तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

शुक्रवार, अक्टूबर 25, 2024

अंतिम यात्रा में शव की दिशा क्यों बदल दी जाती है?

आपको जानकारी होगी कि षव यात्रा के दौरान आरंभ में मृतक का सिर आगे रखा जाता है, फिर आधे रास्ते में दिषा बदल दी जाती है और पैर आगे कर दिए जाते हैं। क्या आपको ख्याल है कि ऐसा क्यों किया जाता है?

षव यात्रा के दौरान मृतक के सिर की दिशा में बदलाव एक प्राचीन परंपरा और धार्मिक मान्यता का हिस्सा है, जो विभिन्न सांस्कृतिक और धार्मिक संदर्भों में महत्वपूर्ण है।

ऐसी मान्यता है कि मृतक की आत्मा को उसकी अंतिम यात्रा में सम्मानजनक तरीके से विदा किया जाना चाहिए। शव को आरंभ में सिर आगे करके ले जाना इस बात का प्रतीक है कि मृतक अभी भी परिवार और समाज के बीच है। आधे रास्ते में पैर आगे करके शव को ले जाने का अर्थ यह है कि अब वह दुनिया से विदा हो रहा है, संसार के कर्तव्यों से मुक्ति पा ली है और उसे अंतिम विश्राम स्थल की ओर ले जाया जा रहा है। रास्ते के बीच में चबूतरा होता है, जहां षव की दिषा बदल जाती है। दिषा बदलने से मृतात्मा का जगत से संबंध टूटता है। तब उसे अहसास होता है कि अब जगत से नाता टूट रहा है और उसकी यात्रा परलोक की ओर है।


गुरुवार, अक्टूबर 24, 2024

क्या आदमी का क्लोन बनाया जा सकता है?

वैज्ञानिकों का मानना है कि आदमी का क्लोन बनाया तो जा सकता है, वर्तमान में तकनीकी रूप से इंसान का पूर्ण क्लोन बनाना संभव नहीं है। एक तो एक तो नैतिक व कानूनी बाधाओं के कारण मानव का क्लोन बनाने पर वैष्विक प्रतिबंध है। दूसरा क्लोनिंग अब तक इंसानों के लिए सफल या सुरक्षित साबित नहीं हुई है।

हालांकि, वैज्ञानिकों ने कुछ हद तक क्लोनिंग की तकनीकों का विकास किया है, जैसे कि जानवरों की क्लोनिंग। 1996 में भेड़ डॉली को सफलतापूर्वक क्लोन किया गया था, जो कि एक बडी उपलब्धि थी।

क्लोनिंग के दो प्रमुख प्रकार होते हैं- एक थेराप्यूटिक क्लोनिंग, इसमें स्टेम सेल्स का उपयोग किया जाता है ताकि किसी व्यक्ति के अंग या ऊतक की मरम्मत या प्रतिस्थापन किया जा सके। दूसरा रीप्रोडक्टिव क्लोनिंग, यह उस प्रक्रिया को संदर्भित करता है, जिसमें एक संपूर्ण जीव का क्लोन बनाया जाता है। लेकिन 

यह एक बहुत ही जटिल और जोखिम भरी प्रक्रिया है, जिसमें स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर चिंताएं हैं।

रविवार, अक्टूबर 20, 2024

गंगा नदी में नहाने से पाप धुल जाते हैं?

 मान्यता है कि गंगा नदी में नहाने से पाप धुल जाते हैं। जो भी बुरे कर्म किए हैं, उनसे मुक्ति मिल जाती है। बेषक गंगा में नहाने से पुण्य तो मिल सकता है, नई उर्जा का संचार तो हो सकता है, मगर किए हुए कर्मों से मुक्ति कैसे मिल सकती है, जबकि सिद्धांत यह है कि आदमी को कर्मों का फल भोगना ही होता है, तत्काल या देर से। आप देखिए न, अपने कर्मों के फल से तो गंगा के पुत्र भीष्म भी नहीं बच पाए थे। उन्हें भी षर षैया पर लेटना पडा था। गंगा स्वयं अपने पुत्र तक को कर्म के बंधन से मुक्त नहीं कर पाई थी। असल में होना यह चाहिए कि हम बुरे कर्म करें ही नहीं कि पाप धोने के लिए गंगा में स्नान करना पडे। मगर हम बहुत चालाक हैं, पहले बुरे कर्म धडल्ले से करते हैं और फिर पाप धोने के लिए गंगा नहाने चले जाते हैं।

शुक्रवार, अक्टूबर 18, 2024

भगवान के दाढ़ी-मूंछ क्यों नहीं होती है?


आपने देखा होगा कि देवी-देवताओं से इतर जितने भी महामानव हुए हैं, जिन्हें कि हम भगवान मानते हैं, उनके चित्रों व मूर्तियों में चेहरों पर दाढ़ी-मूंछ नहीं होती। इसमें भी किंचित अपवाद हो सकता है, मगर क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों है? भगवान कहे जाने वाले राम, कृश्ण, महावीर व बुद्ध के दाढी मूंछ क्यों नहीं होती? आइये, समझने की कोषिष करते हैं कि आखिर ऐसा क्यों है-

भगवान के दाढी मूंछ क्यों नहीं होती, इस गुत्थी को समझने से पहले भगवान शब्द पर आते हैं। इसकी अलग-अलग तरह से व्याख्या हुई है। जैसे जिसके पास धन है, उसे धनवान कहते हैं, उसी प्रकार जिसके पास भग है, वह भगवान है। भग अर्थात योनि। अर्थात प्रकृति। जो आदि शक्ति भगवति से युक्त है, वह भगवान है। वह पूर्ण है। हमारी संस्कृति में अर्धनारीश्वर का जिक्र आता है। उसका मतलब है, जो पुरुष व नारी के समान भाग से मिल कर बना है।

एक व्याख्या ये है कि साकार भगवान, निराकार ईश्वर का ही अवतार है, जैसे श्रीराम व श्रीकृष्ण। इसी प्रकार महावीर व बुद्ध को भी भगवान की श्रेणी में गिना जाता है। वो इसलिए कि महावीर ने केवल्य ज्ञान अर्जित किया और बुद्ध ने बुद्धत्व। इन दोनों के बारे में मान्यता है कि वे मोक्ष को प्राप्त हो गए। वे पूर्णता को प्राप्त हो गए। जन्म-मरण के चक्र से मुक्त।

अब तथ्य की बात, जिसे कि विज्ञान भी मानता है। वो यह कि हर मनुष्य, चाहे वह नर हो या नारी, वह पुरुष व स्त्री, दोनों के ही गुणों से युक्त होता है, क्योंकि उसकी संरचना ही स्त्री व पुरुष के संयोग से हुई है। अंतर सिर्फ गुणसूत्रों का है। अगर पुरुष के गुणसूत्र अधिक हैं तो वह पुरुष के रूप में पैदा होता है और अगर स्त्री के गुणसूत्र अधिक हैं तो उसका जन्म नारी रूप में होता है। हर पुरुष में नारी के भी गुण होते हैं और हर स्त्री में पुरुषों के भी गुण होते हैं। आपने देखा होगा कि कुछ स्त्रियों में जन्म के बाद किन्हीं करणों से पुरुषों के गुण ज्यादा हो जाते हैं तो वह पुरुषों की तरह व्यवहार करती हैं। इसी प्रकार जिन पुरुषों में स्त्रियोचित गुण विकसित हो जाते हैं तो वे स्त्रैण कहलाते हैं। स्त्रैणता का सबसे अनूठा उदाहरण स्वामी रामकृष्ण परमहंस को माना जाता है। वे देवी के उपासक थे। वे देवी में इतने लीन हो गए कि उनका शरीर भी स्त्रैण हाने लगा। बताते हैं कि जीवन के आखिरी वर्षों में उनके स्तन उभरने लगे थे। जहां तक प्राकृतिक विकृति का सवाल है गुण सूत्रों के असंतुलन के परिणाम स्वरूप मनुष्य किन्नर रूप में जन्म लेता है। हालांकि किन्नरों में भी नर-मादा का विभेद है, लेकिन आम तौर पर आपने देखा होगा कि किन्नर की आवाज पुरुषों की तरह मोटी होती है, मगर चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ नहीं आती। व्यवहार पुरुषों की तरह, मगर चाल-ढ़ाल स्त्रियों की तरह।

यह भी एक तथ्य है कि पुरुषों के चेहरे पर दाढ़ी व मूंछ के रूप में बाल होते हैं, जबकि स्त्रियों में ऐसा नहीं होता। कई बार ऐसा पाया गया है कि जो भी स्त्री पुरुषोचित व्यवहार करती है तो उसके भी पुरुषों की तरह चेहरे पर बाल आने लगते हैं। ऐसे भी प्रमाण हैं कि बहुत अधिक उम्र होने पर महिलाओं में गुण सूत्रों का, हारमोन्स का असंतुलन होता है और उनके दाढ़ी-मूंछ आने लगती है।

अब बात मुद्दे की। कोई भी पुरुष पूर्णता को उपलब्ध होता है, अर्थात भगवान की श्रेणी में आता है, तब उसमें पुरुष व स्त्री के गुण समान होते हैं। इसी कारण उसके चेहरे पर बाल नहीं होते। आपने भगवान राम, भगवान कृष्ण, भगवान महावीर, भगवान बुद्ध के जितने भी चित्र या मूर्तियां देखी होंगी, उनमें उनके दाढ़ी-मूंछ नजर नहीं आई होगी। वजह क्या है? क्या वे रोजाना शेव करते थे? इसका जिक्र शास्त्रों में तो कहीं पर भी नहीं है। अर्थात उनके चेहरे पर बाल आते ही नहीं थे? और वजह थी पूर्ण अवस्था। जितना पुरुष, उतनी ही स्त्री। हालांकि यह भी पक्का नहीं है कि वस्तुस्थिति क्या रही होगी, मगर कुछ तथ्यों के आधार पर ऋषि-मुनियों ने जैसा वर्णन किया, उसी के अनुरूप चित्र व मूर्तियां बना दी गईं। 

ऐसी भी मान्यता है कि भगवान सदा किशोर और अमूर्त है। किशोरावस्था दाढ़ी पैदा होने से पहले की अवस्था है। भरपूर यौवन, प्रखर ओज। इसी आधार पर हमने भगवान की परिकल्पना किशोर के रूप में की। किशोरावस्था को ध्यान में रख कर ही मन्दिरों में मूर्तियां रची गईं। यही वजह है कि उनके चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ नहीं दर्शाई गई है।

प्रसंगवश आखिर में भगवान की भिन्न-भिन्न व्याख्याओं पर आते हैं। भगवान शब्द में युक्त भग का अर्थ कामना व भाग्य भी होता है। भग से तात्पर्य प्रकृति या भौतिक संसार से है, अर्थात जो सभी भौतिक आनंदों, कामनाओं और भाग्य को धारणा करने वाला गर्भ है, वह भगवान है। राम व कृष्ण को हम अवतार की श्रेणी में मानते हैं, मगर चूंकि उन्होंने शरीर धारण किया है, इस कारण इस भौतिक संसार से बंधे हुए हैं। उनके जीवन में भी वैसे ही सुख-दुख आए, जैसे कि सामान्य मानव के आते हैं। भगवान का अर्थ जितेंद्रिय भी माना जाता है। इंद्रियों को जीतने वाला। जिसने पांचों इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है तथा जिसकी पंच तत्वों पर पकड़ है, उसे भगवान कहते हैं। जैसे महावीर व बुद्ध। जितेन्द्रिय यानि वह जो पूर्णता को, मोक्ष को प्राप्त हो चुका है और जो जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो गया हो, वही भगवान है। एक और व्याख्या में बताया गया है कि भग यानि ऐश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य, ये छह गुण अपनी समग्रता में जिसमें हों, उसे भगवान कहते हैं। 

गुरुवार, अक्टूबर 03, 2024

जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता पर अब भी संशय क्यों?

राजस्थान में निःशुल्क जेनेरिक दवा योजना के प्रणेता डॉ समित शर्मा ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी की जयंती पर 13 वर्ष पूर्व राजस्थान राज्य के समस्त राजकीय चिकित्सा संस्थानो में आने वाले प्रत्येक रोगी के लिए जेनेरिक मेडिसिन के ड्रीम प्रोजेक्ट के तहत ’निशुल्क दवा योजना’ आरंभ करने के बारे में अपने फेसबुक अकाउंट पर उद्गार व्यक्त किए हैं। उन्होंने लिखा है कि राजस्थान मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन एवं चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की कर्तव्यनिष्ठ और समर्पित टीम ने अनेक बाधाओं और चुनौतियां से लड़ते हुए इसे धरातल पर उतारा, उस विजयी टीम का भी बहुत-बहुत आभार। इतने वर्षों से हमारे सेवाभावी चिकित्सक बंधु, फार्मासिस्ट, नर्सिंग कर्मी आदि अनवरत अनेक रोगियों के दुख, दर्द और कष्टों को दूर करने व उनकी जान बचाने का पुण्य कार्य इसके माध्यम से कर है। उन सब की मेहनत और कर्तव्य निष्ठा को कोटि-कोटि प्रणाम।

बेशक डॉ शर्मा के प्रयासों से मेडिसिन के क्षेत्र में युगांतरकारी परिवर्तन किया जा सका है। वे कोटि कोटि साधुवाद के पात्र हैं। लाभान्वितों की संख्या भी निरंतर बढ रही है, मगर आज भी जेनेरिक दवाओं पर पूर्ण विश्वास कायम नहीं किया जा सका है। आज भी यह धारणा समाप्त नहीं की जा सकी है कि जेनेरिक दवाएं गुणवत्ता की दृश्टि से कमतर हैं। अतः इस महत्वाकांक्षी व बहुउपयोगी योजना की पूर्ण सफलता के लिए गुणवत्ता कायम रखने के कडे उपाय किए जाने चाहिए। 


जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता पर अब भी संशय क्यों?

राजस्थान में निःशुल्क जेनेरिक दवा योजना के प्रणेता डॉ समित शर्मा ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी की जयंती पर 13 वर्ष पूर्व राजस्थान राज्य के समस्त राजकीय चिकित्सा संस्थानो में आने वाले प्रत्येक रोगी के लिए जेनेरिक मेडिसिन के ड्रीम प्रोजेक्ट के तहत ’निशुल्क दवा योजना’ आरंभ करने के बारे में अपने फेसबुक अकाउंट पर उद्गार व्यक्त किए हैं। उन्होंने लिखा है कि राजस्थान मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन एवं चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की कर्तव्यनिष्ठ और समर्पित टीम ने अनेक बाधाओं और चुनौतियां से लड़ते हुए इसे धरातल पर उतारा, उस विजयी टीम का भी बहुत-बहुत आभार। इतने वर्षों से हमारे सेवाभावी चिकित्सक बंधु, फार्मासिस्ट, नर्सिंग कर्मी आदि अनवरत अनेक रोगियों के दुख, दर्द और कष्टों को दूर करने व उनकी जान बचाने का पुण्य कार्य इसके माध्यम से कर है। उन सब की मेहनत और कर्तव्य निष्ठा को कोटि-कोटि प्रणाम।

बेशक डॉ शर्मा के प्रयासों से मेडिसिन के क्षेत्र में युगांतरकारी परिवर्तन किया जा सका है। वे कोटि कोटि साधुवाद के पात्र हैं। लाभान्वितों की संख्या भी निरंतर बढ रही है, मगर आज भी जेनेरिक दवाओं पर पूर्ण विश्वास कायम नहीं किया जा सका है। आज भी यह धारणा समाप्त नहीं की जा सकी है कि जेनेरिक दवाएं गुणवत्ता की दृश्टि से कमतर हैं। अतः इस महत्वाकांक्षी व बहुउपयोगी योजना की पूर्ण सफलता के लिए गुणवत्ता कायम रखने के कडे उपाय किए जाने चाहिए। 


रिटायर्ड कर्मचारी की उम्र कम हो जाती है?

एक सर्वे के मुताबिक जो कर्मचारी अस्सी साल जी सकता था, रिटायर होने के कारण सत्तर साल में ही मर जाता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार कर्मचारी रिटायरमेंट के बाद काम के अभाव में धीरे धीरे अकर्मण्य होने लगता है, जिससे उसका मानसिक स्वास्थ्य बिगडने लगता है। उसका प्रभाव शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पडता है और उसे बीमारियां घेरने लगती हैं। वस्तुतः सरकार की ओर से रिटायरमेंट की तय आयु के बाद भी अनेक कर्मचारी काम करने में सक्षम होते हैं। हठात उनसे काम छीन लिया जाता है। जैसा जिसका ओहदा व वर्चस्व होता है, वह खो जाता है, इस कारण उसकी आत्मशक्ति क्षीण होने लगती है। बेशक बेरोजगारी के दौर में नई पीढी को रोजगार देने के लिए कर्मचारियों को रिटायर करना भी जरूरी है, मगर उसकी वजह से जो कर्मचारी अभी सक्षम हैं, उनकी शक्ति को यूं ही व्यर्थ गंवाना भी उचित प्रतीत नहीं होता। ऐसे में होना यह चाहिए कि जिन कर्मचारियों की उत्पादकता व उपयोगिता शेष है, उसका उपयोग करने के उपाय किए जाने चाहिए। कदाचित उनकी उत्पादकता कम हो सकती है, मगर उनके अनुभव का लाभ लिया जाना चाहिए। नई पीढी की कर्मशीलता का उपयोग भी जरूरी है, इसके लिए रोजगार के नए उपाय तलाशे जाने चाहिए।