तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

मंगलवार, जनवरी 28, 2025

कपाल क्रिया के दौरान जगह क्यों छोड़ते हैं?

आपने देखा होगा कि जब हम किसी की अंत्येष्टि में जाते हैं तो कपाल क्रिया के दौरान लोग एक-दूसरे को जगह छोडऩे को कहते हैं, अर्थात जिस स्थान पर हम बैठे होते हैं, उसे बदलने को कहा जाता है। सभी ऐसा करते भी हैं। मैने इस बारे में अनेक लोगों से बात की कि जगह क्यों छोड़ी जाती है, मगर किसी को यह जानकारी नहीं है कि इसकी वजह क्या है? अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए मैंने अनेक पुस्तकें खंगाली। मुझे याद नहीं कि इस बारे में कहां पढ़ा, मगर इस बारे में इशारा करती कुछ बातें मेरे ख्याल में है।

ऐसी मान्यता है कि अंत्येष्टि के दौरान मृत आत्मा देह में ही कपाल के भीतर ब्रह्मरंद्र में होती है। कपाल की हड्डी चूंकि बहुत मजबूत होती है, इस कारण उस पर घी डाल कर उसे तोड़ा जाता है। बताते हैं कि कपाल क्रिया करने पर ही आत्मा की देह से मुक्ति होती है। देह से मुक्त उसे इसलिए किया जाता है, ताकि वह आगे की यात्रा को प्रस्थान करे। कपाल क्रिया से पहले तक उसका अटैचमेंट न केवल अपने जलते शरीर से अपितु आसपास के दृश्य भी होता है। उस अटैचमेंट को समाप्त करने के लिए श्मशान में मौजूद सभी लोग कपाल क्रिया होते ही अपनी-अपनी जगह छोड़ कर दूसरी जगह पर बैठते हैं और नया दृश्य बन जाता है। एक झटके में जब पुराना दृश्य आत्मा को नहीं दिखाई देता तो स्वाभाविक रूप से उसका श्मशान स्थल से डिटेचमेंट हो जाता है। यानि कि यदि दृश्य नहीं बदला जाए तो आत्मा का पुराने दृश्य से संबंध बना रहेगा और वह श्मशान स्थल से मुक्त नहीं हो पएगी। हम समझ सकते हैं कि वर्षों तक भौतिक शरीर व दुनिया में रहते हुए हमारा कितना गहरा संबंध हो जाता है। शरीर जलने के बाद आत्मा यहीं अटकी रहना चाहती है। उसे जबरन कपाल से मुक्त कराना होता है। इतना ही अंत्येष्टि के दौरान मौजूद दृश्य से भी उसका संबंध विच्छेद कराने का प्रयास करना होता है। यह मेरी नजर में बैठा तथ्य है, हो सकता है वास्तविकता कुछ और हो। मेरा यह दावा नहीं कि मैं ही सही हूं।

आपने देखा होगा कि अंत्येष्टि के बाद जब परिजन घर लौटते हैं तो कपाल क्रिया करने वाला देहलीज पर मृत आत्मा से अपने संबंधी का षब्द जोर से उच्चारण करता है। जैसे पिताजी, बाबोसा, दादाजी इत्यादि। इस का कारण जानने की मैंने बहुत कोशिश की है, मगर अभी तक जानकारी नहीं मिल पाई है। हो सकता है, ऐसा मृत आत्मा का आह्वान करने के लिए किया जाता हो ताकि वह श्मशान के बाद घर पर आ जाए। शास्त्रों में बताया गया है कि तेरह दिन पर आत्मा का वास घर में ही रहता है। उसके बाद की यात्राओं का वर्णन गरुण पुराण सहित अन्य शास्त्रों में मौजूद है।

https://www.youtube.com/watch?v=6V_ouuh_gf0&t=3s


सोमवार, जनवरी 27, 2025

क्या शिव और शंकर अलग-अलग हैं?

हमारी जनचेतना में यह बात गहरे बैठी है कि शिव और शंकर एक ही हैं। इन दोनों में कोई भेद नहीं समझा जाता। जब भी शिव लिंग पर जल चढ़ाते हैं तो मन में त्रिशूलधारी, त्रिनेत्र व नील कंठ की प्रतिमा होती है, जिनकी जटा से गंगा निकलती है। शंकर भगवान का वाहन नंदी को माना जाता है और शिव लिंग के सामने भी नंदी बैल की प्रतिमा स्थापित की जाती है। दोनों के नाम का उच्चारण भी एक साथ किया जाता है, यथा शिव शंकर, शिव शंभू, शिव भोलेनाथ। शिव लिंग पर भी वैसा ही त्रिनेत्र बनाया जाता है, जैसा शंकर के है। दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं, जो कि इन दोनों को अलग-अलग मानते हैं। उनके अपने तर्क हैं।

जो लोग दोनों को अलग मानते हैं, हो सकता है कि उन्हें मतिभ्रम हो या फिर यह एक गूढ़ रहस्य हो, मगर उनके इस तर्क में जरूर दम है कि भगवान शंकर तो खुद ही शिव लिंग के आगे ध्यान करते हैं। ऐसी तस्वीरें मौजूद हैं। यहां तक अवतारी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम भी शिव लिंग की आराधना करते हैं। अर्थात जिस परम सत्ता का प्रतीक शिव लिंग है, वह महादेव व राम से भी ऊपर हैं। वे ही सृष्टि की रचना, पालना व विनाश करने के लिए क्रमशरू त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश की रचना करते हैं। अर्थात महेश परमात्मा शिव की रचना हैं तो फिर दोनों एक कैसे हो सकते हैं।  

एक और तर्क में भी दम है। वो ये कि शंकर तो सृष्टि का संहार करते हैं, उसकी रचना व पालन का भार ब्रह्मा व विष्णु पर है, तो फिर ऐसा कैसा हो सकता है कि सृष्टि का संहार करने वाले व त्रिदेव से ऊपर जो परम सत्ता है, वह और शंकर एक ही हों? इसे यूं भी कहा जा सकता है कि जिस पर केवल संहार का दायित्व है, रचना व पालन का अन्य पर तो वे परम सत्ता कैसे हो सकते हैं? 

सवाल ये भी उठता है कि हम जो शिव रात्री मनाते हैं, वह परमात्मा शिव की स्मृति में है या फिर महादेव शंकर की याद में? शिव रात्रि पर शिव लिंग की ही उपासना की जाती है, इससे लगता है कि शिव लिंग परमात्मा शिव का प्रतीक है। यदि भगवान शंकर ही शिव हैं तो उनका अलग प्रतीक बनाने की क्या जरूरत है। शंकर के ही समकक्ष ब्रह्मा व विष्णु के तो प्रतीक चिन्ह नहीं हैं। ऐसे में शंकर को शिव इसलिए नहीं माना जा सकता, क्यों वे तो साकारी देवता हैं, जिनकी लीलाओं का पुराणों व शास्त्रों में वर्णन है।

वेदों में भी यही लिखा है कि शिव निरंकारी है, उनका कोई आकार नहीं है, शिव लिंग तो एक प्रतीक मात्र है। बावजूद इसके यदि शिव व शंकर को एक ही मान लिया गया है तो जरूर कोई कारण होगा या फिर कोई गंभीर त्रुटि हो गई है।

https://youtu.be/s9tw6VECFQo


रविवार, जनवरी 26, 2025

दूल्हा तोरण क्यों मारता है?

लगभग सभी को जानकारी होगी कि दूल्हा जब दुल्हन के घर पर बारात लेकर पहुंचता है तो वह द्वार पर टंगे तोरण को अपनी तलवार को छुआ कर उसे मारने की रस्म अदा करता है। कुछ लोगों को हो सकता है कि इस परंपरा की वजह पता हो, मगर अधिसंख्य इसके रहस्य से अनभिज्ञ ही होंगे। 

इस सिलसिले में दो किंवदंतियां प्रचलित हैं। पहली इस प्रकार है-

बताते हैं कि किसी भी शादी के दौरान जब दूल्हा दुल्हन के द्वार पर पहुंचता था तो वहां तोते के रूप में बैठा तोरण नामक एक राक्षस दूल्हे के शरीर में प्रवेश कर स्वयं शादी कर लेता था। एक बार एक राजकुमार जैसे ही दुल्हन के द्वार पर पहुंचा तो उसने वहां बैठे राक्षस रूपी तोते को मार डाला। कहते हैं कि तोरण मारने की परंपरा तभी से आरंभ हुई। ज्ञातव्य है दुल्हन के द्वार पर लकड़ी के बना तोरण लगाया जाता है, जिसमें तोता बना होता है। वह राक्षस का प्रतीक होता है।

दूसरी किंवदंती के अनुसार एक राजकुमारी जब छोटी थी तो उसकी मां कहा करती थी कि मेरी चिडिय़ा जैसी बिटिया, तुमको बड़ी होने पर किसी दिन कोई चिड़ा आ कर तुझे ले जाएगा। पास ही पेड़ पर बैठा चिड़ा यह सुना करता था। एक दिन यह देख कर वह अचंभित रह गया कि राजकुमारी की शादी होने जा रही है और एक राजकुमार उसके दरवाजे पर खड़ा है। निराश हो कर उसने राजा के सामने फरियाद की। राजा ने रानी से पूछताछ की तो चिड़े की बात सही निकली। इस पर रानी ने कहा कि वह तो यूं ही प्यार में कहा करती थी, इसका अर्थ ये तो नहीं कि सच में किसी चिड़े से शादी करवाएगी। राजा ने जब अपनी बेटी की शादी चिड़े से करवाने से इंकार कर दिया तो वह अपने समुदाय को इकट्टा करके युद्ध पर उतारू हो गया। युद्ध में राजा हार गया। जैसे ही वह राजकुमारी को ले जाने लगा तो देवी-देवताओं में खलबली मच गई। उन्होंने कहा कि राजकुमारी व चिड़े से उत्पन्न संतान कैसी होगी? उन्होंने चिड़े व उसकी सेना को बहुत समझाया। आखिरकार वे मान गए, मगर एक शर्त रख दी। वो यह कि दूल्हे को चिडिय़ा प्रजाति से माफी मांगते हुए उसके नीचे से गुजरना होगा। इसके लिए दुल्हन के द्वार पर तोरण लटकाया जाएगा, जिस पर चिडिय़ाएं बनी होंगी और दूल्हा उनके नीचे से गुजरेगा। बाद में यह परंपरा बन गई। रहा सवाल तलवार टच करने का तो उसका अर्थ ये है कि वह ऐसा करके उनका अभिनंदन कर रहा है।

जिन को इन दोनों किंवदंतियों की जानकारी नहीं है, वे तोरण निर्माता आजकल तोरण पर गणेश जी का चित्र लगा रहे हैं। उनका प्रयोजन विघ्न विनायक को द्वार पर बैठाना है, ताकि शादी निर्विघ्न संपन्न हो जाए। लेकिन जहां तक परंपरा का सवाल है, उसके हिसाब से गणेश जी के चित्र पर तलवार को छुआने को शुभ नहीं माना जा सकता।


https://www.youtube.com/watch?v=7xEtiHsWBrI&t=5s


शनिवार, जनवरी 25, 2025

क्या हिचकी आना किसी के याद करने का संकेत है?

जब भी हमें हिचकी आती है तो हम स्वयं व पास बैठा व्यक्ति यही कहता है कि जरूर कोई याद कर रहा है। दिलचस्प बात ये है कि जब हम विचार करते हैं कि कौन याद कर रहा होगा और उनके नामों का जिक्र करते हैं तो जिसका नाम लेने पर हिचकी बंद होती है तो यही सोचते हैं कि उसी ने याद किया था। इसके वैज्ञानिक व शारीरिक कारण पर भी चर्चा करेंगे, मगर क्या सही है कि यदि कोई हमें शिद्दत से याद करता है तो हिचकी आती है?

मेरा ऐसा ख्याल है कि शारीरिक क्रिया तो अपनी जगह है ही, मगर इससे भी इतर कुछ तो है। मेरा विचार है कि हमारा मस्तिष्क तो सुपर कंप्यूटर है ही, जो कि पूरे शरीर को संचालित करता है, वहीं पर विचार चलते रहते हैं, मगर अमूमन विचार करने की ऊर्जा कंठ पर केन्द्रित रहती है। जरा महसूस करके देखिए। विज्ञान कहता है कि विचार की कोई भाषा नहीं होती। सही भी है। यह एक मौलिक तथ्य है। इसलिए कि जहां विचार हो रहा है, वहां केवल भाषायी वाक्य ही विचरण नहीं करते, ध्वनि, स्वाद, गंध, दृश्य आदि की अनुभूतियां भी मौजूद रहती हैं। हां, भाषायी वाक्य जरूर उस भाषा में होते हैं, जो कि आमतौर पर हम उपयोग में लेते हैं। आपने अनुभव किया होगा कि कई बार कोई बात कहने से पहले मन ही मन जब रिहर्सल होती है तो उसकी हलचल कंठ पर ही होती है। मैने ऐसे उदाहरण भी देखे हैं कि कोई व्यक्ति जो वाक्य बोलता है तो ठीक तुरंत बाद कंठ पर हुई हलचल बुदबुदाने के रूप में सामने आती है। चूंकि शब्दों का संबंध सीधे कंठ से है, इस कारण भाषा विशेष में विचार करते समय कंठ पर ऊर्जा केन्द्रित होती है। जरा गहरे में जा कर देखिए, सोचते समय भले ही वाणी मौन होती है, मगर कंठ व जीभ पर वाक्य हलचल कर रहे होते हैं। इस यूं समझिये। जैसे हम मन ही मन राम नाम का उच्चारण करते हैं तो बाकायदा जीभ पर वैसी ही क्रिया होती रहती है, जैसी राम नाम का उच्चारण करते वक्त होती है। अर्थात विचार करने के दौरान मस्तिष्क तो आवश्यक रूप से काम कर ही रहा होता है, मगर हमारी ऊर्जा, जिसे प्राण भी कह सकते हैं, कंठ पर भी सक्रिय होती है। इस ऊर्जा के कारण मस्तिष्क की तरह कंठ भी ट्रांसमीटर की तरह काम करता है। वह भी बाह्य जगत की तरंगों को ग्रहण करता है। जैसे ही हमें कोई याद करता है तो उसकी तरंगों का हमारे कंठ पर असर पड़ता है, वहां खिंचाव होता है और हिचकी आने लगती है। जैसे ही हम याद करने वाले का नाम लेते हैं तो वर्तुल पूरा हो जाता है और हिचकी आना बंद हो जाती है। ऐसा मेरा नजरिया है। हालांकि मुझे इस बात का अहसास है कि मेरी जो भी अनुभूति है, उसे ठीक से शब्दों में अभिव्यक्त नहीं पाया हूं, मगर मेरी अभिव्यक्ति उसके इर्द-गिर्द जरूर है। 

यह तो हुई एक बात। आपकी जानकारी में ये भी होगा कि जब हिचकी लगातार आती है, रुकती ही नहीं, न किसी का नाम लेने पर और न ही पानी पीने पर, तब उसे अच्छा नहीं माना जाता। इस कारण उसे बंद करने के प्रयास किए जाते हैं। जैसे कागज के लिफाफे में हवा भर कर वापस उसी हवा को अंदर लिया जाता है। कार्बन डाई ऑक्साइड के भीतर बार-बार जाने पर हिचकी बंद हो जाती है। ऐसी भी धारणा है कि लंबे समय हिचकी चलना किसी गंभीर बीमारी के आगमन का संकेत है। मृत्यु के सन्निकट होने पर भी लगातार हिचकी आती है। मृत्यु के समय लंबी हिचकी आती ही है और उसी के साथ प्राण बाहर निकल जाता है।

खैर, अब आते हैं वैज्ञानिक तथ्य पर। विज्ञान के अनुसार हिचकी हमारे के डायफ्राम सिकुडऩे से आती है। डायफ्राम एक मांसपेशी होती है, जो छाती के खोखल को हमारे पेट के खोखल से अलग करती है। ये सांस लेने की प्रक्रिया में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। फेफड़ों में हवा भरने के लिए डायफ्राम का सिकुडऩा जरूरी होता है। जब हिचकी आती है, तब डायफ्राम को नियंत्रित करने वाली नाडिय़ों में कुछ उत्तेजना होती है, जिसकी वजह से डायफ्राम बार-बार सिकुड़ता है और हमारे फेफड़े तेजी से हवा अंदर खींचते हैं। ऐसा जोर से हंसने, तेज मिर्च वाला खाना खाने, जल्दी-जल्दी खाने या फिर पेट फूलने से हो सकता है। अर्थात उत्तेजना का कारण होती है वायु। अमूमन वायु डकार से बाहर आ जाती है, लेकिन कभी-कभी ये खाने के बीच फंस जाती है। उसे निकालने की शारीरिक क्रिया ही हिचकी है।

जानकार लोग हिचकी बंद करने के उपाय भी बताते हैं, उनमें कुछ इस प्रकार हैं- ठंडा पानी पीएं या आइस क्यूब्स मुंह में रख कर धीरे-धीरे चूसें। दालचीनी का टुकड़ा मुंह में डाल कर चूसें। गहरी सांस लें, जितनी देर हो सके सांस रोकें। लहसुन, प्याज या गाजर का रस सूंघें। पिसी हुई काली मिर्च शहद के साथ चाटें। शक्कर या चॉकलेट चूसें। नीबू के रस में शहद और थोड़ा-सा काला नमक मिला कर चाटें।

https://youtu.be/xAA5JusDyqo

 

शुक्रवार, जनवरी 24, 2025

पूजा की घंटी के शीर्ष पर गरुड़ आकृति क्यों?

आपने देखा होगा कि पूजा के दौरान हम जिस घंटी को बजाते हैं, उसके षीर्श पर गरुड़ की आकृति होती है। जरूर इसका कोई अर्थ या प्रयोजन होगा। वस्तुतः इसके पीछे गहरी धार्मिक मान्यता और प्रतीकात्मकता निहित है। ज्ञातव्य है कि गरुड़ को भगवान विष्णु का सबसे बड़ा भक्त माना जाता है। पुराणों में गरुड़ और भगवान विष्णु के बीच के अटूट बंधन का वर्णन मिलता है। गरुड़ को अमरत्व का वरदान प्राप्त था और वे भगवान विष्णु के सबसे करीबी थे। मान्यता है कि गरुड़ भक्तों की प्रार्थनाओं को सीधे भगवान विष्णु तक पहुंचाते हैं। घंटी की ध्वनि के साथ गरुड़ की आकृति भक्तों की आस्था को और मजबूत करती है। शास्त्रीय उल्लेख है कि गरुड़ को नागों का शत्रु भी माना जाता है। नागों को अक्सर अशुभ शक्तियों से जोड़ा जाता है। इसलिए गरुड़ की उपस्थिति से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है। इसके अतिरिक्त कुछ लोग मानते हैं कि गरुड़ घंटी बजाने से वास्तु दोष दूर होते हैं और घर में सुख-शांति का वातावरण बनता है। घंटी की ध्वनि ध्यान केंद्रित करने और मन को शांत करने में भी मदद करती है। गरुड़ की उपस्थिति इस प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बनाती है। इसलिए गरुड़ की उपस्थिति भगवान विष्णु के आशीर्वाद और संरक्षण का प्रतीक है।


बुधवार, जनवरी 22, 2025

प्रसाद चढ़ाते समय पर्दा क्यों किया जाता है?

आप जानते ही हैं कि जब भी भगवान की मूर्ति को प्रसाद चढ़ाया जाता है तो प्रसाद चढ़ाने के बाद पर्दा किया जाता है, ताकि वे प्रसाद ग्रहण कर लें। यदि मंदिर में पर्दे की व्यवस्था नहीं है तो प्रसाद की थाली पर ही कपड़ा ढ़क दिया जाता है। बिना पर्दे के भी तो प्रसाद चढ़ाया जा सकता है, उसमें दिक्कत क्या है? मगर नहीं, पर्दा करते ही हैं। आखिर वजह क्या है?

कल्पना कीजिए कि आपने बिना पर्दे के प्रसाद चढ़ाया और मूर्ति से एक हाथ निकल कर प्रसाद उठाए तो आप पर क्या बीतेगी? या आपकी आंखों के सामने ही प्रसाद कम होता जाए, तो क्या आप उस दृश्य को देख पाएंगे? हम जानते हैं कि भगवान की मूर्ति से हाथ निकल कर प्रसाद ग्रहण करने आने वाला नहीं है। आ सकता होगा तो भी नहीं आएगा, क्योंकि भगवान रहस्य में ही रहना चाहता है। हालांकि पर्दा करने के बाद भी भगवान के प्रसाद ग्रहण करने के बाद प्रसाद का तौल वही रहता है। अर्थात वे सूक्ष्म रूप से प्रसाद ग्रहण करते हैं। उससे भी बड़ा सच ये है कि वे प्रसाद नहीं, बल्कि हमारे भाव ग्रहण करते हैं। फिर भी प्रसाद चढ़ाने के दौरान पर्दा करने की परंपरा है।

आप देखिए कि नागौर जिले बवाल माता मंदिर में देवी मां की प्रतिमा ढ़ाई प्याला शराब पीती है। यह रहस्यपूर्ण और चमत्कार है। मंदिर से श्रद्धालु को इतना दूर रख जाता है कि उसे यह तो पता लगे कि प्याला खत्म हो गया है, मगर खत्म होता दिखाई देता नहीं है। जब पुजारी मूर्ति के होंठों पर प्याला रखता है तो वह उसे देखता नहीं है, बल्कि अपना चेहरा विपरीत दिशा में कर देता है। क्यों? एक तो वह मर्यादा का पालन कर रहा होता है, दूसरा उसमें भी सामर्थ्य नहीं कि वह प्याले को खत्म होता देख सके। आपने लोक देवताओं के परचों की चर्चा भी सुनी होगी। वे चमत्कार करते हैं, मगर प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप में। 

एक बात और। जब भी किसी की मृत्यु होती है तो उसका सजीव शरीर निर्जीव हो जाता है। हलचल खत्म हो जाती है। मान्यता है कि उसमें से आत्मा निकल गई है। कल्पना कीजिए कि आत्मा निकलते वक्त दिखाई दे जाए तो हमारा क्या हाल होगा? इसीलिए प्रकृति ने ऐसी व्यवस्था की है। अपने उस रहस्य को छिपा लिया है। ऐसे ही मृत्यु के साथ ही जीवन भर की स्मृति पर ताला जड़ देती है। अगले जन्म में उसे कुछ भी याद नहीं रहता। कल्पना कीजिए कि हर किसी को पिछले जन्म की याद रह जाए तो पूरे संसार में आपाधापी मच जाएगी। इसीलिए प्रकृति ने रहस्य को ओढ़ दिया है।

असल में प्रकृति बहुत रहस्यपूर्ण है। वह रहस्यपूर्ण ही रहेगी। प्रकृति न तो रहस्य को उघाड़ती है और न ही उसने इमें इतनी शक्ति दी है कि हम पूरी तरह से उघाड़ सकें। इस तथ्य को हमने भी उसे स्वीकार कर लिया है। बेशक इंसान ने इसके राज के बहुत पर्दे उठाए हैं, मगर आज भी उसके अधिकतर रहस्य बापर्दा हैं। उन्हें उठाया नहीं जा सकेगा। अलबत्ता संकेत जरूर हासिल किए जा पाए हैं, आगे भी किए जा सकते हैं, मगर प्रकृत्ति को कभी भी नग्न नहीं किया जा सकेगा। अर्थात कोरा सच कभी नहीं देखा जा सकेगा। यदि किसी विरले को दिखाई भी दे जाता है तो उसकी जुबान पर ताला पड़ जाता है। वह जरूरी भी है।

असल में प्रकृति इसलिए रहस्यपूर्ण है, क्योंकि यह हमारी समझ की सीमा से परे है। प्रकृति में इतना कुछ है कि हमारी इंद्रियों की क्षमता उन तक नहीं पहुंच पाती। जैसे ब्रह्मांड में अनेक ध्वनियां विचरण कर रही हैं, मगर हमारे कान उन सब को सुनने की क्षमता नहीं रखते। हमें सीमित फ्रिक्वेंसी की आवाजें ही सुनाई देती है। हां, हमने ऐसे ट्रांसमीटर जरूर बना लिए हैं, जो उन ध्वनियों को पकड़ लेते हैं, मगर हमारे कान सीधे उनको नहीं पकड़ सकते। प्रकृति में और भी अनेक चीजें ऐसी हैं, जो हमारी बुद्धि से परे हैं। इसीलिए वे हमारे लिए रहस्यपूर्ण ही रहेंगी। सच बात तो यह है कि प्रकृति में चारों ओर चमत्कार बिखरे पड़े हैं। कई चमत्कारों की जड़ तक हम पहुंचे भी हैं। जैसे गुरुत्वाकर्षण की शक्ति। जब तक न्यूटन ने इस शक्ति का पता नहीं लगाया, तब तक कोई वस्तु ऊपर फैंकने पर वापस नीचे आ जाना हमारे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। इसी प्रकार जब तक विज्ञान को यह पता नहीं था कि बारिश होती कैसे है, तब तक वह चमत्कार ही था कि आसमान से पानी कैसे बरस रहा है? विज्ञान बहुत अंदर तक गया है, लेकिन आज भी बहुत कुछ अछूता है। चिकित्सा विज्ञान ने शरीर को बहुत गहरे में जाना है, बीमारियों के इलाज तलाशे हैं, अंग प्रत्यारोपण तक करने में कामयाब हो गया है, मगर आज तक आत्मा नामक तत्व का पता नहीं लगाया जा सका है। शरीर मृत हो पर ऐसी कौन सी चीज है, जो निकल जाती है और कहां चली जाती है, इसका पता विज्ञान नहीं लगा पा रहा है। अलबत्ता, अध्यात्म ने इस पर काम किया है, लेकिन वह भी उसे तर्कपूर्ण तरीके से सिद्ध नहीं कर पाया है। आत्मा भ्रूण मे कब प्रवेश करती है, शरीर को छोडऩे पर उसकी आगे की यात्रा क्या होती है, उसे कर्म के अनुसार कैसे और कहां दंड दिया जाता है, वह सब कुछ शास्त्र बताता है, मगर वह विज्ञान की तरह उसे दो और दो चार की तरह साबित नहीं कर सकता। क्योंकि वह अनुभूति की वस्तु है और सारी अनुभूतियां अभिव्यक्त नहीं की जा सकतीं, क्योंकि प्रकृति की व्यवस्था रहस्यपूर्ण है।

यूं ते सारी प्राकृतिक शक्तियां अपने आप में चमत्कार ही हैं। क्या सूर्य का रोज उगना और अस्त होना चमत्कार नहीं है? वो तो हम आदी हो गए हैं, इस कारण हमें उसमें कुछ अनोखा नहीं दिखाई देता। क्या हमारा शरीर किसी चमत्कार से कम है? चमड़ी के एक हिस्से को दिखाई देता है, एक को सुनाई देता है, एक स्वाद का पता लगाता है तो एक गंध को महसूस करता है? मगर हमें सब कुछ सामान्य सा लगता है। वजह सिर्फ इतनी है कि कि हम अब उसके अभ्यस्त हो चुके हैं।

लब्बोलुआब, प्रकृति बहुत रहस्यपूर्ण है। कभी पूरी तरह से अनावृत्त नहीं की जा सकेगी। कम से कम सार्वजनिक रूप से तो नहीं। इसीलिए कई सुधि जन कहते हैं कि इसमें मत उलझो की प्रकृति कर रहस्य क्या है, बल्कि प्रकृति को केवल जीयो। उसका आनंद लो।

https://www.youtube.com/watch?v=TZkvDX589N8&t=18s


परिजन के बाहर जाते ही दरवाजा बंद न कीजिए

आज एक ऐसी दिलचस्प परंपरा आपसे साझा कर रहा हूं, जिसका पालन अनेक लोग किया करते हैं। परंपरा यह है कि जब भी परिवार का कोई सदस्य घर से बाहर जाता है, तो उसके जाने के तुरंत बाद दरवाजा बंद नहीं किया जाता। कुछ देर तक खुला ही रखा जाता है।  यहां तक कि जब तक वह गली के मोड पर वह ओझल न हो जाए, तब तक उसे देखते रहते हैं। यदि तुरंत बंद किया जाएगा तो उससे यह भाव आता है, यह आभास जागता है कि हमने उसके बाहर जाते ही उससे तुरंत संबंध विच्छेद कर लिया है। कहीं यह वास्तव में घटित न हो जाए। यह बहुत भयावह है। कुछ समय दरवाजा खुला रखने के ये मायने हैं कि बाहर गया सदस्य मकान व परिवारजन से कनैक्टेड है। वह अपना काम पूरा करके लौटेगा। यह उम्मीद संबंधों को प्रगाढ करती है। हो सकता है कि दरवाजा तुरंत बंद करना या न करना केवल सोच ही हो, इसका धरातल पर कोई असर नहीं पडता हो, मगर कुछ ऐसे लोग भी हो सकते हैं, जो इसे बहुत अधिक महत्व देते हों, और दरवाजा तुरंत बंद करने पर परिजन को खो देने की आषंका रखते हों।

https://www.youtube.com/watch?v=ISS2EbDoi_M