तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

रविवार, नवंबर 11, 2012

गडकरी की विदाई तय, जोशी-जेटली का नाम उभरा


हालांकि पूर्ति कंपनी विवाद के बाद भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी को हटाए जाने की चर्चाओं पर पार्टी ने विराम लगा दिया है, मगर यह तय माना जा रहा है कि उन्हें दुबारा अध्यक्ष बनाए जाने की संभावना पूरी तरह से समाप्त हो गई है। इसका संकेत इस बात से भी मिलता है कि भाजपा की आधिकारिक वेबसाइट बीजेपी.ओआरजी में जहां उनके दूसरी बार अध्यक्ष बनने से पहले ही अगले कार्यकाल में अध्यक्ष के रूप में उनका नाम डाल दिया गया था, लेकिन विवाद होने पर उनके दूसरे कार्यकाल वाला कालम हटा ही दिया गया। रहा सवाल नए अध्यक्ष का तो उस पर मंथन शुरू हो गया है। चर्चा में यूं तो कई नाम हैं, जिनमें पूर्व अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी, अरुण जेटली आदि की चर्चा है, मगर समझा जाता है कि संघ को डॉ. मुरली मनोहर जोशी का नाम ज्यादा रुचता है। उसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि उन पर अब तक कोई दाग नहीं लगा है और दूसरा ये कि वे सीनियर होने के नाते डिजर्व भी करते हैं।
यूं तो पार्टी का एक धड़ा फिर से आडवाणी की ताजपोशी करने के पक्ष में है, मगर संघ इसके लिए राजी नहीं हो रहा, क्योंकि जिन्ना संबंधी बयान की वजह से संघ के दबाव में उन्हें पद छोडऩा पड़ा था। अब अगर संघ उनके नाम पर सहमति देता है तो इसका ये ही अर्थ निकाला जाएगा कि संघ समझौते को मजबूर हुआ है। बावजूद इसके आडवाणी के नाम को पूरी तरह से नकारा नहीं गया है। इस बीच दूसरा नाम राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली का उभरा है, जिनको नरेन्द्र मोदी व आडवाणी का समर्थन हासिल माना जा रहा है। मंथन के दौरान चंद दिन बाद ही मुरली मनोहर जोशी का नाम भी उभरा है, जिनको कि संघ का समर्थन हासिल होने की संभावना जताई जा रही है। बताया जाता है कि वाराणसी से सांसद जोशी के इलाके में अरसे संघ प्रचारक का काम देखते रहे व मौजूदा सरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल ने उनका नाम सुझाया है और उसके लिए संघ के अन्य प्रमुख नीति निर्धारकों को लामबंद भी किया जा रहा है।
यहां यह बताना प्रासंगिक ही होगा कि जोशी पार्टी में कितनी दमदार  स्थिति में रहे हैं। पिछली बार वे लोकसभा में विपक्ष का नेता बनते बनते रह गए थे। वे संघ की पहली पसंद थे, मगर हुआ यूं कि ऐन वक्त पर आडवाणी व संघ के बीच एक समझौता हुआ, वो यह कि संघ आडवाणी की ओर से सुझाए गए सुषमा स्वराज के नाम पर आपत्ति नहीं करेगा और संघ की ओर से अध्यक्ष के रूप में पेश नितिन गडकरी के नाम पर ऐतराज नहीं जताएंगे। नतीजतन जोशी नेता प्रतिपक्ष बनते बनते रह गए। ताजा हालत में जहां सुषमा स्वराज पूरी तरह से गडकरी का साथ दे रही हैं तो आडवाणी ने अरुण जेटली पर हाथ धर दिया है। अब देखना ये है कि संघ आडवाणी और मोदी के दबाव में आता है या फिर अपनी पसंद के जोशी को अध्यक्ष बनवाने मे कामयाब रहता है।
-तेजवानी गिरधर

गुरुवार, नवंबर 08, 2012

मजम्मत के काबिल है सरवर चिश्ती का बयान



महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की रजिस्टर्ड  संस्था अंजुमन सैयद जादगान के पूर्व सचिव सरवर चिश्ती ने अगर वाकई ये कहा है कि मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो कोई ताज्जुब नहीं कि सारे मुसलमान आतंकवादी बन जाएं, तो वह बयान मजम्मत के काबिल है।
यह बयान दो मायनों में गैर वाजिब माना जा सकता है। एक तो वे दुनिया में सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल दरगाह शरीफ से जुड़े हुए एक जिम्मेदार खादिम हैं, जिनके मुंह से शांति का संदेश मिलने की उम्मीद की जानी चाहिए। दूसरा ये कि अगर वे ऐसा सोचते हैं तो यह उनकी निजी राय हो सकती है, मगर पूरी मुस्लिम कौम की तरफ से इस तरह के बयान का वे हक नहीं रखते।
जानकारी के मुताबिक उनके विवादित बयान पर मंगलूर शहर की पांडेश्वर पुलिस ने मामला दर्ज किया है। गत दो नवंबर को पॉपूलर फ्रंट ऑफ इंडिया की सार्वजनिक बैठक में दिए गए इस बयान पर वहां के नागरिक सुनील कुमार ने शिकायत दर्ज करवाई है कि यह भड़काऊ भाषण लोंगों को दंगे उकसाने प्रयास है।
हालांकि अब अजमेर आ कर उन्होंने एक तरफ तो यह कहा है कि उन्होंने साफ सुथरी बात कही है और उन्हें अपने कहे का मलाल नहीं है, मगर दूसरी ओर बयान में सुधार कर यह भी कहा है कि यदि मोदी देश के प्रधानमंत्री बनते हैं तो देश में सेक्युलरिज्म कहां रह पाएगा? उनका पहला बयान जहां वाकई आपत्तिजनक है, वहीं दूसरा बयान ऐसा है, जिसकी चिंता   कांग्रेस सहित अन्य धर्मनिरपेक्ष ताकतों को भी है। उसकी वजह ये है कि मोदी अपनी छवि विकास पुरुष के रूप में स्थापित करने की लाख कोशिशों के बाद भी सांप्रदायिकता की छाप से तो मुक्त नहीं हो पाए हैं। विशेष रूप से मुसलमानों में तो मोदी की छवि कत्तई अच्छी नहीं कही जा सकती। इस रोशनी में चिश्ती का बाद वाला बयान कुछ-कुछ ठीक प्रतीत होता है। और कुछ नहीं तो इससे कम से कम मुसलमानों के बीच मोदी की छवि कैसी है, उसका अनुमान तो होता ही है। अपनी बात को बल प्रदान करने के लिए चिश्ती का यह कहना समझ में आता है कि गुजरात दंगों के बाद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी कहा था सीएम को राजधर्म निभाना चाहिए। अमेरिका ने भी वीजा पर रोक लगा दी थी। पूरे देश और दुनिया में गुजरात दंगों और विशेष तौर पर अल्पसंख्यकों के नरसंहार की कड़ी भत्र्सना हुई है। वे कहते हैं कि ऐसे में मेरा कहा एक रिएक्शन है। बेशक उनका कहा एक रिएक्शन है, मगर यदि उन्हें आशंका है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर ताज्जुब नहीं कि सारे मुसलमान आतंकवादी हो जाएं, तो यह अतिवादी नजरिया है। भले ही उन्होंने ऐसा भाववेश में आ कर कहा हो या उनकी जुबान फिसली हो, मगर उनका वह बयान मजम्मत के काबिल ही है। वो इसलिए कि ऐसा कह कर वे सारे मुसलमानों को कट्टरपंथी करार दिए दे रहे हैं। ऐसे में मुसलमानों और विशेष रूप से खादिमों की जमात को उनके बयान की मजम्मत करनी चाहिए। खादिमों को इसलिए कि दरगाह से जुड़ा कोई जिम्मेदार शख्स अगर ऐसा कहता है तो इससे न केवल खादिम कौम पर संदेह उत्पन्न हो सकता है, अपितु दरगाह शरीफ पर अकीदा रखने वाले लाखों हिंदुओं की आस्था पर भी असर पड़ सकता है। अब देखना ये होगा कि चिश्ती अपने बयान में घोषित रूप से संशोधन करते हैं या उन पर संशोधन का दबाव बनता है। और या फिर बात आई गई हो जाती है। जहां तक चिश्ती को निजी तौर पर जानने वालों का सवाल है, उन्हें एक प्रगतिशील खादिम के तौर पर जाना जाता है और खादिमों में नई सोच लाने की उनकी कोशिशों को सब जानते हैं। यही कारण है कि उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा कि क्या वे ऐसा बयान भी दे सकते हैं, या फिर बयान में कुछ हेरफेर है।

-तेजवानी गिरधर

मंगलवार, नवंबर 06, 2012

गडकरी के बयान पर इतना बवाल क्यों?


भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी के हालिया बयान पर बड़ा बवाल हो रहा है। कांग्रेसी तो उन पर हमला बोल ही रहे हैं, भाजपा में भी आग लग गई है। हालत ये हो गई कि गडकरी को खेद जताना पड़ा।
असल में उन्होंने कहा ये था कि स्वामी विवेकानंद और दाऊद इब्राहिम का आईक्यू लेवल एक जैसा है। एक ने उसका उपयोग समाज के लिए किया तो दूसरे गुनाह के लिए। सबसे पहले इसे लपका इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ने। जैसी कि उसकी आदत है, किसी के भी बयान को सनसनीखेज बना कर पेश करने की, वैसा ही उसने किया। ऐसे में भला कांग्रेस पीछे क्यों रहती। उसने मौका पा कर बयानबाजी शुरू कर दी। इस बीच गडकरी से पहले से तपे हुए भाजपा सांसद राम जेठमलानी ने भी फायदा उठाया। उनके बेटे महेश जेठमलानी ने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति से इस्तीफा दे दिया। दोनो पिता-पुत्र ये चाहते हैं कि गडकरी इस्तीफा दें। जेठमलानी तो पहले भी मांग कर चुके हैं, जब गडकरी पर आर्थिक गडबड़ी करने का आरोप लगा। वे यहां तक बोले थे कि उनके पास भी गडकरी के खिलाफ सबूत हैं। सबको पता है कि जेठमलानी जिसके पीछे पड़ जाते हैं तो हाथ धो कर। ऐसे में भला वे ताजा बयान को क्यों नहीं लपकते। मगर असल सवाल ये है कि गडकरी ने आखिर इतना गलत क्या कह दिया।
बेशक उन्होंने विवेकानंद व दाऊद की तुलना की, मगर मात्र इस मामले में कि दोनों दिमागी तौर पर तेज हैं। भला इसमें गलत क्या है? दाऊद का दिमाग तेज है, तभी तो माफिया डॉन बना हुआ है। उन्होंने ये तो नहीं कहा कि दाऊद विवेकानंद की तरह ही महान है। या दाऊद को भी विवेकानंद की तरह सम्मान से देखा जाना चाहिए। असल में हमारी मानसिकता ये है कि किसी भी मामले में ही सही, दोनों की तुलना कैसे की जा सकती है। सारा जोर इस पर है कि सर्वथा विपरीत ध्रुवों की एक दूसरे से तुलना कैसे की जा सकती है, इसी कारण बवाल मचा हुआ है। रहा सवाल गडकरी की मंशा का तो वह बयान के दूसरे हिस्से से ही स्पष्ट है कि एक ने समाज के लिए आईक्यू का इस्तेमाल किया तो दूसरे ने गुनाह की खातिर। इसमें गलत क्या है? यह ठीक इसी तरह से है, जैसे हम मर्यादा पुरुषोत्तम राम को भगवान का अवतार मानते हैं, मगर साथ ही रावण को प्रकांड विद्वान भी मानते हैं, जिसने कि अपनी विद्वता का दुरुपयोग किया। मगर हमारे यहां इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में तथ्यों तो अलग ढ़ंग से उभारने की प्रवृत्ति बढ़ी हुई है। थोड़ी सी भी गुंजाइश हो तो बाल की खाल उतारना शुरू कर दिया जाता है, भावनाएं भड़काना शुरू कर दिया जाता है, जिसका कि गडकरी को ख्याल नहीं रहा। एक जिम्मेदार राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष के नाते उन्हें अंदाजा होना चाहिए था कि उनके बयान से विवाद हो सकता है। भले ही उनकी मंशा पूरी तरह से साफ हो, मगर इतना तो उन्हें पता होना ही चाहिए कि हमारे यहां मीडिया किसी प्रकार काम करता है और आम लोगों की मानसिकता कैसी है, जिसे कि आसानी से भुना लिया जाता है।
सच ये भी है कि गडकरी इससे पहले भी इस तरह के बयान दे चुके हैं, जो कि उनकी मर्यादा के सर्वथा विपरीत थे। ऐसा प्रतीत होता है कि जब वे बोलते हैं तो कुछ का कुछ निकल जाता है, जो कि उनके लिए परेशानी का सबब बन जाता है। ताजा मामले में भी ऐसा ही हुआ। मगर निष्पक्ष विवेचना की जाए तो उन्होंने कुछ भी गलत नहीं कहा, मगर लोकतंत्र में अगर सही को गलत कहने वालों की संख्या ज्यादा हो तो उसे मानना ही पड़ता है। गडकरी ने भी ऐसा ही किया। उन्होंने खेद जता दिया, हालांकि उन्होंने अपने बयान का खंडन नहीं किया है।
-तेजवानी गिरधर

सोमवार, नवंबर 05, 2012

रघुवेन्द्र मिर्धा पर टिकी हैं निगाहें


संयुक्त संसदीय समिति के भूतपूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय रामनिवास मिर्धा के पौत्र व राजस्थान में केबिनेट मंत्री रहे हरेन्द्र मिर्धा के पुत्र रघुवेन्द्र मिर्धा क्या चुनावी राजनीति में आगे आएंगे या आने का मानस है, इसकी चर्चा इन दिनों नागौर जिले में काफी है। हालांकि स्वयं रघुवेन्द्र ने अपनी ओर से इस प्रकार की रुचि जाहिर नहीं की है, मगर नागौर के युवाओं में वे जिस प्रकार लोकप्रिय होते जा रहे हैं, उससे इस चर्चा को बल मिला है। हालांकि यह पूरी तरह से कांग्रेस और मिर्धा परिवार पर निर्भर करता है कि रघुवेन्द्र मिर्धा को चुनावी संग्राम में उतारा जाएगा या नहीं, मगर क्षेत्र के युवाओं में वे आशा की किरण बनते जा रहे हैं। वे माइनिंग एंड मिनरल इंडस्ट्रीज मिर्धा ग्रुप के सीईओ हैं। यहां यह बताना अप्रासंगिक नहीं होगा कि हरेन्द्र मिर्धा पिछले विधानसभा चुनाव में हार गए थे, वरना मुख्यमंत्री पद के दावेदार होते।
ऐसा नहीं है कि केवल जाटों की नई पीढ़ी ही उनमें रुचि ले रही है, अन्य समाजों में भी उनके समर्थक हैं। और इसकी वजह ये है कि एक तो वे अजमेर के प्रतिष्ठित मेयो कॉलेज सहित दिल्ली विश्वविद्यालय व डिप्लोमेटिक एकेडमी आफॅ लंदन से पढ़े-लिखे हैं और दूसरा जातिवाद उनमें कहीं नहीं झलकता। स्वभाव से सौम्य व शांत होने की वजह सहज ही युवकों को आकर्षित कर लेते हैं। इसके अतिरिक्त उनमें बुद्धिजीवी होने का गुण फेसबुक पर उनके अकाउंट पर आने वाली पोस्ट व उन पर होने वाली टिप्पणियों से झलकता है। फेसबुक पर उनकी अच्छी मित्र मंडल व फॉलोइंग है। उनके एक फेसबुक फॉलोअर डेगाना निवासी व फिलवक्त दिल्ली में काम कर रहे योगेन्द्र चौधरी ने तो उन्हीं के एक समर्थक दिलीप सरावग की रघुवेन्द्र मिर्धा के व्यक्तित्व पर बाकायदा एक छोटी सी कविता भी पोस्ट की है, जो यह झलकाती है कि उनमें अपना भावी नेता तलाशा जा रहा है। देखिए कविता कुछ इस प्रकार है:-

रघुवेन्द्र मिर्धा
यह सौम्य युवा
सागर सा शांत सहृदय है
मगर उमड़ता इसमें ज्वार है
ज्वार!
नागौर सेवा का
ज्वार!
उन ख्वाबों का
जो कभी पाले
रामनिवास जी ने
आमजन हितार्थ
पर........
आङ़े आ गये वो
जिनके बड़े थे स्वार्थ
लेकिन
शांत सागर में आता जब ज्वार है
बह जाते हैं वो कमजोर जिनका आधार है
मुझे उस ज्वार का इन्तजार है
मुझे उस ज्वार का भरोसा है, विश्वास है।

-तेजवानी गिरधर

सोमवार, अक्टूबर 29, 2012

शर्म नहीं आई पूर्व थल सेना अध्यक्ष सिंह को बयान देते?


पूर्व थल सेना अध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने मुम्बई में टीम अन्ना शामिल होते हुए अन्ना हजारे के साथ संयुक्त बयान दिया कि यूपीए सरकार असंवैधानिक है और संसद को तुरंत भंग किया जाए। इतना ही नहीं उन्होंने यहां तक कहा कि जितना ब्रिटिश सरकार ने नहीं लूटा, उससे कहीं अधिक पिछले पैंसठ साल में सरकार ने देश को लूटा है। कदाचित बहुत ज्यादा नहीं पढ़े-लिखे अन्ना हजारे को सेना की नौकरी करते हुए सरकार की हकीकत समझ में न आई हो, मगर पूरी जिंदगी थल सेना अध्यक्ष जैसे गरिमापूर्ण पद की सुविधाओं और सम्मान को भोग चुका व्यक्ति अगर सेवा निवृत्त हो कर इस प्रकार का बयान देता है तो वह सरकार से कहीं ज्यादा खुद उसके लिए शर्मनाक है। यदि वाकई देश का इतना दर्द था, देशभक्ति इतना ही उछाल मार रही थी तो नौकरी छोड़ कर देते ये बयान देते। कैसी विडंबना है कि इसी सरकार के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पदों में एक पर रह कर पूरी जिंदगी सुख भोगने वाले व्यक्ति की जुबान अभिव्यक्ति की आजादी का उपयोग करते हुए लडख़ड़ाई तक नहीं। वाकई यह बेशर्मी की इंतहा है।
होना तो यह चाहिए था कि जब भी सिंह की समझदानी में यह बात आई कि यह सरकार लुटेरी है और देशभक्ति इतनी ही कूट-कूट कर भरी थी तो नौकरी छोड़ देते और सरकार के खिलाफ बिगुल बजा देते, तो उनकी महानता समझ में आती। कहने की जरूरत नहीं है कि ये वही सिंह हैं, जो कुर्सी की पूरा सुख भोगने की खातिर उम्र विवाद को सेवानिवृत्ति तक खींचते रहे। उन्हें इस संदेह का लाभ कत्तई नहीं दिया जा सकता कि उन्हें नौकरी पर रहते सरकार की असलियत का पता नहीं था और नौकरी पूरी होते ही पता लगा है कि सरकार लुटेरी है। स्पष्ट है कि वे सरकार के बारे में अपनी धारणा को दिल में कायम रखते हुए नौकरी के अनुशासन में बंध कर चुप थे और साथ ही उसका पूरा ऐश्वर्य भी भोग रहे थे। अब जब कि नौकरी नहीं रही तो खुल कर मैदान में आ गए हैं। पता है कि अब उनका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता, चाहे जो बयान जारी करें।
एक बात और। ये वही वी के सिंह हैं, जिनके उम्र विवाद के चलते सेना व सरकार के बीच टकराव की नौबत आ गई थी। बीते साल 4 अप्रैल को इंडियन एक्सप्रेस में खबर छपी कि 16 जनवरी को सेना की दो टुकडिय़ां हिसार और आगरा से दिल्ली की ओर कूच कर चुकी थीं, जिसका सीधा सा अर्थ था कि सिंह तख्ता पटल जैसी हरकत करने का मानस बना चुके थे। यह वही दिन था, जिस दिन सेना प्रमुख की याचिका सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट में आ रही थी। मीडिया में यहां तक छपा कि क्या जनरल सिंह ने 16 जनवरी की रात को भारत का परवेज मुशर्रफ बनने की ठान ली थी? वे लोकतंत्र का अपहरण कर सैन्य शासन लाने का ताना-बाना बुन चुके थे? हालांकि भारत सरकार और भारतीय सेना, दोनों ने इन आरोपों का खंडन किया और कहा गया कि वह सेना की टुकडिय़ों का रूटीन अभ्यास था, मगर शक की सुई तो सिंह पर घूम चुकी थी। इस खबर को लेकर यह बात भी आई कि सिंह को बदनाम करने के लिए यह प्रायोजित की गई थी। इस बारे में सैन्य मामलों को जानकार सेवानिवृत्त मेजर जनरल अशोक मेहता का कहना था कि भारत में इस तरह तख्ता पलट करना अथवा तख्ता पलट की धमकी देना संभव नहीं है, लेकिन इस खबर में शक तो गुंजाइश है है। शक इसलिए माना गया चूंकि आम तौर पर सेना की टुकडिय़ों के अभ्यास की खबर सरकार को पहले से ही दी जाती है, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ था।
एक बात और गौर करने लायक है। वो यह कि आज अगर सिंह को अन्ना हजारे गले लगा रहे हैं तो वह इसी कारण न कि सिंह के नाम के साथ पूर्व थल सेना अध्यक्ष का तमगा लगा है। उनका बयान असर डालेगा कि एक पूर्व थल सेना अध्यक्ष यदि सरकार के बारे में कुछ कह रहे हैं तो, जरूर सही ही कह रहे होंगे। यानि कि उसी पद का लाभ उठा रहे हैं। उससे भी गंभीर बात, जिस पर किसी की नजर नहीं गई है, वो यह कि एक पूर्व सेना अध्यक्ष का यह रवैया सैनिकों में बगावत का भाव भी तो पैदा कर सकता है। इस सिलसिले में अन्ना का सेवानिवृत्त सेनाधिकारियों को लामबंद करना कई प्रकार की आशंकाओं को जन्म देता है।
ऐसा नहीं कि सिंह अकेले ऐसे अफसर हैं, जो सेवानिवृत्ति के बाद खुल कर सरकार के खिलाफ खड़े हैं। पहले भी कई अफसर इस प्रकार की हरकतें कर चुके हैं। खैरनार जैसे कम ही अफसर रहे हैं जो ईमानदारी को जिंदा रखने के लिए नौकरी पर रहते हुए सरकारों से टकराव ले चुके हैं। इस सिलसिले में अरविंद केजरीवाल जरूर समर्थन के हकदार हैं, जिन्होंने समाजसेवा व देश सेवा की खातिर अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी, यह बात दीगर है कि उसमें भी उन्होंने नियम-कायदों को ताक पर रख दिया। बाद में कलई खुली तो बड़ा अहसान जताते हुए बकाया चुकाने को राजी हुए।
लब्बोलुआब, देश हित की खातिर लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करना भले ही हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हो, मगर पूरी जिंदगी सरकारी नौकरी का आनंद उठा कर सेवानिवृत्त होने पर सरकार के खिलाफ बकवास करना कत्तई जायज नहीं ठहराया जा सकता।
-तेजवानी गिरधर

गुरुवार, अक्टूबर 25, 2012

किरण ने भी जताई गडकरी के प्रति वफादारी


भाजपा की राष्ट्रीय महासचिव एवं विधायक श्रीमती किरण माहेश्वरी ने भी अपने अध्यक्ष नितिन गडकरी के प्रति वफादारी जाहिर कर दी है। इससे पहले जहां पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने गडकरी को संबल प्रदान किया, वहीं लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज भी खुल कर साथ खड़ी हो चुकी हैं। प्रवक्ता बलबीर पुंज व मुख्तार अब्बास नकवी भी औपचारिक रूप से निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए औपचारिकता निभा चुके हैं। ये बात दीगर है कि शतरंज में ढ़ाई घर की चाल चलने वाले भाजपा सांसद राम जेठमलानी ने जरूर विभीषण वाला काम कर दिया है।
खैर, अपुन बात कर रहे थे, किरण माहेश्वरी की। उन्होंने अपने लिखित बयान में गडकरी को इस बात के लिए बधाई दी है कि उन्होंने उन पर लगाए जा रहे भ्रष्टाचार के आरोपों की किसी भी एजेन्सी से जांच करवाने को कहा है। अब इसमें बधाई वाली बात कहां से आ गई, ये तो खुद किरण माहेश्वरी ही जानें। किरण के बयान में विरोधाभास देखिए। एक ओर वे कहती हैं कि सारी एजेंसियां कांग्रेस सरकार के नियत्रंण में है, इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता कि जांच में शिथिलता एवं पक्षपात की संभावना है। दूसरी ओर वे यह अपेक्षा भी रख रही हैं कि केन्द्रीय सरकार के अधिकरण कांग्रेस के दबाव में विद्वेष पूर्वक कार्यवाही नहीं करेंगे। सवाल ये उठता है कि यदि आपको सरकार पर भरोसा ही नहीं है तो जांच की मांग काहे को कर रहे हैं। अर्थात जांच की मांग इस कारण कर रहे हैं ताकि फिलहाल कहीं कमजोरी साबित न हो जाए और शक इस कारण कर रहे हैं ताकि अगर बाद में सच में गड़बड़ी उजागर हो जाए तो कम से कम यह कहने की गुंंजाइश तो रहे कि सरकार ने बदले की भावना से काम किया है।
एक और दिलचस्प बात देखिए। किरण ने कहा है कि नितिन गडकरी पर भ्रष्टाचार के आरोप कांग्रेस की एक गहरी चाल है। जबकि सच ये है कि उनके खिलाफ पहले अरविंद केजरीवाल ने मामला उठाया और बाद में एक अखबार ने अपनी खोज खबर के आधार पर।
किरण का कहना है कि देश की सत्ता संभालने के बाद से ही कांग्रेस की रणनीति है, विरोधियों की प्रतिष्ठा गिराना और चरित्र हनन। वाकई कांग्रेस की बड़ी दुर्गति है। विरोधी कहते हैं कि कांग्रेस बदमाशी कर रही है, उधर केजरीवाल ने चिल्ला चिल्ला कर आसमान सिर पर उठा रखा है कि कांग्रेस व भाजपा मिलीभगत कर एक दूसरे के निजी मामलात दबा रहे हैं।
किरण का कहना है कि भाजपा कांग्रेस के षड्यंत्रों से विचलित नहीं है। सवाल उठता है कि कौन कह रहा है कि भाजपा विचलित है? ये तो खुद भाजपा नेताओं को ही पता है कि वे सकते में हैं या नहीं कि जिनके नेतृत्व में आगामी लोकसभा चुनाव लडऩा है, वहीं निशाने पर आ गया है।
प्रसंगवश बता दें कि जब केजरीवाल ने हमला बोला था तब तो गडकरी खुल कर सामने आए थे, मगर अखबार के खुलासे के बाद से वे स्वयं छिप कर अपने अन्य साथियों से बयान जारी करवा रहे हैं। सुषमा स्वराज ने तो गडकरी को पाक साफ बताने के लिए बड़ा ही लचर तर्क दिया। वे बोलीं कि गडकरी स्वयं रजत शर्मा के कार्यक्रम आपकी अदालत में तीखे सवालों के जवाब दे चुके हैं, जबकि एक आम आदमी भी जानता है कि रजत शर्मा का यह कार्यक्रम नूरा कुश्ती से ज्यादा कुछ नहीं होता। इसमें लगता तो ये है कि सवाल तीखे हैं, मगर सच ये है कि यह सब मैच फिक्सिंग होती है और इसके जरिए कटघरे में बैठे नेता को उसको पूरा पक्ष उभारने का मौका दिया जाता है। दर्शक तक भाड़े के लाए हुए नजर आते हैं, जो कि नेता के बयानों पर तालियों की गडगड़ाहट से स्टूडियो को गुंजा देते हैं।
खैर, फिलहाल सरकार ने जांच शुरू करवा दी है, जिसमें कि अभी वक्त लगेगा, तब तक तो गडकरी की जान सांसत में ही है।
-तेजवानी गिरधर

रविवार, अक्टूबर 21, 2012

दिग्विजय के सवालों पर अरविंद की बोलती बंद


इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के सुनियोजित सहयोग से राजनीतिक हस्तियों पर सीधे हमले कर हंगामाश्री बने अरविंद केजरीवाल की बोलती बंद है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने जैसे ही उनके व्यक्तिगत व सार्वजनिक जीवन से संबंधित सवाल उठाए हैं, उनका जवाब देते उनसे नहीं बन रहा। अपनी पादर्शिता की ढिंढोरा पीटने वाली टीम केजरीवाल दिग्विजय के सवालों पर लीपापोती करती नजर आ रही है। केजरीवाल जानते हैं कि अगर जवाब दिया तो उनके आदर्शों की पूरी पोल खुल जाएगी और सवाल दर सवाल उठेंगे तो सारी छकड़ी भूल जाएंगे, सो बहाना ये बना रहे हैं कि पहले दिग्विजय अपने आकाओं सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह व राहुल में से किसी को उनसे खुली बहस के लिए राजी करें, तब वे जवाब देंगे।
असल में वे जानते हैं कि दिग्विजय सिंह बिना अध्ययन के हवा में सवाल नहीं उठाते। उनके सवालों पर भले ही लोग खिल्ली उड़ाते हुए अपशब्दों का इस्तेमाल करते हैं, पागल करार देते हैं, मगर बाद में खुलासा हो जाता है कि उनके सवाल में दम था। केजरीवाल जानते हैं कि वे दिग्विजय सिंह से अटके तो उनके सवालों के जवाब देते खुद की चाल ही भूल बैठेंगे। हालांकि उनका तर्क ये है कि दिग्विजय के सावलों में से एक भी सवाल देश से जुड़ा नहीं है, इसलिए जवाब देने की कोई जरूरत नहीं, मगर सच ये है कि कई सवाल उनके आंदोलन व उनके एनजीओ की पोल खोलने वाले हैं। हालांकि वे कहते हैं कि दिग्विजय सिंह जनता के करप्शन के मुद्दे से ध्यान हटाना चाहते हैं, मगर सच ये भी है कि खुद केजरीवाल भी देश के अन्य सभी जरूरी मुद्दों से ध्यान हटा कर केवल अपनी भावी राजनीतिक पार्टी को चमकाने में ही जुटे हुए हैं।
टीम केजरीवाल के अहम सदस्य संजय सिंह कह रहे हैं कि हमने 15 मंत्रियों से सवाल पूछे, लेकिन हमें एक भी सवाल का जवाब नहीं मिला। सरकार की जवाबदेही जनता के प्रति है तो उसे सामने आकर खुली बहस करना चाहिए। मगर उनके इस तर्क से केजरीवाल पर उठे सवालों के जवाब न देने का कोई ठोस आधार नहीं बनता। चलो, वे 15 मंत्री तो चोर हैं, भ्रष्ट हैं, मगर केजरीवाल तो ईमानदारी की मिसाल हैं, वे क्यों मंत्रियों जैसा रवैया अपना रहे हैं?
दरअसल व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर लोगों को सब्ज बाग दिखा कर चर्चित हुए अरविंद केजरीवाल जब अपने राजनीतिक एजेंडे पर आए, तब तक तो ठीक था, मगर खुद को महान व ईमानदारी का पुतला साबित करने के लिए जैसे ही राजनीतिक शख्सियतों पर सीधे हमले पर उतारु हुए, उनका घटियापन खुल कर सामने आ गया। अगर ये मान भी लिया जाए कि दिग्विजय सिंह घटिया व अविश्वसनीय हैं, तो वे तो हैं ही इसी रूप में चर्चित, मगर इससे केजरीवाल की महानता तो स्थापित नहीं हो जाती। लब्बोलुआब, केजरीवाल को पहली बार सेर को सवा सेर मिला है। अब आया है ऊंट पहाड़ के नीचे।
-तेजवानी गिरधर