तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

बुधवार, जुलाई 10, 2019

मीडिया अब भी हमलावर है कांग्रेस पर

हमने पत्रकारिता में देखा है कि आमतौर पर मीडिया व्यवस्था में व्याप्त खामियों को ही टारगेट करता था। सरकार चाहे कांग्रेस व कांग्रेस नीत गठबंधन की या भाजपा नीत गठबंधन की, खबरें सरकार के खिलाफ ही बनती थीं। वह उचित भी था। यहां तक कि यदि विपक्ष कहीं कमजोर होता था तो भी मीडिया लोकतंत्र में चौथे स्तम्भ के नाते अपनी भूमिका अदा करता था। आपको ख्याल होगा कि जेपी आंदोलन व वीपी सिंह की मुहिम में भी मीडिया सरकार के खिलाफ साथ दे रहा था। जब मनमोहन सिंह का दूसरा कार्यकाल अंतिम चरण में था, और भाजपा विपक्ष की भूमिका ठीक से नहीं निभा पाया तो अन्ना आंदोलन को मीडिया ने भरपूर समर्थन दिया। मगर लगता है कि अब सारा परिदृश्य बदल गया है।
नरेन्द्र मोदी के पिछले कार्यकाल में लगभग सारा मीडिया उनका पिछलग्गू हो गया था। विपक्ष में होते हुए भी जब-तब कांग्रेस ही निशाने पर रहती थी। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले और चुनाव प्रचार के दौरान तो मीडिया बाकायदा विपक्ष में बैठी कांग्रेस पर प्रयोजनार्थ हमलावर था ही, नरेन्द्र मोदी को दूसरी बार मिली प्रचंड जीत के बाद भी उसका निशाना कांग्रेस ही है। न तो उसे तब पुरानी मोदी सरकार के कामकाज की फिक्र थी और न ही नई मोदी सरकार की दिशा व दशा की परवाह है। उसे चिंता है तो इस बात की कि कांग्रेस का क्या हो रहा है? राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा क्यों दिया? पहले कहा कि सब नौटंकी है, मान-मुनव्वल के बाद मान जाएंगे, अब जब यह साफ हो गया है कि उन्होंने पक्के तौर पर इस्तीफा दे दिया है तो कहा जा रहा कि वे कायर हैं और कांग्रेस को मझदार में छोड़ रहे हैं। या फिर ये कि अगर पद पर नहीं रहे तो भी रिमोट तो उनके ही हाथ में रहेगा। रहेगा तो रहेगा। कोई क्या कर सकता है? अगर कांग्रेसी अप्रत्यक्ष रूप से कमान उनके ही हाथों में रखना चाहते हैं तो इसमें किसी का क्या लेना-देना होना चाहिए। कुल मिला कर बार-बार राहुल गांधी का पोस्टमार्टम किए जा रहा है। कभी कभी तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह राहुल को हर दम के लिए कुचल देना चाहता है। मोदी तो कांग्रेस मुक्त भारत की बात करते रहे हैं, जबकि टीवी एंकरों का सारा जोर इसी बात है कि कांग्रेस गांधी-नेहरू परिवार मुक्त हो जाए। एक यू ट्यूब चैनल के प्रतिष्ठित एंकर तो कल्पना की पराकाष्ठा पर जा कर इस पर बहस करते दिखाई दिए कि अगर वाकई राहुल ने पूरी तौर से कमान छोड़ दी तो कांग्रेस नष्ट हो जाएगी।
मीडिया के रवैये को देखना हो तो खोल लीजिए न्यूज चैनल। अधिसंख्य टीवी एंकर कांग्रेसी प्रवक्ताओं अथवा कांग्रेसी पक्षधरों के कपड़े ऐसे फाड़ते हैं, मानो घर में लड़ कर आए हों। साफ दिखाई देता है कि वे भाजपा के प्रति सॉफ्ट हैं, जबकि कांग्रेस के प्रति सख्त। कई टीवी एंकर कांग्रेस प्रवक्ताओं पर ऐसे झपटते हैं, मानो भाजपा प्रवक्ताओं की भूमिका में हों। और ढ़ीठ भी इतने हैं कि कांग्रेस प्रवक्ता उन पर बहस के दौरान खुला आरोप लगाते हैं कि आप ही काफी हो, भाजपा वालों को काहे बुलाते हो।
इलैक्ट्रॉनिक मीडिया भाजपा के प्रति कितना नरम है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पर्दे के पीछे भाजपा की भूमिका की चर्चा करने की बजाय कांग्रेस की रणनीति कमजोरी को ज्यादा उभार रहा है। भाजपा के अश्वमेघ यज्ञ के प्रति उसकी स्वीकारोक्ति इतनी है कि उसे बड़ी सहजता से यह कहने में कत्तई संकोच नहीं होता कि भाजपा का अगला निशाना मध्यप्रदेश व राजस्थान की सरकारें होंगी। वस्तुत: इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की यह हालत इस वजह से है कि एक तो इसका संचालन करने वालों में अधिसंख्य मोदी से प्रभावित हैं और दूसरा ये कि चैनल चलाना इतना महंगा है कि बिना सत्ता के आशीर्वाद के उसे चलाया ही नहीं जा सकता। बस संतोष की बात ये है कि हमारे लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है और सत्ता से प्रताडि़त कुछ दिग्गज पत्रकार जरूर अपने-अपने यू ट्यूब चैनल्स के जरिए दूसरा पक्ष भी खुल कर पेश कर पा रहे हैं।
लब्बोलुआब, मीडिया के इस रूप के आज हम गवाह मात्र हैं, कर कुछ नहीं सकते।
-तेजवानी गिरधर
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रविवार, जुलाई 07, 2019

महुआ मोहित्रा के बहाने राहत इंदौरी पर फिर पलटवार

किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है बनाम ये मेरा घर है, मेरी जां, मुफ्त की सराय थोड़ी है
तेजवानी गिरधर
बेशक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दुबारा सत्ता में आने के बाद सबका साथ, सबका विकास नारे के साथ सबका विश्वास जोड़ दिया है, मगर धरातल की सच्चाई ये है कि जिसको विश्वास में लेने की बात कही जा रही है, आज वही तबका मन ही मन भयभीत सा दिखता है। अपने हक-हकूक को लेकर चिंतित है। इसी की प्रतिध्वनि पिछले दिनों लोकसभा में सुनाई दी, जब सपा सांसद आजम खान ने लगभग कातर स्वर में ताजा हालात पर चिंता जाहिर की। तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोहित्रा के भाषण में तो वह और अधिक मुखर नजर आई। उन्होंने राहत इंदौरी के इन दो शेरों को बड़ी शिद्दत के साथ पढ़ कर अपना भाषण समाप्त किया-

जो आज साहिबे मसनद हैं
वो कल नहीं होंगे
किराएदार हैं
जाति मकान थोड़ी है

सभी का खून शामिल है
यहां की मिट्टी में
किसी के बाप का
हिंदुस्तान थोड़ी है

जिस भाव से राहत इंदौरी में ये शेर कहे, ठीक वैसी ही तल्खी महुआ मोहित्रा के अंदाज में नजर आई। जरा दूसरे शेर पर गौर फरमाइये। इसका अर्थ साफ है कि सभी समुदायों का खून इस मिट्टी में है, भारत केवल किसी एक समुदाय का थोड़े ही है।
यह तो हुआ सिक्के का एक पहलु। मगर पलट कर दूसरा पहलु आया तो लगा कि राहत इंदौरी ने जिस हक की बात कर रहे हैं, दूसरा पक्ष उनकी ही शिद्दत से दूसरे समुदाय पर तंज कसने से बाज नहीं आ रहा।
कोई अशोक प्रीतमानी हैं, जिनके नाम से सोशल मीडिया पर दूसरा पहलु वायरल हो रहा है। यह प्रीतमानी ने ही लिखा है या किसी और के लिखे हुए की कॉपी की है, पता नहीं। यहां उसे हूबहू दिया जा रहा है:-
राहत इंदौरी साहब मेरे कुछ पसंदीदा शायरों में से एक शायर हैं। मैं उनकी तहे दिल से इज्जत करता हूं। पर इज्जतदार बने रहना उनकी जिम्मेदारी थी और है। मैंने राहत इन्दौरी के शेर को सुना है, लेकिन इस शेर को पढऩे का उनका अंदाज इतना तल्ख था कि हैरानी हुई और दुख भी। हुआ यूं कि जब उन्होंने मुल्क को अपनी जागीर बनाने की कोशिश की तब मैंने उनके इस रवैये का प्रतिरोध उनके लहजे में कर दिया था। अब दुर्भाग्य यह है कि उसी संदर्भ को ले कर सांसद महुआ मोइत्रा राहत इंदौरी साहब के हवाले से तकरीर पेश कर रही हैं। ऐसे में पेश है मेरी अपनी प्रतिक्रिया-
उनको उन्ही की भाषा में विनम्र जवाब:-

खफा होते हैं हो जाने दो, घर के मेहमान थोड़ी हैं।
जहां भर से लताड़े जा चुके हैं, इनका मान थोड़ी है।

ये कृष्ण-राम की धरती, सजदा करना ही होगा।
मेरा वतन, ये मेरी मां है, लूट का सामान थोड़ी है।

मैं जानता हूं, घर में बन चुके है सैकड़ों भेदी।
जो सिक्कों में बिक जाए वो मेरा ईमान थोड़ी है।

मेरे पुरखों ने सींचा है इसे लहू के कतरे कतरे से।
बहुत बांटा मगर अब बस, खैरात थोड़ी है।

जो रहजन थे, उन्हें हाकिम बना कर उम्र भर पूजा।
मगर अब हम भी सच्चाई से अनजान थोड़ी हैं।

बहुत लूटा फिरंगी तो कभी बाबर के पूतों ने।
ये मेरा घर है, मेरी जां, मुफ्त की सराय थोड़ी है।

आप मेरे पसंदीदा शायर हैं, होंगे पर मुल्क से बढ़ कर थोड़ी हैं।
समझे राहत इंदौरी।
वंदे मातरम .... जय हिंद।
समझा जा सकता है कि भारत पर अपने हक को लेकर दोनों समुदायों के कुछ लोग किस कदर खींचतान करने पर आमादा हैं। बेशक दूसरा पक्ष राहत इंदौरी की तल्खी का प्रत्युत्तर है, मगर यह तो स्पष्ट है कि दोनों ओर विष भरा हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी भले ही सबका विश्वास जीतने की बात कह रहे हों, मगर धरातल पर इस प्रकार का संदेश नहीं पहुंच पाया है। यही चिंता का विषय है। जब तक जमीन पर सदाशयता नहीं होगी, तब तक मोदी की प्रतिबद्धता के कोई मायने नहीं हैं। उससे भी ज्यादा चिंताजनक बात ये है कि उनकी ही विचारधारा के लोगों पर उनका असर नहीं दिखाई पड़ रहा। वे लगातार ऐसी वारदातें कर रहे हैं, बयानबाजी कर रहे हैं, मानों उन्हें किसी बात की परवाह ही नहीं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

गुरुवार, जून 27, 2019

अफसोस कि पत्रकारिता के इतने निकृष्ट दौर का मैं गवाह हूं

गुुरुवार को एबीपी न्यूज चैनल पर चल रही एक बहस देखी। उसे देख कर बहस की एंकर रुबिका पर तो दया आई, मगर खुद आत्मग्लानी से भर गया। पत्रकारिता का इतना मर्यादाविहीन और निकृष्ट स्वरूप देख कर सहसा विश्वास ही नहीं हुआ कि एक प्रतिष्ठित न्यूज चैनल पर अनुभवहीन युवति को कैसे एंकर बना दिया गया है। अपने आप से घृणा होने लगी कि क्यों कर मैने इस पत्रकार जमात में अपनी जिंदगी बर्बाद कर ली। 
असल में बहस इस बात पर हो रही थी कि जेएनयू के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर पुलिस ने देशद्रोह के मामले में चार्जशीट पेश की है। ज्ञातव्य है कि तकरीबन तीन साल बाद यह चार्जशीट पेश की गई है। अब अदालत में बाकायदा मुकदमा चलेगा और वही तय करेगी कि कन्हैया कुमार देशद्रोही है या नहीं। पूरी बहस के दौरान एंकर रुबिका इस तरह चिल्ला चिल्ला कर टिप्पणियां कर रही थीं, मानो कन्हैया को देशद्रोही करार दे दिया गया है। अपने स्टैंड के पक्ष में वे उत्तेजित हो कर लगातार कुतर्क दे रही थीं।  उनका तर्क था कि चार्जशीट को बनाने में क्यों कि तीन साल लगे हैं, इसका मतलब ये है कि उसमें जो चार्ज लगाए गए हैं, वे सही हैं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि एक देशद्रोही कैसे हीरो बन गया और सीपीआई ने उसे लोकसभा चुनाव का टिकट तक दे दिया। उन्होंने इस बात पर बहुत अफसोस जताया कि कोई देशद्रोही कैसे चुनाव लड़ सकता है? कन्हैया कुमार का पक्ष ले रहे एक राजनीतिक समीक्षक कह रहे थे कि किसी के खिलाफ चार्जशीट पेश होने पर आप उसे कैसे देशद्रोही कह सकती हैं, मगर रुबिका उनकी एक नहीं सुन रही थीं। उलटे उन्हें कन्हैया कुमार का अंधभक्त कह कर उन पर पिल पड़ीं। उनकी बॉडी लैंग्वेज ऐसी थी मानो वे ही सबसे बड़ी देशभक्त है और उनका जोर चले तो कन्हैया का पक्ष ले रहे पेनलिस्ट के कपड़े फाड़ दें।
दूसरी ओर जाहिर तौर पर कन्हैया कुमार के खिलाफ वकालत कर रही एक महिला वकील व भाजपा के प्रवक्ता रुबिका के सुर में सुर मिला रहे थे। मगर बहस में बुलाए गए जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार अभय दुबे की रुबिका ने जो हालत की, उसे देख कर बहुत अफसोस हुआ कि वे क्यों कर एक नौसीखिया एंकर के सामने पैनलिस्ट बन कर गए। क्यों अपनी इज्जत का फलूदा बनवाने वहां पहुंचे? वे स्पष्ट रूप से कह रहे थे कि इस बहस को आप कोर्ट न बनाइये, यहां न तो कोई जज बैठा है और न ही कोई सबूत पेश किए जा रहे हैं। आप केवल चार्जशीट के आधार पर किसी को द्रेशद्रोही नहीं कह सकते, यह काम कोर्ट को करने दीजिए। यह सुन कर रुबिका को बहुत बुरा लगा कि वे जिस एजेंडे को चला रही हैं, उसी पर कोई कैसे सवाल खड़ा कर सकता है। वे और ज्यादा भिनक गईं। उन्होंने दुबे जी को बोलने ही नहीं दिया। सवाल ये भी कि एंकर केवल एंकर का ही धर्म क्यों नहीं पालती! पेनलिस्ट को अपनी अपनी राय देने दीजिए, दर्शक खुद फैसला कर लेगा। एकंर खुद ही पार्टी बन रही है, कमाल है।
मुझे तो पत्रकारिता की जो सीख दी गई है उसमें ये सिखाया गया है कि अगर कोई चोरी के आरोप में पकडा जाए तो उसे चोर न लिखें या कोई हत्या के आरोप में पकडा जाए तो उसे हत्यारा पकडा गया ये न लिखें. मगर आज के पत्रकारों को पत्रकारिता के मूलभूत नियम तक का ज्ञान नहीं है, उलटे वे चीख चीख कर पत्रकारिता के कायदों को तार तार कर रहे हैं।
इस बहस को देख कर मन वितृष्णा से भर गया कि आज मैं पत्रकारिता के कैसे विकृत स्वरूप का गवाह बन कर जिंदा हूं। हमने तो पत्रकारिता जी ली, जैसी भी जी, कोई बहुत बड़े झंडे नहीं गाड़े, मगर कभी मर्यादा व निष्पक्षता का दामन नहीं छोड़ा। आज दो-दो कौड़ी के पत्रकारों के हाथ में पत्रकारिता की कमान आ गई है।
सच तो ये है कि वर्तमान में पत्रकारिता का जो दौर चल रहा है, उसमें कोई टिप्पणी ही नहीं करनी चाहिए। कुछ कहना ही नहीं चाहिए। विकृत पत्रकारिता का राक्षस इतना बड़ा व शक्तिशाली हो गया है कि मेरे जैसे पत्रकार को जुबान सिल ही लेनी चाहिए। अपने आपको बहुत रोका, मगर नहीं रोक पाया। मेरी इस टिप्पणी से किसी का मन दुख रहा हो तो मैं क्षमाप्रार्थी हूं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

रविवार, जून 16, 2019

इन्हीं महारानी ने कभी बाबोसा को भी हाशिये पर खड़ा कर दिया था

ऐसी जानकारी है कि रविवार, 16 जनवरी को जयपुर में हुई प्रदेश भाजपा कार्यसमिति की बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की भूमिका अन्य नेताओं की तुलना में कमतर नजर आई। हालांकि वे अब राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दी गई हैं, मगर ऐसा प्रतीत हुआ, मानो वे हाशिये की ओर धकेली जा रही हों। उनमें वो जोश व जज्बा नजर नहीं आया, जैसा कि मुख्यमंत्री पद पर रहते देखा जाता था।
बड़े-बजुर्ग ठीक ही कह गए हैं कि इतिहास अपने आप को दोहराता है। वसुंधरा की ताजा हालत कहीं न कहीं इस कहावत से मेल खाती है। ये वही वसुंधरा हैं, जो राजस्थान में सिंहनी की भूमिका में थीं। उनके इशारे के बिना प्रदेश भाजपा में पत्ता भी नहीं हिलता था। कुछ ऐसा ही राजस्थान का एक ही सिंह, भैरोंसिंह भैरोंसिंह का भी रुतबा रहा है। वे जब स्वयं उपराष्ट्रपति बन कर दिल्ली गए तो प्रदेश की चाबी वसुंधरा को सौंप गए, मगर वे जब रिटायर हो कर लौटे तो उनकी पूरी जमीन वसुंधरा ने खिसका ली थी। राजस्थान का यह सिंह अपने ही प्रदेश में बेगाना सा हो गया। कुछ माह तो घर से निकले ही नहीं। और जब हिम्मत करके बाहर निकले तो उनके कदमों में लौटने वाले भाजपाई ही उन्हें अछूत समझ कर उनसे दूर बने रहे। वसुंधरा का भाजपाइयों में इतना खौफ था कि वे जहां भी जाते, इक्का-दुक्का को छोड़ कर अधिसंख्यक भाजपाई उनके पास फटकते तक नहीं थे। वसुंधरा का आभा मंडल इतना प्रखर था कि उसके आगे संघ लॉबी के नेताओं की रोशनी टिमटिमाती थी। उन्होंने हरिशंकर भाभड़ा सरीखे अनेक नेताओं को खंडहर बता कर टांड पर रख दिया था। राजस्थान में संघ उनके साथ समझौता करके ही काम चला रहा था। एक बार टकराव बढ़ा तो वसुंधरा ने नई पार्टी ही बना लेने की तैयारी कर ली, नतीजतन हाईकमान को झुकना पड़ा।
जब 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का दौर आया तो भी वे झुकने का तैयार नहीं हुईं। पूरे पांच साल खींचतान में ही निकले। विधानसभा चुनाव आए तो एक नारा आया कि मोदी से तेरे से बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं। बताया जाता है कि यह नारा संघ ने  ही दिया था। नतीजा सामने है। आज जब ये कहा जाता है कि भाजपा वसुंधरा के चेहरे के कारण हारी तो इसे समझना चाहिए कि इस चेहरे को बदनाम करने का काम भी भाजपाइयों ने ही किया। यदि ये कहा जाए कि मोदी के कहने पर संघ ने ही वसुंधरा को नकारा करार दिया तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी, जबकि वे इतनी भी बुरी मुख्यमंत्री नहीं थीं। वस्तुत: मोदी जिस मिशन पर लगे थे, उसमें उनको एक भी क्षत्रप बर्दाश्त नहीं था। तो वसुंधरा को निपटा कर ही दम लिया।
जाहिर तौर पर सिंहनी वर्तमान में बहुत कसमसा रहीं होगी, मगर उनके मन में क्या चल रहा है, किसी को जानकारी नहीं है। जानकार मानते हैं कि अब भी वसुंधरा में दम-खम कम नहीं हुआ है, मगर मोदी का कद इतना बड़ा हो चुका है कि वसुंधरा का फिर से उठना नामुमकिन ही लगता है। वसुंधरा की तो बिसात ही क्या है, भाजपा के सारे के सारे दिग्गज नेता मोदी शरणम गच्छामी हो गए हैं। सच तो ये है कि मोदी ने भाजपा को हाईजैक कर लिया है। भाजपा कहने भर को भाजपा है, मगर वह अब अमित शाह के सहयोग से तानाशाह मोदी की सेना में तब्दील हो चुकी है। अगर वसुंधरा हथियार डाल देती हैं तो हद से हद किसी राज्य की राज्यपाल बनाई जा सकती हैं, मगर शायद उनकी इच्छा अब अपने बेटे दुष्यंत सिंह को ढ़ंग की जगह दिलाना होगी, मगर मोदी के रहते ऐसा मुश्किल ही है।
खैर। हालांकि वसुंधरा राजे की स्थिति अभी इतनी खराब नहीं हुई है, उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना कर इज्जत बख्शी गई है। उन्होंने शेखावत की जो हालत की थी, उससे से तो वे बेहतर स्थिति में ही हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से उनकी जो नाइत्तफाकी है, उसे तो देखते हुए यही लगता है कि वे भी उसी संग्रहालय में रख दी जाएंगी, जहां भाजपा के शीर्ष पुरुष लालकृष्ण आडवाणी व मुरली मनोहर जोशी को रखा गया है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

शनिवार, अप्रैल 20, 2019

जीत के लिए भाजपा को नैतिकता ताक पर रखने की सलाह

गिरधर तेजवानी
आज जब कि देश लोकसभा चुनाव की दहलीज में प्रवेश कर चुका है तो भाजपा एक बार फिर सत्ता हासिल करने के लिए नरेन्द्र मोदी ब्रांड के ही भरोसे है। जो किसी जमाने में इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा के जुमले पर तंज कसते हुए व्यक्तिवाद पर हमला करते थे, वे ही आज व्यक्तिवाद की राह पर चल चुके हैं। खुद मोदी भी मोदी है तो मुमकिन है का नारा देकर भाजपा की नैया पार लगाने की भरसक कोशिश में हैं। हम लाख दुहाई दें कि हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं, मगर भाजपा को भी अब समझ आ गया है कि नीतियां अपनी जगह, मगर जीत का मंत्र तो ब्रांडिंग में ही निहित है, चाहे अनीति पर ही क्यों न चलना पड़े।
इसी सिलसिले में एक पोस्ट पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर धड़ल्ले से चल रही है, जिसमें साफ तौर पर मोदी से पहले और मोदी के बाद की भाजपा का विश्लेषण करते हुए सलाह दी जा रही है कि सत्ता के लिए नैतिकता ताक पर रखने से गुरेज नहीं करना चाहिए।
इस पोस्ट में बताया गया है कि जब तक भाजपा अटल बिहारी वाजपेयी की विचारधारा पर चलती रही, मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम पर नैतिकता व शुचिता को अपनाए रही, तब तक कभी भी पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर सकी। करोड़ों के बाद भी कांग्रेस बेशर्मी से अपने लोगों का बचाव करती रही, वहीं पार्टी फंड के लिए मात्र एक लाख रुपये ले लेने पर भाजपा ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को हटाने में तनिक भी विलंब नहीं किया, परन्तु चुनावों में नतीजा, वही ढ़ाक के तीन पात। झूठे ताबूत घोटाला के आरोप पर तत्कालीन रक्षामंत्री जार्ज फर्नांडिस का इस्तीफा, परन्तु चुनावों में नतीजा  वही ढाक के तीन पात। कर्नाटक में भ्रष्टाचार के आरोप लगते ही येदियुरप्पा को भाजपा ने निष्कासित करने में कोई विलंब नहीं किया, परन्तु चुनावों में नतीजा, वही ढाक के तीन पात।
फिर  होता है नरेन्द्र मोदी का पदार्पण। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नक्शे कदम पर चलने वाली भाजपा को वे कर्मयोगी कृष्ण की राह पर ले आते हैं। कृष्ण अधर्मी को मारने में किसी भी प्रकार की गलती नहीं करते हैं। छल हो तो छल से, कपट हो तो कपट से, अनीति हो तो अनीति से, अधर्मी को नष्ट करना ही उनका ध्येय होता है। कुल मिला कर सार यह है कि अभी देश दुश्मनों से घिरा हुआ है, नाना प्रकार के षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। इसलिए अभी हम नैतिकता को अपने कंधे पर ढोकर नहीं चल सकते हैं। नैतिकता को रखिये ताक पर। यदि देश को बचाना चाहते हैं, तो सत्ता को अपने पास ही रखना होगा। वो चाहे किसी भी प्रकार से हो, साम दाम दंड भेद किसी भी प्रकार से। इसलिए भाजपा के कार्यकर्ताओं को चाहिए कि कर्ण का अंत करते समय कर्ण के विलापों पर ध्यान न दें। सिर्फ ये देखें कि अभिमन्यु की हत्या के समय उनकी नैतिकता कहां चली गई थी। आज राजनीतिक गलियारा जिस तरह से संविधान की बात कर रही है, तो लग रहा है जैसे हम पुन: महाभारत युग में आ गए हैं। विश्वास रखो, महाभारत का अर्जुन नहीं चूका था, आज का अर्जुन भी नहीं चूकेगा। चुनावी जंग में अमित शाह जो कुछ भी जीत के लिए पार्टी के लिए कर रहे हैं, वह सब उचित है। वाजपेयी की तरह एक वोट का जुगाड़ न करके आत्मसमर्पण कर देना क्या एक राजनीतिक चतुराई थी? अटलजी ने अपनी व्यक्तिगत नैतिकता के चलते एक वोट से अपनी सरकार गिरा डाली और पूरे देश को चोर लुटेरों के हवाले कर दिया। राजनीतिक गलियारे में ऐसा विपक्ष नहीं है, जिसके साथ नैतिक-नैतिक खेल खेला जाए, सीधा धोबी पछाड़ आवश्यक है।
सिक्के का दूसरा पहलु ये है कि जिस हिंदूवाद के नाम पर भाजपा सत्ता पर काबिज हुई, पांच साल में उसी का पोषण न कर पाने पर भी विश्लेषकों की नजर है।
एक पोस्ट में लिखा है कि देश के लोगों ने मोदी-शाह के नेतृत्व में भाजपा के राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को अपने असली रूप में देख लिया है। जब तक पूर्ण बहुमत के साथ यह पार्टी सत्ता में नहीं आई थी, तब तक एक कौतूहल था कि पता नहीं, ये क्या करेंगे, जब ये अपने दम पर सत्ता में आएंगे। वाजपेयी जी के नेतृत्व में भाजपा पहली बार सत्ता में आयी तो जरूर थी, लेकिन बैसाखियों के सहारे। ऊपर से अटल जी का अपेक्षाकृत उदारवादी चेहरा। तो...समर्थकों में एक कसक सी रह गई कि काश, पार्टी कभी अपने दम पर सत्ता में आ पाती। लो जी, वह भी हो गया। मोदी ने इतिहास रच दिया।  कहा गया कि पृथ्वीराज चौहान के पश्चात 900 वर्षों के इंतजार के बाद कोई चक्रवत्र्ती हिन्दू सम्राट दिल्ली के सिंहासन पर बैठा है। और फिर सिर्फ  उन्मादी ही नहीं, प्रायोजित भीड़ के द्वारा अखलाक की निर्मम हत्या के साथ इस हिंदुत्व का पहला परिचय मिला। गौमाता के रक्षकों के उत्पात से देश दहलने लगा। दूसरी ओर हालत ये है कि कॉमन सिविल कोड, धारा 370 और राम मंदिर के एजेंडे को लेकर भाजपा लगातार 32 वर्षों से चल रही थी, उस पर कुछ भी नहीं हुआ। ऐसे में कट्टर हिंदूवादियों की यह चिंता जायज है कि यदि आज अपने बूते पर भाजपा सत्ता में होने के बाद भी कुछ नहीं कर पाई तो  ढ़लती मोदी लहर के दौर में क्या हो पाएगा? कदाचित इसी कारण भाजपा आज फिर रोजगार, गरीबी, महंगाई जैसे मुद्दों को साइड में रख कर, नोटबंदी व जीएसटी जैसे बडे कदमों की सफलता के नाम पर वोट मांगने की बजाय पाकिस्तान को गाली दे कर राष्ट्रवाद के नाम पर वोट हासिल करने की जुगत में लग गई है।

मंगलवार, मार्च 05, 2019

सर्जिकल स्ट्राइक टू पर सवार हो कर ताजपोशी चाहते हैं मोदी

-तेजवानी गिरधर-
एक अनुमान पहले से था कि नोटबंदी व जीएसटी की नाकामी और चुनावी वादे जुमले साबित होने के बाद दुबारा सत्ता पर काबिज होने के लिए मोदी कोई न कोई खेल खेलेंगे। कुछ को आशंका इस बात की भी थी कि इसके लिए वे पाकिस्तान से छेडख़ानी भी कर सकते हैं। हालांकि पाकिस्तान के साथ मौजूदा टकराव को मोदी की सोची-समझी रणनीति कहने का न तो पर्याप्त आधार है और न ही ऐसा कहना उचित है, मगर संयोग से चुनाव से चंद माह पहले हुए घटनाक्रम की आड़ में मोदी को दुबारा प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाने के जतन सरेआम किए जा रहे हैं, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
मौजूदा संकट के वक्त विपक्ष की सदाशयता या मजबूरी ही है कि वह ऐसे मौके पर सरकार का साथ दे रहा है, मगर मोदी भक्तों ने इस अवसर का भरपूर फायदा उठाने की ठान ही ली है। एक ओर पाक के आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किए जाने पर जहां विपक्ष वायु सेना को शाबाशी दे रहा है तो वहीं   भाजपा मोदी के महिमामंडन में जुट गई है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने तो साफ कहा है कि आतंकी ठिकानों को नष्ट करना यह साबित करता है कि नरेन्द्र मोदी के मजबूत और निर्णायक नेतृत्व में भारत सुरक्षित है।
पाक से टकराव के दौर में आरंभ हुए चुनाव प्रचार में इस्तेमाल किया जा रहा नारा 'मोदी है तो मुमकिन हैÓ इस बात का स्पष्ट संकेत देता है कि मोदी को फिर सत्तारूढ़ करने की खातिर उन्हें महान बनाए जाने की मुहिम छेड़ दी गई है। अमित शाह ने बिना मौका गंवाए यह ऐलान कर दिया कि पाकिस्तान को जो सरकार जवाब दे सकती है, उसी आधार पर 2019 का चुनाव लड़ा जाएगा।
एक पोस्ट देखिए:-
रात भर हमले की मोनिटरिंग, सुबह केबिनेट की मीटिंग, फिर राष्ट्रपति भवन में कार्यक्रम, फिर दिल्ली से उड़ कर चुरू में चुनावी रैली, फिर तुरन्त दिल्ली रवाना होकर मेट्रो में बेठ कर इस्कॉन मन्दिर में श्रीमद भगवद गीता का विमोचन....कब आराम, कब नाश्ता, कब लंच किया होगा? ये मानव नहीं, महामानव है। सेल्यूट मोदी जी।
मोदी को महान बताए जाने की पराकाष्ठा देखिए:-सिकंदर पुराना हो गया, अबसे जो जीता, वही नरेंदर है।
मोदी भक्ति की एक नमूना ये भी देखिए:-मोदी जी मेरे 15 लाख ब्याज सहित पाकिस्तान पर गिराए गए बमों के खर्च में एडजस्ट करके मेरा खाता जीरो कर देना। मेरा और आपका अब तक का हिसाब शून्य हो जायेगा।
एक और पोस्ट:-मैसेज फॉर राहुल गांधी
जब तू सो रहा था
चौकीदार पाकिस्तान को धो रहा था
एक और बानगी:-मोदी को अटल बिहारी वाजपेयी समझने की भूल मत करना। क्यूं की ये टेढ़ी ऊंगली से घी ही नहीं निकालता, डब्बा ही गरम कर देता है।
इस पोस्ट में तो सरासर चुनावी लाभ लेने का प्रयास नजर आता है:-
इसका बटन आपने ही 2014 में दबाया था।
2019 में भी वही बटन दबाना मत भूलना।
क्या इसे भारतीय वायु सेना की शौर्यगाथा का राजनीतिकरण करने का प्रयास नहीं माना जाना चाहिए। चुनाव तक अगर यही मुद्दा प्रमुख रूप से चर्चा में रहता है तो निश्चित तौर पर बीजेपी इसका फायदा उठाने में कामयाब हो सकती है। सोशल मीडिया पर चल रही यह पोस्ट कि सिर्फ आतंकी नहीं मरे हैं, कुछ की प्रधानमंत्री बनने की उम्मीदें भी मर गई हैं, यह साफ इंगित करता है कि इस मौके का भाजपा भरपूर फायदा उठाने जा रही है। इसी कड़ी में यह पोस्ट भी आपकी नजर आई होगी-
केवल मोदी को महान ही नहीं बताया जा रहा, अपितु विरोधियों को पाक परस्त बता कर कड़े तंज भी कसे जा रहे हैं। आतंकियों से पहले उनसे निपटने की अपीलें की जा रही हैं। ये पोस्टें देखिए:-
भाजपा को वोट देना मतलब सेना को एक बुलेट प्रूफ जैकेट देना। कांग्रेस को वोट देना मतलब आतंकवादी को ए के-47 देना। फैसला आपका।
गद्दारों की छाती पर एक चोट मैं भी दूंगा। आने वाले चुनाव में फिर से मोदी जी को वोट दूंगा।
साला, आज ऐसा फील हो रहा है, जैसे  2019 का लोकसभा चुनाव, कांग्रेस एडवांस में हार गई।
मोदीजी का सीना अब इंचों में नहीं, बीघा में नापा जाएगा।
बदला-बदला बोलने वाले कांग्रेसियों की एक भी पोस्ट नहीं आ रही। अरे भाई ये हमला पाकिस्तान पर हुआ है तुम पर नहीं।
जाहिर तौर पर विपक्ष को लगने लगा कि मोदी ताजा हालात का चुनाव में फायदा उठाने जा रहे हैं तो उसका काउंटर देने के लिए इस किस्म की पोस्ट सामने आई:-
इससे पहले की पायलट की वापसी का पूरा श्रेय एक व्यक्ति को दिया जाए, भक्त मीडिया 70 साल के भारत के शौर्य को शून्य करके आप को उस काल में ले जाये कि जो हो रहा है, पहली बार हो रहा है, आपकी जानकारी के लिये बता दूं कि 1971 में हमारे पायलट को पाकिस्तान ने भारत के दबाब में छोड़ा, तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं और 1999 में पायलट नचिकेता को छोड़ा, तब प्रधानमंत्री पंडित अटल बिहारी वाजपेयी थे।
एक ओर जहां पहली सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगे जाने का मुद्दे पर सत्ता पक्ष लगातार विपक्ष को उलाहने देता जा रहा है, वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो बीबीसी के हवाले वे बालाकोट में तीन-चार सौ आतंकियों के मारे पर संदेह जाहिर करने लगे हैं।
कुल मिला कर एक ओर जहां विपक्ष को साथ लेकर सरकार पाक से मुकाबला कर रही है, वहीं देशभर में बयान युद्ध छिड़ा हुआ है। मामले का राजीतिकरण नहीं किए जाने की लाख दुहाइयां दी जाएं, मगर सच ये है कि सारे के सारे देशभक्त आपस में तलवारें भांज रहे हैं। इसका असर स्वाभाविक तौर पर आगामी चुनाव में पड़ता दिखाई दे रहा है।

गुरुवार, फ़रवरी 14, 2019

क्या संघ तिवाड़ी को कांग्रेस में जाने से रोकेगा?

राजनीतिक गलियारों में एक सवाल गूंज रहा है कि क्या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भारत वाहिनी पार्टी के अध्यक्ष घनश्याम तिवाड़ी को कांग्रेस में जाने से रोकेगा? यह सवाल इस कारण उठा है कि प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद तिवाड़ी तीन बार मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मुलाकात कर चुके हैं  और कयास ये लगाए जा रहे हैं कि वे कांग्रेस में जा सकते हैं।
ज्ञातव्य है कि तिवाड़ी ने विधानसभा चुनावों से पहले भारत वाहिनी पार्टी का गठन किया था। इससे पहले वे भाजपा में थे। पार्टी ने विधानसभा चुनावों में 62 सीटों पर प्रत्याशी खड़े किए थे, जिसमें से एक भी प्रत्याशी जीतने में सफल नहीं हुआ। यहां तक कि खुद घनश्याम तिवाड़ी भी अपनी सांगानेर सीट से बुरी तरह से हार कर अपनी जमानत जब्त करा बैठे थे। ऐसे में आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर उन्हें कोई तो रुख अख्तियार करना ही होगा, अन्यथा वे व उनकी पार्टी राजनीति में अप्रासंगिक हो जाएगी। इसी सिलसिले में उन्होंने ऐलान किया है कि उनकी पार्टी लोकसभा चुनाव लडऩे की इच्छुक नहीं है, क्योंकि प्रदेश में दो ही दल भाजपा और कांग्रेस की स्वीकारोक्ति है और उनकी पार्टी इन्हीं में से किसी एक में अपना भविष्य देख रही है। किस पार्टी में शामिल होना है, इसको लेकर पार्टी के प्रमुख नेताओं की बैठक के बाद मार्च के पहले ही हफ्ते में एलान कर देंगे कि वे किसके साथ जा रहे हैं।
चूंकि उन्होंने भाजपा छोड़ कर नई पार्टी बनाई थी, इस कारण यह सवाल प्रासंगिक हो गया कि उनका प्रयोग फेल होने के बाद क्या वे भाजपा में लौट सकते हैं, इस पर वे कहते हैं कि उन्हें बीजेपी से निकाला नहीं गया था, बल्कि उन्होंने खुद बीजेपी छोड़ी थी। इसके अतिरिक्त उनकी दो ही मांग थी, एक तो सवर्ण आरक्षण और दूसरा वसुंधरा सरकार को हटाना। दोनों ही मांगें पूरी हो चुकी हैं, ऐसे में अब भारतीय जनता पार्टी क्या सोचती है, प्रस्ताव भेजती है तो उस पर विचार किया जाएगा।
उनके इस बयान से साफ है कि भले ही वे कांग्रेस में शामिल होने के मन से गहलोत से मुलाकातें कर रहे हों, मगर भाजपा में जाने का रास्ता भी बंद नहीं करना चाहते। वैचारिक रूप से भाजपा उनके लिए अधिक अनुकूल है। वे संघ पृष्ठभूमि से हैं और उन्होंने जब नई पार्टी बनाई, तब भी अधिसंख्य समर्थक या तो संघ से जुड़े हुए थे या फिर वसुंधरा के विरोधी। अब जब कि वसुंधरा को राष्ट्रीय राजनीति में ले कर राजस्थान में उनकी भूमिका को सीमित कर दिया गया है, संभावना इस बात की अधिक है कि संघ उन पर भाजपा में लौटने का दबाव बनाए। बस तिवाड़ी को देखना ये है कि उनको कितने सम्मान के साथ वापस लिया जाता है।
जहां तक उनके कांग्रेस में जाने का सवाल है तो कांग्रेस के लिए यह एक उपलब्धि होगी कि संघ विचारधारा से जुड़ी पार्टी उसके साथ आ रही है, मगर सवाल ये है कि ऐसा होने पर क्या पूरी की पूरी पार्टी कांग्रेस में आएगी? तिवाड़ी को भले ही राजनीतिक मजबूरी के कारण कांग्रेस में जाना ठीक लग रहा हो, मगर उनके संघ विचारधारा के कार्यकर्ता भी उनके साथ कांग्रेस में आएंगे, इसमें तनिक संशय हो सकता है। इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि विधानसभा चुनाव और उसके बाद जयपुर महापौर का उपचुनाव हार चुकी भाजपा में भारत वाहिनी पार्टी से जुड़े चार पदाधिकारियों की घर वापसी हो गई। ये चारों प्रत्याशी इससे पहले भाजपा से ही जुड़े थे।
बहरहाल, संघ की खासियत ये रही है कि वह मौलिक रूप से संघ से जुड़े राजनीतिक कार्यकर्ता के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर रखती है, मगर यदि उसे जच जाए कि उसे किल करना है तो उसे भी पूरी निष्ठुरता के साथ अंजाम देता है, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण है लाल कृष्ण आडवाणी। देखते हैं कि तिवाड़ी के कांग्रेस में जाने के कयासों के बीच संघ क्या खेल खेलता है।
-तेजवानी गिरधर
774206700