तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

मंगलवार, मार्च 24, 2026

 मान्यता है कि जिस मूर्ति की पूजा कम होती है, अथवा निर्जन स्थान पर मौजूद है, उसकी पूजा करने से त्वरित व अधिक फल मिलता है। यानि वहां सुनवाई तुरंत होती है। यह मान्यता लोकविश्वास मात्र नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक आधार है।

वस्तुतः कम पूजित मूर्ति प्रायः पुराने मंदिरों में, गांव के कोने में या उपेक्षित स्थानों पर होती है। वहां जाने वाला व्यक्ति अक्सर सच्ची मजबूरी या आंतरिक पुकार लेकर जाता है, उसमें औपचारिकता नहीं होती। कम पूजित मूर्ति के सामने जाने वाला भक्त सामान्यतः दिखावे से मुक्त होता है। भीड़ और प्रतिस्पर्धा से दूर होता है। उसका भाव अधिक निजी और गहरा होता है। इसलिए फल अधिक अनुभूत होता है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से जहाँ पूजा कम होती है, वहां अपेक्षा नहीं होती, प्रचार नहीं होता, चमत्कार की अफवाह नहीं होती, इससे मन अहंकार और सौदेबाजी से मुक्त रहता है। ऐसा मन जब प्रार्थना करता है, तो वह भीतर तक उतरती है।

तांत्रिक और भक्ति परंपरा में कई साधना-मार्गों में कहा गया है कि उपेक्षित देवता शीघ्र प्रसन्न होते हैं, क्योंकि वहां जाने वाला व्यक्ति फल नहीं, संबंध चाहता है। नाम नहीं, शरण चाहता है।

गूढ़ सत्य ये है कि ईश्वर को पूजा की संख्या नहीं, निष्ठा की तीव्रता आकर्षित करती है। भीड़ में भक्ति अक्सर सामाजिक होती है, परंपरागत होती है, जबकि अकेले में भक्ति आत्मिक होती है, मौन होती है, सत्य होती है। कम पूजित मूर्ति की पूजा से अधिक फल इसलिए मिलता है क्योंकि वहां श्रद्धा अधिक शुद्ध होती है, अहंकार कम होता है, संबंध सीधा होता है।

इस बारे में एक कहानी है। गांव के बाहर, पीपल और खेजड़ी के बीच एक पुरानी सी मूर्ति खड़ी थी। न नक्काशी, न रंग, बस पत्थर पर उकेरी एक आकृति। लोग उसे कहते थे बूढ़ा देव। यहां न पुजारी था, न प्रसाद की दुकान। सिर्फ धूप, चुप्पी और हवा की सरसराहट। एक बार गाँव में सूखा पड़ा। लोग बड़े मंदिर गए। मन्नतें मानीं, नारियल चढ़ाए, लंबी कतारें लगीं। सूखा वैसे का वैसे रहा। उसी गांव की एक विधवा थी धन्नो। उसके पास न चढ़ावा था, न मन्नत के शब्द। वह चुपचाप उस बूढ़े देव के पास गई। एक लोटा पानी रखा, और बोली, “मैं बहुत कुछ नहीं जानती, बस इतना जानती हूँ कि तू भी अकेला है, मैं भी।” फिर रोई नहीं। बस बैठी रही। तीसरे दिन बादल आए। पहले उसी कोने में बरसे, जहां बूढ़ा देव खड़ा था। फिर धीरे-धीरे पूरे गांव में। लोग चकित थे। किसी ने कहा संयोग है। किसी ने कहा कि बरसात का मौसम था। पर धन्नो कुछ नहीं बोली। वह जानती थी कि देवता को शब्द नहीं, साथ अच्छा लगता है। तब से गाँव में एक कहावत चल पड़ी, जिस देव के पास भीड़ नहीं, उसके पास भगवान बैठा होता है। और लोग समझ गए कि कम पूजित मूर्ति जल्दी फल देती है, क्योंकि वहां न दिखावा होता है, न सौदा, सिर्फ मन होता है।

सूफी कहते हैं कि खुदा को तलााशने के लिए दरगाह नहीं, दिल चाहिए। सिंध की धरती पर एक फकीर रहता था लाल शाह। उसकी कब्र न मशहूर थी, न उस पर चादरें चढ़ती थीं। रेत में दबी, कंटीली झाड़ियों के बीच, बस एक टूटा हुआ पत्थर था। लोग कहते, यहां कौन जाता है? न करामात है, न शोर। एक दिन एक मुसाफिर आया। बहुत भटका हुआ, बहुत थका हुआ। वह बड़े दरबारों से होकर आया था। हर जगह भीड़, हर जगह मांग। वह इस टूटी कब्र के पास बैठ गया। न फातिहा पढ़ी, न दुआ माँगी। बस बोला, “अगर तू वाकई दोस्त है, तो चुप बैठने दे।” सूफी कहते हैं कि यहीं से मुलाकात शुरू होती है। रात को मुसाफिर को नींद आई। ख्वाब में लाल शाह बोले, “जहां सवाल नहीं होते, वहीं जवाब उतरते हैं।” सुबह वह मुसाफिर बदला हुआ था। उसकी परेशानी बाहर से नहीं, अंदर से हल हो चुकी थी। लोग पूछने लगे, “तुझे वहां क्या मिला, जहां कुछ भी नहीं था?” वह मुस्कराया, “वहां खुुदा था, इसलिए कुछ नहीं था।” सूफियाना हिकमत कहती है, जो दर मशहूर हो जाता है, वहां अक्सर अल्लाह छुप जाता है। और जो दर गुमनाम रहे, वहां अल्लाह खुद बैठा रहता है। इसलिए सूफी कहते हैं कि कम पूजी जाने वाली मूरत, या गुमनाम कब्र जल्दी असर करती है, क्योंकि वहां दिल खाली होकर पहुंचता है।

रविवार, मार्च 22, 2026

क्या पुनः जन्म लेती है आत्मा?

आत्मा के बारे में विभिन्न धार्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण हैं, और ये इस बात पर निर्भर करते हैं कि आप किस परंपरा या विश्वास प्रणाली से आते हैं। हिंदू धर्म के अनुसार, आत्मा अमर होती है और शरीर के नष्ट हो जाने पर पुनर्जन्म लेती है। आत्मा किसी कब्र या शरीर में स्थायी रूप से नहीं रहती, बल्कि कर्मों के आधार पर उसे नया शरीर प्राप्त होता है। हालांकि वैज्ञानिक रूप से साफ तौर पर यह प्रमाणित करना कठिन है, मगर पुनर्जन्म की ऐसी अनेक घटनाएं हुई हैं, जिन पर विज्ञान मौन हो जाता है। हिंदू धर्म में तो पुनर्जन्म का पूरा विधान है कि आत्मा अगला जन्म कहां लेगी? यहां तक कि सात जन्मों की अवधारणा है। प्रेम के वशीभूत पति-पत्नी सात जन्मों का साथ निभाने की कामना करते हैं। कर्मों के अनुसार अनेक योनियों में जन्म लेने की मान्यता है। रामायण, महाभारत व पुराणों में पुनर्जन्म की अनेकानेक कथाएं प्रचलित हैं। हालांकि वैज्ञानिक नजरिया रखने वाले पुनर्जन्म की घटना को मानसिक विकृति के रूप में परिभाषित करते हैं। इस पर परामनोवैज्ञानिकों ने बहुत काम किया है। 

दूसरी ओर इस्लाम में यह विश्वास है कि मृत्यु के बाद आत्मा को अल्लाह के पास ले जाया जाता है, और कब्र में एक अंतरिम जीवन शुरू होता है, जहां आत्मा अपने कर्मों के अनुसार या तो शांति पाती है या कष्ट उठाती है। परंतु आत्मा कब्र में स्थायी रूप से नहीं रहती, यह एक अस्थायी अवस्था है, जब तक कि कयामत का दिन नहीं आ जाता। ऐसे में इस्लामिक मान्यता के अनुसार, पुनर्जन्म की अवधारणा को स्वीकार नहीं किया जाता है। इस्लाम में यह विश्वास है कि हर इंसान की एक ही जिन्दगी होती है, और मृत्यु के बाद उसे कब्र में दफनाया जाता है। फिर कयामत या आखिरत के दिन, अल्लाह इंसानों को दोबारा जिंदा करेगा और उनके कर्मों का हिसाब-किताब होगा। अच्छे कर्म करने वालों को जन्नत में और बुरे कर्म करने वालों को जहन्नुम में भेजा जाएगा। हालांकि, अपवादस्वरूप कुछ व्यक्तिगत अनुभव या घटनाएं सामने आई हैं, जिन्हें लोग पुनर्जन्म से जोड़ते हैं, लेकिन वे इस्लामी मान्यताओं के अनुसार नहीं होते। कई बार ऐसे अनुभवों को व्यक्ति की मानसिक स्थिति, या दूसरी संस्कृतियों की मान्यताओं से प्रभावित माना जा सकता है। अगर मुस्लिम समाज में पुनर्जन्म से संबंधित कहीं घटनाएं सामने आती हैं, तो वे व्यक्तिगत धारणाओं या अन्य बाहरी प्रभावों के कारण हो सकती हैं, लेकिन वे इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप नहीं होतीं।

ईसाई धर्म में भी आत्मा को अमर माना जाता है। मृत्यु के बाद आत्मा स्वर्ग या नर्क में जाती है, और कब्र केवल शरीर के लिए है। आत्मा कब्र में नहीं रहती।

बौद्ध धर्म में आत्मा की अवधारणा थोड़ी भिन्न है, क्योंकि आत्मा को स्थायी नहीं माना जाता। जीवन-मरण का चक्र चलता रहता है और पुनर्जन्म होता है। कब्र का आत्मा से कोई विशेष संबंध नहीं होता। इसलिए, आत्मा कब्र में रहने का विचार केवल कुछ विशेष धार्मिक मान्यताओं में होता है, लेकिन अधिकांश प्रमुख धर्म इसे अस्थायी मानते हैं या आत्मा को कब्र से परे की अवस्था में मानते हैं।

मृतक का सिर उत्तर दिशा की ओर क्यों रखा जाता है?

हमारे यहां मृत्यु से जुड़ी अनेक परंपराए हैं। इन्हीं परंपराओं में से एक परंपरा है कि मरणासन्न यानि कि मृत्यु जब करीब हो, जब यह निश्चित हो जाए कि मृत्यु आने ही वाली है, किंतु प्राण निकलने में कष्ट अधिक हो रहा हो तो मृत्यु को प्राप्त करने वाले व्यक्ति का सिर उत्तर दिशा की ओर कर देना चाहिए। इसके अतिरिक्त मौत के बाद मृतक का सिर उत्तर दिशा की ओर रखने की भी रवायत है। इस परंपरा को निभाते तो अधिकतर लोग हैं, लेकिन बहुत कम लोग ये जानते हैं कि मृतक का सिर उत्तर दिशा की ओर ही क्यों रखना चाहिए? मृतक का सिर उत्तर की ओर करके इसलिए रखते हैं कि प्राणों का उत्सर्ग दशम द्वार से हो। चुम्बकीय विद्युत प्रवाह की दिशा दक्षिण से उत्तर की ओर होती है। कहते हैं मरने के बाद भी कुछ क्षणों तक प्राण मस्तिष्क में रहते हैं। अतः उत्तर दिशा में सिर करने से गुरुत्वाकर्षण के कारण प्राण शीघ्र निकल जाते हैं। 

परंपरा के अनुसार मृत्यु के बाद अंत्येष्ठि संस्कार के समय मृतक का सिर दक्षिण की तरफ रखना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार दक्षिण की दिशा मृत्यु के देवता यमराज की मानी गई है। इस दिशा में शव का सिर रख हम उसे मृत्यु के देवता को समर्पित कर देते हैं।

इसके अतिरिक्त पार्थिव शरीर को ले जाते समय उसका सिर आगे और पैर पीछे रखे जाते हैं। फिर विश्रांत स्थल पर मृत देह को एक वेदी पर रखा जाता है, इसलिए कि अंतिम बार व्यक्ति इस संसार को देख ले। इसके बाद देह की दिशा बदल दी जाती है। फिर पैर आगे और सिर पीछे हो जाता है अर्थात तब मृत आत्मा को श्मशान को देखते हुए आगे बढना होता है। अंत में जब देह को चिता पर लेटाया जाता है तो उसका सिर चिता पर दक्षिण दिशा की ओर रखते हैं।

हिन्दू सनातन धर्म में पार्थिव शरीर को सूर्यास्त से पूर्व दाह संस्कार करने का नियम है। सनातन धर्म में साधु को समाधि दी जाती है और सामान्यजन का दाह संस्कार किया जाता है। साधु को समाधि इसलिए दी जाती है क्योंकि ध्यान और साधना से उसका शरीर एक विशेष उर्जा और ओरा लिए हुए होता है, इसलिए उसकी शारीरिक ऊर्जा को प्राकृतिक रूप से विसरित होने दिया जाता है। एक बात और, जीते जी उसकी आत्मा षरीर से पृथक हो जाती, इस कारण उसका दाह संस्कार करने की जरूरत नहीं होती। इसी प्रकार मासूस बच्चे का भी दफनाया जाता है, क्यों कि उसकी आत्मा का शरीर से पक्का संबंध नहीं होता, इस कारण दाह संस्कार की जरूरत नहीं होती। दूसरी ओर आम व्यक्ति का दाह संस्कार किया जाता है ताकि उसकी अपने शरीर के प्रति आसक्ति छूट जाए।

ऐसी मान्यता है कि अंतिम संस्कार में शामिल होना पुण्य कर्म है। जिस घर में किसी का देहांत हुआ है, उस घर से 100 गज दूर तक के घरों के लोगों को अंतिम संस्कार में शामिल होना चाहिए। 

श्मशान ले जाने से पूर्व घर पर कुटुंब के लोग मृत व्यक्ति के पार्थिव शरीर की परिक्रमा करते हैं। बाद में दाह संस्कार के समय संस्कार करने वाला व्यक्ति छेद वाले घड़े में जल लेकर चिता पर रखे पार्थिव शरीर की परिक्रमा करता है। जिसके अंत में पीछे की ओर घड़े को गिरा कर फोड़ दिया जाता है। ऐसा मृत व्यक्ति के शरीर से मोहभंग करने के लिए किया जाता है। 

हिंदू धर्मानुसार सूर्यास्त के बाद कभी भी दाह संस्कार नहीं किया जाता है। यदि किसी की मृत्यु सूर्यास्त के बाद हुई है तो उसे अगले दिन सुबह के समय ही दाह संस्कार किए जाने का नियम है। ऐसी मान्यता है कि सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार करने से मृतक की आत्मा को परलोक में भारी कष्ट सहना पड़ता है और अगले जन्म में उसे किसी अंग में दोष भी हो सकता है।

मंगलवार, मार्च 17, 2026

अगरबत्ती जलाना अनुचित है?

हमारे यहां धर्म स्थलों व घर के मंदिरों में अगरबत्ती जलाने का चलन है। यह आम बात है। मगर कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि ऐसा करना अनुचित है। आइये, जानते हैं कि उसकी क्या वजह है?

वे शास्त्रों के हवाले से सवाल खड़ा करते हैं कि जिस बांस की लकड़ी को चिता में भी जलाना वर्जित है, हम उस बांस से बनी अगरबत्ती को मंदिर में कैसे जला सकते हैं? वे कहते हैं कि शव को भले ही बांस व उसकी खपच्चियों से बनी सीढ़ी पर रख कर श्मशान पहुंचाते हैं, लेकिन जलाते वक्त उसे अलग कर देते हैं, क्यों कि बांस जलाने से पितृ दोष लगता है। उनका तर्क है कि शास्त्रों में पूजन विधान में कहीं पर भी अगरबत्ती का उल्लेख नहीं मिलता। सब जगह धूप करने का ही जिक्र है। ज्ञातव्य है कि जिस प्रकार हिंदू अगर का धूप करते हैं, वैसे ही मुस्लिम लोबान का धूप जलाते हैं। इससे वातावरण शुद्ध होता है और सकारत्मकता आती है।

अगरबत्ती नहीं जलाने के बारे में वैज्ञानिक तर्क ये है कि बांस में सीसा प्रचुर मात्रा में होता है और उसके जलने पर लेड आक्साइड बनता है, जो कि एक खतरनाक नीरो टॉक्सिक है, वह खतरनाक है। इसके अतिरिक्त अगरबत्ती के जलने से उत्पन्न हुई सुगन्ध के प्रसार के लिए फेथलेट नाम के विशिष्ट केन्मिकल का प्रयोग किया जाता है। यह एक फेथलिक एसिड का ईस्टर होता है। यह भी स्वांस के साथ शरीर मे प्रवेश करता है, जिससे फेफड़ों को नुकसान होता है। इस प्रकार अगरबत्ती की तथाकथित सुगन्ध न्यूरोटॉक्सिक एवम हेप्टोटोक्सिक को भी स्वांस के साथ शरीर में पहुंचाती है। इसकी लेश मात्र उपस्थिति कैंसर अथवा मस्तिष्क आघात का कारण बन सकती है। हेप्टो टॉक्सिक की थोड़ी सी मात्रा लीवर को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है। इसी कारण अनेक लोग अगरबत्ती की जगह धूप व विभिन्न प्रकार की धूप बत्तियां काम में लेते हैं।

अगरबत्ती नहीं जलाने के खिलाफ तर्क देने वाले कहते हैं कि यह केवल एक भ्रान्ति है कि बांस की लकड़ी को नहीं जलाया जाता। देश के बहुत से प्रांतों में बांस की लकड़ी के अंदर भोजन बनाया जाता है, जिसमे बांस की लकड़ी ही जलती है।

रविवार, मार्च 15, 2026

क्या उठावने के दिन बारहवां उचित है?

इन दिनों ऐसा चलन में आ रहा है कि कई लोग अपने परिजन के निधन के बाद उठावने अर्थात तीसरे की रस्म के साथ ही बारहवें की रस्म कर इतिश्री कर रहे हैं। वर्तमान दौर में ऐसा लोग समयाभाव के कारण कर रहे हैं, तो ठीक प्रतीत होता है, मगर षास्त्र के जानकारों का कहना है कि ऐसा करना अनुचित है।

ज्ञातव्य है कि उठावना मृत्यु के बाद तीसरे दिन परिवार और समाज के सदस्यों द्वारा मृत आत्मा की शांति के लिए किया जाने वाला एक धार्मिक अनुष्ठान है। इसमें मृतक के उत्तराधिकारी को पगडी पहनाई जाती है। इस लिहाज से यह एक सामाजिक कर्म भी है। इसके बाद लोग अपने प्रतिश्ठान खोल कर दैनिक कार्य फिर से आरंभ करते हैं। 

बारहवां मृत्यु के बारहवें दिन किया जाने वाला कर्मकांड है, जिसमें पिंडदान, तर्पण और भोज का आयोजन होता है। इसे मृत आत्मा की सद्गति और परिवार की शुद्धि के लिए किया जाता है। जो परिवार परंपराओं को गहराई से मानते है, तो वे दोनों को अलग-अलग दिन करते हैं। इससे हर अनुष्ठान को पूरी श्रद्धा से निभाने का समय मिलता है।

आधुनिक समय में कई परिवार एक साथ उठावना और बारहवां संपन्न करते हैं। यह समय और संसाधनों की बचत के लिए किया जाता है। लेकिन विद्वान कहते हैं कि दोनों कर्मकांड अलग अलग ही करने चाहिए। दोनों अलग अलग महत्व है। यदि समयाभाव है तो बारहवां छोटे स्तर पर किया जा सकता है।

उक्त सभी के पीछे बहुत गहरा विज्ञान छुपा हुआ है। वैज्ञानिक कहते हैं कि मृत व्यक्ति का दिमाग तीन दिन तक सक्रिय रहता है। हिन्दू धर्मानुसार, ज्यादा से ज्यादा व्यक्ति की चेतना तीन दिन में लुप्त होकर नया जन्म ले लेती है। यदि कोई बहुत ही स्मृतिवान है तो वह तेरह दिन में दूसरा जन्म ले लेता है या फिर सवा माह में। यदि आसक्ति ज्यादा है तो वर्षभर लगता, लेकिन तब तक व्यक्ति पितरों में शामिल हो जाता है। फिर उस व्यक्ति की आत्मा से छुटकारा पाने हेतु गया में उसकी मुक्ति हेतु पिंडदान किया जाता है। गरुड़ पुराणानुसार, व्यक्ति मरने के बाद ऊपर के लोक में सफर करता है, जिससे कि उसको आपके द्वारा दिए गए तर्पण से ही आगे बढऩे की शक्ति मिलती है।

मंगलवार, मार्च 10, 2026

नंदी के कान में क्यों बताते हैं मनोकामना?

आपने देखा होगा कि कई श्रद्धालु शिवजी के मंदिर में दर्शन को जाते हैं तो मंदिर के गर्भगृह के ठीक बाहर सामने स्थित नंदी की प्रतिमा के कान में कुछ फुसफुसाते हैं। असल वे नंदी को अपनी मनोकामना बताते हैं। विश्वास यह कि नंदी उनकी मनोकामना की जानकारी शिवजी को देंगे और शिवजी उसे पूरा करेंगे। असल में मान्यता है कि नंदी शिवजी के परमभक्त व उनके वाहन हैं। उसके सबसे करीब। अतः अर्जी ठीक मुकाम पर पहुंचेगी। यह ठीक वैसे ही है, जैसे श्रद्धालु दरगाह ख्वाजा साहब में हाजिरी के वक्त ख्वाजा साहब से दुआ मांगते हैं, मगर हाजिरी अर्थात जियारत की रस्म खुद्दाम साहेबान अदा करते हैं। इसी प्रकार तीर्थराज पुष्कर में स्नान के दौरान पूजा अर्चना किसी पुरोहित के माध्यम से करवाते है। बेशक अपने इष्ट से सीधे भी संपर्क साधा जा सकता है, मगर माध्यम की जरूरत होती ही है। जैसे मुवक्किल को वकील की जरूरत होती है। किसी सज्जन ने इंटरनेट पर लिखा है कि नंदी के कान में मनोकामना बताने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। यह आस्था मात्र है। बिलकुल यह प्रथा विज्ञान द्वारा प्रमाणित नहीं है। मगर वैज्ञानिक आधार तलााशना भी तो अर्थहीन है। क्या खादिम व पुरोहित की भूमिका का कोई वैज्ञानिक आधार है। नहीं। तो नंदी की अहमियत पर सवाल करना उचित कैसे हो सकता है?

पौराणिक कथा के अनुसार, शिलाद नाम के मुनि ने संतान प्राप्ति की कामना के साथ भगवान इंद्रदेव को रिझाने के लिए तपस्या की। परंतु, इंद्रदेव ने संतान का वरदान देने में असर्मथता जताते हुए भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अनुरोध किया। इसके बाद शिलाद मुनि ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की। जिसके बाद शिवजी प्रकट हुए और उन्होंने शिलाद को स्वयं के रूप में प्रकट होने का वरदान दिया। महादेव के वरदान के बाद शिलाद मुनि को नंदी के रूप में संतान प्राप्त हुई। शिवजी के आशीर्वाद के कारण नंदी अजर अमर हो गए। उन्होंने संपूर्ण गणों, गणेश व वेदों के समक्ष गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक कराया। जिसके बाद नंदी नंदीश्वर कहलाए। भगवान शिव ने नंदी को वरदान दिया कि जहां उनका निवास होगा, वहां स्वयं भी निवास करेंगे। मान्यता है कि तब से ही शिव मंदिर में भगवान शिव के सामने नंदी विराजमान रहते हैं।

सोमवार, मार्च 09, 2026

मौली व कलावा क्यों बांधा जाता है?

भारतीय परंपरा में हाथ की कलाई पर मौली या कलावा बांधने की रस्म सर्वविदित है। क्या आपने कभी ख्याल किया है कि मौली क्यों बांधी जाती है? वस्तुतः यह सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि आस्था, मनोविज्ञान, सामाजिक पहचान और प्रतीक-विद्या का सुंदर मेल है। प्राचीन काल में लोग मानते थे कि मौली में मंत्र-संरक्षित शक्ति होती है। यज्ञ, पूजा या संकल्प के समय इसे बांध कर व्यक्ति को नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा का संकेत दिया जाता था। यह मनोवैज्ञानिक सुरक्षा भी देती है। कलाई पर यह धागा दिखते ही मन में आत्मविश्वास बढ़ता है कि मैं संरक्षित हूं, शुभ कार्य कर रहा हूं। हिंदू कर्मकांड में संकल्प बहुत महत्त्वपूर्ण है। मौली इसी का प्रतीक है। कलाई पर हर बार नजर पड़ने से व्रत और अनुशासन याद रहता है, यह एक मानसिक रिमाइंडर भी है। 

आपको ख्याल में होगा कि कलावा सामान्यतः तीन रंगों में होता है। लाल रंग शक्ति, ऊर्जा व मंगल, पीला ज्ञान, बुद्धि, गुरु-शक्ति और सफेद पवित्रता व सत्य का प्रतीक है। इनका मिश्रण व्यक्ति की देव, धर्म और धर्म-चक्र से जुड़ाव को दर्शाता है। कुछ परंपराएं मानती हैं कि कलाई पर धागा बांधने से नाड़ी बिंदुओं पर हल्का दबाव पड़ता है और रक्त-संचार बेहतर होता है, ध्यान और मन में स्थिरता आती है। हालांकि यह आधुनिक विज्ञान से प्रमाणित नहीं है, पर एक्यूप्रेशर जैसी प्रणालियों में कलाई को महत्त्वपूर्ण माना जाता है। कुल मिला कर मौली सुरक्षा का प्रतीक तो है ही, संकल्प को स्मरण कराता है। मनोवैज्ञानिक सहारा देती है। यह पॉजिटिव रिइन्फोर्समेंट मन में शक्ति और आत्मविश्वास बढ़ाता है।

रक्षा बंधन के दिन बहिन का भाई को राखी या रक्षा सूत्र बांधने के पीछे भी रक्षा का संकल्प लेने का प्रतीक है। रक्षा सूत्र बांध कर बहिन भाई की सुरक्षा की कामना करती है, साथ ही भाई से उसकी सुरक्षा की उम्मीद करती है।

रक्षा-सूत्र अर्थात ऐसा धागा जो हमें किसी न किसी रूप में सुरक्षा प्रदान करता है, शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक।

पुराणों में उल्लेख है कि यज्ञ-कर्म, व्रत, संस्कार, पूजा आदि में पुरोहित दाएं हाथ पर रक्षा-सूत्र बांधता है। इसे प्रोटेक्शन टैग की तरह माना गया। यकीन है कि इससे नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है और शुभ कार्य में व्यवधान नहीं आता। मौली बांध कर यह मंत्र  बोला जाता है - येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः, अर्थात जिस धागे ने बलि और अन्य दैत्य राजाओं की रक्षा की, वही धागा तुम्हारी भी रक्षा करे। मंदिरों, त्योहारों और यज्ञों में सभी को रक्षा-सूत्र बांधा जाता है, यह समानता और सामूहिक आशीर्वाद का प्रतीक है।