तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

सोमवार, जनवरी 19, 2026

महान लोगों की उम्र कम क्यों होती है?

शिखर पर पहुंचने वाले, चाहे वे महान कलाकार हों, उद्यमी, खिलाड़ी, वैज्ञानिक या आध्यात्मिक नेता हों, हम अक्सर देखते हैं कि उनमें से कई अपेक्षाकृत कम आयु में ही संसार छोड़ देते हैं। यह प्रश्न मन को झकझोरता है, लेकिन इसका उत्तर भाग्य या दैवी न्याय से अधिक मानव-जीवन, मनोविज्ञान, शरीर विज्ञान और सामाजिक दबावों से जुड़ा होता है। जो लोग शीर्ष पर पहुंचते हैं, वे अक्सर वर्षों तक असाधारण परिश्रम करते हैं। उनका कार्यदिवस बहुत लंबा होता है। उनका भोजन अमूमन अनियमित होता है। इसके अतिरिक्त वे मानसिक तनाव में रहते हैं और उनका नींद पूरी नहीं आती। वे अपने शरीर से उसकी सीमा से अधिक काम में लेते हैं। यह सब मिलकर हृदय, नर्वस सिस्टम और इम्युनिटी पर गहरा प्रभाव डालता है।

असंख्य उदाहरण ऐसे मिलते हैं, जहां अत्यधिक परिश्रम और तनाव से मधुमेह, हार्ट अटैक, स्ट्रोक आदि का खतरा बढ़ता है।

एक बात और ऊँचाई पर पहुंचने पर अकेलापन झेलते हैं। अधिसंख्य लोग जब शीर्ष पर पहुँचते हैं, तो उन्हें कई तरह के दबाव घेर लेते हैं। सार्वजनिक छवि बनाए रखने की जुगत, असफल न दिखने का डर, सतत प्रतिस्पर्धा और आलोचना, ईर्श्या की राजनीति के अतिरिक्त् उन पर और भी ऊँचा जाने का निरंतर दबाव रहता है।

यह सब मानसिक थकान, अवसाद, चिंता तथा आत्म-देखभाल की कमी पैदा करता है। अक्सर सफलता जितनी चमकीली दिखती है, उतनी ही अकेली भी होती है।

शीर्ष पर पहुँचे कई लोगों का जीवन एकदम अनियमित हो जाता है। देर रात तक काम, अत्यधिक यात्राएँ, असंतुलित खान-पान, कभी-कभी नशे या उत्तेजक पदार्थों की ओर झुकाव और व्यायाम का अभाव, यह सब स्वास्थ्य को दीर्घकाल में नुकसान पहुंचाता है।

प्रसिद्ध दार्शनिकों और परंपराओं में एक विचार मिलता है कि जो जीवन बहुत तीव्र लौ की तरह जलता है, वह प्रायः कम आयु का होता है। यानि जो लोग कम समय में अत्यधिक ऊर्जा, रचनात्मकता, प्रतिभा और परिश्रम झोंक देते हैं, वे जीवन की बैटरी बहुत तेजी से खर्च कर देते हैं।

कुछ उदाहरण यह साबित करते हैं कि ज्यादातर महान लोग जल्दी मरते हैं, जबकि आँकड़ों के स्तर पर यह सार्वभौमिक सत्य नहीं है। संतुलित जीवन वाले महान लोग लंबी आयु तक जिए- नेल्सन मंडेला, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, शिवाजी महाराज की माता जीजाबाई, बेंजामिन फ्रैंकलिन, टॉलस्टॉय, रतन टाटा। इन सबने लंबी और सार्थक आयु पाई क्योंकि सफलता और जीवन में संतुलन बनाए रखा।

एक अवधारणा यह भी है कि महान लोग बहुत कुछ पूर्व जन्म में ही हासिल कर लेते हैं और मौजूदा जन्म में कम उम्र में ही पूरी सफलता हासिल कर लेते हैं।


शुक्रवार, जनवरी 16, 2026

पेशाब या शौच के वक्त नए आइडिया क्यों आते हैं?

ऐसी मान्यता है कि पेषाब करते वक्त या षौच के वक्त दिमाग में नए आइडिया आते हैं। या कोई गुत्थी सुलझने का रास्ता ख्याल में आता है। समझा जाता है कि पेशाब या शौच के वक्त नए आइडिया आने के पीछे कई शारीरिक, मानसिक और न्यूरोलॉजिकल वजहें होती हैं। वस्तुतः दिमाग “रिलैक्स मोड” में चला जाता है। दिमाग फोकस्ड सोच  से निकल कर डिफ्यूज सोच में चला जाता है। और यही मोड रचनात्मकता का सबसे बड़ा स्रोत है। इसलिए अचानक समाधान व आइडिया टपक पड़ते हैं। वैज्ञानिक को किसी अविष्कार का ख्याल आ सकता है। कवि के मन में कविता की पंक्तियां उभर सकती हैं। ऐसा माना जाता है कि पेषाब या षौच के वक्त वेगस नर्व अपनी भूमिका अदा करती है। वह दिल की धड़कन धीमी करती है, शरीर को शांत करती है, दिमाग यकायक खुल जाता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि जब मूत्राशय या आंत भरी होती है तो दिमाग का एक हिस्सा असुविधा में लगा रहता है, जैसे ही दबाव हटता है, मानसिक ऊर्जा अचानक मुक्त हो जाती है। यही मुक्त ऊर्जा सोच में छलांग लगाती है। पेषाब या षौच के वक्त आदमी निपट अकेला होता है, एकांत में होता है और एकांत में ज्ञानेन्द्री सक्रिय हो जाती है। न्यूरो साइंस के अनुसार जब हम कुछ खास नहीं सोच रहे होते, तब दिमाग का “डिफॉल्ट मोड नेटवर्क” एक्टिव हो जाता है। यही नेटवर्क यादों को जोड़ता है, पुराने अनुभवों से नए अर्थ निकालता है, अचानक वाह वाला पल देता है। लोकबुद्धि में कहें तो जब देह खाली होती है, तब चेतना भरती है। इसलिए अगर कभी शौचालय में कोई जबरदस्त आइडिया आए, तो उसे हल्के में मत लीजिए। हो सकता है वही आपके अगले लेख, समाधान या दर्शन की शुरुआत हो।

शनिवार, जनवरी 10, 2026

चैट जीपीटी से मौलिक लेखकों पर संकट?

इन दिनों चैट जीपीटी का बोलबाला है। लेखन से लेकर शोध तक, हर क्षेत्र में इसका प्रयोग तेजी से बढ़ा है। खासकर किसी विषय पर आलेख तैयार करने के लिए लोग केवल एक हेडिंग देते हैं और क्षण भर में तैयार लेख प्राप्त कर लेते हैं। वस्तुतः चैट जीपीटी इंटरनेट पर उपलब्ध तथ्यों, सूचनाओं और शैलियों को समेटकर उन्हें सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत कर देता है।

ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है, क्या इससे मौलिक लेखकों के सामने संकट खड़ा हो रहा है? जब मशीन लेखन उपलब्ध है, तो कोई प्रकाशक या संपादक किसी मौलिक लेखक को प्राथमिकता क्यों देगा? दिलचस्प है कि यही प्रश्न जब चैट जीपीटी से पूछा गया, तो उसका उत्तर अपेक्षाकृत ईमानदार और संतुलित था। उसके अनुसार, मौलिक लेखकों का अंत नहीं होगा, लेकिन लेखन की दुनिया का स्वरूप अवश्य बदलेगा।

चैट जीपीटी जैसे एआई टूल साधारण, फॉर्मूलानुमा और सूचना-आधारित लेखन में बेहद सक्षम हैं। खबरों का पुनर्लेखन, सामान्य ज्ञान, सतही विश्लेषण या एसईओ आधारित सामग्री, इन क्षेत्रों में एआई तेज, सस्ता और पर्याप्त साबित हो सकता है। निस्संदेह, इससे औसत स्तर के कॉलम और कंटेंट लेखन में मानव लेखकों की मांग घट सकती है।

लेकिन यहीं से मौलिक लेखक की असली पहचान शुरू होती है। मौलिक लेखन अनुभव से जन्म लेता है और अनुभव मशीन के पास नहीं होता। भूख की टीस, सत्ता का दमन, प्रेम की विफलता, लोकजीवन की गंध, विस्थापन का दर्द या समय की बेचौनी, इन सबको लेखक जीता है, तब लिखता है। एआई इन भावनाओं की नकल कर सकता है, अनुभूति नहीं।

व्यवस्था से टकराने वाला लेख, जोखिम उठाने वाली कविता और समय के विरुद्ध खड़ा निबंध,यह दृष्टि है, विजन है, जो अभी भी मानवीय चेतना की देन है। मशीन आंकड़े दे सकती है, संदर्भ जोड़ सकती है, लेकिन नैतिक साहस और वैचारिक टकराव नहीं रच सकती।

हां, जो लेखक नई भाषा नहीं गढ़ता, नए प्रश्न नहीं उठाता और पुरानी लकीरों पर ही चलता रहता है, उसके लिए एआई सचमुच खतरा है। लेकिन जो लेखक अपने समय को पढ़ता है, लोक, दर्शन, इतिहास और निजी अनुभव को जोड़कर अपनी अलग आवाज पहचानता है, उसके लिए एआई केवल एक औजार है, प्रतिद्वंद्वी नहीं।

भविष्य में संभवतः श्रेष्ठ लेखन का नया मॉडल सामने आएगा, जहां लेखक सोच देगा, दृष्टि देगा और एआई संरचना, संपादन तथा संदर्भ में सहायक बनेगा। जैसे कैमरे के आने से चित्रकार समाप्त नहीं हुए, बल्कि चित्रकला के नए रूप सामने आए, वैसे ही एआई से लेखक समाप्त नहीं होंगे।

कुल मिलाकर, चैट जीपीटी मौलिक लेखकों के लिए खतरा नहीं, बल्कि औसत और यांत्रिक लेखन के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है।


शुक्रवार, जनवरी 09, 2026

पैर हिलाना व चाबी को घुमाना अशुभ?

आपने देखा होगा कि अमूमन कई लोग पलंग या कुर्सी पर बैठे हुए पैर हिलाते हैं या अंगुली में चाबी घुमाते हैं। भारतीय परंपरा में इसे अषुभ माना जाता है और ऐसा न करने की सलाह दी जाती है। हालांकि इसे वैज्ञानिक दृश्टि से प्रमाणित नहीं माना जाता, मगर लोकविश्वास, शिष्टाचार और मनोवैज्ञानिक दृष्टि इसके अर्थ निकाले जाते हैं। भारतीय लोकमान्यता के अनुसार पैर हिलाने को चंचलता या अस्थिरता का संकेत माना जाता है। बुजुर्ग कहा कहते हैं कि इससे लक्ष्मी नहीं ठहरती। यह मन के भटकाव का संकेत माना जाता है। इसे सामने बैठे व्यक्ति के प्रति असम्मान भी कहा जाता थे। अंगुली में चाबी का छल्ला घुमाने को भी अच्छा नहीं माना जाता। मानते हैं कि इससे विवाद हो सकता है। इससे यह संकेत मिलता है कि मन में बेचैनी व अधीरता है। ऐसा माना जाता है कि व्यक्ति भौतिक रूप से मौजूद है, मगर उसका मन कहीं और है। भीतर ही भीतर कुछ चल रहा है। कोई न कोई चिंता है। मनोविज्ञान कहता है कि पैर हिलाना या चाबी घुमाना तनाव व बेचैनी का द्योतक है। इससे आंतरिक ऊर्जा का क्षय होता है। वह अनजाने में व्यर्थ ही बाहर निकालती है। षास्त्रीय दृश्टि से यह भले ही अशुभ नहीं हो, मगर सार्वजनिक जगह पर

शिष्टाचार की दृष्टि से अनुचित है। यदि व्यक्ति सचेत, स्थिर और संयमित रहने का अभ्यास करे, तो ये आदतें स्वतः कम हो सकती हैं।


मंगलवार, जनवरी 06, 2026

क्या खुशबूदार अगरबत्ती से भगवान प्रसन्न होते हैं?

 

आमतौर पर जब भी हम अगरबत्ती या धूप खरीदते हैं तो यह ख्याल रखते हैं कि हमें कौन सी खुशबूू पसंद है? भाव भले ही भगवान को प्रसन्न करने का हो, मगर खुशबूू का चयन अपनी पसंद के अनुसार ही करते हैं। हाल ही किराने के दुकानदार से जब अगरबत्ती खरीद रहा था तो उसने दो तरह की अगरबत्तियां दिखाईं, एक सामान्य खुशबूू वाली सस्ती अगरबत्ती व दूसरी बेहतरीन खुशबूू वाली थोडी महंगी अगरबत्ती। मैने उनसे कहा कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए तो अगर नामक जडी वाली अगरबत्ती या धूप जलाई जाती है। उसमें भांति भांति की खुशबूू तो हम स्वयं अपने आनंद लेने के लिए जलाते हैं, भगवान के लिए नहीं। इस पर वहां मौजूद एक बुजुर्ग ने कहा कि ऐसी बात नहीं है। खुशबूू का आनंद भगवान भी लेते हैं। खुशबूू वाली अगरबत्ती से भगवान अधिक प्रसन्न होते हैं। यह बात मेरे गले नहीं उतरी, मगर मैने इस विषय में डुबकी लगाने की सोची।

दरअसल भारतीय परंपरा में भगवान की पूजा के पांच उपचार बताए गए हैं, गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य। शास्त्रों में यह नहीं कहा गया कि भगवान को किस ब्रांड या कितनी महंगी खुशबूूदार अगरबत्ती चाहिए। वस्तुतः भगवान को भाव प्रिय है, वस्तु नहीं। इस सिलसिले में भगवतगीता में कहा गया है कि “पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति” अर्थात भाव से अर्पित की गई साधारण वस्तु भी भगवान स्वीकार करते हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि अगर आपके पास भगवान को चढाने के लिए फूल नहीं हैं तो आप आंख मूंद कर कल्पना करें कि आपके पास फूल हैं और आप उन्हें भगवान को चढा रहे हैं, भगवान उन्हें भी स्वीकार करते हैं। स्पष्ट है कि भगवान फूल को नहीं भाव को देखते हैं। तो फिर सवाल उठता है कि हम खुशबूूदार अगरबत्ती क्यों जलाते हैं? ऐसी प्रतीत होता है कि भगवान को भले ही खुशबूूदार अगरबत्ती से कोई सरोकार नहीं, वह तो हम इसलिए जलाते हैं, ताकि मन की विक्षेपता शांत हो, वातावरण पवि़त्र बने, मन की प्रसन्नता से इंद्रियां एकाग्र हों, जिससे अहंकार और सांसारिक दुर्गंध यथा क्रोध, ईर्श्या, लोभ आदि का दहन हो। यानी सुगंधित धूप बाहरी से अधिक आंतरिक शुद्धि का प्रतीक है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो खुशबू से मन शांत होता है। जब मन शांत होता है तो प्रार्थना सच्ची बनती है, ध्यान गहरा होता है, श्रद्धा स्वाभाविक होती है। यह स्थिति भक्त के लिए लाभकारी है, न कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए कोई आवश्यकता।

ज्ञातव्य है कि कबीर, तुलसी, मीरा जैसे संतों ने बार-बार कहा है कि भगवान धूप-दीप से नहीं, हृदय की निर्मलता से प्रसन्न होते हैं। भगवान खुशबू से नहीं, भावना से प्रसन्न होते हैं।

यहां एक पहलु भी गौर करने लायक है। हमारे यहां परंपरा है कि अमुक देवी-देवता को उनकी पसंद के अमुक गंध के अमुक फूल-फल व मिश्ठान्न अर्पित करते हैं। इससे तो यही अर्थ निकलता है कि वे हमारी ओर से अर्पित वस्तु को भोग करते हैं और प्रसन्न होते हैं। इस तथ्य से इस बात की पुष्टि होती है कि भगवान सुगंधित अगरबत्ती को स्वीकार करते हैं और प्रसन्न होते हैं।


रविवार, जनवरी 04, 2026

क्या मृतात्मा को बुलाया जा सकता है?

यह कौतुहल लंबे समय से बना हुआ है कि क्या मृतात्मा को बुलाया जा सकता है या क्या मृतात्मा से बात की जा सकती है? इसका उत्तर धर्म, आध्यात्म, और विज्ञान, तीनों दृष्टियों से अलग-अलग है।

लगभग सभी धर्मों में माना गया है कि मृत आत्मा को बुलाना या उससे संपर्क करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। हिंदू मत के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा अपने कर्मों के अनुसार यमलोक या पितृलोक की यात्रा करती है। जब तक वह अपने अगले जन्म या मोक्ष की स्थिति में नहीं पहुंचती, तब तक उसे बाधित करना अधर्म माना जाता है। इसलिए “आत्मा बुलाना” जैसे प्रयोग प्लेन चिट बोर्ड करने को पाप या अपवित्र माना जाता है। इसी प्रकार इस्लाम में आत्माओं से संपर्क करना वर्जित है, क्योंकि माना जाता है कि आत्माओं के नाम पर अक्सर जिन्न या दुष्ट शक्तियां धोखा देती हैं। ईसाई मत में भी स्पिरिट कॉलिंग को निषिद्ध कहा गया है। आपको जानकारी होगी कि कुछ लोग प्लेन चिट बोर्ड के जरिए इच्छित मृतात्मा को बुलाने का दावा करते हैं, मगर उसमें मृतात्मा से संवाद संकेतों में होता है, जिसको पक्के तौर पर नहीं माना जा सकता कि मृतात्मा से वास्तव में संवाद हो रहा है।

विज्ञान के अनुसार अब तक कोई प्रमाण नहीं कि किसी मृत व्यक्ति की आत्मा को सचमुच बुलाया जा सकता है या उससे संपर्क संभव है।

स्पिरिट कॉलिंग, टेबल टर्निंग या ओइजा बोर्ड जैसे प्रयोग मनुष्य के अवचेतन मन और आटो-सजेशन से जुड़ी मानी जाती हैं, यानी दिमाग स्वयं वह अनुभव गढ़ लेता है।

कुछ साधक या तांत्रिक दावा करते हैं कि वे आत्माओं से संवाद कर सकते हैं, लेकिन ऐसे अनुभव प्रायः ऊर्जात्मक या मानसिक कंपन के रूप में होते हैं, न कि वास्तव में आत्मा के आगमन के रूप में। अधिकतर मामलों में यह भ्रम या मानसिक प्रभाव साबित हुआ है।

इस सिलसिले में मेरा अनुभव यह है कि मैं दरगाह के एक खादिम के हुजने में बैठा था। उन्होंने बताया कि वह अपने दिवंगत गुरू को उनकी कृपा पाने के लिए बुला सकते हैं। उन्होंने आंख बंद कर गुरू को याद किया और यकायक बहुत मोहक सुगंध पूरे हुजरे में फैल गई। उनका दावा था कि उनके गुरू हुजरे में आ गए हैं। इस बारे में मैने कुछ जानकारों से पूछा तो उन्होंने बताया कि आत्मा का अस्तित्व वायु रूप है, और उसका आव्हान करने पर वह गंध के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती है। इस बारे में मेरा एक अनुभव यह है कि जब मेरी माताश्री का निधन हुआ तो जिस कमरे में वे रहती थीं, वहां लगातार तीन दिन तक गुलाब की महक आती रही, जबकि वहां न तो कोई अगरबत्ती जलाई हुई थी और न ही किसी ने इत्र लगा रखा था।


रविवार, दिसंबर 21, 2025

नेत्रहीन अमूमन अच्छे गायक क्यों होते हैं?

आपने देखा होगा कि नेत्रहीन की कोई न कोई इन्द्री अधिक सक्रिय होती है। खासकर कंठ यानि स्वर इंन्द्री। नेत्रविहीन अमूमन बहुत सुमधुर गायक होते हैं। इसके अनेक उदाहरण मौजूद हैं। यह सार्वभौमिक नियम तो नहीं है, लेकिन कई नेत्रहीन लोग आवाज की बारीकियों को गहराई से सुन पाते हैं। उनका सारा ध्यान स्वर-इंद्री पर केन्द्रित हो जाता है। इसलिए वे अपने स्वर, सुर और ताल को बेहतर साध लेते हैं। संगीत का अभ्यास भी कई नेत्रहीन व्यक्तियों के लिए एक स्वाभाविक अभिव्यक्ति बन जाता है। इसलिए मधुर कंठ उनकी “अतिरिक्त इन्द्रिय” नहीं, बल्कि बेहतर श्रवण-ध्यान और लगातार अभ्यास का परिणाम है। 

वस्तुतः जब दृष्टि नहीं रहती, तो मस्तिष्क अपने उस हिस्से को उपयोग में लाता है जो पहले देखने में लगता था, और उसे सुनने, छूने, दिशा-ज्ञान या स्मृति जैसी गतिविधियों में लगा देता है। इसे न्यूरोप्लास्टिसिटी कहते हैं। उनकी श्रवण शक्ति अधिक प्रशिक्षित हो जाती है और वे सूक्ष्म ध्वनियों, स्वर के उतार-चढ़ाव को बेहतर पकड़ते हैं। स्पर्श व दिशा-ज्ञान (जैसे छड़ी से कंपन समझना, कमरे की ध्वनि-गूंज से दूरी आंकना) अधिक पैना होता है। स्मृति और ध्यान सामान्य लोगों की तुलना में बेहतर विकसित हो सकते हैं। वे किसी भी वस्तु को छू कर बता देते हैं, वह क्या है? यानि उनकी अंगुलियों की त्वचा बहुत संवेदना से भर जाती है। इसी संवेदना का उपयोग पढाई के लिए ब्रेल लिपी में उपयोग किया जाता है। ब्रेल लिपी दृष्टिबाधित (नेत्रहीन) व्यक्तियों के लिए विकसित एक स्पर्श आधारित लेखन प्रणाली है। इसे उंगलियों से छूकर पढ़ा जाता है। इसका आविष्कार लुई ब्रेल (स्वनपे ठतंपससम) ने 1824 में किया था।

मान्यता है कि उनकी छठी इन्द्री भी अधिक सक्रिय होती है। बहुत-से लोग नेत्रहीनों के बारे में यह अनुभव करते हैं कि वे किसी व्यक्ति की उपस्थिति, उसके भाव या कमरे का माहौल बहुत जल्दी भाँप लेते हैं। वास्तव में यह “छठी इन्द्रिय” नहीं, बल्कि सुपर-संवेदी अवलोकन है। यानी वे ध्वनि, चाल, सांसों की लय, हवा के दबाव, हल्के कंपन, गंध जैसे सूक्ष्म संकेतों पर अधिक ध्यान देते हैं, जिन्हें सामान्य व्यक्ति नजर पर निर्भर रहने के कारण अनदेखा कर देता है।