाइस का डिजिटल रिकॉर्डर की तरह उपयोग किया जा सकता है।

इसी प्रकार लेजर ग्रिड बनाई गई है। कोई अतृप्त आत्मा या शक्ति होने पर लेजर बीम जलने लगती है। इसे सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। इसके साथ ही कैमरा और कैम रिकॉर्डर भी लगाया जाता है। मार्केट में कई डिफ्रेंट फीचर्स वाले लेजर ग्रिड उपलब्ध हैं।

सामान्य आंखों से न दिखाई देने वाली आकृतियों को देखने के लिए मोशन डिटेक्टर या मोशन सेंसर का इस्तेमाल किया जाता। मान्यता है कि इस डिवाइस से ऐसी शक्तियों का आसानी से पता चल जाता है। मोशन सेंसर्स बहुत सेंसिटिव मूवमेंट्स को भी आसानी से ट्रैक कर लेते हैं।

वैज्ञानिक नजरिया है कि विद्युत आवेश से युक्त किसी वस्तु द्वारा उत्पन्न भौतिक क्षेत्र विद्युतचुम्बकीय क्षेत्र कहा जाता है। ऐसे क्षेत्र में स्थित किसी आवेशित वस्तु पर बल लगता है, चाहे यह वस्तु स्थिर हो या गतिमान। विद्युतचुम्बकीय अंतर्कि्रया प्रकृति में विद्यमान चार मूलभूत बलों में से एक है।

ज्ञातव्य है कि शार्क मछली रास्ता खोजने के लिए मैग्नेटिक फील्ड का उपयोग करती हैं। वैज्ञानिकों को अभी तक यह पता था कि समुद्री कछुए चुंबकीय संकेतों के जरिए यह जान पाते हैं कि उन्होंने हजारों दूर मील कहां अपने अंडे छिपा रखें हैं, लेकिन अभी तक यह पता नहीं चल सका था कि शार्क आखिर हजारों किलोमीटर दूर की यात्राओं में अपना रास्ता कैसे पता लगा लेती हैं। शोधकर्ताओं का पता चला है कि इसके लिए वे भी मैग्नेटिक फील्ड पर निर्भर करती हैं। वे पृथ्वी की मैग्ननेटिक फील्ड का उपयोग उनका रास्ता खोजने में करती हैं। यह एक तरह का प्राकृतिक जीपीएस है।


गुरुवार, अप्रैल 16, 2026

ताली बजाने की कीमिया बहुत दिलचस्प है

 आपको ख्याल में होगा कि जब भी आरती, भजन अथवा कीर्तन होता है तो, उसमें सभी लोग तालियां बजाते हैं। क्या आपको ख्याल है कि ताली बजाई क्यों जाती है? उसके रहस्य को जाने बिना ही परंपरा के अनुसार ताली बजाते हैं। बडी दिलचस्प बात है कि आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि जिस प्रकार व्यक्ति अपने बगल में कोई वस्तु छिपा ले और यदि दोनों हाथ ऊपर करे तो वह वस्तु नीचे गिर जायेगी। ठीक उसी प्रकार जब हम दोनों हाथ ऊपर उठा कर ताली बजाते है, तो जन्मों से संचित पाप, जो हमने स्वयं अपने बगल में दबा रखे है, नीचे गिर जाते हैं अर्थात नष्ट होने लगते हैं। बताया तो यहां तक जाता है कि जब हम कीर्तन के समय हाथ ऊपर उठा कर ताली बजाने में काफी षक्ति लगती है और हमारे हाथों की रेखाएं तक बदल जाती हैं।

जब हम ताली बजाते हैं, तो हथेलियां बड़ी गति से टकराती हैं और हवा का दाब अचानक बदलने से “पॉप” जैसी ध्वनि पैदा होती है। इस टकराव में लगभग 100-300 न्यूटन तक बल लग सकता है। ध्वनि तरंगें पैदा होकर तेजी से फैलती हैं, जिससे अन्य लोगों में भी ताली बजाने की प्रेरणा होती है। ताली बजाने से डोपामीन (खुशी का हार्मोन) रिलीज होता है। इससे उत्साह, अपनापन और सामूहिक ऊर्जा बढ़ती है। इससे शरीर में रक्त संचार बढ़ता है, तनाव कम होता है। समूह में ताली बजाने से सिंक्ट्रनाइजेशन प्रभाव होता है। लोग एकसाथ जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। ताली मूल रूप से सबसे प्राचीन वाद्य यंत्र है। “ताल” का शब्द ही “ताली” से जुड़ा है। नृत्य, भजन, कथक आदि में ताल संकेत करने का पहला साधन ताली ही है।

वस्तुतः हथेली में 30 से अधिक प्रमुख दबाव बिंदु होते हैं। एक्यूप्रेशर सिद्धांत के अनुसार मनुष्य को हाथों में पूरे शरीर के अंग व प्रत्यंग के दबाव बिंदु होते हैं, जिनको दबाने पर सम्बंधित अंग तक खून व ऑक्सीजन का प्रवाह पहुंचने लगता है और धीरे-धीरे वह रोग ठीक होने लगता है।

ताली में बाएं हाथ की हथेली पर दाएं हाथ की चारों अंगुलियों को एक साथ तेज दबाव के साथ इस प्रकार मारा जाता है कि दबाव पूरा हो और आवाज अच्छी आए। इस प्रकार की ताली से बाएं हथेली के फेफड़े, लीवर, पित्ताशय, गुर्दे, छोटी आंत व बड़ी आंत तथा दाएं हाथ की अंगुली के साइनस के दबाव बिंदु दबते हैं और इससे इन अंगों तक खून का प्रवाह तीव्र होने लगता है। इस प्रकार की ताली को तब तक बजाना चाहिए जब तक कि हथेली लाल न हो जाए। इस प्रकार की ताली कब्ज, एसिडिटी, मूत्र, संक्रमण, खून की कमी व श्वांस लेने में तकलीफ जैसे रोगों में लाभ पहुंचाती है।

दूसरे किस्म की ताली:- दोनों हाथों के अंगूठा-अंगूठे से कनिष्का-कनिष्का से तर्जनी-तर्जनी से यानी कि सभी अंगुलियां अपने समानांतर दूसरे हाथ की अंगुलियों पर पड़ती हों, हथेली-हथेली पर पड़ती हो। इस प्रकार की ताली की आवाज बहुत तेज व दूर तक जाती है। इस प्रकार की ताली कान, आंख, कंधे, मस्तिष्क, मेरूदंड के सभी बिंदुओं पर दबाव डालती है। इस ताली का सर्वाधिक लाभ फोल्डर एंड सोल्जर, डिप्रेशन, अनिद्रा, स्लिप डिस्क, स्पोगोलाइसिस, आंखों की कमजोरी में पहुंचता है। इस ताली से अन्य अंगों के दबाव बिंदु सक्रिय हो उठते हैं।यह ताली सम्पूर्ण शरीर को सक्रिय करने में मदद करती है। यदि इस ताली को तेज व लम्बा बजाया जाता है तो शरीर में पसीना आने लगता है, जिससे शरीर के विषैले तत्व पसीने से बाहर आकर त्वचा को स्वस्थ रखते हैं। अतः ताली बजाना एक उत्कृष्ट व्यायाम है। रक्त का शुद्धिकरण बढ़ जाता है और हृदय रोग, रक्त नलिकाओं में रक्त का थक्का बनना रुकता है। रक्त के श्वेत रक्तकण सक्षम तथा सशक्त बनने के कारण शरीर में चुस्ती, फुर्ती तथा ताजगी का एहसास होता है। रक्त में लाल रक्तकणों की कमी दूर होकर वृद्धि होती है और स्वास्थ्य सुधरता है। इस तरह ताली दुनिया का सर्वोत्तम एवं सरल सहज योग है और प्रतिदिन नियमित रूप से ताली बजाकर कई रोग दूर किए जा सकते हैं।