तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

रविवार, जुलाई 12, 2026

चिता में लकडी समर्पित क्यों की जाती है?

आप जानते हैं कि किसी भी व्यक्ति के अंतिम संस्कार का समापन मौजूद लोगों की ओर से लकडी के समर्पण से होता है। हर व्यक्ति पूरी श्रद्घा से चिता में लकडी डालता है। लेकिन आपने कभी विचार किया है कि ऐसा क्यों किया जाता है। यह केवल ईंधन नहीं, बल्कि अंतिम सहभागिता का प्रतीक है कि मैं भी इस विदाई का साक्षी और सहभागी हूँ।

धार्मिक दृष्टि से यह माना जाता है कि लकड़ी देना पितृ ऋण से मुक्त होने का संकेत है। मृतक के प्रति अंतिम कर्तव्य (अंत्येष्टि -संस्कार) में सहभागिता है। लोकभावना में यह भी था कि जिसने लकड़ी दी, उसने मृतात्मा के कष्ट को थोड़ा कम किया।

आज अधिकतर श्मशानों में यह दृश्य मिलता है कि लकड़ी का एक ही टुकड़ा रखा जाता है। सभी लोग उसे छूकर या आगे बढ़ा कर प्रतीकात्मक रूप से लकड़ी देने की प्रक्रिया को पूरा कर लेते हैं। यह बदलाव अचानक नहीं, बल्कि व्यावहारिक कारणों से आया है। असल में शहरीकरण के चलते स्थान की कमी है। शहरों में श्मशान सीमित हैं। ऐसे में सैकड़ों लकड़ियां रखना अव्यवहारिक हो गया। लकड़ी की अत्यधिक खपत पर सवाल भी उठते हैं, इसलिए प्रतीकात्मक अर्पण की परंपरा बनी रहे और प्रकृति पर बोझ भी न बढ़े।  महामारी और संक्रमण के अनुभवों के बाद कम वस्तुओं का साझा उपयोग अधिक सुरक्षित माना जाता है। सवाल उठता है कि क्या इससे परंपरा का महत्व कम हुआ? 

नहीं। यह समझना जरूरी है कि संस्कार का भाव प्रधान है, वस्तु नहीं। शास्त्रों में भी कहा गया है भावेन देवाः तुष्यन्ति

(देवता और संस्कार भावना से तृप्त होते हैं)। यदि मन में श्रद्धा है, तो एक लकड़ी छूना भी सौ लकड़ियाँ देने के बराबर माना जा सकता है। कुल मिला कर लकड़ी देने की परंपरा समाप्त नहीं हुई, केवल उसका रूप बदला है।