तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

शुक्रवार, मार्च 27, 2026

मुण्डन संस्कार क्यों कराया जाता है?

मुण्डन संस्कार को चूड़ाकरण संस्कार या चौलकर्म भी कहते हैं, जिसका अर्थ है, वह संस्कार जिसमें बालक को चूड़ा अर्थात् शिखा दी जाता है। बच्चे का मुण्डन संस्कार कराने के पीछे हमारे ऋषि-मुनियों की बहुत गहरी सोच थी। माता के गर्भ से आए सिर के बाल अपवित्र माने गये हैं। इनके मुण्डन का उद्देश्य बालक की अपवित्रता को दूर कर उसे अन्य संस्कारों वेदारम्भ, यज्ञ आदि के योग्य बनाना है क्योंकि मुण्डन करते हुए यह कहा जाता है कि इसका सिर पवित्र हो, यह दीर्घजीवी हो। अतः यह बालक के स्वास्थ्य व शरीर के लिए नया संस्कार है।

दूसरी बात, गर्भ के बाल झड़ते रहते हैं, जिससे शिशु के तेज की वृद्धि नहीं हो पाती है। इन केशों को मुंडवा कर शिखा रखी जाती है। कहीं-कहीं पर पहले मुण्डन में नहीं वरन् दूसरी बार के मुण्डन में शिखा छोड़ते हैं। शिखा से आयु और तेज की वृद्धि होती है। मुण्डन बालिकाओं का भी होता है, किन्तु उनकी शिखा नहीं छोड़ी जाती है ।

शास्त्रों में जन्मकालीन बालों का बच्चे के प्रथम, तीसरे या पांचवे वर्ष में या कुल की परम्परानुसार शुभ मुहुर्त में मुण्डन करने का विधान है। जन्म से तीसरे वर्ष में मुण्डन संस्कार उत्तम माना गया है। पांचवे या सातवें वर्ष में मध्यम और दसवें व ग्यारहवें वर्ष में मुण्डन संस्कार करना निम्न श्रेणी का माना जाता है। बच्चे का मुण्डन शुभ मुहुर्त में किसी देवी-देवता या कुल देवता के स्थान पर या पवित्र नदी के तट पर कराया जाता है। अपने गोत्र की परम्परानुसार मुण्डन करके बालों को नदी के तट पर या गोशाला में गाड़ दिया जाता है। कहीं-कहीं कुल देवता को ये बाल समर्पित कर फिर उन्हें विसर्जित किया जाता है। सिंधी समाज में एक मुंडन घर पर और दूसरा धर्म स्थल पर करने की परंपरा रही है। मुण्डन करने के बाद बच्चे के सिर पर दही-मक्खन, मलाई या चंदन लगाया जाता है। कुछ लोग मुण्डन के बाद बालक को स्नान करा कर सिर पर स्वास्तिक बना देते हैं। मुण्डन में अपने परिवार की परम्परा और रीतियों के अनुसार ही पूजा-पाठ और दान-पुण्य व अन्य मांगलिक कार्य किए जाते हैं। आचार्य चरक ने मुण्डन संस्कार का महत्व बताते हुए कहा है कि इससे बालक की आयु, पुष्टि, पवित्रता और सौन्दर्य में वृद्धि होती है। मुण्डन संस्कार के अनेक मन्त्रों का भी यही भाव है कि सूर्य, इन्द्र, पवन आदि सभी देव तुझे दीर्घायु, बल और तेज प्रदान करें। कई लोग कोई मनोकामना पूरी होने पर भी भगवान का धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए मुंडन करवाते हैं।

भारत में सिर मुंडवाना कई धार्मिक स्थलों और परंपराओं से जुड़ा हुआ है। तिरुपति बालाजी में मन्नत पूरी होने पर या कृतज्ञता स्वरूप भगवान वेंकटेश्वर को केश अर्पण की परंपरा है। गया में पितृ श्राद्ध और पिंडदान हेतु कई लोग मुंडन कराते हैं।

हरिद्वार में श्राद्ध व अस्थि विसर्जन के समय गंगा स्नान के साथ मुंडन कराया जाता है। प्रयागराज संगम तट पर पितृ कर्म, कल्पवास, कुंभ पर्व पर मुंडन कराया जाता है। वाराणसी मोक्ष नगरी में श्राद्ध, तर्पण और मुंडन कराया जाता है। पुष्कर पितृ कर्म और धार्मिक अनुष्ठान के दौरान मुंडन की परंपरा है। सोमनाथ में विशेषकर पितृ दोष निवारण के लिए मुंडन करवाते हैं। रामेश्वरम धाम में पितृ तर्पण, सेतु स्नान के साथ मुंडन करवाते हैं। कई लोग उज्जैन के महाकालेश्वर में श्राद्ध और ग्रह शांति के अवसर पर और चित्रकूट में पितृ तर्पण व मुंडन करवाते हैं।

इसी प्रकार जैन धर्म में दीक्षा के समय केश-लोचन कराया जाता है। बौद्ध परंपरा में संन्यास दीक्षा में सिर मुंडन कराया जाता है।

गुरुवार, मार्च 26, 2026

तुलसी वास्तु दोष भी दूर करती है

क्या आपने कभी इस बात पर ध्यान दिया कि आपके घर, परिवार या आप पर कोई मुसीबत आने वाली होती है तो उसका असर सबसे पहले आपके घर में स्थित तुलसी के पौधे पर होता है। आप उस पौधे का कितना भी ध्यान रखें धीरे-धीरे वो पौधा सूखने लगता है। तुलसी का पौधा ऐसा है जो आपको पहले ही बता देगा कि आप पर या आपके घर परिवार को किसी मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है।

पुराणों और शास्त्रों के अनुसार माना जाए तो ऐसा इसलिए होता है कि जिस घर पर मुसीबत आने वाली होती है उस घर से सबसे पहले लक्ष्मी यानी तुलसी चली जाती है। क्योंकि दरिद्रता, अशांति या क्लेश जहां होता है, वहां लक्ष्मी जी का निवास नहीं होता। अगर ज्योतिष की माने तो ऐसा बुध के कारण होता है। बुध का प्रभाव हरे रंग पर होता है और बुध को पेड़ पौधों का कारक ग्रह माना जाता है। बुध ऐसा ग्रह है जो अन्य ग्रहों के अच्छे और बुरे प्रभाव जातक तक पहुंचाता है। अगर कोई ग्रह अशुभ फल देगा तो उसका अशुभ प्रभाव बुध के कारक वस्तुओं पर भी होता है। अगर कोई ग्रह शुभ फल देता है तो उसके शुभ प्रभाव से तुलसी का पौधा उत्तरोत्तर बढ़ता रहता है। बुध के प्रभाव से पौधे में फल फूल लगने लगते हैं। शास्त्रानुसार तुलसी के विभिन्न प्रकार के पौधे मिलते हैं, उनमें श्रीकृष्ण तुलसी, लक्ष्मी तुलसी, राम तुलसी, भू तुलसी, नील तुलसी, श्वेत तुलसी, रक्त तुलसी, वन तुलसी, ज्ञान तुलसी मुख्य रूप से विद्यमान है। सबके गुण अलग अलग है।

विद्वान बताते हैं कि प्रतिदिन चार पत्तियां तुलसी की सुबह खाली पेट ग्रहण करने से मधुमेह, रक्त विकार, वात, पित्त आदि दोष दूर होने लगते है। घर में तुलसी के पौधे की उपस्थिति एक वैद्य समान तो है ही यह वास्तु के दोष भी दूर करने में सक्षम है। 

शास्त्रों के अनुसार वास्तु दोष को दूर करने के लिए तुलसी के पौधे अग्नि कोण अर्थात दक्षिण-पूर्व से लेकर वायव्य उत्तर-पश्चिम तक लगा सकते हैं। तुलसी का गमला रसोई के पास रखने से पारिवारिक कलह समाप्त होती है। पूर्व दिशा की खिडकी के पास रखने से पुत्र यदि जिद्दी हो तो उसका हठ दूर होता है। यदि घर की कोई सन्तान अपनी मर्यादा से बाहर है, अर्थात नियंत्रण में नहीं है तो पूर्व दिशा में रखे तुलसी के पौधे में से तीन पत्ते किसी ना किसी रूप में सन्तान को खिलाने से सन्तान आज्ञानुसार व्यवहार करने लगती है। कन्या के विवाह में विलम्ब हो रहा हो तो अग्नि कोण में तुलसी के पौधे को कन्या नित्य जल अर्पण कर एक प्रदक्षिणा करने से विवाह जल्दी और अनुकूल स्थान में होता है। यदि कारोबार ठीक नहीं चल रहा तो दक्षिण-पश्चिम में रखे तुलसी कि गमले पर प्रति शुक्रवार को सुबह कच्चा दूध अर्पण करे व मिठाई का भोग रख कर किसी सुहागिन स्त्री को मीठी वस्तु देने से व्यवसाय में सफलता मिलती है।

समानांतर ब्रह्मांड का वजूद है?

पिछले दिनों सपने के दौरान ऐसा महसूस हुआ कि एक और दुनिया में विचरण कर रहा हूं। मगर ठीक वैसी ही, जैसी कि हमारी दुनिया है। वहां घटनाएं ठीक वैसी घट रही हैं, जैसी इस दुनिया में घट चुकी हैं। फर्क सिर्फ यही है कि वह दुनिया कुछ और रंगीन है, कुछ और सजीव। तब ख्याल आया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी दुनिया की तरह, ठीक इस जैसी दुनिया भी कहीं और मौजूद है? यानि कि इसकी कॉपी है। इस सिलसिले में कुछ विद्वानों से चर्चा की। साथ ही इंटरनेट पर सर्च किया तो पाया कि कुछ वैज्ञानिक पेरेलल यूनिवर्स की अवधारणा रखते हैं, लेकिन उसे अब तक साबित नहीं किया जा सका है। वैज्ञानिक संदर्भ में पेरेलल यूनिवर्स उस विचार को कहते हैं, जिसमें हमारा ब्रह्मांड एक मात्र नहीं है, बल्कि कई ब्रह्मांड मौजूद हैं, जिनमें अलग-अलग नियम, अवस्थाएं या इतिहास हो सकते हैं।

यह विचार मुख्य रूप से कुछ उन्नत भौतिक सिद्धांतों, जैसे स्ट्रिंग थ्योरी, क्वांटम मैकेनिक्स के कुछ व्याख्याओं से आता है। इसे सार्वभौमिक रूप से सिद्ध या मान्यता प्राप्त नहीं माना जाता। कुछ प्रमुख सिद्धांतों में यह संभावित व्याख्या के रूप में स्वीकार किया जाता है। अभी तक प्रत्यक्ष रूप से कोई अनुभवजन्य सबूत नहीं मिला है कि समानांतर ब्रह्मांड सच में मौजूद हैं। असल में क्वांटम मल्टीवर्ल्ड इंटरप्रिटेशन क्वांटम भौतिकी की एक व्याख्या है, जिसमें हर क्वांटम घटना के लिए ब्रह्मांड विभाजित हो जाता है। इससे बहु-ब्रह्मांड का ख्याल आता है। लेकिन, यह व्याख्या सत्यापित नहीं हुई है।

कुछ ब्रह्मांड शास्त्रियों ने सुझाव दिया है कि बिग बैंग जैसी घटनाओं से अलग-अलग बबल यूनिवर्स बन सकते हैं। फिर भी अब तक कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं। वैज्ञानिक समुदाय में तीन मुख्य स्थितियाँ पाई जाती हैं। कुछ वैज्ञानिक इसे संभव मानते हैं, पर असिद्ध। कुछ कहते हैं कि यह व्यर्थ कल्पना है, जब तक कोई परीक्षण नहीं मिल जाता। कुछ मानते हैं कि यह क्वांटम और ब्रह्मांड शास्त्र की बेहतर समझ की दिशा में एक वैध विचार है। कुल मिलाकर वैज्ञानिकों ने इसे विचार के रूप में लिया है। कुछ सिद्धांत इसे संभावित मानते हैं। लेकिन इसे अभी तक वैज्ञानिक रूप से सिद्ध या मान्यता प्राप्त नहीं माना जाता। इस सिलसिले में ब्रह्माकुमारीज का एक प्रमुख सिद्धांत कालचक्र से जुड़ा है। उनके अनुसार यह सृष्टि एक निश्चित, चक्रीय क्रम में चलती है और हर चक्र के बाद वही घटनाएँ, वही आत्माएँ और वही भूमिकाएँ फिर से बिल्कुल उसी प्रकार दोहराई जाती हैं। उनके मतानुसार सृष्टि का एक पूरा चक्र 5000 वर्ष का होता है। इस चक्र में चार युग आते हैं। सतयुग पूर्ण शांति और पवित्रता का युग, त्रेतायुग थोड़ी कमी, पर अभी भी उच्च अवस्था, द्वापरयुग भक्ति और पतन की शुरुआत और कलियुग नैतिक पतन और अशांति का समय। कलियुग के अंत में एक छोटा-सा संगमयुग माना जाता है, जब परमात्मा (उनके अनुसार शिव) ज्ञान देकर आत्माओं को शुद्ध करते हैं और फिर पुनः सतयुग आरंभ होता है। कुल मिला कर ब्रह्माकुमारीज का दावा है कि हर 5000 वर्ष बाद इतिहास हूबहू दोहराया जाता है। आप और मैं भी वही आत्माएँ हैं जो पिछले चक्र में भी थे। हमारी भूमिकाएँ भी बिल्कुल वैसी ही रहती हैं, न कम, न ज्यादा। इसे वे “ड्रामा का सिद्धांत” कहते हैं, जैसे एक फिल्म निश्चित स्क्रिप्ट के अनुसार चलती है।

वैसे परंपरागत पुराणों के अनुसार चारों युगों की अवधि लाखों वर्षों की मानी जाती है, न कि 5000 वर्ष। आधुनिक इतिहास और विज्ञान सृष्टि को अरबों वर्ष पुराना मानते हैं और घटनाओं के हूबहू दोहराव का समर्थन नहीं करते। कुछ दार्शनिक परंपराएँ, जैसे बौद्ध और सांख्य भी चक्रीय सृष्टि की बात करती हैं, लेकिन ठीक वैसी ही पुनरावृत्ति का विचार उतना स्पष्ट नहीं है।

मंगलवार, मार्च 24, 2026

 मान्यता है कि जिस मूर्ति की पूजा कम होती है, अथवा निर्जन स्थान पर मौजूद है, उसकी पूजा करने से त्वरित व अधिक फल मिलता है। यानि वहां सुनवाई तुरंत होती है। यह मान्यता लोकविश्वास मात्र नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक आधार है।

वस्तुतः कम पूजित मूर्ति प्रायः पुराने मंदिरों में, गांव के कोने में या उपेक्षित स्थानों पर होती है। वहां जाने वाला व्यक्ति अक्सर सच्ची मजबूरी या आंतरिक पुकार लेकर जाता है, उसमें औपचारिकता नहीं होती। कम पूजित मूर्ति के सामने जाने वाला भक्त सामान्यतः दिखावे से मुक्त होता है। भीड़ और प्रतिस्पर्धा से दूर होता है। उसका भाव अधिक निजी और गहरा होता है। इसलिए फल अधिक अनुभूत होता है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से जहाँ पूजा कम होती है, वहां अपेक्षा नहीं होती, प्रचार नहीं होता, चमत्कार की अफवाह नहीं होती, इससे मन अहंकार और सौदेबाजी से मुक्त रहता है। ऐसा मन जब प्रार्थना करता है, तो वह भीतर तक उतरती है।

तांत्रिक और भक्ति परंपरा में कई साधना-मार्गों में कहा गया है कि उपेक्षित देवता शीघ्र प्रसन्न होते हैं, क्योंकि वहां जाने वाला व्यक्ति फल नहीं, संबंध चाहता है। नाम नहीं, शरण चाहता है।

गूढ़ सत्य ये है कि ईश्वर को पूजा की संख्या नहीं, निष्ठा की तीव्रता आकर्षित करती है। भीड़ में भक्ति अक्सर सामाजिक होती है, परंपरागत होती है, जबकि अकेले में भक्ति आत्मिक होती है, मौन होती है, सत्य होती है। कम पूजित मूर्ति की पूजा से अधिक फल इसलिए मिलता है क्योंकि वहां श्रद्धा अधिक शुद्ध होती है, अहंकार कम होता है, संबंध सीधा होता है।

इस बारे में एक कहानी है। गांव के बाहर, पीपल और खेजड़ी के बीच एक पुरानी सी मूर्ति खड़ी थी। न नक्काशी, न रंग, बस पत्थर पर उकेरी एक आकृति। लोग उसे कहते थे बूढ़ा देव। यहां न पुजारी था, न प्रसाद की दुकान। सिर्फ धूप, चुप्पी और हवा की सरसराहट। एक बार गाँव में सूखा पड़ा। लोग बड़े मंदिर गए। मन्नतें मानीं, नारियल चढ़ाए, लंबी कतारें लगीं। सूखा वैसे का वैसे रहा। उसी गांव की एक विधवा थी धन्नो। उसके पास न चढ़ावा था, न मन्नत के शब्द। वह चुपचाप उस बूढ़े देव के पास गई। एक लोटा पानी रखा, और बोली, “मैं बहुत कुछ नहीं जानती, बस इतना जानती हूँ कि तू भी अकेला है, मैं भी।” फिर रोई नहीं। बस बैठी रही। तीसरे दिन बादल आए। पहले उसी कोने में बरसे, जहां बूढ़ा देव खड़ा था। फिर धीरे-धीरे पूरे गांव में। लोग चकित थे। किसी ने कहा संयोग है। किसी ने कहा कि बरसात का मौसम था। पर धन्नो कुछ नहीं बोली। वह जानती थी कि देवता को शब्द नहीं, साथ अच्छा लगता है। तब से गाँव में एक कहावत चल पड़ी, जिस देव के पास भीड़ नहीं, उसके पास भगवान बैठा होता है। और लोग समझ गए कि कम पूजित मूर्ति जल्दी फल देती है, क्योंकि वहां न दिखावा होता है, न सौदा, सिर्फ मन होता है।

सूफी कहते हैं कि खुदा को तलााशने के लिए दरगाह नहीं, दिल चाहिए। सिंध की धरती पर एक फकीर रहता था लाल शाह। उसकी कब्र न मशहूर थी, न उस पर चादरें चढ़ती थीं। रेत में दबी, कंटीली झाड़ियों के बीच, बस एक टूटा हुआ पत्थर था। लोग कहते, यहां कौन जाता है? न करामात है, न शोर। एक दिन एक मुसाफिर आया। बहुत भटका हुआ, बहुत थका हुआ। वह बड़े दरबारों से होकर आया था। हर जगह भीड़, हर जगह मांग। वह इस टूटी कब्र के पास बैठ गया। न फातिहा पढ़ी, न दुआ माँगी। बस बोला, “अगर तू वाकई दोस्त है, तो चुप बैठने दे।” सूफी कहते हैं कि यहीं से मुलाकात शुरू होती है। रात को मुसाफिर को नींद आई। ख्वाब में लाल शाह बोले, “जहां सवाल नहीं होते, वहीं जवाब उतरते हैं।” सुबह वह मुसाफिर बदला हुआ था। उसकी परेशानी बाहर से नहीं, अंदर से हल हो चुकी थी। लोग पूछने लगे, “तुझे वहां क्या मिला, जहां कुछ भी नहीं था?” वह मुस्कराया, “वहां खुुदा था, इसलिए कुछ नहीं था।” सूफियाना हिकमत कहती है, जो दर मशहूर हो जाता है, वहां अक्सर अल्लाह छुप जाता है। और जो दर गुमनाम रहे, वहां अल्लाह खुद बैठा रहता है। इसलिए सूफी कहते हैं कि कम पूजी जाने वाली मूरत, या गुमनाम कब्र जल्दी असर करती है, क्योंकि वहां दिल खाली होकर पहुंचता है।

रविवार, मार्च 22, 2026

क्या पुनः जन्म लेती है आत्मा?

आत्मा के बारे में विभिन्न धार्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण हैं, और ये इस बात पर निर्भर करते हैं कि आप किस परंपरा या विश्वास प्रणाली से आते हैं। हिंदू धर्म के अनुसार, आत्मा अमर होती है और शरीर के नष्ट हो जाने पर पुनर्जन्म लेती है। आत्मा किसी कब्र या शरीर में स्थायी रूप से नहीं रहती, बल्कि कर्मों के आधार पर उसे नया शरीर प्राप्त होता है। हालांकि वैज्ञानिक रूप से साफ तौर पर यह प्रमाणित करना कठिन है, मगर पुनर्जन्म की ऐसी अनेक घटनाएं हुई हैं, जिन पर विज्ञान मौन हो जाता है। हिंदू धर्म में तो पुनर्जन्म का पूरा विधान है कि आत्मा अगला जन्म कहां लेगी? यहां तक कि सात जन्मों की अवधारणा है। प्रेम के वशीभूत पति-पत्नी सात जन्मों का साथ निभाने की कामना करते हैं। कर्मों के अनुसार अनेक योनियों में जन्म लेने की मान्यता है। रामायण, महाभारत व पुराणों में पुनर्जन्म की अनेकानेक कथाएं प्रचलित हैं। हालांकि वैज्ञानिक नजरिया रखने वाले पुनर्जन्म की घटना को मानसिक विकृति के रूप में परिभाषित करते हैं। इस पर परामनोवैज्ञानिकों ने बहुत काम किया है। 

दूसरी ओर इस्लाम में यह विश्वास है कि मृत्यु के बाद आत्मा को अल्लाह के पास ले जाया जाता है, और कब्र में एक अंतरिम जीवन शुरू होता है, जहां आत्मा अपने कर्मों के अनुसार या तो शांति पाती है या कष्ट उठाती है। परंतु आत्मा कब्र में स्थायी रूप से नहीं रहती, यह एक अस्थायी अवस्था है, जब तक कि कयामत का दिन नहीं आ जाता। ऐसे में इस्लामिक मान्यता के अनुसार, पुनर्जन्म की अवधारणा को स्वीकार नहीं किया जाता है। इस्लाम में यह विश्वास है कि हर इंसान की एक ही जिन्दगी होती है, और मृत्यु के बाद उसे कब्र में दफनाया जाता है। फिर कयामत या आखिरत के दिन, अल्लाह इंसानों को दोबारा जिंदा करेगा और उनके कर्मों का हिसाब-किताब होगा। अच्छे कर्म करने वालों को जन्नत में और बुरे कर्म करने वालों को जहन्नुम में भेजा जाएगा। हालांकि, अपवादस्वरूप कुछ व्यक्तिगत अनुभव या घटनाएं सामने आई हैं, जिन्हें लोग पुनर्जन्म से जोड़ते हैं, लेकिन वे इस्लामी मान्यताओं के अनुसार नहीं होते। कई बार ऐसे अनुभवों को व्यक्ति की मानसिक स्थिति, या दूसरी संस्कृतियों की मान्यताओं से प्रभावित माना जा सकता है। अगर मुस्लिम समाज में पुनर्जन्म से संबंधित कहीं घटनाएं सामने आती हैं, तो वे व्यक्तिगत धारणाओं या अन्य बाहरी प्रभावों के कारण हो सकती हैं, लेकिन वे इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप नहीं होतीं।

ईसाई धर्म में भी आत्मा को अमर माना जाता है। मृत्यु के बाद आत्मा स्वर्ग या नर्क में जाती है, और कब्र केवल शरीर के लिए है। आत्मा कब्र में नहीं रहती।

बौद्ध धर्म में आत्मा की अवधारणा थोड़ी भिन्न है, क्योंकि आत्मा को स्थायी नहीं माना जाता। जीवन-मरण का चक्र चलता रहता है और पुनर्जन्म होता है। कब्र का आत्मा से कोई विशेष संबंध नहीं होता। इसलिए, आत्मा कब्र में रहने का विचार केवल कुछ विशेष धार्मिक मान्यताओं में होता है, लेकिन अधिकांश प्रमुख धर्म इसे अस्थायी मानते हैं या आत्मा को कब्र से परे की अवस्था में मानते हैं।

मृतक का सिर उत्तर दिशा की ओर क्यों रखा जाता है?

हमारे यहां मृत्यु से जुड़ी अनेक परंपराए हैं। इन्हीं परंपराओं में से एक परंपरा है कि मरणासन्न यानि कि मृत्यु जब करीब हो, जब यह निश्चित हो जाए कि मृत्यु आने ही वाली है, किंतु प्राण निकलने में कष्ट अधिक हो रहा हो तो मृत्यु को प्राप्त करने वाले व्यक्ति का सिर उत्तर दिशा की ओर कर देना चाहिए। इसके अतिरिक्त मौत के बाद मृतक का सिर उत्तर दिशा की ओर रखने की भी रवायत है। इस परंपरा को निभाते तो अधिकतर लोग हैं, लेकिन बहुत कम लोग ये जानते हैं कि मृतक का सिर उत्तर दिशा की ओर ही क्यों रखना चाहिए? मृतक का सिर उत्तर की ओर करके इसलिए रखते हैं कि प्राणों का उत्सर्ग दशम द्वार से हो। चुम्बकीय विद्युत प्रवाह की दिशा दक्षिण से उत्तर की ओर होती है। कहते हैं मरने के बाद भी कुछ क्षणों तक प्राण मस्तिष्क में रहते हैं। अतः उत्तर दिशा में सिर करने से गुरुत्वाकर्षण के कारण प्राण शीघ्र निकल जाते हैं। 

परंपरा के अनुसार मृत्यु के बाद अंत्येष्ठि संस्कार के समय मृतक का सिर दक्षिण की तरफ रखना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार दक्षिण की दिशा मृत्यु के देवता यमराज की मानी गई है। इस दिशा में शव का सिर रख हम उसे मृत्यु के देवता को समर्पित कर देते हैं।

इसके अतिरिक्त पार्थिव शरीर को ले जाते समय उसका सिर आगे और पैर पीछे रखे जाते हैं। फिर विश्रांत स्थल पर मृत देह को एक वेदी पर रखा जाता है, इसलिए कि अंतिम बार व्यक्ति इस संसार को देख ले। इसके बाद देह की दिशा बदल दी जाती है। फिर पैर आगे और सिर पीछे हो जाता है अर्थात तब मृत आत्मा को श्मशान को देखते हुए आगे बढना होता है। अंत में जब देह को चिता पर लेटाया जाता है तो उसका सिर चिता पर दक्षिण दिशा की ओर रखते हैं।

हिन्दू सनातन धर्म में पार्थिव शरीर को सूर्यास्त से पूर्व दाह संस्कार करने का नियम है। सनातन धर्म में साधु को समाधि दी जाती है और सामान्यजन का दाह संस्कार किया जाता है। साधु को समाधि इसलिए दी जाती है क्योंकि ध्यान और साधना से उसका शरीर एक विशेष उर्जा और ओरा लिए हुए होता है, इसलिए उसकी शारीरिक ऊर्जा को प्राकृतिक रूप से विसरित होने दिया जाता है। एक बात और, जीते जी उसकी आत्मा षरीर से पृथक हो जाती, इस कारण उसका दाह संस्कार करने की जरूरत नहीं होती। इसी प्रकार मासूस बच्चे का भी दफनाया जाता है, क्यों कि उसकी आत्मा का शरीर से पक्का संबंध नहीं होता, इस कारण दाह संस्कार की जरूरत नहीं होती। दूसरी ओर आम व्यक्ति का दाह संस्कार किया जाता है ताकि उसकी अपने शरीर के प्रति आसक्ति छूट जाए।

ऐसी मान्यता है कि अंतिम संस्कार में शामिल होना पुण्य कर्म है। जिस घर में किसी का देहांत हुआ है, उस घर से 100 गज दूर तक के घरों के लोगों को अंतिम संस्कार में शामिल होना चाहिए। 

श्मशान ले जाने से पूर्व घर पर कुटुंब के लोग मृत व्यक्ति के पार्थिव शरीर की परिक्रमा करते हैं। बाद में दाह संस्कार के समय संस्कार करने वाला व्यक्ति छेद वाले घड़े में जल लेकर चिता पर रखे पार्थिव शरीर की परिक्रमा करता है। जिसके अंत में पीछे की ओर घड़े को गिरा कर फोड़ दिया जाता है। ऐसा मृत व्यक्ति के शरीर से मोहभंग करने के लिए किया जाता है। 

हिंदू धर्मानुसार सूर्यास्त के बाद कभी भी दाह संस्कार नहीं किया जाता है। यदि किसी की मृत्यु सूर्यास्त के बाद हुई है तो उसे अगले दिन सुबह के समय ही दाह संस्कार किए जाने का नियम है। ऐसी मान्यता है कि सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार करने से मृतक की आत्मा को परलोक में भारी कष्ट सहना पड़ता है और अगले जन्म में उसे किसी अंग में दोष भी हो सकता है।

मंगलवार, मार्च 17, 2026

अगरबत्ती जलाना अनुचित है?

हमारे यहां धर्म स्थलों व घर के मंदिरों में अगरबत्ती जलाने का चलन है। यह आम बात है। मगर कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि ऐसा करना अनुचित है। आइये, जानते हैं कि उसकी क्या वजह है?

वे शास्त्रों के हवाले से सवाल खड़ा करते हैं कि जिस बांस की लकड़ी को चिता में भी जलाना वर्जित है, हम उस बांस से बनी अगरबत्ती को मंदिर में कैसे जला सकते हैं? वे कहते हैं कि शव को भले ही बांस व उसकी खपच्चियों से बनी सीढ़ी पर रख कर श्मशान पहुंचाते हैं, लेकिन जलाते वक्त उसे अलग कर देते हैं, क्यों कि बांस जलाने से पितृ दोष लगता है। उनका तर्क है कि शास्त्रों में पूजन विधान में कहीं पर भी अगरबत्ती का उल्लेख नहीं मिलता। सब जगह धूप करने का ही जिक्र है। ज्ञातव्य है कि जिस प्रकार हिंदू अगर का धूप करते हैं, वैसे ही मुस्लिम लोबान का धूप जलाते हैं। इससे वातावरण शुद्ध होता है और सकारत्मकता आती है।

अगरबत्ती नहीं जलाने के बारे में वैज्ञानिक तर्क ये है कि बांस में सीसा प्रचुर मात्रा में होता है और उसके जलने पर लेड आक्साइड बनता है, जो कि एक खतरनाक नीरो टॉक्सिक है, वह खतरनाक है। इसके अतिरिक्त अगरबत्ती के जलने से उत्पन्न हुई सुगन्ध के प्रसार के लिए फेथलेट नाम के विशिष्ट केन्मिकल का प्रयोग किया जाता है। यह एक फेथलिक एसिड का ईस्टर होता है। यह भी स्वांस के साथ शरीर मे प्रवेश करता है, जिससे फेफड़ों को नुकसान होता है। इस प्रकार अगरबत्ती की तथाकथित सुगन्ध न्यूरोटॉक्सिक एवम हेप्टोटोक्सिक को भी स्वांस के साथ शरीर में पहुंचाती है। इसकी लेश मात्र उपस्थिति कैंसर अथवा मस्तिष्क आघात का कारण बन सकती है। हेप्टो टॉक्सिक की थोड़ी सी मात्रा लीवर को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है। इसी कारण अनेक लोग अगरबत्ती की जगह धूप व विभिन्न प्रकार की धूप बत्तियां काम में लेते हैं।

अगरबत्ती नहीं जलाने के खिलाफ तर्क देने वाले कहते हैं कि यह केवल एक भ्रान्ति है कि बांस की लकड़ी को नहीं जलाया जाता। देश के बहुत से प्रांतों में बांस की लकड़ी के अंदर भोजन बनाया जाता है, जिसमे बांस की लकड़ी ही जलती है।