योगी चूंकि नाड़ी शोधन, शीतली, शीतकारी जैसे प्राणायाम करते हैं, इस कारण वे शरीर की ऊष्मा संतुलित करते हैं व स्वेद यानि पसीना की मात्रा घटाते हैं। योग ग्रंथों में अत्यधिक पसीने को
प्राण-क्षय का संकेत माना गया है।
सामान्य व्यक्ति क्रोध, भय, उत्तेजना, घबराहट में रहता है, जो कि “मानसिक गर्मी” पैदा करते हैं। योगी का चित्त शांत होने से
तनाव जन्य पसीना स्वतः कम हो जाता है। चूंकि योगी का आहार सादा, सात्त्विक व कम मसालेदार होता है, इस कारण शरीर की उष्णता और पसीने की मात्रा कम रहती है। वैसे योगी को पसीना न आए, यह सिद्धि नहीं है। गर्मी, श्रम या कठिन आसन में योगी को भी पसीना आता है।
योगशास्त्र कहता है “न अति स्वेदः, न अति शैत्यं कृ समत्व।”
निष्कर्ष यह है कि नियमित योगाभ्यास करने वाले व्यक्ति को
सामान्यतः पसीना कम आता है।यह देह के नहीं, प्राण और चित्त के संतुलन का फल है। योग का लक्ष्य पसीना रोकना नहीं,
स्वाभाविक संतुलन प्राप्त करना है। लोक कथाओं में कहा गया है कि जो भीतर से शीतल हो, उसे बाहर की गर्मी नहीं सताती। यह कथन देह से अधिक चेतना की बात करता है।
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