तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

रविवार, मार्च 10, 2013

वसुंधरा से ज्यादा अपनों की बेवफाई से दुखी हैं तिवाड़ी

बुरी तरह से रूठे भाजपा नेता घनश्याम तिवाड़ी ने देव दर्शन यात्रा की शुरुआत के दौरान जिस प्रकार नाम लिए बिना अपनी ही पार्टी के कई नेताओं पर निशाना साधा, उससे साफ है कि वे नई प्रदेश अध्यक्ष श्रीमती वसुंधरा राजे से तो पीडि़त हैं ही, वसुंधरा के खिलाफ बिगुल बजाने वालों के साथ छोड़ जाने से भी दुखी हैं।
वसुंधरा का नाम लिए बिना उन पर हमला बोलते हुए जब वे बोले कि राजस्थान को चरागाह समझ रखा है तो उनका इशारा साफ था कि उन जैसे अनेक स्थानीय नेता तो बर्फ में लगे पड़े हैं और बाहर से आर्इं वसुंधरा उनकी छाती पर मूंग दल रही हैं। वसुंधरा और पार्टी हाईकमान की बेरुखी को वे कुछ इन शब्दों में बयान कर गए-लोग कहते हैं कि घनश्यामजी देव दर्शन यात्रा क्यों कर रहे हैं? घनश्यामजी किसके पास जाएं? सबने कानों में रुई भर रखी है। न कोई दिल्ली में सुनता है, न यहां। सारी दुनिया बोलती है उस बात को भी भी नहीं सुनते।
अब तक वसुंधरा राजे खिलाफ मुहिम चलाने वाले साथियों पर निशाना साधते हुए वे बोले कि जिन लोगों ने गंगा जल हाथ में लेकर न्याय के लिए संघर्ष करने की बात कही थी, वे भी छोटे से पद के लिए छोड़ कर चले गए। उनका सीधा-सीधा इशारा वसुंधरा राजे की कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष बने अरुण चतुर्वेदी व औंकार सिंह लखावत और नेता प्रतिपक्ष बने गुलाब चंद कटारिया की ओर था। इसकी पुष्टि उनके इस बयान से होती है कि मेरे पास भी बहुत प्रलोभन आए हैं, पारिवारिक रूप से भी आए हैं, अरे यार क्यों लड़ते हो, आपके बेटे को भी एक टिकट दे देंगे। आप राष्ट्रीय में बन जाओ, उसे प्रदेश में बना दो। हमारी पारिवारिक लड़ाई नहीं है, हजारों कार्यकर्ताओं की लड़ाई है, जो सत्य के लिए लड़ रहे हैं। वे कार्यकर्ताओं की हमदर्दी भुनाने के लिए यह भी बोले कि जो बेईमान, चापलूस, भ्रष्ट हैं वो ऊपर हैं, जो कार्यकर्ता हैं वो नीचे हैं।
खुद को मानते हैं संस्कृति का पोषक
तिवाड़ी ने खुद को और नेताओं से ऊपर बैठाते हुए कहा कि हम विधायक दल की बैठक में बैठे थे, हमें सूचना दी गई कि राज्यपाल विधानसभा में अंग्रेजी में भाषण करेगी, अपने को विरोध नहीं करना है। तब मैंने उसी समय खड़े होकर कहा था, कि 199 एमएलए भी पक्ष लेंगे तो तिवाड़ी हिंदी में भाषण कराएगा। समर्थन करेंगे तो भी तिवाड़ी हिंदी में भाषण की मांग करेगा। हम भाजपा में हैं, भाजपा में रहेंगे लेकिन कोई हिंदी और संस्कृति को समाप्त करने का कोई प्रयास करेगा, वह बर्दाश्त नहीं होगा। तब मैंने कहा था कि जिसको न निज देश का अभिमान है वह नर नहीं निरा पशु समान। अंग्रेजी पढ़ के सब गुण होत प्रवीण, निज भाषा ज्ञान के रहत हीन के हीन। हीन बनकर नहीं रहना चाहते। अर्थात भाजपा में अकेले वे ही बचे हैं, जिन्हें अपनी संस्कृति की पीड़ा है।
कांग्रेस के बराबर ला खड़ा किया
उन्होंने अपने उद्बोधन में भाजपा को कांग्रेस के बराबर ला खड़ा किया। शुचिता और सिद्धांतों की राजनीति करने वाली मौजूदा भाजपा पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि कोई कहे दाल में काला है, मैं तो कहता हूं इस राजनीति में तो पूरी दाल ही काली है। किसी भी पार्टी में जाकर देख लीजिए। जो बेईमान, चापलूस, भ्रष्ट हैं वो ऊपर हैं, जो कार्यकर्ता हैं वो नीचे हैं। जातिवाद का जहर फैलाया जा रहा है। यह सब क्यों किया जा रहा है?
एक पाटी के नेता ने कहा कि आप राजस्थान में कैसे हो, वो बोले एक घर राजस्थान में है, एक हिमाचल में। दोनों पार्टियों में यही स्थिति है। आजकल दोनों पार्टियों के नेताओं से पूछते हैं कि कितनी सीटें आएंगी तो कहते हैं 215 सीटें। 200 तो राजस्थान की है, बाकी प्रांतों से आने वाले 15 तो लाएंगे, यह स्थिति हो रही है राजस्थान की।
तब खुद भी तो चर रहे थे
उनके इस बयान पर खासा चर्चा हो रही है कि देव दर्शन में सबसे पहले जाकर भगवान के यहां अर्जी लगाऊंगा कि हे भगवान, हिंदुस्तान की राजनीति में जितने भी भ्रष्ट नेता हैं उनकी जमानत जब्त करा दे, यह प्रार्थना पत्र दूंगा। भगवान को ही नहीं उनके दर्शन करने आने वाले भक्तों से भी कहूंगा कि राजस्थान को बचाओ। राजस्थान को चारागाह समझ रखा है। सवाल उठता है कि जब वे राजस्थान को चरागाह समझने वालों के साथ चर रहे थे, तब उन्हें यह ख्याल क्यों नहीं आया कि राजस्थान लुटा जा रहा है?
-तेजवानी गिरधर

मंगलवार, मार्च 05, 2013

चतुर्वेदी लायक ही नहीं थे अध्यक्ष पद के

arun chaturvedi 3राजस्थान प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वसुंधरा राजे की कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष का पद स्वीकार कर निवर्तमान अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी ने सभी को चौंकाया है। पार्टी कार्यकर्ताओं व नेताओं को समझ में ही नहीं आ रहा है कि ऐसा उन्होंने कैसे किया? क्या वे हाईकमान की किसी रणनीति का शिकार हुए हैं? क्या वे स्वयं वसुंधरा की टीम के शामिल होना चाहते थे? या वसुंधरा उन्हें अपनी छतरी के नीचे लाना चाहती थीं? अगर उनको टीम में शामिल होने का ऑफर था तो भी उन्होंने उसे स्वीकार करने से पहले सौ बार सोचा क्यों नहीं? क्या उन्हें अपने पूर्व पद की मर्यादा व गौरव का जरा भी भान नहीं रहा? अपनी पहले ही प्रतिष्ठा का जरा भी ख्याल नहीं किया? क्या वे इतने पदलोलुप हैं कि अध्यक्ष के बाद उपाध्यक्ष बनने को उतारू थे? ये सारे सवाल भाजपाइयों के जेहन में रह-रह कर उभर रहे हैं।
स्वाभाविक सी बात है कि जो खुद अभी हाल तक अध्यक्ष पद पर रहा हो, वह भला किसी और की अध्यक्षता वाली कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष पद के लिए राजी होगा तो ये सवाल पैदा होंगे? इससे एक शक और होता है, वो ये कि शायद वे अध्यक्ष पद के लायक थे ही नहीं। गलती से उन्हें अध्यक्ष बना दिया गया, जिसे उन्होंने संघ के दबाव में ढ़ोया। वे थे तो उपाध्यक्ष पद का टैग लगाने योग्य, मगर गलती से पार्टी ने उन पर अध्यक्ष का टैग लगा रखा था। असल में उन्होंने संस्कृत की स्वजाति द्रुतिक्रमा वाली कहानी को चरितार्थ कर लिया, जैसे एक चूहा विभिन्न योनियों के बाद आखिर चूहा पर बन कर ही संतुष्ट हुआ। अध्यक्ष रह चुकने के बाद भी उन्हें उपाध्यक्ष बन कर ही संतुष्टि हुई। और वह भी उसके नीचे, जिसे टक्कर देने के लिए उन्हें खड़ा किए रखा गया। आत्म समर्पण की इससे बड़ी मिसाल कहीं नहीं मिल सकती। धरातल का सच भी ये है कि उन्हें वसुंधरा की जिस दादागिरी को समाप्त करने और उन पर नियंत्रण करने का जिम्मा दिया गया था, उसमें वे कत्तई कामयाब नहीं हो पाए। वे कहने भर को पार्टी के अध्यक्ष थे, मगर प्रदेश में वसुंधरा की ही तूती बोलती रही। वह भी तब जब कि अधिकतर समय वसुंधरा ने जयपुर से बाहर ही बिताया। चाहे दिल्ली रहीं या लंदन में, पार्टी नेताओं का रिमोट वसुंधरा के हाथ में ही रहा। अधिसंख्य विधायक वसुंधरा के कब्जे में ही रहे। यहां तक कि संगठन के पदाधिकारी भी वसुंधरा से खौफ खाते रहे। परिणाम ये हुआ कि वसुंधरा ने जिस विधायक दल के पद से बमुश्किल इस्तीफा दिया, वह एक साल तक खाली ही रहा। आखिरकार अनुनय-विनय करने पर ही फिर से वसुंधरा ने पद ग्रहण करने को राजी हुई। जब-जब वसुंधरा को दबाने की कोशिश की गई, वे बिफर कर इस्तीफों की राजनीति पर उतर आईं, मगर पार्टी हाईकमान उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाया।
कुल मिला कर चतुर्वेदी का उपाध्यक्ष बनना स्वीकार करना पार्टी कार्यकर्ताओं गले नहीं उतर रहा, चतुर्वेदी भले ही संतुष्ट हों।
-तेजवानी गिरधर

रविवार, मार्च 03, 2013

भैरोंसिंह शेखावत को ठेंगा, उनकी पत्नी को सलाम

Bhairon Singh Shekhawatकहते हैं राजनीति में सब कुछ जायज है। साम, दाम, दंड, भेद सब कुछ। वाकई सही है। स्वार्थ की खातिर आदमी उन्हीं कंधों को ठोकर मार देता है, जिनके सहारे वह ऊपर चढ़ा है और हर उस को भी अपना माई-बाप बना लेता है, जिससे स्वार्थ पूरा हो रहा हो। कुछ ऐसा ही वाकया पेश किया प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्रीमती वसुंधरा राजे ने। उन्होंने उन्हीं स्वर्गीय भैरोंसिंह शेखावत जी की धर्मपत्नी श्रीमती सूरज कंवर के घर जा कर उनका आशीर्वाद लिया, जिनको जीत-जी राजनीति की बर्फ में लगाने का काम उन्होंने किया था।
कहने की जरूरत नहीं है ये वही वसुंधरा हैं, जिनकी वजह से राजस्थान के सिंह कहलाने वाले स्वर्गीय शेखावत जी अपने प्रदेश में ही बेगाने से हो गए थे। दरअसल स्वर्गीय श्री शेखावत के उपराष्ट्रपति पद का कार्यकाल समाप्त करने के बाद राजस्थान लौटते ही दोनों के बीच छत्तीस का आंकड़ा हो गया था। असल वे तब नहीं चाहतीं थीं कि शेखावत फिर से राजस्थान में पकड़ बनाएं। यूं तो शेखावत के पुत्र नहीं था, इस कारण खतरा नहीं था कि उनका कोई उत्तराधिकारी प्रतिस्पद्र्धा में आ जाएगा, मगर उनके जवांई नरपत सिंह राजवी उभर रहे थे। वसुंधरा इस खतरे को भांप गई थीं। इसी कारण शेखावत राजवी को भी उन्होंने पीछे धकेलने की उन्होंने भरसक कोशिश की। इस प्रसंग में यह बताना अत्यंत प्रासंगिक है कि शेखावत ने वसुंधरा राजे के कार्यकाल में ही भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम की शुरुआत की थी। यही वसुंधरा को नागवार गुजरी। सब जानते हैं कि शेखावत की इसी मुहिम का उदाहरण दे कर कांग्रेस ने वसुंधरा के कार्यकाल पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे।
vasundhara 2-28.4.12वसुंधरा अपने कार्यकाल में इतनी आक्रामक थीं कि भाजपाई शेखावत की परछाई से भी परहेज करने लगे थे। कई दिन तक तो वे सार्वजनिक जीवन में दिखाई ही नहीं दिए। इसी संदर्भ में अजमेर की बात करें तो लोग भलीभांति जानते हैं कि जब वे दिल्ली से लौट कर दो बार अजमेर आए तो उनकी अगुवानी करने को चंद दिलेर भाजपा नेता ही साहस जुटा पाए थे। शेखावत जी की भतीजी संतोष कंवर शेखावत, युवा भाजपा नेता भंवर सिंह पलाड़ा और पूर्व मनोनीत पार्षद सत्यनारायण गर्ग सहित चंद नेता ही उनका स्वागत करने पहुंचे। अधिसंख्य भाजपा नेता और दोनों तत्कालीन विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी व श्रीमती अनिता भदेल ने उनसे दूरी ही बनाए रखी। वजह थी मात्र ये कि अगर वे शेखावत से मिलने गए तो मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया नाराज हो जाएंगी। पूरे प्रदेश के भाजपाइयों में खौफ था कि वर्षों तक पार्टी की सेवा करने वाले वरिष्ठ नेताओं को खंडहर करार दे कर हाशिये पर धकेल देने वाली वसु मैडम अगर खफा हो गईं तो वे कहीं के नहीं रहेंगे।
वस्तुत: श्रीमती राजे ने एक बार मुख्यमंत्री बनने के बाद तय कर लिया था कि अब राजस्थान को अपने कब्जे में ही रखेंगी। शेखावत ही क्यों, उनके समकक्ष या यूं कहना चाहिए कि उनके वरिष्ठ अनेक नेताओं को उन्होंने खंडहर बता कर हाशिये पर खड़ा कर दिया। मगर अब जब वसुंधरा पर आगामी चुनाव जीतने की चुनौती है तो उन्हीं खंडहरों के यहां धोक दे रही हैं। इसी सिलसिले में वे हरिशंकर भाभड़ा व ललित किशोर चतुर्वेदी सरीखे दिग्गजों के घर जा कर उनका दिल जीतने की कोशिश कर रही हैं।
-तेजवानी गिरधर

बुधवार, फ़रवरी 27, 2013

ब्राह्मणों के वर्चस्व वाली भाजपा में तिवाड़ी बेगाने क्यों?

ghanshyam tiwariपूर्व मुख्यमंत्री एवं भाजपा की प्रदेशाध्यक्ष श्रीमती वसुन्धरा राजे ने अपने सरकारी निवास पर राजस्थान ब्राह्मण महासभा द्वारा आयोजित सम्मान समारोह में प्रदेश के ब्राह्मण वोटों को आकर्षित करने के लिए एक दिलचस्प बात कह दी। वो ये कि भाजपा के संस्थापक पंडित दीनदयाल उपाध्याय ब्राह्मण थे और भाजपा के शीर्षस्थ नेता पूर्व प्रधानमंत्री अटल वाजपेयी भी ब्राह्मण ही हैं। लोकसभा और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष भी ब्राह्मण ही हैं। भाजपा के केन्द्रीय संसदीय बोर्ड में भी अधिकांश ब्राह्मण ही हैं। देश के अधिकांश राज्यों में भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष भी ब्राह्मण ही हैं। इसलिये हम तो पंडितों के आशीर्वाद के बिना आगे बढ़ ही नहीं सकते।
सवाल ये उठता है कि अगर वे ब्राह्मणों का इतना ही सम्मान करती हैं और उनके आशीर्वाद के बिना आगे बढ़ ही नहीं सकतीं तो फिर अपने ही साथी घनश्याम तिवाड़ी को रूठा हुआ कैसे छोड़ रही हैं? इतना वरिष्ठ ब्राह्मण नेता ही पार्टी में बेगाना और अलग-थलग क्यों है? जब से वसुंधरा व संघ लॉबी में सुलह हुई है तिवाड़ी नाराज चल रहे हैं। उन्हें मनाने की कोशिशें निचले स्तर पर जरूर हुई हैं, मगर खुद वसुंधरा ने अब तक कोई गंभीर कोशिश नहीं की है। क्या तिवाड़ी ब्राह्मण नहीं हैं? अगर हैं तो इसका मतलब ये है कि उनके वचन और कर्म में तालमेल नहीं हैं। ब्राह्मणों के सम्मान में भले ही कुछ कहें, मगर धरातल पर कितना सम्मान है, इसका जीता जागता उदाहरण हैं वरिष्ठ भाजपा नेता तिवाड़ी की नाराजगी। होना तो यह चाहिए था कि ब्राह्मण महासभा के आयोजन में ही उनका ठीक से सम्मान किया जाता। उससे भी ज्यादा अफसोसनाक है ब्राह्मण महासभा का कृत्य, जिसने अपनी समाज के वरिष्ठ नेता को हाशिये डाले जाने के बाद भी कोई ऐतराज नहीं किया। उलटे वसुंधरा का स्वागत करने पहुंच गई। ऐसा प्रतीत होता है कि तिवाड़ी को आइना दिखाने के लिए ही यह आयोजन हुआ, ताकि उन्हें संदेश दिया जाए कि वे भले ही नाराज हों, मगर उनकी समाज तो वसुंधरा के साथ है।
ज्ञातव्य है कि प्रदेश भाजपा में नए तालमेल के प्रति तिवाड़ी की असहमति तभी पता लग गई थी, जबकि दिल्ली में सुलह वाले दिन वे तुरंत वहां से निजी काम के लिए चले गए। इसके बाद वसुंधरा के राजस्थान आगमन पर स्वागत करने भी नहीं गए। श्रीमती वसुंधरा के पद भार संभालने वाले दिन सहित कटारिया के नेता प्रतिपक्ष चुने जाने पर मौजूद तो रहे, मगर कटे-कटे से। कटारिया के स्वागत समारोह में उन्हें बार-बार मंच पर बुलाया गया लेकिन वे अपनी जगह से नहीं हिले और हाथ का इशारा कर इनकार कर दिया। बताते हैं कि इससे पहले तिवाड़ी बैठक में ही नहीं आ रहे थे, लेकिन कटारिया और भूपेंद्र यादव उन्हें घर मनाने गए। इसके बाद ही तिवाड़ी यहां आने के लिए राजी हुए। उन्होंने दुबारा उप नेता बनने का प्रस्ताव भी ठुकरा दिया।
ब्राह्मण के मुद्दे पर एक बात और याद आती है। हाल ही एक बयान में तिवाड़ी की पीड़ा उभर आई थी, वो ये कि मैं ब्राह्मण के घर जन्मा हूं। ब्राह्मण का तो मास बेस हो ही नहीं सकता। मैं राजनीति में जरूर हूं, लेकिन स्वाभिमान से समझौता करना अपनी शान के खिलाफ समझता हूं। मैं उपनेता का पद स्वीकार नहीं करूंगा। पता नहीं ब्राह्मण महासभा को उनकी ब्राह्मण होने की इस पीड़ा का अहसास है या नहीं।
एक बात और। अगर बकौल वसुंधरा भाजपा में ब्राह्मणों का इतना ही वर्चस्व है तो अन्य जातियों का क्या होगा? जिस जाति की वे बेटी हैं, जिस जाति में वे ब्याही हैं व जिस जाति की वे समधन हैं और इन संबंधों की बिना पर जिन जातियों से वोट मांगती हैं, उनका क्या होगा? तब उनके बार-बार दोहराये जाने वाले इस बयान के क्या मायने रह जाते हैं कि भाजपा छत्तीसों कौम की पार्टी है? ऐसे में अगर लोग ये कहते हैं कि भाजपा ब्राह्मण-बनियों की पार्टी है तो क्या गलत कहते हैं? सच तो ये है कि ऊंची जातियों के वर्चस्व की वजह से ही भाजपा अनुसूचित जातियों में अपनी पकड़ नहीं बना पाई है। अस्सी फीसदी हिंदुओं के इस देश में हिंदूवाद के नाम पर भाजपा को तीन-चौथाई बहुमत नहीं मिल पाता। अनुसूचित जाति के लोग भाजपा के इस कथित हिंदूवाद की वजह से ही कांग्रेस, सपा, बसपा, जनता दल आदि का रास्ता तलाशते हैं।
-तेजवानी गिरधर

सोमवार, फ़रवरी 25, 2013

लो अब भाभड़ा ने भी बदला अपना सुर

vasu-bhabhadaअब जब कि प्रदेश के सारे वसुंधरा विरोधी भाजपा नेताओं को यह साफ दिख गया है कि वे ही पार्टी की वर्तमान और भविष्य हैं तो वे मौके की नजाकत देख कर अपना सुर बदलने लगे हैं। पहले वसुंधरा के धुर विरोधी वरिष्ठ नेता कैलाश मेघवार ने अपना मूड, माइंड व सुर बदल कर उन्हें भावी मुख्यमंत्री स्वीकार किया और अब पुराने दिग्गज हरिशंकर भाभड़ा ने भी अपना सुर बदल कर न केवल उन्हें जीतने का आशीर्वाद दिया, अपितु यह भी कहा कि वे पहले भी वसुंधरा राजे के साथ थे, आज भी हैं और आगे भी साथ रहेंगे। 2008 के चुनाव के बाद हमारी वसुंधरा राजे से कभी कोई शिकायत नहीं रही। हमारी शिकायत तो पार्टी हाईकमान से थी। ज्ञातव्य है कि पार्टी में अपने राजनीतिक विरोधियों को मनाने की कवायद के तहत प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वसुंधरा राजे ने हाल ही जयपुर के मालवीय नगर में पूर्व उप मुख्यमंत्री हरिशंकर भाभड़ा से मिलने उनके आवास पर गईं। यहां वसुंधराराजे की भाभड़ा से पौने घंटे बातचीत हुई।
आपको याद दिला दें कि इससे पहले भास्कर के वरिष्ठ संवाददाता त्रिभुवन को एक साक्षात्कार में भाभड़ा ने कहा था कि अब भाजपा को भी कांग्रेस की तरह समझने लगे हैं। दोनों का अंतर कम हो गया। लोग भ्रमित हैं कि किसे वोट दें। पहले राजाओं का वर्चस्व था। अब पैसे और सत्ता के बल पर नए जागीरदार पैदा हो गए। उन्हीं की घणी-खम्मां हो रही है। अघोषित राजतंत्र है। अपने कुटुंब को आगे बढ़ाते हैं। टिकट भी उनको, पद भी उनको। सब पार्टियों में यही हाल है। जिस वसुंधरा के कारण आज वे खंडहर की माफिक हो गए हैं, उनके बारे में उनकी क्या धारणा रही, इसका खुलासा होता है उनके तब दिए इस बयान से हो जाता है कि जनता ने राजा-रानियों को एक मौका तो दिया, लेकिन कुछ नहीं किया तो दूसरा मौका नहीं दिया। साथ ही कहा था कि वसुंधरा बहुत काबिल हैं। उनकी हर विषय पर पकड़ है। उन्हें भाषा की कठिनाई नहीं है। वसुंधरा की प्रशासन पर पकड़ अच्छी थी, लेकिन कुछ एलीमेंट तो ऐसे होते ही हैं, जिन पर कोई कंट्रोल नहीं कर सकता! उन्होंने ये भी कहा था कि भाजपा और कांग्रेस को खतरा एक-दूसरे से नहीं, अपने आपके भीतर पैदा हो चुके विरोधियों से है। भाजपा के दोनों गुटों की अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं। एक गुटबाजी करेगा तो दूसरा भी करेगा। एक गुटबाजी के लिए जिम्मेदार होता है, दूसरा तो प्रतिक्रिया करता है। जब उनसे पूछा गया कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है तो यह कह कर मन की बात छिपाने की कोशिश करते हैं कि जिसने गुटबाजी शुरू की। जब पूछा गया कि किसने शुरुआत की तो यह कह कर बचने की कोशिश भी करते हैं कि यह खोज का विषय है। वसुंधरा के परिपेक्ष्य में उन्होंने कहा था कि हम मर्यादा रखते थे। शेखावत को नेता माना तो माना। उनसे हम आपत्ति रखते थे तो वे जायज चीजें तुरंत मान लेते थे। वे जिद्दी नहीं थे। इससे झगड़ा नहीं होता था।
जब ये पूछा गया था कि वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री पद का दावेदार मान कर चुनाव लडने के मुद्दे पर उनके क्या विचार हैं तो बोले थे कि जरूरी नहीं कि किसी को लोकतंत्र में चुनाव से पहले नेता घोषित किया जाए। किसी एक आदमी को नेता तब घोषित किया जाता है, जब उसका नाम घोषित होने से लाभ होता हो। यह गंभीर प्रश्न है कि नेता घोषित हो कि नहीं! यह विषय केंद्रीय चुनाव समिति तय करती है। वह फायदे और नुकसान देखे। . .भैरोसिंह शेखावत मुख्यमंत्री रहे, लेकिन उन्हें कभी मुख्यमंत्री घोषित थोड़े किया गया था। आज यह तो तय है कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा? साथ ही जोड़ा कि आप बात तो लोकतंत्र की करते हैं तो किसी को मुख्यमंत्री पहले कैसे घोषित कर सकते हैं। आप चुने हुए विधायकों के अधिकार की अवहेलना कैसे कर सकते हैं। कई बार नेता घोषित करने के दुष्परिणाम भी होते हैं। महत्वाकांक्षाएं जब सीमा पार कर जाती हैं तो वे पार्टी के लिए घातक होती हैं। जब वसुंधरा की लोकप्रियता का पार्टी को लाभ मिलने का सवाल किया गया तो बोले कि भाजपा में टीम वर्क रहा है। कभी उन्होंने किसी व्यक्ति पर अपने आपको आश्रित नहीं किया।
कुल मिला कर भाभड़ा के हृदय परिवर्तन से यह साफ हो गया है कि वे धरातल के सच और हालात को समझ चुके हैं और वसुंधरा के आगे नतमस्तक हैं।
-तेजवानी गिरधर

वसुंधरा ने फिर शुरू की खंडहरों को सलामी की कवायद

vasu-kailashvasu-bhabhadaहालांकि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनने और मुख्यमंत्री पद की दावेदार के रूप में स्थापित हो चुकी श्रीमती वसुंधरा जानती हैं कि अब अधिसंख्य पुराने नेता भी उनका नेतृत्व स्वीकार कर रहे हैं, फिर भी उनका सम्मान रखने की खातिर अब उनसे मिल कर नाराजगी को सदा के लिए समाप्त करने की कवायद में फिर जुट गई हैं। हालांकि इससे पहले भी उन्होंने यह अभियान चलाया था और पुराने नेताओं से मिल कर उनका दिल जीतने की कोशिश की थी, मगर राष्ट्रीय अध्यक्ष का मसला नहीं सुलझ पाने के कारण उसे स्थगित कर दिया था। अब जब कि उन्हें लगभग फ्री हैंड सा मिल गया है, वे पूरे जोश-खरोश के साथ अपने अभियान में फिर जुट गई हैं। इसका एक बड़ा फायदा ये हो रहा है कि एक ओर जहां नेताओं की नाराजगी दूर हो रही है, वहीं उनके वसुंधरा को भावी मुख्यमंत्री स्वीकार करने के बयानों से पार्टी स्तर पर मजबूती भी मिल रही है। इससे यह संदेश जा रहा है कि अब वसुंधरा की दावेदारी में कोई कसर बाकी नहीं रह गई है।
सबसे पहले उन्होंने अपने धुर विरोधी दिग्गज कैलाश मेघवाल को अपने निवास पर आमंत्रित कर गिले-शिकवे दूर किए तो मेघवाल ने भी उनको भावी मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार करने की ऐलान कर दिया। इसके बाद उन्होंने पूर्व उपमुख्यमंत्री हरिशंकर भाभड़ा के निवास स्थान पर जा कर उनकी आशीर्वाद लिया। इसके एवज में भाभड़ा ने पुरानी सारी बातें भूलते हुए कहा कि वे पहले भी वसुंधरा राजे के साथ थे, आज भी हैं और आगे भी साथ रहेंगे। जानकारी है कि वे जल्द ही कटे-कटे से चल रहे घनश्याम तिवाड़ी को भी मनाने की कोशिश करने वाली हैं।
vs1vs2ज्ञातव्य है प्रदेश भाजपा में सुलह से पहले भी वसुंधरा ने कुशलक्षेम पूछने के बहाने कोटा में बुजुर्ग नेताओं से मुलाकात की और इन नेताओं के अगले विधानसभा चुनाव में कामयाबी का आशीर्वाद मांगा था। उन्होंने वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं तक से भेंट की थी। तब पत्रकारों ने जब यह सवाल किया था कि इस दौरे के क्या मायने हैं तो उन्होंने कहा था कि राज को राज रहने दो। तब उन्होंने वरिष्ठ नेता पूर्व मंत्री के के गोयल, पूर्व सांसद रघुवीरसिंह कौशल, पूर्व केंद्रीय मंत्री भुवनेश चतुर्वेदी, जुझारसिंह और रामकिशन वर्मा के घर पहुंच कर उनकी कुशलक्षेम पूछी। वे साहित्यकार वयोवृद्ध भाजपा नेता गजेंद्रसिंह सोलंकी की कुशलक्षेम पूछने भी गई थीं। वरिष्ठ नेता भाभडा की कुशलक्षेम उन्होंने अपने इस दौरे में भी पूछी थी। वसुंधरा के इस दौरे को अगले विधानसभा चुनाव की तैयारी के लिए कूटनीति की जाजम बिछाने के रूप में भी देखा जा गया था।
-तेजवानी गिरधर

रविवार, फ़रवरी 24, 2013

असल में मेघवाल का मूड व माइंड बदला है

vasu-kailashकभी पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुधंरा राजे के धुर विरोधी रहे वरिष्ठ भाजपा नेता कैलाश मेघवाल ने दैनिक भास्कर के वरिष्ठ संवाददाता त्रिभुवन को एक साक्षात्कार में कहा है कि वसुंधरा राजे का मूड और माइंड अब बदल गया है, उन्होंने अनुभवों से बहुत कुछ सीखा है, जबकि असलियत ये है कि मूड व मांइड तो मेघवाल का बदला है, सुर भी बदला है, अपना वजूद बचाने की खातिर। आपको याद होगा, ये वही मेघवाल हैं, जिन्होंने सर्वाधिक मुखर हो कर श्रीमती राजे का विरोध किया और अगर ये कहा जाए कि वसुंधरा विरोधी मुहिम के सूत्रधार ही मेघवाल ही थे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को अगर वसुंधरा पर हमले का मौका मिला तो असल में वह मेघवाल ने ही दिया था। उन्होंने उन्हीं के आरोपों को आधार बना कर वसुंधरा पर हमले किए थे और आज भी करते रहते हैं।
असल में मेघवाल उन चंद नेताओं में शुमार रहे हैं, जिनकी कोशिश थी कि वसुंधरा राजस्थान में पैर नहीं जमा पाएं। और इसके लिए उन्होंने पार्टी लाइन से हट कर नागाई की। पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत ने भी अपने दामाद नरपत सिंह राजवी की खातिर वसुंधरा विरोधी रुख अख्तियार किया था, यह बात अलग है कि उन्हें इसमें कामयाबी हासिल नहीं हो पाई। वसुंधरा का इतना खौफ हुआ करता था कि भाजपा के अधिसंख्य नेता उन दिनों शेखावत से मिलने तक से डरते थे। नतीजतन राजस्थान का एक ही सिंह अपने राज्य में ही बेगाना सा हो गया था। लगभग यही स्थिति मेघवाल की भी हुई। वे हाशिये पर चले गए। अपना अस्तित्व समाप्त होता देख शातिर दिमाग खांटी नेता मेघवाल ने अपना मूड, माइंड व सुर बदल लिया है। उन्होंने भी अनुभव से सीख लिया है कि वसुंधरा को नेता माने बिना कोई चारा नहीं है। कुछ समय पहले सीएम इन वेटिंग के सवाल पर न सूत, न कपास और जुलाहों में ल_म ल_ा कहने वाले मेघवाल के श्रीमुख से ही निकल रहा है कि आगामी चुनाव में वसुंधरा के चेहरे और नाम का भरपूर फायदा पार्टी को मिलेगा। बड़ी दिलचस्प बात ये है कि वे खुद ही कह रहे हैं कि वसुंधरा अपने विरोधियों को परास्त करने और अपने आपको मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार बनाने में सबल और सक्षम साबित हुई हैं। वसुंधरा ही मुख्यमंत्री होंगी। यानि राजनीति में जिंदा रहने के लिए वे साफ तौर पर सरंडर कर चुके हैं। उन्हें कपासन से टिकट चाहिए, इसी कारण वसुंधरा के यहां धोक देने पहुंच गए।
रहा सवाल हाशिये पर जा चुके मेघवाल की वर्तमान में प्रासंगिकता का तो इसमें कोई दोराय नहीं कि पार्टी को आज भी उनकी जरूरत महसूस हो रही है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब वे वसुंधरा से मिले तो इस मुलाकात की बाकायदा विज्ञप्ति जारी की गई, जिसमें बताया गया कि आगामी विधानसभा चुनाव वसुन्धरा के नेतृत्व में लड़ेंगे। वसुन्धरा ही भाजपा की सरकार में मुख्यमंत्री होंगी। असल में मेघवाल को इतनी तवज्जो इस कारण दी गई क्योंकि वे अनुसूचित जाति के उन पुराने नेताओं में शुमार हैं, जिनकी कि आज भी जमीन पर पकड़ है। वैसे भी वे उस जमाने के भाजपा नेता हैं, जब अनुसूचित जाति पर भाजपा की कुछ खास पकड़ नहीं हुआ करती थी। अब तो भाजपा में अनुसूचित जाति के अनेक नेता पैदा हो चुके हैं।
समझा जाता है कि समीकरणों में आए बदलाव के बाद मेघवाल टिकट भी हासिल करने में कामयाब होंगे और अपना स्थान फिर बनाने में भी।
-तेजवानी गिरधर