तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

मंगलवार, अप्रैल 17, 2012

संघ के मोदी पर हाथ रखने से मचेगा भाजपा में घमासान

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की ओर से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को दिल्ली की ओर कूच करने का इशारा करने से भाजपा में पहले से चल रहे घमासान के बढऩे की आशंका तेज हो गई है। हालांकि प्रधानमंत्री पद के अन्य दावेदारों ने फिलवक्त चुप्पी साध रखी है, मगर समझा जाता है कि वे भी नया गणित बैठाने की जुगत करेंगे। पूर्व में पीएम इन वेटिंग रह चुके लाल कृष्ण आडवाणी के खासमखास पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने तो आडवाणी की खुल कर पैरवी कर दी है। उनका यह कहना कि वरिष्ठतम आडवाणी जी के रहते किसी और की दावेदारी का तो कोई मतलब ही नहीं है, यूं ही उड़ाने लायक नहीं है। जिन्ना के बारे में विवादित पुस्तक लिखने के कारण पूर्व में पार्टी से बाहर किए जा चुके जसवंत की हैसियत भले ही संघ के सामने कुछ नहीं हो, मगर उनका ठीक इसी मौके पर बोलना यह साबित करता है कि पार्टी का एक धड़ा अब भी निपटाए जा चुके आडवाणी में फिर जान फूंकने की कोशिश कर रहा है। समझा जाता है कि संघ की ओर से मोदी को प्रोजेक्ट करने को अन्य दावेदार भी आसानी से पचाने वाले नहीं हैं।
असल में कांग्रेस सरकार की लगभग तय सी विदाई से उत्साहित भाजपा में पहले से ही पीएम वेटिंग को लेकर खींचतान चल रही थी। लोकसभा में विपक्ष की नेता श्रीमती सुषमा स्वराज और राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली तो अपनी मौजूदा भूमिका के कारण प्रबल दावेदार माने ही जा रहे थे। उधर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी गुजरात दंगों से जुड़े एक मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्देश को अपनी जीत के रूप में प्रचारित कर तीन दिवसीय उपवास किया, जिसे इस रूप में लिया गया कि वे भी दावेदारी कर रहे हैं। रहा सवाल पूर्व में पीएम इन वेटिंग रह चुके आडवाणी का तो उन्होंने भी रथयात्रा के जरिए जता दिया था कि उन्हें खारिज बम न माने जाए। उनके दावे को बल इस कारण भी मिला कि रथ यात्रा के पूरी तरह से निजी फैसले पर भी पार्टी ने मोहर लगा दी थी। हालांकि औपचारिक बयान देते हुए पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने स्पष्ट करने की कोशिश की थी कि इसका मकसद उन्हें दावेदार के रूप में स्थापित करना नहीं है। गाहे बगाहे पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह का नाम भी उछलता रहता है। कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि पार्टी अध्यक्ष गडकरी भी गुपचुप तैयारी कर रहे हैं। वे लोकसभा चुनाव नागपुर से लडऩा चाहते हैं और मौका पडऩे पर खुल कर दावा पेश कर देंगे। कुल मिला कर यह स्पष्ट है कि भाजपा में एकाधिक दावेदार हैं। इस स्थिति को भले ही पार्टी अपनी संपन्नता करार दे कर विवाद को ढंकने का प्रयास करे, लेकिन यही उसके लिए सबसे बड़ी समस्या बना हुआ है
ताजा प्रकरण की विवेचना करें तो मोदी को दावेदार बताने की पहल खुद पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने ही की। हालांकि साथ ही वे यह भी कहते रहे कि सुषमा व जेतली भी प्रधानमंत्री पद के योग्य हैं। उनकी इस प्रकार की बयानबाजी से पार्टी में भारी असमंजस पैदा हो रहा था। मगर अब जब कि पार्टी के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्य ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम साफ तौर पर उछाल दिया है। दरअसल पहले टाइम पत्रिका में नरेन्द्र मोदी को विकास पुरुष बताने और अब गुलबर्गा सोसायटी में एसआईटी द्वारा क्लीन चिट दिए जाने के बाद संघ कुछ ज्यादा ही उत्साहित है। पांचजन्य ने तो साफ तौर पर कहा है कि नरेन्द्र मोदी को प्रदेश के नहीं बल्कि देश के नेतृत्व पर सोचना चाहिए। यूं पिछले दिनों नागपुर में हुई संघ की महाबैठक में भी मोदी का नाम आया था, मगर बात सिरे तक नहीं पहुंची। मगर जैसे ही एसआईटी ने मोदी को बेदाग घोषित कर दिया, संघ के मुखपत्र ने तुरंत मौका लपक लिया। यानि कि संघ पार्टी को कठपुतली की तरह इस्तेमाल करना चाहती है। मगर धरातल के राजनीतिक समीकरणों व मजबूरियों को समझने वाली पार्टी इससे बड़े भारी पशोपेश में पड़ जाएगी कि वह अपना चेहरा पूरी तरह से हिंदूवादी कैसे कर दे? विशेष रूप से प्रधानमंत्री पद के अन्य दावेदार, जो कि यही चाहते रहे कि मोदी पर कट्टर हिंदूवादी लेबल लगा रहे, मगर एसआईटी की ओर से मोदी को क्लीन चिट दिए जाने पर संघ के नए दाव के बाद उनको सांप सूंघ गया है।
पार्टी से अलग हट कर विचार करें तो भी यह लगता है कि मोदी दिल्ली के कुछ और नजदीक पहुंच गए हैं। वजह ये है कि पहले जहां कांग्रेस मोदी को कसाई बता कर उनके खिलाफ अभियान छेड़े हुई थी, अब उसकी बोलती बंद हो गई है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी को अब मोदी को मौत का सौदागर कहने से पहले दस बार सोचना पड़ेगा।
जहां तक मीडिया का सवाल है, वह भी भाजपा की ओर से मोदी को दावेदार मानने लगा है। टाइम पत्रिका की ओर से आगामी भिडंत राहुल व मोदी के बीच होने की संभावना जताए जाने के बाद हुए एक सर्वे में यह रुझान आया कि प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी को 24 प्रतिशत लोगों ने पसंद किया है और कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को केवल 17 प्रतिशत लोग ही चाहते हैं। उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद तो राहुल का ग्राफ और भी गिरा है। ऐसे में मोदी को क्लीन चिट मिलने पर संघ ने तुरंत उनको दौड़ में सबसे आगे ला खड़ा करने की कोशिश की है। उनको राष्ट्रीय स्तर पर मान्य बनाने के लिए गुजरात में हुए विकास को गिना कर उन्हें विकास पुरुष स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि धरातल का एक सच ये भी है कि भले ही टाइम पत्रिका उनको अपने मुख पत्र पर छापे और एसआईटी उन्हें क्लीन चिट दे दे, पार्टी का एक धड़ा यह जानता है कि आम जनता में उनकी छवि इतनी सुधर नहीं पाई है, जितनी कि जताई जा रही है। आज भी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के उस कथन को गिनाया जाता है, जिसमें मोदी के राजधर्म पर चलने को कहा गया था। बहरहाल देखते हैं कि संघ के इस नए पैंतरे के क्या परिणाम निकलते हैं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

शुक्रवार, अप्रैल 13, 2012

निर्मल बाबा को मीडिया ने ही चढ़ाया, वही उतार रहा है

समागम के नाम पर दरबार लगा कर अपने भक्तों की समस्याओं का चुटकी में कथित समाधान करने की वजह से लोकप्रिय हो रहे निर्मल बाबा स्वाभाविक रूप से संस्पैंस बढऩे के कारण यकायक इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के निशाने पर आ गए हैं। स्टार न्यूज ने अपने क्राइम के सीरियल सनसनी पर एक विशेष रिपोर्ट प्रसारित कर उनका पूरा पोस्टमार्टम ही कर दिया है। अब तक उनके बारे में कोई विशेष जानकारी किसी समाचार माध्यम पर उपलब्ध नहीं थी, उसे भी कोई एक माह की मशक्कत के बाद उजागर किया है कि आखिर उनकी विकास यात्रा की दास्तान क्या है। इतना ही नहीं उन पर एक साथ दस सवाल दाग दिए हैं। दिलचस्प मगर अफसोसनाक बात ये है कि ये वही स्टार न्यूज चैनल है, जो प्रतिदिन उनका विज्ञापन भी जारी करता रहा है और अब न्यूज चैनलों पर विज्ञापनों के जरिए चमत्कारों को बढ़ावा देने से की प्रवृत्ति से बचने की दुहाई देते हुए बड़ी चतुराई से बाबा के करोड़ों रुपए कमाने पर सवाल खड़े कर रहा है। इतना ही नहीं अपने आप को ईमानदार जताने के लिए विज्ञापन अनुबंध की तय समय सीमा समाप्त होने के बाद वह इसका प्रसारण बंद करने की भी घोषणा कर रहा है।
सवाल उठता है कि यदि वाकई स्टार न्यूज को चमत्कारी बाबाओं का महिमा मंडन किए जाने पर ऐतराज रहा है, तो यह उसे अब कैसे सूझा कि ऐसे विज्ञापन नहीं दिखाए जाने चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि या तो विज्ञापन की रेट को लेकर विवाद हुआ होगा या फिर ये लगा होगा कि जितनी कमाई बाबा के विज्ञापन से हो रही है, उससे कहीं अधिक का फायदा तो टीआरपी बढऩे से ही हो जाएगा। वजह स्पष्ट है कि जब सारे चैनल किसी के गुणगान में जुटे हों तो जो भी चैनल उसका नकारात्मक पहलु दिखाएगा, दुनिया उसी की ओर आकर्षित होगी। इसी मसले से जुड़ी एक तथ्यात्मक बात ये भी है कि स्टार न्यूज ने बाबा के बारे में जो जानकारी बटोरने का दावा किया है, वह सब कुछ तो सोशल मीडिया पर पहले से ही आने लग गई थी। उसे लगा होगा कि जब बाबा की खिलाफत शुरू हुई है तो कोई और चैनल भी दिखा सकता है, सो मुद्दे को तुरंत लपक लिया। मुद्दा उठाने को तर्कसंगत बनाने के लिए प्रस्तावना तक दी, जिसकी भाषा यह साबित करती प्रतीत होती है, मानो चैनलों की भीड़ में अकेला वही ईमानदार है।
असल में निर्मल बाबा चमत्कारी पुरुष हैं या नहीं या उनका इस प्रकार धन बटोरना जायज है या नाजायज, इस विवाद को एक तरफ भी रख दिया जाए, तो सच ये है कि उन्हें चमत्कारी पुरुष के रूप में स्थापित करने और नोट छापने योग्य बनाने का श्रेय इलैक्ट्रॉनिक मीडिया को जाता है। बताते हैं कि इस वक्त कोई चालीस चैनलों पर निर्मल बाबा के दरबार का विज्ञापन निरंतर आ रहा है। जब बाबा भक्तों से कमा रहे हैं तो भला इलैक्ट्रॉनिक मीडिया उनसे क्यों न कमाए? माना कि चैनल चलाने के लिए धन की जरूरत होती है, मगर इसके लिए आचार संहिता, सामाजिक सरोकार, नैतिकता व दायित्वों को तिलांजलि देना बेहद अफसोसनाक है। ऐसे में क्या यह सवाल सहज ही नहीं उठता कि निर्मल बाबा के विज्ञापन देने वाले चैनल थोड़ा सा तो ख्याल करते कि आखिर वे समाज को किस ओर ले जा रहे हैं? क्या जनता की पसंद, जनभावना और आस्था के नाम पर अंधविश्वास को स्थापित कर के वे अपने दायित्व से च्युत तो नहीं हो रहे? कैसी विडंबना है कि एक ओर जहां इस बात पर जोर दिया जाता है कि समाचार माध्यमों को कैसे अधिक तथ्यपरक व विश्वनीय बनाया जाए और उसी के चलते चमत्कार से जुड़े प्रसंगों पर हमले किए जाते हैं, वहीं हमारे मीडिया ने कमाने के लिए चमत्कारिक व्यक्तित्व निर्मल बाबा की कमाई से कुछ हिस्सा बांटना शुरू कर दिया। सच तो ये है कि इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की ही बदौलत पिछले कुछ वर्षों में एकाधिक बाबा अवतरित हुए हैं। वे इसके जरिए लोकप्रियता हासिल करते हैं और धन बटोरने लग जाते हैं। दोनों का मकसद पूरा हो रहा है। सामाजिक सरोकार जाए भाड़ में। बाबा लोग पैसा खर्च करके लोकप्रियता और पैसा बटोर रहे हैं और चैनल पैसे की खातिर बिकने को तैयार बैठे हैं।
थोड़ा सा विषयांतर करके देखें तो बाबा रामदेव की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। उनसे भी बेहतर योगी हमारे देश में मौजूद हैं और अपने छोटे आश्रमों में गुमनामी के अंधेरे में काम कर रहे हैं, मगर बाबा रामदेव ने योग सिखाने के नाम पर पैसा लेना शुरू किया और उस संचित धन को मीडिया प्रबंधन पर खर्च किया तो उन्हें भी इसी मीडिया ने रातों रात चमका दिया। यद्यपि उनके दावों पर भी वैज्ञानिक दृष्टि से सवाल उठाए जाते हैं, मगर यदि ये मान लिया जाए कि कम से कम चमत्कार के नाम तो नहीं कमा रहे, मीडिया की बदौलत ऐसे चमके हैं कि उसी लोकप्रियता को हथियार बना कर सीधे राजनीति में ही दखल देने लग गए हैं।
अन्ना हजारे का मामला कुछ अलग है, मगर यह सौ फीसदी सच है कि वे भी केवल और केवल मीडिया की ही पैदाइश हैं। उसी ने उन्हें मसीहा बनाया है। माना कि वे एक अच्छे मकसद से काम कर रहे हैं, इस कारण मीडिया का उनको चढ़ाना जायज है, मगर चमकने के बाद उनकी भी हालत ये है कि वे सीधे पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही चुनौती दे रहे हैं। आज अगर उनकी टीम अनियंत्रित हो कर दंभ से भर कर बोल रही है तो उसके लिए सीधे तौर यही मीडिया जिम्मेदार है। अन्ना और मीडिया के गठजोड़ का ही परिणाम था कि अन्ना के आंदोलन के दौरान एकबारगी मिश्र जैसी क्रांति की आशंका उत्पन्न हो गई थी।
लब्बोलुआब इलैक्ट्रॉनिक मीडिया जितना धारदार, व्यापक व प्रभावशाली है, उतना ही गैर जिम्मेदाराना व्यवहार कर रहा है। सरकार व सेना के बीच कथित विवाद को उभारने का प्रसंग इसका ज्वलंत उदाहरण है। इसे वक्त रहते समझना होगा। कल सरकार यदि अंकुश की बात करे, जो कि प्रेस की आजादी पर प्रहार ही होगा, तो इससे बेहतर यही है कि वह बाजार की गला काट प्रतिस्पद्र्धा में कुछ संयम बरते और अपने लिए एक आचार संहिता बनाए।
-तेजवानी गिरध
7742067000
tejwanig@gmail.com

सोमवार, अप्रैल 09, 2012

पाक राष्ट्रपति जरदारी की जियारत के साथ जुड़ गए विवाद


पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की महान सूफी संत हजरत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह जियारत तो सुकून से हो गई, मगर इसके साथ ही दो बड़े विवाद जुड़ गए हैं। एक तो दरगाह दीवान सैयद जैनुल आबेदीन अली खान द्वारा उचित पास न मिलने के कारण बहिष्कार और जरदारी की ओर से की गई पांच करोड़ रुपए देने की घोषणा।
दरगाह दीवान
दरगाह के दीवान सैयद जैनुल आबेदीन अली खान को पूरे परिसर को अधिकृत पास नहीं देने से वे काफी खफा हैं। उनके सचिव सैयद अलाऊद्दीन आरिफ ने बाकायदा लिखित बयान जारी कर संकेत दिया है कि इस घटना के बाद दरगाह दीवान साहब ने अपने कानूनी अधिकार का इस्तेमाल करते हुए हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट जाने का मानस बना लिया है।
उनका कहना है कि जरदारी की की दरगाह पर यात्रा के समय जिला प्रशासन ने सैकड़ों साल पुरानी परंपरा को तिलांजलि दे दी। प्रशासन ने दीवान पूरे दरगाह परिसर का अधिकृत पास नहीं दिया, जिसके चलते उन्होंने जरदारी की यात्रा का बॉयकाट किया। उन्होंने कहा कि हजरत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में सज्जादानशीन, खादिम और दरगाह कमेटी की अपनी अपनी भूमिका है। जहां दरगाह कमेटी दरगाह एक्ट के अनुसार प्रबंधन का कार्य करती है, वहीं सज्जादानशीन ख्वाजा साहब के वंशज की हैसियत से धार्मिक रस्में अदा करते आ रहे हैं। प्राचीन परंपराओं के अनुसार दरगाह दीवान किसी भी राष्ट्राध्यक्ष के निजाम गेट पर आगवानी करने के बाद मजार तक साथ जाते हैं। मजार शरीफ पर खादिम द्वारा जियारत कराई जाती है। उनका कहना है कि इस मरतबा अतिविशिष्ट व्यक्ति की यात्रा के दौरान दीवान साहब को निजाम गेट तक का पास दिया गया था।
 दरगाह दीवान के सचिव ने सैयद जैनुल आबेदीन अली खान क े हवाले से कहा कि  सैकड़ों साल पुरानी परंपरा को प्रशासन कैसे तोड़ सकता है? पाकिस्तानी राष्ट्रपति के लिए परंपराओं को नहीं तोड़ा जा सकता है। प्रशासन में कुछ ऐसे तत्व हैं जो दोनों देशों के बीच दोस्ती का माहौल  नही चाहते हैं और उन्होने बेवजह का विवाद पैदा कर दीवान साहब और खादिमों के कथित विवाद की आड़ लेकर सैकड़ों वर्षो की परंपराओं को तोड़ा है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2005 में पाक के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के आगमन, बंगलादेश की राष्ट्रपति शेख हसीना के अलावा इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के यात्रा के दौरान दरगाह दीवान साहब पुरानी रस्मों के साथ आगवानी की थी। इस समय नए विवाद को जन्म दिया गया है। उन्होंने बताया कि बंगलादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की अजमेर जियारत के दौरान भी इस तरह का विवाद उत्पन्न हुआ था, लेकिन प्रशासन ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए ऐन वक्त पर समस्त दरगाह परिसर का पास जारी किया। उन्होंने कहा कि ताजा प्रकरण में सरकार का रवैया दगाह पर आस्था रखने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं की धार्मिक अस्था को ठेस पहुंचाने वाला है।
असल में ऐसा प्रतीत होता है कि दरगाह दीवान, खुद्दामे ख्वाजा व दरगाह कमेटी के बीच चलती वर्षों पुरानी खींचतान के चलते ही प्रशासन ने विवाद से बचने के लिए दीवान को पास नहीं दिया होगा, मगर उसे यह ख्याल नहीं रहा कि उसने एक नई बला को न्यौता दे दिया है। हालांकि ख्वाजा साहब के वंशज के मामले में वर्षों से विवाद होता रहता है, मगर इतना तो तय है कि परंपरा के मुताबिक दरगाह दीवान किसी भी राष्ट्राध्यक्ष के निजाम गेट पर अगवानी करने के बाद मजार तक साथ जाते हैं और परंपरा के ही मुताबिक मजार शरीफ पर जियारत खादिम द्वारा कराई जाती है। इस मरतबा दीवान को केवल निजाम गेट तक का ही पास दिया गया था।
यहां उल्लेखनीय है कि दरगाह दीवान अपने हकों के लिए वर्षों से लड़ रहे हैं और इसके लिए वे किसी भी सीमा तक चले जाते हैं। दरगाह ख्वाजा साहब एक्ट से संबंधित किताबें तो उन्हें कंठस्थ याद हैं। कानून के भी पक्के जानकार हैं। और कोई छोटा मसला होता तो कदाचित गम भी खा जाते, मगर पाक राष्ट्रपति का मसला काफी बड़ा है। प्रशासन के पास भले ही नगर निगम मेयर कमल बाकोलिया, भाजपा विधायक वासुदेव देवनानी, पाकिस्तान की जेल में बंद सरबजीत की बहिन व पुत्री आदि को पास जारी न करने का कोई संतोषजनक जवाब हो, मगर दरगाह शरीफ की धार्मिक परंपरा से जुड़े मसले पर उठे विवाद से निपटने में प्रशासन को जोर आएगा।
जरदारी की इस यात्रा के साथ जुड़ा विवाद ये है कि उन्होंने जियारत के दौरान पांच करोड़ रुपए देने की घोषणा की। इस पर उनको जियारत कराने वाले खादिम और खादिमों की संस्था अंजुमन सैयद जादगान का कहना है कि वे नजराने के तौर पर घोषणा करके गए हैं, इस कारण उस राशि पर उनका हक है, दूसरी ओर दरगाह कमेटी का मानना है कि वे दरगाह के विकास के लिए घोषणा करके गए हैं, अत: यह राशि उसको मिलनी चाहिए, ताकि वह उसका दरगाह के विकास में उपयोग कर सके। बहरहाल, अब यह विवाद तभी समाप्त होगा, जब जरदारी राशि भेजते समय उसका क्या उपयोग करना है, यह साफ करते हैं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

रविवार, अप्रैल 08, 2012

जरदारी की उम्मीद अलबत्ता पूरी हो जाए, हमारी नहीं होगी

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी भारत की यात्रा पर हैं। उनकी यह यात्रा पूरी तरह से निजी है और उनका असल मकसद महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह में हाजिरी देना है। जाहिर सी बात है कि वे फिर कोई उम्मीद ले कर आ रहे हैं। बेहद परेशानी में हैं। उन पर लगे भ्रष्टाचार के मामलों को दोबारा खोलने के लिए पाकिस्तान का सुप्रीम कोर्ट प्रधानमंत्री गिलानी पर दबाव बना रहा है। जरूर उससे राहत पाने की दुआ करने को वे ख्वाजा साहब के दर पर आ रहे हैं। इससे पहले भी उनकी उम्मीद पूरी हो चुकी है। जेल से रिहाई होने पर वे अपनी बेगम पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती बेनजीर भुट्टो के साथ मन्नत का धागा खोलने और शुक्राना अदा करने आ चुके हैं। जैसा कि सब जानते हैं कि ख्वाजा सबकी झोली भरते हैं, सो उम्मीद है कि इस बार भी वे जो उम्मीद ले कर आ रहे हैं, वह पूरी होगी, मगर उनसे भारत को उम्मीद करना बेमानी है।
हालांकि इस निजी यात्रा के दौरान वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भी मिल रहे हैं, मगर वह औपचारिक ही है। बातचीत का कोई एजेंडा नहीं है। ज्ञातव्य है कि इन दिनों आतंकवादी हाफिज सईद के सिर पर इनाम रखा हुआ है, इस कारण वह मुद्दा बेहद गर्माया हुआ है, मगर इस मुलाकात में इस पर कोई चर्चा होने की कोई उम्मीद नहीं है। उम्मीद करनी भी नहीं चाहिए। खुद जरदारी ने भी लाहौर में रवाना होने से पहले उम्मीद जता दी है कि मनमोहन इस मुद्दे को नहीं उठाएंगे। उनके पास कुछ जवाब देने को है ही नहीं।
असल में जरदारी का भारत आना तय होते ही पाकिस्तान में रोना-धोना शुरू हो गया था। कई विरोधी दल और कट्टरपंथी संगठन छाती पीट रहे हैं कि एक ओर आतंकवादी हाफिज सईद के सिर पर इनाम रखा जा रहा है और दूसरी ओर हमारे राष्ट्रपति दुश्मन देश की यात्रा कर रहे हैं। वस्तुत: जरदारी पाकिस्तान के बेहद कमजोर राष्ट्रपति हैं, जो अपनी पत्नी बेनजीर भुट्टो की शहादत की वजह से इस कुर्सी तक पहुंच तो गए, लेकिन ख़ुद पाकिस्तान में कोई उन्हें कोई खास तवज्जो नहीं देता। हालत तो ये है कि वहां तख्ता पलट तक की चर्चा होती रहती हैं। हकीकत ये है कि पाकिस्तान में सरकार जरदारी या गिलानी नहीं, बल्कि सेना, आईएसआई और आतंकवादी चलाते हैं। जाहिर सी बात है कि जिस मुल्क में अवाम ने भी आतंकवादियों को ही अपना रहनुमा मान लिया हो, उस मुल्क में बेचारा प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति क्या कर सकता है। आतंकवादियों के डर से जब उसने अपने आका अमेरिका को ओसामा बिन लादेन नहीं सौंपा, तो एक दुश्मन देश को हाफिज सईद को सौंपने की हिम्मत कैसे जुटा सकता है। ऐसे में भारत का उनसे सईद के मामले में उम्मीद करना पूरी तरह से बेमानी है, भले वे शहंशाहों के शहंशाह ख्वाजा गरीब नवाज से अपनी उम्मीद पूरी करवा कर लौटें।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
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शुक्रवार, मार्च 30, 2012

पश्यंति वाणी सुन कर गीता पर लिखी अनूठी पुस्तक

सूफी संत मिश्राजी द्वारा गीता के एक श्लोक की 110 पेज में व्याख्या
अजमेर। गत दिनों अजमेर से एक यादगार पुस्तक प्रकाशित हुई है। इस पुस्तक में सूफी संत हजरत हरप्रसाद मिश्रा उवैसी ने गीता के एक श्लोक की 110 पेज में व्याख्या कराई है। प्राचीन ऋषि-मुनियों वाली मनोसंवाद विधि से कराए गए इस कार्य के लिए आपने अपने मुरीद अजमेर के जाने-माने इतिहासविद व पत्रकार श्री शिव शर्मा को माध्यम बनाया।
गीता शास्त्र में दूसरे अध्याय के सर्वाधित चर्चित श्लोक है-
कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफल हेतुर्भूमा, ते संगोस्तव कर्मणि।
इस एक ही श्लोक में गीता के कर्मयोग का सार निहित है। इसका अर्थ समझने के लिए कर्म के उनतीस रूपों की विवेचना की गई है-स्वकर्म, स्वधर्म, नियतकर्म, अकर्म, विकर्म, निषिद्ध कर्म आदि। आपने स्पष्ट किया है कि कर्म के शास्त्रीय, प्रासंगिक, मनोवैज्ञानिक और परिस्थितिगत व्यावहारिक पक्षों को ज्ञात लेने के बाद ही इस श्लोक के वास्तविक अर्थ को समझा जा सकता है। गुरुदेव ने 22 नवंबर 2008 को महासमाधि ले ली थी और यह कार्य आपने 2011 में करवाया। आपकी रूहानी चेतना के माध्यम बने आपके शिष्य श्री शिव शर्मा ने बताया कि शक्तिपात के द्वारा आपने नाम दीक्षा के वक्त ही मेरी कुंडलिनी शक्ति को आज्ञाचक्र पर स्थित कर दिया था। फिर मेरी आंतरिक चेतना को देह से समेट कर आप इसी जगह चैतन्य कर देते थे। उसी अवस्था में आप इस श्लोक की व्याख्या समझाते थे। यह कार्य पश्यन्ती वाणी के सहारे होता था। वाणी के चार रूप होते हैं-परा यानि जिसे आकाश व्यापी ब्रह वाणी जो केवल सिद्ध संत महात्मा सुनते हैं, पश्यन्ति यानि नाभी चक्र में धड़कने वाला शब्द जो आज्ञा चक्र पर आत्मा की शक्ति से सुना जाता है और देखा भी जाता है, मध्यमा यानि हृदय क्षेत्र में स्पंदित शब्द और बैखरी यानि कंड से निकलने वाली वाणी जिसके सहारे में हम सब बोलते हैं। कामिल पूर्ण गुरू हमारे अंतर्मन में पश्यन्ती के रूप में बोलते हैं। गुरुदेव ने मुझ पर इतनी बड़ी कृपा क्यों की, मैं नहीं जानता, किंतु जिन दिनों आप मुझसे यह कार्य करवा रहे थे, उन दिनों ध्यान की खुमारी चढ़ी रहती थी। ध्यान में गीता, मौन में गीता, इबादत में गीता, सत्संग में गीता, अध्ययन में गीता और चिंतन में भी गीता ही व्याप्त रहती थी। बाहरी स्तर पर जीवन सामान्य रूप से चलता रहता था, लेकिन अंतर्मन में गुरु चेतना, गीता शास्त्र और भगवान वासुदेव श्री कृष्ण की परा चेतना धड़कती रहती थी।
हजरत मिश्रा जी ने भगवान श्री कृष्ण के दो बार दर्शन किए थे। उनके दीक्षा गुरू सूफी कलंदर बाबा बादामशाह की भी श्रीकृष्ण में अटूट निष्ठा थी। संभवत: इसीलिए पर्दा फरमाने के बाद भी आपने गीता के इस एक ही श्लोक की विराट व्याख्या वाला लोककल्याणकारी कार्य कराया है। इस पुस्तक में गुरुदेव ने कहा है कि मनुष्य मन का गुलाम है और गीता इस गुलामी से छूटने की बात करती है। आप कामनाओं के वश में हैं और गीमा इनसे मुक्त होने की राह दिखाती है। आप पर अहंकार हावी है, जबकि गीता इस अहंकार को जड़मूल से उखाड़ फैंकने की बात समझाती है। आप भोग की तरफ भागते हैं, गीता कर्मपथ पर दौड़ाती है। आप स्वर्ग के लिए ललचाते हैं और गीता आपको जन्म-मरण से छुटकारा दिलाने वाले परमधाम तक पहुंचाना चाहती है। इसलिए गीता से भागो मत, उसे अपनाओ, कर्मयोग से घबराओ मत, उसे स्वीकार करो। तुम मोक्षदायी कर्मयोग के पथ पर कदम तो रखो, भगवान स्वयं तुम्हें चलाना सिखा देंगे।
पुस्तक में गुरू महाराज ने कहा है कि मनुष्य को केवल कर्तव्य कर्म करने का अधिकार है। स्वैच्छाचारी कर्म उसका पतन करते हैं। यह पुस्तक अजमेर के अभिनव प्रकाशन ने प्रकाशित की है। इसके बाद नारी मुक्ति से संबंधित अगली पुस्तक में गुरूदेव गीता के ही आधे श्लोक की व्याख्या करा रहे हैं।
लेखक शिव शर्मा स्वभाव से दार्शनिक हैं और अजमेर के इतिहास के अच्छे जानकार हैं। इससे पहले वे अनेक पुस्तकें लिख चुके हैं। उनमें प्रमुख हैं-भाषा विज्ञान, हिंदी साहित्य का इतिहास, ऊषा हिंदी निबंध, केशव कृत रामचन्द्रिका, कनुप्रिया, चंद्रगुप्त, रस प्रक्रिया, भारतीय दर्शन, राजस्थान सामान्य ज्ञान, हमारे पूज्य गुरुदेव, पुष्कर: अध्यात्म और इतिहास, अपना अजमेर, अजमेर : इतिहास व पर्यटन, दशानन चरित, सदगुरू शरणम, मोक्ष का सत्य, गुरू भक्ति की कहानियां।
उनका संपर्क सूत्र है:-
101-सी-25, गली संख्या 29, नई बस्ती, रामगंज, अजमेर
मोबाइल नंबर- 9252270562

मंगलवार, मार्च 27, 2012

...इसलिए नहीं निभा पा रही भाजपा सशक्त विपक्ष की भूमिका


बहुदलीय प्रणाली और छोटे व क्षेत्रीय दलों का राष्ट्रीय राजनीति में दखल के चलते एक ओर जहां देश में कमजोर गठबंधन सरकारों का दौर चल रहा है, वहीं पार्टी विथ द डिफ्रेंस का विशेषण खोती भाजपा भी कमजोर विपक्ष साबित होती जा रही है। भले ही उसने कई मुद्दों पर कांग्रेस नीत सरकार को घेरने की कोशिश की हो और कुछ कामयाब भी रही हो, मगर यह उसकी कमजोरी का ही प्रमाण है कि काला धन, भ्रष्टाचार और लोकपाल बिल जैसे मुद्दों पर उसकी पकड़ नहीं होने के कारण ही बाबा रामदेव व अन्ना हजारे यकायक उभर कर आ गए हैं।
असल में परिवारवाद और भ्रष्टाचार की मिसाल बनी कांग्रेस की तुलना में भाजपा की अहमियत थी ही इस कारण कि उसमें आम लोगों को चरित्र व शुचिता नजर आती थी। संसद में भले ही वह संख्या बल में कमजोर रही, मगर उसके प्रति एक अलग ही सम्मान हुआ करता था। उसकी यह विशिष्ट पहचान तभी तक रही, जब तक कि वह लगातार विपक्ष में ही रही। जैसे ही उसने सत्ता का मजा चखा, उसी प्रकार के दुर्गुण उसमें भी आते गए, जैसे कि कांग्रेस में कूट-कूट कर भरे हुए थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में जिस प्रकार भाजपा ने अपने असली ऐजेंडे को साइड में रख कर ममता, जयललिता व माया से समझौते दर समझौते कर सरकार चलाई, उसकी अपनी मौलिक पहचान खोती चली गई। आज भले ही मनमोहन सिंह की सरकार गठबंधन की मजबूरी के लिए रेखांकित हो कर जानी जाने लगी है, मगर वाजपेयी भी कम मजबूर नहीं थे। अगर यह कहा जाए कि भाजपा सत्ता के साथ जुड़ी जरूरी बुराइयों का पता ही तब लगा, धरातल की राजनीति के आटे-दाल का भाव ही तब पता चला, जबकि उसने सत्ता को पाया तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। हिंदुत्व, स्वदेश व देश प्रेम की ऊंची व आदर्शपूर्ण बातें उसने विपक्ष में रहते तो बड़े जोर शोर से की और वह लोगों को अच्छी भी लगती थी, मगर जैसे ही भारतीय विमान यात्रियों को अपहरणकर्ताओं के चंगुल से छुड़ाने के लिए आतंवादियों को सौंपने जैसी हालत से गुजरना पड़ा, सबको पता लग गया कि उसे भी सत्ता में आने के बाद पूरा विश्व और उसकी व्यवस्था समझ में आ गई है। कदाचित इसी कारण उसे कट्टर हिंदूवाद से हट कर राजनीति करनी पड़ी और वही उसके लिए घातक हो गई। इंडिया शाइनिंग के नारे और मजबूत बनाम सशक्त प्रधानमंत्री के नारे के बाद भी जब सत्ता नहीं मिली तो उसके थिंक टैंकों को यह सोचने को मजबूर होना पड़ गया कि कहीं न कहीं मौलिक भूल हो रही है। एक ओर तो सत्ता के लिए धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढऩे की मजबूरी तो दूसरी ओर मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कान मरोडऩे के बीच उसे समझ में नहीं आ रहा कि वह आखिर कौन सा रास्ता अख्तियार करे। हालांकि अब भी वह संघ से ही संचालित होती है, मगर उसके भीतर दो वर्ग पैदा हो गए हैं। एक वे जो कट्टर हिंदूवादी हैं तो दूसरे वे जो नरमपंथी हैं। इन्हीं के बीच संघर्ष मचा हुआ है। यह ठीक वैसी स्थिति है, जैसी जनता पार्टी के दौर में थी, जब एक मौलिक वर्ग को अलग हो कर भारतीय जनता पार्टी बनानी पड़ी थी। आज दिल्ली से ले कर ठेठ नीचे तक असली और दूसरे दर्जे के नेता व कार्यकर्ता का संघर्ष चल रहा है।
इतना ही नहीं, एक और समस्या भी उसके लिए सिरदर्द बन गई है। कांग्रेस के परिवारवाद की आलोचना कर अपने अपने भीतर आंतरिक लोकतंत्र की दुहाई देने वाली भाजपा में राज्य स्तर पर व्यक्तिवाद उभर आया है। उसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है कर्नाटक, जहां पार्टी को खड़ा करने वाले निवर्तमान मुख्यमंत्री येदियुरप्पा का कद पार्टी से भी बड़ा हो गया है। वो तो लोकायुक्त की रिपोर्ट का भारी दबाव था, वरना पार्टी के आदेश को तो वे साफ नकार ही चुके थे। हालांकि पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारक इकाई संसदीय बोर्ड के एकमत से इस्तीफा देने के फैसले को मानने के लिए मजबूर हुए, मगर एक बार फिर सिर उठाने लगे हैं।
इसी प्रकार राजस्थान का मामला भी सर्वाधिक चर्चित रहा, जिसकी वजह से पार्टी की प्रदेश इकाई खूंटी पर लटकी नजर आई। यहां पार्टी आलाकमान के फैसले के बावजूद पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने नेता प्रतिपक्ष के पद से इस्तीफा देने से इंकार कर दिया था। बड़ी मुश्किल से उन्होंने पद छोड़ा, वह भी राष्ट्रीय महासचिव बनाने पर। उनके प्रभाव का आलम ये था कि तकरीबन एक साल तक नेता प्रतिपक्ष का पद खाली ही पड़ा रहा। आखिरकार पार्टी को झुकना पड़ा और फिर से उन्हें फिर से इस पद से नवाजा गया। ऐसे में भाजपा के इस मूलमंत्र कि 'व्यक्ति नहीं, संगठन बड़ा होता है, की धज्जियां उड़ गईं।
गुजरात, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, झारखण्ड, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे कई राज्य हैं, जहां के क्षत्रपों ने न सिर्फ पार्टी आलाकमान की आंख से आंख मिलाई, अपितु अपनी शर्तें भी मनवाईं। अफसोसनाक बात है कि उसके बाद भी पार्टी सर्वाधिक अनुशासित कहलाना चाहती है। आपको याद होगा कि दिल्ली में मदन लाल खुराना की जगह मुख्यमंत्री बने साहिब सिंह वर्मा ने हवाला मामले से खुराना के बरी होने के बाद उनके लिए मुख्यमंत्री पद की कुर्सी को छोडऩे से साफ इंकार कर दिया था। उत्तर प्रदेश में तो बगावत तक हुई। कल्याण सिंह से जब मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा लिया गया तो वे पार्टी से अलग हो गए और नई पार्टी बना कर भाजपा को भारी नुकसान पहुंचाया। मध्यप्रदेश में उमा भारती का मामला भी छिपा हुआ नहीं है। वे राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी को खुद पर कार्रवाई की चुनौती देकर बैठक से बाहर निकल गई थीं। शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बनाए जाने पर उन्होंने अलग पार्टी ही गठित कर ली। एक लंबे अरसे बाद उन्हें पार्टी में शामिल कर थूक कर चाटने का मुहावना चरितार्थ किया गया।
इसी प्रकार गुजरात में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का कद आज इतना बड़ा हो चुका है कि पार्टी पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगने के बाद भी हाईकमान में इतनी ताकत नहीं कि उन्हें कुछ कह सके। इसी प्रकार झारखण्ड में शिबू सोरेन की पार्टी से गठबंधन इच्छा नहीं होने के बावजदू अर्जुन मुण्डा की जिद के आगे भाजपा झुकी। इसी प्रकार जम्मू-कश्मीर में वरिष्ठ नेता चमन लाल गुप्ता का विधान परिषद चुनाव में कथित रूप से क्रास वोटिंग करना और महाराष्ट्र के वरिष्ठ भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे का दूसरी पार्टी में जाने की अफवाहें फैलाना भी पार्टी के लिए गंभीर विषय रहे हैं।
स्पष्ट है कि सिद्धांतों की दुहाई दे कर च्पार्टी विथ दि डिफ्रेंसज् का तमगा लगाए हुए भाजपा समझौता दर समझौता करने को मजबूर है। पार्टी की विचारधारा को धत्ता बताने वाले जसवंत सिंह व राम जेठमलानी को छिटक कर फिर से गले लगाना इसका साक्षात उदाहरण है।
पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष नितिन गडकरी पर हालांकि संघ का पूरा वरदहस्त है, मगर वे भी बड़बोलेपन की वजह से पद की गरिमा कायम नहीं रख पाए हैं। गडकरी ने अपने बेटे की शादी को जिस शाही अंदाज से अंजाम दिया है, उससे यह साबित हो गया है कि पार्टी अब तथाकथित दकियानूसी आदर्शवाद के मार्ग का परित्याग कर चुकी है। गडकरी ने ही क्यों इससे पहले भाजपा नेता बलबीर पुंज व राजीव प्रताप रूड़ी भी इसी प्रकार के आलीशान भोज आयोजित कर पार्टी कल्चर के हो रहे रिनोवेशन का प्रदर्शन कर चुके हैं। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के ठाठ कीकानाफूसी भी कम नहीं होती है।
कुल मिला कर ये सब कारण हैं, जिसकी वजह से भाजपा कमजोर हुई है और उसी कारण सशक्त विपक्ष की भूमिका नहीं निभा पा रही। भाजपा शासित राज्यों में हुए भ्रष्टाचार का परिणाम ये है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर वह कांग्रेस को घेरने में जब कामयाब नहीं हुई तो बाबा रामदेव व अन्ना के हाथ में ये मुद्दे आ गए। विपक्ष की सच्ची भूमिका नहीं निभा पाने का यह सबसे बड़ा उदाहरण है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

शनिवार, मार्च 24, 2012

अलग-अलग हैं शाहबाज लाल कलंदर व झूलेलाल?


जिस गीत दमा दम मस्त कलंदर को गा और सुन कर सिंधी ही नहीं, अन्य समुदाय के लोग भी झूम उठते है, उस पर यह सवाल आज भी मौजूं है उसका सिंधी समुदाय से कोई ताल्लुक है भी या नहीं? पाकिस्तान की मशहूर गायिका रेश्मा व बांग्लादेश की रूना लैला की जुबान से थिरक कर लोकप्रिय हुआ यह गीत किसकी महिमा या स्मृति में बना हुआ है, इसको लेकर विवाद है।
यह सच है कि आम तौर सिंधी समुदाय के लोग अपने विभिन्न धार्मिक व सामाजिक समारोहों में इसे अपने इष्ट देश झूलेलाल की प्रार्थना के रूप में गाते हैं, लेकिन भारतीय सिंधू सभा ने खोज-खबर कर दावा किया है कि यह गीत असल में हजरत कलंदर लाल शाहबाज की तारीफ में बना हुआ है, जिसका झूलेलाल से कोई ताल्लुक नहीं है। सभा ने एक पर्चा छाप कर भी इसका खुलासा किया है।
पर्चे में लिखा है कि यह गीत सिंधी समुदाय के लोग चेटीचंड व अन्य उत्सवों पर गाते हैं। आम धारणा है कि यह अमरलाल, उडेरालाल या झूलेलाल अवतार की प्रशंसा या प्रार्थना के लिए बना है। उल्लेखनीय बात है कि पूरे गीत में झूलेलाल से संदर्भित प्रसंगों का कोई जिक्र नहीं है, जैसा कि आम तौर पर किसी भी देवी-देवता की स्तुतियों, चालीसाओं व प्रार्थनाओं में हुआ करता है। सिर्फ झूलेलालण शब्द ही भ्रम पैदा करता है कि यह झूलेलाल पर बना हुआ है। असल में यह तराना पाकिस्तान स्थित सेहवण कस्बे के हजरत कलंदर लाल शाहबाज की करामात बताने के लिए बना है।
पर्चे में बताया गया है कि काफी कोशिशों के बाद भी कलंदर शाहबाज की जीवनी के बारे में कोई लिखित साहित्य नहीं मिलता। पाकिस्तान में छपी कुछ किताबों में कुछ जानकारियां मिली हैं। उनके अनुसार कलंदर लाल शाहबाज का असली नाम सैयद उस्मान मरुदी था। उनका निवास स्थान अफगानिस्तान के मरुद में था। उनका
जन्म 573 हिजरी यानि 1175 ईस्वी में हुआ। उनका बचपन मरुद में ही बीता। युवा अवस्था में वे हिंदुस्तान चले आए। सबसे पहले उन्होंने मंसूर की खिदमत की। उसके बाद बहाउवलदीन जकरिया मुल्तानी के पास गए। इसके बाद हिजरी 644 यानि 1246 ईस्वी में सेवहण पहुंचे। हिजरी 650 यानि 1252 ईस्वी में उनका इंतकाल हो गया। इस हिसाब से वे कुल छह साल तक सिंध में रहे।
कुछ किताओं के अनुसार आतताइयों के हमलों से तंग आ कर मुजाहिदीन की एक जमान तैयार हुई, जो तबलीगी इस्लाम का फर्ज अदा करती थी। उसमें कलंदरों का जिक्र आता था। आतताइयों में से विशेष रूप से चंगेज खान, हलाकु, तले और अन्य इस्लामी सुल्तानों पर चढ़ाई कर तबाही मचाई थी। इसमें मरिवि शहर का जिक्र भी है, जो शाहबाज कलंदर का शहर है। कलंदर शाह हमलों के कारण वहां से निकल कर हिंदुस्तान आए। वे मुल्तान से होते हुए 662 हिजरी में सेवहण आए और 673 में उनका वफात हुआ। यानि वे सेवहण में 11 साल से ज्यादा नहीं रहे। इस प्रकार उनके सेहवण में रहने की अवधि और वफात को लेकर मत भिन्नता है। पर्चे के अनुसार सेवहण शहर पुराना है। कई संस्कृतियों का संगम रहा। वहीं से सेवहाणी कल्चर निकल कर आया, जिसकी पहचान बेफिक्रों का कल्चर के रूप में थी। यह शहर धर्म परिवर्तन का भी खास मरकज रहा। इसी सिलसिले में बताया जाता है कि वहां एक सबसे बड़े शेख हुए उस्मान मरुंदी थे, जिन्हें लाल शाहबाज कलंदर के नाम से भी याद किया जाता है।
पर्चे में बताया गया है कि शाह कलंदर का आस्ताना सेवहण में जिस जगह है, वहां पहले शिव मंदिर था। वहां पर हर वक्त अलाव जलता रहता था, जिसे मुसलमान अली साईं का मच कहते थे। यह शहर जब सेवहण में शाह कलंदर का वफात हुआ तो हिंदुओं ने उनको अपने मुख्य मंदिर में दफन करने की इजाजत दी। बाद में वहां के पुजारी भी उनके मलंग हो गए। इस पर्चे के जरिए यह साबित करने की कोशिश की गई है कि कलंदर शाहबाज इस्लाम के प्रचारक थे। इसी को आधार बना कर सिंधी समुदाय को आगाह किया गया है कि भला इस्लाम के प्रचारक और धर्म परिवर्तन की खिलाफत करने वाले झूलेलाल एक कैसे हो सकते हैं। एक और शंका ये है कि यदि दोनों एक हैं तो इस गीत को केवल सिंधी ही क्यों गाते हैं, मुस्लिम क्यों नहीं? क्या इसकी वजह केवल इतनी है कि यह सिंधी भाषा में है?
अलबत्ता परचे में इसे जरूर स्वीकार किया गया है कि दमा दम मस्त कलंदर अकीदत से गाने से मुरादें पूरी होती हैं। आम धारणा है कि सात वर्ष की उम्र में उन्होंने कुरआन को जुबानी याद कर लिया था। यह भी पक्का है कि उनको अरबी व फारसी के साथ उर्दू जीनत जुबान भी बोलते थे। पूरी उम्र उन्होंने शादी नहीं की। उनके मन को जर और जमीन भी मैला नहीं कर पाए। अन्य दरवेश तो बादशाहों के नजराने कबूल कर लेते थे, मगर शाह कलंदर उस ओर आंख उठा कर भी नहीं देखते थे।
पर्चे में यह स्पष्ट नहीं है कि दमा दम मस्त कलंदर गीत में झूलेलालण शब्द कैसे शामिल हो गया, जिसकी वजह से सिंधी समुदाय के लोग इसे श्रद्धा के साथ गाते हैं। बहरहाल यह इतिहासविदों की खोज का विषय है कि शाहबाज कलंदर को झूलेलाल क्यों कहा गया है।
अजमेर में भी शाह कलंदर व झूलेलाल को लेकर असमंजस उभर चुका है। मौलाई कमेटी के कन्वीनर सैयद अब्दुल गनी गुर्देजी की ओर से पिछले तकरीबन 32 साल से हर साल चेटीचंड के मौके पर सिंधी समुदाय का हार्दिक अभिनंदन करने के लिए एक पर्चा जारी किया जाता है। इसमें वे लिखते हैं कि सिंधी समाज के आराध्यदेव झूलेलाल जी को ही मुसलमान सखी शाहबाज कलंदर या लाल शाहबाज कलंदर कहते हैं। गत 23 नवंबर 2004 को दैनिक भास्कर में छपी खबर के अनुसार जब इस सिलसिले में उनसे पूछा गया कि वे किस आधार पर दोनों को एक बताते हैं तो उनका कहना था कि उन्हें कोई जानकारी नहीं है कि दोनों में कोई फर्क है या गाने को लेकर कोई विवाद है। न ही किसी सिंधी भाई ने कभी ऐतराज किया। वे तो महज भाईचारे के लिए पर्चा छपवाते हैं। इसके बावजूद अगर वे पता कर पाए कि दोनों अलग-अलग हैं तो एक होने का जिक्र हटवा देंगे।

-तेजवानी गिरधर
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tejwanig@gmail.com