तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

रविवार, दिसंबर 01, 2024

रात के बारह बजे क्यों तोड़ते हैं व्रत?

एक सृष्टि वह है, जो हमारे चारों ओर विद्यमान है, उसके हम अंग हैं, हम उसी के अनुरूप उठते-बैठते, खाते-पीते हैं, हम उससे बंधे हुए हैं, मगर एक सृष्टि वह भी है, जो हम निर्मित करते हैं। हमारे आस-पास। जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि का कथन उसी संदर्भ में है। ऐसा नहीं है कि जैसी हमारी दृष्टि होगी, पूरी की पूरी सृष्टि भी वैसी ही हो जाएगी। वजह ये कि सृष्टि नियंता की तरह हम उतने शक्तिमान नहीं हैं, हमारी शक्ति की सीमाएं हैं। जैसे पूरी सृष्टि के शाश्वत व सार्वभौमिक नियम हम पर लागू होते हैं, वैसे ही हमारी बनाई हुई सृष्टि के नियम भी हम को प्रभावित करते हैं। एक सीमा तक।

आपने देखा होगा कि कई बार मंगलवार या शनिवार अथवा किसी और वार का व्रत रखने वाले किसी पार्टी में होते हैं तो कहते हैं कि आज अमुक वार है, मेरा व्रत है, अतः रात के बारह बजे दूसरा वार शुरू होने पर ही अन्न अथवा मदिरा का सेवन कर पाऊंगा। सवाल ये उठता है कि हम अपनी हिंदू संस्कृति के तहत व्रत रखते हैं तो उसमें वार का नियम भी हिंदू संस्कृति का लागू होगा, रात बारह बजे वार बदलने का नियम तो आंग्ल नियम है। हमारे यहां तो सूर्याेदय के समय नया वार शुरू होता है, जो कि दूसरे दिन सूर्याेदय तक रहता है। अर्थात कोई भी वार दिन से शुरू होता है और उसके बाद उस वार की रात आती है। इसी प्रकार इस्लामिक परंपरा में पहले रात व बाद में दिन शुरू होता है। तभी तो जुम्मे अर्थात शुक्रवार से पहले आने वाले गुरुवार को जुम्मेरात कहते हैं।

मुद्दा ये है कि आपने यदि मंगलवार को व्रत रखा हुआ है तो वह अगले दिन सुबह सूर्याेदय तक चलना चाहिए, जबकि अमूमन लोग रात बारह बजे ही वार बदलने वाले नियम को मानते हुए बारह बजते ही व्रत तोड़ देते हैं। आपने ये भी देखा होगा कि जो व्यक्ति मंगलवार का व्रत रखता है तो वह सोमवार की रात बारह बजे से पहले खा-पी लेता है, वह मानता है कि बारह बजे मंगलवार शुरू हो जाएगा, जबकि वह गलत है। इस बात को लेकर आपने कई बार मित्र मंडली में बहस होती हुई देखी होगी।

मेरा ऐसा अनुभव है कि कोई भी व्यक्ति जो भी नियम अपने लिए बनाता है, वह उस पर लागू होता है, उसमें संस्कृति के अनुसार बने हुए नियम का कोई अर्थ नहीं होता। यदि हमने मंगलवार की रात बारह बजे वार बदलने की धारणा अपने मन में कायम कर रखी है तो वही हमें प्रभावित करेगी। यदि हम उस धारणा को भंग करेंगे तो कदाचित वह प्रतिकूलता दे सकती है। और एक बार प्रतिकूलता मिली तो हमारा यकीन मजबूत हो जाता है कि मैंने अपना बनाया हुआ नियम तोड़ा, इस कारण प्रतिकूल स्थिति उत्पन्न हुई। वस्तुतः यह हमारी आस्था का सवाल है। एक गीत आपने सुना होगा- मानो तो गंगा मां हूं, ना मानो तो बहता पानी। ताजा मुद्दे पर यह पंक्ति सटीक बैठती है। मेरी नजर में इसका मानसिक खेल ये है कि जैसे ही किसी कारणवश हम अपनी निर्मित धारणा, जिसे कि हम लघु सृष्टि भी कह सकते हैं, के विपरीत कोई काम करेंगे, तो हमारे भीतर अपराधबोध उत्पन्न होगा, जो कि हमारी मानसिक शक्ति को कमजोर करेगा व मन में आशंका उत्पन्न होगी। कदाचित प्रतिकूल परिणाम भी हो सकता है। दूसरी ओर जिसने इस प्रकार वार का नियम नहीं बना रखा है तो उस को कोई फर्क नहीं पड़ता।

एक और उदाहरण देखिए। परंपरागत रूप से कुछ लोग मंगलवार व वृहस्पतिवार को बाल-नाखून आदि नहीं काटते, जबकि अनेक लोग बाल काटते समय वार को कोई अहमियत नहीं देते। दोनों प्रकार के लोगों पर अपने-अपने हिसाब से बनाई गई धारणा काम करती है। यह ठीक है कि जब भी मंगलवार व वृहस्पतिवार को बाल नहीं कटवाने की परंपरा शुरू हुई, उस वक्त उसके कोई तार्किक कारण रहे होंगे। हमारे दैनंदिन जीवन में प्रतिदिन में हम अनेकानेक परंपरागत नियमों का पालन करते हैं, मगर आपने देखा होगा कि समय बदलने के साथ वे नियम टूटे भी हैं और उनमें शिथिलता आई है। अब किसी ने नियम तोड़ा है तो उसे नुकसान हुआ ही है या होगा और किसी ने नियम पाला है तो उसे बहुत फायदा हुआ ही है या होगा, इस बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।

यूं नियम की बड़ी महत्ता है, इस पर विस्तार से कभी और बात करेंगे।

आखिर में एक बात जरूर कहना चाहता हूं। प्रकृति के मामले में हमारा बोला हुआ तथ्य पूर्ण सत्य होगा, इसकी संभावना कम है, क्योंकि प्रकृति में दो और दो चार नहीं होता। कभी पांच तो कभी तीन हो जाता है। यही वजह है कि प्रकृति समझ में नहीं आती। वस्तुतरू यह प्रकृति चूंकि विरोधी तत्त्वों से मिल कर बनी है, इस कारण इसमें विरोधाभास भी खूब हैं। यह इतनी रहस्यपूर्ण है कि हम इसकी थाह नहीं पा सकते। यहां कुछ भी अंतिम सत्य नहीं है। जिसे हम सत्य मानते हैं, वही देश, काल, परिस्थिति बदलने पर असत्य हो जाता है।


गुरुवार, नवंबर 21, 2024

क्या शुभ मुहूर्त निकालना बेमानी है?

भारतीय संस्कृति में सभी कार्य शुभ मुहूर्त में ही करने की परंपरा है। ऐसा कार्य की सफलता के लिए किया जाता है। इसके प्रति लोगों में गहरी आस्था है। विवाह, भवन निर्माण, दुकान के उद्घाटन इत्यादि बड़े कार्यों में तो शुभ मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा ही जाता है, कई लोग छोटे-छोटे कार्य भी चोघडिय़ा देख कर करते हैं। यह तो हुआ तस्वीर का एक रुख। दूसरा रुख ये है कि शुभ मुहूर्त में काम आरंभ करने पर भी कई बार असफलता हाथ लगती है। यह सर्वविदित है कि लगभग हर विवाह शुभ मुहूर्त में ही होता है, कुंडलियों का मिलान किया जाता है, बावजूद इसके गृह क्लेश और संबंध विच्छेद की घटनाएं होती हैं। शुभ मुहूर्त में दुकान का आरंभ करने पर भी कई बार दुकान नहीं चलती या फिर घाटा होने पर बंद करनी पड़ती है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या शुभ मुहूर्त बेमानी है?

किसी सज्जन ने हाल ही एक पोस्ट सोशल मीडिया पर डाली, जिसका सारांश आपकी नजर पेश है-

सीता विवाह और राम का राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त में किए गए, फिर भी न वैवाहिक जीवन सफल हुआ, न ही राज्याभिषेक। जब मुनि वशिष्ठ से इसका जवाब मांगा गया तो उन्होंने साफ कह दिया-

सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेहूं मुनिनाथ। 

लाभ हानि, जीवन मरण, यश-अपयश विधि हाथ।

इसका तात्पर्य ये है कि विधि ने जो निर्धारित कर रखा है, वही होता है, चाहे आप कोई भी कार्य शुभ मुहूर्त में आरंभ करें। 

विशेष रूप से मरण के मामले में हमारा कोई दखल नहीं। वह अवश्यंभावी है। उसे टाला नहीं जा सकता। बेशक चिरंजीवी होने का वरदान तो होता है, मगर कभी न मरने का वरदान कभी किसी को नहीं मिला। यदि कोई मृत्यु से बचने के अनेक प्रकार के वरदान किसी के पास थे तो भी विधि ने उसकी मृत्यु का युक्तिसंगत रास्ता निकाल दिया। पितामह भीष्म को भले ही इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था, मगर उन्हें भी एक दिन मरना था। बस फर्क इतना था कि वे अपनी मृत्यु को टाल सकते है। 

उस पोस्ट में यह भी लिखा है कि भगवान राम व भगवान कृष्ण को विधि अनुसार ही फल भोगने पड़े। इसी प्रकार शिव जी सती की मृत्यु को नहीं टाल सके, जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है। इसी प्रकार रामकृष्ण परमहंस भी अपने कैंसर को न टाल सके। न साईं बाबा अपनी मृत्यु को और न ईसा मसीह अपनी पीड़ादायक मृत्यु को। रावण व कंस बहुत शक्तिसंपन्न थे, मगर उनका अंत भी विधि ने तय कर रखा था।

प्रश्न ये उठता है कि जब सब कुछ विधि के ही हाथ है तो मुहूर्त निकलवाने की जरूरत क्या है?

ऐसा प्रतीत होता है कि विधि का विधान तो काम करता ही है, मगर किसी भी कार्य की सफलता में कई फैक्टर काम करते हैं। वस्तुतः विधि अपनी ओर से कुछ भी निर्धारित नहीं करती। वह हमारे कर्मों, काम के प्रति समर्पण, लगन, मेहनत आदि से ही गणना कर निर्धारण करती है। कदाचित पूर्व जन्म के कर्म व संस्कार भी भूमिका अदा करते हैं। शुभ समय में काम आरंभ करना भी एक फैक्टर है, मगर अकेले इससे काम नहीं चलता, अन्य फैक्टर भी काम करते हैं। इसी कारण शुभ मुहूर्त में कार्यारंभ करने पर भी कई बार असफलता हाथ लगती है। 

एक और बात ये भी लगती है कि जीवन के सोलह संस्कार व अन्य बड़े काम पूर्व कर्मों के आधार पर पहले से निर्धारित होते हैं, मगर दैनिक दिनचर्या से जुड़े छोटे-मोटे कार्य में शुभ मुहूर्त अपनी भूमिका निभाता है। इसका आप स्पष्ट अनुभव भी कर सकते हैं। चूंकि शुभ मुहूर्त का अस्तित्व माना गया है, इस कारण यह जानते हुए भी कि होगा वही जो मंजूरे खुदा होगा, हम शुभ मुहूर्त निकलवाते हैं। और सफलता नहीं मिलने पर हम यह मान कर अपने आप को संतुष्ट करते हैं कि हमारी किस्मत में नहीं था, या फिर हमसे कोई त्रुटि हो गई होगी।

बुधवार, नवंबर 13, 2024

क्या अंतिम समय में भगवान का नाम लेने से कल्याण संभव है?

क्या अंतिम समय में भगवान का नाम लेने से कल्याण संभव है? मान्यता तो यही है, इसी कारण अंत समय में भगवान का नाम लेने व स्मरण करने की सलाह दी जाती है। मरणासन्न व्यक्ति के सामने भगवान का नाम दोहराया जाता है, ताकि उसका ध्यान भगवान में लगे। मगर सवाल यह उठता है कि जिसने जीवन भर धर्माचरण नहीं किया, केवल आखिरी वक्त में भगवान का नाम लेने से उसका कल्याण कैसे हो सकता है? अव्वल तो मरते समय भगवान पर ध्यान स्थिर होना ही मुष्किल है। इस बारे में विद्वानों की मान्यता है कि अंतिम समय में भगवान का नाम लेने से कल्याण की संभावना है, लेकिन यह व्यक्ति की आंतरिक स्थिति, उनके कर्म, और पूरे जीवन में किए गए प्रयासों पर भी निर्भर करता है। असंभव भले न हो, मगर कठिन जरूर है। आध्यात्मिक दृष्टि से इसका तात्पर्य यह है कि अंतिम समय में भगवान का नाम लेने से व्यक्ति की चेतना का स्तर ऊंचा होता है और वह भौतिक बंधनों से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार, भले ही व्यक्ति ने जीवन में गलतियां की हों, अंत में भगवान का स्मरण करने से उसे एक विशेष कृपा मिल सकती है।

दूसरा मत ये है कि सिर्फ अंतिम समय में भगवान का नाम लेना ही पर्याप्त नहीं होता। यदि व्यक्ति अपने पूरे जीवन में धर्म का पालन करता है, सत्कर्म करता है और भगवान का स्मरण करता है, तो अंत में उसका भगवान से जुड़ना सहज और स्वाभाविक हो जाता है।

 अंतिम समय में भगवान का स्मरण केवल तभी फलदायी होता है जब व्यक्ति ने पूर्व में आध्यात्मिक साधना की हो या संपूर्ण विश्वास से उसे किया हो।


शनिवार, नवंबर 09, 2024

नंदी के कान में क्यों बताते हैं मनोकामना?

आपने देखा होगा कि कई श्रद्धालु षिवजी के मंदिर में दर्षन को जाते हैं तो मंदिर के गर्भगृह के ठीक बाहर सामने स्थित नंदी की प्रतिमा के कान में कुछ फुसफुसाते हैं। असल वे नंदी को अपनी मनोकामना बताते हैं। विष्वास यह कि नंदी उनकी मनोकामना की जानकारी षिवजी को देंगे और षिवजी उसे पूरा करेंगे। असल में मान्यता है कि नंदी षिवजी के परमभक्त व उनके वाहन हैं। उसके सबसे करीब। अतः अर्जी ठीक मुकाम पर पहुंचेगी। यह ठीक वैसे ही है, जैसे श्रद्धालु दरगाह ख्वाजा साहब में हाजिरी के वक्त ख्वाजा साहब से दुआ मांगते हैं, मगर हाजिरी अर्थात जियारत की रस्म खुद्दाम साहेबान अदा करते हैं। इसी प्रकार तीर्थराज पुश्कर में स्नान के दौरान पूजा अर्चना किसी पुरोहित के माध्यम से करवाते है। बेषक अपने ईश्ट से सीधे भी संपर्क साधा जा सकता है, मगर माध्यम की जरूरत होती ही है। जैसे मुवक्किल को वकील की जरूरत होती है। किसी सज्जन ने इंटरनेट पर लिखा है कि नंदी के कान में मनोकामना बताने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। यह आस्था मात्र है। बिलकुल यह प्रथा विज्ञान द्वारा प्रमाणित नहीं है। मगर वैज्ञानिक आधार तलाषना भी तो अर्थहीन है। क्या खादिम व पुरोहित की भूमिका का कोई वैज्ञानिक आधार है। नहीं। तो नंदी की अहमियत पर सवाल करना उचित कैसे हो सकता है?

पौराणिक कथा के अनुसार, शिलाद नाम के मुनि ने संतान प्राप्ति की कामना के साथ भगवान इंद्रदेव को रिझाने के लिए तपस्या की। परंतु, इंद्रदेव ने संतान का वरदान देने में असर्मथता जताते हुए भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अनुरोध किया। इसके बाद शिलाद मुनि ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की। जिसके बाद शिवजी प्रकट हुए और उन्होंने शिलाद को स्वयं के रूप में प्रकट होने का वरदान दिया। महादेव के वरदान के बाद शिलाद मुनि को नंदी के रूप में संतान प्राप्त हुई। शिवजी के आशीर्वाद के कारण नंदी अजर अमर हो गए। उन्होंने संपूर्ण गणों, गणेश व वेदों के समक्ष गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक कराया। जिसके बाद नंदी नंदीश्वर कहलाए। भगवान शिव ने नंदी को वरदान दिया कि जहां उनका निवास होगा, वहां स्वयं भी निवास करेंगे। मान्यता है कि तब से ही शिव मंदिर में भगवान शिव के सामने नंदी विराजमान रहते हैं।


बुधवार, नवंबर 06, 2024

ज्योतिषी के लिए आस्तिक होना जरूरी नहीं?

क्या आपको इस बात पर यकीन होगा कि कोई नास्तिक भी ज्योतिश का प्रकांड पंडित हो सकता है। जाहिर है, आप यही कहेंगे कि ऐसा कैसे संभव हो सकता है। जो आस्तिक नहीं, उसे ज्योतिश आ ही कैसे सकता है। मगर सच ये है कि ऐसा संभव होते देखा है मैने। मेरे एक अभिन्न मित्र नास्तिक हैं, बचपन से। कभी कोई पूजा-पाठ नहीं करते। न दीया जलाते हैं और न ही अगरबत्ती। बावजूद इसके वे हस्तरेखा व कुंडली के प्रकांड विद्वान हैं। सटीक भविश्यवाणी किया करते हैं। दिलचस्प बात ये है कि खुद टोने-टोटके में यकीन नहीं करते, मगर जिज्ञासु को उसका उपाय बताते हैं। मैं तब अचंभित रह गया, जब उन्होंने एक सुपरिचित ज्योतिशी को उनकी हथेली देख कर बता दिया था अमुक दिन आपका एक बडा ऑपरेषन होगा, जबकि स्वयं ज्योतिशी को इसकी जानकारी नहीं थी। ऐसा प्रतीत होता है कि ज्योतिश विषुद्ध रूप से एक विज्ञान है, जैसे एमबीबीएस। एमबीबीएस करने के लिए धार्मिक होने की कोई जरूरत नहीं, ठीक इसी प्रकार ज्योतिर्विद्या सीखने के लिए आस्तिक होना जरूरी नहीं। हां, इतना जरूर हो सकता है कि आस्तिक ज्योतिशी भविश्य वाणी करते वक्त अंतर्दृश्टि का उपयोग भी किया करते होंगे। इन्ट्यूषन का उपयोग करते होंगे। मैं निजता की रक्षा करते हुए नास्तिक ज्योतिशी का नाम उजागर नहीं करूंगा। मेरा मकसद सिर्फ ज्योतिश को विषुद्ध विज्ञाान होने को आपसे साझा करना है।


गुरुवार, अक्टूबर 31, 2024

मनो संवाद विधि से गीता पर लिखी अनूठी पुस्तक

आपको यह जान कर अचरज हो सकता है कि क्या मनोसंवाद विधि से, पश्यंति वाणी से कोई पुस्तक लिखी जा सकती है। जी हां, अजमेर  के विद्वान श्री शिव शर्मा ने यह उपलब्धि हासिल की है। इस पुस्तक में सूफी संत हजरत हरप्रसाद मिश्रा उवैसी ने गीता के एक श्लोक की 110 पेज में व्याख्या कराई है। प्राचीन ऋषि-मुनियों वाली मनोसंवाद विधि से कराए गए इस कार्य के लिए आपने अपने मुरीद अजमेर के जाने-माने इतिहासविद व पत्रकार श्री शिव शर्मा को माध्यम बनाया।

गीता शास्त्र में दूसरे अध्याय के सर्वाधित चर्चित श्लोक है-

कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफल हेतुर्भूमा, ते संगोस्तव कर्मणि।

इस एक ही श्लोक में गीता के कर्मयोग का सार निहित है। इसका अर्थ समझने के लिए कर्म के उनतीस रूपों की विवेचना की गई है-स्वकर्म, स्वधर्म, नियतकर्म, अकर्म, विकर्म, निषिद्ध कर्म आदि। आपने स्पष्ट किया है कि कर्म के शास्त्रीय, प्रासंगिक, मनोवैज्ञानिक और परिस्थितिगत व्यावहारिक पक्षों को ज्ञात लेने के बाद ही इस श्लोक के वास्तविक अर्थ को समझा जा सकता है। गुरुदेव ने 22 नवंबर 2008 को महासमाधि ले ली थी और यह कार्य आपने 2011 में करवाया। आपकी रूहानी चेतना के माध्यम बने आपके शिष्य श्री शिव शर्मा ने बताया कि शक्तिपात के द्वारा आपने नाम दीक्षा के वक्त ही मेरी कुंडलिनी शक्ति को आज्ञाचक्र पर स्थित कर दिया था। फिर मेरी आंतरिक चेतना को देह से समेट कर आप इसी जगह चौतन्य कर देते थे। उसी अवस्था में आप इस श्लोक की व्याख्या समझाते थे। यह कार्य पश्यन्ती वाणी के सहारे होता था। वाणी के चार रूप होते हैं-परा यानि जिसे आकाश व्यापी ब्रह्म वाणी जो केवल सिद्ध संत महात्मा सुनते हैं, पश्यन्ति यानि नाभी चक्र में धड़कने वाला शब्द जो आज्ञा चक्र पर आत्मा की शक्ति से सुना जाता है और देखा भी जाता है, मध्यमा यानि हृदय क्षेत्र में स्पंदित शब्द और बैखरी यानि कंड से निकलने वाली वाणी जिसके सहारे में हम सब बोलते हैं। कामिल पूर्ण गुरू हमारे अंतर्मन में पश्यन्ती के रूप में बोलते हैं। गुरुदेव ने मुझ पर इतनी बड़ी कृपा क्यों की, मैं नहीं जानता, किंतु जिन दिनों आप मुझसे यह कार्य करवा रहे थे, उन दिनों ध्यान की खुमारी चढ़ी रहती थी। ध्यान में गीता, मौन में गीता, इबादत में गीता, सत्संग में गीता, अध्ययन में गीता और चिंतन में भी गीता ही व्याप्त रहती थी। बाहरी स्तर पर जीवन सामान्य रूप से चलता रहता था, लेकिन अंतर्मन में गुरु चेतना, गीता शास्त्र और भगवान वासुदेव श्री कृष्ण की परा चेतना धड़कती रहती थी।

हजरत मिश्रा जी ने भगवान श्री कृष्ण के दो बार दर्शन किए थे। उनके दीक्षा गुरू सूफी कलंदर बाबा बादामशाह की भी श्रीकृष्ण में अटूट निष्ठा थी। संभवतः इसीलिए पर्दा फरमाने के बाद भी आपने गीता के इस एक ही श्लोक की विराट व्याख्या वाला लोक कल्याणकारी कार्य कराया है। इस पुस्तक में गुरुदेव ने कहा है कि मनुष्य मन का गुलाम है और गीता इस गुलामी से छूटने की बात करती है। आप कामनाओं के वश में हैं और गीमा इनसे मुक्त होने की राह दिखाती है। आप पर अहंकार हावी है, जबकि गीता इस अहंकार को जड़मूल से उखाड़ फैंकने की बात समझाती है। आप भोग की तरफ भागते हैं, गीता कर्मपथ पर दौड़ाती है। आप स्वर्ग के लिए ललचाते हैं और गीता आपको जन्म-मरण से छुटकारा दिलाने वाले परमधाम तक पहुंचाना चाहती है। इसलिए गीता से भागो मत, उसे अपनाओ, कर्मयोग से घबराओ मत, उसे स्वीकार करो। तुम मोक्षदायी कर्मयोग के पथ पर कदम तो रखो, भगवान स्वयं तुम्हें चलाना सिखा देंगे।

पुस्तक में गुरू महाराज ने कहा है कि मनुष्य को केवल कर्तव्य कर्म करने का अधिकार है। स्वैच्छाचारी कर्म उसका पतन करते हैं। यह पुस्तक अजमेर के अभिनव प्रकाशन ने प्रकाशित की है। इसके बाद नारी मुक्ति से संबंधित अगली पुस्तक में गुरूदेव गीता के ही आधे श्लोक की व्याख्या करा रहे हैं।

लेखक शिव शर्मा स्वभाव से दार्शनिक हैं और अजमेर के इतिहास के अच्छे जानकार हैं। इससे पहले वे अनेक पुस्तकें लिख चुके हैं। उनमें प्रमुख हैं-भाषा विज्ञान, हिंदी साहित्य का इतिहास, ऊषा हिंदी निबंध, केशव कृत रामचन्द्रिका, कनुप्रिया, चंद्रगुप्त, रस प्रक्रिया, भारतीय दर्शन, राजस्थान सामान्य ज्ञान, हमारे पूज्य गुरुदेव, पुष्कर, अध्यात्म और इतिहास, अपना अजमेर, अजमेर - इतिहास व पर्यटन, दशानन चरित, सदगुरू शरणम, मोक्ष का सत्य, गुरू भक्ति की कहानियां।


सोमवार, अक्टूबर 28, 2024

ज्ञानी की छाया नहीं बना करती?

विद्वान कहते हैं कि ज्ञान को उपलब्ध व्यक्ति की छाया नहीं बनती। इस पर सहसा यकीन नहीं होता। भला किसी व्यक्ति की छाया कैसे नहीं बन सकती। धूप के सामने खडे होंगे तो छाया बनेगी ही। अतः कुछ विवेचकों ने इसका अर्थ यह निकाला है कि यह कथन भौतिक नहीं, बल्कि गहन और आध्यात्मिक है, जिसका संबंध आत्मबोध, आत्मज्ञान या आध्यात्मिक जागरूकता से है। अर्थत जब व्यक्ति वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तो वह कर्म बंध व भौतिकता से परे हो जाता है। यह विचार खासकर अद्वैत वेदांत व बौद्ध धर्म से आया हुआ प्रतीत होता है। छाया भौतिक संसार की सीमाओं, माया या अज्ञानता का प्रतीक हो सकती है। जब व्यक्ति ज्ञान के उच्चतम स्तर पर पहुंचता है, तो वह माया या भौतिक बंधनों से मुक्त हो जाता है, और इस कारण उसकी छाया नहीं बनती। छाया का न बनना यह दर्शाता है कि वह व्यक्ति अब आत्मा के शुद्ध स्वरूप को प्राप्त कर चुका है, जो असीम और अप्रभावित है।

छाया का अभाव यह भी इंगित करता है कि उस व्यक्ति में कोई भ्रम या अज्ञानता शेष नहीं रहती, क्योंकि वह अब पूर्ण ज्ञान में है। छाया के मायने हैं संचित कर्म। जो मृत्यु के बाद अगले जन्म में साथ चलते हैं। ज्ञानी चूंकि अनासक्त भाव से कृत्य करता है, इस कारण छाया के रूप में कर्मबंधन बनता ही नहीं। सारे कर्म पानी पर खींची गई रेखा के समान होते हैं। कदाचित कथन भौतिक रूप से सही भी हो। ज्ञातव्य है कि सामुद्रिक षास्त्र में यह मान्यता है कि जब व्यक्ति की मृत्यु निकट होती है तो कर्मों के रूप में संचित छाया आगे की या़त्रा के लिए षरीर से विलग हो जाती है। छाया बनना बंद हो जाती है। इस विचार की रोषनी में यह ठीक प्रतीत होता है कि ज्ञानी की छाया वाकई नहीं बनती हो, क्योंकि उसने कर्मों का संचय किया ही नहीं है।