तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

शुक्रवार, मार्च 18, 2011

सांसद कोष : मांगने वाले भी खुद ही, देने वाले भी खुद ही, भई वाह !

केन्द्र सरकार ने अंतत: निर्णय कर ही लिया कि सांसद कोष को दो करोड़ से बढ़ा कर पांच करोड़ कर दिया जाए। सरकार ने क्या, सांसदों ने ही निर्णय किया है। मांग करने वाले भी सांसद और मांग पूरी करने वाले भी सांसद। खुद ने खुद को ही सरकारी खजाने से तीन करोड़ रुपए ज्यादा देने का निर्णय कर लिया। सांसद निधि बढ़ाने के निर्णय का कोई और विकल्प है भी नहीं। और दिलचस्प बात ये है कि राजनीतिक विचारधाराओं में लाख भिन्नता के बावजूद इस मसले पर सभी सांसद एकमत हो गए। भला अपने हित के कौन एक नहीं होता। मगर आमजन को यह सवाल करने का अधिकार तो है ही कि जिस मकसद से यह निर्णय किया गया है, वह पूरा होगा भी या नहीं? क्या वास्तव में इसका सदुपयोग होगा?
हालांकि कोष बढ़ाने के निर्णय के साथ यह तर्क दिया गया है कि इससे दूरदराज गांव-ढ़ाणी में रह रहे गरीब का उत्थान होगा, मगर इस तर्क से उस पूरे प्रशासनिक तंत्र पर सवालिया निशान लग जाता है, जो कि वास्तव में सरकार की रीढ़ की हड्डी है। एक सांसद तो फिर भी अपने कार्यकाल में संसदीय क्षेत्र के गांव-गांव ढ़ाणी-ढ़ाणी तक नहीं पहुंच पाता, जबकि प्रशासनिक तंत्र छोटे-छोटे मगरे-ढ़ाणी तक फैला हुआ है। 
सवाल ये उठता है सांसद निधि बढ़ाए जाने के निर्णय से पहले धरातल पर जांच की गई कि क्या वास्तव में सांसद अपने विवेकाधीन कोष का लाभ जरूरतमंद को ही दे रहे हैं? क्या किसी सरकारी एजेंसी से जांच करवाई गई है कि सांसद निधि की बहुत सारी राशि ऐसी संस्थाओं को रेवड़ी की तरह बांट दी जाती है, जिससे व्यक्तिगत का व्यक्तिगत हित सधता है? चाहे वह वोटों के रूप में हो अथवा कमीशनबाजी के रूप में। कमीशनबाजी का खेल काल्पनिक नहीं है, कई बार ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। सवाल ये भी है कि सांसद निधि बढ़ाए जाने से पहले क्या इसकी भी जांच कराई गई कि पहले जो दो करोड़ की राशि थी, वह भी ठीक से काम में ली गई है या नहीं?
हालांकि इस सभी सवालों के मायने यह नहीं है कि सांसद निधि का दुरुपयोग ही होता है, लेकिन यह तो सच है ही कि अनेक सांसद ऐसे हैं जो सांसद निधि का उपयोग करने में रुचि लेते ही नहीं। और जो लेते हैं वे किस तरह से अपने निकटस्थों और उनकी संस्थाओं को ऑब्लाइज करते हैं, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। इस सिलसिले में अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपनों को दे वाली कहावत अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं कही जाएगी। इसके अतिरिक्त जिन संस्थाओं को सांसद कोष से राशि दी जाती है, वे संस्थाएं अमूमन प्रभावशाली लोगों की होती हैं। इनमें पत्रकारों के संगठन व पत्रकार क्लबों को शामिल किया जा सकता है। जयपुर के पिंक सिटी क्लब में भी अनेक सांसदों व विधायकों के कोष की राशि खर्च की गई है। यानि जिन संस्थाओं को राशि दी जाती है, वे उतनी जरूरतमंद नहीं, जितने कि गरीब तबके के लोग। एक उदाहरण और देखिए। अजमेर के दो सांसदों औंकारसिंह लखावत व डॉ. प्रभा ठाकुर ने देशनोक स्थित करणी माता मंदिर के लिए इसलिए अपने कोष से राशि इसीलिए दे दी क्योंकि उन पर अपनी चारण जाति के प्रभावशाली लोगों का दबाव था। या फिर इसे उनकी श्रद्धा की उपमा दी जा सकती है। हालांकि यह सही है कि दोनों सांसदों ने नियमों के मुताबिक ही यह राशि दी होगी, इस कारण इसे चुनौती देना बेमानी होगा, मगर सवाल ये है कि देशभर में इस प्रकार खर्च की गई राशि से ठेठ गरीब आदमी को कितना लाभ मिलता है?
वस्तुस्थिति तो ये है कि इस राशि का उपयोग अपनी राजनीतिक विचारधारा का पोषित के लिए किया जाता है। अनेक सांसदों ने अपनी पार्टी की विचारधारा से संबद्ध दिवंगत अथवा जीवित नेताओं के नाम पर स्मारक, उद्यान आदि बनाने के लिए राशि दी है।
ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे, जिनमें आपको सांसद कोष से बने निर्माणों की दुर्दशा होती हुई मिल जाएगी। अजमेर का ही एक छोटा सा उदाहरण ले लीजिए। तत्कालीन भाजपा सांसद प्रो. रासासिंह रावत ने पत्रकारों को ऑब्लाइज करने के लिए सूचना केन्द्र में छोटा सा पत्रकार भवन बनाया, मगर उसका आज तक उपयोग नहीं हो पाया है। उस पर ताले ही लगे हुए हैं। रखरखाव के अभाव में वह जर्जर होने लगा है।
ऐसे में सांसद निधि को दो करोड़ से बढ़ा कर यकायक पांच करोड़ रुपए कर दिया जाना नि:संदेह नाजायज ही लगता है। सांसदों को अपनी निधि बढ़ाने से पहले ये तो सोचना चाहिए था कि यह पैसा आमजन की मेहनत की कमाई से बने कोष में से निकलेगा। एक ओर गरीबी हमारे देश की लाइलाज बीमारी बन गई है। सरकार के लाख प्रयासों और अनेकानेक योजनाओं के बाद भी बढ़ती जनसंख्या और महंगाई के कारण गरीबी नहीं मिटाई जा सकी है, दूसरी ओर सांसद निधि के नाम पर सरकारी कोष से करीब आठ सौ सांसदों को मिलने वाले अतिरिक्त चौबीस सौ करोड़ रुपए  क्या जायज हैं? खैर, आमजन केवल सवाल ही उठा सकते हैं, उस पर निर्णय करना तो जनप्रतिनिधियों के ही हाथ में है। जब तक ये सवाल उनके दिल को नहीं छू लेते, तब तक कोई भी उम्मीद करना बेमानी है।
-गिरधर तेजवानी

शनिवार, मार्च 12, 2011

हत्या के लिए पुलिस जिम्मेदार कैसे हो गई?

किशनगढ़ के कांग्रेस विधायक नाथूराम सिनोदिया के पुत्र भंवर सिनोदिया का अपहरण होने के बाद हत्या कर दिए जाने पर राजस्थान विधानसभा में भाजपा ने जम कर हंगामा किया। भाजपा विधायकों ने पुलिस पर ढि़लाई का आरोप लगाते हुए गृहमंत्री शांति धारीवाल से इस्तीफे की मांग कर डाली। धारीवाल के जवाब से असंतुष्ट विपक्ष ने सदन का बहिष्कार भी कर दिया। विपक्ष की यह भूमिका यंू तो सहज ही लगती है, मगर गहराई से विचार किया जाए तो यह पूरी तरह से बेमानी ही है।
अव्वल तो ऐसे विवादों में होने वाली हत्याएं सुनियोजित होते हुए भी उसकी जानकारी पुलिस को नहीं होती, जब तक कि संबंधित पक्ष इस प्रकार की आशंका न जाहिर करें। भंवर सिनोदिया की हत्या को भी ऑर्गेनाइज क्राइम की श्रेणी नहीं गिना जा सकता, जिसके बारे में पुलिस को घटना से पहले पता लग जाए। यदि किसी के बीच किसी सौदेबाजी का विवाद हो गया है और उसको लेकर अचानक किसी की हत्या कर दी जाती है, तो पुलिस को सपना कैसे आ सकता है कि इस प्रकार की वारदात हो सकती है? ऐसी हत्या के लिए भी पुलिस को दोषी देने की प्रवृत्ति  कत्तई उचित नहीं कही जा सकती। भला इसमें पुलिस की ढि़लाई कहां से आ गई? पुलिस भला इस हत्या को कैसे रोक सकती थी? रहा सवाल हत्या के बाद पुलिस की भूमिका का तो उसने त्वरित कार्यवाही करके लाश का पता लगा लिया और दो आरोपियों को गिरफ्तार भी कर लिया। इतना ही नहीं उसने कानून-व्यवस्था के मद्देनजर तब हत्या के तथ्य को उजागर नहीं किया, जब तक कि लाश नहीं मिल गई। पुलिस को शाबाशी देना तो दूर, उसे गाली बकने की हमारी आदत सी बन गई है। इससे पुलिस अपना कर्तव्य निर्वहन करने को बाध्य हो न हो, हतोत्साहित जरूर होती है। माना कि विपक्ष को दबाव बनाने के लिए इस प्रकार विरोध जताना पड़ता है, मगर ऐसी हत्या, जिसके लिए न तो पुलिस जिम्मेदार है, न कानून-व्यवस्था और न ही गृहमंत्री, पुलिस को दोषी ठहाराना व गृहमंत्री के इस्तीफे की मांग करना हमारी इस प्रवृत्ति को उजागर करता है कि हंगामा करना ही हमारा मकसद है, हालात से हमारा कोई लेना-देना नहीं है। सवाल ये उठता है कि क्या भाजपा के राज में इस प्रकार ही हत्याएं नहीं हुईं? हालांकि तब कांग्रेस ने भी इसी प्रकार की प्रवृत्ति का इजहार किया था, लेकिन न तो तब के गृहमंत्री ने इस्तीफा दिया और न ही इस सरकार के गृहमंत्री इस्तीफा देने वाले हैं, मगर हमारी आदत है, इस्तीफा मांगने की सो मांगेगे। अकेले राजनीतिक लोग ही नहीं, हमारे मीडिया वाले भी कभी-कभी इस प्रकार की गैरजिम्मेदार हरकत कर बैठते हैं। गुरुवार को जब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सिनोदिया गांव में भंवर सिनोदिया के पिता विधायक नाथूराम सिनोदिया व परिजन को सांत्वना देने पहुंचे तो एक मीडिया वाले यह सवाल दाग दिया कि पहले बीकानेर में युवक कांग्रेस नेता की हत्या और अब विधायक पुत्र की हत्या को आप किस रूप में लेते हैं? एक अन्य  ने पूछा कि क्या इससे ऐसा नहीं लगता कि प्रदेश में कानून-व्यवस्था बिगड़ गई है? जाहिर तौर पर गहलोत को यह कहना पड़ा कि क्राइम तो क्राइम है, इसका राजनीतिक अर्थ नहीं होता। सवाल ये उठता है कि हम सवाल पूछते वक्त ये ख्याल क्यों नहीं रखते कि ऐसे सवाल का क्या उत्तर आना है?  अगर एक ही मामले में राजनीतिक रंजिश के कारण कांग्रेसियों की हत्या होती तो समझ में आ सकता था कि यह सवाल जायज है, मगर ऐसा प्रतीत होता है कि हम केवल कुछ पूछने मात्र के लिए ऐसे सवाल दागते हैं।
बहरहाल, अब जब कि जांच ओएसजी को दी जा चुकी है, उम्मीद की जानी चाहिए कि हत्या के पीछे अकेले व्यक्तिगत या व्यापारिक रंजिश थी, या फिर इसके पीछे कोई राजनीतिक द्वेषता थी, इसका पता लग जाएगा। वैसे पुलिस अब ज्यादा सतर्क होना पड़ेगा, क्योंकि जिस प्रकार विधायक के जवान बेटे की हत्या की गई है, उससे प्रतिहिंसा की आशंका तो उत्पन्न होती ही है।

मंगलवार, मार्च 08, 2011

केवल कांग्रेस पर हमले से बदली बाबा रामदेव के आंदोलन की दिशा

इन दिनों प्रख्यात योग गुरू बाबा रामदेव और कांग्रेस के बीच हो रहा टकराव सुर्खियों में है। जाहिर तौर पर योग को पुनर्स्थापित करने वाले बाबा रामदेव के प्रति श्रद्धा की वजह से अधिसंख्य लोग उनकी तरफदारी करते नजर आ रहे हैं, जबकि राजनीतिज्ञों के प्रति कायम अश्रद्धा की भावना के कारण कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को मानसिक रूप से कुछ विक्षिप्त होने की संज्ञा दी जा रही है। मगर इस जद्दोजहद में बाबा रामदेव की भारत स्वाभिमान वाली मूल मुहिम गलत दिशा में जाती दिखाई दे रही है।
असल में जब तक बाबा रामदेव केवल योग व आयुर्वेद की शिक्षा दे रहे थे, तब तक सभी श्रद्धालु अपनी राजनीतिक विचारधारा को घर पर रख कर आ रहे थे। कांग्रेसी हो या भाजपाई, हिंदू के साथ-साथ प्रगतिशील विचारधारा का मुस्लिम भी बाबा के आगे श्रद्धावनत था। इसके बाद जैसे ही बाबा रामदेव ने जब भ्रष्टाचार और विदेशों में जमा काले धन के खिलाफ मुहिम छेड़ी थी तो वह उनके श्रद्धालुओं को कुछ अटपटी तो लगी, लेकिन चूंकि मुहिम का उद्देश्य पवित्र था और उनके विचारों में एकनिष्ठ देशप्रेम छलक रहा था, इस कारण लोग उन्हें बड़े शौक से सुन रहे थे। उनकी मुहिम राजनीति में व्याप्त अनीति के खिलाफ एक बड़ी जनक्रांति दिखाई दे रही थी। तर्क नीतिगत थे, इस कारण एक साधु के राजनीतिक चर्चा करने को जायज माना जा रहा था। उन्होंने जब राजनीति में शुचिता की खातिर देशभर में रैलियां निकालीं तो लोगों को उनमें जयप्रकाश नारायण के दर्शन होने लगे और ऐसा महसूस किया जाने लगा है कि ऋषि दयानंद सरस्वती के बाद वे एक बड़े समाजोद्धारक के रूप में उभरने लगे हैं। कई दिग्गज बुद्धिजीवियों ने उनका खुल कर समर्थन भी किया, मगर चंद दिन बाद ही ऐसा प्रतीत होने लगा है कि बाबा रामदेव बयानों की दलदल में फंसते नजर आ रहे हैं।
यह सही है कि कांग्रेस को देश पर राज करने का मौका ज्यादा मिला है, उसके नेताओं ने ज्यादा सत्ता सुख भोगा है, इस कारण उनका काला धन विदेशों में अपेक्षाकृत ज्यादा होने की संभावना है। मगर इसका अर्थ ये भी नहीं है कि अकेले कांग्रेस के ही नेता भ्रष्ट हैं। भ्रष्टाचार हमारी रग-रग में शामिल हो चुका है। पूरे तंत्र पर छा गया है। इससे कांग्रेस सहित अन्य कोई भी दल अछूता नहीं है। धर्मनिरपेक्षता और हिंदूवाद की विचारधाराओं के कारण कांग्रेस और भाजपा में नीतिगत अंतर तो नजर आता है, मगर राजनीति में भ्रष्टाचार के मामले में दोनों के बीच कोई अंतर रेखा नजर नहीं आती है। प्रारंभ में बाबा रामदेव जब बिना किसी पक्षपात के भ्रष्ट हो चुके तंत्र पर हमला बोल रहे थे और उसे पलटने के लिए अपने प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारने की बात कर रहे थे, तब यही प्रतीत हो रहा था कि न तो वे केवल कांग्रेस के खिलाफ हैं और न ही भाजपा के प्रति उनका विशेष लगाव है। लेकिन जैसे ही उन्होंने सीधे कांग्रेस व गांधी-नेहरू परिवार पर निशाना साधना शुरू किया है, उनके आंदोलन की दिशा ही बदल गई है। अब ऐसा लगने लगा है कि उनकी पूरी मुहिम केवल कांग्रेेस को सत्ता से बाहर करने के लिए है। संघ और भाजपा की ओर से उनके आंदोलन को समर्थन दिए जाने की वजह से कदाचित बाबा के नहीं चाहते भी वे मात्र कांग्रेस विरोधी दिखाई देने लगे हैं। बुद्धिजीवी बाबा रामदेव और संघ व भाजपा के बीच किसी अंतर्गठजोड़ के सूत्र तलाश रहे हैं।
हालत ये हो गई है कि जो बुद्धिजीवी बाबा रामदेव को महान समाज सुधारक कहते हुए नहीं थक रहे थे, उन्हीं में कुछ बाबा रामदेव के ट्रस्टों का पोस्टमार्टम करने को उतारू हैं। लोगों को इस बात को हजम करने में दिक्कत आ रही है कि कल तक जिस स्वामी रामदेव को वे साइकिल पर घूमता देखते थे, वह अब हैलीकाप्टर में घूमता है और उसके पास दुनिया का अत्याधुनिक आश्रम है। अब ये बातें भी की जाने लगी हैं कि उनके साधकों को ज्यादा दिलचस्पी अपने आरोग्य मे हैं, न कि योगी के मुख से आध्यात्मिक बातों के साथ अचानक राजनीति की कड़वी बातें सुनने में। यहां तक कहा जाने लगा है कि शिष्टाचार, श्रद्दा और विश्वास के चलते जुटी भीड़ के समर्थन का गुमान स्वामी रामदेव को होने लगा है, लेकिन इस भीड़ से उन्हें अप्रत्याशित रूप से वोट के रूप में देशभक्त लोग मिल जायेंगे, ऐसी उम्मीद करनी तो बेमानी ही होगी। सवाल ये भी उठाये जा रहे हैं कि जिस आम आदमी की बात स्वामी रामदेव करते हैं, उसके अन्दर इतना मानसिक और सामाजिक साहस नहीं है कि वह पतंजलि योगपीठ की भव्य ओपीडी में एंट्री भी कर पाए। स्वदेशी आंदोलन पर सर्वाधिक मुखर बाबा रामदेव को मिली लगभग एक दर्जन से ज्यादा विदेशी गाडियां आंखों में चुभने लगी हैं। प्रश्न ये भी उठाया जा रहा है कि जिन भ्रष्ट राजनीतिकों पर बाबा हमले पर हमले करते रहे हैं, उन्हीं पर अपनी पकड़ का प्रदर्शन करने के लिए विभिन्न सेवा प्रकल्पों के शिलान्यास समारोहों में मुख्यमंत्रियों को बुलाते रहे हैं। इन बड़े नेताओं में वे चेहरे भी शामिल हैं, जिन पर देश की अदालतों में घोटालों के मुकदमे भी चल रहे हैं।
विवादग्रसत हो चुके बाबा रामदेव को एक बार फिर अपनी मुहिम पर पुनर्विचार करना होगा। आशाभरी निगाहों से बाबा रामदेव को देख रहे करोड़ों भारतीयों की निष्ठा उनमें बनी रहे, इसके लिए जरूरी है कि बाबा बयानबाजी और विवादों से बचें। हालांकि हमारे अन्य आध्यात्मिक व धार्मिक गुरू भी राजनीति में शुचिता पर बोलते रहे हैं। मगर बाबा रामदेव जितने आक्रामक हो उठे हैं और देश के उद्धार के लिए खुल कर राजनीति में आने का आतुर हैं, उसमें उनको कितनी सफलता हासिल होगी, ये तो वक्त ही बताएगा, मगर योग गुरू के रूप में उन्होंने जो अंतरराष्ट्रीय ख्याति व प्रतिष्ठा अर्जित की है, उस पर आंच आती साफ दिखाई दे रही है। यदि समय रहते बाबा रामदेव ने आंदोलन की दिशा पर ध्यान नहीं दिया तो खतरा इस बात का ज्यादा है कि उत्थान और पतन की कहानियों अटे पड़े इस देश में वे भी इतिहास का विषय बन जाएंगे

बुधवार, मार्च 02, 2011

वसुंधरा की वापसी से आएगी भाजपा में जान

लंबी जद्दोजहद के बाद आखिरकार भाजपा हाईकमान को भले ही अपने पूर्व के निर्णय को वापस लेना पड़ा हो, मगर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को फिर से विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाने से पार्टी में नई जान आने की पूरी संभावना है। पार्टी के और मजबूत होने से तात्पर्य सिर्फ इतना है कि यदि विपक्ष मजबूत होगा तो सरकार भी सतर्कता और सावधानी से काम करेगी।
हालांकि भाजपा हाईकमान के लिए यह एक विडंबनापूर्ण स्थिति ही थी कि उसे तकरीबन एक साल तक विधानसभा में विपक्ष का नेता पद खाली रखने के बाद भी आखिरकार श्रीमती वसुंधरा को ही फिर स्वीकार करना पड़ा। वस्तुत: यह पद खाली था ही इस कारण कि पार्टी में गतिरोध बना हुआ था। संघ लॉबी ने बमुश्किल वसुंधरा राजे को पद से इस्तीफा दिलवाया था, इस कारण उनके दुबारा काबिज होने के लिए कत्तई तैयार ही नहीं था। हाईकमान को उम्मीद थी कि मसले को थोड़ा लंबा खींचा जाएगा तो वसुंधरा राजे समझौतावादी रुख अपना लेंगी। उनका प्रदेश से ध्यान बंटाने के लिए राष्ट्रीय महासचिव भी बनाया, लेकिन चूंकि वसुंधरा राजे के समर्थक विधायकों में उनके सिवाय किसी पर सहमति बन ही नहीं रही थी, इस कारण हाईकमान को मजबूर होना पड़ा। आखिर में तो स्थिति यहां तक आ गई थी वसुंधरा खुद तो प्रदेश अध्यक्ष बन कर पार्टी पर काबिज होना चाहती थीं और विपक्ष के नेता पद पर अपने ही किसी समर्थक विधायक को बैठाना चाहती थीं। यही वजह रही कि वे आखिरी क्षण तक विधायक दल का नेता बनने को राजी नहीं हो रही थीं। पूर्व प्रधानमंत्री व भाजपा के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी के विशेष आग्रह पर उन्होंने पद ग्रहण किया।
जरा पीछे मुड़ कर देखें तो विधानसभा में विपक्ष का नेता पद खाली होने और वसुंधरा समर्थकों व शहर भाजपा अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी के बीच एक विभाजक रेखा सी खिंच जाने के कारण पार्टी कार्यकर्ता निरुत्साहित सा बैठा था। प्रदेश में पार्टी संगठन की कमान चतुर्वेदी को देने के बाद भी वे श्रीमती वसुंधरा राजे के सामने कमजोर स्थिति में थे।   वसुंधरा राजे कितनी प्रभावशाली थीं, इसकी कल्पना इसी से की जा सकता है कि राज्यसभा चुनाव में दौरान वे पार्टी की राह से अलग चलने वाले राम जेठमलानी को न केवल पार्टी का अधिकृत प्रत्याशी बनवा लाईं, अपितु चतुराई व साम-दाम-दंड-भेद से उन्हें जितवा भी दिया। जेठमलानी को जितवा कर लाने से ही साफ हो गया था कि प्रदेश में दिखाने भर को अरुण चतुर्वेदी के पास पार्टी की कमान है, मगर असली ताकत श्रीमती वसुंधरा के पास है। आम भाजपाइयों में भी वसुंधरा के प्रति स्वीकारोक्ति ज्यादा थी। कुल मिला कर पार्टी का कार्यकर्ता असमंजस में था और प्रदेश में दमदार विपक्ष न होने के कारण कांग्रेस भी लापरवाह हो चली थी। इसका परिणाम ये हुआ कि प्रदेश के विकास में शिथिलता आने लगी थी। 
अब जब कि वसुंधरा फिर से अपनी पुरानी भूमिका में आ चुकी हैं, कार्यकर्ताओं में तो उत्साह का संचार हुआ ही है, कांग्रेस भी सकते में आ गई है। चूंकि वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री रह चुकी हैं और अशोक गहलोत सरकार कैसा काम कर रही है, इसको भलीभांति समझती हैं कि सरकार को किस प्रकार से घेरना है। कांग्रेस भी जानती है कि वसुंधरा का व्यक्तित्व आकर्षक है और अब अगर सावधानी नहीं बरती गई तो आगामी चुनाव आने तक कांग्रेस का जनाधार खिसक जाएगा। ऐसे में वह खुद-ब-खुद सतर्क हो गई है। अब उसके मंत्री पहले जैसी लापरवाही और ऊलजलूल हरकतें करेंगे तो ज्यादा परेशानी में आएंगे। इस कारण अब उसका जोर भी पूरी तरह से विकास पर होने की उम्मीद की जा रही है। कुल मिला कर प्रदेश भाजपा के ढ़ांचे में इस परिवर्तन को कांग्रेस में भी सुधार होने के साथ सरकार का ध्यान जनहित पर रहेगा। अगर उसने लापरवाही बरती तो वसुंधरा फिर से सत्ता पर काबिज होने को आतुर हैंं।

सोमवार, फ़रवरी 28, 2011

कहीं खुद की चाल भी न भूल जाएं बाबा रामदेव

एक कहावत है- कौआ चला हंस की चाल, खुद की चाल भी भूल गया। हालांकि यह पक्के तौर पर अभी से नहीं कहा जा सकता कि प्रख्यात योग गुरू बाबा रामदेव की भी वैसी ही हालत होगी, मगर इन दिनों वे जो चाल चल रहे हैं, उसमें अंदेशा इसी बात का ज्यादा है।
हालांकि हमारे लोकतांत्रिक देश में किसी भी विषय पर किसी को भी विचार रखने की आजादी है। इस लिहाज से बाबा रामदेव को भी पूरा अधिकार है। विशेष रूप से देशहित में काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलना और उसके प्रति जनता में जागृति भी स्वागत योग्य है। इसी वजह से कुछ लोग तो बाबा में जयप्रकाश नारायण तक के दर्शन करने लगे हैं। हमारे अन्य आध्यात्मिक व धार्मिक गुरू भी राजनीति में शुचिता पर बोलते रहे हैं। मगर बाबा रामदेव जितने आक्रामक हो उठे हैं और देश के उद्धार के लिए खुल कर राजनीति में आने का आतुर हैं, उसमें उनको कितनी सफलता हासिल होगी, ये तो वक्त ही बताएगा, मगर योग गुरू के रूप में उन्होंने जो अंतरराष्ट्रीय ख्याति व प्रतिष्ठा अर्जित की है, उस पर आंच आती साफ दिखाई दे रही है। गुरुतुल्य कोई शख्स राजनीति का मार्गदर्शन करे तब तक तो उचित ही प्रतीत होता है, किंतु अगर वह स्वयं ही राजनीति में आना चाहता है तो फिर कितनी भी कोशिश करे, काजल की कोठरी में काला दाग लगना अवश्यंभावी है।
यह सर्वविदित ही है कि जब वे केवल योग की बात करते हैं तो उसमें कोई विवाद नहीं करता, लेकिन भगवा वस्त्रों के प्रति आम आदमी की श्रद्धा का नाजायज फायदा उठाते हुए राजनीतिक टीका-टिप्पणी करेंगे तो उन्हें भी वैसी ही टिप्पणियों का सामना करना होगा। ऐसा नहीं हो सकता कि केवल वे ही हमला करते रहेंगे, अन्य भी उन पर हमला बोलेंगे। इसमें फिर उनके अनुयाइयों को बुरा नहीं लगना चाहिए। स्वाभाविक सी बात है कि उन्हें हमले का विशेषाधिकार कैसे दिया जा सकता है?
हालांकि काले धन के बारे में बोलते हुए वे व्यवस्था पर ही चोट करते हैं, लेकिन गाहे-बगाहे नेहरू-गांधी परिवार को ही निशाना बना बैठते हैं। शनै: शनै: उनकी भाषा भी कटु होती जा रही है, जिसमें दंभ साफ नजर आता है, इसका नतीजा ये है कि अब कांग्रेस भी उन पर निशाना साधने लगी है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने तो बाबा रामदेव के ट्रस्ट, आश्रम और देशभर में फैली उनकी संपत्तियों पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। हालांकि यह सही है कि ये संपत्तियां बाबा रामदेव के नाम पर अथवा निजी नहीं हैं, मगर चंद वर्षों में ही उनकी सालाना आमदनी 400 करोड़ रुपए तक पहुंचने का तथ्य चौंकाने वाला ही है। बताया तो ये भी जा रहा है कि कुछ टीवी चैनलों में भी बाबा की भागीदारी है। बाबा के पास स्कॉटलैंड में दो मिलियन पौंड की कीमत का एक टापू भी बताया जाता है, हालांकि उनका कहना है वह किसी दानदाता दंपत्ति ने उन्हें भेंट किया है। भले ही बाबा ने खुद के नाम पर एक भी पैसा नहीं किया हो, मगर इतनी अपार धन संपदा ईमानदारों की आमदनी से तो आई हुई नहीं मानी जा सकती। निश्चित रूप से इसमें काले धन का योगदान है। इस लिहाज से पूंजीवाद का विरोध करने वाले बाबा खुद भी परोक्ष रूप से पूंजीपति हो गए हैं। और इसी पूंजी के दम पर वे चुनाव लड़वाएंगे।
ऐसा प्रतीत होता है कि योग और स्वास्थ्य की प्रभावी शिक्षा के कारण करोड़ों लोगों के उनके अनुयायी बनने से बाबा भ्रम में पड़ गए हैं।   उन्हें ऐसा लगने लगा है कि आगामी चुनाव में जब वे अपने प्रत्याशी मैदान उतारेंगे तो वे सभी अनुयायी उनके मतदाता बन जाएंगे। योग के मामले में भले ही लोग राजनीतिक विचारधारा का परित्याग कर सहज भाव से उनके इर्द-गिर्द जमा हो रहे हैं, लेकिन जैसे ही वे राजनीति का चोला धारण करेंगे, लोगों का रवैया भी बदल जाएगा। आगे चल कर हिंदूवादी विचारधारा वाली भाजपा को भी उनसे परहेज रखने की नौबत आ सकती है, क्योंकि उनके अनुयाइयों में अधिसंख्य हिंदूवादी विचारधारा के लोग हैं, जो बाबा के आह्वान पर उनके साथ होते हैं तो सीधे-सीधे भाजपा को नुकसान होगा। कदाचित इसी वजह से 30 जनवरी को देशभर में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनयुद्ध अभियान के तहत निकाली गई जनचेतना रैलियों को भाजपा या आरएसएस ने खुल कर समर्थन नहीं दिया। बाबा रामदेव के प्रति व्यक्तिगत श्रद्धा रखने वाले लोग भले ही रैलियों में शामिल हुए हों, मगर चुनाव के वक्त वे सभी बाबा की ओर से खड़े किए गए प्रत्याशियों को ही वोट देंगे, इसमें तनिक संदेह ही है। इसकी एक वजह ये है कि वे योग गुरू के रूप में भले ही बाबा रामदेव को पूजते हों, मगर राजनीतिक रूप से उनकी प्रतिबद्धता भाजपा के साथ रही है।
जहां तक देश के मौजूदा राजनीतिक हालात का सवाल है, उसमें शुचिता, ईमानदारी व पारदर्शिता की बातें लगती तो रुचिकर हैं, मगर उससे कोई बड़ा बदलाव आ जाएगा, इस बात की संभावना कम ही है। ऐसा नहीं कि वे ऐसा प्रयास करने वाले पहले संत है, उनसे पहले करपात्रीजी महाराज और जयगुरुदेव ने भी अलख जगाने की पूरी कोशिश की, मगर उनका क्या हश्र हुआ, यह किसी ने छिपा हुआ नहीं है।  इसी प्रकार राजनीति में आने से पहले स्वामी चिन्मयानंद, रामविलास वेदांती, योगी आदित्यनाथ, साध्वी ऋतंभरा और सतपाल महाराज के प्रति कितनी आस्था थी, मगर अब उनमें लोगों की कितनी श्रद्धा है, यह भी सब जानते हैं। कहीं ऐसा न हो कि बाबा रामदेव भी न तो पूरे राजनीतिज्ञ हो पाएं और न ही योग गुरू जैसे ऊंचे आसन की गरिमा कायम रख पाएं।

आखिर वसुंधरा का तोड़ नहीं निकाल पाया भाजपा हाईकमान

अपने आपको सर्वाधिक अनुशासित बता कर च्पार्टी विद द डिफ्रेंसज् का नारा बुलंद करने वाली भाजपा का शीर्ष नेतृत्व आखिरकार पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे के आगे नतमस्तक हो गया। हालत ये हो गई कि वे राजस्थान विधानसभा में विपक्ष का नेता दुबारा बनने को तैयार नहीं थीं और बड़े नेताओं को उन्हें राजी करने के लिए काफी अनुनय-विनय करना पड़ा। इसे राजस्थान भाजपा में व्यक्ति के पार्टी से ऊपर होने की संज्ञा दी जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। कैसी विलक्षण स्थिति है कि एक साल पहले जिस वसुंधरा को विपक्ष का नेता पद छोडऩे के लिए हाईकमान मजबूर कर रहा था, वही उनका तोड़ नहीं निकाल पाने के कारण अंतत: पुन: उन्हीं को यह आसन ग्रहण करने की विनती करने को मजबूर हो गया। प्रदेश भाजपा के इतिहास में वर्षों तक यह बात रेखांकित की जाती रहेगी कि हटाने और दुबारा बनाने, दोनों मामलों में पार्टी को झुकना पड़ा। पार्टी के कोण से इसे थूक कर चाटने वाली हालत की उपमा दी जाए तो गलत नहीं होगा। चाटना क्या, निगलना तक पड़ा।
वस्तुत: राजस्थान में वसु मैडम की पार्टी विधायकों पर इतनी गहरी पकड़ है कि हाईकमान को एक साल पहले विपक्ष का नेता पद छुड़वाने के लिए एडी चोटी का जोर लगाना पड़ा। असल बात तो ये कि उन्होंने पद छोड़ा ही न छोडऩे के अंदाज में। इसका नतीजा ये रहा कि उनके इस्तीफे के बाद किसी और को नेता नहीं बनाया जा सका और जब बनाया गया तो भी उन्हीं को, जबकि वे तैयार नहीं थीं। आखिर तक वे यही कहती रहीं कि यदि बनाना ही था तो फिर हटाया ही क्यों।
पार्टी हाईकमान वसुंधरा को फिर से विपक्ष नेता बनाने को यूं ही तैयार नहीं हुआ है। उन्हें कई बार परखा गया है। पार्टी ने जब अरुण चतुर्वेदी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया, तब भी वे दबाव में नहीं आईं और पार्टी का एक बड़ा धड़ा अनुशासन की परवाह किए बिना वसुंधरा खेमे में ही बना रहा। ये उनकी ताकत का ही प्रमाण है कि राज्यसभा चुनाव में दौरान वे पार्टी की राह से अलग चलने वाले राम जेठमलानी को न केवल पार्टी का अधिकृत प्रत्याशी बनवा लाईं, अपितु अपनी कूटनीतिक चालों से उन्हें जितवा भी दिया। ये वही जेठमलानी हैं, जिन्होंने भाजपाइयों के आदर्श वीर सावरकर की तुलना पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना से की, जिन्ना को इंच-इंच धर्मनिरपेक्ष तक करार दिया, पार्टी की मनाही के बाद इंदिरा गांधी के हत्यारों का केस लड़ा, संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु को फांसी नहीं देने की वकालत की और पार्टी के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ ही चुनाव मैदान में उतर गए। जेठमलानी को जितवा कर लाने से ही साफ हो गया था कि प्रदेश में दिखाने भर को अरुण चतुर्वेदी के पास पार्टी की फं्रैचाइजी है, मगर असली मालिक श्रीमती वसुंधरा ही हैं। चतुर्वेदी ने भी चालें कम नहीं चलीं, मगर विधायकों पर वसुंधरा के तिलिस्म को भंग नहीं कर पाए। वसुंधरा के आभा मंडल के आकर्षण का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पार्टी में पद चाहने वाले भी चतुर्वेदी से छुप-छुप कर ही मिलते रहे कि कहीं वसुंधरा को पता न लग जाए, क्यों कि आने वाले दिनों में वसुंधरा के फिर से मजबूत होने के पूरे आसार हैं। आम भाजपाइयों में भी वसुंधरा के प्रति स्वीकारोक्ति ज्यादा है। प्रदेश में जहां भी जाती हैं, कार्यकर्ता और भाजपा मानसिकता के लोग उनके स्वागत के लिए पलक पांवड़े बिछा देते हैं।
हालांकि हाईकमान को वसुंधरा की ताकत का अंदाजा था, मगर संघ लॉबी के दबाव की वजह से वह सी एंड वाच की नीति बनाए हुए था। जब उसे यह पूरी तरह से समझ में आ गया कि वसुंधरा को दबाया जाना कत्तई संभव नहीं है और वीणा के तार ज्यादा खींचे तो वे टूट ही जाएंगे तो मजबूर हो कर उसे शरणागत होना पड़ा। जहां तक संघ का सवाल है, उसकी सोच ये रही कि वसुंधरा के पावरफुल रहते पार्टी का मौलिक चरित्र कायम रखना संभव नहीं है। संघ का ये भी मानना रहा कि वसुंधरा की कार्यशैली के कारण ही भाजपा की पार्टी विथ द डिफ्रंस की छवि समाप्त हुई। उन्होंने पार्टी की वर्षों से सेवा करने वालों को हाशिये पर खड़ा कर दिया, उन्हें खंडहर तक की संज्ञा देने लगीं, जिससे कर्मठ कार्यकर्ता का मनोबल टूट गया। यही वजह रही कि वह आखिरी क्षण तक इसी कोशिश में रहा कि वसुंधरा दुबारा विपक्ष का नेता न बनें, मगर आखिरकार झुक गया।
कुल मिला कर ताजा घटनाक्रम से तो यह पूरी तरह से स्थापित हो गया है के वे प्रदेश भाजपा में ऐसी क्षत्रप बन कर स्थापित हो चुकी हैं, जिसका पार्टी हाईकमान के पास कोई तोड़ नहीं है। उनकी टक्कर का एक भी ग्लेमरस नेता पार्टी में नहीं है, जो जननेता कहलाने योग्य हो। अब यह भी स्पष्ट हो गया है कि आगामी विधानसभा चुनाव में केवल वे ही पार्टी की नैया पार कर सकती हैं।
-गिरधर तेजवानी