तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

बुधवार, फ़रवरी 05, 2025

तकिया उठा सकता है आपको नींद से?

एक अरसे से नौवीं व ग्यारहवीं क्लास की परीक्षा की तुलना में दसवीं व बारहवीं क्लास की बोर्ड परीक्षा को कठिन माना जाता है। इस कारण दसवीं व बारहवीं की परीक्षा देने वाले परीक्षार्थी पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देते हैं। विशेष रूप से सुबह जल्दी उठ कर पढ़ते हैं, चूंकि शांत वातावरण में स्मृति में पढ़ा हुआ जल्द संग्रहित होता है। सुबह जल्द उठने के लिए घड़ी में अलार्म सैट करते हैं। मैं जब दसवीं में था तो किसी ने एक प्रयोग बताया था। वो ये कि आप अपने तकिये पर हाथ रख कर उसे संदेश दीजिए कि हे तकिया देवता, मुझे सुबह चार बजे उठा देना। मैंने इस प्रयोग को कर के देखा। आप यकीन करें या न करें, मगर मेरा अनुभव ये है कि वाकई मेरी नींद अपेक्षित समय पर अपने आप खुल जाती थी।

कुछ बड़ा होने पर मैंने इसका राज जानने की कोशिश की। जिज्ञासा थी कि क्या वाकई एक निर्जीव तकिया हमारे आदेश को मानता है? स्वाभाविक सी बात है कि ऐसा हो नहीं सकता। होता भी हो तो पता नहीं, मगर मैं जिस निष्कर्ष पहुंचा, वह आपसे साझा करता हूं। असल में तकिया एक निमित्त मात्र है। जैसे ही हम तकिये को आदेश देते हैं तो वह आदेश हमारे अंतर्मन में चला जाता है। वस्तुतः वही अंतर्मन काम करता है। जैसे एक भौतिक घड़ी है, वैसे ही हमारे भीतर एक बायलॉजिकल घड़ी है। अंतर्मन उस बायलॉजिकल घड़ी का इस्तेमाल करते हुए हमें निर्धारित समय पर जगा देता है। और हमें ये लगता है कि ऐसा तकिये ने किया है। हालांकि हम चाहें तो अपने अंतर्मन को सीधे भी आदेश दे सकते हैं, मगर वह आसान नहीं, इस कारण निमित्त के रूप में तकिये का इस्तेमाल करना पड़ता है। यह ठीक वैसे ही है, जैसे भगवान सर्वत्र है और उसको कहीं भी याद किया जा सकता है, लेकिन हम उसके लिए मंदिर जा कर मूर्ति का इस्तेमाल करते हैं। मूर्ति निमित्त मात्र है, मगर वहां का वातावरण हमें भगवान पर ध्यान केन्द्रित करने में सहायक होता है। बिना मूर्ति के भी ध्यान हो सकता है, मगर वह आसान नहीं। मन बहुत चंचल है, उसे भीतर से स्थिर करना कठिन है। इसीलिए हम बाहर की मूर्ति का इस्तेमाल करते हैं, जिस पर ध्यान केन्द्रित करना अपेक्षाकृत आसान है।

ये तो हुई तकिये की बात। मगर आपको ये तो ख्याल में होगा ही कि बिना तकिये के प्रयोग के भी सुबह एक निश्चित समय के आसपास हमारी नींद अपने आप खुल जाती है। यह काम हमारी बायलॉजिकल घड़ी करती है।

बायलॉजिकल घड़ी की बात चली है तो मेरी यह समझ भी आपसे शेयर कर लेता हूं। बाहरी घड़ी को देख कर तो हम दिन भर के काम करते ही हैं, मगर साथ ही बायलॉजिकल घड़ी भी काम करती रहती है। जैसे कि हमने यदि ये नियम बनाया कि सुबह दस बजे खाना खाना है। बायलॉजिकल घड़ी उसी हिसाब से सैट हो जाती है। कुछ दिनों बाद दस बजते ही हमें भूख लगती है। बायलॉजिकल घड़ी दस बजते ही आमाशय में मौजूद पाचक तत्त्वों को सक्रिय होने का आदेश देती है। इसीलिए कहा जाता है कि निश्चित समय पर खाना खाने पर आसानी से पचता है, क्योंकि उस समय पर भोजन को पचाने वाले रस सक्रिय होते हैं। अर्थात हम जो नियम अपने लिए बनाते हैं, वह हम पर लागू हो जाता है। एक अर्थ में वह हमें गवर्न करता है। बाध्य करता है। इसीलिए नियमितता की महिमा है। कहा जाता है न कि भगवान का ध्यान, आरती आदि निश्चित समय पर ही करनी चाहिए। उसकी वजह ये है कि निश्चित समय पर बायलॉजिकल घड़ी के आदेश से मन तुरंत एकाग्र होने के लिए तैयार हो जाता है। किसी भी वक्त ध्यान, आरती करने की तुलना में निश्चित समय पर करने से चित्त उस पर तुरंत स्थिर हो जाता है। स्वाभाविक रूप से अधिक फलदायक होता है।

नियमितता का जिक्र आया है तो एक दृष्टांत के साथ अपनी बात को पूरा करता हूं। वह कितना सच्चा है, कितना नहीं, मुझे नहीं पता, मगर यह नियमितता का अल्टीमेट उदाहरण है। एक धार्मिक व्यक्ति प्रतिदिन निश्चित समय पर जंगल में स्थित एक मंदिर में मूर्ति के आगे दीया जलाता था। उसका एक पड़ौसी, जो कि घोर नास्तिक था, वह भी नियम से रोज उस दीये को बुझा कर आ जाता था। एक दिन भयानक तूफान आया। धार्मिक व्यक्ति की हिम्मत जवाब दे गई और वह आलस्य करके घर ही बैठा रहा। नास्तिक आदमी तूफान से घबराया नहीं और पहुंच गया दीया बुझाने। मूर्ति में विराजित देवता ने उसे वरदान दिया। धार्मिक आदमी को यह पता लगा कि देवता ने नास्तिक को वरदान दिया है तो वह पहुंच गया मंदिर और मूर्ति से शिकायत की कि मैं तो रोज आपके सामने श्रद्धा से दीया जलाता हूं, जबकि नास्तिक आदमी आपका अनादर करते हुए दीया बुझा देता है, फिर भी आपने उसे वरदान क्यों दिया? इस पर मूर्ति के देवता ने जवाब दिया कि वह नास्तिक आदमी तुमसे ज्यादा नियमित है। अपने नियम की पालना करके लिए उसने तूफान की भी परवाह नहीं की। इसीलिए उससे प्रसन्न हो कर मैने उसे वरदान दिया है। 

है न दिलचस्प किस्सा। यह एक उदाहरण मात्र है, मगर इसका संदेश यही है कि हम जीवन में नियमितता लाएं। जैसे सृष्टि का नियंता सूर्य निश्चित समय पर उदय होता है और निश्चित समय पर अस्त होता है, ठीक उसी प्रकार हमें भी नियमपूर्वक रहना चाहिए।

https://www.youtube.com/watch?v=BXYLR8q7i9o&t=22s

मंगलवार, फ़रवरी 04, 2025

क्या कलंदर व झूलेलाल एक ही हैं?

 जिस गीत दमा दम मस्त कलंदर को गा और सुन कर सिंधी ही नहीं, अन्य समुदाय के लोग भी झूम उठते है, उस पर यह सवाल बना हुआ है कि क्या कलंदर व सिंधियों के आराध्य देवता झूलेलाल एक ही हैं? पाकिस्तान की मशहूर गायिका रेश्मा व बांग्लादेश की रूना लैला की जुबान से थिरक कर लोकप्रिय हुआ यह गीत किसकी महिमा या स्मृति में बना हुआ है, इसको लेकर विवाद है।

यह सर्वविदित है कि आम तौर सिंधी समुदाय के लोग अपने विभिन्न धार्मिक व सामाजिक समारोहों में इसे अपने इष्ट देश झूलेलाल की प्रार्थना के रूप में गाते हैं, लेकिन भारतीय सिंधू सभा ने खोज-खबर कर दावा किया है कि यह गीत असल में हजरत कलंदर लाल शाहबाज की तारीफ में बना हुआ है, जिसका झूलेलाल से कोई ताल्लुक नहीं है। सभा ने एक पर्चा छाप कर इसका खुलासा किया है।

पर्चे के अनुसार आम धारणा है कि यह अमरलाल, उडेरालाल या झूलेलाल अवतार की प्रशंसा या प्रार्थना के लिए यह गीत बना है। उल्लेखनीय बात है कि पूरे गीत में झूलेलाल से संदर्भित प्रसंगों का कोई जिक्र नहीं है, जैसा कि आम तौर पर किसी भी देवी-देवता की स्तुतियों, चालीसाओं व प्रार्थनाओं में हुआ करता है। सिर्फ झूलेलालण शब्द ही भ्रम पैदा करता है कि यह झूलेलाल पर बना हुआ है। असल में यह तराना पाकिस्तान स्थित सेहवण कस्बे के हजरत कलंदर लाल शाहबाज की करामात बताने के लिए बना है।

पर्चे में बताया गया है कि काफी कोशिशों के बाद भी कलंदर शाहबाज की जीवनी के बारे में कोई लिखित साहित्य नहीं मिलता। पाकिस्तान में छपी कुछ किताबों में कुछ जानकारियां मिली हैं। उनके अनुसार कलंदर लाल शाहबाज का असली नाम सैयद उस्मान मरुदी था। उनका निवास स्थान अफगानिस्तान के मरुद में था। उनका जन्म 573 हिजरी यानि 1175 ईस्वी में हुआ। उनका बचपन मरुद में ही बीता। युवा अवस्था में वे हिंदुस्तान चले आए। सबसे पहले उन्होंने मंसूर की खिदमत की। उसके बाद बहाउवलदीन जकरिया मुल्तानी के पास गए। इसके बाद हिजरी 644 यानि 1246 ईस्वी में सेवहण पहुंचे। हिजरी 650 यानि 1252 ईस्वी में उनका इंतकाल हो गया। इस हिसाब से वे कुल छह साल तक सिंध में रहे।

कुछ किताबों के अनुसार आतताइयों के हमलों से तंग आ कर मुजाहिदीन की एक जमात तैयार हुई, जो तबलीगी इस्लाम का फर्ज अदा करती थी। उसमें कलंदरों का जिक्र आता था। आतताइयों में से विशेष रूप से चंगेज खान, हलाकु, तले और अन्य इस्लामी सुल्तानों पर चढ़ाई कर तबाही मचाई थी। इसमें मरिवि शहर का जिक्र भी है, जो शाहबाज कलंदर का शहर है। कलंदर शाह हमलों के कारण वहां से निकल कर हिंदुस्तान आए। वे मुल्तान से होते हुए 662 हिजरी में सेवहण आए और 673 में उनका वफात हुआ। यानि वे सेवहण में 11 साल से ज्यादा नहीं रहे। इस प्रकार उनके सेहवण में रहने की अवधि और वफात को लेकर मत भिन्नता है। पर्चे के अनुसार सेवहण शहर पुराना है। कई संस्कृतियों का संगम रहा। वहीं से सेवहाणी कल्चर निकल कर आया, जिसकी पहचान बेफिक्रों का कल्चर के रूप में थी। यह शहर धर्म परिवर्तन का भी खास मरकज रहा। इसी सिलसिले में बताया जाता है कि वहां एक सबसे बड़े शेख हुए उस्मान मरुंदी थे, जिन्हें लाल शाहबाज कलंदर के नाम से भी याद किया जाता है।

पर्चे में बताया गया है कि शाह कलंदर का आस्ताना सेवहण में जिस जगह है, वहां पहले शिव मंदिर था। वहां पर हर वक्त अलाव जलता रहता था, जिसे मुसलमान अली साईं का मच कहते थे। यह शहर जब सेवहण में शाह कलंदर का वफात हुआ तो हिंदुओं ने उनको अपने मुख्य मंदिर में दफन करने की इजाजत दी। बाद में वहां के पुजारी भी उनके मलंग हो गए। इस पर्चे के जरिए यह साबित करने की कोशिश की गई है कि कलंदर शाहबाज इस्लाम के प्रचारक थे। इसी को आधार बना कर सिंधी समुदाय को आगाह किया गया है कि भला इस्लाम के प्रचारक और धर्म परिवर्तन की खिलाफत करने वाले झूलेलाल एक कैसे हो सकते हैं। एक और शंका ये है कि यदि दोनों एक हैं तो इस गीत को केवल सिंधी ही क्यों गाते हैं, मुस्लिम क्यों नहीं? क्या इसकी वजह केवल इतनी है कि यह सिंधी भाषा में है?

अलबत्ता परचे में इसे जरूर स्वीकार किया गया है कि दमा दम मस्त कलंदर अकीदत से गाने से मुरादें पूरी होती हैं। आम धारणा है कि सात वर्ष की उम्र में उन्होंने कुरआन को जुबानी याद कर लिया था। यह भी पक्का है कि उनको अरबी व फारसी के साथ उर्दू जीनत जुबान भी बोलते थे। पूरी उम्र उन्होंने शादी नहीं की। उनके मन को जर और जमीन भी मैला नहीं कर पाए। अन्य दरवेश तो बादशाहों के नजराने कबूल कर लेते थे, मगर शाह कलंदर उस ओर आंख उठा कर भी नहीं देखते थे।

पर्चे में यह स्पष्ट नहीं है कि दमा दम मस्त कलंदर गीत में झूलेलालण शब्द कैसे शामिल हो गया, जिसकी वजह से सिंधी समुदाय के लोग इसे श्रद्धा के साथ गाते हैं। बहरहाल यह इतिहासविदों की खोज का विषय है कि शाहबाज कलंदर को झूलेलाल क्यों कहा गया है।

इस सिलसिले में अजमेर में भी असमंजस हो चुका है। बात थोड़ी पुरानी है, मगर चूंकि इसी विवाद से जुड़ी हुई है, इस वजह से यहां जिक्र कर रहा हूं। मौलाई कमेटी के कन्वीनर सैयद अब्दुल गनी गुर्देजी की ओर से पिछले कई साल से चेटीचंड के मौके पर सिंधी समुदाय का हार्दिक अभिनंदन करने के लिए एक पर्चा जारी करते रहे हैं। इसमें उल्लेख था कि सिंधी समाज के आराध्यदेव झूलेलाल जी को ही मुसलमान सखी शाहबाज कलंदर या लाल शाहबाज कलंदर कहते हैं। इस पर 23 नवंबर 2004 को दैनिक भास्कर में मेरी बाईलाइन खबर के अनुसार जब उनसे पूछा गया कि वे किस आधार पर दोनों को एक बताते हैं तो उनका कहना था कि उन्हें कोई जानकारी नहीं है कि दोनों में कोई फर्क है या गाने को लेकर कोई विवाद है। न ही किसी सिंधी भाई ने कभी ऐतराज किया। वे तो महज भाईचारे के लिए पर्चा छपवाते हैं।

https://www.youtube.com/watch?v=COszpBXQYzA


सोमवार, फ़रवरी 03, 2025

इस्लाम में भी है भूतों से बचाव का उपाय

जिस तरह हिंदू मतावलंबियों में भूत-पिशाच इत्यादि से बचाव के लिए हनुमान चालीसा व रामचरित मानस के सुंदर कांड का पाठ करने की परंपरा है, उसी प्रकार इस्लाम को मानने वाले भी भूत-प्रेत को दूर भगाने का उपाय करते हैं। कदाचित सभी मुस्लिमों को उस उपाय के बारे में जानकारी होगी क्योंकि मदरसे की शुरुआती तालीम में ही इसका रियाज करवाया जाता है, मगर शायद हिंदुओं को इसकी जानकारी न हो।

सर्वविदित है कि जब भी कोई शुभ काम करते हैं तो उसमें बाधा न आने के लिए कई लोग सुंदरकांड का पाठ करवाते हैं। इसी प्रकार जब भी किसी स्थान पर भय प्रतीत हो तो हनुमान चालीसा का पाठ करने की सलाह दी जाती है, ताकि वहां मौजूद दुष्टात्माएं भाग जाएं। हनुमान चालीसा में ही लिखा है कि भूत-पिशाच निकट नहीं आवे, महावीर जब नाम सुनावे। स्वाभाविक रूप से यह आम जिज्ञासा होती होगी कि मुस्लिम ऐसी स्थिति में क्या करते हैं?

इस्लाम के जानकारों का कहना है कि मखलूकात आपको कोई नुकसान न पहुंचा पाएं, इसके लिए कुरान की एक आयत का तीन बार पाठ करना चाहिए। उस आयत का नाम है आयतुल कुर्सी। उसमें दस जुमले हैं। इस्लाम के जानकार बताते हैं कि आयतुल कुर्सी कुरान की सब से अज़ीम तरीन आयत है। 

हदीस में इस आयत को तमाम आयातों से अफजल फऱमाया है। सूरह बकरा की यह आयत कुरान की तमाम आयातों की सरदार है, जिस घर में पढ़ी जाती है, शैतान वहां से निकल जाता है।

स्वाभाविक रूप से वह आयत मूलतः अरबी लिपी में है। 

आयत इस प्रकार है-

1. अल्लाहु ला इलाहा इल्लाहू

2. अल हय्युल क़य्यूम

3. ला तअ खुज़ुहू सिनतुव वला नौम

4. लहू मा फिस सामावाति वमा फ़िल अर्ज़

5. मन ज़ल लज़ी यश फ़ऊ इन्दहू इल्ला बि इजनिह

6. यअलमु मा बैना अयदी हिम वमा खल्फहुम

7. वला युहीतूना बिशय इम मिन इल्मिही इल्ला बिमा शा..अ

8. वसिअ कुरसिय्यु हुस समावति वल अर्ज़

9. वला यऊ दुहू हिफ्ज़ुहुमा

10. वहुवल अलिय्युल अज़ीम


उसका तर्जुमा इस प्रकार है:-

1. अल्लाह जिसके सिवा कोई माबूद नहीं।

2. वही हमेशा जिंदा और बाकी रहने वाला है।

3. न उसको ऊंघ आती है न नींद।

4. जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है सब उसी का है।

5. कौन है जो बगैर उसकी इजाज़त के उसकी सिफारिश कर सके।

6. वो उसे भी जनता है जो मखलूकात के सामने है और उसे भी जो उन से ओझल है।

7. बन्दे उसके इल्म का जऱा भी इहाता नहीं कर सकते सिवाए उन बातों के इल्म के जो खुद अल्लाह देना चाहे।

8. उसकी ( हुकूमत ) की कुर्सी ज़मीन और असमान को घेरे हुए है।

9. ज़मीनों आसमान की हिफाज़त उसपर दुशवार नहीं।

10. वह बहुत बलंद और अज़ीम ज़ात है।

असल में इस आयत की जानकारी मुझे यूट्यूब पर हॉरर शो चलाने वाले चंद व्लागर के एपीसोड से मिली। इनमें ऊपरी हवाओं से ग्रसित हवेलियों या स्थानों की छानबीन के दौरान वे इस आयत का निरंतर पाठ करते हैं। उनका दावा है कि इससे वे मखलूकात से बचे रहते हैं। इस बारे में विस्तार से जानकारी मुझे मेरी एक परिचित विदूषी डॉ. फरगाना से हासिल हुई। वे अध्यात्म की एक अलग ही दुनिया में विचरण करती हैं। जानकारी काफी दिलचस्प लगी, लिहाजा आप सुधि पाठकों के साथ साझा कर रहा हूं। 

एक बेहद रोचक जानकारी ये भी हुई कि जब व्लागर किसी अभिशप्त स्थान पर विजिट करते हैं तो बाकायदा उन मखलूकात से अल्लाह का हवाला देते हुए आग्रह करते हैं कि उन्हें बिना कोई नुकसान पहुंचाते हुए दौरा करने दें। बड़े अदब के साथ ये भी विनती करती हैं कि चूंकि आप अदृश्य हैं, लिहाजा अपने बच्चों को रास्ते से हटा लें, ताकि उनको चोट न लगे। 

इस सिलसिले में आपको जानकारी होगी कि जब भी हम घर से बाहर किसी खुले स्थान पर लघुशंका करते हैं तो कुछ आवाज करते हैं अथवा खंखारते हैं या हनुमान जी का स्मरण करते हैं, ताकि अगर वहां कोई भूत इत्यादि हो तो वह वहां से हट जाए। विशेष रूप से इस बात का ख्याल रखते हैं कि किसी पेड़ या झाड़ी के नीचे लघुशंका नहीं करते, क्योंकि वहां भूत-प्रेत आदि के वास की संभावना होती है।

https://www.youtube.com/watch?v=NR0qCOZMHDs&t=35s

रविवार, फ़रवरी 02, 2025

किसी के लिए दुआ मांगने से खुद के संचित पुण्य का क्षय होता है?

हिंदू, इस्लाम, बौद्ध धर्म और कई अन्य परंपराओं में दुआ या प्रार्थना को सकारात्मक और पुण्यकारी कर्म माना गया है। किसी और के लिए दुआ करना या उनकी भलाई की कामना करना आमतौर पर निस्वार्थता और परोपकार का प्रतीक होता है। कर्म सिद्धांत के अनुसार, किसी के लिए शुभकामना या प्रार्थना करना एक सकारात्मक कर्म है, जो अच्छे फल देता है। यह एक अच्छे कर्म के रूप में जुड़ता है। सर्वे भवन्तु सुखिनः जैसी प्रार्थनाएं दूसरों की भलाई के लिए की जाती हैं और इसे उच्च पुण्य कर्म माना गया है। इसी प्रकार इस्लाम में किसी के लिए दुआ करना  यानि दूसरे के लिए अल्लाह से प्रार्थना करना इबादत का हिस्सा है और इसे एक नेक काम माना जाता है। तभी तो कहते हैं कि दुआ में याद रखना।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो दूसरों के लिए प्रार्थना करने से आपके भीतर सकारात्मकता और करुणा का विकास होता है। यह आपको मानसिक शांति और संतोष प्रदान करता है। जब आप दूसरों के लिए प्रार्थना करते हैं, तो यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा के प्रवाह को बढ़ाता है, जो अंततः आपको भी लाभ पहुंचाती है। इन सब से भिन्न एक नजरिया मेरी जानकारी में आया तो मैं चकित रह गया। अध्यात्म के बारे में गहन जानकारी रखने वाली एक विदुशी ने बताया जब तक बहुत जरूरी न हो, किसी के लिए दुआ नहीं मांगे। उनकी मान्यता है कि जब हम किसी के लिए दुआ मांगते हैं, तो हमारे संचित पुण्य का क्षय होता है। उनका तर्क था कि जैसे हम अपने किसी प्रिय के लिए दुआ करते हैं कि मेरी उम्र भी उसे लग जाए, तो यह ऐसी ही कीमिया है कि हमारी उम्र दूसरे में षिफ्ट हो जाए। यह ठीक ऐसे ही है, जैसे हम किसी को दस रूपये दान में दें, तो हमारे कोश में दस रूपये की कमी होगी ही। मैं उनके नजरिये से सहमत नहीं हो पाया। लेकिन अब भी यह विचार आता है कि क्या आत्म कल्याण के इच्छुक व्यक्ति के वाकई किसी के लिए दुआ मांगने से उसके पुण्य में क्षय हो सकता है।

https://youtu.be/KJ5N8KUBi3E


शनिवार, फ़रवरी 01, 2025

अच्छे लोगों को भगवान अपने पास जल्दी बुला लेता है?

आम तौर पर यदि किसी सज्जन व्यक्ति का कम उम्र में ही देहावसान हो जाता है तो यही कहा जाता है कि भगवान अच्छे लोगों को अपने पास जल्द बुला लेता है। अनेक उदाहरण ऐसे हैं भी, मगर इस धारणा का आधार क्या है, इसको लेकर सवाल उठते हैं। ऐसी क्या वजह है कि भगवान अच्छे लोगों की उम्र कम ही रखता है? उसका भला क्या प्रयोजन हो सकता है? यदि इस धारणा को सही मानें तो सवाल ये भी उठता है कि जिनकी उम्र अधिक होती है तो क्या वे बुरे होते हैं? इसके विपरीत हमारे यहां तो अधिक उम्र वालों को सौभाग्यशाली माना जाता है। यदि कोई अपने जीवन में पड़पोता या पड़पोती देखे तो उसे बहुत ही भाग्यवान मानते हैं। अधिक उम्र अच्छी होती है, इसी कारण तो हम लोग चिरायु होने की कामना करते हैं, लंबी उम्र की दुआ करते हैं। हमें पता है कि मनुष्य की अधिकतम उम्र एक सौ साल की होती है, फिर भी हम किसी के जन्मदिन पर तुम जीयो हजारों साल की शुभेच्छा जाहिर करते हैं। कदाचित मृत्यु के बाद भी कीर्ति पताका वर्षों तक फहराने के भाव से ऐसा किया जाता होगा।

शास्त्रों व पुराणों में कई ऋषियों के हजारों साल तक जीने के प्रसंग आते हैं। शास्त्रानुसार यह भी स्थापित तथ्य है कि हनुमानजी चिरंजीवी हैं। बताते हैं कि सीता माता ने हनुमानजी को लंका की अशोक वाटिका में राम का संदेश सुनने के बाद आशीर्वाद दिया था कि वे अजर-अमर रहेंगे। यानि कि वे चिरयुवा भी हैं। मान्यता है कि जहां भी भक्ति-भाव से भगवान राम की पूजा-अर्चना होती है, हनुमानजी वहां विद्यमान होते हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को चिरकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया था। वे आज भी पृथ्वी पर अपनी मुक्ति के लिए भटक रहे हैं। इसी प्रकार ऋषि मार्कण्डेय, भगवान वेद व्यास, भगवान परशुराम, राजा बलि, विभीषण और कृपाचार्य भी चिरंजीवी माने जाते हैं।

बहरहाल, अब मौलिक सवाल पर आते हैं। एक ओर हम ये मानते हैं कि भगवान अच्छे लोगों को अपने पास जल्दी बुला लेते हैं तो दूसरी ओर चिरायु होने को अच्छा माना जाता है। है न अजीबोगरीब विरोधाभास। 

ऐसा प्रतीत होता है कि केवल मन की संतुष्टि के लिए ऐसा कहा जाता है कि अच्छे लोगों के परिजन को सांत्वना देने के लिए यह कहा जाता है कि भगवान अच्छे लोगों को जल्द बुला लेता है। सच तो ये है कि मृत्यु का अच्छे या बुरे होने से कोई ताल्लुक नहीं है।

https://www.youtube.com/watch?v=PYIdyeNMAN8

गुरुवार, जनवरी 30, 2025

क्या मूर्ति में शक्ति होती है?

हिंदू संस्कृति में मूर्ति पूजा का बड़ा महत्व है। अधिसंख्य हिंदू मंदिर जाते हैं और मूर्ति पूजा करते हैं। मूर्ति के सामने खड़े हो कर सच्चे दिल से पूजा-अर्चना व आराधना करने से इच्छा की पूर्ति होती है, यह भी पक्की धारणा है। न केवल धारणा है, अपितु ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे, जिनसे प्रमाणित हो सकता है कि मूर्ति पूजा करने से इच्छित फल मिलता है। बावजूद इसके हिंदू संस्कृति की ही एक शाखा आर्य समाज मूर्ति पूजा में यकीन नहीं रखता। सच क्या है, जरा विचार कर के देखें।

असल में आर्य समाज के प्रवर्तक महर्षि दयानंद सरस्वती ने केवल इसी कारण मूर्ति पूजा का निषेध कर दिया कि मूर्ति में प्रतिष्ठित जो देवता या भगवान खुद अपनी रक्षा नहीं कर सकता, वह भला हमारा भला क्या करेगा? ऐसा ख्याल उनमें मन में तब आया, जब उन्होंने देखा कि एक मंदिर में मूर्ति पर एक चूहा चढ़ कर मस्ती कर रहा है और मूर्ति के सामने रखा प्रसाद खा रहा है। तब उनकी सोच बनी कि एक चूहे से मूर्ति अपनी रक्षा नहीं कर पा रही है तो मूर्ति की पूजा करने से क्या लाभ? तार्किक ढंग से यह बात सही प्रतीत होती है।

इसी कड़ी में हमारी यह भी जानकारी है कि मुस्लिम आतताइयों ने देश के अनेक स्थानों पर मंदिर ध्वस्त किए, मूर्तियां तोड़ीं, मगर उनका कुछ भी नहीं बिगड़ा। मूर्तियां अपनी ही रक्षा नहीं कर पाईं। ऐसे में यह सवाल तो उठता ही है कि क्या वाकई मूर्ति में कोई शक्ति नहीं होती? बावजूद इसके  मूर्तियों में अधिसंख्य हिंदुओं की प्रगाढ़ आस्था है। अनेक ऐसी मूर्तियां संज्ञान में हैं, जिनके बारे में मान्यता है कि वे चमत्कारी हैं। ज्यादा दूर नहीं जाते। निकटवर्ती नागौर जिले में मेड़ता के पास गांव में बंवाल माता का मंदिर है। यहां देवी की मूर्ति श्रद्धालुओं के सामने ढ़ाई प्याला शराब पीती है। बताते हैं कि कई वैज्ञानिकों ने उसकी जांच-पड़ताल की, मगर वे यह नहीं पकड़ पाए कि वहां कोई चालबाजी तो नहीं है। स्वयं मैंने देखा है कि देवी मां ढ़ाई प्याला शराब पीती है। रहस्य क्या है, कुछ पता नहीं। दिलचस्प बात ये है कि जिस श्रद्धालु के पास में तंबाकू होती है, उसकी शराब मूर्ति ग्रहण नहीं करती। इसको भी मैने आजमाया, तो सच निकला। ऐसी मान्यता है कि जिस श्रद्धालु का शराब रूपी प्रसाद देवी मां ग्रहण करती है, उसकी मनोकामना पूरी होती है। जिसका ग्रहण नहीं करती, उसके बारे में यह मान्यता है कि अभी देवी उससे प्रसन्न नहीं है। 

बात लंबी हो रही है, मगर प्रसंगवश बताना चाहता हूं कि कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनकी मान्यता है कि शिव जी, देवी मां, हनुमान जी, गणेश जी आदि देवताओं के अतिरिक्त लोक देवता बाबा रामदेव, भैरों जी, गोगा जी आदि तो त्वरित फल देते हैं, जबकि भगवान श्रीकृष्ण व भगवान श्री राम फल नहीं देते, अलबत्ता वे आत्म कल्याण जरूर करते हैं। चूंकि हमारी रुचि भौतिक उपलब्धियों में होती है, इसी कारण देवताओं की आराधना हम ज्यादा करते हैं। इस धारणा की पुष्टि इससे होती है कि देवताओं के तो अनेकानेक मंदिर हैं, जबकि भगवान श्री राम व भगवान श्री कृष्ण के मंदिर कम हैं।

खैर, मुद्दे पर आते हैं। सवाल ये कि क्या मूर्ति में शक्ति होती है? होनी तो चाहिए, क्योंकि मूर्ति निर्जीव पत्थर या धातु की होती है, इस कारण उनकी बाकायदा विधि-विधान से प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। प्राण प्रतिष्ठा के बाद तो एक अर्थ में वह सजीव हो जाती है। उसमें ताकत होनी ही चाहिए।  मगर फिर वही सवाल कि तो फिर वे अपनी रक्षा क्यों नहीं कर पाती? यानि कि कौतुहल बरकरार है। 

मूर्ति में शक्ति होती है, इस धारणा को बड़े पैमाने पर तब बल मिला, जब कुछ साल पहले पूरे देश में गणेश जी की मूर्तियों ने दूध पिया था। हालांकि उसकी वैज्ञानिक विवेचना भी हुई, आलोचना भी हुई। दूसरी ओर न्यायाधीशों व आईएएस अधिकारी स्तर के बुद्धिजीवियों ने भी गणेश जी को दूध पिलाया। बड़ी बहस हुई। किसी ने उसे अंध श्रद्धा करार दिया तो किसी ने वैज्ञानिक कारण बताए। हालांकि निष्कर्ष कुछ नहीं निकला। 

मुझे ऐसा लगता है कि मूर्ति में अपने आप में ताकत नहीं होती। सारा रहस्य आस्था में है। हम जब उस पर ध्यान केन्द्रित करते हैं तो हमारी आत्मिक शक्ति उसमें प्रतिबिंबित होती है। वही आत्मिक शक्ति पलट कर चमत्कार करती है और हमें ये लगता है कि मूर्ति ने चमत्कार किया है। जिस मूर्ति की बहुत अधिक मान्यता होती है, वहां चमत्कार की संभावना इसलिए बढ़ जाती है, क्यों कि वहां बहुत अधिक लोगों की आत्मिक शक्ति मूर्ति पर केन्द्रित होती है।

ऐसा भी हो सकता है कि भौतिक या त्वरित चमत्कार मूर्ति से नहीं होते होंगे। हम अपेक्षा करें कि वह हम मानवों की ही तरह व्यवहार करे तो यह संभव नहीं है। हां, उसमें धारणा करें तो वह अदृश्य रूप से फल देती होगी।

मूर्ति ही क्यों, किसी स्थान व मजारों आदि पर भी लोग इसी प्रयोजन मत्था टेकते हैं कि वहां मनोकामना पूरी होगी। आप देख सकते हैं कि कभी-कभी अजमेर की दरगाह ख्वाजा साहब के सामने कोई फकीर या कलंदर खड़ा हो कर सवाल करता है और तब तक डटा रहता है, जब तक वह सवाल पूरा नहीं होता। यह हठ योग है। ऐसे हठियों की मनोकामना भी पूरी होती ही है। हालांकि इसका साइंस कुछ और है।

आखिर में एक बात जरूर कहना चाहता हूं। वस्तुतः यह प्रकृति चूंकि विरोधी तत्त्वों से मिल कर बनी है, इस कारण इसमें विरोधाभास भी खूब हैं। यह इतनी रहस्यपूर्ण है कि हम इसकी थाह नहीं पा सकते। यहां कुछ भी अंतिम सत्य नहीं है। जिसे हम सत्य मानते हैं, वही देश, काल, परिस्थिति बदलने पर असत्य हो जाता है। मेरे कहने का तात्पर्य ये है कि हम न तो ये कह सकते हैं कि मूर्ति में शक्ति होती है और न ये कि वह केवल पत्थर है। कहीं है तो कहीं नहीं है। कभी है तो कभी नहीं। तभी तो जब मूर्ति के सामने कामना करने पर पूरी होती है तो कहते हैं कि वह चमत्कारी है और पूरी नहीं होती तो मूर्ति को दोष देने की बजाय खुद को जिम्मेदार मानते हैं कि हमारी श्रद्धा में ही कमी रह गई होगी।

मुझ अज्ञानी व अल्पबुद्धि को मूर्ति के रहस्य के बारे में जो कुछ समझ में आया है, वह साझा किया है। वास्तविक रहस्य क्या है, उसके आगे मैं सरंडर करता हूं। नेति नेति नेति।

https://www.youtube.com/watch?v=nFJzs_RS9gE&t=6s

बुधवार, जनवरी 29, 2025

जिसे दुबारा शादी करनी है, वह पत्नी की अंत्येष्टि में भाग नहीं लेता

आम तौर पर जिस भी युवा व्यक्ति की पत्नी की मृत्यु हो जाती है, तो वह दुबारा शादी करने का विचार रखता है। यदि बच्चे न हों तो करता भी है। यदि उसका विचार न भी हो तो भी रिश्तेदार उस पर दबाव बनाते हैं कि वह दुबारा विवाह कर ले। क्या आपको जानकारी है कि पत्नी के निधन पर फिर विवाह करने का इच्छुक पति, पत्नी की अंत्येष्टि में भाग नहीं लेता। समझा जा सकता है कि ऐसा करके वह अपने संबंधियों व परिचितों को यह संदेश देता है कि वह फिर विवाह करना चाहता है, लिहाजा उसके लिए किसी युवती की तलाश की जाए। हालांकि पत्नी की अंत्येष्टि में भाग न लेना पति के लिए कितना कष्टप्रद है, यह वह ही समझ सकता है, मगर बुजुर्ग उसे सलाह देते हैं कि वह अंतिम संस्कार में न जाए, ताकि फिर शादी का रास्ता खुला रहे, फिर भले ही बाद में वह न करे।

इस सिलसिले मैने ज्योतिष में रुचि रखने कुछ लोगों से चर्चा की तो उन्होंने कुछ अलग ही मत प्रकट किया। उनका कहना था कि यदि किसी आदमी की जन्म कुंडली में दो शादियों का योग हो, तो भी अंत्येष्टि में भाग लेने के बाद दूसरी शादी का योग नष्ट हो जाता है। उसके बाद यदि वह चाहे तो भी उसकी दूसरी शादी नहीं हो सकती। अगर अंत्येष्टि में भाग नहीं लेता तो वैवाहिक संभावना का वर्तुल अधूरा ही रह जाता है, वैक्यूम रह जाता है और वह दूसरी शादी कर सकता है। उसमें बाधा नहीं आती। एक अन्य जानकार ने अलग ही मिथ बताया। वो यह कि जब पति अंत्येष्टि के दौरान उपस्थित नहीं होता तो देह संस्कार के दौरान पत्नी की आत्मा को पति के न दिखाई देने पर उससे संबंध विच्छेद हो जाता है। ऐसे में जब वह दूसरी शादी करता है तो पूर्व पत्नी की आत्मा उसे परेशान नहीं करती। वैसे इसके अपवाद भी हैं कि किसी को पत्नी की अंत्येष्टि में भाग लेने से मना किया गया, मगर वह नहीं माना। बाद में उसकी दुबारा शादी हो गई। 

https://www.youtube.com/watch?v=rRmcMEuplmo&t=79s