तीसरी आंख

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मंगलवार, फ़रवरी 17, 2026

सपने में सपना देखने के क्या मायने हैं?

सपने में सपना देखने को सामान्य भाषा में सपने के भीतर सपना कहा जाता है। मनोविज्ञान में इसे अंग्रेजी में फाल्स अवेकनिंग कहा जाता है, यानी ऐसा भ्रम कि व्यक्ति जाग गया है, जबकि वह अब भी सपना ही देख रहा होता है। इसमें व्यक्ति सपने में ही यह सपना देखता है कि वह जाग गया है। कई बार यह क्रम दो-तीन परतों तक चला जाता है। अक्सर यह स्थिति तनाव, अत्यधिक सोच, नींद की अनियमितता या गहरी मानसिक सक्रियता में होती है। भारतीय दार्शनिक संदर्भ में इसे स्वप्न के भीतर स्वप्न या स्वप्नावस्था का स्वप्न कहा जा सकता है। उपनिषदों की भाषा में यह चेतना की परतों, जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति के आपसी घुलाव का उदाहरण माना जाता है। उपनिषद और बौद्ध दर्शन, दोनों इसे केवल मानसिक घटना नहीं, बल्कि चेतना की परतों का संकेत मानते हैं। ज्ञातव्य है कि उपनिषद मनुष्य की चेतना को चार अवस्थाओं में बाँटते हैं। जागृत यानि बाह्य जगत का अनुभव, स्वप्न यानि भीतर का जगत, स्मृति और कल्पना, सुषुप्ति यानि गहरी नींद, जहाँ इच्छा-कल्पना भी लुप्त और तुरीय यानि शुद्ध साक्षी भाव (जो तीनों को देखता है)। सपने में सपना उपनिषदों के अनुसार यह बताता है कि स्वप्न भी अंतिम सत्य नहीं है, वह भी एक अनुभव मात्र है। बृहदारण्यक उपनिषद में संकेत मिलता है कि आत्मा स्वयं ही स्वप्न रचती है और स्वयं ही उसमें विचरती है। जब स्वप्न के भीतर दूसरा स्वप्न आता है, तब यह बोध उभरता है कि अनुभव के भीतर भी अनुभव संभव है। यानी जैसे जागृत जीवन एक बड़ा सपना हो सकता है, वैसे ही स्वप्न भी एक सूक्ष्म जाग्रत है। बौद्ध दर्शन में इसे माया के भीतर माया कहा जा सकता है। सपने में सपना देखना बौद्ध दृष्टि में अनित्यता और शून्यता की सीधी अनुभूति है। बुद्ध कहते हैं, सब कुछ स्वप्नवत है, फेन के समान है। तिब्बती बौद्ध परंपरा में इसे डीम योगा से जोड़ा जाता है, जहाँ साधक जानबूझ कर स्वप्न में यह पहचान विकसित करता है कि यह सपना है। सूफी कहते हैं कि “लोग सो रहे हैं, मरते हैं तो जागते हैं।” सपने में सपना देखना उस जागरण की एक रिहर्सल जैसा है।


मृतात्मा को बुलाया जा सकता है क्या?

यह कौतुहल लंबे समय से बना हुआ है कि क्या मृतात्मा को बुलाया जा सकता है या क्या मृतात्मा से बात की जा सकती है? इसका उत्तर धर्म, आध्यात्म, और विज्ञान, तीनों दृष्टियों से अलग-अलग है।

लगभग सभी धर्मों में माना गया है कि मृत आत्मा को बुलाना या उससे संपर्क करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। हिंदू मत के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा अपने कर्मों के अनुसार यमलोक या पितृलोक की यात्रा करती है। जब तक वह अपने अगले जन्म या मोक्ष की स्थिति में नहीं पहुंचती, तब तक उसे बाधित करना अधर्म माना जाता है। इसलिए “आत्मा बुलाना” जैसे प्रयोग प्लेन चिट बोर्ड करने को पाप या अपवित्र माना जाता है। इसी प्रकार इस्लाम में आत्माओं से संपर्क करना वर्जित है, क्योंकि माना जाता है कि आत्माओं के नाम पर अक्सर जिन्न या दुष्ट शक्तियां धोखा देती हैं। ईसाई मत में भी स्पिरिट कॉलिंग को निषिद्ध कहा गया है। आपको जानकारी होगी कि कुछ लोग प्लेन चिट बोर्ड के जरिए इच्छित मृतात्मा को बुलाने का दावा करते हैं, मगर उसमें मृतात्मा से संवाद संकेतों में होता है, जिसको पक्के तौर पर नहीं माना जा सकता कि मृतात्मा से वास्तव में संवाद हो रहा है।

विज्ञान के अनुसार अब तक कोई प्रमाण नहीं कि किसी मृत व्यक्ति की आत्मा को सचमुच बुलाया जा सकता है या उससे संपर्क संभव है।

स्पिरिट कॉलिंग, टेबल टर्निंग या ओइजा बोर्ड जैसे प्रयोग मनुष्य के अवचेतन मन और आटो-सजेशन से जुड़ी मानी जाती हैं, यानी दिमाग स्वयं वह अनुभव गढ़ लेता है।

कुछ साधक या तांत्रिक दावा करते हैं कि वे आत्माओं से संवाद कर सकते हैं, लेकिन ऐसे अनुभव प्रायः ऊर्जात्मक या मानसिक कंपन के रूप में होते हैं, न कि वास्तव में आत्मा के आगमन के रूप में। अधिकतर मामलों में यह भ्रम या मानसिक प्रभाव साबित हुआ है।

इस सिलसिले में मेरा अनुभव यह है कि मैं दरगाह के एक खादिम के हुजने में बैठा था। उन्होंने बताया कि वह अपने दिवंगत गुरू को उनकी कृपा पाने के लिए बुला सकते हैं। उन्होंने आंख बंद कर गुरू को याद किया और यकायक बहुत मोहक सुगंध पूरे हुजरे में फैल गई। उनका दावा था कि उनके गुरू हुजरे में आ गए हैं। इस बारे में मैने कुछ जानकारों से पूछा तो उन्होंने बताया कि आत्मा का अस्तित्व वायु रूप है, और उसका आव्हान करने पर वह गंध के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती है। इस बारे में मेरा एक अनुभव यह है कि जब मेरी माताश्री का निधन हुआ तो जिस कमरे में वे रहती थीं, वहां लगातार तीन दिन तक गुलाब की महक आती रही, जबकि वहां न तो कोई अगरबत्ती जलाई हुई थी और न ही किसी ने इत्र लगा रखा था।