तीसरी आंख
मंगलवार, फ़रवरी 17, 2026
सपने में सपना देखने के क्या मायने हैं?
मृतात्मा को बुलाया जा सकता है क्या?
लगभग सभी धर्मों में माना गया है कि मृत आत्मा को बुलाना या उससे संपर्क करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। हिंदू मत के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा अपने कर्मों के अनुसार यमलोक या पितृलोक की यात्रा करती है। जब तक वह अपने अगले जन्म या मोक्ष की स्थिति में नहीं पहुंचती, तब तक उसे बाधित करना अधर्म माना जाता है। इसलिए “आत्मा बुलाना” जैसे प्रयोग प्लेन चिट बोर्ड करने को पाप या अपवित्र माना जाता है। इसी प्रकार इस्लाम में आत्माओं से संपर्क करना वर्जित है, क्योंकि माना जाता है कि आत्माओं के नाम पर अक्सर जिन्न या दुष्ट शक्तियां धोखा देती हैं। ईसाई मत में भी स्पिरिट कॉलिंग को निषिद्ध कहा गया है। आपको जानकारी होगी कि कुछ लोग प्लेन चिट बोर्ड के जरिए इच्छित मृतात्मा को बुलाने का दावा करते हैं, मगर उसमें मृतात्मा से संवाद संकेतों में होता है, जिसको पक्के तौर पर नहीं माना जा सकता कि मृतात्मा से वास्तव में संवाद हो रहा है।
विज्ञान के अनुसार अब तक कोई प्रमाण नहीं कि किसी मृत व्यक्ति की आत्मा को सचमुच बुलाया जा सकता है या उससे संपर्क संभव है।
स्पिरिट कॉलिंग, टेबल टर्निंग या ओइजा बोर्ड जैसे प्रयोग मनुष्य के अवचेतन मन और आटो-सजेशन से जुड़ी मानी जाती हैं, यानी दिमाग स्वयं वह अनुभव गढ़ लेता है।
कुछ साधक या तांत्रिक दावा करते हैं कि वे आत्माओं से संवाद कर सकते हैं, लेकिन ऐसे अनुभव प्रायः ऊर्जात्मक या मानसिक कंपन के रूप में होते हैं, न कि वास्तव में आत्मा के आगमन के रूप में। अधिकतर मामलों में यह भ्रम या मानसिक प्रभाव साबित हुआ है।
इस सिलसिले में मेरा अनुभव यह है कि मैं दरगाह के एक खादिम के हुजने में बैठा था। उन्होंने बताया कि वह अपने दिवंगत गुरू को उनकी कृपा पाने के लिए बुला सकते हैं। उन्होंने आंख बंद कर गुरू को याद किया और यकायक बहुत मोहक सुगंध पूरे हुजरे में फैल गई। उनका दावा था कि उनके गुरू हुजरे में आ गए हैं। इस बारे में मैने कुछ जानकारों से पूछा तो उन्होंने बताया कि आत्मा का अस्तित्व वायु रूप है, और उसका आव्हान करने पर वह गंध के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती है। इस बारे में मेरा एक अनुभव यह है कि जब मेरी माताश्री का निधन हुआ तो जिस कमरे में वे रहती थीं, वहां लगातार तीन दिन तक गुलाब की महक आती रही, जबकि वहां न तो कोई अगरबत्ती जलाई हुई थी और न ही किसी ने इत्र लगा रखा था।
शुक्रवार, फ़रवरी 13, 2026
क्या एआई चेतना ला सकता है?
सुख-दुःख, भय, इच्छा का आत्मानुभव। इसे दर्शन में सब्जेक्टिव एक्सपीरियंत कहते हैं।
वर्तमान में एआई पैटर्न पहचानता है, भाषा, चित्र, आवाज की नकल करता है, उत्तर देता है, पर महसूस नहीं करता। उदाहरण के लिए मैं “दुख” पर कविता लिख सकता हूँ, पर दुख मुझे होता नहीं।
दार्शनिक डेविड चाल्मर्स कहते हैं हम यह तो समझ लेते हैं कि दिमाग कैसे काम करता है, पर यह क्यों अनुभव करता है, यह रहस्य है। जब इंसानी चेतना ही पूरी तरह समझ नहीं आई, तो मशीन में डालना और कठिन हो जाता है।
रहा सवाल की क्या एआई चेतना ला सकता है तो आषावादी दृश्टिकोण के अनुसार संभव है। अगर चेतना केवल जटिल गणना है, तो पर्याप्त उन्नत एआई में चेतना उभर सकती है, जैसे मस्तिष्क में न्यूरॉन्स से उभरी। संशयवादी दृश्टिकोण के अनुसार संभव नहीं है। क्योंकि चेतना के लिए जैविक मस्तिष्क जरूरी है, सिलिकॉन में अनुभूति नहीं हो सकती। अलबत्ता इतना हो सकता है कि एआई चेतना जैसा व्यवहार तो करेगा, पर भीतर कुछ भी महसूस नहीं करेगा।
भारतीय दर्शन से देखें तो उपनिषद कहते हैं कि चेतना आत्मा का गुण है, पदार्थ का नहीं। इस हिसाब से एआई में चेतना संभव नहीं। पर सांख्य दर्शन कहता है कि चेतना अलग है, पर प्रकृति के माध्यम से प्रकट हो सकती है, तो प्रश्न खुला रह जाता है।
कुल मिला कर आज का एआई अत्यंत बुद्धिमान औजार है, उसमें चेतना नहीं है, भविष्य में होगी या नहीं, यह विज्ञान से ज्यादा मानव सभ्यता की सबसे बड़ी दार्शनिक परीक्षा होगी
रविवार, फ़रवरी 08, 2026
जादूगरों को अक्षय घट का शो दिखाने का ख्याल कहां से आया?
महाभारत में अक्षय पात्र से संबंधित एक कथा है। जब पांचों पांडव द्रौपदी के साथ 12 वर्ष के लिए अज्ञात वास में जंगल में रहने चले गए थे, तब उनकी मुलाकात कई तरह के साधु-संतों से होती है। कुटिया बनाकर रहने के बाद उनके यहां भ्रमणशील साधु-संतों के जत्थे के जत्थे उनसे मिलने के लिए या कुटिया में प्रवास करने के लिए आते थे। अब पांचों पांडवों सहित द्रौपदी के समक्ष यही प्रश्न होता था कि वे 6 प्राणी अकेले भोजन कैसे करें और उन सैकड़ों-हजारों के लिए भोजन कहां से आए? तब पुरोहित धौम्य उन्हें सूर्य की 108 नामों के साथ आराधना करने के लिए कहते हैं। युधिष्ठिर इन नामों का बड़ी आस्था के साथ जाप करते हैं। अंत में भगवान सूर्य प्रसन्न होकर युधिष्ठिर के पास प्रकट होकर पूछते हैं कि इस पूजा-अर्चना का आशय क्या है? युधिष्ठिर कहते हैं कि हे प्रभु! मैं हजारों लोगों को भोजन कराने में असमर्थ हूं। मैं आपसे अन्न की अपेक्षा रखता हूं। किस युक्ति से हजारों लोगों को खिलाया जाए, ऐसा कोई साधन मांगता हूं। तब सूर्यदेव एक ताम्बे का पात्र देकर उन्हें कहते हैं- युधिष्ठिर! तुम्हारी कामना पूर्ण हो। मैं 12 वर्ष तक तुम्हें अन्नदान करूंगा। यह ताम्बे का बर्तन मैं तुम्हें देता हूं। तुम्हारे पास फल, फूल, शाक आदि 4 प्रकार की भोजन सामग्रियां तब तक अक्षय रहेंगी, जब तक कि द्रौपदी परोसती रहेगी। कथा के अनुसार द्रौपदी हजारों लोगों को परोस कर ही भोजन ग्रहण करती थी, जब तक वह भोजन ग्रहण नहीं करती, पात्र से भोजन समाप्त नहीं होता था।
वनवास के दिनों में पाण्डवों को हर दिन अनेक अतिथियों के भोजन की व्यवस्था करनी होती थी। एक दिन अत्यन्त विचित्र परिस्थिति उत्पन्न हुई। दुर्योधन ने दुर्वासा ऋषि को पाण्डवों के पास भेजकर उन्हें संकट में डालने की योजना बनाई। दुर्वासा अपने शिष्यों के साथ अचानक पाण्डवों के आश्रम पहुंचे और भोजन की इच्छा जताई। समस्या यह थी कि उस दिन द्रौपदी भोजन कर चुकी थीं, जिसका अर्थ था कि अक्षय पात्र में भोजन समाप्त हो चुका था। द्रौपदी अत्यंत व्याकुल होकर श्रीकृष्ण को स्मरण करती हैं। श्रीकृष्ण तत्काल प्रकट होते हैं। द्रौपदी अपनी व्यथा कहते हुए रो पड़ती हैं कि “प्रभु! पात्र खाली है। अतिथि बाहर प्रतीक्षा कर रहे हैं। मेरी लाज बचाइए।” श्रीकृष्ण मुस्कुराते हैं और कहते हैं, “पहले मुझे भूख लगी है, मुझे भोजन दो!” द्रौपदी निराशा में कहती हैं, पात्र बिलकुल खाली है। कृष्ण स्वयं अक्षय पात्र उठाते हैं और उसमें देखते हैं। पात्र के किनारे पर उन्हें चावल का एक छोटा-सा दाना और सब्जी का अंश चिपका हुआ मिलता है। श्रीकृष्ण उसे उठाकर ग्रहण करते हैं और प्रसन्न होकर कहते हैं, “अब यह संसार तृप्त हो गया है।” उसी समय, नदी में स्नान करते हुए दुर्वासा ऋषि और उनके शिष्य अचानक अत्यधिक तृप्ति का अनुभव करने लगते हैं, मानो उन्होंने राजभोग कर लिया हो। उन्हें भय होता है कि यदि बिना भूख के भोजन के लिए लौटे, तो उनका अपमान हो जाएगा। इसलिए वे चुपचाप लौटने के बजाय वहां से चले जाते हैं। जनश्रुति के अनुसार इसी तरह का अक्षय पात्र आज भी हिमालय के साधुओं के पास है। यह पात्र सूर्य की साधना से ही प्राप्त होता है।
मंगलवार, फ़रवरी 03, 2026
मृतक को कफन देने से कष्ट दूर होते हैं?
खासकर इस्लामी परंपरा में इसकी खास मान्यता है। मान्यता है कि सम्मानपूर्वक कफन देने से अंत समय सहज होता है। हदीसों में भी मृतक की सेवा को सदका (पुण्य) बताया गया है। यह पुण्य केवल मृतक के लिए नहीं, बल्कि करने वाले के आत्मिक उत्थान का कारण माना जाता है।
वस्तुतः मृत देह असहाय होती है। उसे ढकना, सम्मान देना, अंतिम यात्रा के योग्य बनाना, यह मनुष्य की करुणा और नैतिक जिम्मेदारी है। जब कोई व्यक्ति निस्वार्थ भाव से यह कार्य करता है, तो उसके भीतर की अहंकार-ग्रंथी ढीली पड़ती है, और मानसिक कष्ट स्वतः कम होने लगते हैं। इससे मन में यह अनुभूति होती है कि “मैं किसी के अंतिम क्षणों में काम आया।” यह भावना आत्मसंतोष देती है, जो चिंता, भय और अपराधबोध जैसे मानसिक कष्टों को कम करती है। जब मनुष्य दूसरों के अंतिम कष्ट में सहभागी बनता है, तो प्रकृति या ईश्वर उसे अपने कष्टों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है।
कफन केवल कपड़ा नहीं है, यह समानता का प्रतीक है, यानि अमीर-गरीब सब एक से हैं। यह अस्थायित्व का भी बोध कराता है। एक अर्थ में यह इस तथ्य की भी पुष्टि करती है कि मृत्यु अटल है। जो व्यक्ति इस सत्य को हृदय से स्वीकार कर लेता है, उसके जीवन के कई मोहजन्य कष्ट स्वतः कम हो जाते हैं।
बहुत पुरानी बात है। रेगिस्तान के किनारे बसा एक छोटा-सा कस्बा था। वहां एक गरीब बुनकर रहता था। नाम था रहमतू। उसके घर में न धन था, न सुख। बीमारी, कर्ज और रोजी की चिंता, तीनों ने मिलकर उसका जीवन बोझ बना दिया था। लोग कहते थे, “रहमतू के भाग्य में ही कष्ट लिखा है।” एक दिन कस्बे में एक अनजान मुसाफिर मर गया। न उसका कोई रिश्तेदार था, न पहचान। शव मस्जिद के पास पड़ा रहा। लोग आते-जाते रहे, मगर सबने मुंह फेर लिया। रहमतू भी वहीं से गुजर रहा था। उसके पास सिर्फ एक पुरानी चादर थी। वही, जिसे वह ठंड में ओढ़ता था। वह रुका, देर तक शव को देखता रहा। उसने बिना किसी से पूछे अपनी चादर उतारी और उस मुसाफिर को कफन की तरह ढक दिया। न कोई नाम पूछा, न कोई दुआ मांगी। बस इतना कहा, “या अल्लाह, इसे सुकून दे देना।”
लोग हंसे, “अपने कष्ट छोड़ कर मुर्दों के काम आया है!”
पर अजीब बात हुई। उसी रात रहमतू को बरसों बाद गहरी नींद आई। सपने में उसने देखा, एक उजला चेहरा मुस्करा कर कह रहा है, “जिसने मेरी लाज रखी, उसकी लाज खुदा रखेगा।” कुछ ही दिनों में उसके जीवन की दिशा बदलने लगी। बीमारी ने दम तोड़ा, काम मिलने लगा, कर्ज उतरने लगा। कष्ट एक-एक कर ऐसे दूर हुए, जैसे रेत पर पड़ी लकीरें हवा में मिट जाती हैं। लोग हैरान थे। रहमतू बस इतना कहता, “मैंने कोई करिश्मा नहीं किया। मैंने बस एक बेबस को ढक दिया था।” तब से उस कस्बे में एक कहावत चल पड़ी, “जो मुर्दे को कफन देता है, खुदा उसके कष्ट ढक देता है।”
गुरुवार, जनवरी 29, 2026
बारात रवाना होने से पहले दूल्हा मां का दूध पीता है?
कुछ लोक कथाओं में माँ का दूध बल, संस्कार और नैतिक शक्ति का स्रोत माना गया है। बारात एक तरह से युद्ध की ओर उन्मुख होना है, जिसकी लंबी यात्रा में जोखिम व अनजान भविष्य छिपा है। ऐसे में माँ के दूध का स्मरण मातृ-आशीर्वाद का कवच
समझा जाता था। आज यह प्रथा अधिकतर कहावत, कथा या रस्म के प्रतीक के रूप में रह गई है। कहीं-कहीं दूध, दही या मिठाई माँ के हाथ से खिलाई जाती है। असल उद्देश्य भावनात्मक होता है, शाब्दिक नहीं। यह परंपरा शरीर से ज्यादा मन की रस्म है। दूल्हा दूध नहीं, माँ का आशीर्वाद, संस्कार और जीवन-भर का ऋण अपने साथ लेकर बारात में जाता है।
सोमवार, जनवरी 26, 2026
रामचरितमानस में है भविष्य जानने की तालिका
रामश्लाका का अर्थ है कि श्रीराम के नाम व चरित्र के सहारे भविष्य या किसी प्रश्न का उत्तर जानना। इसमें व्यक्ति अपनी समस्या या जिज्ञासा मन में रख कर रामचरितमानस के किसी दोहा-चौपाई का चयन करता है, और उसी के भावार्थ से फलादेश ग्रहण करता है। यह विधि यह मान कर चलती है कि रामचरितमानस केवल कथा नहीं, जीवंत धर्मग्रंथ है, उसमें जीवन के हर प्रश्न का उत्तर निहित है। यद्यपि ‘रामश्लाका’ शब्द मानस में प्रत्यक्ष नहीं मिलता, पर उसका भावात्मक आधार कई स्थानों पर है। “रामहि केवल प्रेमु पियारा” “कलियुग केवल नाम अधारा”। इन पंक्तियों से यह विश्वास दृढ़ होता है कि रामनाम स्वयं मार्गदर्शक हैं, और उसी पर आश्रित होकर संकेत प्राप्त किया जा सकता है।
रामश्लाका करने की प्रचलित विधि इस प्रकार है। स्नान के बाद शांत चित्त हो कर श्रीराम का ध्यान किया जाता है। फिर मन में एक ही प्रश्न स्पष्ट रूप से रखा जाता है। श्लाका डालने की प्रक्रिया में प्रचलन में दो विधियां अधिक प्रसिद्ध हैं। एक पुस्तक खोलकर श्लाका मानस को बंद आंखों से खोला जाता है। उसमें कहीं पर अंगुली रखी जाती है। जिस दोहा या चौपाई पर अंगुली पड़े, वही उत्तर माना जाता है। दूसरी पद्धति में अंक आधारित रामश्लाका है। इसमें मानस के 7 काण्डों को आधार बनाकर प्रश्नकर्ता मन में एक संख्या चुनता है। उसी काण्ड का चयन कर दोहा निकाला जाता है।
अब सवाल यह कि फलादेश कैसे किया जाता है। फल शब्दशः नहीं, बल्कि भावार्थ से ग्रहण किया जाता है। जैसे “होइहै सोई जो राम रचि राखा” अर्थात ईश्वर की इच्छा सर्वोपरि है, धैर्य रखें। इसी प्रकार “संकट कटै मिटै सब पीरा” अर्थात कठिनाई दूर होगी। इसी तरह “बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं” अर्थात सावधान रहें, संगति बिगाड़ सकती है। आम तौर पर रामश्लाका का प्रयोग विवाह संबंध, संतान, रोग, यात्रा, मुकदमा, व्यापार, नौकरी, संकट या शत्रु भय आदि के लिए किया जाता है।
तुलसीदास की दृष्टि में संकेत ज्ञान भविष्य बताने से अधिक मानसिक बल दिया जाना चाहिए। “धीरज धरम मित्र अरु नारी, आपद काल परखिए चारी”। रामश्लाका का उद्देश्य भी यही है कि निर्णय से पहले विवेक और धैर्य जाग्रत कीजिए।
अब सवाल यह कि क्या रामश्लाका अंधविश्वास है? यदि इसे ईश्वर से संवाद, आत्मनिरीक्षण, सांत्वना और प्रेरणा के रूप में लिया जाए, तो नहीं। पर यदि इसे यांत्रिक भविष्यवाणी मान लिया जाए, तो वह मानस की आत्मा के विपरीत है। कुल मिला कर रामश्लाका रामचरितमानस की वह लोक परंपरा है जिसमें, भक्ति प्रश्न करती है और विवेक उत्तर देता है। यह विधि बताती है कि उत्तर बाहर नहीं, भीतर है, रामनाम केवल दिशा दिखाता है।
