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शनिवार, सितंबर 26, 2026

धार्मिक कथाओं के स्थल पर तोता क्यों रखा जाता है?

धार्मिक कथा का मंच केवल कथा सुनाने का स्थान नहीं होता। वहां रखी जाने वाली हर वस्तु के पीछे कोई न कोई सांस्कृतिक, धार्मिक अथवा प्रतीकात्मक अर्थ छिपा होता है। आपने अक्सर देखा होगा कि भागवत कथा या अन्य धार्मिक आयोजनों के मंच पर तोते का चित्र, प्रतिमा अथवा प्रतीक दिखाई देता है। आखिर धार्मिक कथा के स्थल पर तोता ही क्यों?

इसका सबसे बड़ा संबंध ‘शुक’ यानी तोते से है। संस्कृत में तोते को ‘शुक’ कहा जाता है और सनातन परंपरा में शुकदेव जी का विशेष स्थान है। श्रीमद्भागवत की कथा राजा परीक्षित को शुकदेव जी ने सुनाई थी। इसलिए भागवत कथा की परंपरा में तोता केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि भागवत ज्ञान को आगे पहुंचाने वाले शुकदेव जी का प्रतीक बन गया। तोते की एक विशेषता भी इस प्रतीक को और अर्थपूर्ण बनाती है। वह जो सुनता है, उसे दोहराता है। धार्मिक परंपरा में इसे ज्ञान को ग्रहण करके आगे पहुंचाने के रूप में देखा गया। गुरु से शिष्य और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ज्ञान के हस्तांतरण की यह परंपरा भारतीय संस्कृति की बड़ी विशेषता रही है।

ब्रज की धार्मिक परंपरा में तोते का संबंध राधा-कृष्ण की प्रेमलीला से भी जोड़ा जाता है। राधा जी के हाथ में तोते का चित्रण कई धार्मिक कलाकृतियों में मिलता है। वहां तोता प्रेम, संदेश और संवाद का प्रतीक बन जाता है। दिलचस्प यह है कि सामान्य बोलचाल में हम किसी व्यक्ति के बहुत कुछ रट लेने पर कहते हैं “तोते की तरह रट लिया।” लेकिन धार्मिक प्रतीकवाद में यही तोता एक बिल्कुल अलग अर्थ ग्रहण कर लेता है। यहां वह महज नकल करने वाला पक्षी नहीं, बल्कि सुने हुए ज्ञान को सुरक्षित रखने और दूसरों तक पहुंचाने वाला संदेशवाहक बन जाता है। इस दृष्टि से कथा स्थल पर रखा गया तोता जैसे श्रद्धालुओं को मौन संदेश देता है। ज्ञान केवल सुनने के लिए नहीं, आगे पहुंचाने के लिए भी है। यानी धार्मिक कथा के मंच पर बैठा छोटा-सा तोता हमें शुकदेव जी की याद दिलाने के साथ-साथ भारतीय ज्ञान परंपरा की उस खूबसूरत परंपरा का भी प्रतीक है, जिसमें सुना हुआ ज्ञान स्मृति में रखा जाता है और फिर अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाता है। शायद इसी कारण कथा के विशाल मंच पर यह छोटा-सा तोता इतना महत्वपूर्ण हो जाता है।


 https://youtu.be/K0eePHVJqH8