तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

बुधवार, अप्रैल 25, 2018

सांप्रदायिकता व जातिवाद की पराकाष्ठा से गुजर रहा है देश

-तेजवानी गिरधर-
यह सही है कि सांप्रदायिकता व जातिवाद हमारे देश की प्रमुख समस्याओं में से हैं, और ये अरसे से कायम हैं, मगर विशेष रूप से इन दिनों ये पराकाष्ठा को छूने लगी हैं। गनीमत है कि हमारा संविधान कठोर व स्पष्ट है और सामाजिक व्यवस्था में विशेष किस्म की उदारता व सहिष्णुता है, वरना स्थिति इतनी भयावह है कि गृह युद्ध छिड़ जाए या देश के टुकड़े हो जाएं।
तेजवानी गिरधर
कठुआ की घटना को ही लीजिए। कैसी विडंबना है कि वीभत्स बलात्कार व हत्या जैसे जघन्य अपराधों को भी अब संप्रदाय से जोड़ कर देखा जा रहा है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और प्रगतिशील कहलाने वाला हमारा देश आज कैसे दुष्चक्र में फंसा हुआ है। इस तरह के दुष्चक्र पहले भी चलते रहे हैं, मगर सत्ता के संरक्षण में आज जो कुछ हो रहा है, वह बेहद अफसोसनाक है। हालत ये है कि संयुक्त राष्ट्र संघ को ऐसे मामले में दखल देना पड़ रहा है। भारी दबाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कड़े रुख के बाद जरूर जिम्मेदार राजनेता रेखांकित हुए, मगर तब तक आक्रोष पूरे देश में फैल चुका है।
यूं हमारे देश के बहुसंख्यक नागरिक शांति प्रिय हैं, मगर उन्हें बरगलाने वाले साधन अब बहुत अधिक हो गए हैं। सूचना के आदान-प्रदान का काम जब केवल प्रिंट व इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के पास रहा, तब तक वे मर्यादा की सीमा से बंधे हुए रहे, कमोबेश अब भी हैं, मगर जब से सोशल मीडिया का बोलबाला है, किसी पर कोई अंकुश ही नहीं रहा। वाट्स ऐप व फेसबुक सांप्रदायिकता व जातिवाद के साथ राजनीतिक विद्वेष वाली पोस्टों से भरे पड़े हैं। भड़ास निकालने का स्तर इतना घटिया हो चला है कि ऐसा प्रतीत होता है कि मानो हम पूरी तरह से अराजक हो गए हैं। समय-समय पर सरकारों की ओर से चेतावनियां दी जाती हैं, पुलिस आखिरी हथियार के रूप में साइबर सेवाओं को कुछ दिन के लिए ठप कर देती हैं, मगर कानून का भय तो मानो बच ही नहीं गया है। आज अगर सांप्रदायिकता चरम पर है तो उसकी बड़ी वजह ये है कि सांप्रदायिक लोग ऊलजलूल हरकतें करके अपने आपको गौरवान्वित महसूस करते हैं। दुर्भाग्य से उन्हें शाबाशी देने वाले भी कम नहीं हैं। सरकार पर उनका कोई नियंत्रण नहीं। कभी कभी तो लगता है कि कहीं राजनीतिक लाभ के लिए जानबूझ कर समाज में ध्रुवीकरण को बढ़ावा तो नहीं दिया जा रहा।
पिछले दिनों एससी एसटी के मामले में सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था के बाद जिस प्रकार देश जल उठा, उससे तो हिंदू भी आपस में बंटा नजर आया। जैसे ही उसका राजनीतिकरण हुआ, सत्तारूढ़ भाजपा भी घबरा गई। उसे लगने लगा कि पिछले कई साल की मशक्कत के बाद मुख्य धारा से जोड़ा गया कुछ प्रतिशत अनुसूचित जाति का तबका कहीं छिटक न जाए। एक ओर तो वह कट्टर हिंदूवाद के अंदरूनी दबाव में है तो दूसरी ओर अनुसूचित जाति की मिजाजपुर्सी के लिए अंबेडकवाद को पूजने को मजबूर है। अंबेडकर के नाम पर अब क्या कुछ नहीं हो रहा। एक ओर संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण विरोध विचार का कड़वा घूंट पिया जा रहा है तो दूसरी ओर राजनीतिक घाटा होते देख आरक्षण समाप्त नहीं किए जाने की ताबड़तोड़ बयानबाजी देनी पड़ रही है। आरक्षण का पूरा दोष कांग्रेस पर मढ़ तो दिया जाता है, मगर संस्कारवान पीढ़ी बनाने की दुहाई देने वाले दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ वाले इस देश में सामाजिक समरसता कायम नहीं की जा सकी है। गांवों में आज भी सामाजिक स्तर पर अनुसूचित जाति का तबका दमन का शिकार है। आपको ख्याल होगा कि पिछले दिनों एससी एसटी आंदोलन के दौरान सर्वाधिक पूजित हनुमान जी के चित्र के साथ घृणित दुव्र्यवहार होने का वीडियो वायरल हुआ तो उस पर बड़ा विवाद हुआ, मगर इसका किसी के पास जवाब नहीं था कि हनुमान जी और अन्य देवी-देवताओं के मंदिरों में प्रवेश नहीं करने देने के लिए कौन जिम्मेदार है? जब हम उन्हें मंदिर में जोने से रोकते हैं तो यह उम्मीद कैसे करके बैठे हैं कि जिन देवी-देवताओं को हम रोजाना श्रद्धा से पूजते हैं, उनको वे भी पूजनीय मानेंगे। अर्थात कड़वी सच्चाई यही है कि हमारी सामाजिक व्यवस्था आज भी पिछड़ों को बराबरी का दर्जा नहीं दे रही, केवल कानूनी रूप से ही पिछड़े आगे लाए जा रहे हैं। कानून का दुरुपयोग अगर हो रहा है तो उसकी वजह यही है कि हम मानसिक रूप से पिछड़ों को स्वीकार नहीं कर रहे, ऐसे में वे अतिरेक करने पर आमादा हो जाते हैं।
केवल अनुसूचित जातियां ही क्यों, हिंदुओं की अन्य जातियां भी अलग-अलग केन्द्रों पर ध्रुवीकृत हो चुकी हैं। यही वजह है कि चुनावों में टिकटों का निर्धारण ही जातियों के आधार पर हो रहा है।
कुल जमा सांप्रदायिकता व ऊंच-नीच की इस समस्या का समाधान इस कारण नहीं हो पा रहा है कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था उसमें सहयोग करने की बजाय बढ़ावा देने पर आमादा है। ऐसे में इस देश का भगवान ही मालिक है।

शुक्रवार, मार्च 23, 2018

वसुंधरा को न निगलते बन रहा है, न उगलते

-तेजवानी गिरधर-
हाल ही संपन्न लोकसभा उपचुनाव में 17 विधानसभा क्षेत्रों में बुरी तरह से पराजित होने के बाद भाजपा सकते में है। न तो वह यह निश्चय कर पा रही है कि मोदी लहर कम हो गई है और न ही ये कि यह केवल मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की अकुशल शासन व्यवस्था का परिणाम है। आरएसएस खेमा जहां इस हार को वसुंधरा के अब तक के शासन काल के प्रति जनता की नाराजगी से जोड़ कर देख रही है तो वहीं वसुंधरा खेमा यह मानता है कि ऐसे परिणाम आरएसएस की चुप्पी की वजह से आये हैं। असलियत ये है कि यह दोनों ही तथ्य सही है। एक सोची समझी रणनीति के तहत इस उपचुनाव को पूरी तरह से वसुंधरा राजे के मत्थे मढ़ दिया गया, जिसमें प्रत्याशियों के चयन से लेकर चुनावी रणनीति व प्रचार का जिम्मा वसुंधरा पर ही था। आरएसएस की चुप्पी असर ये हुआ कि घर-घर से मतदाता को निकाल कर वोट डलवाने का माहौल कहीं भी नजर नहीं आया। यह सही है कि एंटी इन्कंबेंसी फैक्टर ने काम किया गया, मगर संघ की अरुचि के कारण उसे रोका नहीं जा सका। दिलचस्प बात ये है कि भले ही इसे राज्य सरकार के प्रति एंटी इन्कंबेंसी से जोड़ा गया, मगर सच ये है कि इसमें मुख्य भूमिका केन्द्र सरकार की नोटबंदी व जीएसटी ने अदा की। अर्थात जनता की नाराजगी राज्य के साथ केन्द्र की सरकार के प्रति भी उजागर हुई। ऐसे में अकेले वसुंधरा को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा पा रहा।
आपको ज्ञात होगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की वसुंधरा के प्रति नाइत्तफाकी काफी समय से चल रही है और यही वजह है कि कई बार उनको हटा कर किसी और को मुख्यमंत्री बनाने की चर्चाएं हुईं। अब जबकि वसुंधरा के नेतृत्व में लड़े गए उपचुनाव में भाजपा चारों खाने चित्त हो गई तो यही माना जाना चाहिए कि भाजपा हाईकमान नई रणनीति के तहत वसुंधरा को हटाए, मगर ऐसा होना आसान नहीं लग रहा। इस तथ्य को आसानी से समझा जा सकता है कि आज जब वसुंधरा राजस्थान में हैं, तब भाजपा की ये हालत हुई है तो उन्हें दिल्ली बुलाए जाने पर क्या होगा। वसुंधरा के एरोगेंस के बारे हाईकमान अच्छी तरह से वाकिफ है। अगर उनके कद के साथ कुछ भी छेडख़ानी की जाती है तो वे किसी भी स्तर पर जा सकती हैं। अब दिक्कत ये है कि मजबूरी में भाजपा यदि वसुंधरा के चेहरे पर ही चुनाव लड़ती है तो परिणाम नकारात्मक आने का खतरा है और हटाती है तो और भी अधिक नुकसान हो सकता है। कुल मिला कर भाजपा ही हालत ये है कि वसुंधरा न निगलते बन रही है और न ही उगलते। यदि वजह है कि वसुंधरा के नेतृत्व में ही नई सोशल इंजीनियरिंग पर काम हो रहा है। मंत्रीमंडल में फेरबदल पर गंभीरता से विचार हो रहा है। डेमेज कंट्रोल के लिए पिछले दिनों किरोड़ी लाल मीणा की पूरी पार्टी का भाजपा में विलय होना इसी कवायद का हिस्सा है। ऐसा करके भाजपा ने मीणा समाज को जोडऩे का काम किया है। भाजपा अभी आनंदपाल प्रकरण से नाराज राजपूतों व वरिष्ठ नेता घनश्याम तिवाड़ी के कारण छिटक रहे ब्राह्मण समाज को भी साधने की जुगत में लगी हुई है। कदाचित इसी वजह से राजपूत व ब्राह्मण समाज से एक-एक उप मुख्यमंत्री तक की अफवाहें फैल रही हैं। हालांकि यह एक फार्मूला है, मगर अन्य फार्मूलों पर भी चर्चा हो रही है। संभव है, जल्द ही मंत्रीमंडल का नया स्वरूप सामने आ जाए।
राजनीति में कब क्या होगा, कुछ नहीं कहा जा सकता। हो सकता है कि वसुंधरा पर इतना दबाव बना दिया जाए कि वे राजस्थान छोड़ कर दिल्ली जाने को राजी हो जाएं, मगर जिस तरह की हलचल चल रही है, उसे देखते हुए नहीं लगता कि पार्टी इतना बड़ा कदम उठाने का दुस्साहस करेगी। हद से हद ये होगा कि वसुंधरा यथावत रहेंगी और मोदी व पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के दबाव में विधानसभा चुनाव में संघ कोटे की सीटें बढ़ा दी जाएं। आगे आगे देखते हैं होता है क्या?

गुरुवार, मार्च 08, 2018

मन से भगाए बिना नहीं भागेगा विधानसभा से भूत

-तेजवानी गिरधर-
भूत होते हैं या नहीं, इस पर विवाद सदैव से रहा है। भूतों को मानने वालों के पास इसका कोई सबूत नहीं है तो नहीं मानने वाले भी विपदा के समय आखिरी चारा न होने पर ऊपरी हवा का उपचार करवाने ओझाओं की शरण में चले जाते हैं। यह एक सीधी सट्ट सच्चाई है। पिछले दिनों विधानसभा में भूतों की मौजूदगी की अफवाह के चलते न केवल तांत्रिकों से जांच-पड़ताल करवाई गई, अपितु इस चर्चा को लेकर खूब हंसी-ठिठोली भी हुई। प्रिंट व इलैक्टॉनिक मीडिया ने तो इसका महा कवरेज किया ही, सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा छाया रहा। विधायकों व नेताओं की जितनी सामूहिक छीछालेदर हुई, उतनी शायद ही कभी हुई हो।
स्वाभाविक रूप से इक्कसवीं सदी में जबकि, विज्ञान व तकनीकी अपने चरम पर हैं, भूतों की बात बेमानी लगती है। सार्वजनिक मंच की बात करें तो वहां भूत अंधविश्वास के सिवाय कुछ भी नहीं, मगर सच्चाई इसके सर्वथा विपरीत है। अध्ययन-अध्यापन में कहीं भी भूतों की पुष्टि नहीं की जाती, मगर सच ये है कि भूत की मौजूदगी हमारी मान्यताओं में है और उसे कोई भी नकार नहीं सकता। यह एक कड़वी सच्चाई है कि विधायक हों या नेता, या फिर आम आदमी, आम तौर पर भूत की मौजदगी की सर्वस्वीकार्यता है। तभी तो तांत्रिक व ओझाओं की झाड़-फूंक परंपरा कायम है। वस्तुत: बातें भले ही हम वैज्ञानिक युग की करें, मगर जब भी लाइलाज बीमारी या रहस्यपूर्ण आदिभौतिक समस्या आती है तो डॉक्टरों से इलाज के साथ तांत्रिकों व पीर-फकीरों की शरण में चले जाते हैं। यद्यपि इस सबका ग्राफ गिरा है, मगर भूतों अथवा ऊपरी हवा की मान्यता नकारी नहीं जा सकी है।  आपने कई बार ये भी सुना होगा कि अमुक बंगले में भूत का वास है, इस कारण वहां कोई नहीं रहता।
भूत-प्रेत से इतर बात करें तो यह सर्वविदित है कि हमारे नेतागण राजनीति चमकाने अथवा टिकट हासिल करने के लिए बाबाओं, ज्योतिषियों व तांत्रिकों के देवरे ढोकते हैं। इसे अन्यथा नहीं लिया जाता। यानि कि सारी की सारी अवैज्ञानिक मान्यताओं को हमारे समाज से सहमति दे रखी है। वास्तु को तो वैज्ञानिक मान्यता की तरह लिया जाने लगा है, जबकि आज भी उसका सटीक वैज्ञानिक व तर्कयुक्त आधार नहीं है। इसको लेकर कई तरह की भ्रांतियां हैं, मगर हम अपने निजी जीवन में उसे स्वीकार करते ही हैं। पूर्ण स्वीकार्यता भी नहीं और पूर्ण अस्वीकार्यता भी नहीं। पैंडुलम जैसी स्थिति है। 
ऐसे में अगर विधानसभा भवन में भूत-प्रेत अथवा वास्तुदोष का शगूफा छूटता है तो उस पर हम असहज हो जाते हैं। मीडिया तो ल_ लेकर ही पीछे पड़ जाता है। इसके विपरीत अगर हम मीडिया कर्मियों के निजी जीवन में झांकें तो वे भी कहीं न कहीं ऊपरी हवा से निजात के लिए तंत्र-मंत्र इत्यादि का सहज इस्तेमाल करते दिखाई दे जाएंगे। क्या यह सही नहीं है कि हम अपने घर में अज्ञात कारण से होने वाली अशांति से निपटने के लिए सुंदरकांड का पाठ नहीं करवाते? क्या ज्योतिषी के बताने पर पितरों की शांति के लिए अनुष्ठान नहीं करवाते? पुष्कर के निकट सुधाबाय में तो बाकायदा मंगल चौथ के दिन मेला भरता है और कुंड में डुबकी लगवा कर कथित रूप से प्रेत-बाधा से मुक्ति दिलवाने वालों का तांता लगा रहता है।
लब्बोलुआब, बात ये है कि हम निजी जीवन में तो पारंपरिक अंध विश्वासों को लिए हुए जीते हैं, मगर सार्वजनिक मंच पर उसका विरोध करने लगते हैं। यानि कि हम दोहरा चरित्र जी रहे हैं। न तो पूर्ण विज्ञान परक हो पाए हैं और न ही पुरानी परंपराओं को छोड़ पाए हैं। ऐसे में विधानसभा में भूतों की रहस्यमयी समस्या को लेकर बहस बेमानी सी लगती है।

शुक्रवार, फ़रवरी 09, 2018

हार के बाद भी भाजपा को हुआ फायदा

भीलवाड़ा जिले की मांडल विधानसभा सीट सहित अजमेर व अलवर की सभी विधानसभा सीटों को मिला कर कुल सभी 17 सीटों पर भाजपी की करारी हार से बेशक भाजपा को तगड़ा झटका लगा है और उसका मोदी फोबिया उतर गया है, मगर राजनीति के जानकार मानते हैं कि इस उपचुनाव से भाजपा को फायदा ही हुआ है।
जानकारों का मानना है कि दो लोकसभा सीटों व एक विधानसभा सीट के हारने से सीटों की गिनती के लिहाज से केन्द्र व राज्य की सरकारों को कुछ खास नुकसान नहीं हुआ है, मगर इससे ये खुलासा हो गया है कि न तो अब मोदी लहर कायम है और न ही वसुंधरा राजे की लोकप्रियता शेष रही है। एंटी इन्कंबेंसी के फैक्टर ने भी तगड़ा काम किया है। कांग्रेस मुक्त भारत के जुमले की जुगाली करने वाले भाजपाइयों का दंभ भी टूटा है। सब कुछ मिला कर भाजपा को विधानसभा चुनाव से दस माह पहले ही अपनी जमीन खिसकने की जानकारी मिल गई है। अगर ये उपचुनाव नहीं होते तो कदाचित भाजपा भ्रम में ही रहती और सीधे विधानसभा चुनाव हुए होते तो शर्तिया तौर पर सत्ता से बेदखल हो जाती। अब जबकि उसे जमीनी हकीकत पता लग गई है तो उसे संभलने का पूरा मौका मिल गया है। अब वह न केवल अपने पहले से मौजूद सांगठनिक ढ़ांचे को और मजबूत बनाएगी, अपितु चुनाव परिणामों को प्रभावित करने वाले सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार कर लेगी। अब बाकायदा नए सिरे से जाजम बिछाएगी। जातीय समीकरण भी साधेगी और मौजूदा विधायकों की गंभीरता से स्क्रीनिंग करेगी।
उधर कांग्रेस को बड़ा फायदा ये हुआ है कि वह अब पूरी तरह से उत्साह से लबरेज हो गई है। मगर साथ ही यह भी आशंका है कि कहीं सत्ता आने की संभावना में उसका कार्यकर्ता सुस्त न हो जाए। वैसे पहली बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने मेरा बूथ मेरा गौरव अभियान चला कर पार्टी का चुनावी ढ़ांचा मजबूत कर लिया है। इसका लाभ निश्चित रूप से विधानसभा चुनाव में होगा, मगर संदेह ये भी उत्पन्न होता है कि कहीं अति उत्साह में कार्यकर्ता ढ़ीला न पड़ जाए।

बुधवार, फ़रवरी 07, 2018

कांग्रेस के हौसले बुलंद, भाजपा को बिछानी होगी नई जाजम

उपचुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा की करारी हार के साथ कांग्रेस के हौसले बुलंद हो गए हैं। तकरीबन चार साल साल पहले विधानसभा चुनाव में जो कांग्रेस चारों खाने चित्त हो गई थी और मृत प्राय: सी थी, वह प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट के नेतृत्व में पूरे जोश के साथ फिर खड़ी हो गई है। हालांकि  विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं और तब न जाने कौन से समीकरण बनेंगे, मगर जिस तरह मांडलगढ़ सहित अजमेर व अलवर की सभी विधानसभा सीटों पर कांग्रेस ने बढ़त हासिल की है, उससे उसके कार्यकर्ताओं में अगला चुनाव जीत सकने का विश्वास भर दिया है। दूसरी ओर भाजपा इन परिणामों से हतप्रभ है और अगले चुनाव में जीत के लिए उसे मौजूदा जाजम को हटा कर नई जाजम बिछानी होगी, केवल पैबंद लगाने से काम नहीं चलेगा। बेशक उसके पास सशक्त संगठन है, फिर भी प्रत्याशियों के चयन में अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी। इसके अतिरिक्त एंटी इन्कंबेंसी फैक्टर को ध्यान में रखते हुए सरकार की कार्यप्रणाली में सुधार लाना होगा। यदि जनता को राहत नहीं मिली तो वह उसे पलटी खिला देगी। रहा सवाल मोदी लहर का तो वह पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है, अलबत्ता अगला चुनाव मोदी को खुद मोनीटर करना होगा।
वसुंधरा के दिल्ली ट्रांसफर के आसार
राजस्थान में लोकसभा के दो व विधानसभा के एक उपचुनाव में भाजपा की हार के बाद यह पक्के तौर पर माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जल्द ही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को दिल्ली बुला कर केबीनेट मंत्री बनाएंगे, ताकि राजस्थान में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले नए सिरे से जाजम बिछाई जा सके।
हालांकि मोदी काफी समय से इस ताक में थे कि वसुंधरा को राजस्थान से हटाया जाए, मगर वे इतनी मजबूत रही हैं कि उन्हें हिलाने का साहस नहीं कर पाए। अब जब कि भाजपा तीन सीटों के उपचुनाव में बुरी तरह से हार गई है, मोदी को मौका मिल जाएगा। असल में मोदी व वसुंधरा की नाइत्तफाकी काफी समय से है, यही वजह है कि कई बार ये चर्चा हुई कि वसुंधरा को हटा कर ओम माथुर या राज्यवर्धन सिंह अथवा भूपेन्द्र यादव को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। लेकिन हर बार कोई न कोई ऐसा कारण बन जाता था कि अफवाहों पर विराम लग जाता था। अब जब कि यह स्पष्ट हो गया है कि वसुंधरा का चेहरा आगामी विधानसभा चुनाव लड़ाने के लायक नहीं रहा है तो उन्हें हटा कर नए सिरे से जाजम बैठाना भाजपा की मजबूरी हो गया है। यदि उन्हें हटाने में कोई दिक्कत आती है तो इतना तय माना जा रहा है कि कम से कम विधानसभा चुनाव तो उनके नाम पर नहीं लड़ा जाएगा। इतना ही नहीं माना ये भी जा रहा है कि जीत सुनिश्चित करने के लिए मोदी एक सौ बांसठ विधायकों में से तकरीबन एक सौ मौजूदा विधायकों के टिकट काटने जैसा कड़ा कदम भी उठा सकते हैं, जाहिर तौर पर उसमें कई मंत्री भी होंगे।
सचिन पायलट ही होंगे मुख्यमंत्री पद के दावेदार
अजमेर सहित लोकसभा की दो सीटों व एक विधानसभा सीट पर कांग्रेस की शानदार जीत के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट को आगामी विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किए जाने पर मुद्दे पर अंदरखाने मिल रही चुनौती पर विराम लग गया है।
इसमें कोई दो राय यह उपचुनाव सचिन के लिए विधानसभा चुनाव के सेमी फाइनल के रूप में अग्रि परीक्षा सा था। उन्होंने न केवल प्रत्याशियों के चयन में चतुराई बरती, अपितु रणनीति पर भी खूब काम किया। मेरा बूथ मेरा गौरव अभियान चला कर सभी छोटे-बड़े नेताओं को बूथ पर काम कर दिखाने को बांध दिया। नतीजतन अनुकूल परिणाम आए। समझा जाता है कि अब आगामी चुनाव उनके ही नेतृत्व में लड़े जाने की संभावना प्रबल हो गई। यह तो कांग्रेस हाईकमान पर निर्भर है कि वह उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट चुनाव लड़ती है अथवा नहीं, मगर यदि सरकार कांग्रेस की बनती है तो मुख्यमंत्री वे ही होंगे। कुछ लोगों ने उन पर अजमेर लोकसभा सीट का उपचुनाव लडऩे का दबाव बनाया, मगर चूंकि उन्हें राजस्थान की कमान सौंपने के मकसद से प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था और उन्होंने चार साल में दिन-रात एक करके मृतप्राय: कांग्रेस में जान फूंकी, उन्होंने अपने आप को विधानसभा चुनाव के लिए सुरक्षित रख लिया। उनकी यह नीति काम आई और अब आगामी चुनाव उनके ही नेतृत्व में लड़े जाने व सरकार बनने पर मुख्यमंत्री बनने का रास्ता सुगम हो गया है।
-तेजवानी गिरधर-

मंगलवार, दिसंबर 26, 2017

भाजपा : जीत की पुडिय़ा में लिपट कर मिली चेतावनी

चाहे हिमाचल प्रदेश के साथ गुजरात में जीत को लेकर भाजपा प्रसन्न दिखाई दे, मगर सच ये है कि उसे अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सिमटते  तिलिस्म का अहसास हो गया होगा। बेशक गुजरात में भाजपा केवल और केवल मोदी के दम पर ही जीती है, मगर सच ये भी है कि इन चुनावों ने यह साफ कर दिया है कि, जो मोदी लहर पिछले लोकसभा चुनाव व उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों के वक्त चली थी, या चलाई गई थी, वह अब नदारद हो गई है। बेशक कांग्रेस हार गई, मगर चुनाव में भाजपा व कांग्रेस के बीच हुई कांटे की टक्कर ने यह साबित कर दिया है कि भाजपा का कांग्रेस मुक्त का नारा बेमानी है। वस्तुत: भाजपा का जीतना कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है और न ही कांग्रेस का हारना। सबसे बड़ा सवाल ये कि जिस गुजरात मॉडल के नाम पर भाजपा ने पूरा देश जीता, जिस गुजरात में मोदी की डंका बोलता है, वहीं पर कथित रूप से खत्म होती कांग्रेस ने दो-दो हाथ कर लिए। अब भाजपा के लिए कई तरह की चुनौतियां उठ खड़ी हुई हैं तो कई राहतें कांग्रेस को मिल गई हैं।
यह सर्वविदित ही है कि भाजपा आरंभ से मुद्दा आधारित राजनीति करती रही है। जिस मुद्दे पर उसे एक बार सफलता मिलती है, वह दूसरी बार में समाप्त प्राय: हो जाता है और उसे फिर नया मुद्दा तलाशना पड़ता है। पिछले लोकसभा चुनाव तक भाजपा सारे मुद्दे आजमा चुकी थी और उसके पास कोई नया मुद्दा नहीं था। यहां तक कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी विपक्ष के नाते वह नकारा साबित हुई। एक मात्र यही वजह रही कि अन्ना हजारे को जन आंदोलन करना पड़ा। चूंकि उनके पास कोई राजनीतिक विजन नहीं था, इस कारण वे आंदोलन करके अलग हो गए, यह दीगर बात है कि उन्हीं के अनुयायी अरविंद केजरीवाल ने आंदोलन की वजह से कांग्रेस के खिलाफ बने माहौल का लाभ उठा कर दिल्ली विधानसभा पर कब्जा कर लिया। चूंकि उनके पास राष्ट्रीय स्तर पर न तो कोई सांगठनिक ढ़ांचा था और न ही संसाधन, इस कारण भाजपा खड़ी फसल को काटने में कामयाब हो गई। रहा सवाल मुद्दे का तो उसने करोड़ों-अरबों रुपए खर्च कर मोदी को ब्रांड बनाया और उसी ब्रांड पर अभूतपूर्व सफलता भी हासिल की। माहौल ऐसा बनाया गया कि मोदी आगामी बीस साल तक इस देश पर शासन करने को पैदा हुए हैं। यानि कि पार्टी गौण हो गई और व्यक्ति प्रमुख हो गया। बेशक पार्टी की अपनी रीति-नीति है, सिद्धांत हैं, मगर उसके खेवनहार केवल मोदी और उनके हनुमान अमित शाह हैं। इस जोड़ी ने बाद के विधानसभा चुनावों में रणनीतिक जीत हासिल की, मगर बिहार व पंजाब के परिणामों ने इशारा कर दिया था कि मोदी नाम की लहर धीमी पडऩे लगी है। वह अब इतनी धीमी पड़ गई है कि खुद अपने ही गुजरात में मोदी को पसीने आ गए। चुनावी जानकार तो यहां तक कहने लगे हैं कि अगर मोदी धुंआधार रैलियां नहीं करते तो गुजरात हाथ से निकला हुआ ही था। ऐसे में भाजपा को आगामी विधानसभा चुनावों व लोकसभा चुनाव को लेकर चिंताएं पैदा हो गई हैं। परेशानी ये है कि भाजपा के पास मोदी का कोई विकल्प नहीं है। मोदी ही एक मात्र नेता बचे हैं, जिनके नाम पर चुनाव लडऩा मजबूरी है।
गुजरात चुनाव ने मोदी के अहम पर चोट मारी है। जीत के बाद वे जब बोल रहे थे, तो उनमें जीते हुए नेता का भाव नहीं था। जीता हुआ नेता तर्क नहीं करता, जीत तो अपने आप में भाजपा और मोदी के तर्कों का परिणाम है। नए सिरे से तर्कशास्त्र खड़े करके मोदी ने अहंकार और अपने गुजरात से बढ़ते हुए अलगाव को ही व्यक्त किया है। जब आदमी अलगाव में रहता है तो उसे ढंकने के लिए सबसे ज्यादा तर्क गढ़ता है। बहाने बनाता है।
बात अगर कांग्रेस की करें तो यह स्वयं सिद्ध तथ्य है कि वह हारी, मगर उसकी हार में भी जीत का भाव है। वो इसलिए कि उसने मोदी को उनके घर में ही बुरी तरह घेरने में कामयाबी हासिल कर ली।
गुजरात चुनाव का असर आगामी लोकसभा चुनाव तक कितना रहेगा, यह कहना अभी ठीक नहीं, मगर सीधे-सीधे तौर पर यह राजस्थान विधानसभा चुनाव को प्रभावित करेगा। अगर भाजपा गुजरात में प्रचंड बहुमत से जीतती तो राजस्थान भी उसके लिए आसान प्रतीत होता, मगर अब वह गंभीर चिंता से घिर गई है। उसकी एक मात्र वजह ये है कि भाजपा की क्षत्रप मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का आभा मंडल फीका पड़ चुका है। उनके नाम पर चुनाव लडऩा हार को न्यौता देना है। दूसरा ये कि मोदी लहर भी समाप्त हो चुकी है।  हालांकि अब भी उसे मोदी नामक ब्रह्मास्त्र काम में ही लेना होगा, मगर टक्कर कांटे की होगी। उसे एक-एक टिकट बहुत ठोक बजा कर फाइनल करनी होगी। उधर हार के बावजूद कांग्रेस में आये उत्साह से भी उसका पाला पडऩे वाला है। कांग्रेसियों में यह आत्मबल जाग गया है कि जब भाजपा के भगवान मोदी के घर में सेंध मारी जा सकती है तो वसुंधरा के जर्जर हो चुके किले को ढ़हाना कोई कठिन काम नहीं है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

शुक्रवार, अक्टूबर 06, 2017

वसुंधरा को अब समझ आया कि पांच दिन का हफ्ता गलत है

मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे को अपने दूसरे कार्यकाल के आखीर में समझ में आया है कि राज्य सरकार के दफ्तरों में पांच दिन का हफ्ता ठीक नहीं है और छह दिन का हफ्ता किया जाना चाहिए। अजमेर के निकटवर्ती कस्बे में सर्व समाज के प्रतिनिधियों से संवाद करते हुए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने कहा कि सरकारी दफ्तरों में अब जल्द ही सिक्स डे वीक शुरू होगा। उनका कहना था कि मौजूदा समय में पांच दिन का सप्ताह महज चार दिन का रह गया है। हालत ये है कि दफ्तरों में शुक्रवार दोपहर से सोमवार दोपहर तक ज्यादातर कर्मचारी नहीं मिलते। इससे जनता को परेशानी का सामना करना पड़ता है।
यहां उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने अपने पिछले कार्यकाल में सरकार के जाते-जाते कर्मचारियों के वोट हासिल करने के लिए पांच दिन का हफ्ता किया था। सच्चाई ये है कि पांच दिन के सप्ताह का फैसला न तो आम जन की राय ले कर किया गया था और न ही इस तरह की मांग कर्मचारी कर रहे थे। बिना किसी मांग के निर्णय को लागू करने से ही स्पष्ट था कि यह एक राजनीतिक फैसला था, जिसका फायदा तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जल्द ही होने जा रहे विधानसभा चुनाव में उठाना चाहती थीं। उन्हें इल्म था कि कर्मचारियों की नाराजगी की वजह से ही पिछली गहलोत सरकार बेहतरीन काम करने के बावजूद धराशायी हो गई थी, इस कारण कर्मचारियों को खुश करके भारी मतों से जीता जा सकता है। हालांकि दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं पाया। असल बात तो ये है कि जब वसुंधरा ने यह फैसला किया, तब खुद कर्मचारी वर्ग भी अचंभित था, क्योंकि उसकी मांग तो थी नहीं। वह समझ ही नहीं पाया कि यह फैसला अच्छा है या बुरा। हालांकि अधिकतर कर्मचारी सैद्धांतिक रूप से इस फैसले से कोई खास प्रसन्न नहीं हुए, मगर कोई भी कर्मचारी संगठन इसका विरोध नहीं कर पाया।
अब जब कि पांच दिन के सप्ताह की व्यवस्था को काफी साल हो गए हैं, यह स्पष्ट हो गया है कि इससे आम लोगों की परेशानी बढ़ी है। पांच दिन का हफ्ता करने की एवज में प्रतिदिन के काम के घंटे बढ़ाने का कोई लाभ नहीं हुआ है। कर्मचारी वही पुराने ढर्ऱे पर ही दफ्तर आते हैं और शाम को भी जल्द ही बस्ता बांध लेते हैं। कलेक्ट्रेट को छोड़ कर अधिकतर विभागों में वही पुराना ढर्ऱा चल रहा है। कलेक्ट्रेट में जरूर कुछ समय की पाबंदी नजर आती है, क्योंकि वहां पर राजनीतिज्ञों, सामाजिक संगठनों व मीडिया की नजर रहती है। आम जनता के मानस में भी आज तक सुबह दस से पांच बजे का समय ही अंकित है और वह दफ्तरों में इसी दौरान पहुंचती है। कोई इक्का-दुक्का ही होता है, जो कि सुबह साढ़े नौ बजे या शाम पांच के बाद छह बजे के दरम्यान पहुंचता है। यानि कि काम के जो घंटे बढ़ाए गए, उसका तो कोई मतलब ही नहीं निकला। बहुत जल्द ही उच्च अधिकारियों को यह समझ में आ गया था कि छह दिन का हफ्ता ही ठीक था। इस बात को जानते हुए उच्च स्तर पर कवायद शुरू तो हुई और कर्मचारी नेताओं से भी चर्चा की गई, मगर यह सब अंदर ही अंदर चलता रहा। मगर हुआ कुछ नहीं।
बहरहाल, यदि तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो केन्द्र सरकार के दफ्तरों में बेहतर काम हो ही रहा है। पांच दिन डट कर काम होता है और दो दिन मौज-मस्ती। मगर केन्द्र व राज्य सरकार के दफ्तरों के कर्मचारियों का मिजाज अलग है। केन्द्रीय कर्मचारी लंबे अरसे से उसी हिसाब ढले हुए हैं, जबकि राज्य कर्मचारी अपने आपको उस हिसाब से ढाल नहीं पाए। वे दो दिन तो पूरी मौज-मस्ती करते हैं, मगर बाकी पांच दिन डट कर काम नहीं करते। कई कर्मचारी तो ऐसे भी हैं कि लगातार दो दिन तक छुट्टी के कारण बोर हो जाते हैं। दूसरा अहम सवाल ये भी है कि राज्य सरकार के अधीन जो विभाग हैं, उनसे आम लोगों का सीधा वास्ता ज्यादा पड़ता है। इस कारण हफ्ते में दो दिन छुट्टी होने पर परेशानी होती है। यह परेशानी इस कारण भी बढ़ जाती है कि कई कर्मचारी छुट्टी के इन दो दिनों के साथ अन्य किसी सरकारी छुट्टी को मिला कर आगे-पीछे एक-दो दिन की छुट्टी ले लेते हैं और नतीजा ये रहता है कि उनके पास जिस सीट का चार्ज होता है, उसका काम ठप हो जाता है। अन्य कर्मचारी यह कह कर जनता को टरका देते हैं कि इस सीट का कर्मचारी जब आए तो उससे मिल लेना। यानि कि काम की रफ्तार काफी प्रभावित होती है।
खैर, अपने दूसरे कार्यकाल में चुनाव से करीब एक साल पहले वसुंधरा को समझ आ गया है कि सिक्स डे वीक किया जाना चाहिए। देखते हैं, वे ये निर्णय कर लेती हैं और इसकी प्रतिध्वनि क्या होती है?
-तेजवानी गिरधर
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