तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

रविवार, जून 07, 2026

देवी-देवताओं के वाहन पशु-पक्षी

देवी और देवता 33 प्रकार के होते हैं। प्रत्येक देवी और देवता का एक वाहन होता है। देवी-देवताओं ने अपने वाहन के रूप में कुछ पशु या पक्षियों को चुना है, तो इसके पीछे उनकी विशिष्ठ योग्यता ही रही है। अध्यात्मिक, वैज्ञानिक और व्यवहारिक कारणों से भारतीय मनीषियों ने भगवानों के वाहनों के रूप में पशु-पक्षियों को जोड़ा है। यह भी माना जाता है कि देवताओं के साथ पशुओं को उनके व्यवहार के अनुरूप जोड़ा गया है। अगर पशुओं को भगवान के साथ नहीं जोड़ा जाता तो शायद पशु के प्रति हिंसा का व्यवहार और ज्यादा होता। भारतीय मनीषियों ने प्रकृति और उसमें रहने वाले जीवों की रक्षा का एक संदेश दिया है। हर पशु किसी न किसी भगवान का प्रतिनिधि है, उनका वाहन है, इसलिए इनकी हिंसा नहीं करनी चाहिए।

ग्रंथों के अनुसार विष्णु का वाहन गरुड़ है। माना जाता है कि गिद्धों (गरुड़) की एक ऐसी प्रजाति थी, जो बुद्धिमान मानी जाती थी और उसका काम संदेश को इधर से उधर ले जाना होता था, जैसे कि प्राचीनकाल से कबूतर भी यह कार्य करते आए हैं। प्रजापति कश्यप की पत्नी विनता के 2 पुत्र हुए- गरुड़ और अरुण। गरुड़जी विष्णु की शरण में चले गए और अरुणजी सूर्य के सारथी हुए। सम्पाती और जटायु इन्हीं अरुण के पुत्र थे।

मां लक्ष्मी का वाहन उल्लू है। पश्चिमी मान्यता अनुसार किस व्यक्ति को मूर्ख बनाना अर्थात उल्लू बनाना कहा जाता है। इसका यह मतलब कि मूर्ख व्यक्ति को उल्लू समझा जाता है, लेकिन यह धारणा गलत है। उल्लू सबसे बुद्धिमान निशाचारी प्राणी होता है। उल्लू को भविष्य का ज्ञान पहले से ही हो जाता है। उल्लू को भारतीय संस्कृति में शुभता और धन संपत्ति का प्रतीक माना जाता है। 

मां सरस्वती का वाहन हंस है। हंस पवित्र, जिज्ञासु और समझदार पक्षी होता है। इसकी खासियत हैं कि यह अन्य पक्षियों की अपेक्षा सबसे ऊंचाई पर उड़ान भरता है और लंबी दूरी तय करने में सक्षम होता है। जो ज्ञानी होते हैं वे हंस के समान ही होते हैं और जो बुद्धत्व प्राप्त कर लेते हैं, उनको परमहंस कहा गया है। मां सरस्वती का हंस पर विराजमान होना यह बताता है कि ज्ञान से ही जिज्ञासा को शांत किया जा सकता है। ज्ञान से ही जीवन में पवित्रता, नैतिकता, प्रेम और सामाजिकता का विकास होता है।

शिव का वाहन नंदी बैल है। शिव के एक गण का नाम है नंदी। प्राचीनकालीन किताब कामशास्त्र, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और मोक्षशास्त्र में से कामशास्त्र के रचनाकार नंदी ही थे। विश्व की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं में बैल को महत्व दिया गया है। जिस तरह गायों में कामधेनु श्रेष्ठ है उसी तरह बैलों में नंदी श्रेष्ठ है। वह बल और शक्ति का भी प्रतीक है। बैल को मोह-माया और भौतिक इच्छाओं से परे रहने वाला प्राणी भी माना जाता है। यह सीधा-साधा प्राणी जब क्रोधित होता है तो सिंह से भी भिड़ लेता है। यही सभी कारण रहे हैं, जिसके कारण भगवान शिव ने बैल को अपना वाहन बनाया। शिवजी का चरित्र भी बैल समान ही माना गया है। मां पार्वती का वाहन बाघ है, तो मां दुर्गा का वहन शेर। माता दुर्गा को शेरावाली कहा जाता है।

स्कंद पुराण के तमिल संस्करण कांडा पुराणम में उल्लेख है कि देवासुर संग्राम में भगवान शिव के पुत्र मुरुगन (कार्तिकेय) ने दानव तारक और उसके दो भाइयों सिंहामुखम एवं सुरापदम्न को पराजित किया था। अपनी पराजय पर सिंहामुखम माफी मांगी तो मुरुगन ने उसे एक शेर में बदल दिया और अपना माता दुर्गा के वाहन के रूप में सेवा करने का आदेश दिया। 

यमराज का वाहन भैंसा है। भैंसे का रूप जिस तरह से भयानक होता है उसी तरह यमराज का रूप भी भयानक है। अतः यमराज उसको अपने वाहन के तौर पर प्रयोग करते हैं।

देवी गंगा का वाहन मगरमच्छ है। सिंधु, गंगा, नर्मदा, ब्रह्मपुत्र, कावेरी आदि नदियों में जल में विचरण करने वाला प्रमुख प्राणी मगरमच्छ ही है।

बहुत कम लोगों को पता होगा कि शनिदेव की सवारी कौवा या गिद्ध ही नहीं बल्कि पूरे 9 सवारी शनिदेव की है। जैसे- गिद्ध, घोड़ा, गधा, कुत्ता, शेर, सियार, हाथी, मोर और हिरण हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि शनिदेव जिस वाहन पर सवार होकर जिसके पास भी जाते हैं, वह व्यक्ति उसी के हिसाब से फल का उत्तरदायी होता है। हालांकि कौवे को उनकी मुख्य सवारी माना जाता है।

भगवान भैरव का वाहन कुत्ता माना जाता है। हालांकि भगवान भैरव ने इसे अपना वाहन तो नहीं बनाया, लेकिन वे हमेशा इसे अपने साथ रखते हैं। मान्यता है कि कुत्ते को भोजन देने से भैरव महाराज प्रसन्न होते हैं और हर तरह के आकस्मिक संकटों से वे भक्त की रक्षा करते हैं। हनुमानजी पिशाच को अपना आसन बनाकर उस पर बैठते हैं।

गणेष जी का वाहन मूषक अर्थात चूहा है। इसकी विशेषता है कि वह हर चीज को कुतर डालता है। वह यह नहीं देखता की वस्तु आवश्यक है या अनावश्यक। इसी प्रकार कुतर्की भी यह विचार नहीं करते की यह कार्य शुभ है या अशुभ। श्रीगणेश बुद्धि एवं ज्ञान के देवता हैं तथा कुतर्क मूषक है, जिसे गणेशजी ने अपने नीचे दबा कर अपनी सवारी बना रखा है। कार्तिकेय का वाहन मयूर है। इंद्र ने अपना वाहन ऐरावत नामक एक हाथी को बनाया। समुद्र मंथन के दोरान 14 रत्नों में से एक ऐरावत की भी उत्पत्ति हुई थी। हाथी शांत, समझदार और तेज बुद्धि का प्रतीक है।


शनिवार, जून 06, 2026

पीछे से आवाज क्यों नहीं दी जाती?

हम सब जानते हैं कि जब भी कोई किसी काम से रवाना होता है तो जाते समय उसको पीछे से आवाज नहीं दिया करते। इसे अपशकुन माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि पीछे से आवाज देने पर उस कार्य के संपन्न होने में संशय उत्पन्न हो जाता है, जिसके लिए वह निकला है। इसके अतिरिक्त इसे किसी अनिष्ट की आशंका का संकेत भी माना जाता है। सलाह यही दी जाती है कि रवाना होने की बजाय कुछ पल ठहर लिया जाए। उस वक्त को टाल दिया जाए। यानि कि घर आ कर कुछ पल वापस पलंग या कुर्सी पर बैठा जाए या फिर पानी का एक गिलास पी लिया जाए। उसके बार रवाना हुआ जाए।

जरा गहराई में जाएं तो पाएंगे कि यकायक पीछे से आवाज देने का भाव हमारे मन में प्रकृति ही पैदा करती है। अर्थात जिस पल में वह भाव उत्पन्न होता है, वह किसी काम के निकलने के लिए उचित नहीं होता। प्रकृति उसे टाले जाने की सलाह दे रही होती है। अगर हम उसे अनसुना करते हैं तो उसका परिणाम विपरीत आ जाता है।

अगर इसको अंध विश्वास भी मान लें तो भी काम की सफलता इस कारण संदिग्ध हो जाती है, क्यों कि हमारे मन में यह धारणा पहले से बैठी हुई है कि पीछे से आवाज आई है, यानि कि कुछ गड़बड़ होगी ही, हमारी आत्मशक्ति में कुछ कमजोरी आ जाती है। हम वह कार्य उतने मनोयोग से नहीं कर पाते, जितने से किये जाने की जरूरत होती है। और वाकई काम ठीक से पूरा नहीं होता।

कई बार ऐसा भी होता है कि जैसे ही कोई रवाना होता है, और यकायक हमारे मन में उसे किसी बात की याद दिलाने का ख्याल आता है, मगर चूंकि हम मानते हैं कि पीछे से आवाज देना ठीक नहीं है, हम अपने आपको रोक लेते हैं और व्यक्ति को जाने देते हैं और पाते हैं कि वह स्वतः ही कुछ पल बाद वापस चला आता है, चूंकि तब तक टेलीपैथी से उसके मस्तिष्क में हमारा मस्तिष्क लौटने का संकेत भेज चुका होता है। ऐसा भी होता है कि भले ही हमने अपने आप को टोकने से रोक लिया हो फिर भी काम बिगड़ जाता है। इसका सीधा अर्थ है कि प्रकृति ने तो हमें संकेत दिया था, मगर हमने ही या तो अनसुना कर दिया या फिर बलात खुद को रोक दिया।

ऐसा नहीं कि केवल अन्य व्यक्ति के मन में ही पीछे से आवाज देने का भाव आता है, कई बार हम खुद काम के लिए निकलते हुए महसूस करते हैं कि पीछे से आवाज आ रही है, कुछ अधूरा-अधूरा सा है, या फिर हम कुछ भूल रहे हैं। कई बात तो दिमाग पर जोर डालने पर पकड़ लेते हैं कि हम क्या भूल रहे हैं, मगर कई बार ऐसा नहीं हो पाता। मजे की बात ये है कि क्या भूल रहे हैं, यह घर के भीतर जा कर उसी स्थान पर खड़े होने पर ही याद आता है, जहां से हमारे विचार या दृश्य की शृंखला टूटी है। ऐसा भी होता है कि लाख याद करने पर भी हमें याद नहीं आता तो हम काम के लिए रवाना हो जाते हैं और गन्तव्य स्थान पर पहुंचने के बाद ही पता लगता है कि अमुक चीज भूल गए।

सच में प्रकृति ने हमें मस्तिष्क नामक गजब का सुपर कंप्यूटर दिया है, जो अपने आस-पास से संकेत ग्रहण करता है और संकेत प्रेषित भी करता है। वैज्ञानिक भी इसे स्वीकार करने लगे हैं। हालांकि वे इसका वैज्ञानिक विवेचन नहीं कर पाते, मगर इसे टेली रेस्पोंस पॉवर के नाम से संबोधित करते हैं। टेली रेस्पोंस पॉवर के अनेक सफल प्रयोग हो चुके हैं। यह पूर्ण प्रमाणिक विज्ञान नहीं है, चूंकि यह हमारी मानसिक शक्ति पर निर्भर करता है। यह हमारे संदेश प्रसारण की क्षमता व संदेश ग्रहण करने की पात्रता पर निर्भर करता है। टेली रेस्पोंस पॉवर पर फिर कभी विस्तार से चर्चा करेंगे।

इस संदर्भ में चैट जीपीटी बताता है कि पीछे से किसी को आवाज देना असभ्यता माना जाता है, सामने से बुलाना सम्मान और शालीनता का प्रतीक है। पीछे से पुकारना ऐसे लगता है जैसे आदेश दिया जा रहा हो, अनुरोध नहीं। बुजुर्गों, गुरुओं या सम्मानित व्यक्तियों को पीछे से आवाज देना विशेष रूप से अनुचित माना गया है।

मनोवैज्ञानिक दृश्टि से पीछे से अचानक आवाज आने पर व्यक्ति चौंक सकता है। भय, असहजता या भ्रम पैदा हो सकता है। यह असुरक्षा की भावना जगाता है। कई परंपराओं में पीछे से आवाज देने को अशुभ या अमंगल संकेत माना गया है। कुल मिला कर पीछे से आवाज देना सिर्फ एक आदत नहीं, बल्कि असभ्यता, असावधानी और अशिष्ट व्यवहार का प्रतीक माना गया है, इसलिए कहा गया है कि “पीछे से आवाज नहीं दी जाती।”


सोमवार, मई 25, 2026

दो कोडी की कोडी है बेशकीमती जनाब

 

आपने कोडी देखी होगी। यूं तो उसकी कोई कीमत नहीं मानी जाती, मगर है वह बेषकीमती। आइये, जानते हैं कि वह अनूठी और बेषकीमती कैसे है। आज भले ही मुद्रा के रूप में सिक्के चलन में है, मगर पुराने समय में उसका उपयोग सिक्के के रूप में प्रयोग होता था। विवाह, पूजा, तांत्रिक साधनाओं, खेल-कूद, जैसे चौपड़ आदि में भी उसका उपयोग होता रहा है। कुछ पारंपरिक खेलों में कोड़ियां फेंककर अंक निकाले जाते थे। कोड़ी कई खेल जैसे चौसर और चंग पो में इस्तेमाल होती है। वैसे आम बोलचाल में उसकी कीमत अत्यंत सस्ती मानी जाती है, जिसका मूल्य नगण्य है। तभी तो किसी के लिए यह कहा जाता है कि यह तो कोड़ी भर भी कीमत नहीं रखता। या यह तो दो कोडी का आदमी है। कोड़ी को लेकर आपने बहुत सी कहावतें सुनी होंगी, जैसे दो कोड़ी की औकात ना होना, कल के हजार से आज की कौड़ी अच्छी, पैसा न कोड़ी-बाजार जाए दौड़ी, कोड़ी-कोड़ी पर जान देना, दूर की कौड़ी, कोड़ी के भाव बिकना।

वस्तुतः कोडी एक तरह का छोटा सा समुद्री शंख है, जो छोटा, चिकना, गोलाई लिए हुए होता है। कोड़ी समुद्र से निकले एक जीव का आवरण है, जिसे वह मर जाने के बाद छोड़ देता है। कोड़ी कई रंगों में मिलती है जैसे सफेद, पीली और हरी। समुद्र से निकलने के कारण इसे लक्ष्मी का रूप भी माना जाता है। इसलिए कुछ लोग इसे लक्ष्मी कोडी भी कहते हैं। इसका इस्तेमाल पुराने जमाने में धन  और सामान के अदल-बदल में पैसे के रूप में भी किया जाता था। लक्ष्मी के पूजन में कोड़ी रखी जाती है। तांत्रिक भी इस इस्तेमाल बहुधा जादू-टोने में किया करते हैं। वषीकरण, अर्थात किसी को बस में करने के लिए कोड़ी ब्रह्मास्त्र का काम करती है। एक टोटका है कि कोई पैसा न लौटाए तो 3 कोड़ी उसके घर के सामने फेंक देते हैं या जमीन में दबा देते हैं। इसके अतिरिक्त सजावट और भगवान की आंख बनाने में भी कोड़ी का इस्तेमाल किया जाता है।

पुराने जमाने में एक नई और साफ-सुथरी कोड़ी तीन फूटी कोड़ी के बराबर मानी जाती थी। दस कोड़ी देने पर एक दमड़ी (तांबे का सिक्का) मिलती थी। दो दमड़ी देने पर एक धेला मिलता था। एक धेले के बदले में डेढ पाई मिलती थी। तीन पाई का एक पैसा और चार पैसे के बराबर एक आना होता था। सोलह आने के बराबर 64 पैसे होते थे। उसकी कीमत एक रुपया होती थी। आज भले ही एक रुपए की कोई कीमत नहीं रही, मगर कोड़ी आज भी अनमोल है। दिलचस्प बात है कि अजमेर में आज भी दरगाह इलाके में इसका उपयोग किया जाता है। 

कोड़ी, जिसे आम बोलचाल में हम अक्सर तुच्छ मानकर “दो कोड़ी का” कहकर किसी की अवहेलना कर देते हैं, वास्तव में अपनी प्रकृति, इतिहास और उपयोग में बेहद अनूठी और बेशकीमती रही है। आपने कोड़ी अवश्य देखी होगीकृछोटी, चिकनी, गोलाई लिए हुए समुद्र की लहरों से निकली यह सुंदर सी वस्तु कभी मुद्रा, कभी पूजन सामग्री, कभी तांत्रिक साधना और कभी खेल-कूद का अभिन्न हिस्सा रही है। आज भले ही सिक्कों और नोटों ने मुद्रा का स्थान ले लिया हो, लेकिन पुराने समय में कोड़ी का आर्थिक और सामाजिक महत्व आश्चर्यजनक रूप से बड़ा था।

दिलचस्प तथ्य यह भी है कि अजमेर के दरगाह क्षेत्र में आज भी कोड़ी का उपयोग देखने को मिल जाता है। यह इस बात का प्रमाण है कि कोड़ी केवल एक समुद्री वस्तु नहीं, बल्कि भारत की परंपरा, अर्थव्यवस्था, आस्था और लोकजीवन का जीवित प्रतीक है। जो वस्तु कभी मुद्रा, श्रद्धा, शक्ति और खेलकृचारों रूपों में उपयोगी रही, वह वास्तव में “बेशकीमती” ही कही जा सकती है, चाहे हम उसे दो कोड़ी की ही क्यों न कहें।

शुक्रवार, मई 22, 2026

क्या गायब हुआ जा सकता है?

 गायब या अंतर्ध्यान शब्द के मायने है, अदृश्य होना। इसका उल्लेख आपने शास्त्रों, पुराणों आदि में सुना होगा। अनेक देवी-देवताओं, महामानवों व ऋषि-मुनियों से जुड़े प्रसंगों में इसका विवरण है कि वे आह्वान करने पर प्रकट भी होते हैं, साक्षात दिखाई देते हैं और अंतर्ध्यान भी हो जाते हैं। मौजूदा वैज्ञानिक युग में यह वाकई अविश्वनीय है। विज्ञान आज तक भी इस पुरातन कला को समझ नहीं पाया है। हालांकि कुछ वैज्ञानिकों ने इस पर काम किया है और सिद्धांततः यह मानते हैं कि ऐसा संभव है, मगर कोई भी ऐसा कर नहीं पाया है। बताते हैं कि ओशो ने दुनिया के चंद शीर्ष वैज्ञानिकों की टीम बना कर इस पर काम किया था और उन्हें पूरी उम्मीद थी कि कामयाबी मिल जाएगी।

इस बारे में उपलब्ध जानकारी के अनुसार वैज्ञानिक नैनो किरणों पर काम कर रहे हैं। इस सिलसिले में एक लबादा बनाने की कोशिश की जा रही है, जिसे पहनने के बाद उस पर नैनो किरणें डालने पर दिखाई देना बंद हो जाता है। कुछ वैज्ञानिक इस पर भी काम कर रहे हैं कि विशेष तापमान व दबाव यदि मनुष्य के आसपास क्रियेट किया जाए तो वह अदृश्य हो सकता है। कुछ प्रयोग कनाडा, जापान और अमेरिका में चल रहे हैं। जापान के वैज्ञानिक डॉ. सुसुमु ताची ने ऐसा “इनविजिबिलिटी क्लोक” बनाया था, जो कैमरा और प्रोजेक्टर से पीछे की पृष्ठभूमि को आगे दिखा देता है। यानी पहनने वाला लगभग गायब सा दिखाई देता है। यह तकनीक कुछ सैन्य वाहनों और ड्रोन में प्रयोग की जा रही है। यह परिवेश के रंग और प्रकाश को नकल कर आंखों को भ्रमित करती है।

जानकारी के अनुसार एक उपकरण बनाया जा चुका है, जिसके भीतर रखी वस्तु एक दिशा से तो दिखाई देती है, मगर दूसरी दिशा से नहीं दिखाई देती। एक उपकरण, जिसका नाम फोटोनिक क्रिस्टल बताया गया है, वह वस्तुओं को दिखाई देने में बाधक बनता है, अर्थात अदृश्य कर देता है। प्रसंगवश एक शब्द ख्याल में आता है- मृग मरीचिका। कहते हैं न कि रेगिस्तान में तेज धूप में किरणों की तरंगों में दूर से हिरण को ऐसा आभास होता है कि वहां समुद्र है या पानी है, जबकि वास्तव में ऐसा होता नहीं है। अर्थात हिरण को दृष्टि भ्रम होता है। हो सकता है कि कल इसी प्रकार का दृष्टि भ्रम बना कर आदमी को अदृश्य किया जा सके। 

एक जानकारी ये भी है कि देवी देवता सशरीर प्रकट हो सकते हैं, जो कि पंचमहाभूत से बने हैं, मगर अन्य आत्माएं वायु अथवा प्रकाश के रूप में विचरण करती हैं और उसका आभास भी करवा सकती हैं। भारतीय ग्रंथों में कई पात्रों के अदृश्य होने का उल्लेख मिलता है। जैसे हनुमानजी, जो इच्छा से आकार बदल सकते थे (सूक्ष्म रूप धारण करना)। बताते हैं कि हिमालय की पहाडियों में एक जड़ी पाई जाती है, जिसे मुंह में रखने पर आदमी दिखाई देना बंद हो जाता है। मगर इसके भी प्रमाणिक उदाहरण हमारे संज्ञान में नहीं हैं। इसी प्रकार जनश्रुति है कि एक पक्षी विशेष का पंख अपने पास रखने वाला व्यक्ति दूसरों को दिखाई नहीं देता, मगर इसके भी पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं।

गायब हो जाने के संबंध में कुछ रहस्यमयी किस्से जानकारी में आए हैं। बताते हैं कि एक महिला क्रिस्टीन जांसटन और उनके पति एलन जांसटन 1975 की गर्मियों में उत्तरी धु्रव की यात्रा पर गए थे। वहां एलन अचानक गायब हो गए। बाद में पुलिस तेज घ्रांण शक्ति वाले कुत्ते ले कर खोजने गई तो जिस स्थान से एलन गायब हुए थे, वहां पर आ कर कुत्ते रुक गए। 

एक किस्सा ये भी है। अमेरिका के टेनेसी स्थित गैलेटिन के निवासी डेविड लांग 23 सितम्बर, 1808 को दोपहर में घर से बाहर निकले। उनकी मुलाकात उनके एक न्यायाधीश मित्र आगस्टस पीक से हुई। शिष्टाचार के बाद जैसे ही डेविड लांग आगे बढ़ा तो वह अचानक गायब हो गया।

इसी प्रकार पूरी बस्ती ही गायब होने का भी किस्सा है। घटना अगस्त 1930 की बताई जाती है। कनाडा के चर्चिल थाने के पास अंजिकुनी नामक एस्किमो की बस्ती थी। एक दिन अचानक पूरी बस्ती के लोग न जाने कहां गायब हो गए। 

इसी प्रकार 1885 में वियतनाम में सैनिकों की छह सौ सैनिकों की एक टुकड़ी ने सेगॉन शहर की ओर कूच किया। कोई एक मील दूर जाने पर वह पूरी टुकड़ी गायब हो गई। आज तक उस रहस्य से पर्दा नहीं उठ पाया है। अनुमान यही लगाया गया कि धरती से इतर कोई और ग्रह है, जहां के प्राणी लोगों को पकड़ कर ले जाते हैं।

वस्तुओं के गायब हो जाने के किस्से भी आम हैं। आप के साथ भी ऐसा हो चुका होगा। जैसे किसी स्थान विशेष पर रखी वस्तु आप लेने जाते हैं तो वह वहां नहीं मिलती। आपको अचरज होता है कि वह कहां गायब हो गई। कुछ समय बाद जब फिर देखते हैं तो वह वहीं मिल जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह कुछ समय के लिए गायब हो जाती है। ऐसा भ्रम की वजह से भी हो सकता है।

आपने ऐसे मदारियों को भी करतब दिखाते हुए देखा होगा कि वे गुलाब जामुन या कोई मिठाई मांगने पर हवा में हाथ धुमा कर वह वस्तु पेश कर देते हैं। हालांकि यह ऐसे जादू के रूप में माना जाता है, जिसके पीछे कोई तकनीक काम करती है, जबकि आम मान्यता है कि मदारी कुछ समय के लिए मांगी गई वस्तु किसी दुकान या ठेले से मंगवाते हैं और कुछ समय बाद वह वस्तु वापस वहीं पहुंच जाती है, जहां से मंगाई गई है।


मंगलवार, मई 19, 2026

हनुमान जी की भिन्न मुद्राओं की उपासना के भिन्न फल

 ऐसी मान्यता है कि हनुमान जी की विभिन्न मुद्राओं की उपासना के भिन्न-भिन्न फल प्राप्त होते हैं। उनकी प्रत्येक मुद्रा एक विशेष गुण, शक्ति या आशीर्वाद का प्रतीक होती है। हनुमान जी की उपासना भक्त की निष्ठा और भाव पर निर्भर करती है। उनकी किसी भी मुद्रा में ध्यान और भक्ति से उपासना करने पर इच्छित फल प्राप्त होता है।

विद्वान बताते हैं कि हनुमान जी की वीर मुद्रा उनके वीर और पराक्रमी रूप का प्रतीक है, जिसमें वे युद्ध के लिए तैयार मुद्रा में दिखते हैं। इसकी उपासना से साहस और शक्ति में वृद्धि होती है। शत्रु पर विजय मिलती है। जीवन के कठिन संघर्षों में सफलता प्राप्त होती है।

हनुमान जी की भक्त मुद्रा भक्ति और समर्पण का प्रतीक है। इस मुद्रा में हनुमान जी भगवान राम और माता सीता के चरणों में समर्पित रहते हैं। इसकी उपासना से सच्ची भक्ति और समर्पण का विकास होता है। मन की शांति प्राप्त होती है। ईश्वर के प्रति श्रद्धा और प्रेम बढ़ता है।

हनुमान जी की ज्ञान मुद्रा विद्या और ज्ञान का प्रतीक है। इस मुद्रा में हनुमान जी अपने हाथ में ग्रंथ धारण किए हुए होते हैं।

इस मुद्रा की उपासना से विद्या, बुद्धि और स्मरण शक्ति का विकास होता है। विद्यार्थियों और विद्वानों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है। इससे आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है।

हनुमान जी की पंचमुखी मुद्रा सर्वत्र रक्षा का प्रतीक है। इस मुद्रा में हनुमान जी के पांच मुख होते हैं - नरसिंह, गरुड़, वराह, हयग्रीव और हनुमान।

इस मुद्रा की उपासना से हर दिशा में सुरक्षा प्राप्त होती है। नकारात्मक शक्तियों और बुरी नजर से रक्षा होती है। बाधाओं और संकटों से मुक्ति मिलती है। हनुमान जी की आशीर्वाद मुद्रा करुणा और कृपा का प्रतीक है।

इस मुद्रा में हनुमान जी अपने दाहिने हाथ से आशीर्वाद देते हैं। इस मुद्रा की उपासना से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। मानसिक और शारीरिक समस्याओं से छुटकारा मिलता है। भक्त के सभी कार्य सफल होते हैं।

हनुमान जी की उड़ान मुद्रा द्रुत गति और साहस का प्रतीक है।

इस मुद्रा में हनुमान जी गदा और पर्वत लेकर आकाश में उड़ते हुए दिखाई देते हैं। इस मुद्रा की उपासना से कार्यों में तेजी और सफलता प्राप्त होती है। समय पर समस्याओं का समाधान होता है। जीवन के संकट दूर होते हैं।

हनुमान जी की लालित्य मुद्रा सेवा और समर्पण का प्रतीक है। इस मुद्रा में हनुमान जी भगवान राम और माता सीता के प्रति सेवा भाव में दिखते हैं। इसकी उपासना से सेवा और परोपकार का भाव बढ़ता है। परिवार और समाज में आदर और प्रेम प्राप्त होता है। आध्यात्मिक उन्नति होती है।

धार्मिक दृष्टि से यह आस्था और श्रद्धा का विषय है, जबकि मनोवैज्ञानिकों का मत है कि यह सब हमारी धारणा का ही परिणाम है। जैसी हमारी आंतरिक धारणा होती है, वैसा ही हमें फल प्राप्त होता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो यह सब व्यक्ति की मानसिक धारणा और आत्मसुझाव अर्थात ऑटो सजेशन का परिणाम है। जिस रूप की उपासना करते हुए व्यक्ति अपने मन में जो भाव उत्पन्न करता है, वही भाव उसकी चेतना पर गहरा प्रभाव डालता है।

मनोविज्ञान यह मानता है कि मनुष्य का व्यवहार और निर्णय उसकी अवचेतन धारणा से प्रभावित होता है। अतः हनुमान जी की उपासना, वस्तुतः, व्यक्ति के भीतर सकारात्मक भावनाओं और मानसिक ऊर्जा को सक्रिय करने का साधन बन जाती है।

सोमवार, मई 18, 2026

मृत्यु होने पर घर को बारह दिन अशुभ क्यों मानते हैं?

मृत्यु पर घर को 12 दिन अशुभ क्यों मानते हैं? ऐसा ही किसी का जन्म होने पर भी होता है। इसका धार्मिक और परंपरागत कारण ये है कि मृत्यु के बाद 10-12 दिन ‘अशौच’ (सूतिक मृतक-अपवित्रता) की अवधि कहलाता है। इसके पीछे विचार यह है कि जीवन और मृत्यु को संसार का महान संक्रमण (ट्रांजिशन) माना गया है। मृत्यु के तुरंत बाद परिवार शोक की अवस्था में रहता है, इसलिए वे धार्मिक कर्मकांडों या शुभ कार्यों से दूर रहते हैं। इसके अतिरिक्त पितृलोक की यात्रा, प्रेत-शांति और आत्मा की स्थिरता के लिए संस्कारिक समय दिया जाता है। इस अवधि के दौरान पुरोहित द्वारा शुद्धिकरण, तर्पण, पिंडदान आदि होते हैं। यह काल वास्तव में अशुभ नहीं, बल्कि अनुष्ठानिक विराम है, जिसमें घर के लोग स्वयं को व्यवस्थित करते हैं।

जहां तक वैज्ञानिक-सामाजिक संदर्भ की बात है तो पुराने समय में यह अवधि व्यावहारिक कारणों से भी रखी जाती थी। मृत्यु अक्सर किसी बीमारी से होती थी, इसलिए परिवार को आराम, सफाई और पुनर्गठन के लिए समय चाहिए होता था। लगातार संवेदना व्यक्त करने आने वाले आगंतुकों, भोजन-पानी की व्यवस्था और मानसिक थकान, इन सबके कारण परिवार के सदस्य किसी भी शुभ कार्य के लिए तैयार नहीं होते थे। साधारणतः 12 दिन तक परिवार गहन शोक, मानसिक अस्थिरता और थकान से गुजरता है। यह अवधि मन को संयत करने के लिए भी मानी जाती थी।

इसका मनोवैज्ञानिक कारण भी है। शोक एक मानसिक प्रक्रिया है। किसी प्रियजन की मृत्यु के बाद मन से विस्मय, अविश्वास, दुख, स्मृति-पीड़ा की लहरें उठती हैं। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि किसी बड़े भावनात्मक धक्के से निकलने में 10 से 14 दिन का समय लगना स्वाभाविक है। ऐसे में कोई उत्सव, शुभ कार्य या भीड़-भाड़ मन को और आहत कर सकती है। इसलिए समाज ने एक निर्धारित समय-सीमा बना दी, जिसे हम अशुभ मानते हैं, पर इसका उद्देश्य था मानव मन की रक्षा।

अब सवाल यह कि बच्चे के जन्म पर भी सूतक काल होता है। यह भी शाब्दिक अर्थ में अशुभ नहीं है। सूतक (सूतिका शौच) वास्तव में मां और नवजात की सुरक्षा अवधि है। प्रसव के बाद मां को आराम की आवश्यकता होती है। नवजात का रोग-प्रतिरोधक तंत्र कमजोर होता है, इसलिए बाहर-भीतर आने वाले लोगों पर नियंत्रण रखा जाता था।

पुराने समय में संक्रमण बड़ा खतरा होता था, इसलिए 10-12 दिन की सीमाएं बनाई गईं। इसी वजह से मां पूजा-पाठ का काम नहीं करती थी, उद्देश्य धार्मिक अशुद्धि नहीं, बल्कि शारीरिक सुरक्षा था।

अब सवाल कि सूतक 12 दिन का ही क्यों? भारतीय संस्कृति में दशगात्र-एकादश-द्वादश जैसे संस्कार क्रम हैं। प्रायः दसवां

दिन शरीर और घर का शुद्धिकरण, कपाल क्रिया के कर्म, ग्यारहवां दिन पितृ-तर्पण, 12वां दिन नवपात्रिका या समापन संस्कार और तेरहवां दिन यानि तेरहवीं सामाजिक रूप से शोक का अंत। यह पूरी प्रक्रिया 12 दिन का ढांचा बनाती है।

शनिवार, मई 09, 2026

पंचक में मरने वाला 4 अन्य को भी ले जाता है?

हमारे यहां लोकविश्वास और ज्योतिषीय परंपराओं में यह मान्यता है कि पंचक में मरने वाला व्यक्ति चार अन्य को भी साथ ले जाता है। पहले यह जानते हैं कि पंचक क्या होता है? पंचक पांच नक्षत्रों का समूह है। धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती। जब चंद्रमा इन पांच नक्षत्रों में से किसी में होता है, तो उसे पंचक काल कहा जाता है। पुरानी ज्योतिष परंपराओं में यह कहा गया है कि पंचक में मृत्यु होने पर व्यक्ति अकेला नहीं जाता, बल्कि चार और लोगों को अपने साथ ले जाता है। इस विश्वास के पीछे तर्क यह था कि यह समय अशुभ या असंतुलित ऊर्जा वाला माना जाता था। इसलिए उस काल में अंत्येष्टि, बिस्तर या लकड़ी का काम, दक्षिण दिशा में यात्रा आदि कार्य वर्जित माने गए। ऐसा प्रतीत होता है कि यह धारणा केवल परंपरागत चेतावनी है, ताकि लोग अशुभ समय में बड़े कार्यों से बचें। भला किसी व्यक्ति की मृत्यु का दूसरों के जीवन पर सीधा प्रभाव कैसे पड सकता है? बावजूद इसके लोग परंपरा पर यकीन करते हैं। पंचक में मृत्यु होने पर अंत्येष्टि से पहले कुछ विशेष शांति उपाय किए जाते हैं, ताकि मृत व्यक्ति के साथ अन्य लोगों पर कोई अशुभ प्रभाव न पड़े।

एक उपाय यह है- कुश या घास से चार पुतले बनाए जाते हैं। इन्हें “प्रेत पुतला” कहा जाता है। फिर उस पुतलों की मृतक के साथ ही प्रतीकात्मक अंत्येष्टि कर दी जाती है। मान्यता है कि ऐसा करने से बाकी चार की मृत्यु का दोष समाप्त हो जाता है। कुछ जगहों पर “पंचक शांति” या “पंचक निवारण हवन” किया जाता है। इसमें विशिष्ट मंत्रों से अग्निहोत्र, हवन, और पितृ शांति की क्रिया कराई जाती है। यह क्रिया अक्सर “गरुड़ पुराण” या “पंचक शांति विधि” के अनुसार होती है।

पंचक दोष से बचने के लिए ब्राह्मणों को भोजन, दक्षिणा या अनाज का दान किया जाता है। कहीं-कहीं कंबल या वस्त्र दान भी किया जाता है। कुछ परंपराओं में कहा जाता है कि पंचक के समय चिता में लकड़ी की पांच गांठें या टुकड़े अधिक नहीं डालने चाहिए, ताकि पंचक का दोष न बढ़े।