तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

गुरुवार, दिसंबर 22, 2016

नोटबंदी की नाकामी का ठीकरा बैंकों पर फूटेगा?

क्या चंद भ्रष्ट बैंक वाले ही दोषी हैं, सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं? 
हालांकि नोटबंदी का फैसला जिस प्रकार जल्दबाजी में उठाया गया और उससे आम जनता को हो रही परेशानी से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहले ही घिरते दिखाई दे रहे थे, मगर जिस प्रकार लगातार बैंकों से मिलीभगत करके करोड़ों रुपए के नोट बैंकों से बाहर निकले और पकड़े गए, उसे देख कर लगता है कि इस ऐतिहासिक कदम की नाकामी का पूरा ठीकरा बैंकों पर ही फूटने वाला है।
ज्ञातव्य है कि आजकल रोजाना ही इलैक्ट्रॉनिक मीडिया व अखबारों मे नये करेंसी नोट बड़ी तादाद में पकड़ में आने के समाचार आ रहे हैं। सवाल ये उठता है कि एक ओर जहां एटीएम मशीनों के बाहर लाइन लगा कर भी एक आदमी को मात्र दो हजार रुपए ही हासिल हो पा रहे हैं या बैंकों से दस हजार और अधिकतम 24 हजार रुपए मिल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर लाखों और करोड़ों रुपए के दो हजार रुपए के नोट कैसे पकड़े जा रहे हैं? सीधे आरबीआई या नोट प्रिटिंग प्रेस से तो बाहर आ नहीं सकते। स्वाभाविक सी बात है कि इतने नोट किसी बैंक की करेंसी चेस्ट या फिर बैंक के मैनेजर अथवा किसी कर्मचारी से मिलीभगत करके हासिल किए गए हैं। चर्चा तो यह तक है कि जितनी बरामदगी दिखाई जा रही है, वास्तव में उससे कहीं अधिक बरामद हो रहे हैं, मगर उस स्तर पर भी पुलिस से मिलीभगत हो रही है, जैसी कि पुलिस की छवि बनी हुई है।
कैसी विडंबना है कि बिना तैयारी या कुछ खामियों के साथ ही सही, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इतना बड़ा कदम उठाया, मगर वह न केवल नकारा साबित हो रहा है, अपितु बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का कारोबार चालू और हो गया। जो बैंक कर्मचारी आम तौर पर भ्रष्टाचार नहीं किया करते थे, जैसे ही उन्हें मौका मिला, उन्होंने जम कर लूट मचा दी। बेशक इसके लिए ऐसा करने वाले बैंक कर्मचारी ही जिम्मेदार हैं, मगर सवाल ये उठता है कि क्या सरकार को इतना भी ख्याल नहीं रहा कि इतना बड़ा लीकेज बैंकों के जरिए हो जाएगा, जिसके भरोसे ही उसने यह कदम क्रियान्वित किया। आपको याद होगा कि नोटबंदी के बाद कुछ दिन तक जब देखा गया कि बैंक के कर्मचारियों को बहुत अधिक अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ रही है तो खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शाबाशी दी थी, मगर उन्हीं में चंद भ्रष्ट बैंक कर्मचारियों ने इस मुहिम की पूरी हवा ही निकाल दी। स्पष्ट है कि बैंकों के जरिए नए नोट बाजार में लाने की जो प्रक्रिया थी, उसमें बहुत अधिक लचीलापन था। कोई पुख्ता नीति नहीं बनाई गई। बैंक के मैनेजर और केशियर को ही यह लिबर्टी थी कि वह चाहे तो निर्धारित पूरे चौबीस हजार दे और चाहे तो केवल दो हजार की पकड़ाए या फिर बैंक में राशि न होने का बहाना बना कर लौटा दे। क्या सरकार को यह पता नहीं था कि जहां भी राशनिंग होगी, वहीं पर ब्लैक होने लगेगी? और उसी का परिणाम निकला कि जहां-जहां बैंक वालों को मौका लगा, वहीं पर उन्होंने कमीशन लेकर नए नोट दे दिए। ऐसा नहीं कि यह केवल कुछ ही स्थानों पर हुआ, अधिकतर बैंकों में छोटे स्तर पर नोटों की अदला बदली हुई है। स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली लोग पूरे चौबीस हजार रुपए निकलवा कर ला रहे हैं, जबकि आम आदमी धक्के खा रहा है। बैंकों में हुए इस भ्रष्टाचार की खबरें तो तब सामने आईं, जब नए नोट बड़ी तादाद में पकड़े जाने लगे, मगर उससे भी पहले बाजार में यह खुली चर्चा थी कि कुछ लोग बीस से तीस प्रतिशन कमीशन ले कर नोट बदलने का काम कर रहे हैं। खुफिया तंत्र या तो विफल हो गया, या फिर उसकी सूचना को सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया। अन्यथा तुरंत ऐसे भ्रष्टाचार पर रोक के कदम उठाए जाते। आज जब कि बड़े पैमाने पर नए नोट पकड़े जा रहे हैं और आरबीआई व सीबीआई हरकत में आए हैं और दोषियों की धरपकड़ हो रही है, उसके बाद भी कमीशन का धंधा जारी होने की चर्चाएं हैं। ये ठीक है कि पुराने नोटों के बदले ही नए नोट ही लिए गए हैं, जिससे सीधे तौर पर सरकार को कोई नुकसान नहीं माना जा सकता, मगर एक ओर जहां आम जन त्राहि त्राहि कर रहा है, रोजी रोटी की विकट समस्या उत्पन्न हो गई, बाजार बुरी तरह अस्त व्यस्त हो रहा है, वहीं चंद लोग इस प्रकार पीछे के रास्ते से करोड़ों रुपए हासिल कर रहे हैं, तो असंतोष बढऩा ही है। अर्थात यदि ये लूट नहीं मची होती तो जनता को उतनी तकलीफ नहीं होती, जितनी कि हो रही है। एक तो वैसे ही नए नोटों की सप्लाई की सीमा के कारण आम जन कष्ट पा रहा था, ऊपर से इस प्रकार मची लूट से उसकी तकलीफ और बढ़ गई है।
कुल मिला कर मोदी का यह ऐतिहासिक कदम बुरी तरह विवादित और विफल होने जा रहा है। इसके लिए जहां सरकार की तैयारी का अभाव एक प्रमुख कारक है, उससे कहीं अधिक बैंकों की बदमाशी जिम्मेदार है। ऐसे में मोदी समर्थक इस नाकामी का पूरा ठीकरा बैंकों पर फोड़ते दिखाई दे रहे हैं। मगर सवाल ये उठता है कि सरकार ने इतनी लापरवाही कैसे बरती कि बैंक वालों को लूट मचाने का मौका मिल गया। इसका एक परिणाम ये रहा कि आज हर बैंक वाला चोर नजर आता है, जबकि कुकृत्य लाखों बैंक कर्मचारियों में से गिनती के भ्रष्ट बैंक वालों ने किया या कर रहे हैं।
-तेजवानी गिरधर

गुरुवार, दिसंबर 08, 2016

जनता त्रस्त, सरकार मस्त

इसमें कोई दोराय नहीं कि नोटबंदी के कदम से आम जनता बेहद, बेहद परेशान है, जिसे कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी मानते हैं, तभी तो हालात सुधारने के लिए पचास दिन की मोहलत मांगते हैं, बावजूद इसके विपक्ष सरकार को घेरने में कामयाब नहीं हो पाया। बेशक संसद में विपक्ष ने हंगामा कर कार्यवाही को बाधित किया, मगर धरातल पर सरकार के कदम के खिलाफ वह रोष नजर नहीं आया, जो कि उसकी विकट परेशानी की एवज में नजर आना चाहिए था। इसके कई कारण हो सकते हैं, मगर फिलहाल हालत ये है कि जनता को कोई राहत मिलती नजर नहीं आ रही, सरकार इतनी बेखौफ है कि व्यवस्था सुधारने के नाम पर रोज नए नियम लागू कर रही है और विपक्ष समझ ही नहीं पा रहा कि आखिर माजरा क्या है? इससे कहीं न कहीं यह प्रतीत होता है कि लाख परेशानी के बावजूद मोदी जनता में यह संदेश देने में कामयाब हो गए हैं कि उन्होंने देशहित में एक क्रांतिकारी कदम उठाया है, जिसके लिए थोड़ी बहुत तकलीफ तो उठानी ही होगी।
असल में काले धन के नाम पर जिस प्रकार हल्ला बोलते हुए मोदी ने यह कदम उठाया, वह इस अर्थ में लिया जा रहा है कि वे देश हित में कड़वी दवा पिला रहे हैं। जिस प्रकार हड़बड़ी में ये कदम उठाया गया और उसके बाद अस्त व्यस्त हुए बाजार व जनता में मची अफरा तफरी से यह तो स्थापित हो ही गया है कि सरकार ने पूर्व तैयारी के नाम पर कुछ नहीं किया था। सारे नए नियम बाद में हालात को सुधारने के लिए लागू किए जा रहे हैं, हालांकि उनसे राहत पहुंची हो, ऐसा कहीं नजर नहीं आ रहा। धरातल पर हालात बेहद खराब हैं, फिर भी जनता का आक्रोष फूटा नहीं तो जरूर इसके कुछ कारण हैं।
ऐसा प्रतीत होता है कि प्रयोजित तरीके से जिस प्रकार मोदी एक अवतार के रूप में उभर कर आए और जादूई तरीके से सत्ता पर काबिज हुए, जनता में वह नशा कहीं न कहीं अब भी बरकरार है। बेशक लोग परेशान जरूर हैं, मगर शायद वे यही सोच रहे हैं इस कदम से आगे चल कर हालात बेहतर होंगे। कदाचित काला धन रखने वालों की हालत देख कर जो खुशी मिल रही है, वह कहीं उनकी तकलीफ से ज्यादा भारी है। इसमें स्थाई समाधान की उम्मीद में अस्थाई परेशानी को झेलने का भाव भी नजर आ रहा है।
एक वजह और नजर आती है। वो यह कि जनता प्रतिदिन बैंकों व एटीएम के बाहर लाइन लगा कर रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने में इतनी व्यस्त है, जो कि उसकी प्राथमिकता भी है, कि आक्रोष जाहिर करना गैरजरूरी और व्यर्थ हो गया है। स्वाभाविक सी बात है, आम आदमी रोजी रोटी का जुगाड़ करे कि रोष जाहिर करने में अपना वक्त जाया करे। उसके रोष को मुखर करने में विपक्ष भी नाकामयाब रहा। इसमें विपक्ष की एकजुटता का अभाव तो एक बड़ा कारण है ही, पहले से परेशान जनता को बंद अथवा कोई और आंदोलन करके परेशानी में डालने पर दाव उलटा पडऩे का भी अंदेशा रहा।
भारत बंद के आह्वान का ही मसला लीजिए, जिसकी कि कहीं स्पष्ट घोषणा नहीं हुई थी, फिर भी मोदी की आईटी सेना और भाजपा इस रूप में भुना ले गई कि भारत बंद विफल हो गया है। उसने इसे रूप में भुनाया कि जनता मोदी के कदम से खुश है, इस कारण बंद में विपक्ष का साथ नहीं दिया। सोशल मीडिया पर तो हालत ये थी कि कथित से आहूत बंद के पक्ष में एक पोस्ट आती तो उससे दस गुना ज्यादा बंद के खिलाफ अपीलें पसर जातीं। इसे भाजपा की चतुराई ही कहा जाएगा कि जो बंद आहूत ही नहीं किया गया, वह उसके विफल हो जाने को साबित करने में कामयाब हो गई। इस उदाहरण से यह पता चलता है कि देश को किस खतरनाक झूठ का शिकार बनाया गया। भारत बंद का सोशल मीडिया में कुप्रचार एक दिलचस्प शोध का विषय है। एक काल्पनिक दैत्य पैदा करके उससे छद्म युद्ध करना कितना रोमांचक है? वाम दलों ने बिहार, बंगाल और केरल में राज्यस्तरीय बंद बुलाया था, लेकिन उसे भारत बंद की संज्ञा नहीं दी जा सकती। राजस्थान में भी प्रमुख विपक्षी दल ने बंद का आह्वान नहीं किया था, क्योंकि वह पहले ही जिला स्तर पर विरोध प्रदर्शन कर चुकी थी।
हालांकि मीडिया में इस प्रकार की खबरें छायी रहीं कि नोटबंदी की जानकारी भाजपा खेमे को पहले से थी, मगर उस पर यह संदेश ज्यादा प्रभावी हो गया कि विपक्ष इसलिए चिल्ला रहा है कि मोदी ने उनकी कमर तोड़ दी है। यह मोदी की चतुराई ही कही जाएगी कि जब विपक्ष ने कहा कि सरकार ने बिना तैयारी के कदम उठाया, जो कि सही भी है, मगर इसका जवाब विपक्ष का मुंह बंद करने वाला रहा कि हां, उन्हें अपना काला धन ठिकाने लगाने की तैयारी का वक्त नहीं मिला।
नोटबंदी की वजह से जो परेशानी हुई है और हो रही है, वह अपनी जगह है, मगर सोशल मीडिया पर आलम ये है कि तकलीफ से जुड़ी वीडियो क्लिपिंग से कई गुना अधिक मोदी के कदम की तारीफ वाली वीडियो क्लिपिंग रोज जारी हो रही हैं। दिलचस्प बात ये है कि परेशानी वाले संदेश व लंबी लाइनों में हो रही परेशानी के वीडियो जहां वास्तविक हैं, वहीं तारीफ वाले संदेष स्पष्ट रूप से प्रायोजित हैं, फिर भी वे भारी पड़ रहे हैं। यानि कि मोदी का आईटी सेल जबदस्त है। उसकी तुलना में विपक्ष बिखरा बिखरा सा है। हालत ये है कि राजनीतिक पंडित यह दावे के साथ कहने की स्थिति में नहीं हैं कि मोदी के इस कष्टदायक कदम का लाभ आगामी विधानसभा चुनावों में विपक्ष को मिलेगा या नहीं।
तेजवानी गिरधर

रविवार, नवंबर 27, 2016

राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के लिए बच्चों का इस्तेमाल

राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप तो होता ही रहता है। मतभिन्नता और उसकी अभिव्यक्ति लोकतंत्र की पहचान भी है। हर किसी को अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है। पहले अपना पक्ष रखने के लिए पर्याप्त मंच नहीं मिलता था, लेकिन अब सोशल मीडिया इतना व्यापक हो गया है कि बड़ी आसानी से बाकायदा वीडियो बना कर अपनी बात कहने लगे हैं लोग। इतना ही नहीं, बात को और अधिक प्रभावोत्पादक बनाने केलिए इसके लिए बच्चों का भी इस्तेमाल किया जाने लगा है। ऐसा करके हमारी भड़ास निकालने की क्षुधा तो शांत होती ही है, मगर ऐसा करके हम अपनी भावी पीढ़ी को क्या संस्कार दे रहे हैं, ये सोचने का विषय है। कहते हैं न कि पूत का पग पालने में ही दिख जाते हैं, कुछ वैसा ही जयश्री राम वाली सेना का भावी रूप कैसा होगा, इसकी हल्की झलक इस वीडियो में:-
https://youtu.be/ZNAIQZvN38Q

ये पढ़ाया और सिखाया जा रहा है स्कूल में?

नोटबंदी के बाद सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप की बाढ़ आई हुई है। कई तरह के वीडियो शेयर किए जा रहे हैं। विपक्षी जहां नोटबंदी से हुई परेशानी के वीडियो डाल रहे हैं तो मोदी समर्थक नोटबंदी को जायज ठहराने वाले वीडियो जारी कर रहे हैं। इस भीड़ में एक वीडियो ऐसा भी नजर आया, जहां नोटबंदी के पक्ष में बने एक गाने पर एक सरकारी स्कूल के बच्चे झूम कर नाच रहे हैं। साफ नजर आ रहा है कि यह सुनियोजित है, क्योंकि मौके पर जिम्मेदार शिक्षक भी मौजूद हैं। सवाल ये उठता है कि क्या हमारे सरकारी स्कूल अब इस काम में आने लगे हैं?
ये पढ़ाया और सिखाया जा रहा है स्कूल में?
नोटबंदी के बाद सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप की बाढ़ आई हुई है। कई तरह के वीडियो शेयर किए जा रहे हैं। विपक्षी जहां नोटबंदी से हुई परेशानी के वीडियो डाल रहे हैं तो मोदी समर्थक नोटबंदी को जायज ठहराने वाले वीडियो जारी कर रहे हैं। इस भीड़ में एक वीडियो ऐसा भी नजर आया, जहां नोटबंदी के पक्ष में बने एक गाने पर एक सरकारी स्कूल के बच्चे झूम कर नाच रहे हैं। साफ नजर आ रहा है कि यह सुनियोजित है, क्योंकि मौके पर जिम्मेदार शिक्षक भी मौजूद हैं। सवाल ये उठता है कि क्या हमारे सरकारी स्कूल अब इस काम में आने लगे हैं?
वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक कीजिए:-
https://youtu.be/rs3cirGqHek

शुक्रवार, नवंबर 25, 2016

मोदी के नाम पर कहीं ये अराजकता के संकेत तो नहीं

नोटबंदी की वजह से देश में फैली आर्थिक अराजकता के विरोध में आगामी 28 नवंबर को विपक्ष की ओर से आहूत भारत बंद के दौरान जगह-जगह मोदी समर्थकों व विरोधियों के बीच भिड़ंत होने का अंदेशा नजर आ रहा है। कम से कम सोशल मीडिया पर जिस प्रकार की पोस्ट धड़ल्ले से डाली जा रही हैं, उससे तो यही लगता है कि कहीं ये आभासी दुनिया हकीकत के धरातल पर न उतर आए। दिलचस्प बात ये है कि बंद के समर्थन से संबंधित जितनी पोस्ट हैं, उससे कहीं अधिक बंद के विरोध में हैं। आम तौर पर बंद के समर्थन में न होने की सामान्य पोस्ट हैं, मगर कई जगह बाकायदा चेतावनी युक्त पोस्ट डाली गई हैं, जिसमें कानून हाथ में लेने की अपील की गई है। इस प्रकार की पोस्ट को लेकर सोशल मीडिया पर भी लेखन युद्ध छिड़ा हुआ है, जिसमें एक दूसरे को चैलेंज तक दिया जा रहा है।
बानगी के बतौर एक पोस्ट देखिए:-
राष्ट्र हित में जारी सूचना :-
सभी सच्चे भारतीयों से निवेदन है कि वो सभी भारतीय जो देश का भला चाहते हैं, वे 28 नवम्बर को अपने घर व अपनी दुकान के मुख्य दरवाजे पर एक अच्छा सा ल_ तैयार रखें। भारत बन्द के दौरान जो भी आपकी दुकान बन्द करवाने के लिए आये, उसकी अच्छे से धुलाई करें। देश हित में ऐसे मौके बार-बार नहीं आते।
सवाल ये उठता है कि कानून हाथ में लेना कैसा राष्ट्र हित है। हो सकता है, ऐसे अतिवादी लोग गिनती में ज्यादा न हों, मगर इन पर अंकुश लगना ही चाहिए।
राजनीतिक मतभिन्नता किस प्रकार निजी वितृष्णा का रूप ले सकती है, इसका उदाहरण ये पोस्ट है-
जो दुकान 28 नवम्बर को भारत बंद में बंद होगी, उस दुकान से मैं आजीवन कुछ नहीं खरीदूंगा। ये मेरी अखंड प्रतिज्ञा है।
एक पोस्ट ऐसी भी है, जिसमें नोटबंदी की वजह से हो रही परेशानी की स्वीकारोक्ति तो है, मगर साथ ही बंद का सफल न होने देने का आग्रह किया गया है। देखिए:-
तमाम मतभेदों और नोट चेंज के अभियान की जो भी कमियां या खामियां हैं, उनको भुला कर हम लोगों को विपक्षी दलों के 28 तारीख के भारत बंद को सफल नहीं होने देना चाहिए। यदि आज ये संगठन 28 तारीख के बंद को सफल कर लेते हैं, तो आप और हम सभी को इससे भी ज्यादा बुरे दिनों को देखने के लिए तैयार रहना होगा, क्योंकि जो पार्टिया बंद आहूत कर रही हैं, वे और उनके समर्थक वर्ग से सभी परिचित हैं। इसलिए 28 को 10 बजे खुलने वाला बाजार 9 बजे ही खुलना चाहिए, और जिन स्थानों पर सोमवार की छुट्टी रहती है, वहां स्थानीय प्रशासन से विशेष अनुमति ले कर बाजार खोलने का प्रयास करना चाहिये। देश प्रथम है हमारे लिए।
कदाचित देश के इतिहास में ऐसा व्यापक अभियान पहली बार अंजाम दिया जा रहा है, वरना अब तक तो यही देखा गया है कि जब भी कोई विरोधी दल किसी मुद्दे पर बंद आहूत करता है तो सत्तापक्ष शांत रहता है। स्थानीय स्तर पर छिटपुट टकराव जरूर होता है, मगर आम तौर पर शांति ही रहती है। अगर अशांति होती भी है तो प्रदर्शनकारियों व पुलिस के बीच टकराव की वजह से।
ऐसा प्रतीत होता है कि नोटबंदी का यह मुद्दा पार्टीगत से हट कर व्यक्ति केंद्रित होने से हुआ है, जहां विरोध व्यक्ति का है तो समर्थन के केन्द्र में भी व्यक्ति ही है। एक दूसरी वजह ये है कि एक ओर जहां नोटबंदी के तरीके का विरोध हो रहा है तो दूसरी ओर तकलीफ पा कर भी इस कदम का समर्थन करने वाले खम ठोक कर खड़े हैं। एक ऐप के जरिए सर्वे करवा कर तो बाकायदा यह साबित करने की कोशिश की गई है कि देश की अधिसंख्य जनता नोटबंदी के समर्थन में है, हालांकि जितने छोटे पैमाने पर यह हुआ है, इसको लेकर विपक्ष का कहना है कि चंद लाख लोगों की राय को सवा करोड़ लोगों का सर्वे कैसे माना जा सकता है। वैसे यह भी एक अजीब बात है कि कदम पहले उठा लिया गया और जनमतसंग्रह बाद में उसे सही बताने के लिए किया जा रहा है।
बहरहाल, यह स्पष्ट है कि मोदीवादी और भाजपाई कदम को सही ठहराने के लिए विरोध में हो रहे बंद को विफल करना चाहते हैं। राजनीतिक दाव पेच तक तो इसमें कोई आपत्ति नहीं, मगर यदि इसको लेकर हो रही ल_बाजी की अपील आभासी दुनिया से निकल कर कार्य रूप में परिणित हो गई तो यह ठीक नहीं होगा। नोटबंदी सही है या गलत, ये विवाद का विषय हो सकता है, मगर यह निर्विवाद होना चाहिए कि इसको लेकर यदि लड़ाई-झगड़ा होता है तो वह देशहित में कत्तई नहीं। भगवान करे, सोशल मीडिया पर लाठियां भांजने वाले देश हित में वहीं बने रहें।
-तेजवानी गिरधर
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मंगलवार, नवंबर 22, 2016

मोदीवादी इतने आशंकित क्यों?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से 8 नवंबर की रात यकायक पांच सौ व एक हजार का नोट बंद करने की घोषणा के बाद बाजार में जो अफरातफरी मची, बैंकों व एटीएम मशीनों पर जो लंबी लंबी कतारें लगीं, और जिस प्रकार आम लोगों का गुस्सा फूट रहा है, उसे देखते हुए लगता है कि मोदीवादी आशंकित हैं कि जिस कदम से मोदी के और अधिक लोकप्रिय होने की उम्मीद थी, उसके विपरीत कहीं आम जनता मोदी विरोधी तो नहीं हो जाएगी? खुद मोदी के बाद के भाषणों से भी यही परिलक्षित हो रहा है कि वे जल्दबाजी में उठाए गए इस कदम से हुई परेशानी को देखते हुए मरहम लगाने की कोशिश कर रहे हैं। कष्ट पा रही जनता को मस्का लगाने के लिए महान बता रहे हैं। काम के अतिरिक्त बोझ के तले दबे बैंक कर्मियों की तारीफ कर रहे हैं। जब देखा कि स्थिति बेहद विस्फोटक हो गई है तो उन्हें पचास दिन की मोहतल मांगनी पड़ गई। और उसकी पराकाष्ठा ये है कि एक प्रधानमंत्री को यह कहना पड़ गया कि अगर पचास दिन में हालात न सुधरें तो उन्हें सार्वजजिनक रूप से चाहे जो सजा दी जाए। सवाल उठता है कि यकायक फैसला लेते वक्त इन पचास दिनों का ख्याल क्यों नहीं रहा? इतना ही नहीं, इस मुद्दे पर उनका भावुक हो जाना भी यह संदेह पैदा कर रहा है कि भले ही वे अपने आप को बहादुर बता रहे हों, मगर कहीं न कहीं खुद को कमजोर महसूस कर रहे हैं। संदेह ये भी है कि कहीं भाजपा के अंदर ही एक प्रेशर ग्रुप तैयार नहीं हो गया है जो नोटबंदी के तरीके की आलोचना कर रहा है। लाडपुरा के भाजपा विधायक भवानी सिंह राजावत के वायरल हुए वीडियो, जिसका कि उन्होंने खंडन किया है, से तो यह साफ नजर आ रहा है कि खुद मोदी की पार्टी के लोग ही कसमसा रहे हैं, मगर पार्टी अनुशासन के कारण चुप हैं या फिर मोदी की तारीफ करने को मजबूर हैं। एक बात और ख्याल में आती है, वो यह कि चाहे गोपनीयता के चलते या फिर एकाधिकारवादी वृत्ति के कारण नोटबंदी के निर्णय और उसके बाद दिन प्रति दिन हो रहे सुधारात्मक कदमों के बीच वित्त मंत्री अरुण जेटली बेहद कमजोर नजर आ रहे हैं।
बेशक, विरोधी दलों का विरोध लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है, मगर जिस प्रकार नकदी की कमी से त्रस्त लोग गुस्सा रहे हैं, गालियां दे रहे हैं, वह मोदीवादियों के लिए चिंता का विषय है। सोशल मीडिया पर एक ओर जहां मोदी के इस कदम से उत्पन्न समस्याओं से जुड़े संदेश व वीडियो चल रहे हैं, कदाचित वे विरोधी दलों की सुनियोजित रणनीति का हिस्सा भी हों, ठीक उसी तरह मोदीवादियों ने भी मोर्चा संभाल लिया है। उनकी पोस्टों के जरिए यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि मोदी ने देश हित में एक महान काम किया है। उसकी सराहना की जानी चाहिए। देशवासियों को संयम बरतना चाहिए। यदि थोड़ी तकलीफ हो भी रही है तो देश की खातिर उसे सहन करना चाहिए और मोदी के हाथ मजबूत करने चाहिए। यानि कि मोदी के पक्ष की ओर से डेमेज कंट्रोल की पूरी कोशिश की जा रही है। उसमें भी तुर्रा ये कि इस कदम से को आम आदमी का भरपूर समर्थन मिलने का दावा किया जा रहा है। न केवल खुद मोदी, बल्कि उनका हर समर्थक यही दावा करता दिखाई दे रहा है कि जनता बेहद खुश है।
सवाल उठता है कि यदि यह कदम सराहनीय है, तो फिर क्यों इस कदम की तारीफ पर इतना जोर दिया जा रहा है। हकीकत ये है कि आम आदमी परेशान है। भले ही उस तक यह संदेश देने में मोदी सफल रहे हों कि यह कदम देशहित में है, मगर धरातल पर हो रही परेशानी को वह सहन नहीं कर पा रहा। यह स्वाभाविक भी है। देशहित कब होगा, कब इसके परिणाम आएंगे और कितना लाभ होगा, ये तो भविष्य के गर्त में छिपा है, या फिर अर्थशास्त्री बेहतर समझ सकते हैं, मगर मौजूदा स्थिति ये है कि आम आदमी त्राहि त्राहि कर उठा है।
उसी का परिणाम है कि अब मोदी वादियों की ओर से या तो मरहम लगाने की कोशिश की जा रही है या फिर कई तरीके से इसे उचित बताने  की कोशिश की जा रही है। अब यह स्पष्ट हो चुका है कि बैंकों के घंटों लाइनों में लगने वालों की परेशानी का मोदी और उनके सलाहकारों को तनिक भी भान नहीं था और न ही उन्होंने इसके लिए कोई उपाय किए। सारे उपाय बाद में शनै: शनै: किए जा रहे हैं। सरकार के स्तर पर लापरवाही बरते जाने का ही परिणाम है कि सत्तारूढ़ भाजपा संगठन को बैंकों के बाहर जनसेवा के कैंप लगाने पड़ रहे हैं।
लब्बोलुआब, कैसी विडंबना है कि जो कदम वाकई सही था, अकेले इस वजह से कि ठीक से लागू नहीं किया गया, आलोचना के चरम पर जा कर भद्दी गालियों का शिकार हो गया है। अफसोस कि अब उसी सही कदम को सही ठहराने में पूरी ताकत झोंकनी पड़ रही है।
बतौर बानगी कुछ वीडियोज की लिंक यहां दी जा रही है:-

https://youtu.be/HAM1fBi0PsI

https://youtu.be/zNdr9GedrNE

https://youtu.be/JTQLlrPIs4g

https://youtu.be/nCPcm8Ks5M4

https://youtu.be/uGJO_LK1vNk

https://youtu.be/gw3OWiYC15o

-तेजवानी गिरधर
7742067000
8094767000

शुक्रवार, नवंबर 18, 2016

क्या मोदी अकेले पड़ रहे हैं?

क्या नोटबंदी के मामले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अकेले पडऩे वाले हैं? यह सवाल चौंकाने वाला है। निहायत काल्पनिक और हास्यास्पद भी। इसे बेतुका व तुक्का भी कहा जा सकता है। सोशल मीडिया पर गंदी गालियों  और बेशर्म दलीलों के बीच जब मैने भी इससे संबंधित पोस्ट पढ़ी तो चौंक उठा। जहां तक मेरी जानकारी है, इस आशय का विचार पहली बार नजर आया है। मगर विचार तो विचार है। चाहे किसी एक के मन में आया हो। जरूर उसका भी कोई दर्द होगा। उसकी भी कोई सोच होगी। यह विचार शेयर करने वाले शख्स का नाम लेना व्यर्थ है, मगर इतना जरूर तय है कि वे हैं मोदी के परम भक्त। फेसबुक पर उसकी अब तक की सभी पोस्ट नोटबंदी के पक्ष में और सवाल उठाने वालों पर तंज कसने वाली ही नजर आई हैं। कॉपी-पेस्ट के जमाने में हो सकता है कि ये उन्होंने भी कहीं से चुरा कर पोस्ट की हो, मगर है दिलचस्प।
आइये, पहले उनकी पोस्ट पढ़ लें, फिर उस पर थोड़ी चर्चा:-
कोई मुगालते में मत रहिये... मोदी ने संघ और बीजेपी से भी पंगा ले लिया है। शीर्ष पर ये आदमी बहुत अकेला है। कल उनके भाषण में ये बात बहुत उभर कर सामने आई है। ये शख्स बहुत जिद्दी भी है। भले ये बर्बाद हो जायेगा, लेकिन अब यहां से ये लौटेगा नहीं। अब मोदी आर-पार की लड़ाई में है। अब इनको सिर्फ देशवासियों का ही सहारा है। व्यवस्था के खिलाफ एक लड़ाई राजीव गांधी ने भी लड़ी थी, लेकिन वो अभिमन्यु साबित हुये। मारे गये। पहले उनकी ईमानदार छवि को मारा गया, फिर उनके शरीर को।
प्रधानमंत्री तो देश को लगभग सभी अच्छे ही मिले हैं। लेकिन जहां तक विजनरी लीडर का सवाल है, मोदी नेहरू और राजीव गांधी को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। जमीनी नेता होने की वजह से इनमें एक खास किस्म का साहस भी है, जो कभी-कभी दुस्साहस की सीमा को भी छू आता है।
अगर मोदी इन 50 दिनों में फेल होते हैं तो ये खुद तो खत्म हो ही जायेंगे लेकिन देश भी मुसीबत में फंस जायेगा। निजी स्वार्थ में ही सही, लेकिन अगले 50 दिन हमें इस आदमी का साथ देना ही पड़ेगा। अब देश दाव पर है।
आप भी साथ दें, क्योंकि बात अब हमारे वर्तमान की नहीं है, बल्कि हमारे बच्चों के भविष्य की है और हमारे जमीर की है कि क्या हम नये बनते हुये भारत के निर्माण में अपना योगदान देना चाहते हैं या नहीं।
है न बिलकुल अजीब पोस्ट। ऐसा प्रतीत होता है कि लाइनों में खड़े लोगों की गालियों और सोशल मीडिया पर चल रही फोकटी जंग के बीच उन्हें लगा हो कि मामला वाकई गंभीर है। कदाचित भाजपा विधायक भवानी सिंह राजावत के नोटबंदी के प्रतिकूल वायरल हुए वीडियो, जिसका कि राजावत खंडन कर चुके हैं, को सुन कर उन्हें लगा हो कि अब तो भाजपाई भी दबे स्वर में आलोचना करने लगे। संभव है ऐसे और भी हों, जो पार्टी अनुशासन के कारण ही चुप हों। यदि ऐसा है तो फिर धीरे-धीरे मोदी अकेले पड़ते जाएंगे। उनकी सोच कुछ कुछ उचित जान पड़ती है। वो इसलिए कि मुख्य आलोचना नोटबंदी की नहीं है, बल्कि बिना मजबूत योजना के लागू करने से आम जनता को हो रही परेशानी की है। विपक्ष भी मोटे तौर पर निर्णय के खिलाफ नहीं, बल्कि जनता में मची अफरा तफरी को मुद्दा बना कर मोर्चा संभाले हुए है। भाजपाइयों का बैंकों के बाहर जनसेवा करने का भी मतलब ये है कि सरकार की नाकामी की भरपाई उन्हें करनी पड़ रही है। यानि कि वे भी कहीं न कहीं मन ही मन यह तो स्वीकार कर ही रहे होंगे कि मोदी के इस देशहितकारी कड़े कदम के साइड इफैक्ट पार्टी को नुकसान न पहुंचा दें।
खैर, हो सकता है कि लेखक को लग रहा हो कि विपक्ष के हमलों का बरबस मुकाबला कर रही भाजपा कहीं कमजोर न पड़ जाए। उन्हें लग रहा है कि पचास दिन का वादा पूरा नहीं हो पाएगा। ऐसे में मोदी को पुरजोर समर्थन करना जरूरी है।
हो सकता है कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा में भी कोई अंतर्विरोध चल रहा हो, जिसकी अब तक कोई भनक नहीं पड़ी है, मगर यदि एक सच्चे मोदी भक्त को पूर्वाभास युक्त चिंता सता रही है तो उसे तनिक गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
आगे क्या होगा, अभी से कुछ कहना व्यर्थ है, मगर अपुन को केवल एक बात समझ में आती है कि नोटबंदी का निर्णय भले ही देशहितकारी राजनीतिक कदम हो, मगर मोदी के आर्थिक मामलों के सलाहकारों ने जाने-अनजाने चूक की है। या तो उन्हें खुद ही अंदाजा नहीं था कि हालात इतने खराब हो सकते हैं या फिर अंदाजा होने के बाद भी मोदी के इच्छित फैसले पर चुपचाप सहमति दे दी। और उनकी चूक का खामियाजा आज पूरा देश भुगत रहा है।
-तेजवानी गिरधर
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