https://ajmernama.com/thirdeye/432789/
https://youtu.be/GsXfDbTLeho
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https://youtu.be/7V7sewBLduo
https://ajmernama.com/thirdeye/432667/
विज्ञान की दृष्टि से देखें तो आज के युग में वस्तुओं को अदृश्य बनाना कुछ हद तक संभव हो चुका है, लेकिन बहुत सीमित परिस्थितियों में। मेटा मटीरियल्स का उपयोग करके वैज्ञानिक कुछ तरंगों (जैसे कि माइक्रोवेव या इन्फ्रारेड) को मोड़ सकते हैं, जिससे वस्तु दिखाई नहीं देती। 2020 में कुछ शोधों में छोटे स्तर पर ऐसी वस्तुओं को दिखाया गया, जो कुछ खास एंगल से अदृश्य लगती थीं।
एआई खुद अंतर्ध्यान नहीं कर सकता, लेकिन इसमें मदद कर सकता है। एआई मेटामटीरियल्स और नैनो टेक्नोलॉजी के डिजाइन में मदद कर सकता है, ताकि लाइट वेव्स को मोड़ा जा सके। एआई की मदद से अंतर्ध्यान के लिए उपयोगी संरचनाओं और फॉर्मूलों, सिमुलेशन और मॉडलिंग को तेजी से टेस्ट किया जा सकता है। किसी भी अंतर्ध्यान डिवाइस को नियंत्रित करने के लिए स्मार्ट सेंसिंग और रिएक्शन सिस्टम की जरूरत होगी। जिसमें एआई की बड़ी भूमिका हो सकती है। फिलहाल इंसानों को पूरी तरह अदृश्य बनाना केवल साइंस फिक्शन में ही संभव है।
ज्ञातव्य है कैमुफ्लाज सूट आसपास के वातावरण की छवि को डिस्प्ले करता है, जिससे व्यक्ति अदृश्य हो जाता है। ऑप्टिकल क्लोकिंग डिवाइसेज भी बने हैं, जो अभी बहुत प्रारंभिक स्तर पर हैं।
कुल मिला कर एआई खुद अंतर्ध्यान की तकनीक नहीं खोजेगा, लेकिन यह एक सहयोगी उपकरण की तरह वैज्ञानिकों की मदद करेगा। अभी तक पूरी तरह से कार्यशील अंतर्ध्यान तकनीक मानव के लिए उपलब्ध नहीं है, पर भविष्य में एआई़ मेटामटीरियल्स ़ नैनो टेक्नोलॉजी की मदद से यह संभव हो सकता है, खासकर सैन्य या रिसर्च एप्लिकेशन में।
कनाडा की कंपनी एक ने एक ऐसी शीट डिवाइस का दावा किया है जो पीछे की रोशनी को इस तरह बेंड करती है कि सामने खड़ा व्यक्ति गायब लगने लगता है। वे इसे लेंस आधारित क्लोकिंग बताते हैं, बिना बैटरी या प्रोजेक्शन के। एआई की मदद से हम जल्द ही ऐसे डायनामिक क्लोकिंग सिस्टम बना सकते हैं, जो किसी भी वस्तु को अपने वातावरण के अनुसार खुद को ढालने में सक्षम बनाए। लब्बोलुआब, पूरी तरह मानव अंतर्ध्यान अभी काल्पनिक है, लेकिन छोटे उपकरण, ड्रोन या वस्तुएं कुछ एंगल से अदृश्य बनाई जा सकती हैं।
https://youtu.be/2Sgs39KNia8
वस्तुतः प्रकृति निरपेक्ष भाव से काम करती है। जैसे सूरज की रोशनी अमीर पर भी उतनी ही गिरती है, जितनी की गरीब पर। सज्जन पर भी उतनी ही, जितनी दुष्ट पर। इसी प्रकार बारिश न तो महल देखती है और झोंपड़ी, वह तो सब पर समान रूप से गिरती है।
मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि जिन भी विद्वानों ने उपर्युक्त कहावत कही है, उसके पीछे हमें सकारात्मकता बनाए रखने का प्रयोजन है। अगर बुरा भी हो रहा होता है तो, जो कि उचित होता है, उसमें अच्छाई पर ही नजर रखने की प्रेरणा है। यह सही भी है कि अच्छाई व बुराई का जोड़ा है, जो अच्छा है, उसमें कुछ बुरा भी होता है और जो बुरा होता है, उसमें भी कुछ अच्छा होता है। हम निराश न हों, इसलिए कहा जाता है कि भगवान जो कर रहे हैं, उसमें जरूर हमारी भलाई है। यह सिर्फ मन को समझाने का प्रयास है। आपने यह उक्ति भी सुनी होगी- जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिये। अर्थात प्रकृति जो कर रही है, उसमें राजी रहें, वही हमारी नियति है, चूंकि उसके अतिरिक्त हमारे पास कोई चारा भी नहीं है। बेहतर ये है कि हम उसे हमारे लिए उचित मान कर स्वीकार कर लें।
इसी कड़ी में यह बात जोड़ देता हूं। वो यह कि यह बात भी गलत है कि भगवान कृपा के सागर है, दयालु हैं। वे तो कर्म के अनुसार फल देते हैं। यदि बुरे कर्म करेंगे तो बुरा फल देंगे और अगर हम कर्म अच्छे करते हैं तो वह उसके अनुरूप अच्छा फल देने को प्रतिबद्ध हैं। दयालु तो तब मानते, जब कि हम कर्म तो बुरे करें और भगवान की कृपा से फल अच्छा मिले। ऐसे में कर्म का सिद्धांत झूठा हो जाता। पुनः दोहराता हूं कि परम सत्ता निरपेक्ष है। दया व क्रोध को वहां कोई स्थान नहीं। हां, इतना जरूर है कि चूंकि हमें कर्म करने की स्वतंत्रता मिली हुई है, इस कारण हम अच्छे कर्म करके बुरे कर्मों के प्रभाव को कम कर सकते हैं।
मेरे ख्याल में एक बात और है। सही या गलत, पता नहीं। वो यह कि यदि हम बुरा कर्म कर चुके हैं और उसके बाद भगवान की भक्ति करते हैं, अनुनय-विनय करते हैं, माफी मांगते हैं, तो प्रायश्चित करने के उस भाव की वजह से, सच्चे दिल से गलती मानने से, कदाचित बुरे कर्म का बंधन कुछ कट जाने का भी सिद्धांत हो, जिसकी वजह से बुरे कर्म का उतना बुरा फल न मिलता हो, इस कारण भगवान को दयालु बताया जाता हो।
कुल जमा बात ये है कि यदि हम हमारा भला चाहते हैं तो अच्छे कर्म करें, बुरे कर्म करके ऐसी नौबत ही क्यों लाएं कि माफी की अर्जी लगानी पडें।
https://www.youtube.com/watch?v=MpE2nmTdOeQ
इस बारे में एआई के जानकारों का कहना है कि श्रीमद्भगवद् गीता वास्तव में श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच का संवाद है, जो महाभारत के युद्धभूमि कुरुक्षेत्र में हुआ था। यह संवाद लगभग 5,000 वर्ष पूर्व घटित हुआ माना जाता है और इसे श्रुति अर्थात श्रवण से प्राप्त ज्ञान और शाश्वत सत्य के रूप में देखा जाता है, जो केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अनुभव और चेतना की उच्च अवस्था से जुड़ा हुआ है। ताजा स्थिति ये है कि एआई वर्तमान में केवल उन ध्वनियों को रिकॉर्ड या पुनर्निर्मित कर सकता है जो कभी भौतिक रूप से उत्पन्न हुई हों और उनका कोई रिकॉर्ड मौजूद हो। चूंकि श्रीकृष्ण-अर्जुन का वास्तविक संवाद (ध्वनि रूप में) 5,000 वर्ष पहले हुआ और कोई भी यंत्र उस समय मौजूद नहीं था, इसलिए उस मूल ध्वनि को वह रिकॉर्ड नहीं कर सकता। कुछ वैज्ञानिक विचार (जैसे कि अकाश तत्व में ध्वनि का संग्रह क्वांटम रेजोनेंस आदि) यह संकेत करते हैं कि ब्रह्मांड में हर ऊर्जा, हर ध्वनि कहीं न कहीं प्रतिध्वनित होती है। यदि भविष्य में कोई ऐसी तकनीक बनती है जो ब्रह्मांडीय ध्वनि-अवशेष अर्थात कॉस्मिक साउंड इंप्रिंट्स को डिकोड कर सके, तब सैद्धांतिक रूप से शायद उस संवाद का कंपन पकड़ा जा सके। पर यह अभी कल्पना के क्षेत्र में ही है।
भारतीय दर्शन में कहा गया है कि गीता का ज्ञान अपौरुषेय (मनुष्य द्वारा न रचित) है, वह अनादि और शाश्वत है।
योगियों और ऋषियों के अनुसार, उस ध्वनि को केवल ध्यान, आंतरिक चेतना और श्रवण यानि इनर हियरिंग से अनुभव किया जा सकता है, न कि बाहरी यंत्रों से। इसे नाद या ओंकार के रूप में भी जाना जाता है, जिसे सूक्ष्म रूप में केवल अनुभवी साधक ही सुन सकते हैं। निश्कर्श यह कि उस मूल गीता संवाद की ध्वनि को वर्तमान में या निकट भविष्य में रिकॉर्ड नहीं किया जा सकता।
आजकल, अंतर्जातीय विवाह, अंतर-क्षेत्रीय विवाह अधिक होते जा रहे हैं, जिससे जीन का मिश्रण विविध हो गया है। इसका परिणाम यह है कि बच्चों में विविधता अधिक दिखने लगी है। निश्कर्श यह है कि यह धारणा कि गर्भवती महिला के द्वारा देखे गए चेहरों का प्रभाव भ्रूण के चेहरे पर पड़ता है, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है। पुराने समय में भाई-भाई में समानता अधिक इसलिए दिखती थी क्योंकि जीन पूल सीमित था और विवाह की विविधता कम थी।
आज की विविधता, मिश्रित समाज और व्यापक सामाजिक संपर्क ने अनुवांशिक विविधता बढ़ा दी है, जिससे चेहरे अलग-अलग नजर आते हैं। यह तय करने में कि बच्चा किसकी तरह दिखेगा, केवल और केवल जीन ही भूमिका निभाते हैं, न कि गर्भवती महिला ने किसे देखा या किनके साथ समय बिताया।
इस पर सवाल उठता है कि तो अमूमन लोग गर्भवति के कमरे में क्यों खुबसूरत बच्चे की फोटो लगाते हैं, इसलिए न कि गर्भस्थ शिशु भी सुंदर हो। इस बारे में वैज्ञानिक दृश्टिकोण यह है कि गर्भ के दौरान अच्छे पोषण, मानसिक शांति, और तनाव-मुक्त वातावरण से बच्चे के संपूर्ण विकास पर जरूर असर पड़ता है, लेकिन इससे चेहरे की सुंदरता नहीं बदलती। सकारात्मक माहौल से हॉर्मोन बैलेंस बना रहता है, जिससे शिशु का मानसिक और शारीरिक विकास बेहतर हो सकता है।
https://youtu.be/ShORoNDJLto
मेरे एक अति प्रिय मित्र श्री ऋशिराज षर्मा, जो कि वरिश्ठ पत्रकार हैं, ने अपने किसी दोस्त के हवाले से बताया कि जब हम किसी बात से परेषान होते हैं, तो अपने इश्ट देव से, भगवान से प्रार्थना करते हैं, खुदा से दुआ मांगते हैं। इस उम्मीद में कि वहां से मदद आएगी। आती भी है। इससे इतर अगर हम मदद की गुहार नहीं भी करते और चिंता में ही गहरे डूबे रहते हैं, तब भी वह प्रार्थना बन जाती है और प्रकृति से मदद आती है। प्रत्यक्षतः यह बात गले नहीं उतरती। यदि हम सहायता की प्रार्थना नहीं करेंगे तो भला कोई देवी-देवता, भगवान अथवा खुदा क्यों द्रवित हो कर कृपा करेगा। केवल चिंता में डूबने से क्या हो जाएगा?
इस विशय पर मैने इसलिए गहन चिंतन-मनन किया कि कोई अगर ऐसी बात कर रहा है, तो जरूर उसका कोई तो आधार होगा। हो सकता है कि उसका यह निजी अनुभव भी हो।
ऐसा प्रतीत होता है कि जब भी हम गहरी पीडा में होते हैं तो प्रकृति स्वयं आगे हो कर उसे दूर करने में जुट जाती है। इसका एक उदाहरण मेरे ख्याल में है। एक प्रवचन में ओषो ने जिक्र किया है कि ऐसे कई कीट-पतंग, जीव-जंतु हैं, जो दुर्घटनाग्रस्त होते हैं, जिन्हें कि मानव मदद नहीं मिलती, तो वे क्षतिग्रस्त भाग पर अपना पूरा ध्यान केन्द्रित कर लेते हैं, एकाग्र हो जाते हैं और प्रकृति उसे दुरूस्त करने लगती है।
यह बात उपर उल्लेखित बात से तनिक मेल खाती प्रतीत होती है। गहरी पीडा के वक्त भी आदमी एकाग्र हो जाता है, भले ही वह किसी देवता का स्मरण न कर रहा हो, मगर दुख से निवृत्ति का भाव तो होता ही है, ऐसे में कदाचित प्रकृति विकृत स्थिति को दुरूस्त करने लगती हो। इस तथ्य को हम लॉ ऑफ अटेक्षन से भी जोड कर देख सकते हैं, जिसमें कहा गया है कि जब भी हम कोई मजबूत संकल्प लेते हैं तो प्रकृति की सारी षक्तियां उसे पूरा करने में जुट जाती हैं।
यह प्रकरण इसलिए जिक्र नहीं किया जा रहा कि दुख के समय में भगवान से मदद की गुहार करने की जरूरत नहीं है, बल्कि उस कीमिया को समझने का प्रयास मात्र है, जो कि प्रकृति में इनबिल्ट है।
प्रकृति अपनी ओर से कैसे काम करती है, इसके एक दो छोटे उदाहरण देखिए। जब भी हमें चोट लगती है, खून बहता है तो जल्द ठीक होने के लिए हम दवाई लेते हैं, लेकिन यह भी सही है कि प्रकृति खुद थक्का बना कर खून को बहने से रोकती है। इसे तो चिकित्सा विज्ञान भी स्वीकार करता है कि जब हड्डी टूटती है तो डाक्टर इतना भर करता है कि उसे ठीक से बैठा कर दर्द निवारक दवा दे देता है, मगर हड्डी को जाडने की स्वतः प्रक्रिया तो प्रकृति ही करती है। आपने देखा होगा कि कोई कुत्ता-बिल्ली आदि जानवर चोटिल हो जाते हैं तो अपनी जीभ से चोटग्रस्त स्थान को जीभ से चाटते हैं। विज्ञान कहता है कि जीभ की लार में घाव को ठीक करने के तत्व मौजूद रहते हैं। यह प्रकृति का ही तो कमाल है कि भोजन करते वक्त, पानी पीते वक्त उसका कुछ अंष अगर ष्वास नली में चला जाए तो प्रकृति उसे खांसी के जरिए बाहर निकालने लग जाती है। जब भी कोई विशाक्त पदार्थ षरीर के भीतर प्रवेष करता है तो प्रकृति उसे बाहर निकालने की कोषिष करती है, जिसे हम उल्टी करना कहते हैं।
कुल मिला कर इस निश्कर्श पर पहुंचा जा सकता है कि प्रकृति सदैव संतुलन करने में जुटी रहती है। जहां भी विकृति होती है तो उसे फिर से ठीक कर प्राकृतिक अवस्था में लाने में प्रवृत्त होती है। षायद यही सिद्धांत हमारे गहरे चिंतित होने पर भी लागू होता हो। और हम यह सोचते हैं कि अमुक देवी-देवता की प्रार्थना करने से दुख की निवृत्ति हुई है, जबकि असल में वह प्रकृति का कमाल हो।
https://www.youtube.com/watch?v=bMBH2cV8Wpw