तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

रविवार, दिसंबर 22, 2024

पृथ्वीराज चौहान को अश्वत्थामा ने दी थी शब्दभेदी बाण की विद्या?

भारत के अन्तिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान (तृतीय), जिनका कि अजमेर की तारागढ़ पहाड़ी पर स्मारक बना हुआ है, के देहांत के साथ शब्द भेदी बाण का जिक्र आवश्यक रूप से आता है। उन्हें शब्द भेदी बाण चलाना किसने सिखाया या यह विद्या वरदान में दी, इसको लेकर इंटरनेट पर अलग-अलग तरीके से जानकारी पसरी हुई है। हालांकि उसके पुख्ता ऐतिहासिक प्रमाण को लेकर सभी जानकार मौन हैं, मगर किसी न किसी के हवाले से वे बताते हैं कि उन्हें यह विद्या अश्वत्थामा ने दी। 

ज्ञातव्य है कि अश्वत्थामा के बारे में मान्यता है कि वे काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के सम्मिलित अंशावतार थे और आठ चिरंजीवियों में से एक हैं। वे गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र थे। द्वापर युग में जब कौरव व पांडवों में युद्ध हुआ था, तब उन्होंने कौरवों का साथ दिया था। अश्वत्थामा अत्यंत शूरवीर एवं प्रचंड क्रोधी स्वभाव के योद्धा थे। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को चिरकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया था। वे आज भी पृथ्वी पर अपनी मुक्ति के लिए भटक रहे हैं। यह भी मान्यता है कि मध्यप्रदेश के बुरहानपुर शहर से 20 किलोमीटर दूर असीरगढ़ के किले में भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर है। बताते हैं कि अश्वत्थामा प्रतिदिन इस मंदिर में भगवान शिव की पूजा करने आते हैं। अश्वत्थामा को अन्य कई स्थानों पर भी देखे जाने के किस्से हैं।

बताते हैं कि 1192 में पृथ्वीराज चौहान मुहम्मद गौरी से युद्ध में हार गए तो वे जंगल की ओर निकल पड़े। वे एक शिव मंदिर में प्रतिदिन आराधना करने जाते थे। वह शिव मंदिर क्या असीरगढ़ किले का ही मंदिर था, इस बारे में कोई उल्लेख नहीं है। एक बार उन्होंने पाया कि अलसुबह उनसे पहले कोई पूजा-अर्चना कर गया। इस पर उन्होंने इस रहस्य का पता लगाने के लिए भगवान शिव की आराधना की तो उन्हें एक बुजुर्ग ने दर्शन दिए। उसके सिर पर गहरा घाव था। पृथ्वीराज चौहान अच्छे वैद्य भी थे। उन्होंने उस व्यक्ति का घाव ठीक करने का प्रस्ताव रखा। वे मान गए। इलाज शुरू हुआ। जब एक हफ्ते के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ तो पृथ्वीराज चौहान चौंके। उन्होंने अपने अनुमान के आधार पर उस व्यक्ति से पूछा कि क्या वे अश्वत्थामा हैं, इस पर उस व्यक्ति ने हां में जवाब दिया। पृथ्वीराज चौहान अभिभूत हो गए और उनसे वरदान मांगा। अश्वत्थामा ने उन्हें शब्दभेदी बाण का वरदान दिया। साथ ही तीन शब्द भेदी तीर दिए, जो अचूक थे। ज्ञातव्य है कि महाभारत कथा में स्पष्ट अंकित है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा के सिर पर लगी मणि को युक्तिपूर्वक हटवाया था और उसकी वजह से उनके सिर पर गहरा घाव हो गया था। 

जहां तक पृथ्वीराज चौहान के शब्दभेदी बाण का उपयोग करने का सवाल है, तो उसका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार हैरू-

सन् 1192 में मोहम्मद गौरी ने तराइन के दूसरे युद्ध में उनको हरा दिया, तो वे जंगल में चले गए, बाद में मगर गुप्तचरों की सूचना के आधार पर गौरी ने उन्हें कैद कर लिया। कहीं यह उल्लेख है कि उन्हें अजयमेरू दुर्ग में रखा गया तो कहीं ये हवाला है कि गौरी उन्हें सीधे गौर (गजनी) ले गया। स्थानीय दुर्ग अथवा गौर में गौरी ने गर्म सलाखों से उनके दोनों नेत्रों जला दिया। पृथ्वीराज चौहान के बचपन के मित्र व राज कवि चंद वरदायी फकीर की वेशभूषा में पीछा करते हुए गौर पहुंच गए। चंद वरदायी ने सुल्तान मोहम्मद गौरी से संपर्क स्थापित किया व निवेदन किया कि आंखों के फूट जाने के बावजूद पृथ्वीराज चौहान शब्दभेदी बाण से अचूक निशाना लगाना जानते हैं, जिस अजूबे को सुल्तान को देखना चाहिए। गौरी ऐसी कला देखने को राजी हो गया। एक ऊंचे मंच पर बैठ कर मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को तीरंदाजी से लक्ष्य पर संधान करने का आदेश दिया। जैसे ही गौरी के सैनिक ने घंटा बजाया, कवि चंद वरदायी ने यह दोहा पढ़ारू-

चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण,

ता ऊपर सुल्तान है, मत चूके चौहान।

पृथ्वीराज चौहान ने मंच पर गौरी के बैठने की स्थिति का आकलन करके बाण चला दिया, जो सीधा गौरी को लगा और उसके उसी वक्त प्राण निकल गए। इसके बाद गौरी के सैनिकों के हाथों अपमानजनक मृत्यु से बचने के लिए कवि चंद वरदायी ने अपनी कटार पृथ्वीराज चौहान के पेट में भौंक दी और उसके तुरंत बाद वही कटार अपने पेट में भौंक कर इहलीला समाप्त कर ली।

प्रसंगवश यह जानना उचित रहेगा कि शब्दभेदी बाण चलाना तो बहुत से यौद्धाओं ने सीखा था, परंतु उसमें पारंगत चार या पांच ही थे। ज्ञातव्य है कि भगवान राम के पिताश्री महाराजा दशरथ के जिस बाण से मातृ-पितृ भक्त श्रवण कुमार की मृत्यु हुई, वह शब्द भेदीबाण था। श्रवण कुमार माता-पिता को एक तालाब के पास छोड़ पानी भरने गए तो पानी की कलकल की आवाज से आखेट को निकले महाराजा दशरथ को यह भ्रम हुआ कि कोई हिरण पानी पी रहा है और उन्होंने शब्दभेदी बाण चला दिया था। इस पर श्रवण कुमार के माता-पिता ने दशरथ को श्राप दिया कि वे भी अपने अंतिम समय में पुत्र का वियोग सहन करेंगे, और दोनों ने प्राण त्याग दिए। 

इसी प्रकार महाराज पांडु भी शब्दभेदी बाण की विद्या जानते थे। एक दिन राजा पांडु अपनी दोनों पत्नियों कुन्ती एवं माद्री के साथ तपस्या के लिए ऋषि कण्व के आश्रम में रहने गए। एक दिन माद्री के हठ करने पर पाण्डु आखेट करने गए। कहीं ये उल्लेख है कि सिंह की गर्जना सुन कर उन्होंने शब्दभेदी बाण चलाया तो कहीं ये जिक्र है कि उन्हें एक मृग की छाया दिखाई दी, जिस पर उन्होंने शब्दभेदी बाण चला दिया। बाण लगते ही ऋषि कण्व प्रकट हो गए, जो अपनी पत्नी के साथ सहवास कर रहे थे। उन्होंने पांडु को श्राप दिया कि जब भी वे अपनी पत्नी के साथ सहवास करेंगे तो उनकी मृत्यु हो जाएगी। एक दिन माद्री एक झरने के किनारे नहा रही थी, उनको इस रूप में देख कर पांडु विचलित हो गए और माद्री के साथ सहवास करने लगे। ऐसा करते ही कण्व ऋषि के श्राप  की वजह से उनकी वहीं मृत्यु हो गई। उनके वियोग में माद्री ने भी वहीं प्राण त्याग दिए।

इसी प्रकार महाभारत के महत्वपूर्ण पात्र कर्ण, जिन्होंने दुर्याेधन की मित्रता के चलते कौरवों का साथ दिया था, उनको भी शब्दभेदी बाण की विद्या हासिल थी। एक कथा के अनुसार उन्होंने एक बार केवल आवाज के आधार पर गाय के बछड़े को मार दिया था। इसी प्रकार द्रौणाचार्य को अपना गुरू मान कर तीरंदाजी सीखने वाले एकलव्य के बारे में भी एक कथा है कि उन्होंने शब्दभेदी बाण से एक कुत्ते को मार डाला था। जानकारी ये भी है कि शब्दभेदी बाण की विद्या भीम ने अर्जुन को दी थी।

विशेष बात ये है कि अन्य यौद्धाओं ने तो शब्द की ध्वनि के आधार पर शब्द भेदी बाण चलाया, जबकि पृथ्वीराज चौहान ने शब्दों को सुन कर उनके अर्थ के आधार पर अनुमान लगा कर शब्द भेदी बाण चलाया, जो कदाचित कहीं अधिक कठिन था।

https://www.youtube.com/watch?v=Foa3VxzkJDk&t=68s

शनिवार, दिसंबर 21, 2024

सोये हुए व्यक्ति के चरण स्पर्श क्यों नहीं किए जाते?

हमारे यहां मान्यता है कि सोये हुए व्यक्ति के चरण स्पर्श नहीं किए जाने चाहिए। अगर इस मान्यता से अनभिज्ञ कोई व्यक्ति सोये हुए व्यक्ति के चरण स्पर्श करता है तो उसे ऐसा करने से रोका जाता है। मान्यता तो यह तक है कि लेटे हुए व्यक्ति के भी चरण स्पर्श नहीं किए जाते। अगर कोई चरण स्पर्श करना चाहता है तो लेटा हुआ व्यक्ति बैठ जाता है। सवाल ये है कि आखिर इस मान्यता के पीछे क्या साइंस है, क्या कारण है?

विभिन्न जानकारों से इस बारे में चर्चा करने पर जो तथ्य सामने आए, वे आपसे साझा किए जा रहे हैं।

अव्वल तो अगर सोये हुए किसी व्यक्ति के चरण स्पर्श करेंगे तो उसका प्रयोजन पूरा ही नहीं होगा। आप आशीर्वाद या सम्मान की खातिर किसी के चरण स्पर्श करते हैं, मगर यदि वह सोया हुआ है तो उसे पता ही नहीं लगेगा कि आप उसके चरण स्पर्श कर रहे हैं। अर्थात वह आशीर्वाद देने की स्थिति में ही नहीं है और न ही उसको ये पता लगेगा कि आप उसके प्रति सम्मान का इजहार कर रहे हैं।

वैसे इसका मूल कारण दूसरा बताया जाता है। हालांकि सोते समय सांस चल रही होती है और आदमी जिंदा होता है, मगर सोना भी एक प्रकार की मृत्यु मानी गई है। अगर कोई आदमी गहरी नींद में हो तो उसकी ज्ञानेन्द्रियां-कर्मेन्द्रियां भी सुप्त हो जाती हैं। चूंकि उसकी आंखें बंद हैं, इस कारण दिखाई नहीं देता है, उसका मुख बंद है, इस कारण उसका स्वर यंत्र व जीभ की स्वाद तंत्रिका सुप्त होती है, उसे सुनाई भी नहीं देता। स्पर्श का भी अनुभव नहीं होता। यानि कि वह लगभग मृतक समान है। ज्ञातव्य है कि हमारे यहां मृतक के शव के चरण स्पर्श करने कर चलन है। जिस मान्यता की हम चर्चा कर रहे हैं, उसे इसी से जोड़ कर देखा जाता है। अर्थात हम यदि सोये हुए किसी व्यक्ति के चरण स्पर्श कर रहे हैं, इसका मतलब ये कि हम मृत व्यक्ति के चरण छू रहे हैं। इसे अपशकुन माना जाता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि हमारे चरण स्पर्श करने से वह मर ही जाएगा, मगर यह कृत्य उसी के तुल्य माना जाता है। 

लेटे हुए व्यक्ति के चरण स्पर्श नहीं करने के पीछे तर्क ये है कि ऐसा करने से चरण स्पर्श करने वाले के प्रति उपेक्षा का भाव महसूस होता है। यह सामान्य शिष्टाचार के विपरीत है। वाकई यह कितनी अभद्रता है कि कोई आपके प्रति सम्मान दर्शा रहा है और हम उसके सम्मान को स्वीकार करने के लिए उठ कर बैठ तक नहीं सकते।  

स्थितियों अथवा दृश्य के प्रति हम कितने सतर्क हैं, इसको लेकर एक आलेख में पहले भी चर्चा कर चुके हैं। इन उदाहरणों से उसे समझ सकते हैं। आपने देखा होगा कि हमारे यहां भोजन परोसते समय पहले जल पेश किया जाता है। उसके बाद भोजन की थाली। या फिर आगे-पीछे। अज्ञानतावश कोई यदि भोजन की थाली एक हाथ में व दूसरे हाथ में पानी का गिलास ले कर आए या पानी का गिलास भोजन की थाली में लाए तो इसे अपशगुन माना जाता है। ज्ञातव्य है कि हमारे यहां मान्यता है कि श्राद्ध के दौरान ऐसा मृतक के लिए किया जाता है। यदि हम जिंदा व्यक्ति के साथ ऐसा कर रहे हैं, तो इसका अर्थ ये हुआ कि हम मृतक के साथ ऐसा कर रहे हैं। इसी प्रकार अगर कोई मकान की चौखट पर बैठे तो उसे वहां न बैठने को कहा जाता है, क्यों कि मान्यता ये है कि चौखट पर बैठने से दरिद्रता आती है। इसके विपरीत तथ्य है कि जो दरिद्र हो जाता है, जिसके पास खाने को भी नहीं होता, वह चौखट पर आ कर बैठता है। ऐसे ही अनेक और उदाहरण हो सकते हैं। यथा दुकान बंद करने को दुकान मंगल करना कहते हैं। दीया बुझाने को दीया बढ़ाना कहते हैं। किसी अपने को अपशब्द कहने की जरूरत पड़ जाए तो उसका विलोमार्थ उपयोग में लेते हैं। जैसे यदि कोई लापरवाही करते हुए कुछ नुकसान कर दे तो यकायक मुंह से ये निकलता है कि अंधा है क्या, मगर सिंधी में कहते हैं कि सजा है क्या अर्थात आंख से पूरा दिखता है क्या? 

कुल जमा बात ये है कि हमारी संस्कृति में नकारात्मकता को भी सकारात्मक दृष्टि से देखते हैं।


https://www.youtube.com/watch?v=54z11Vs4Xg4&t=4s

गुरुवार, दिसंबर 19, 2024

अदृश्य शक्तियां किसी के सपने में आ सकती हैं?

बात तकरीबन 1978 की है। उन दिनों मैंने अनेक तांत्रिक प्रयोग किए थे। एक प्रयोग का जिक्र कर रहा हूं। मैं तब लाडनूं में था और निकटवर्ती जसवंतगढ़ में विज्ञान कॉलेज में प्रथम वर्ष मैथ्स का छात्र था। मेरे एक मित्र सी. एल. तिवाड़ी तृतीय वर्ष बायलॉजी में थे। मुझे एक तांत्रिक प्रयोग के लिए श्मशान से ताजा चिता की राख लानी थी। इसका जिक्र मैंने श्री तिवाड़ी से किया तो वे बोले कि वे भी साथ चलना चाहते हैं। मैं उन्हें साथ ले गया। श्मशान में जल कर पूर्ण हुई एक चिता मिल गई, जिसके अंगारे अभी सुलग रहे थे। मैंने उससे तांत्रिक विधि से थोड़ी सी राख ली। श्री तिवाड़ी ने हड्डी का एक टुकड़ा उठाया और बताया कि वह रीड़ की हड्डी का एक गुटखा है, जिसका उन्होंने बायलॉजिकल नाम भी बताया। हम वहां से रवाना हो गए। 

हमें किसी मीटिंग में जाना था, इस कारण हड्डी का टुकड़ा रास्ते में एक मकान की खिड़की पर रख दिया। मीटिंग से लौटने पर हड्डी का वह टुकड़ा मैने ले लिया और घर आ गया। घर में मैने उसे अपनी किताबों के पीछे छुपा कर रख दिया। कुछ दिन बात श्री तिवाड़ी बदहवास से मेरे पास आए और एक अजीब सी बात बताई। उन्होंने बताया कि उनके एक मित्र जनाब अजीज खान, जो कि उनके क्लास फैलो हैं, को एक सपना आया है। सपने में उन्होंने चिता से राख लाने की घटना को क्रमवार देखा है। उन्होंने बताया कि वह चिता किसी साध्वी की थी। 

                             उन्होंने चौंकाने वाली बात ये भी बताई कि साध्वी की आत्मा ने मेरे किताबों पीछे छुपी हड्डी गायब कर दी है। मैं हतप्रभ रह गया कि उस घटना का सपना किसी थर्ड पर्सन को कैसे आया? दूसरा ये कि हड्डी का टुकड़ा कैसे गायब हो सकता है, जिसे कि मैने एक दिन पहले ही सुरक्षित देखा है? मैने तुरंत जा कर देखा। वाकई हड्डी का टुकड़ा गायब था। श्री तिवाड़ी ने बताया कि जब उन्होंने चिता से हड्डी का टुकड़ा उठाया था, तब उनको किसी अज्ञात शक्ति ने झन्नाटेदार थप्पड़ मारा था, मगर मारे डर के उन्होंने इसका जिक्र नहीं किया था। उन्होंने ये भी बताया कि जिस दिन की यह घटना है, उसी दिन से हर शाम के वक्त उनके हाथों से मांस जलने की बदबू आती है और वे खाना नहीं खा पाते। 

इस पूरी घटना में मैं इस बात से चकित नहीं हुआ कि उस शक्ति ने हड्डी का टुकड़ा गायब कर दिया, लेकिन इस बात से अचंभित था कि एक थर्ड पर्सन को घटना का हूबहू सपना कैसे आया? श्री तिवाड़ी ने सवाल किया कि जनाब अजीज से न तो उन्होंने हमारी मित्रता और न ही घटना का कभी जिक्र कभी किया, फिर भी उनको पूरा सपना कैसे आयाड्ढ? मैं निरुत्तर था। इससे यह तो प्रमाणित होता ही है कि अदृश्य शक्तियां किसी घटना का सपना किसी को दिखा सकती हैं।

https://www.youtube.com/watch?v=-3QSW6V3eT4

मंगलवार, दिसंबर 17, 2024

क्या फ्रिज में आटे का लोया रखने पर उसे भूत खाने को आते हैं?

आजकल की व्यस्त जिंदगी में आमतौर पर गृहणियां आटे को गूंथ कर उसका लोया फ्रिज में रख देती हैं, ताकि जब खाने का वक्त हो तो उसे तुरंत निकाल कर गरम रोटी बनाई जा सके। यह आम बात है। इसको लेकर संस्कृति की दुहाई देते हुए सोशल मीडिया में यह जानकारी फैलाई रही है कि यह उचित नहीं है। वो इसलिए कि आटे का लोया पिंड का रूप ले लेता है, जिसे ग्रहण करने के लिए भूत-प्रेत आ जाते हैं और अनेक प्रकार के अनिष्ट कर देते हैं। 

शास्त्रों का हवाला देते हुए कहा जाता है कि आटे के ये पिंड भूतों-प्रेतों को निमंत्रण देते हैं। ये उन अतृप्त आत्माओं को आकर्षित करते हैं, जिनके पिंड दान नहीं किए गए हैं । इस आटे पर उनकी नकारात्मक ऊर्जा का वास हो जाता है। इस आटे को खाने से पूरे परिवार पर इसका असर पड़ता है। प्रसंगवश बता दें कि इस तथ्य को इस बात से जोड़ा जाता है कि हिंदुओं में पूर्वजों एवं मृत आत्माओं को संतुष्ट करने के लिए पिंड दान की विधि बताई गई है। पिंडदान के लिए आटे का लोया, जिसे पिंड कहते हैं, बनाया जाता है। 

इसी संदर्भ में कहा जाता है कि आटे का लोया गोल होता है, वही मृतात्माओं को आमंत्रित करता है। यदि उस पर कुछ अंकित कर दिया जाए तो प्रेतात्माएं उस ओर आकर्षित नहीं होतीं। इस कारण कई महिलाएं आटे का लोया बनाने के बाद उस पर अंगुलियों के निशान अंकित कर देती हैं। यह निशान इस बात का प्रतीक होता है कि रखा हुआ पिंड पूर्वजों के लिए नहीं, बल्कि आम इंसानों के लिए है। जानकारी में ऐसा भी है कि महिलाएं आटा गूंथने के बाद उस पर अगुलियों के निशान बना कर उसमें पानी भर देती हैं। कुछ देर ऐसा करके रख देने से रोटियां मुलायम बनती हैं।

सवाल ये है कि सच क्या है? क्या वाकई भूत-प्रेत की धारणा के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार है? या यूं ही प्रचलित मान्यता? 

जहां तक वैज्ञानिक तथ्य का सवाल है, ऐसा बताया जाता है कि आटा पानी के संपर्क में आने के बाद उसमें कई रासायनिक बदलाव आते हैं। ज्यादा समय तक रखने पर वे नुकसानदायक हो जाते हैं। अगर उसे फ्रिज में रख दिया जाए तो हानिकारक किरणों पर भी प्रभाव पड़ता है। उस आटे से बनी रोटी खाने से कई तरह की बीमारियां होने का खतरा रहता है।

दूसरी ओर जो लोग भूत-प्रेत का अस्तित्व ही नहीं मानते, वे उनके आकर्षित होने को सिरे से नकार देते हैं। जो भूत-प्रेत का अस्तित्व मानते भी हैं, तो उनका मानना है कि आटा गूंथ कर फ्रिज में रखने से भले ही बीमारी का खतरा हो, मगर उसका भूत-प्रेत के आकर्षण से कोई भी सम्बन्ध नहीं है। किसी भी भौतिक वस्तु का सेवन करने के लिए इन्द्रियों की आवश्यकता होती है। बिना इन्द्रियों के भौतिक वस्तुओं का सेवन नहीं किया जाता सकता। मृत्यु के बाद मनुष्य का सूक्ष्म शरीर, जिसे अक्सर भूत-प्रेत समझ लिया जाता है, केवल महसूस कर सकता है, भोग करने के लिए उसे इन्द्रियों की आवश्यकता होती है, जो कि उसके पास नहीं होतीं।

असल में दिक्कत ये है कि आटे के लोये को खाने के लिए भूत-प्रेतों के आने जैसे सवालों का सवाल है, उसका प्रचार करने वाले उसे शास्त्रोक्त तो बता देते हैं, मगर कभी जिक्र नहीं करते कि किस शास्त्र में ऐसा लिखा हुआ है। वे इस बात का भी जिक्र नहीं करते कि अमुक ऋषि ने इतने हजार लोगों पर प्रयोग करके यह तथ्य सिद्ध किया है। इसी कारण ऐसी बातें अंध विश्वास की श्रेणी में गिनी जाती हैं। बावजूद इसके भय के कारण कई उसे मान भी लेते हैं कि मानने में हर्ज ही क्या है? दिलचस्प बात ये है कि पिंड को खाने के लिए मृतात्माओं के आने वाली बात को जानते हुए भी अधिसंख्य महिलाएं व्यस्त जिंदगी में समय को बचाने के लिए अथवा आलस्य के कारण आटे का लोया बना कर फ्रिज में रखती हैं। 

हो सकता है कि भूत-प्रेत वाली बातें सच हों, मगर ऐसी बातें करने वालों को बाकायदा उस शास्त्र का हवाला देना चाहिए, अन्यथा लोग उसे अंध विश्वास ही करार देंगे। उनका मकसद भले ही संस्कृति को बचाना हो, मगर उनके बिना आधार के, केवल शास्त्र शब्द का हवाला देते हुए ऐसी बातें करने से उलटा संस्कृति का नुकसान ही होने वाला है। वे संस्कृति का बचाव नहीं, बल्कि उसका नुकसान कर रहे हैं।

https://www.youtube.com/watch?v=oISPhoRYOL0&t=2s

सोमवार, दिसंबर 16, 2024

क्या है नजर लगने का वैज्ञानिक आधार?

आपने देखा होगा कि हम लोग नजर न लगने के लिए कई तरह के टोटके करते हैं। जैसे बच्चे को नजर न लगेे इसके लिए उसके कान के पीछे काला टीका लगाते हैं। यानि कि काला टीका किसी की नजर को जज्ब कर लेता है। नये मकान में ऊपर रेलिंग पर काली हांडी लगाते हैं। ताकि देख कर मन ही मन तारीफ करने वाले की नजर हांडी पर अटक जाए और मकान का बचाव हो जाए। इसी प्रकार गाडियों में पीछे जूता बांधते हैं। बुरी नजर वाले, तेरा मुंह काला स्लोगन भी आपने अमूमन देखा होगा। कई लोग बाजार में दुकानों पर शोकेस में रखी मिठाइयां, नमकीन इत्यादि इसलिए नहीं खाते, क्योंकि उन पर अनेक ललचाई नजरें पड़ती हैं। यदि हम कुछ खा रहे हैं और उसे कोई और मनुष्य या कुत्ता देख रहा होता है तो उसे भी उसमें कुछ अंश खाने को देते हैं, ताकि उसकी नजर न लगे। हालांकि आजकल तो मकानों में बाकायदा डाइनिंग हॉल बनाए जाते हैं, जिस पर बैठ कर सभी परिजन या मेहमान साथ में खा सकें। वैसे पुरानी मान्यता है कि भोग सदैव गुप्त स्थान पर ही करना चाहिए। कई लोग भोजन अकेले में छिप कर किया करते हैं, ताकि उस पर किसी की नजर न पड़े। कुछ जानकारों का मानना है कि किसी दूसरे व्यक्ति की नकारात्मकता जब हमारी सकारात्मकता पर हावी होती है तो उसे नजर लगना कहते हैं। छठवीं इंद्रिय युक्त साधिका प्रियांका लोटलीकर के अनुसार किसी अन्य व्यक्ति द्वारा संक्रमित रज-तम तरंगों से पीडित होने की प्रक्रिया को कुदृष्टि (बुरी नजर लगना) शब्द से जाना जाता है। कोई अन्य व्यक्ति जानबूझ कर अथवा अनजाने में हमें कुदृष्टि (बुरी नजर) से पीडित कर सकता है।

बुरी नजर व नकारात्मक शक्तियां असर न करें, इसके लिए मकान व दुकान के बाहर शनिवार को नीबू-मिर्ची टांगने की भी परंपरा हैं। इसका वैज्ञानिक आधार क्या है, पता नहीं, मगर वास्तुविद बताते हैं कि नीबू-मिर्ची नकारात्मक ऊर्जा को मकान व दुकान में प्रवेश करने से रोकते हैं और खुद जज्ब कर लेते हैं। इसके लिए शनिवार को उपयुक्त वार माना जाता है। दूसरे शनिवार को पहले से बंधे नीबू-मिर्ची को हटा कर सड़क पर फैंक दिया जाता है। टोटकों के जानकार बताते हैं कि शनिवार को उनके ऊपर से नहीं गुजरना चाहिए, अन्यथा उनमें  मौजूद नकारात्मक शक्तियां हमें प्रभावित कर सकती हैं। 

नजर लगने पर उतारने के लिए कई तरह के उपाय भी प्रचलन में हैं।  बताते हैं कि अगर आपको ऐसा प्रतीत हो कि अमुक व्यक्ति की आपको नजर लग सकती है तो उसका झूठा पानी पी लो, उसका असर खत्म हो जाएगा। खैर, किसी और की क्या, मान्यता तो ये भी है कि खुद हम पर ही हमारी नजर लग जाती है। यही वजह है कि आम तौर हमारे साथ कुछ अच्छा होने के बारे में बताते वक्त हम कहते हैं कि भगवान की कृपा है। हालांकि ऐसा कहने से यही प्रतीत होता है कि हम भगवान का शुक्र अदा कर रहे होते हैं, मगर साथ ही इसका निहितार्थ ये भी है कि नजर न लग जाए। किसी की तारीफ करते वक्त थुथकार करने की भी परंपरा है। इसी कड़ी में कई पढ़े-लिखे लोग टच वुड शब्द का इस्तेमाल करते हुए आस-पास रखी लकड़ी की वस्तु को छूते हैं। टच वुड अर्थात लकड़ी को छूना। यह शब्द पाश्चात्य संस्कृति से आया है। अर्थात पाश्चात्य संस्कृति के लोग भले ही नजर लगने की हमारी मान्यता को दकियानूसी करार दें, मगर वे भी मानते तो हैं ही।

टच वुड शब्द का प्रयोग कब से हो रहा है, इस विषय में कोई तथ्यात्मक जानकारी नहीं है। बताया जाता है कि इसका प्रयोग ईसा पूर्व से चला आ रहा है। टच वुड कहते हुए लकड़ी को छूने से होता क्या है, इस बारे में भी कोई पुख्ता वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं है, लेकिन आम धारणा है कि वृक्षों पर आत्माओं का निवास होता है। उनकी नजर आपकी खुशियों को नहीं लगे, इसलिए कोई अच्छी बात कहते वक्त लकड़ी छूते हैं, ताकि आत्माएं खुशियों में रुकावट न डालें। एक जानकारी ये भी है कि टच वुड बोलने के वक्त पवित्र माने जाने वाले चंदन, रुद्राक्ष, तुलसी आदि का स्पर्श करना अधिक शुभ फलदायी है। मुझे लगता है कि कुछ अच्छा बोलते वक्त सकारात्मक शक्तियों के साथ नकारात्मक शक्तियां भी प्रवाहित होती हैं और पेड को छूने से वह नकारात्मक एनर्जी को हजम कर जमीन को भेज देता है। चूंकि हर जगह पेड संभव नहीं है, इस कारण उसकी अनुपस्थिति में लकडी को छूने का चलन हो गया होगा।

https://www.youtube.com/watch?v=xlB2LpNo2NI


रविवार, दिसंबर 15, 2024

क्या उम्र बढ़ाई जा सकती है?

मौत अंतिम सत्य है, यह हर आदमी जानता है, मगर मरना कोई नहीं चाहता। मौत से बचना चाहता है। रोज लोगों को मरते देखता है, मगर खुद के मरने की कल्पना तक नहीं करता। इसी से जुड़ा एक सत्य ये भी है कि हर व्यक्ति लंबी उम्र चाहता है। यही जिजीविषा उसे ऊर्जावान बनाए रखती है। दिलचस्प बात ये है कि जन्मदिन पर हमें पता होता है कि हमारी निर्धारित उम्र, यदि है तो, में एक और साल की कमी हो गई है, मगर फिर भी खुशी मनाते हैं। समझ ही नहीं आता कि किस बात की खुशी मनाई जाती है? क्या इस बात की कि इसी दिन हम इस जमीन पर पैदा हुए थे? पैदा तो लाखों-करोड़ों लोग हो रहे हैं, मर भी रहे हैं, उसमें नया या उल्लेखनीय क्या है? मेरा नजरिया ये है कि अगर वाकई हमने इस संसार में आ कर कुछ उल्लेखनीय किया है तो समझ भी आता है कि लोग हमारा जन्मदिन मनाएं, वरना सामान्य जिंदगी में जन्मदिन मनाने जैसा क्या है? या फिर ये भी हो सकता है कि तनाव भरी जिंदगी में जन्मदिन के बहाने हम खुशी का आयोजन करते हैं। इस मौके पर सभी लोग हमारी लंबी उम्र की दुआ करते हैं। सवाल ये उठता है कि क्या वाकई ऐसी दुआओं से उम्र लंबी होती है? यदि हम मानते हैं कि हर आदमी एक निर्धारित उम्र लेकर पैदा हुआ है तो फिर हमारी अधिक जीने की इच्छा या दुआ से क्या हो जाएगा? मन बहलाने से अधिक इसका क्या महत्व है? 

किसी व्यक्ति विशेष की उम्र बढ़ाई जा सकती है या नहीं, यह अलग विषय है, मगर यह सच है कि आयुर्वेद सहित जितने भी विज्ञान हैं, वे सार्वजनिक रूप से इस प्रयास में जुटे हैं कि निरोगी रहते हुए उम्र को बढ़ाया जाए। औसत आयु बढ़ी भी है। शिशु मृत्यु दर घटाई जा सकी है। विज्ञान मानता है कि आदमी 14 मैच्योरिटी पीरियड्स तक जी सकता है। एक मैच्योरिटी पीरियड में तकरीबन 20 से 25 साल माने जाते हैं। अर्थात आदमी अधिकतम 350 साल जी सकता है। यह एक बेहद आदर्श स्थिति है। हालांकि हमारी वैदिक परंपरा के अनुसार आदमी की उम्र एक सौ साल मानी जाती है, बावजूद इसके ऐसे अनेक लोग हैं जो एक सौ साल से भी तीस-पैंतीस साल अधिक जीये। आज भी हम सुनते हैं कि अमुख शहर में अमुक व्यक्ति एक सौ पच्चीस साल में उम्र में मरा। यानि शतायु की अवधारणा औसत आयु के रूप में की गई है। यही वजह है कि शतायु होने की दुआ की जाती है।

अब बात करते हैं इस पर कि क्या हम अपनी आयु को बढ़ा सकते हैं? यह एक मौलिक तथ्य है कि अमूमन आदमी की मौत किसी बीमारी की वजह से होती है। या फिर बूढ़े होने के कारण शरीर के विभिन्न अंगों के शिथिल होने पर आदमी अंततरू मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। यदि स्वास्थ्य बरकरार रखा जा सके या बुढ़ापे को रोका जा सके तो और अधिक जीया जा सकता है। 

विज्ञान मानता है कि उम्र बढऩे के साथ सेंससेंट सेल बढ़ते हैं। यदि इनको शरीर से हटाया जा सके तो आयु को बढ़ाया जा सकता है। केवल इतना ही काफी नहीं है। उसके लिए यह भी जरूरी है कि विशेष प्रकार का प्रोटीन, जो स्वस्थ सेल में होता है. वह शरीर में बढ़ाया जाए।

धरातल कर सच ये है कि लगभग पचास साल के बाद अमूमन ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, कैंसर जैसी बीमारियां घेरने लगती हैं। हार्ट अटैक व ब्रेन हैमरेज के कारण अचानक मौत हो जाती है। इन बीमारियां से बचने के लिए आदर्श जीवन पद्धति अपनाने की सीख दी जाती है। शुद्ध जलवायु पर जोर दिया जाता है। शुद्ध जल का पान करने की सलाह दी जाती है, क्योंकि लगभग 70 प्रतिशत रोग जल की अशुद्धता से ही होते हैं। इसी शुद्ध वायु की भी महिमा है। वायु प्रदूषण से बचने को कहा जाता है। प्राणायाम करने को कहा जाता है। अच्छी नींद भी स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक मानी जाती है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए ध्यान की भी महिमा बताई गई है। 

ध्यान की बात आई तो एक बहुत महत्वपूर्ण बात याद आ गई। आपने सुना होगा कि अमुक ऋषि डेढ़ सौ साल जीये। तीन सौ साल तक जीने की भी किंवदंतियां है। वह कैसे संभव हो सका? जानकारों का मानना है कि भले ही हमारी तथाकथित निर्धारित उम्र वर्षों में गिनी जाती हो, मगर सच ये है कि जन्म के समय ही यह तय हो जाता है कि अमुक व्यक्ति का शरीर कितनी सांसें लेकर मृत्यु को प्राप्त होगा। अर्थात सांस लेने व छोडऩे की अवधि को बढ़ा कर भी उम्र बढ़ाई जा सकती है। जैसे मान लो हम एक मिनट में दस बार सांस लेते हैं, लेकिन यदि एक मिनट में एक ही बार सांस लें तो हमने नौ सांसें बचा लीं। यानि हमारी उम्र नौ सांस बढ़ गई। प्राणायाम में सांस को बाहर या भीतर रोका जाता है। इन दोनों प्रक्रियाओं के पृथक-पृथक लाभ हैं, मगर दोनों में ही एक लाभ ये भी होता है कि सांसों का बचाव हो जाता है व उतनी ही उम्र बढ़ जाती है। हमारे ऋषि-मुनियों-योगियों ने प्राणायाम से ही अपनी उम्र बढ़ाई है। आपको पता होगा कि कछुए व व्हेल मछली की उम्र बहुत अधिक होती है, उसका कारण ये है कि उनकी श्वांस लेने और छोडऩे की गति आदमी से बहुत कम है। वृक्षों में पीपल व बड़ के साथ भी ऐसा ही है। उनकी सांस की गति काफी धीमी है, इसी कारण उनकी उम्र अधिक होती है।

कुल जमा निष्कर्ष ये निकलता है कि प्रकृति हमारी उम्र की गणना दिनों या वर्षों में नहीं करती, बल्कि वह उसका निर्धारण सांसों की गिनती से करती है। योगी बताते हैं कि जब भी हम सांस को रोकते हैं तो उस अवधि में समय स्थिर हो जाता है। रुक जाता है। अर्थात भौतिक उपायों के अतिरिक्त यदि हम नियमित प्राणायाम करें तो अपनी उम्र को बढ़ा सकते हैं।

https://www.youtube.com/watch?v=5E3f8BFnNN0&t=1s

शुक्रवार, दिसंबर 13, 2024

पिज्जा खाने से रुकी किरपा आ जाती है

आपको याद होगा कि जीवन की परेशानियों के निराकरण के लिए अजीबो-गरीब उपाय बताने वाले निर्मल बाबा खुद परेशानी में पड़ गए थे। न केवल उनकी तीव्र आलोचना हुई, अपितु उनका मखौल भी खूब उड़ा। यहां तक कि पुलिस में शिकायत भी हुई। स्वाभाविक सी बात है कि समोसा या पिज्जा खाने, गाय को केला खिलाने या अमुक देवी-देवता को अमुक मात्रा में प्रसाद चढ़ाने जैसे उपायों मात्र से समस्याओं का अंत हो जाने की कोई बात करेगा तो तार्किक लोग उसका मजाक उड़ाएंगे ही। बावजूद इसके उनके भक्तों की संख्या अनगिनत है। वस्तुतः जिनको फायदा हुआ होगा, वे तो उनके गुण गाएंगे ही, चाहे ऊलजलूल उपाय करने से ही हुआ हो। वैसे भी दुनिया इतनी दुखी है कि कोई भी उपाय करने को राजी हो जाती है। चारों ओर से निराशा हाथ लगने से धूनी की भभूत में भी उसे चमत्कार नजर आता है। मगर दूसरी ओर वैज्ञानिक सोच वाले लोग ऐसे उपायों को अतार्किक, अंध विश्वास और वाहियात करार देते हैं। 

इस मुद्दे का गहराई से अध्ययन करने से मैने पाया कि निर्मल बाबा जिस प्राकृतिक सिद्धांत के आधार पर उपाय बताते हैं, वह पद्यति कारगर होनी चाहिए। उन्हें कैसे पता लगता है कि अमुक सवाली के मन में क्या है और कौन सी वस्तु उसने कितने दिन से नहीं खाई है, अथवा उसका कौन सा संकल्प या इच्छा पूरी नहीं हुई है, उसके पीछे जरूर कोई गड़बड़झाला होने की संभावना मानी जा सकती है। वे अंतर्यामी हैं या नहीं, इस पर भी सवाल उठाए जा सकते हैं, मगर वे जिस प्राकृतिक सिद्धांत के आधार पर उपाय करते हैं, वह मुझे तो तार्किक लगती है।

ऐसा प्रतीत होता है कि जब भी हमारे मन में कोई इच्छा जागृत होती है अथवा कोई संकल्प निर्मित होता है, वह हमारे भीतर एक प्रकार की ग्रंथी का निर्माण करता है। जैसे ही वह इच्छा अथवा संकल्प पूरा होता है, ग्रंथी का विसर्जन हो जाता है। पूरा न होने पर वह ग्रंथी विकृतियां उत्पन्न करती है। अतृप्त इच्छा का कितना महत्व है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई बार आत्मा इसी कारण भटकती रहती है, क्योंकि उसकी कोई इच्छा विशेष पूरी नहीं हो पाती। यही वजह है कि हमारे यहां मृत्यु होने से ठीक पहले प्राणी की अंतिम इच्छा पूछी जाती है। उसकी वजह भी यही है कि उसकी आखिरी ख्वाहिश पूरी कर दी जाए, ताकि मृत्योपरांत उसकी आत्मा भटके नहीं। 

अतृप्त इच्छाएं पूरी न होने पर उसका प्रभाव वस्तुओं पर भी पड़ता है, ऐसी हमारे यहां मान्यता है। आपको ऐसे कई लोग मिल जाएंगे, जो कि बाजार में सजा कर रखी गई मिठाई अथवा अन्य खाद्य पदार्थ का सेवन करने से बचते हैं। उसके पीछे धारणा ये है कि सजा कर रखी गई वस्तु पर अनेक लोगों की दृष्टि पड़ती है। ऐसे लोगों की नजर भी पड़ती है, जो कि उसे खाना तो चाहते हैं, मगर उनकी खरीदने की हैसियत नहीं होती अथवा किसी और कारण से खरीद नहीं पाते। ऐसे में वस्तु में अतृप्त इच्छा का दृष्टि दोष उत्पन्न हो जाता है। उस वस्तु को खाने पर हमको दोष लगता है। 

हमारी संस्कृति में तो यह तक मान्यता है कि भोजन सदैव एकांत में करना चाहिए। ऐसा इसलिए कि भोजन करते समय अन्य की दृष्टि उस पर पडऩे से दोष उत्पन्न हो जाता है। आपने देखा होगा कि अनेक दुकानदार पीठ करके भोजन करते हैं, ताकि उस पर किसी ग्राहक की नजर नहीं पड़े। आपने देखा होगा कि यदि हमारे भोजन पर किसी अन्य की नजर पड जाए तो हम उसका कुछ अंष उसे खिला देते हैं, ताकि दोष न लगे।

अपूर्ण संकल्प जीवन में कठिनाइयां उत्पन्न करते हैं, ऐसी भी मान्यता है। एक प्रकरण आपसे साझा करता हूं। एक बार मेरी माताजी मामाजी के घर घूमने गई। वहां उनकी परिचित महिला से मुलाकात हो गई। वह स्नान करके शुद्ध हो कर उनके पास आ कर बैठी थी। जैसे ही उनके वस्त्र का मेरी माताजी के वस्त्र से स्पर्श हुआ, यकायक वह एक भाव अवस्था में आ गई और गुस्से में बोलने लगी कि याद कर, कोई पच्चीस साल पहले तूने अमुक मंदिर में अपनी मनोकामना पूरी होने के लिए एक धर्मग्रंथ से फूल चुना था। तेरी वह इच्छा पूरी हो गई, मगर तूने संकल्प के साथ प्रसाद चढ़ाने का जो निश्चय किया था, वह आज तक अधूरा है। इसी कारण संकट में है। उस महिला को मेरी माताजी की पच्चीस साल पहले की घटना कैसे ख्याल में आ गई, यह विचार का अन्य विषय है, मगर अधूरा संकल्प परेशानी पैदा करता है, वह तो इससे प्रमाणित होता ही है।

आपके ख्याल में होगा कि कई धर्म स्थलों के दरवाजों पर श्रद्धालु मन्नत का धागा अथवा कोई वस्तु बांधते हैं और मन्नत पूरी होने पर प्रसाद चढ़ा कर धागा खोलते हैं। अर्थात संकल्प या इच्छा पूरी होने पर उसकी पूर्णाहुति जरूर करते हैं। ऐसी मान्यता है कि ऐसा नहीं करने पर दोष लगता है। संकल्प लेकर कोई व्रत रखने पर भी उसका उद्यापन करने की प्रथा हमारे यहां प्रचलित है। मन्नत का धागा बांधने की बात पर मुझे याद आया कि मेरी माताजी हमारा कोई कार्य होने की इच्छा रख कर अपनी चुन्नी के कोने पर गांठ बांधती है और काम पूरा होने पर गांठ खोल कर मन में तय किया हुआ प्रसाद चढ़ाती है। गांठ का प्रयोजन यही होता है कि संकल्प की याद विस्मृत न हो। ऐसे ही अनेक प्रकरण मेरी जानकारी में हैं।

मुझे लगता है कि गांठ न बांधने पर भी इच्छा की गांठ मन के भीतर पड़ जाती है, जिसे कि मैने ग्रंथी की संज्ञा दी है। इच्छा के पूरा होने पर वह ग्रंथी विसर्जित हो जाती है, अथवा कोई न कोई विकृति पैदा करती है। 

कुल जमा निष्कर्ष ये है कि निर्मल बाबा जिस पद्यति का उपयोग करते हैं, वह कारगर होनी चाहिए। हमें भी सामान्य जीवन में यह ख्याल रखना चाहिए कि हमारे मन में जो भी इच्छा जागृत हो, उसे यथासंभव पूर्ण कर लेना चाहिए। चंद उदाहरण पेष हैं, जिनका हमें ख्याल रखना चाहिए। जैसे अगर हमारे मन में किसी भिखारी को कुछ देने का भाव आया है तो उसे पूरा कर लेना चाहिए। इसी प्रकार यदि कभी किसी मंदिर के दर्षन या किसी दरगाह में हाजिरी का मन में विचार आए तो यथासंभव उसे पूरा कर लेना चाहिए। इसमें ख्याल रखने योग्य बात ये है कि हमें अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए। इसके अतिरिक्त अनीतिपूर्ण इच्छाओं को पैदा ही नहीं होने देना चाहिए। चूंकि अगर वे पूरी कर भी ली गई तो भले ही ग्रंथी से होने वाली कठिनाई से हम मुक्त हो जाएंगे, मगर अनीति से किए गए कार्य का परिणाम तो हमें भुगतना ही होगा।

आलेख यूट्यूब पर देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक कीजिए-

https://www.youtube.com/watch?v=fwjuxo3Tggs&t=23s