तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

शुक्रवार, फ़रवरी 14, 2025

भगवान के दाढ़ी-मूंछ क्यों नहीं होती है?

आपने देखा होगा कि देवी-देवताओं से इतर जितने भी महामानव हुए हैं, जिन्हें कि हम भगवान मानते हैं, उनके चित्रों व मूर्तियों में चेहरों पर दाढ़ी-मूंछ नहीं होती। इसमें भी किंचित अपवाद हो सकता है, मगर क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों है? भगवान कहे जाने वाले राम, कृश्ण, महावीर व बुद्ध के दाढी मूंछ क्यों नहीं होती? आइये, समझने की कोषिष करते हैं कि आखिर ऐसा क्यों है-

भगवान के दाढी मूंछ क्यों नहीं होती, इस गुत्थी को समझने से पहले भगवान शब्द पर आते हैं। इसकी अलग-अलग तरह से व्याख्या हुई है। जैसे जिसके पास धन है, उसे धनवान कहते हैं, उसी प्रकार जिसके पास भग है, वह भगवान है। भग अर्थात योनि। अर्थात प्रकृति। जो आदि शक्ति भगवति से युक्त है, वह भगवान है। वह पूर्ण है। हमारी संस्कृति में अर्धनारीश्वर का जिक्र आता है। उसका मतलब है, जो पुरुष व नारी के समान भाग से मिल कर बना है।

एक व्याख्या ये है कि साकार भगवान, निराकार ईश्वर का ही अवतार है, जैसे श्रीराम व श्रीकृष्ण। इसी प्रकार महावीर व बुद्ध को भी भगवान की श्रेणी में गिना जाता है। वो इसलिए कि महावीर ने केवल्य ज्ञान अर्जित किया और बुद्ध ने बुद्धत्व। इन दोनों के बारे में मान्यता है कि वे मोक्ष को प्राप्त हो गए। वे पूर्णता को प्राप्त हो गए। जन्म-मरण के चक्र से मुक्त।

अब तथ्य की बात, जिसे कि विज्ञान भी मानता है। वो यह कि हर मनुष्य, चाहे वह नर हो या नारी, वह पुरुष व स्त्री, दोनों के ही गुणों से युक्त होता है, क्योंकि उसकी संरचना ही स्त्री व पुरुष के संयोग से हुई है। अंतर सिर्फ गुणसूत्रों का है। अगर पुरुष के गुणसूत्र अधिक हैं तो वह पुरुष के रूप में पैदा होता है और अगर स्त्री के गुणसूत्र अधिक हैं तो उसका जन्म नारी रूप में होता है। हर पुरुष में नारी के भी गुण होते हैं और हर स्त्री में पुरुषों के भी गुण होते हैं। आपने देखा होगा कि कुछ स्त्रियों में जन्म के बाद किन्हीं करणों से पुरुषों के गुण ज्यादा हो जाते हैं तो वह पुरुषों की तरह व्यवहार करती हैं। इसी प्रकार जिन पुरुषों में स्त्रियोचित गुण विकसित हो जाते हैं तो वे स्त्रैण कहलाते हैं। स्त्रैणता का सबसे अनूठा उदाहरण स्वामी रामकृष्ण परमहंस को माना जाता है। वे देवी के उपासक थे। वे देवी में इतने लीन हो गए कि उनका शरीर भी स्त्रैण हाने लगा। बताते हैं कि जीवन के आखिरी वर्षों में उनके स्तन उभरने लगे थे। जहां तक प्राकृतिक विकृति का सवाल है गुण सूत्रों के असंतुलन के परिणाम स्वरूप मनुष्य किन्नर रूप में जन्म लेता है। हालांकि किन्नरों में भी नर-मादा का विभेद है, लेकिन आम तौर पर आपने देखा होगा कि किन्नर की आवाज पुरुषों की तरह मोटी होती है, मगर चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ नहीं आती। व्यवहार पुरुषों की तरह, मगर चाल-ढ़ाल स्त्रियों की तरह।

यह भी एक तथ्य है कि पुरुषों के चेहरे पर दाढ़ी व मूंछ के रूप में बाल होते हैं, जबकि स्त्रियों में ऐसा नहीं होता। कई बार ऐसा पाया गया है कि जो भी स्त्री पुरुषोचित व्यवहार करती है तो उसके भी पुरुषों की तरह चेहरे पर बाल आने लगते हैं। ऐसे भी प्रमाण हैं कि बहुत अधिक उम्र होने पर महिलाओं में गुण सूत्रों का, हारमोन्स का असंतुलन होता है और उनके दाढ़ी-मूंछ आने लगती है।

अब बात मुद्दे की। कोई भी पुरुष पूर्णता को उपलब्ध होता है, अर्थात भगवान की श्रेणी में आता है, तब उसमें पुरुष व स्त्री के गुण समान होते हैं। इसी कारण उसके चेहरे पर बाल नहीं होते। आपने भगवान राम, भगवान कृष्ण, भगवान महावीर, भगवान बुद्ध के जितने भी चित्र या मूर्तियां देखी होंगी, उनमें उनके दाढ़ी-मूंछ नजर नहीं आई होगी। वजह क्या है? क्या वे रोजाना शेव करते थे? इसका जिक्र शास्त्रों में तो कहीं पर भी नहीं है। अर्थात उनके चेहरे पर बाल आते ही नहीं थे? और वजह थी पूर्ण अवस्था। जितना पुरुष, उतनी ही स्त्री। हालांकि यह भी पक्का नहीं है कि वस्तुस्थिति क्या रही होगी, मगर कुछ तथ्यों के आधार पर ऋषि-मुनियों ने जैसा वर्णन किया, उसी के अनुरूप चित्र व मूर्तियां बना दी गईं। 

ऐसी भी मान्यता है कि भगवान सदा किशोर और अमूर्त है। किशोरावस्था दाढ़ी पैदा होने से पहले की अवस्था है। भरपूर यौवन, प्रखर ओज। इसी आधार पर हमने भगवान की परिकल्पना किशोर के रूप में की। किशोरावस्था को ध्यान में रख कर ही मन्दिरों में मूर्तियां रची गईं। यही वजह है कि उनके चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ नहीं दर्शाई गई है।

प्रसंगवश आखिर में भगवान की भिन्न-भिन्न व्याख्याओं पर आते हैं। भगवान शब्द में युक्त भग का अर्थ कामना व भाग्य भी होता है। भग से तात्पर्य प्रकृति या भौतिक संसार से है, अर्थात जो सभी भौतिक आनंदों, कामनाओं और भाग्य को धारणा करने वाला गर्भ है, वह भगवान है। राम व कृष्ण को हम अवतार की श्रेणी में मानते हैं, मगर चूंकि उन्होंने शरीर धारण किया है, इस कारण इस भौतिक संसार से बंधे हुए हैं। उनके जीवन में भी वैसे ही सुख-दुख आए, जैसे कि सामान्य मानव के आते हैं। भगवान का अर्थ जितेंद्रिय भी माना जाता है। इंद्रियों को जीतने वाला। जिसने पांचों इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है तथा जिसकी पंच तत्वों पर पकड़ है, उसे भगवान कहते हैं। जैसे महावीर व बुद्ध। जितेन्द्रिय यानि वह जो पूर्णता को, मोक्ष को प्राप्त हो चुका है और जो जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो गया हो, वही भगवान है। एक और व्याख्या में बताया गया है कि भग यानि ऐश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य, ये छह गुण अपनी समग्रता में जिसमें हों, उसे भगवान कहते हैं। 

https://youtu.be/z8XaD02LCvk


गुरुवार, फ़रवरी 13, 2025

विज्ञान मानता है कि कोई भी ध्वनि नष्ट नहीं होती। वह ब्रह्मांड में कहीं न कहीं विचरण करती रहती है। उसी सिद्धांत पर ही तो रेडियो का अविष्कार हुआ। कोई ध्वनि अंतरिक्ष में छोड़ी गई अर्थात ब्रॉडकास्ट की गई। फिर उसी को कैच करने की तकनीक रेडियो या ट्रांसमीटर में काम में ली गई। इसी प्रकार दृश्यों का, वीडियो का प्रयोग करके टेलीविजन बनाया गया। यह सब हमारे सामने हैं। कोई कपोल कल्पित बात नहीं है। दुनिया में कहीं भी, हजारों किलोमीटर दूर क्रिकेट मैच हो रहा होता है और हम उसे उसी समय अपने टेलिविजन पर देख रहे होते हैं। क्या यह किसी चमत्कार से कम है? मगर चूंकि इसे विज्ञान से संभव कर दिखाया है, इस कारण हमें अचरज नहीं होता।

महाभारत में भी इसी का जिक्र है कि संजय ने दिव्य दृष्टि से युद्ध को देख कर उसका पूरा वृतांत धृष्टराष्ट्र को सुनाया था। बेशक, उस वक्त टेलिविजन का अविष्कार नहीं हुआ था, मगर दूरस्थ घटनाक्रम को देखने की क्षमता का ही संजय ने उपयोग किया, जो कि उनको वरदान के रूप में  मिली थी। यह बात दीगर है कि वह विधा कुछ और थी, 

मगर इसका अर्थ है कि मौलिक रूप से एक स्थान के दृश्य या घटनाक्रम को दूसरे स्थान पर देख पाना संभव था।

अब असल मुद्दे पर आते हैं। ओशो का ख्याल था कि ध्वनि के अंतरिक्ष में सदैव मौजूद रहने के सिद्धांत के आधार पर महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण व अर्जुन के बीच जो संवाद हुआ, उसकी ध्वनि भी अंतरिक्ष में कहीं न कहीं विचरण कर रही होगी। बस जरूरत है तो उसे कैच करने की। सर्वविदित है कि गीता में श्रीकृष्ण व अर्जुन के बीच जो संवाद हुआ, वही हूबहू गीता में बताया गया है। गीता लिखित पुस्तक नहीं है, बल्कि उसमें संवाद को लिपिबद्ध किया गया है। बताया जाता है कि ओशो ने कुछ वैज्ञानिकों की टीम को उस संवाद को रिकॉर्ड करने का सौंपा था। वे वर्षों पुरानी ध्वनि की फ्रिक्वेंसी को नाप कर उसे कैच करने की कोशिश में जुटे थे। ओशो के निधन के बाद उस प्रयास का क्या हुआ, कुछ भी जानकारी नहीं। उनके बाद क्या अब भी उस पर कोई काम दुनिया में कहीं हो रहा है, इसकी भी जानकारी नहीं है। अगर कभी ये संभव हो पाया तो कितना सुखद व आश्चर्यजनक होगा। तब गीता पढ़ी नहीं जाएगी, बल्कि सुनी जाएगी, श्रीकृष्ण व अर्जुन की ऑरीजनल आवाज में।

https://youtu.be/cNggac7Db84


बुधवार, फ़रवरी 12, 2025

भगवान शिव की परिक्रमा आधी क्यों की जाती है?

धर्मस्थलों में गर्भग्रह में स्थापित मूर्ति और मजारों की परिक्रमा करने की परंपरा है। यह भी सर्वविदित तथ्य है कि परिक्रमा की दिशा घड़ी की सुई की तरह दक्षिणावृत होती है। लेकिन यह बेहद रोचक तथ्य है कि अकेले भगवान शिव अथवा शिव लिंग ही ऐसे हैं, जिनकी परिक्रमा पूरी नहीं की जाती। परिक्रमा जहां समाप्त होती है, वहीं से फिर घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में लौटा जाता है। जहां तक भगवान शिव का प्रश्न है तो सब जानते हैं कि उनकी जटा से गंगा का प्रवाह होता है, जो कि अति विशाल है। यह मान कर कि उसे पार नहीं किया जा सकता, परिक्रमा वहीं रोक पर वापस लौट जाते हैं। इसे चंद्राकार परिक्रमा कहा जाता है। इसी प्रकार शिव लिंग पर भी चूंकि विभिन्न प्रकार के अभिषेक किए जाते हैं, जिनका निकास गोमुख से होता है, जिसे कि सोमसूत्र कहा जाता है, उसे उलांघना भी धार्मिक विधि के विपरीत माना जाता है। शास्त्रानुसार सोमसूत्र शक्ति-स्रोत है। उसे लांघते समय पैर फैलाने से वीर्य निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है, जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। जानकारी ये भी है कि तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढंके हुए सोमसूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है।

ऐसी मान्यता है कि सनातन धर्म में परिक्रमा करने का चलन गणेश जी के मां पार्वती की परिक्रमा करने से शुरू हुआ। इससे जुड़ा प्रसंग ये है कि एक बार मां पार्वती ने अपने पुत्रों कार्तिकेय तथा गणेश को सांसारिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए पृथ्वी का एक चक्कर लगा कर आने का आदेश दिया गया।  कार्तिकेय अपनी सवारी मोर पर रवाना हुए, लेकिन गणेश अपने वाहन चूहे को देख विचार में पड़ गए कि वे इस प्रतियोगिता में कैसे प्रथम आएं? उन्होंने एक युक्ति निकाली और मां पार्वती के चक्कर लगाना आरंभ कर दिया। जब कार्तिकेय पृथ्वी का पूरा चक्कर लगा कर लौटे तो देखा कि गणेश वहां पहले से मौजूद हैं तो वे चकित रह गए। इस पर गणेश ने कहा कि मां पार्वती ही संसार हैं। ज्ञान प्राप्ति के लिए उनकी परिक्रमा ही पर्याप्त है, उसके लिए पृथ्वी की परिक्रमा की जरूरत नहीं। 

धार्मिक मान्यता के अनुसार केवल शिव जी की आधी परिक्रमा की जाती है, जबकि मां दुर्गा की एक, हनुमानजी व गणेशजी की तीन-तीन, भगवान विष्णु की चार, पीपल के वृक्ष की एक सौ आठ परिक्रमा का विधान है। वैसे सामान्यरू तीन परिक्रमा का चलन है।

अब आते हैं इस तथ्य पर कि परिक्रमा आखिर क्यों की जाती है? ऐसी मान्यता है कि पवित्र स्थान, मूर्ति, वृक्ष, पौधा आदि की परिक्रमा से उनके इर्द-गिर्द मौजूद आभा मंडल से सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। हमारी संस्कृति में मंदिर, नदि, पर्वत, तीर्थ, वृक्ष आदि की परिक्रमा का चलन है। दिलचस्प बात है कि पाणिग्रहण संस्कार में वर-वधू अग्नि की परिक्रमा करते हैं। 

जरा और गहरे में जाएं तो देखिए, सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं और सभी ग्रहों को साथ लेकर हमारा सूर्य महासूर्य की परिक्रमा कर रहा है। इतना ही नहीं, बल्कि सभी ग्रह अपनी धूरि पर भी कर रहे हैं। अर्थात यह केवल मान्यता का मसला नहीं है, बल्कि परिक्रमा या चक्र में ब्रह्मांड का गहरा रहस्य छुपा हुआ है। हर छोटा बड़े की परिक्रमा कर रहा है। समय की सूचक घड़ी में भी सुइयां चक्राकार घूम रही हैं। चक्र ही परिवर्तन व प्रगति का द्योतक है। निष्कर्ष यही कि परिक्रमा से केन्द्र तुष्ट होता है, वहीं से ऊर्जा प्राप्त होती है।

https://www.youtube.com/watch?v=OYiVYyKP3YU


सोमवार, फ़रवरी 10, 2025

उबासी आने पर चुटकी क्यों ली जाती है?

उबासी व जम्हाई एक सामान्य शारीरिक क्रिया है। हर किसी को आती है उबासी। उसके अपने कारण हैं, लेकिन कई लोग उबासी आने पर होंठों के आगे चुटकी बजाते हैं। संभव है, इसकी आपको भी जानकारी हो। आप भी चुटकी बजाते हों। मगर ये चुटकी क्यों ली जाती है, उसका ठीक-ठीक क्या कारण है, यह ठीक से नहीं पता। जाहिर तौर पर उबासी ऊब, थकावट या नीरसता अनुभव होने का संकेत है। हो सकता है ऊब मिटाने के लिए चुटकी ली जाती हो। यह भी हो सकता है कि ऐसा इसलिए भी किया जाता हो कि उबासी के दौरान मुंह खुला रहने के दौरान कोई मक्खी-मच्छर श्वास के साथ भीतर न प्रवेश कर जाए।

बहरहाल उबासी के दौरान चुटकी लेने का एक प्रसंग रामायण में आता है। जरा इस पर बात कर लेते हैं।

वस्तुतः भक्त हनुमान द्वारा भगवान राम की निरंतर सेवा से सीता जी, भरत, लक्ष्मण आदि ईर्ष्या करने लगे थे। भगवान राम के राज्याभिषेक के बाद सब कुछ आनंद से चल रहा था। हनुमान जी भी अयोध्या में ही रह कर भगवान राम की सेवा करते थे। हर वक्त, यहां तक कि शयन कक्ष में भी हनुमान सेवा में उपस्थित रहते थे। ईर्ष्यावश सीता जी, भरत व लक्ष्मण ने एक योजना बनाई, ताकि हनुमान को सेवा से दूर रखा जा सके। राम दरबार में भरत ने राम की ओर से एक आदेश सुनाया। इसके तहत उन्होंने शयन कक्ष में सिर्फ सीता जी के, दरबार में भरत जी के और भोजन और भ्रमण के दौरान लक्ष्मण जी ने सेवा के अधिकार ले लिए। हालांकि भगवान राम ने हनुमान के लिए सेवा के लिए कुछ न छोडऩे पर संशय किया था, मगर सब टाल गए। अपने लिए सेवा का अवसर न बचने पर हनुमान हनुमान गढ़ी में दुखी हो कर रोने लगे। अपनी सेवा में हनुमान जी को न पाकर श्रीराम का भी मन नहीं लगा, तब उन्होंने हनुमान का पता करवाया और उनको बुलावा भेजा। हनुमान के दुख का कारण जान कर भगवान राम ने उनसे सेवा को कोई मौका मांगने को कहा। चतुर हनुमान ने भगवान राम को उबासी आने पर चुटकी बजाने की सेवा मांगी। भगवान राम ने स्वीकृति दे दी। हनुमान से ईर्ष्या करने वाली मंडली को यह बहुत ही सामान्य सी सेवा लगी, सो उन्होंने कोई ऐतराज नहीं किया। लेकिन इस सेवा के बहाने हनुमान हर पल भगवान राम के साथ ही रहने लगे। पता नहीं कब उबासी आ जाए और उन्हें चुटकी बजानी पड़े। एक दिन रात में सीता जी ने हनुमान को शयन कक्ष से बाहर भेज दिया। भगवान राम ने उबासी ली, और उनका मुंह खुला का खुला रह गया। यह स्थिति देख कर सभी घबरा गए। किसी को कुछ नहीं समझ आया कि क्या किया जाए। इस पर हनुमान को बुलवाया गया। उनके चुटकी बजाते ही भगवान राम सामान्य हो गए। है न दिलचस्प प्रसंग।

खैर, उबासी आती क्यों है, इस पर विदुषी निशी खंडेलवाल ने एक विस्तृत आलेख लिखा है। आइये, उसके कुछ अंश जान लेते हैं। 

जानकारी ये है कि हम ही नहीं, बल्कि गर्भस्थ शिशु भी उबासी लेता है। अल्ट्रा साउंड निरीक्षण के दौरान 20 सप्ताह के शिशुओं की गर्भ में उबासिया रिकार्ड की गई हैं। इससे तो ऐसा लगता है कि उबासी का आना हमारे लिए काफी महत्वपूर्ण है और इस पर नियंत्रण कर पाना सम्भव नहीं। रात को सोने से पहले, सुबह उठने के बाद, किसी काम को लगातार करते रहने से, बहुत ज्यादा थकान महसूस होने जाने आदि-आदि परिस्थितियों में सभी के उबासी लेने के अनुभव हैं।

उबासी क्यों आती है, इसका पता लगाने और किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए बहुत-से अध्ययन किए गए हैं। सन् 1986 में महाविद्यालय के कुछ छात्रों पर किए गए प्रयोगों में पाया कि उस समय उबासी ज्यादा आती है, जब छात्रों को बोरियत महसूस होती है। 

ऐसा माना जाता है कि थके होने पर उबासी ज्यादा आती है। यह देखा जाता है कि अक्सर उबासी नींद आने की स्थिति में आती है। सबसे ज्यादा उबासी सोने से पहले और सो कर उठने के समय आती है, क्योंकि इस समय सक्रियता का स्तर बहुत कम होता है। परन्तुु बाद में हुए कुछ प्रयोगों से यह पता चला कि सतर्कता का स्तर अक्सर उबासी के बाद नहीं, उससे पहले बढ़ जाता है और सतर्कता के अन्य सम्भावित कारण भी पाए गए। तो यह परिकल्पना भी बहुत सटीक साबित नहीं हुई।

दिलचस्प बात है कि कई जानवर उबासी लेते हैं - शेर-बिल्ली, कुत्ते-भेड़िए, बन्दर-वानर, सांप, मछली, चूहे, घोड़े, तोते, पेंग्विन, उल्लू आदि। मनुष्यों की तरह सामाजिक समूहों में रहने वाले जानवरों में किसी को उबासी लेते हुए देख कर अन्य को भी उबासी आ जाती है। इनमें चिम्पैन्ज़ी और तोते शामिल हैं। शोध से यही पता चला है कि कुत्ते अपने मालिक को उबासी लेते देख खुद उबासी लेने लगते हैं। अर्थात उबासी एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति में भी फैल सकती है।

-तेजवाणी गिरधर

7742067000

https://www.youtube.com/watch?v=Wpzd3YOx4eM

शनिवार, फ़रवरी 08, 2025

संजय जैसी दिव्यदृष्टि क्या अब भी संभव है?

यह हमारे संज्ञान में है कि महाभारत काल में संजय को दिव्य दृश्टि हासिल थी। उन्होंने उसी दिव्य दृश्टि से महल में बैठे बैठे दूरस्थ हो रहे युद्ध को देखा और धृतराश्ट को पूरा वर्णन सुनाया। ऐसा होना काल्पनिक लगता है, मगर धार्मिक आस्था के कारण हमारी मान्यता है कि ऐसा हुआ ही होगा। लेकिन विज्ञान ऐसी किसी दिव्य दृश्टि की पुश्टि नहीं करता। विज्ञान ऐसी स्थिति किसी भी सूरत में मानने को तैयार नहीं है। परंतु वर्तमान काल में एक घटना ने उसे मानने को मजबूर कर दिया है। हालांकि वह अब भी उस गुत्थी को सुलझाने की क्षमता नहीं रखता। ओषो ने अपने एक प्रवचन में बताया कि अमेरिका में टेट सीरियो नामक एक व्यक्ति हुआ। उसे हजारों किलोमीटर दूर हो रही घटना को देखने की क्षमता हासिल थी। किसी स्थान पर घटित हो रही घटना को वह देखना चाहता तो पांच मिनट आंख बंद कर ध्यान में बैठता और उसे घटना दिखाई देने लग जाती। केवल घटना को देखने में ही नहीं, बल्कि घटना के चित्र को पकडने में भी सक्षम था। वह चित्र उसकी आंख में दिखाई देता था, जिसके हजारों फोटो खींचे गए हैं। ओषो कहते हैं कि दिव्य दृश्टि के लिए आत्मज्ञानी होना आवष्यक नहीं, किसी आध्यात्मिक षक्ति की जरूरत नहीं, वह तो एक प्राकृतिक षक्ति है। टेट कोई आत्मज्ञानी नहीं था, अलबत्ता उसे असामान्य व्यक्ति जरूर कहा जा सकता है।

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शुक्रवार, फ़रवरी 07, 2025

क्या पता लग सकता है कि मृतात्मा अगले जन्म में कहां गई?

हालांकि हम हर व्यक्ति के मरने पर उसके नाम के साथ स्वर्गीय शब्द जोड़ देते हैं, भले ही हमें यह पता भी न हो कि वह स्वर्ग में गया या नरक में। वैसे भी हमारे यहां परंपरा है कि यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन में बुरा रहा हो, तो भी उसके मरने पर हम उसकी बुराई नहीं करते। यही कहते हैं कि भला आदमी था। उसके नाम के साथ स्वर्गीय शब्द जोड़ कर यही जताते हैं कि वह स्वर्ग में ही गया होगा और सम्मान देते हैं। इसके अतिरिक्त यह भी अवधारणा है कि मृतात्मा अगला जन्म लेती है। कुछ लोग मानते हैं कि मनुष्य मरने के बाद फिर मनुष्य योनि में ही जन्म लेता है। ऐसा मानने वाले पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका अगले जन्म में फिर मिलने की कामना करते हैं। कई तो अगले सात जन्म तक भी साथ होने की इच्छा जताते हैं। अब ये सात जन्म ही क्यों, छह या आठ क्यों नहीं, कुछ पता नहीं। षायद मनुश्य योनि में केवल सात बार ही जन्म लिया जा सकता हो। दूसरी ओर कुछ लोगों की मान्यता है कि मनुष्य अपने कर्म के अनुसार किसी अन्य योनि में जन्म लेता है। कुछ मानते हैं कि मरने के वक्त जो ख्याल आता है, उसी के अनुरूप जन्म मिलता है। एक जिज्ञासा ये हो सकती है कि मृतात्मा ने अगले जन्म में किस योनि में जन्म लिया है, क्या इसके बारे में ठीक-ठीक जानकारी मिल सकती है? बताते हैं कि ज्योतिष शास्त्र में यह संभव हैै। ज्योतिषी कुंडली देख कर यह तक बता देते हैं कि यह आपका आखिरी जन्म है, इसके बाद जन्म-मरण के चक्कर से मुक्ति मिल जाएगी। 

खैर, एक पद्दति मेरी जानकारी में भी है, वह आपसे साझा करता हूं। जब किसी की मृत्यु शाम को होती है, और जैसा कि हमारे यहां परंपरा है कि सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार नहीं किया करते, इस कारण उसे रात भर रखना होता है। उसके पास एक दीपक जलाया जाता है। बताया जाता है कि ऐसा इस कारण किया जाता है ताकि वातावरण में विचरण कर रही कोई बुरी आत्मा उसमें प्रवेश न कर जाए। खैर, जानकारी ये है कि जो दीपक पूरी रात जलता है, उसके नीचे तेल से एक आकृति बन जाती है, जो कि किसी मनुष्य, जीव-जन्तु आदि की हो सकती है। जो भी आकृति बनती है, माना जाता है कि मृतात्मा उसी योनि की ओर प्रस्थान करेगी। यह पद्दति कितनी सही है, पता नहीं, मगर चलन में है जरूर। हमारे परिवार में किन्हीं पूर्वज के बारे में बताया जाता है कि दीपक के नीचे भ्रमर का चिन्ह बन गया था, इस कारण जब भी कोई भ्रमर घर में आ जाता है तो यही मानते हैं कि अमुक पूर्वज पधारे हैं और उन्हें पानी की छींटा दे कर शांत किया जाता है। ऐसा करने पर वे चले जाते हैं।

https://www.youtube.com/watch?v=AawUENKd--s&t=3s


गुरुवार, फ़रवरी 06, 2025

शादी न हो रही हो तो करें ये टोटका

यदि किसी युवक की शादी न हो रही हो, शादी में विलंब हो रहा हो तो एक उपाय किया जाता है। वो ये कि जब किसी की शादी हो रही हो और वह जब वधु पक्ष के दरवाजे पर तोरण मारने के बाद घोड़ी से उतर रहा हो तो अविवाहित युवक अगर तुरंत घोड़ी पर बैठ जाए तो उसकी भी शादी का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। है न विचित्र परंपरा।

ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकृति मरक्त स्थान की पूर्ति होने की व्यवस्था है। जैसे ही कोई स्थान रिक्त होता है, प्रकृति उसे भरने की कोशिश करती है। दूल्हे का घोड़ी पर बैठे होना एक स्थिति है। इसे हम दृश्य भी कह सकते हैं। जैसे ही दूल्हा घोड़ी से उतरता है, तो वह स्थान रिक्त हो जाता है। उसे अगर अविवाहित युवक तुरंत भरता है तो प्रकृति तत्काल बनी दूसरी स्थिति को पूर्ण करने में जुट जाती है। अर्थात प्रकृति ऐसे संयोग निर्मित करती है कि उस युवक की जल्द शादी हो जाए।

https://www.youtube.com/watch?v=y-Q-wayfeaE