तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

शुक्रवार, जनवरी 10, 2025

पत्नी को पति का नाम लेने से क्यों रोका गया?

हम देखते हैं कि आजकल नव दंपत्ति बेहिचक एक-दूसरे को उनके नाम से पुकारते हैं। न तो इसमें उन्हें तनिक शर्म महसूस होती है और न ही ऐसा करने में उनको कुछ आपत्तिजनक लगता है। यहां तक कि अब तो प्यार से रखे गए शार्ट नेम का भी उपयोग करने लगे हैं। इसे एक दूसरे के प्रति प्रेम का द्योतक माना जाने लगा है। इसके विपरीत परंपरा ये रही है कि पत्नी पति को न तो नाम से बुलाती है और न ही किसी के सामने पति का जिक्र उसका नाम ले कर करती है। पति ही नहीं, पति के बड़े भाई अर्थात जेठ का नाम लेने से भी परहेज करती हैं। आज भी ऐसी पीढ़ी मौजूद है, जिसमें इस परंपरा का निर्वाह किया जा रहा है। वैसे, कई ऐसे पुरुष भी हैं जो पत्नी को नाम से नहीं पुकारते। वे सुनती हो, ऐसा कह कर बुलाते हैं। इसी प्रकार पत्नी नाम से पुकारने की बजाय अजी सुनते हो, कह कर संबोधित करती हैं।

मैंने ऐसे अनेक प्रसंग देखे हैं, जिनमें किसी सरकारी काम के दौरान महिला से पति का नाम पूछा गया तो उसे नाम लेने में बहुत हिचक हुई और साथ में खड़े अन्य व्यक्ति से कहा कि आप मेरे पति का नाम बता दीजिए। अनपढ़ या कम पढ़ी लिखी महिला की छोडिय़े, पढ़ी लिखी महिलाएं भी कभी अपने पति का जिक्र करती हैं तो मेरे पति या उसके नाम का संबोधन करने से बचती हैं और हमारे ये या हमारे साहब कह कर इंगित करती हैं। 

सवाल ये उठता है कि आखिर किस वजह से पत्नी को पति का नाम न लेने की सीख दी गई। इस बारे में बहुत खोज करने पर यह जानकारी हासिल हुई कि स्कंध पुराण में कहा गया है कि पति का नाम लेने से उनकी उम्र कम होने लगती है। ऐसा करने पर उम्र कम क्यों होती है, इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिली। भला नाम लेने या न लेने का उम्र से क्या ताल्लुक? ज्ञातव्य है कि शास्त्रज्ञों के अनुसार श्रीगणेश ने भगवान वेद व्यास के मुख निकली वाणी को स्कंध पुराण में लिखा है। उसी में पतिव्रता स्त्रियों की मर्यादाओं का भी उल्लेख है। इन मर्यादाओं में पति के सोने के बाद सोना, सुबह पति से पहले उठना, पति के भोजन करने के बाद भोजन करना शामिल है। यहां तक कि पति के परदेश जाने पर शृंगार न करने तक की हिदायत दी गई है। जिन भी ऋषि-मुनियों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया, उसके पीछे उनका क्या प्रयोजन था, ये तो पता नहीं, मगर ऐसा प्रतीत होता है कि यह सब पुरुष प्रधान समाज की देन है। उसी पुरुष प्रधान व्यवस्था ने पति को परमेश्वर की संज्ञा दी है। एक तरफ यह कह कर महिला को महत्ता दी गई कि यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, तत्र रंमते देवता, वहीं दूसरी ओर मर्यादा के नाम पर महिलाओं पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगाए गए। सर्वविदित है कि महिलाएं पति की उम्र लंबी होने की कामना के साथ करवा चौथ का व्रत रखती हैं। मैंने कई प्रगतिशील महिलाओं तक को करवा चौथ का व्रत करते देखा है। कैसी अजीब बात है कि पत्नी की उम्र बढ़ाने के उद्देश्य से पति के लिए किसी व्रत अथवा आयोजन का प्रावधान नहीं किया गया।

धरातल की सच्चाई है कि आज भी वह पीढ़ी मौजूद है, जो पतिव्रता स्त्रियों के लिए बनाई गई मर्यादाओं का पूरी श्रद्धा से पालन करती है। कई महिलाएं पति के भोजन करने के बाद उसकी जूठी थाली में ही भोजन करती हैं। आज भी कई ऐसे परिवार हैं, जिनमें पहले पुरुषों को भोजन करवाने की व्यवस्था है, महिलाएं बाद में भोजन करती हैं। नॉन वेज खाने वाले परिवारों में पुरुषों को अच्छी बोटियां परोसी जाती है और महिलाएं जो कुछ बच जाता है, उसी को खा कर संतुष्ट रहती हैं।

हालांकि समय के साथ मर्यादाएं क्षीण हो रही हैं। महिलाएं पुरुषों के बराबर में आ कर खड़ी होने लगी हैं। विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं ने पुरुषों से बेहतर परिणाम दिए हैं। महिलाओं के कामकाजी होने के कारण परिवारों में उनकी अहमियत बढ़ रही हैं। लेकिन साथ उसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं। इस बारे में किसी लेखक ने कहा है कि दुनिया में भी भले ही लोकतंत्र की बड़ी महत्ता हो, मगर परिवार में राजशाही ही पनपती है। अगर घर की बहू को भी समान अधिकार दे दिए जाते हैं तो वह पति व ससुर की बराबरी करने लगेगी, नतीजतन टकराव होगा और सामान्य शिष्टाचार शिथिल हो जाएगा। उनकी बात में दम है। किसी भी इकाई, परिवार हो या दफ्तर, उसमें किसी एक का प्रधान होना जरूरी है, अन्यथा अराजकता फैल जाएगी। 

https://www.youtube.com/watch?v=iD4Zl9l0Y2k


गुरुवार, जनवरी 09, 2025

क्यों जरूरी है इष्ट देवता?

यह सर्वविदित है कि इस्लाम एकेश्वरवाद के तहत केवल खुदा में ही यकीन रखता है। हिंदू दर्शन में भी एके साधे, सब सधे की मान्यता है, मगर बहुदेववाद चलन में है। हिंदू मान्यता के अनुसार देवी-देवता तैंतीस करोड़ हैं। कुछ मानते हैं कि देवी-देवता तैंतीस करोड नहीं बल्कि तैंतीस कोटि अर्थात प्रकार के हैं। उनमें वे प्रचलित देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना किया करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण, भगवान राम, विष्णु, ब्रह्मा, महेश के अतिरिक्त दुर्गा, सरस्वती, हनुमान, गणेश सहित अनेक देवी-देवताओं के साथ लोक देवता यथा बाबा रामदेव, तेजाजी महाराज, भैरों जी महाराज आदि की आराधना की जाती है। इसी प्रकार ग्राम देवता, कुल देवता भी होते हैं। जिस देवी-देवता के प्रति निजी आस्था होती है, उसे इष्ट देवता कहते हैं।

इष्ट देवता क्या है, हमारा इष्ट देवता कौन होना चाहिए, इस विषय पर चर्चा से पहले एक प्रचलित कहानी की बात करते हैं। कहते हैं कि एक बार एक नाव में एक हिंदू व एक मुसलमान सवार थे। अचानक तूफान आया। दोनों अपने-अपने भगवान को याद करने लगे। मुसलमान ने केवल खुदा को ही याद किया, तो वह बच गया। हिंदू ने कभी हनुमान जी को याद किया तो कभी दुर्गा मां को पुकारा, कभी गणेश जी का स्मरण किया तो कभी श्रीकृष्ण को और वह डूब गया। यह कहानी मूलतः हिंदू धर्म पर नहीं, बल्कि बहुदेववाद पर तंज कसती है। कहानी का प्रयोजन ये है कि सफलता के लिए एकनिष्ट होना चाहिए। एकनिष्ट होने से एकाग्रता बढ़ती है, जबकि भिन्न देवी-देवताओं को एक साथ इष्टदेव मान लेने से एकाग्रता भंग होती है। भले ही कोई देवी या देवता सर्वशक्तिमान भगवान या ईश्वर नहीं हैं, मगर वे भगवान की ही शक्ति से संचालित हैं। देवता भिन्न-भिन्न हैं और उनकी प्रकृति भी अलग-अलग है, मगर उनमें मौजूद शक्ति एक ही है। जैसे दीपक, मोमबत्ती, चूल्हा, यज्ञ आदि में स्थित अग्रि एक ही है। भिन्न-भिन्न देवी-देवता की आराधना का अलग-अलग फल है, मगर मनुष्य को इष्ट देव का सर्व प्रथम व सर्वाधिक ध्यान करना चाहिए। जब भी विपत्ति आए तो केवल इष्ट देव का ही ध्यान करना चाहिए। जैसे कहते हैं न कि जीवन में गुरु होना जरूरी है, वैसे ही इष्ट भी उतना ही जरूरी है।

वस्तुतः हर इंसान किसी एक देवी या देवता की ओर सबसे ज्यादा आकर्षित होता है और वही देवी या देवता उसका इष्ट देव होता है। कुछ लोग इष्ट देव या देवी का निर्धारण कुंडली में अंकित जन्म नक्षत्र के आधार पर करते हैं, जबकि कुछ की मान्यता ये है कि इष्ट देव का संबंध ग्रह-नक्षत्रों से नहीं होता। वे मानते हैं कि इष्ट देव पिछले जन्मों के संस्कारों से तय होता है। वस्तुत जो देव स्वतः पसंद हो, वही इष्ट देव होता है। इस बारे में ज्योतिष कहता है कि आपका जन्म जिस नक्षत्र में होता है, उसी के देवता आपको आकर्षित करते हैं।

जो लोग मानते हैं कि ज्योतिष हमारे इष्ट देव का निर्धारण करता है, उनके अनुसार आप अपनी जन्म तारीख, जन्म दिन, बोलते नाम की राशि या अपनी जन्म कुंडली की लग्न राशि के अनुसार जान सकते हैं। जिनका जन्म जनवरी या नवंबर माह में हुआ हो वे शिव या गणेश की पूजा करें। फरवरी में जन्मे शिव की उपासना करें। मार्च व दिसंबर में जन्मे व्यक्ति विष्णु की साधना करें। अप्रेल, सितंबर, अक्टूबर में जन्मे व्यक्ति गणेशजी की पूजा करें। मई व जून माह में जन्मे व्यक्ति मां भगवती की पूजा करें। जुलाई माह में जन्मे व्यक्ति विष्णु व गणेश का घ्यान करें।

जिनको वार का पता हो, परंतु समय का पता न हो, तो वार के अनुसार इष्ट देव इस प्रकार होंगे- रविवार- विष्णु, सोमवार- शिवजी, मंगलवार- हनुमान जी, बुधवार- गणेश जी, गुरुवार- शिव जी, शुक्रवार- देवी, शनिवार- भैरव जी।

जिनको जन्म समय ज्ञात हो, उनके लिए जन्म कुंडली के पंचम स्थान से पूर्व जन्म के संचित कर्म, ज्ञान, बुद्धि, शिक्षा, धर्म व इष्ट का बोध होता है। अरुण संहिता के अनुसार व्यक्ति के पूर्व जन्म में किए गए कर्म के आधार पर ग्रह या देवता भाव विशेष में स्थित होकर अपना शुभाशुभ फल देते हैं। पंचम स्थान में स्थित ग्रहों या ग्रह की दृष्टि के आधार पर आपके इष्ट देव तय होते हैं। सूर्य- विष्णु, चंद्रमा- राधा, पार्वती, शिव, दुर्गा, मंगल- हनुमानजी, कार्तिकेय, बुध- गणेश, विष्णु, गुरू- शिव, शुक्र- लक्ष्मी, तारा, सरस्वती। शनि- भैरव, काली।

जन्मकुंडली के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के इष्ट देवी या देवता निश्चित होते हैं। यदि उन्हें जान लिया जाए तो कितने भी प्रतिकूल ग्रह हो, आसानी से उनके दुष्प्रभावों से रक्षा की जा सकती है। 

लग्न के अतिरिक्त पंचम व नवम भाव के स्वामी ग्रहों के अनुसार देवी-देवताओं का ध्यान पूजन भी सुख-सौहार्द्र बढ़ाने वाला होता है। इष्ट देव की पूजा करने के साथ रोज एक या दो माला मंत्र जाप करना चमत्कारिक फल दे सकता है और आपकी संकटों से रक्षा कर सकता है।

https://www.youtube.com/watch?v=giIW26A2cA4&t=29s 

बुधवार, जनवरी 08, 2025

एक ही बार राम का नाम लिया और मर गया

एकाग्रता का बड़ा महत्व है। चाहे ध्यान या समाधि में, चाहे संसार के दैनंदिन कार्यों में। जो भी काम हम एकाग्रता से करते हैं, उसके पूरे होने की संभावना बढ़ जाती है। एकाग्रता के अनेक उदाहरण भी हमारी जानकारी में हैं। सर्वाधिक चर्चित है अर्जुन और चिडिय़ा की आंख वाला प्रसंग। अर्जुन जब चिडिय़ा की आंख को भेदने की कोशिश करते हैं तो उन्हें सिर्फ आंख ही दिखाई देती है, आसपास का कुछ भी नजर नहीं आता, तभी तीर सीधा आंख के बीचोंबीच जा कर लगता है।

एकाग्रता के मायने भी हम जानते हैं। मन की सारी शक्ति लगाते हुए विचारों को एक ही जगह केन्द्रित करने को हम एकाग्रता कहते हैं। एकाग्रता से हमारी बिखरी हुई सारी शक्ति संगठित हो जाती है। जैसे एक उत्तल लैंस को सूर्य के सामने रखते हैं तो दूसरी ओर सूर्य की सारी किरणें एक ही दिशा में बढ़ते हुए एक बिंदू पर आ कर फोकस हो जाती है, और वहां रखा कागज या कपास जलने लगता है। वस्तुतर: सूर्य की हर किरण में तपिश होती है और जैसे ही बहुत सारी किरणें आगे बढ़ते हुए एक जगह केन्द्रित होती है तो तापमान इतना बढ़ जाता है कि वस्तु जलने लगती है।  

विद्यार्थियों को एकाग्रचित्त हो कर पढ़ाई करने को इसलिए कहा जाता है, ताकि वे जो कुछ पढ़ रहे हैं, वह स्मृति में ठीक से संग्रहित हो जाए। यदि नजरें तो किताब में लिखी पंक्तियों पर है, मगर चित्त इधर-उधर भटक रहा है तो वह सारा पढ़ा हुआ बेकार चला जाता है, अर्थात स्मृति पटल पर अंकित होने से रह जाता है।

इसी प्रकार जब हम किसी मंदिर में मूर्ति के सामने खड़े हो कुछ अरदास कर रहे होते हैं और हमारा ध्यान बाहर रखी चप्पल पर रहता है कि कोई उठा कर न ले जाए तो अरदास फलित नहीं हो पाती। अर्थात चित्त एकाग्र नहीं है। आंखें मूर्ति को देख रही है, जुबान से अरदास के शब्द भी निकल रहे हैं और मन कहीं और है, दुकान पर है, दफ्तर पर है, घर पर है, तो अरदास ईष्ट तक नहीं पहुंचती।

एकाग्रता का एक सटीक उदाहरण मैंने ओशो के प्रवचन में सुना। उसे एकाग्रता की पराकाष्ठा कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। हालांकि वह हूबहू तो याद नहीं, मगर उसका सार ठीक से ख्याल में है। आप भी जानिये। एक थे भट्टोजी दीक्षित। उम्र तकरीबन 85 साल। घोर धार्मिक। प्रतिदिन सुबह-शाम मंदिर जाते। घंटा बजाते, दीया जलाते, आराधना करते, दिनभर माला फेरते। हर वक्त राम का नाम ही बुदबुदाते। उनका एक पुत्र था। उम्र तकरीबन 60 साल। घोर नास्तिक। ईश्वर में कोई आस्था नहीं। न कभी मंदिर जाता, न ही राम का नाम लेता। बाप ताजिंदगी बेटे को समझाते-समझाते थक गया कि कि बेटा मंदिर जाया कर, राम का नाम लिया कर, मगर बेटा इस कान से सुनता, दूसरे कान से निकाल देता। बाप रोजाना टोकता, मगर बेटे के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। एक दिन बाप ने बहुत जोर देकर कहा, बेटा अब तो तू भी बूढ़ा होने को है। पूरी जिंदगी यूं ही गुजार दी। कभी तो राम का नाम ले। बेटा बाप की नसीहत सुनते-सुनते तंग आ गया था। उसने कहा, ठीक है आज मंदिर जाता हूं, राम का नाम लूंगा, मगर आप बैठे मेरे लौटने की प्रतिक्षा मत करना। बाप समझा नहीं। उसने सोचा, चलो बेटा आज तैयार तो हुआ। खैर, बेटा मंदिर गया। घंटा बजाया। मूर्ति के सामने खड़ा हुआ। उसने राम का नाम लिया। एक ही बार। पूरे मन से, पूरी बुद्धि से, पूरी शिद्दत से, रोयें-रोयें से, अपनी समग्र ताकत से, राम का नाम लिया एक बार और प्राण त्याग दिए। 

यह प्रसंग कितना सही है, मुझे नहीं पता, मगर एकाग्रता का इससे सटीक वाकया मैने नहीं सुना। देखिए, बाप ने पूरी जिंदगी राम का नाम लेने में गुजार दी, मगर ऊपरी मन से, औपचारिकता से। चले तो बहुत, मगर पहुंचे कहीं नहीं। दूसरी ओर बेटे ने एक ही बार राम का नाम लिया, मगर मन की समग्र शक्ति से। और वह राम को उपलब्ध हो गया।

https://www.youtube.com/watch?v=MPqJU7OH-zw

मंगलवार, जनवरी 07, 2025

उपांशु जप बहुत प्रभावकारी है

शास्त्रों में जप तीन प्रकार का माना गया है-मानस, उपांशु और वाचिक। वाचिक सरल, उपांशु कुछ कठिन और मानस कड़ी साधना के बाद संभव हो पाता है। मन ही मन मंत्र का अर्थ मनन करके उसे धीरे-धीरे इस प्रकार उच्चारण करना कि जिह्वा और ओंठ में गति न ही, मानस जप कहलाता है। जिह्वा और ओठ को हिला कर मंत्रों के अर्थ का विचार करते हुए इस प्रकार उच्चारण करना कि कुछ न सुनाई पड़े, उपांशु जप कहलाता है। विद्वान उपांशु व मानस जप के मध्य जिह्वा जप नाम का एक चौथा जप भी मानते हैं। यूं तो जिह्वा जप भी उपांशु के ही अंतर्गत है, अंतर केवल इतना ही है कि जिह्वा जप में जिह्वा हिलती है, पर ओठ में गति नहीं होती और न उच्चारण ही सुनाई पड़ता है। वर्णों का स्पष्ट उच्चारण करना वाचिक जप कहलाता है। कहा जाता है कि वाचिक जप से दस गुना फल उपांशु में, शत गुना फल जिह्वा जप में और सहस्त्र गुना फल मानस जप में होता है। 

मनु महाराज कहते हैं कि उपांशु जप से मन मूर्छित होने लगता है। एकाग्रता आरंभ होती है। वृत्तियां अंतर्मुखी होने लगती हैं। इसके द्वारा साधक स्थूल से सूक्ष्म में प्रवेश करता है। वाणी के सहज गुण प्रकट होते हैं। मंत्र का प्रत्येक उच्चारण मस्तक पर कुछ असर करता सा मालूम होता है।

उपांशु जप के बारे में मेरा जो अनुभव है, वह मुझे एक आलेख में झलकता है। उसमें लिखा था कि जब भी हमें हिचकी आती है तो हम स्वयं व पास बैठा व्यक्ति यही कहता है कि जरूर कोई याद कर रहा है। दिलचस्प बात ये है कि जब हम विचार करते हैं कि कौन याद कर रहा होगा और उनके नामों का जिक्र करते हैं तो जिसका नाम लेने पर हिचकी बंद होती है तो यही सोचते हैं कि उसी ने याद किया था। सवाल ये है कि यदि कोई हमें शिद्दत से याद करता है तो हिचकी आती है? मेरा ऐसा ख्याल है कि शारीरिक क्रिया तो अपनी जगह है ही, मगर इससे भी इतर कुछ तो है। मेरा विचार है कि हमारा मस्तिष्क तो सुपर कंप्यूटर है ही, जो कि पूरे शरीर को संचालित करता है, वहीं पर विचार चलते रहते हैं, मगर अमूमन विचार करने की ऊर्जा कंठ पर केन्द्रित रहती है। जरा महसूस करके देखिए। विज्ञान कहता है कि विचार की कोई भाषा नहीं होती। सही भी है। यह एक मौलिक तथ्य है। इसलिए कि जहां विचार हो रहा है, वहां केवल भाषायी वाक्य ही विचरण नहीं करते, ध्वनि, स्वाद, गंध, दृश्य आदि की अनुभूतियां भी मौजूद रहती हैं। हां, भाषायी वाक्य जरूर उस भाषा में होते हैं, जो कि आमतौर पर हम उपयोग में लेते हैं। आपने अनुभव किया होगा कि कई बार कोई बात कहने से पहले मन ही मन जब रिहर्सल होती है तो उसकी हलचल कंठ पर ही होती है। मैने ऐसे उदाहरण भी देखे हैं कि कोई व्यक्ति जो वाक्य बोलता है तो ठीक तुरंत बाद कंठ पर हुई हलचल बुदबुदाने के रूप में सामने आती है। चूंकि शब्दों का संबंध सीधे कंठ से है, इस कारण भाषा विशेष में विचार करते समय कंठ पर ऊर्जा केन्द्रित होती है। जरा गहरे में जा कर देखिए, सोचते समय भले ही वाणी मौन होती है, मगर कंठ व जीभ पर वाक्य हलचल कर रहे होते हैं। इस यूं समझिये। जैसे हम मन ही मन राम नाम का उच्चारण करते हैं तो बाकायदा जीभ पर वैसी ही क्रिया होती रहती है, जैसी राम नाम का उच्चारण करते वक्त होती है। अर्थात विचार करने के दौरान मस्तिष्क तो आवश्यक रूप से काम कर ही रहा होता है, मगर हमारी ऊर्जा, जिसे प्राण भी कह सकते हैं, कंठ पर भी सक्रिय होती है। इस ऊर्जा के कारण मस्तिष्क की तरह कंठ भी ट्रांसमीटर की तरह काम करता है। वह भी बाह्य जगत की तरंगों को ग्रहण करता है। संप्रेषण भी कर सकता है। जैसे ही हमें कोई याद करता है तो उसकी तरंगों का हमारे कंठ पर असर पड़ता है, वहां खिंचाव होता है और हिचकी आने लगती है। जैसे ही हम याद करने वाले का नाम लेते हैं तो वर्तुल पूरा हो जाता है और हिचकी आना बंद हो जाती है। ऐसा मेरा नजरिया है। हालांकि मुझे इस बात का अहसास है कि मेरी जो भी अनुभूति है, उसे ठीक से शब्दों में अभिव्यक्त नहीं पाया हूं, मगर मेरी अभिव्यक्ति उसके इर्द-गिर्द जरूर है।

उपांशु जप भी मूलतः कंठ पर स्थित होता है। चूंकि कंठ ऊर्जा का केन्द्र है, इस कारण इस जप के परिणाम बड़े प्रभावकारी होते हैं। मैने स्वयं उसका अनुभव किया है। वह परिणाम मूलक भी होता है। जिस भी देवी-देवता अथवा इष्ट देवता के नाम पर यह किया जाता है, वहां से प्रतिक्रिया के रूप में ऊर्जा का संचार हमारी ओर होता है। आप भी इसका अनुभव कर सकते हैं।

https://www.youtube.com/watch?v=T67EHkbgimA&t=22s

सोमवार, जनवरी 06, 2025

क्या भगवान प्रसाद ग्रहण करते हैं?

स्थूल व तार्किक बुद्धि का एक सवाल है कि हम भगवान की मूर्ति के आगे जो प्रसाद चढ़ाते हैं, क्या वह उसे ग्रहण करती है? अगर ग्रहण करती है तो वह कम क्यों नहीं होता? अगर मूर्ति प्रसाद का अंश मात्र भी ग्रहण नहीं करती तो फिर प्रसाद चढ़ाने का प्रयोजन क्या है? सवाल वाजिब है।

इसी से जुड़ा सवाल है कि जब सब कुछ भगवान का ही दिया हुआ है तो वही उसे अर्पण करने का क्या मतलब है? जिसने संपूर्ण चराचर जगत  बनाया है, सारे भोज्य पदार्थ उसी की देन हैं। उसी का अंश मात्र अर्पित करने से उसे क्या फर्क पड़ता होगा?

भगवान की मूर्ति भोग ग्रहण करती है या नहीं, इस शंका का समाधान करते हुए एक प्रसंग कुछ इस प्रकार व्यक्त किया गया है-

एक शिष्य ने अपने गुरू से यही प्रश्न किया। इस पर उन्होंने पुस्तक में अंकित एक श्लोक कंठस्थ करने को कहा। एक घंटे बाद गुरू ने शिष्य से पूछा कि उसे श्लोक कंठस्थ हुआ कि नहीं। इस पर शिष्य ने शुद्ध उच्चारण के साथ श्लोक सुना दिया। गुरू ने पुस्तक दिखाते हुए कहा कि श्लोक तो पुस्तक में ही है, तो वह तुम्हारी स्मृति में कैसे आ गया? स्वाभाविक रूप से शिष्य निरुत्तर हो गया। गुरू ने समझाया कि पुस्तक में जो श्लोक है, वह स्थूल रूप में है । तुमने जब श्लोक पढ़ा तो वह सूक्ष्म रूप में तुम्हारे अंदर प्रवेश कर गया, लेकिन पुस्तक में स्थूल रूप में अंकित श्लोक में कोई कमी नहीं आई। इसी प्रकार भगवान हमारे प्रसाद को सूक्ष्म रूप में ग्रहण करते हैं और इससे स्थूल रूप के प्रसाद में कोई कमी नहीं आती।

वस्तुतर: प्रसाद चढ़ाना एक भाव है, कृतज्ञता प्रकट करने का। और भाव की ही महिमा है। कहा तो यहां तक जाता है कि अगर हमारे पास पुष्प, फल, मिष्ठान्न आदि नहीं हैं तो भी अगर हम कल्पना करके सच्चे भाव से उसे अर्पित करते हैं तो वह उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना भौतिक रूप से प्रसाद चढ़ाने का। अर्थात महत्व पदार्थ का नहीं, बल्कि भाव का है। उससे भी दिलचस्प बात ये है कि भगवान को चढ़ाया हुआ प्रसाद दिव्य हो जाता है। भले ही उसमें रासायनिक रूप से कोई अंतर न आता हो, तो भी उसके एक-एक कण में दिव्यता आ जाती है। यह भी एक भाव है। तभी तो कहते हैं कि प्रसाद का तो एक कण ही काफी है, जरूरी नहीं कि वह अधिक मात्रा में हो। इसके अतिरिक्त प्रयास ये भी रहता है कि वह अधिक से अधिक के मुख में जाए। यह भी एक भाव है, सबके भले का।

एक आरती में तो बाकायदा एक पंक्ति है कि तेरा तुझ को अर्पण, क्या लागे मेरा। ऐसा इसलिए कहा जाता है ताकि कृतज्ञता प्रकट करते समय यह अहम भाव न आ जाए कि मैने कुछ अर्पित किया है। एक रोचक बात देखिए। भगवान को हम हमारा ही विराट रूप मानते हैं। इसी कारण जैसे मौसम के अनुसार हमारा भोजन परिवर्तित होता है, तो प्रसाद भी हम वैसा ही चढ़ाते हैं। यहां तक कि सर्दी में भगवान की मूर्ति को गरम वस्त्र पहनाते हैं। भला मूर्ति को भी कोई ठंड लगती है? मगर ये हमारा भाव है। और कहते भी हैं कि भगवान भाव के भूखे हैं। तभी तो वे शबरी के झूठे बेर भी ग्रहण कर लेते हैं।

https://www.youtube.com/watch?v=KCUUkPl9Qr4

दीपक से दीपक क्यों नहीं जलाना चाहिए?

हमारे यहां दीप से दीप जले की बड़ी महिमा है। ज्ञान के प्रसार के लिए इस उक्ति का प्रयोग किया जाता है। व्यवहार में यह बिलकुल ठीक भी है। एक व्यक्ति से ही दूसरे में ज्ञान का प्रकाश जाता है और उससे आगे वह अन्य में। इस प्रकार यह सिलसिला चलता रहता है। मगर धर्म के जानकार कहते हैं कि एक दीपक से दूसरा दीपक नहीं जलाना चाहिए। हर दीपक को नई दियासलाई से जलाने की सलाह दी जाती है। सवाल ये उठता है कि यह मान्यता कैसे स्थापित हुई?

सामान्यतरू हमें एक दीपक से दूसरे दीपक को जलाने में कुछ भी गलत प्रतीत नहीं होता। चाहे दीपक से जलाओ या दूसरी दियासलाई से, क्या फर्क पड़ता है? अगर हमें अधिक दीपक जलाने हैं तो यह निरी मूर्खता ही होगी कि हर दीपक को जलाने के लिए नई दियासलाई काम में लें। तो फिर धर्म के जानकार अलग-अलग दीपक को अलग-अलग जलाने की सलाह क्यों देते हैं?

बताया जाता है कि जब हम किसी दीपक को जलाते हैं तो वह अग्नि की एक इकाई होती है। जिस भी देवी-देवता के नाम दीपक जलाया गया है, वह उसी के नाम होता है। उसको शेयर नहीं किया जा सकता। यदि हम उसी दीपक से दूसरा दीपक जलाते हैं तो वह जूठन के समान हो जाता है। जब हम किसी का जूठा नहीं खाते तो एक देवता की जूठी अग्नि दूसरे को कैसे अर्पित कर सकते हैं। मान्यता है कि ऐसी जूठी अग्नि दूसरे दीपक के देवता को स्वीकार्य भी नहीं होती।

कुछ जानकार कहते हैं कि दीपक से दीपक जलाने से ऋण का भार बढ़ता है। इसके पीछे क्या तर्क है, क्या विज्ञान है, पता नहीं। हो सकता है ऐसा इसलिए माना जाता हो एक दीपक की ज्योति दूसरे दीपक के लिए उधार लेने की घटना हमारे जीवन में ऋण लेने के रूप में घटित होती हो।

प्रसंगवश इस जानकारी पर भी चर्चा कर लेते हैं। एक दियासलाई से सिर्फ एक ही सिगरेट जलाने का भी चलन है। हद से हद दो सिगरेटें जलाई जाती हैं। तीसरी सिगरेट तक के लिए दियासलाई बच जाने पर भी उसे बुझा कर नई दियासलाई जलाई जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह चलन तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा की मान्यता के कारण है। कुछ लोग बताते हैं कि इसका चलन सेना से आया। सैनिकों की मान्यता है कि लगातार एक के बाद एक सिगरेट एक ही दियासलाई से जलाने पर एक रेखा निर्मित होती है। दुश्मन को पता चल जाता है कि वहां सैनिक पंक्तिबद्ध खड़े हैं और वह आक्रमण कर सकता है।

https://www.youtube.com/watch?v=LPy_U0Wrf2s&t=91s

शनिवार, जनवरी 04, 2025

क्या मोर के आंसू से मोरनी गर्भवति होती है?

बचपन में मैने एक प्रसंग सुना था। वो ये कि मोर मोरनी को रिझाते  वक्त अपने खूबसूरत पंखों को देख कर इठलाता है, लेकिन जैसे ही अपने बदसूरत पैर देखता है तो दुखी हो जाता है। उसकी आंखों से आंसू बहने लगते है। मोरनी तुरंत उसके आंसू पी लेती है और उसी से उसके भीतर प्रजनन की प्रक्रिया होती है।

असल में यह एक अवधारणा है। अनेक कथावाचकों को यह प्रसंग सुनाते हुए मैने देखा है। यह अवधारणा कहां से आई, पता नहीं, मगर ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान श्रीकृष्ण के सिर पर बंधे मोर पंख की गरिमा को और महिमामंडित करने के प्रयास में ऐसी सोच निर्मित हुई होगी। सोच यह भी रही कि चूंकि मोर अन्य प्राणियों की तरह मादा से संसर्ग नहीं करता, इस कारण वह ब्रह्मचारी है। उसकी इसी विशेषता के कारण उसे राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया।

कुछ अरसा पहले राजस्थान हाईकोर्ट के जज श्री महेश शर्मा ने अपने कार्यकाल के आखिरी दिन एक अहम फैसले के दौरान इसी अवधारणा का हवाला दिया तो पूरे देश में खूब हो-हल्ला हुआ। उनकी खिल्ली भी उड़ाई गई कि इतना विद्वान व्यक्ति बिना पुख्ता जानकारी के कैसे ऐसी मिथ्या बात कर सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि उनके दिमाग में प्रचलित अवधारणा ही थी। गलती सिर्फ ये हुई कि उन्होंने इसका वैज्ञानिक पहलु जानने की कोशिश नहीं की। 

बहरहाल, उनके वक्तव्य पर बहस शुरू हो गई और लोग ये सवाल करने लगे कि क्या ये मुमकिन है कि आंसू पीकर मोरनी गर्भवती हो जाए? इस पर पक्षी वैज्ञानिक अपना पक्ष लेकर सामने आए। उनका कहना था कि मोर और मोरनी भी वैसे ही बच्चे पैदा करते हैं, जैसे बाकी पशु-पक्षी। दरअसल वे अपने सुंदर पंख फैला कर मोरनी को मोहित करते हैं। मोरनी जब संसर्ग की सहमति दे देती है तो वे बाकायदा वैसे ही काम क्रीड़ा करते हैं, जैसे अन्य पक्षी। और इस तरह से वह गर्भवति होती है। 

विज्ञान के अनुसार प्रजनन के लिए नर-मादा का मिलाप जरूरी है। जिस समय इनका मिलाप होता है, नर मादा की पीठ पर सवार होता है। दोनों मल विसर्जन करने वाले अंग, जिसे कि क्लोका कहा जाता है, उसे खोलते हैं और इस प्रकार नर पक्षी अपना वीर्य मादा के शरीर में प्रविष्ठ करवाता है।

गूगल सर्च करने पर जानकारी मिली कि प्रोफेसर डॉ. संदीप नानावटी के अनुसार मोर शर्मिला पक्षी है, इसलिए वह एकांत मिलने पर ही सहवास करता है। कदाचित इसी वजह से लोगों में भ्रांति है कि मोर के आंसू पी कर मोरनी गर्भवती होती है। पक्षी विज्ञानी विक्रम ग्रेवाल का भी मानना है कि अन्य पक्षियों की तरह मोरनी से सहवास कर प्रजनन करता है। 

जहां तक मोर को राष्ट्रीय पक्षी घोषित करने का सवाल है तो जानकारी ये है कि मोर पहले भारत में ही पाया जाता था। राष्ट्रीय पक्षी के चुनाव की लिस्ट में मोर के साथ सारस व हंस के नाम थे। 1960 में राष्ट्रीय पक्षी चुनने पर विचार हुआ। उनमें यह एक राय बनी कि उसी पक्षी को राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया जाए जो देश के हर हिस्से में पाया जाता हो, उसे हर आम-ओ-खास जानता हो और वह भारतीय संस्कृति का हिस्सा हो। इन शर्तों पर मोर ही खरा उतरा। और इस प्रकार 26 जनवरी 1963 को मोर को राष्ट्रीय पक्षी घोषित कर दिया गया।

आंसू के जरिए प्रजनन होने के इस प्रसंग के साथ ही इस प्रकार एक प्रसंग और ख्याल में आता है। आपने रामायण सुनी-पढ़ी होगी। उसमें जिक्र आता है कि पवन पुत्र हनुमान जी बाल ब्रह्मचारी थे। अपनी पूंछ से लंका दहन के कारण उनको तीव्र पीड़ा हो रही थी। पूंछ की अग्नि को शांत करने के लिए समुद्र के निकट गए। इस दौरान उनको पसीना आया। उस पसीने की एक बूंद को एक मछली ने पी लिया था। उसी पसीने की बूंद से वह मछली गर्भवती हो गई। बाद में एक दिन पाताल के असुरराज अहिरावण के सेवकों ने उस मछली को पकड़ लिया। जब वे उसका पेट चीर रहे थे, तो उसमें से वानर की आकृति का एक मनुष्य निकला। वे उसे अहिरावण के पास ले गए। अहिरावण ने उसे पाताल पुरी का रक्षक नियुक्त कर दिया। यही वानर हनुमान पुत्र मकरध्वज के नाम से जाना गया। मकरध्वज ने अपने पैदा होने का वृतांत हनुमान जी को सुनाया। हनुमानजी ने अहिरावण का वध कर श्रीराम व लक्ष्मण को मुक्त कराया और उसे पाताल लोक का राजा नियुक्त कर दिया।

यह प्रसंग मोर-मोरनी के प्रसंग से मिलता जुलता है। तर्क ये दिया जा सकता है कि जब पसीने की बूंद से प्रजनन हो सकता है तो आंसू से क्यों नहीं हो सकता? सच्चाई क्या है, कुछ पता नहीं। शास्त्रों में बिना संसर्ग के अन्य तरीकों से प्रजनन के अनेक उदाहरण मौजूद हैं। उन पर विज्ञान ने अब तक कोई काम नहीं किया है।

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