खासकर इस्लामी परंपरा में इसकी खास मान्यता है। मान्यता है कि सम्मानपूर्वक कफन देने से अंत समय सहज होता है। हदीसों में भी मृतक की सेवा को सदका (पुण्य) बताया गया है। यह पुण्य केवल मृतक के लिए नहीं, बल्कि करने वाले के आत्मिक उत्थान का कारण माना जाता है।
वस्तुतः मृत देह असहाय होती है। उसे ढकना, सम्मान देना, अंतिम यात्रा के योग्य बनाना, यह मनुष्य की करुणा और नैतिक जिम्मेदारी है। जब कोई व्यक्ति निस्वार्थ भाव से यह कार्य करता है, तो उसके भीतर की अहंकार-ग्रंथी ढीली पड़ती है, और मानसिक कष्ट स्वतः कम होने लगते हैं। इससे मन में यह अनुभूति होती है कि “मैं किसी के अंतिम क्षणों में काम आया।” यह भावना आत्मसंतोष देती है, जो चिंता, भय और अपराधबोध जैसे मानसिक कष्टों को कम करती है। जब मनुष्य दूसरों के अंतिम कष्ट में सहभागी बनता है, तो प्रकृति या ईश्वर उसे अपने कष्टों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है।
कफन केवल कपड़ा नहीं है, यह समानता का प्रतीक है, यानि अमीर-गरीब सब एक से हैं। यह अस्थायित्व का भी बोध कराता है। एक अर्थ में यह इस तथ्य की भी पुष्टि करती है कि मृत्यु अटल है। जो व्यक्ति इस सत्य को हृदय से स्वीकार कर लेता है, उसके जीवन के कई मोहजन्य कष्ट स्वतः कम हो जाते हैं।
बहुत पुरानी बात है। रेगिस्तान के किनारे बसा एक छोटा-सा कस्बा था। वहां एक गरीब बुनकर रहता था। नाम था रहमतू। उसके घर में न धन था, न सुख। बीमारी, कर्ज और रोजी की चिंता, तीनों ने मिलकर उसका जीवन बोझ बना दिया था। लोग कहते थे, “रहमतू के भाग्य में ही कष्ट लिखा है।” एक दिन कस्बे में एक अनजान मुसाफिर मर गया। न उसका कोई रिश्तेदार था, न पहचान। शव मस्जिद के पास पड़ा रहा। लोग आते-जाते रहे, मगर सबने मुंह फेर लिया। रहमतू भी वहीं से गुजर रहा था। उसके पास सिर्फ एक पुरानी चादर थी। वही, जिसे वह ठंड में ओढ़ता था। वह रुका, देर तक शव को देखता रहा। उसने बिना किसी से पूछे अपनी चादर उतारी और उस मुसाफिर को कफन की तरह ढक दिया। न कोई नाम पूछा, न कोई दुआ मांगी। बस इतना कहा, “या अल्लाह, इसे सुकून दे देना।”
लोग हंसे, “अपने कष्ट छोड़ कर मुर्दों के काम आया है!”
पर अजीब बात हुई। उसी रात रहमतू को बरसों बाद गहरी नींद आई। सपने में उसने देखा, एक उजला चेहरा मुस्करा कर कह रहा है, “जिसने मेरी लाज रखी, उसकी लाज खुदा रखेगा।” कुछ ही दिनों में उसके जीवन की दिशा बदलने लगी। बीमारी ने दम तोड़ा, काम मिलने लगा, कर्ज उतरने लगा। कष्ट एक-एक कर ऐसे दूर हुए, जैसे रेत पर पड़ी लकीरें हवा में मिट जाती हैं। लोग हैरान थे। रहमतू बस इतना कहता, “मैंने कोई करिश्मा नहीं किया। मैंने बस एक बेबस को ढक दिया था।” तब से उस कस्बे में एक कहावत चल पड़ी, “जो मुर्दे को कफन देता है, खुदा उसके कष्ट ढक देता है।”