तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

मंगलवार, फ़रवरी 18, 2025

ये डंकी रूट क्या है?

इन दिनों अमेरिका में अवैध रूप से रह रहे अप्रवासी भारतीयों को भारत लौटाया जा रहा है। कहा जा रहा है कि वे डंकी रूट से अमेरिका गए थे। डंकी रूट के मायने क्या हैं? कम ही लोगों को इसकी जानकारी होगी। इस सिलसिले में किसी समय अजमेर में जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के सेवानिवृत्त अधिशाषी अभियंता रहे लेखक ई. शिव शंकर गोयल, जो कि इन दिनों दिल्ली में निवास कर रहे हैं, उन्होंने शोध किया है। उनकी जानकारी के अनुसार जब राजस्थान में, अगस्त 1968 में, सार्वजनिक निर्माण विभाग से निकल कर जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग का गठन हुआ तो नागौर जिले के बांका पट्टी इलाके में ग्राउंड वाटर में अधिक फ्लोराइड की समस्या मुंह बायें खडी थी। स्थानीय लोग वहां का पानी पी-पीकर कूबड, हाथ-पांव टेढे होना तथा दांतों की विभिन्न बीमारियां झेल रहे थे। विभाग ने उस स्थान से दूर एक जगह पीने योग्य पानी का पता लगा कर एक ट्यूब वैल खुदवाया और उसे गांवों से जोड़ने हेतु एक गांव में सर्वे टीम भेजी। टीम को देख कर गांव वाले भी इकट्ठे हो गये। उनमें से एक ने टीम के मुखिया से पूछ लिया कि इतने ताम-झाम के साथ कैसे आना हुआ? तो उन्हें बताया गया कि ट्यूब वैल से गांव तक आने का छोटे से छोटा रास्ता ढूंढना है ताकि पाइप लाइन बिछाई जा सके। इस पर गांव वालों ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा कि इस छोटे से काम के लिए इतना झंझट करने की क्या जरूरत है? जब रेलवे लाइन बिछी थी तो गांव से स्टेशन तक का छोटे में छोटा गेला (रास्ता) ढूंढना था तो हमने एक गधे को पीट कर उधर की तरफ छोड दिया। वह जिस जिस रास्ते से स्टेशन गया, उससे पता लगा कि वह सबसे सोरा (छोटा) रास्ता है। कहते हैं कि तभी से डंकी रूट चर्चा का विषय हो गया, जिसका इस्तेमाल गुजरात, पंजाब और हरियाणा के कुछ लोगों ने किया।

इस बारे में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस में तनिक भिन्न जानकारी उपलब्ध है। 

उसके अनुसार डंकी रूट एक अवैध और खतरनाक प्रवास मार्ग को संदर्भित करता है, जिसका उपयोग लोग गैरकानूनी तरीके से एक देश से दूसरे देश में जाने के लिए करते हैं। यह रूट मुख्य रूप से दक्षिण एशियाई देशों (भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि) से यूरोप, अमेरिका, कनाडा और अन्य विकसित देशों तक जाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसमें कई देशों से होते हुए गुप्त और खतरनाक रास्तों से यात्रा करनी पड़ती है, जैसे ईरान, तुर्की, ग्रीस के जरिए यूरोप में प्रवेश और दक्षिण और मध्य अमेरिका के रास्ते अमेरिका में प्रवेश (मेक्सिको बॉर्डर के जरिए) रूस, सर्बिया या अन्य पूर्वी यूरोपीय देशों से होकर। डंकी शब्द पंजाबी में छिप कर जाने या गैरकानूनी तरीके से यात्रा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसे डंकी इसलिए कहा गया क्योंकि लोगों को लंबी दूरी पैदल, खच्चरों (mules) या अन्य अवैध साधनों से तय करनी पड़ती है, जो गधों (Donkeys) पर बोझ ढोने की तरह कठिन और थकाने वाला होता है। पंजाब और अन्य भारतीय राज्यों के कई लोग कनाडा, यूरोप, अमेरिका जाने के लिए इस अवैध रास्ते का इस्तेमाल करते हैं। पंजाबी बोलचाल में डंकी शब्द का इस्तेमाल उन लोगों के लिए किया जाता है जो बिना वीजा या कानूनी दस्तावेजों के किसी देश में घुसने की कोशिश करते हैं। समय के साथ यह शब्द खासकर अवैध रूप से विदेश जाने वाले प्रवासियों के लिए प्रचलित हो गया।

-तेजवाणी गिरधर

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असुरों को वरदान देते ही क्यों हैं त्रिदेव?

सवाल ये है कि त्रिदेव या देवता असुरों को ऐसे वरदान देते ही क्यों हैं कि वे उसका दुरुपयोग कर सकें? क्या उन्हें इस बात का अहसास और इल्म नहीं कि असुर उस वरदान को दुनिया पर जुल्म ढ़हाने के लिए उपयोग करेगा? क्या किसी को आराधना, कठोर साधना व तप करने के बाद वरदान देना उनकी मजबूरी है, चाहे वह उसका दुरुपयोग करे?

पुराणों और रामायण व महाभारत से जुड़ी कथाओं में इस बात का स्पष्ट जिक्र है कि अमुक असुर ने त्रिदेव या किसी देवी-देवता से प्राप्त वरदान का दुरुपयोग करते हुए देवताओं, ऋषि-मुनियों आमजन को बहुत पीड़ित किया। इस पर दुखी हो कर वे त्रिदेव के पास गए और त्राहि माम त्राहि माम कहते हुए उस असुर की यातानाओं से मुक्ति के लिए प्रार्थना की। उन्होंने अपने वरदान की महत्ता को तो कायम रखा, मगर साथ ही देवताओं व ऋषि-मुनियों पर दया की और अपने ही वरदान का तोड़ निकाला। और इस प्रकार अंततः देवी-देवता, ऋषि-मुनि व आमजन परेशानी से मुक्ति पाते हैं। ऐसे अनेकानेक प्रसंग हैं। कोई गिनती ही नहीं।

सवाल ये है कि त्रिदेव या देवता असुरों को ऐसे वरदान देते ही क्यों हैं कि वे उसका दुरुपयोग कर सकें? क्या उन्हें इस बात का अहसास और इल्म नहीं कि असुर उस वरदान को दुनिया पर जुल्म ढ़हाने के लिए उपयोग करेगा? क्या किसी को आराधना, कठोर साधना व तप करने के बाद वरदान देना उनकी मजबूरी है, चाहे वह उसका दुरुपयोग करे? ऐसे वरदान भी जानकारी में हैं, जिनके साथ ये शर्त लगाई जाती है कि वे उसका उपयोग जनकल्याण के लिए करने की बजाय दुरुपयोग करेंगे तो वह स्वतः ही बेअसर हो जाएगा। मगर सच्चाई ये है कि असुरों द्वारा हासिल वरदानों की प्रकृति ही ऐसी होती है कि उनका दुरुपयोग किया ही जाता है। स्वाभाविक ही है कि असुर ऐसा ही करेंगे। वरना वे असुर ही क्यों कहलाते? वरदान भी ऐसे-ऐसे कि क्या कहें? जिनसे साफ झलकता है कि असुर उसका दुरुपयोग करेंगे ही। असल में वे शक्ति का वरदान हासिल ही इसलिए करते हैं, ताकि उसका उपयोग कर देवताओं का दमन करें। अपने साम्राज्य का विस्तार कर सकें। कोई असुर अजेय होने का वरदान पा लेता है तो कोई ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र व अन्य कई प्रकार के अमोघ अस्त्र वरदान स्वरूप हासिल कर लेता है, जिनका उपयोग महाविनाश के लिए किया जा सकता है। जब यह पहले से संज्ञान में है कि उनका उपयोग सृष्टि को नष्ट करने के लिए किया जा सकता है तो उसे देना ही नहीं चाहिए। 

जरा गौर कीजिए। भस्मासुर शंकर भगवान से किसी के भी सिर पर हाथ फेरने पर उसके भस्म हो जाने का वरदान पा लेता है। बाद में माता पार्वती का वरण करने की खातिर भगवान को ही भस्म करने पर आमादा हो जाता है। बड़ी युक्ति से भगवान को उससे मुक्ति मिल पाती है। उसकी भी एक कहानी है। ब्रह्मा जी व विष्णु भगवान भी पहले तो ऐसे ही अनेक वरदान असुरों को देते हैं और बाद में खुद ही उनके निवारण के रास्ते निकालते हैं। यानि समस्या भी वे ही पैदा करते हैं और समाधान भी खुद ही करते हैं। हिरण्यकश्यप की कथा सर्वविदित है। उसे न अस्त्र से न शस्त्र से, न अंदर न बाहर, न जमीन पर न आसमान में, न मानव द्वारा न पशु द्वारा मारे जाने की वरदान हासिल होता है। अर्थात भगवान पहले तो ऐसा वरदान दे देते हैं कि उसे विभिन्न तरीकों से मारा नहीं जा सकेगा और बाद में खुद ही तोड़ निकालते हुए नृसिंह अवतार लेकर युक्तिपूर्वक उसका वध करते हैं, ताकि उनका वरदान की कायम रहे और हिरण्यकश्यप भी मारा जा सके।

इन सब में एक बात कॉमन है, वो यह कि मृत्यु अवश्यंभावी है, जगत के इस अटल सत्य को ध्यान में रख कर ही वरदान दिए जाते हैं। किसी को भी अमरता का वरदान नहीं दिया जाता। दिया भी नहीं जा सकता। जैसे भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान था, मगर में उसमें भी मृत्यु सुनिश्चित थी। बस इतना था कि उन्हें तभी काल वरण पाएगा, जब उनकी इच्छा होगी।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ असुर ही प्राप्त वरदान का दुरुपयोग करते हैं, ऐसे कई प्रसंग हैं, जिनमें देवता भी अपनी शक्तियों का बेजा इस्तेमाल करते हैं। बिलकुल वैसा ही व्यवहार करते हैं, जैसा कि आम मनुष्य करता है। ऋषि-मुनि तक मानवीय कामनाओं के वशीभूत हो कर कृत्य करते हैं। हां, इतना जरूर है कि ऐसे प्रसंगों की संख्या कम है। दुरुपयोग करने पर बाद में उन्हें भी शापित होना पड़ता है।

खैर, कुल मिला कर यह सवाल सिर ही चकरा देता है कि क्यों तो असुरों को वरदान दे कर उन्हें शक्तिशाली बनाया जाता है और फिर बाद में देवताओं के अनुनय-विनय पर दया करके असुरों का अंत किया जाता है।

यह तो हुई मोटी बु्द्धि और तर्क की बात। विषय का एक पहलु। जरा गहरे में जाएं तो और ही दृष्टिकोण उभरता है। ऐसा प्रतीत होता है कि परमसत्ता या प्रकृति द्वारा जगत के संचालन के लिए नकारात्मक व सकारात्मक शक्तियों का संतुलन बैठाया जाता है। यह जगत है ही द्वैत। अच्छाई और बुराई से मिल कर ही बना है। दोनों जगत के अस्तित्व के लिए आवश्यक तत्त्व हैं। इनका जोड़, बाकी, गुणा, भाग सृष्टि के रचनाकार भगवान ब्रह्मा, सृष्टि के पालक भगवान विष्णु व सृष्टि के संहारकर्ता भगवान शंकर करते हैं। ये तीनो सृष्टि के नियामक आयोग के डायरेक्टर हैं, जो स्वयं भी शक्ति के आदि केन्द्र के नियमों की पालना करवाने के लिए बाध्य हैं।

दूसरा तथ्य ये समझ में आता है कि कठोर साधना करके कोई भी शक्ति हासिल कर सकता है, चाहे असुर हो या देवता। प्रकृति की आदि शक्ति उसमें कोई भेद नहीं करती। वह सदैव निरपेक्ष रहती है।

इस विषय पर कभी और विस्तार से गहरे में चर्चा करेंगे।

https://www.youtube.com/watch?v=GsUgnVxIs5k


रविवार, फ़रवरी 16, 2025

दैनिक राषिफल पर अविष्वास क्यों?

हर आम ओ खास की दैनिक राषिफल देखने में रूचि होती है। चाहे उस पर विष्वास हो या नहीं। यकीन न हो तो भी एक बार देख ही लेते हैं। यकीन न होने के पीछे तर्क यह होता है कि अमुक राषि का दिनमान पूरी दुनिया के लोगों पर कैसे लागू हो सकता है? जैसे राषिफल आता है कि अमुक राषि के लोग आज मालामाल होंगे। बेषक उस राषि के लोगों के लिए वैसा योग होता तो है, मगर सभी के लिए भिन्न भिन्न होता है, क्योंकि सभी की कुंडली में ग्रहों की स्थिति अलग अलग होती है। अगर मालामाल होने का योग लागू होता है तो भी सभी पर समान रूप से परिफलित नहीं हो पाता। इसे यूं समझिये। जैसे किसी दिन अमुक राषि के लोगों पर धन वर्शा का योग है, मगर सभी पर धन वर्शा होती नजर नहीं आती। असल में वर्शा तो सभी पर समान रूप से होती है, मगर उसका फल हर व्यक्ति की पात्रता के अनुसार मिलता है। जिसका पात्र एक लीटर का है तो उसे एक लीटर और जिसका पांच लीटर का है, उसे पांच लीटर जल मिलता है। गरीब भी मालामाल होता है, मगर पात्रता के अनुसार। जैसे उसके पास दस रूपये हैं तो उसे एक हजार मिलते हैं और जिसके पास पहले से एक हजार रूपये हैं तो उसे पचास हजार मिलते हैं। ऐसे में असमंजस होना स्वाभाविक है, षंका होना लाजिमी है।

https://youtu.be/k6Wt1yPMp-k


श्रीमद्भागवत कथा में तोता क्यों रखा जाता है?

हालांकि आकाश में स्वछंद विचरण करने वाले किसी पक्षी को पिंजरे में कैद रखना उचित प्रतीत नहीं होता, लेकिन हमारे यहां तोते को पालने का प्रचलन रहा है। उसे शुभ माना जाता है। चूंकि तोते की आवाज मीठी होती है और वह राम-राम जैसे कुछ शब्द आसानी से सीख लेता है, इस कारण कुछ लोग मनोविनोद के कारण उसे पालते हैं। शौक में कई लोग रंग-बिरंगी चिडिय़ाएं यथा लव बर्ड्स भी पालते हैं।

आपने देखा होगा कि जहां भी श्रीमद्भागवत कथा होती है तो वहां पर तोता रखा जाता है। अगर तोता उपलब्ध न हो तो कथा स्थल के मुख्य द्वार पर कार्ड बोर्ड का बना तोता टांगा जाता है। मैने स्वयं ने कई जगह ऐसा देखा है। स्वाभाविक रूप से यह जिज्ञसा होती है कि आखिर ऐसा क्यों किया जाता है?

पौराणिक जानकारी के अनुसार जैसे बंदर में हनुमान जी की उपस्थिति मानी जाती है, उसी प्रकार तोते को शुकदेव जी का प्रतिनिधि माना जाता है। ज्ञातव्य है कि शुकदेव जी ने राजन परीक्षित को श्रीमद्भागवत कथा सुनाई थी। शुकदेवजी का जन्म व्यासजी की पत्नी पिंगला के गर्भ से हुआ था, जिनके पेट में वह तोता 12 साल तक रहा था। उसने हिमालय की गुफा में उस वक्त  कथा सुन ली थी, जब भगवान शंकर पार्वतीजी को यह कथा सुना रहे थे और इस दौरान पार्वती जी को निद्रा आ गई। स्वयं भगवान शंकर के श्रीमुख से कथा के दस स्कंध सुनने के कारण तोते की महिमा हो गई। तोते को शुक भी कहा जाता है।

ऐसी मान्यता है कि तोते की मौजूदगी के बिना व्यास कथा का महत्व नहीं रहता। तोते को आसन दे कर उसकी पूजा किए बिना श्रीमद्भागवत कथा मान्य ही नहीं है। हालांकि कथा करने वाले को कथा व्यास की पदवी होती है, मगर तोते की मौजूदगी के बिना वह कथा फल प्रदान नहीं करती।

प्रसंगवश बता दें कि पक्षियों में तोता ऐसा पक्षी है, जो कि मनुष्य की तरह बोल सकता है, अगर उसे प्रशिक्षित किया जाए। वैज्ञानिकों के अनुसार तोते के मस्तिष्क का सेरीब्रम पार्ट काफी विकसित होता है, इसी कारण उसे मनुष्य की बोली का प्रशिक्षण दिया जा सकता है।

https://youtu.be/NyxamV_l5nQ


शुक्रवार, फ़रवरी 14, 2025

भगवान के दाढ़ी-मूंछ क्यों नहीं होती है?

आपने देखा होगा कि देवी-देवताओं से इतर जितने भी महामानव हुए हैं, जिन्हें कि हम भगवान मानते हैं, उनके चित्रों व मूर्तियों में चेहरों पर दाढ़ी-मूंछ नहीं होती। इसमें भी किंचित अपवाद हो सकता है, मगर क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों है? भगवान कहे जाने वाले राम, कृश्ण, महावीर व बुद्ध के दाढी मूंछ क्यों नहीं होती? आइये, समझने की कोषिष करते हैं कि आखिर ऐसा क्यों है-

भगवान के दाढी मूंछ क्यों नहीं होती, इस गुत्थी को समझने से पहले भगवान शब्द पर आते हैं। इसकी अलग-अलग तरह से व्याख्या हुई है। जैसे जिसके पास धन है, उसे धनवान कहते हैं, उसी प्रकार जिसके पास भग है, वह भगवान है। भग अर्थात योनि। अर्थात प्रकृति। जो आदि शक्ति भगवति से युक्त है, वह भगवान है। वह पूर्ण है। हमारी संस्कृति में अर्धनारीश्वर का जिक्र आता है। उसका मतलब है, जो पुरुष व नारी के समान भाग से मिल कर बना है।

एक व्याख्या ये है कि साकार भगवान, निराकार ईश्वर का ही अवतार है, जैसे श्रीराम व श्रीकृष्ण। इसी प्रकार महावीर व बुद्ध को भी भगवान की श्रेणी में गिना जाता है। वो इसलिए कि महावीर ने केवल्य ज्ञान अर्जित किया और बुद्ध ने बुद्धत्व। इन दोनों के बारे में मान्यता है कि वे मोक्ष को प्राप्त हो गए। वे पूर्णता को प्राप्त हो गए। जन्म-मरण के चक्र से मुक्त।

अब तथ्य की बात, जिसे कि विज्ञान भी मानता है। वो यह कि हर मनुष्य, चाहे वह नर हो या नारी, वह पुरुष व स्त्री, दोनों के ही गुणों से युक्त होता है, क्योंकि उसकी संरचना ही स्त्री व पुरुष के संयोग से हुई है। अंतर सिर्फ गुणसूत्रों का है। अगर पुरुष के गुणसूत्र अधिक हैं तो वह पुरुष के रूप में पैदा होता है और अगर स्त्री के गुणसूत्र अधिक हैं तो उसका जन्म नारी रूप में होता है। हर पुरुष में नारी के भी गुण होते हैं और हर स्त्री में पुरुषों के भी गुण होते हैं। आपने देखा होगा कि कुछ स्त्रियों में जन्म के बाद किन्हीं करणों से पुरुषों के गुण ज्यादा हो जाते हैं तो वह पुरुषों की तरह व्यवहार करती हैं। इसी प्रकार जिन पुरुषों में स्त्रियोचित गुण विकसित हो जाते हैं तो वे स्त्रैण कहलाते हैं। स्त्रैणता का सबसे अनूठा उदाहरण स्वामी रामकृष्ण परमहंस को माना जाता है। वे देवी के उपासक थे। वे देवी में इतने लीन हो गए कि उनका शरीर भी स्त्रैण हाने लगा। बताते हैं कि जीवन के आखिरी वर्षों में उनके स्तन उभरने लगे थे। जहां तक प्राकृतिक विकृति का सवाल है गुण सूत्रों के असंतुलन के परिणाम स्वरूप मनुष्य किन्नर रूप में जन्म लेता है। हालांकि किन्नरों में भी नर-मादा का विभेद है, लेकिन आम तौर पर आपने देखा होगा कि किन्नर की आवाज पुरुषों की तरह मोटी होती है, मगर चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ नहीं आती। व्यवहार पुरुषों की तरह, मगर चाल-ढ़ाल स्त्रियों की तरह।

यह भी एक तथ्य है कि पुरुषों के चेहरे पर दाढ़ी व मूंछ के रूप में बाल होते हैं, जबकि स्त्रियों में ऐसा नहीं होता। कई बार ऐसा पाया गया है कि जो भी स्त्री पुरुषोचित व्यवहार करती है तो उसके भी पुरुषों की तरह चेहरे पर बाल आने लगते हैं। ऐसे भी प्रमाण हैं कि बहुत अधिक उम्र होने पर महिलाओं में गुण सूत्रों का, हारमोन्स का असंतुलन होता है और उनके दाढ़ी-मूंछ आने लगती है।

अब बात मुद्दे की। कोई भी पुरुष पूर्णता को उपलब्ध होता है, अर्थात भगवान की श्रेणी में आता है, तब उसमें पुरुष व स्त्री के गुण समान होते हैं। इसी कारण उसके चेहरे पर बाल नहीं होते। आपने भगवान राम, भगवान कृष्ण, भगवान महावीर, भगवान बुद्ध के जितने भी चित्र या मूर्तियां देखी होंगी, उनमें उनके दाढ़ी-मूंछ नजर नहीं आई होगी। वजह क्या है? क्या वे रोजाना शेव करते थे? इसका जिक्र शास्त्रों में तो कहीं पर भी नहीं है। अर्थात उनके चेहरे पर बाल आते ही नहीं थे? और वजह थी पूर्ण अवस्था। जितना पुरुष, उतनी ही स्त्री। हालांकि यह भी पक्का नहीं है कि वस्तुस्थिति क्या रही होगी, मगर कुछ तथ्यों के आधार पर ऋषि-मुनियों ने जैसा वर्णन किया, उसी के अनुरूप चित्र व मूर्तियां बना दी गईं। 

ऐसी भी मान्यता है कि भगवान सदा किशोर और अमूर्त है। किशोरावस्था दाढ़ी पैदा होने से पहले की अवस्था है। भरपूर यौवन, प्रखर ओज। इसी आधार पर हमने भगवान की परिकल्पना किशोर के रूप में की। किशोरावस्था को ध्यान में रख कर ही मन्दिरों में मूर्तियां रची गईं। यही वजह है कि उनके चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ नहीं दर्शाई गई है।

प्रसंगवश आखिर में भगवान की भिन्न-भिन्न व्याख्याओं पर आते हैं। भगवान शब्द में युक्त भग का अर्थ कामना व भाग्य भी होता है। भग से तात्पर्य प्रकृति या भौतिक संसार से है, अर्थात जो सभी भौतिक आनंदों, कामनाओं और भाग्य को धारणा करने वाला गर्भ है, वह भगवान है। राम व कृष्ण को हम अवतार की श्रेणी में मानते हैं, मगर चूंकि उन्होंने शरीर धारण किया है, इस कारण इस भौतिक संसार से बंधे हुए हैं। उनके जीवन में भी वैसे ही सुख-दुख आए, जैसे कि सामान्य मानव के आते हैं। भगवान का अर्थ जितेंद्रिय भी माना जाता है। इंद्रियों को जीतने वाला। जिसने पांचों इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है तथा जिसकी पंच तत्वों पर पकड़ है, उसे भगवान कहते हैं। जैसे महावीर व बुद्ध। जितेन्द्रिय यानि वह जो पूर्णता को, मोक्ष को प्राप्त हो चुका है और जो जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो गया हो, वही भगवान है। एक और व्याख्या में बताया गया है कि भग यानि ऐश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य, ये छह गुण अपनी समग्रता में जिसमें हों, उसे भगवान कहते हैं। 

https://youtu.be/z8XaD02LCvk


गुरुवार, फ़रवरी 13, 2025

विज्ञान मानता है कि कोई भी ध्वनि नष्ट नहीं होती। वह ब्रह्मांड में कहीं न कहीं विचरण करती रहती है। उसी सिद्धांत पर ही तो रेडियो का अविष्कार हुआ। कोई ध्वनि अंतरिक्ष में छोड़ी गई अर्थात ब्रॉडकास्ट की गई। फिर उसी को कैच करने की तकनीक रेडियो या ट्रांसमीटर में काम में ली गई। इसी प्रकार दृश्यों का, वीडियो का प्रयोग करके टेलीविजन बनाया गया। यह सब हमारे सामने हैं। कोई कपोल कल्पित बात नहीं है। दुनिया में कहीं भी, हजारों किलोमीटर दूर क्रिकेट मैच हो रहा होता है और हम उसे उसी समय अपने टेलिविजन पर देख रहे होते हैं। क्या यह किसी चमत्कार से कम है? मगर चूंकि इसे विज्ञान से संभव कर दिखाया है, इस कारण हमें अचरज नहीं होता।

महाभारत में भी इसी का जिक्र है कि संजय ने दिव्य दृष्टि से युद्ध को देख कर उसका पूरा वृतांत धृष्टराष्ट्र को सुनाया था। बेशक, उस वक्त टेलिविजन का अविष्कार नहीं हुआ था, मगर दूरस्थ घटनाक्रम को देखने की क्षमता का ही संजय ने उपयोग किया, जो कि उनको वरदान के रूप में  मिली थी। यह बात दीगर है कि वह विधा कुछ और थी, 

मगर इसका अर्थ है कि मौलिक रूप से एक स्थान के दृश्य या घटनाक्रम को दूसरे स्थान पर देख पाना संभव था।

अब असल मुद्दे पर आते हैं। ओशो का ख्याल था कि ध्वनि के अंतरिक्ष में सदैव मौजूद रहने के सिद्धांत के आधार पर महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण व अर्जुन के बीच जो संवाद हुआ, उसकी ध्वनि भी अंतरिक्ष में कहीं न कहीं विचरण कर रही होगी। बस जरूरत है तो उसे कैच करने की। सर्वविदित है कि गीता में श्रीकृष्ण व अर्जुन के बीच जो संवाद हुआ, वही हूबहू गीता में बताया गया है। गीता लिखित पुस्तक नहीं है, बल्कि उसमें संवाद को लिपिबद्ध किया गया है। बताया जाता है कि ओशो ने कुछ वैज्ञानिकों की टीम को उस संवाद को रिकॉर्ड करने का सौंपा था। वे वर्षों पुरानी ध्वनि की फ्रिक्वेंसी को नाप कर उसे कैच करने की कोशिश में जुटे थे। ओशो के निधन के बाद उस प्रयास का क्या हुआ, कुछ भी जानकारी नहीं। उनके बाद क्या अब भी उस पर कोई काम दुनिया में कहीं हो रहा है, इसकी भी जानकारी नहीं है। अगर कभी ये संभव हो पाया तो कितना सुखद व आश्चर्यजनक होगा। तब गीता पढ़ी नहीं जाएगी, बल्कि सुनी जाएगी, श्रीकृष्ण व अर्जुन की ऑरीजनल आवाज में।

https://youtu.be/cNggac7Db84


बुधवार, फ़रवरी 12, 2025

भगवान शिव की परिक्रमा आधी क्यों की जाती है?

धर्मस्थलों में गर्भग्रह में स्थापित मूर्ति और मजारों की परिक्रमा करने की परंपरा है। यह भी सर्वविदित तथ्य है कि परिक्रमा की दिशा घड़ी की सुई की तरह दक्षिणावृत होती है। लेकिन यह बेहद रोचक तथ्य है कि अकेले भगवान शिव अथवा शिव लिंग ही ऐसे हैं, जिनकी परिक्रमा पूरी नहीं की जाती। परिक्रमा जहां समाप्त होती है, वहीं से फिर घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में लौटा जाता है। जहां तक भगवान शिव का प्रश्न है तो सब जानते हैं कि उनकी जटा से गंगा का प्रवाह होता है, जो कि अति विशाल है। यह मान कर कि उसे पार नहीं किया जा सकता, परिक्रमा वहीं रोक पर वापस लौट जाते हैं। इसे चंद्राकार परिक्रमा कहा जाता है। इसी प्रकार शिव लिंग पर भी चूंकि विभिन्न प्रकार के अभिषेक किए जाते हैं, जिनका निकास गोमुख से होता है, जिसे कि सोमसूत्र कहा जाता है, उसे उलांघना भी धार्मिक विधि के विपरीत माना जाता है। शास्त्रानुसार सोमसूत्र शक्ति-स्रोत है। उसे लांघते समय पैर फैलाने से वीर्य निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है, जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। जानकारी ये भी है कि तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढंके हुए सोमसूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है।

ऐसी मान्यता है कि सनातन धर्म में परिक्रमा करने का चलन गणेश जी के मां पार्वती की परिक्रमा करने से शुरू हुआ। इससे जुड़ा प्रसंग ये है कि एक बार मां पार्वती ने अपने पुत्रों कार्तिकेय तथा गणेश को सांसारिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए पृथ्वी का एक चक्कर लगा कर आने का आदेश दिया गया।  कार्तिकेय अपनी सवारी मोर पर रवाना हुए, लेकिन गणेश अपने वाहन चूहे को देख विचार में पड़ गए कि वे इस प्रतियोगिता में कैसे प्रथम आएं? उन्होंने एक युक्ति निकाली और मां पार्वती के चक्कर लगाना आरंभ कर दिया। जब कार्तिकेय पृथ्वी का पूरा चक्कर लगा कर लौटे तो देखा कि गणेश वहां पहले से मौजूद हैं तो वे चकित रह गए। इस पर गणेश ने कहा कि मां पार्वती ही संसार हैं। ज्ञान प्राप्ति के लिए उनकी परिक्रमा ही पर्याप्त है, उसके लिए पृथ्वी की परिक्रमा की जरूरत नहीं। 

धार्मिक मान्यता के अनुसार केवल शिव जी की आधी परिक्रमा की जाती है, जबकि मां दुर्गा की एक, हनुमानजी व गणेशजी की तीन-तीन, भगवान विष्णु की चार, पीपल के वृक्ष की एक सौ आठ परिक्रमा का विधान है। वैसे सामान्यरू तीन परिक्रमा का चलन है।

अब आते हैं इस तथ्य पर कि परिक्रमा आखिर क्यों की जाती है? ऐसी मान्यता है कि पवित्र स्थान, मूर्ति, वृक्ष, पौधा आदि की परिक्रमा से उनके इर्द-गिर्द मौजूद आभा मंडल से सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। हमारी संस्कृति में मंदिर, नदि, पर्वत, तीर्थ, वृक्ष आदि की परिक्रमा का चलन है। दिलचस्प बात है कि पाणिग्रहण संस्कार में वर-वधू अग्नि की परिक्रमा करते हैं। 

जरा और गहरे में जाएं तो देखिए, सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं और सभी ग्रहों को साथ लेकर हमारा सूर्य महासूर्य की परिक्रमा कर रहा है। इतना ही नहीं, बल्कि सभी ग्रह अपनी धूरि पर भी कर रहे हैं। अर्थात यह केवल मान्यता का मसला नहीं है, बल्कि परिक्रमा या चक्र में ब्रह्मांड का गहरा रहस्य छुपा हुआ है। हर छोटा बड़े की परिक्रमा कर रहा है। समय की सूचक घड़ी में भी सुइयां चक्राकार घूम रही हैं। चक्र ही परिवर्तन व प्रगति का द्योतक है। निष्कर्ष यही कि परिक्रमा से केन्द्र तुष्ट होता है, वहीं से ऊर्जा प्राप्त होती है।

https://www.youtube.com/watch?v=OYiVYyKP3YU