तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

सोमवार, दिसंबर 08, 2014

पायलट की जंबो कार्यकारिणी से भी संतुष्ट नहीं हुए कांग्रेसी

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने सभी को खुश करने के लिए जंबो कार्यकारिणी बनाई, बावजूद इसके प्रदेश के कांग्रेसी कार्यकर्ता इससे संतुष्ट नहीं हैं। कार्यकारिणी की घोषणा के तुरंत बाद विरोध के स्वर उठने लगे हैं। जहां जातिगत उपेक्षा के आरोप लग रहे हैं, वहीं काम करने वालों को जगह नहीं दिए जाने पर नाराजगी जाहिर की जा रही है। श्रीमती सोनिया गांधी के नेतृत्व में चल रही पाटी भले ही महिलाओं को राजनीति में आगे लाने की पैरवी करती हो, मगर उनको भी उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाने का अफसोस है।
कुछ अति उत्साही कार्यकर्ता अपने विरोध को मुखर करने के लिए सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक व वाट्स ऐप का उपयोग कर रहे हैं। देखिए एक बानगी-
कांग्रेस ने अपने सच्चे और सक्रिय कार्यकर्ता की अनदेखी कर सोशल मीडिया पर कांग्रेस से जुड़े तमाम युवाओं के जबे को ठेस पहुंचाई है। सोशल मीडिया पर पिछले पांच वर्ष से भी ज्यादा समय से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को प्रदेश में नई पहचान देने वाले और प्रदेश के युवाओं की टीम बनाने वाले लोकेश शर्मा को हाशिये पर रखना अपनी ही पार्टी के लिए काम कर रही पूरी टीम के साथ अन्याय किया गया है। जब प्रदेश में कांग्रेस की सोशल मीडिया पर कोई पहचान नहीं थी, तब लोकेश भैया ने इस काम को एक मुहिम के रूप में शुरू किया और धीरे-धीरे हम जैसे अनेक युवा उनके काम से प्रभावित होकर होकर उनसे जुड़ते चले गए। सरकार की योजनाएं हो, जनकल्याणकारी कार्य हो, कोई भी उपलब्धि हो या विपक्ष को मुंहतोड़ जवाब देना हो, इस सबकी शानदार शुरुआत करके एक आंदोलन सोशल मीडिया पर उनके नेतृत्व में उनकी पूरी टीम चला रही है। विधानसभा और लोकसभा चुनावों के कैम्पेन में पार्टी का पक्ष रखने में कोई कमी नहीं छोड़ी और उसके बाद भी लगातार उसी ऊर्जा के साथ हरेक सदस्य को जोश से लबरेज होकर काम करने को प्रेरित करते रहे। आज प्रदेश स्तर के उसी नेतृत्व की अनदेखी होते देख कर किसी भी सदस्य को समझ नहीं आ रहा कि पार्टी को क्या चाहिए, क्या काम करने वाले लोगों को मौके नहीं देने से पार्टी को सफलता हाथ लगेगी, क्या प्रदेश में मौजूद मजबूत टीम को दरकिनार कर राजस्थान कांग्रेस नए जुडऩे वाले लोगों को कोई सन्देश देने में सफल रहेगी?
वैसे बताया जाता है कि वे पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत लॉबी के हैं।
इसी प्रकार अखिल भारतीय रैगर महासभा (प्रगतिशील) के राष्ट्रीय अध्यक्ष पी.एम. जलुथरिया ने रैगर समाज की उपेक्षा का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक भी पद पर रैगर समाज को जगह नहीं दी गई है। महासभा ने कांग्रेस के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित कर कहा है कि समाज की प्रदेश में 35 लाख जनसंख्या है और करीब 25 लाख वोटर, लेकिन कांग्रेस को समाज के वोटरों को बंधुआ मान रखा है। पहले लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकाय के चुनावों में रैगरों को टिकट नहीं दिए, अब संगठन में भी उपेक्षा की गई हैैैै।
राजस्थान राज्य विमुक्त, घुमंतू, अर्द्ध घुमंतु कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष, गोपाल केसावत, जो कि कांगे्रस नेता ने भी कहा है कि परंपरागत वोट बैंक घुमंतू समाज की उपेक्षा की गई है। उनका सवाल है कि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने घुमंतू बोर्ड का गठन किया व पूर्व प्रदेशाध्यक्ष डॉ. चंद्रभान ने संगठन में प्रकोष्ठ बनाया, मगर सचिन पायलट इस परंपरा को तोड़ रहे हैं।
कार्यकारिणी के प्रति महिलाओं में असंतोष देखा जा रहा है। इसकी वजह ये कि प्रदेश उपाध्यक्ष की 15 और महासचिव की 26 की सूची में केवल एक-एक महिला को शामिल किया गया है। सचिव की 43 नामों की सूची में 8 नाम हैं, मगर 14 कार्यकारिणी सदस्यों में केवल 2 को जगह मिल पाई है। इसी प्रकार स्थाई और विशेष आमंत्रित सदस्यों में 5 पदाधिकारी महिलाएं हैं। अर्थात कुल 131 की लंबी सूची में केवल 17 महिलाएं हैं।
यहां उल्लेखनीय है कि तनिक असंतोष की खबरों के बाद स्वयं पायलट ने यह कहा कि वे जरूरत होने पर कुछ और पात्र नेताओं को स्थान दिया जा सकता है।
-तेजवानी गिरधर

मंगलवार, नवंबर 18, 2014

वसुंधरा का तख्ता पलट टला, मगर खतरा बरकरार

हालांकि लंबे इंतजार व जद्दोजहद के बाद राज्य की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अपने मंत्रीमंडल का विस्तार तो कर पाईं और इसके साथ ही उनके तख्तापटल की आशंकाएं टल गईं, मगर राजनीतिक हलकों में अब भी यही राय है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उन्हें ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री बने नहीं रहने देंगे। पिं्रट व इलैक्ट्रॉनिक मीडिया पर हालांकि बहुत कुछ खुल कर सामने नहीं आ पाया, मगर इन दिनों सर्वाधिक सक्रिय सोशल मीडिया पर तो साफ तौर पर ये खबरें चल रही थीं कि जल्द ही पूर्व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ओम प्रकाश माथुर राज्य के मुख्यमंत्री बना दिए जाएंगे।
असल में जिस प्रकार राज्य मंत्रीमंडल के विस्तार में बाधाएं आईं, जिसकी वजह से भाजपा को उपचुनाव में झटका भी झेलना पड़ा, उसी से लग गया था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व वसुंधरा राजे के बीच सब कुछ ठीकठाक नहीं है। मंत्रीमंडल विस्तार के लिए वसुंधरा राजे को कई बार दिल्ली जाना पड़ा, मगर तकरीबन दस माह बाद जा कर उन्हें सफलता हासिल हो पाई। हालांकि मंत्रीमंडल को संतुलित किया गया है, मगर अब भी माना जाता है कि संघ लॉबी के घनश्याम तिवाड़ी व नरपत सिंह राजवी सरीखे कुछ प्रमुख नेता समायोजित नहीं हो पाए हैं, इस कारण मनमुटाव की फांस बरकरार है। यह तब और अधिक दुखदायी हो गई, जब पिछले दिनों वसुंधरा ने यह कह दिया कि इतना प्रचंड बहुमत किसी एक व्यक्ति का कमाल नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं की मेहनत व जनता का आशीर्वाद है। इसको लेकर खूब खबरबाजी हुई। बताया जाता है कि इसको लेकर मोदी की नाराजगी और बढ़ गई है। वसुंधरा के इस बयान को सीधे तौर पर मोदी पर निशाना करने के रूप में देखा गया। जाहिर तौर पर वसुंधरा विरोधी लॉबी ने इसका फायदा उठाने की कोशिश की होगी। ऐसे में माना यही जा रहा है कि वसुंधरा राजे सुरक्षित तो कत्तई नहीं है। आम धारणा यही बनती जा रही है कि मोदी को जैसे ही मौका मिलेगा, वे वसुंधरा को निपटा देंगे। कुछ लोग मानते हैं कि ऐसा वे दो-तीन माह में कर लेंगे, जबकि कुछ का मानना है कि स्थानीय निकाय चुनाव में उनको परफोरमेंस दिखाने के लिए कम से कम एक साल और मौका दिया जाएगा। बताया जाता है कि ओम प्रकाश माथुर को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाए जाने के बाद वसुंधरा को कुछ राहत मिली है। वैसे भी ये माना जा रहा था कि माथुर को भले ही ऊपर से थोपने की कोशिश की जाए, मगर विधायकों की आमराय उनके पक्ष में बनाना कठिन होगा। माना जाता है कि वे एक अच्छे रणनीतिकार व संगठनकर्ता तो हैं, प्रशासनिक तौर पर उतने कुशल नहीं, जितना एक मुख्यमंत्री को होना चाहिए। इसी वजह से बीच में गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया का भी नाम सामने आया था।
कुल मिला कर माना यही जा रहा है कि वसुंधरा विरोधी लॉबी अभी तक सक्रिय है और वह घात लगा कर बैठी है कि कब उन्हें कमजोर साबित किया जाए। हाईकमान की भी उन पर पैनी नजर है। ऐसे में वसुंधरा को बहुत सुरक्षित नहीं माना जा सकता।
-तेजवानी गिरधर

गुरुवार, नवंबर 13, 2014

क्या प्रो. जाट को मंत्री बनने के लिए पाला बदलना पड़ा?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बीच के जगजाहिर संबंधों की ही वजह रही कि राजनीतिक विश्लेषक यह मान कर चल रहे थे कि अजमेर के सांसद प्रो. सांवरलाल जाट को केन्द्रीय मंत्रीमंडल में स्थान नहीं मिल पाएगा और यह उनके साथ सबसे बड़ा धोखा होगा। राज्य में किसी केबीनेट मंत्री को लोकसभा चुनाव लड़ाया जाए तो इसका मतलब यही माना जाना चाहिए कि अगर वह जीता और पार्टी की सरकार बनी तो केन्द्रीय मंत्रीमंडल में उसका स्थान पक्का होगा, मगर प्रो. जाट के साथ ऐसा होता नजर नहीं आ रहा था। बेशक उनकी पैरवी मुख्यमंत्री वसुंधरा कर रही थीं, मगर चूंकि मोदी व उनके बीच ट्यूनिंग को ठीक माना जा रहा, इस कारण कम से कम राजनीति के जानकार तो यही मान कर चल रहे थे कि प्रो. जाट शायद ही मंत्री बन पाएं। कदाचित इसका अहसास खुद प्रो. जाट को भी रहा होगा। उनके लिए अफसोसनाक बात ये भी थी जो नसीराबाद सीट उन्होंने छोड़ी उसके लिए उनके पुत्र को पार्टी ने टिकट नहीं दिया। ऐसे में अगर उन्हें मंत्री नहीं बनाया जाता तो समझा जा सकता है कि जाती तौर पर उनके साथ क्या बीतती। सो बताते हैं कि उन्होंने अकेले वसुंधरा के भरोसे रहना उचित नहीं समझा। मोदी के करीबी भाजपा नेता ओम प्रकाश माथुर के लगातार संपर्क में रहे। यह बात राजनीति के जानकारों की जानकारी में भी थी। मगर इसका जिक्र मीडिया में कहीं नहीं आया। जैसे ही प्रो. जाट को मंत्री बनाया गया तो पत्रकारों ने खुलासा किया कि वे माथुर के संपर्क में भी थे।
बात अगर राजनीतिक समीकरणों की करें तो यह सब को पता है कि माथुर व वसुंधरा के बीच कैसे संबंध हैं। एक बारगी तो यह अफवाह तक फैल गई थी कि वसुंधरा को हटा कर माथुर को मुख्यमंत्री बनाया जा रहा है। अब समझा सकता है कि प्रो. जाट ने वसुंधरा के खासमखास होने के बाद भी माथुर से करीबी क्यों बढ़ाई। संभव है उन्हें लग रहा हो कि अकेले वसुंधरा उन्हें मंत्री नहीं बनवा पाएंगी। ऐसे में केवल वसुंधरा के भरोसे रह कर भला अपना राजनीतिक कैरियर काहे को खराब करते। जो भी हो माथुर से नजदीकी और मंत्री बनने में माथुर का हाथ होने की कानाफूसी का कुछ लोग ये भी अर्थ लगा रहे हैं कि प्रो. जाट ने ऐन वक्त पर पाला बदल लिया। कुछ लोग इसका ये भी अर्थ लगा रहे हैं कि वसुंधरा ने यह जानते हुए कि अकेले उनके दम पर वे मंत्री नहीं बन पाएंगे, खुद ही जाट से कहा होगा कि वे दूसरे चैनल पर भी काम करें। हालांकि अभी ये पक्का नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने पाला बदल लिया है, मगर यदि उनको मंत्री बनवाने में माथुर का हाथ रहा है, तो समझा जा सकता है कि अब मोदी व वसुंधरा में से कौन उनके लिए अहम रहेगा। वैसे भी केन्द्र में काम करना है तो मोदी के प्रति स्वामी भक्ति उन्हें दिखानी ही होगी।
-तेजवानी गिरधर

शनिवार, अक्टूबर 25, 2014

सोशल मीडिया ने तो बना दिया ओम प्रकाश माथुर को मुख्यमंत्री

एक ओर जहां राज्य मंत्रीमंडल के विस्तार की कवायद चल रही है, वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया ने भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ओम प्रकाश माथुर को मुख्यमंत्री बना दिया है और अब बस औपचारिक घोषणा का इंतजार है।
हालांकि ये बात सही है कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच ट्यूनिंग नहीं बैठने और असंतुष्ठ लॉबी के सक्रिय होने के कारण यह लग रहा है कि वसुंधरा राजे अब मुख्यमंत्री पद पर ज्यादा दिन नहीं रह पाएंगी। गोपनीय स्तर पर मुख्यमंत्री को हटाए जाने की कवायद भी चल रही है, जिसे मोदी का संरक्षण हासिल बताया जाता है। इस सनसनीखेज साजिश का खुलासा अपुन पहले ही कर चुके हैं। तब तक यही माना जा रहा था कि मोदी के खासमखास ओम प्रकाश माथुर की ताजपोशी होगी, मगर जैसे ही महाराष्ट्र के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया यह कयास लगाया जाना लगा कि शायद उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का विचार त्याग दिया गया है, इसी कारण फिर नई जिम्मेदारी दे दी गई है। इसमें कुछ लोगों का तर्क ये है कि एक तो उन्हें प्रशासनिक तंत्र को हैंडल करने का अनुभव नहीं है, दूसरा विधायकों के बीच वे आसानी से स्वीकार्य नहीं हैं। ऐसे में अगर वसुंधरा को हटाया भी गया तो गुलाब चंद कटारिया का नंबर आ सकता है।
जहां तक सोशल मीडिया पर माथुर की खबर चलने का सवाल है, उसका मजमून कुछ इस प्रकार है:-
ब्रेकिंग न्यूज- ओमप्रकाश माथुर होंगे राजस्थान के नये मुख्यमंत्री
जल्द ही राजस्थान को तानाशाही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया से मुक्ति मिलने की सम्भावना है। सूत्र बताते हैं कि वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की अनदेखी, अपने विधायकों पर तानाशाही रवैया रखने, 10 महीने में कुछ भी काम न हो पाना तथा केंद्र की वित्तीय सुविधाओं का उपयोग न कर पाने के कारण केन्द्रीय नेतृत्व ने उनको बदलने का फैसला कर लिया है। ऐसे में ओमप्रकाश माथुर का नाम प्रबल दावेदारों में सबसे ऊपर है।
जाहिर तौर पर राजस्थान की राजनीति से गायब हो चुके ओम प्रकाश माथुर चर्चा में आए तो उनके व्यक्तित्व की भी चर्चा होने लगी है। इस बारे में सोशल मीडिया पर अजमेर के वरिष्ठ पत्रकार एस पी मित्तल की एक टिप्पणी भी चल रही है। वो इस प्रकार है:-
ओम प्रकाश माथुर ने अपनी लाइन बड़ी की
सब जानते हैं कि भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री ओम प्रकाश माथुर और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे में छत्तीस का आंकड़ा है। राजनीतिक विवाद के चलते ही माथुर ने राजस्थान की राजनीति को छोड़ दिया। यदि माथुर वसुंधरा राजे के साथ विवादों में ही उलझते रहते तो शायद आज  इतने बड़ मुकाम पर नहीं पहुंचते। माथुर ने वसुंधरा राजे की लाइन को छोटा करने के बजाए स्वयं की लाइन को बड़ा करने की रणनीति अपनाई। माथुर ने पहले गुजरात में और फिर महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में अपनी राजनीतिक कुशलता का परिचय दिया। यही वजह रही कि इस बार माथुर को देश में सबसे बड़े उत्तर प्रदेश राज्य का प्रभारी बनाया गया है। आज माथुर जिस मुकाम पर खड़े हैं, वह राजस्थान की राजनीति से बहुत बड़ा है। माथुर की कामयाबी से राजस्थान के भाजपा नेताओं को सबक लेना चाहिए।
खैर, जो कुछ भी हो यह कहना कत्तई गलत नहीं होगा इस बार प्रचंड बहुमत से सरकार बनाने वाली वसुंधरा उम्मीद के विपरीत कमजोर साबित हुई हैं। उनके मोदी से संबंध न होने की बात को इस कारण भी बल मिला क्योंकि यह चर्चा जबरदस्त रही कि पिछले दिनों एक सभा में उन्होंने यहां तक कह दिया कि किसी एक व्यक्ति के दम पर चुनाव नहीं जीता जाता, जीत में सभी का सहयोग होता है। जाहिर है उनका ये बयान सुन कर मोदी की जुबान का स्वाद खराब हुआ ही होगा। ऐसे में अगर वे उन्हें निशाने पर लेते हैं, तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
-तेजवानी गिरधर

शुक्रवार, अक्टूबर 24, 2014

राज्य मंत्रीमंडल का विस्तार हर हालत में 27 तक होगा

राज्य मंत्रीमंडल के लंबे समय से प्रतीक्षित विस्तार का आखिर समय आ ही गया। कई बार चर्चा हुई कि विस्तार अब होगा, अब होगा, मगर हर बार किसी न किसी वजह से वह टलता ही रहा, मगर अब स्थिति यहां तक आ गई है कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को आगामी 27 अक्टूबर तक विस्तार करना ही होगा।
असल में यूं तो वसुंधरा राजे के पास आगामी 15 नवंबर तक का समय था। तब नसीराबाद से विधायक बनने के बाद इस्तीफा देकर सांसद बने प्रो. सांवरलाल जाट के बिना विधायक रहते मंत्री बने रहने को छह माह पूरे होने हैं। इस बात की कोई संभावना भी नहीं थी कि उन्हें फिर से विधानसभा का चुनाव लडय़ा जाए। अगर विधायक रखना ही था तो इस्तीफा ही क्यों दिलवाते। खैर, चूंकि 15 नवंबर तक जाट को इस्तीफा देना ही होगा और उनके इस्तीफा देते ही न्यूनमत 12 मंत्रियों की बाध्यता आ जाएगी, यानि कि तब तक उन्हें मंत्रीमंडल का विस्तार करना ही होगा। मगर इस बीच समस्या ये आ गई कि राज्य में कुछ स्थानीय निकायों के चुनाव के लिए आचार संहिता 28 अक्टूबर को लागू हो जाएगी और तब वे मंत्रीमंडल का विस्तार नहीं कर पाएंगी, इस कारण अब यह लगभग पक्का ही है कि 27 अक्टूबर तक किसी भी सूरत में जाट का इस्तीफा और मंत्रीमंडल का विस्तार कर दिया जाएगा। इसमें भी एक पेच बताया जा रहा है। भाजपा हाईकमान की इच्छा है कि फिलहाल जाट के इस्तीफा देने के साथ सिर्फ एक-दो नए मंत्री बना दिए जाएं और पूरा विस्तार बाद में किया जाए, मगर जानकारी ये है कि वसुंधरा ठीक से विस्तार करना चाहती हैं। अब देखना ये है कि क्या हाईकमान वसुंधरा राजे को अपनी बात मानने में कामयाब हो जाता है या फिर वसुंधरा की इच्छा को पूरा किया जाता है।
कुल मिला कर मंत्रीमंडल विस्तार के लिए उलटी गिनती शुरू होने के साथ मंत्री बनने के इच्छुक विधायकों में हलचल तेज हो गई है। बनने में कौन कामयाब होगा, ये तो वक्त ही बताएगा।
-तेजवानी गिरधर

रविवार, अगस्त 31, 2014

राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट

हालांकि राजस्थान में श्रीमती वसुंधरा राजे के नेतृत्व में प्रचंड बहुमत से भाजपा ने कामयाबी हासिल कर सत्ता हासिल की है और ऐसे में इसकी अस्थिरता की कल्पना करना भी नासमझी कहलाएगी, मगर राजनीति हल्कों में इस किस्म की चर्चा आम है कि भाजपा हाईकमान राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की संभावनाएं तलाश रहा है अथवा एक गुट विशेष वसुंधरा को अपदस्थ करने की फिराक में है।
बेशक ऐसी बात कपोल कल्पित ही लगती है, मगर जिस प्रकार आठ माह बीत जाने के बाद भी पूर्ण मंत्रीमंडल गठित नहीं हो पाया, उससे इसकी आशंका तो महसूस की ही जा रही है कि जरूर केन्द्र व राज्य में कहीं न कहीं कोई गतिरोध है। संभव है ऐसा मंत्री बनाने को लेकर पसंद-नापसंद को लेकर है। ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा हाईकमान विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी श्रीमती वसुंधरा को फ्रीहैंड देने के मूड में नहीं हैं। और इसी को लेकर खींचतान चल रही है। एक ओर जहां प्रचंड बहुमत से भाजपा को जिताने वाली वसुंधरा कम से कम राजस्थान में अपनी पसंद का ही मंत्रीमंडल बनाना चाहती हैं, वहीं केन्द्र में सत्तारूढ़ हो कर मजबूत हो चुकी भाजपा अपनी हिस्सेदारी, जिसे कि दखल कहना ज्यादा उपयुक्त होगा, रखना चाहती है। असल में वे दिन गए, जब केन्द्र में भाजपा विपक्ष में और कमजोर थी और वसुंधरा विधायकों के दम पर उस पर हावी थी, मगर अब हालात बदल गए हैं। केन्द्रीय नेता देश की सरकार चला रहे हैं। वे ज्यादा पावरफुल हो गए हैं। ऐसे में वे राजस्थान के मामले में टांड अड़ा रहे हैं। इसी अड़ाअड़ी के बीच ये चर्चा हो रही है कि मोदी राजस्थान में अपनी पसंद का मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं, जो उनके इशारे पर काम करे, वसुंधरा की तरह आंख में आंख मिला कर बात न करे। बताया जाता है कि मोदी की शह पर प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष ओमप्रकाश माथुर मुख्यमंत्री की कुर्सी हथियाने की जुगत भिड़ा रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि माथुर मोदी के कितने करीबी हैं। इस सिलसिले में तकरीबन सत्तर विधायकों की एक गुप्त बैठक भी हुई और जोड़तोड़ की कवायद चल रही है। मसले का एक पहलु ये भी है कि मोदी पूरे देश में अपने हिसाब से ही जाजम बिछाना चाहते हैं। केन्द्रीय मंत्रियों पर शिकंजे और अपने ही शागिर्द अमित शाह को भाजपा अध्यक्ष बनवाने से यह साफ है कि वे इंदिरा गांधी वाली शैली में काम कर रहे हैं। आपको याद होगा कि इंदिरा गांधी के सामने जा कर बात करने के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री उनकी भृकुटी के अंदाज का पूरा ख्याल रखा करते थे।
खैर, मोदी की शह पर राज्य में अंडरग्राउंड चल रही हलचल कितनी कामयाब होगी, यह कहना मुश्किल है, मगर इससे कम से कम वसुंधरा जरूर अचंभित हैं। हालांकि वे इतनी चतुर राजनीतिज्ञ हैं कि एकाएक कोई बड़ा बदलाव नहीं होने देंगी, मगर इतना जरूर है कि पिछली बार की तरह वे शेरनी की शैली नहीं अपना पा रही हैं। दमदार नेतृत्व के बावजूद उनके ओज में आई कमी को साफ तौर पर देखा जा सकता है। असल में पहले जब सीमित विधायक थे, तब उनका उन पर एकछत्र राज था, मगर इस बार ढ़ेर सारे विधायकों को संभालना आसान नहीं रहा है। उसमें आरएसएस लॉबी के विधायक लामबंदी कर रहे हैं, जो कि वसुंधरा के लिए सिरदर्द है। जो कुछ भी हो, मगर आने वाले दिनों में कुछ ऐसा साफ झलकेगा कि केन्द्र वसुंधरा पर शिकंजा रखना चाहती है, ताकि वे एक क्षत्रप की तरह मनमानी न कर पाएं।
-तेजवानी गिरधर

बुधवार, अगस्त 20, 2014

मगर आयोग की खत्म हुई साख का क्या होगा?

आरएएस के प्रश्रपत्र बिकने के लिए लीक होने, प्रश्र पत्रों में भारी गड़बडिय़ां पाए जाने जैसी गंभीर घटनाओं के सामने आने के बाद जिस प्रकार तेजी से जांच की जा रही है, उससे राजस्थान लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष हबीब खान गोराण की कुर्सी छिनेगी या रहेगी, दोषियों को वाकई कड़ी से कड़ी सजा मिल पाएगी या नहीं, ये सवाल इन दिनों में चर्चा में हैं, मगर सवाल ये उठता है कि इतनी गंभीर धांधली के कारण आयोग की साख को जो बट्टा लगा है, उसका क्या होगा? इसमें कोई दोराय नहीं कि अगर किसी भी स्तर पर गोराण की गड़बडिय़ों में संलिप्ता पाई जाती है तो उन्हें हटाने की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए, मगर साथ ही सवाल ये भी है कि क्या सरकार साख खो चुके आयोग की कार्यप्रणाली को सुधारने के प्रति वाकई गंभीर भी है या फिर मामला ठंडा होने के बाद वही घोड़े और वही मैदान की कहावत चरितार्थ हो जाएगी।
दरअसल जैसे ही मामला उजागर हुआ, उससे बेरोजगार युवा वर्ग तो अपने अंधकारमय होते भविष्य के प्रति बेहद चिंतित हो उठा है, वहीं सरकार पर भी भारी दबाव है कि निष्पक्ष जांच करवा कर दोषियों को सजा के मुकाम पर पहुंचाए। जाहिर तौर पर जैसा अमूमन होता है, किसी भी संस्था में कोई गड़बड़ी पाई जाती है तो सबसे पहले उसके मुखिया पर इस्तीफे देने या उसे हटाने की मांग जोर पकड़ लेती है। इस प्रकरण में भी यही हो रहा है। मामले ने राजनीतिक रूप भी ले लिया है। नतीजतन गोरान के पुराने मामलों को खंगाला जा रहा है। दिन-ब-दिन उन पर शिकंजा कसता जा रहा है। चूंकि उनकी नियुक्ति कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में हुई, इस कारण वे भाजपा सरकार के निशाने पर हैं, मगर सवाल ये है कि क्या केवल गौराण को इस्तीफा देने के लिए मजबूर करने अथवा हटाने की प्रक्रिया शुरू किए जाने मात्र से समस्या का हल हो जाएगा? क्या केवल मुखिया को अपदस्त कर देने से ही आयोग की व्यवस्था सुधर जाएगी और प्रश्न पत्र लीक होना बंद हो जाएंगे।
वस्तुत: जब भी इस प्रकार के संगीन मामले सामने आते हैं, वे राजनीति के शिकंजे में आ ही जाते हैं। मामले की जांच का मुद्दा तो उठता ही है, मगर सारा ध्यान संस्था के मुखिया को हटाने पर केन्द्रित हो जाता है। अगर यह मांग मान ली जाती है तो मामला ठंडा हो जाता है और उसके बाद जांचों का क्या होता है, उनका हश्र क्या होता है, सब जानते हैं। यानि कि गुस्सा संस्था प्रधान को हटाने तक ही सीमित रहता है और बाद में स्थिति जस की तस हो जाती है। हद से पकड़े गए मामले में दोषियों के खिलाफ कार्यवाही आरंभ हो जाती है, मगर शातिरों के इस प्रकार की गड़बड़ी करने की गुंजाइश ही न रहे, इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता।
इसमें काई दो राय नहीं कि वर्तमान में आयोग के जो हालात हैं, उससे उसकी पूरी कार्यप्रणाली ही संदेह के घेरे में आ गई है और उसमें आमूलचूल परिवर्तन करने की जरूरत है। मगर सवाल ये है कि आज जो नेता गौरान अथवा आयोग की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा रहे हैं, वे आयोग में अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति राजनीतिक आधार पर नहीं किए जाने का सवाल क्यों नहीं उठाते। सच तो ये है कि गोराण हो या पूर्ववर्ती अध्यक्ष, सभी की नियुक्ति राजनीतिक आधार पर ही की जाती रही है। राजनीतिक आधार पर ही नहीं, बल्कि जातीय तुष्टिकरण तक के लिए। नागौर के मौजूदा भाजपा सांसद सी. आर. चौधरी को भाजपा सरकार ने जाटों को खुश करने के लिए अध्यक्ष बनाया तो कांग्रेस ने मुस्लिमों की नाराजगी को कम करने के लिए गोराण की नियुक्ति करवा दी। चेयरमैन से लेकर सदस्य तक राजनीतिक दलों के वफादार हैं तो जाहिर है कि यहां प्राथमिकता प्रतिभा नहीं, बल्कि सियासी प्रतिबद्धता है। अगर हालत यह है तो आरपीएसी में गड़बडिय़ां और पेपर बिकना व लीक होना कोई आश्चर्य पैदा नहीं करता। ऐसे में भला कैसे उम्मीद की जा सकती है कि आयोग के कामकाज में निष्पक्षता या पारदर्शिता और परीक्षा कार्य में गोपनीयता बनी रहेगी। यानि कि अगर आयोग के कामकाज में सुधार लाना है तो आयोग में नियुक्ति की प्रक्रिया में परिवर्तन लाना होगा। साथ ही परीक्षा की गोपनीयता के सारे उपाय करने होंगे। यदि इस ओर ध्यान न दिया गया तो प्रतिभाएं निराश-हताश होती रहेंगी।
गोराण की नियुक्ति पर ही बड़ा सवाल
पर्चा लीक होने के साथ ही जिस प्रकार गोराण से जुड़े पुराने मामले उजागर हो रहे हैं, उससे यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि यदि उनका चरित्र संदिग्ध था तो सरकारी तंत्र में उनकी नियुक्ति की फाइल आगे सरकी ही है। स्वाभाविक रूप से जब उनको आयोग का अध्यक्ष बनाए जाने का प्रस्ताव तैयार किया होगा तो उसके साथ ही उनके अब तक के रिकार्ड से जुड़े कागजात भी नत्थी किए गए होंगे। या तो वे जानबूझ कर नीचे दबा दिए गए होंगे, या फिर राजनीतिक दबाव इतना अधिक बनाया गया कि वे नजरअंदाज कर दिए गए। यानि कि केवल मुस्लिमों को राजी करने के लिए जिस तरह उनकी नियुक्ति की गई, उसके लिए सीधे तौर पर पिछली अशोक गहलोत सरकार जिम्मेदार है।
एसपी मंथली प्रकरण में भी उठे थे गोराण पर सवाल
अजमेर के तत्कालीन एसपी राजेश मीणा के बंधी वसूली के प्रकरण के दौरान भी गोराण का नाम आया था। उनका जिक्र संबंधित एफआईआर में था। इस रूप में कि राजेश मीणा और एएसपी लोकेश मीणा के लिए थानों से बंधी जुटाने वाले रामदेव ठठेरा 2 जनवरी 2013 को कपड़े की थैली लेकर लोकेश मीणा के निवास से गौरान के बंगले में गया था। वह 40-50 मिनट तक बंगले में रहा और इसके बाद खाली हाथ लोकेश मीणा के निवास पर लौट आया। लेकिन आरोप पत्र में उनका नाम नहीं था। इस बारे में एसीबी ने उनको क्लीन चिट दे दी, मगर ये खुलासा नहीं किया कि ठठेरा उनके निवास पर क्यों गया था। उसने ये भी साफ नहीं किया कि अगर गौरान का बंधी मामले से कोई लेना देना नहीं था तो फिर उनका नाम एफआईआर में क्यों दर्ज किया गया। उस वक्त न तो सत्तारूढ़ कांग्रेस ने और न ही विपक्ष में बैठे भाजपा विधायकों ने इस मामले को उठाया। अब जबकि आरपीएससी अपने ही अंदरूनी मामले में फंस गई तो गोराण के उस प्रकरण को भी उठाया जा रहा है। खींवसर विधायक हनुमान बेनीवाल ने विधानसभा में आरोप लगाया कि जनवरी 2013 में बंधी मामले में गोराण की भूमिका की जांच क्यों नहीं हुई, जबकि एफआईआर में उनका नाम है। यानि कि उसी वक्त मामले की गहन जांच कर ली जाती तो इतने बड़े संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के मामले में दूध का दूध पानी का पानी हो जाता।
एसीबी की कार्यवाही भी संदेह के घेरे में
बेशक, इस पूरे प्रकरण में सचमुच क्या हुआ, इसके लिए एसीबी पर ही यकीन करना होगा क्योंकि जांच एजेंसी वही है, मगर एसीबी के कार्यवाहक महानिदेशक अजीत सिंह का मात्र इतनी सफाई देना ही पर्याप्त नहीं कि गोरान की इस मामले में संलिप्तता नहीं पाई गई और उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला। कैसी विडंबना है कि पहले खुद ही गोरान का नाम एफआईआर में शामिल किया और फिर खुद की खंडन कर दिया कि उनके बारे में कोई सबूत नहीं मिला है। वो भी तब जब निलंबित एसपी मीणा ने अपनी जमानत अर्जी में सवाल उठाया था। वरना यह पता ही नहीं लगता कि एसीबी ने कहां चूक की है। जब अजीत सिंह ने यह कहा कि गोराण बिलकुल निर्दोष हैं तो उन्हें यह भी बताना होगा कि आखिर किस तरह? आयोग अध्यक्ष का पद संवैधानिक है और आयोग की बड़ी गरिमा है, उसके बारे में यदि कोई संशय पैदा होता है तो उस पर सफाई होना बेहद जरूरी है। वरना, यह शक करना वाजिब होगा कि राजनीतिक दबाव की वजह से एसीबी ने लीपापोती की।
-तेजवानी गिरधर