तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

रविवार, मई 04, 2025

चांदी व तांबे के बर्तन में रखे पानी पीने के क्या फायदे हैं?

दोस्तो, नमस्कार। आपकी जानकारी में होगा कि कई लोग चांदी या तांबे में रखे पानी को पीते हैं। ऐसी मान्यता है कि इससे कुछ फायदे होते हैं। स्वाभाविक रूप से ऐसा पानी में चांदी व तांबे के तत्व षामिल हो जाने की वजह से होता होगा, ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इसकी वजह से बर्तन का वजन कम होता है? हमें तो नजर नहीं आता
कि बर्तन के वजन में कमी आई है, यानि बर्तन के तत्व में कमी नहीं आती तो षंका होना स्वाभाविक है कि कहीं यह केवल मिथ मात्र तो नहीं है?

चलिए, पहले यह जानते हैं कि चांदी व तांबे के बर्तन में रखे पानी से क्या क्या फायदे बताए गए हैं। बताया जाता है कि चांदी व तांबे के बर्तन में रखे पानी में चांदी यानि एजी और तांबे यानि कॉपर के आयन पानी में घुल जाते हैं। बर्तन में पानी डाल कर तुरंत पीने से ही उसमें आयन नहीं आते। लंबे समय तक पानी रखा जाए यानि 6 से 8 घंटे या उससे अधिक, तो उसमें थोड़ी मात्रा में कॉपर आयन घुलते हैं। यह प्रक्रिया ऑक्सीडेशन और जल में मौजूद खनिजों के कारण होती है। इसी प्रकार चांदी के आयन बहुत धीमी गति से घुलते हैं। लेकिन इनकी मात्रा तांबे की तुलना में कम होती है। चांदी व तांबे के आयन एंटी बैक्टीरियल गुणों वाले होते हैं।

तांबा रोगाणुओं खासकर ईकोली और सल्मोनेला को नष्ट कर सकता है। तांबा पाचन तंत्र को उत्तेजित करता है और गैस, अपच जैसी समस्याओं में राहत देता है। इससे त्वचा को स्वस्थ रखने में मदद मिलती है। इसके अतिरिक्त न्यूरो ट्रांसमीटर के निर्माण में मदद करता है, जिससे मस्तिष्क का कार्य बेहतर होता है। डब्ल्यू एच ओ के अनुसार दिन में कम से कम 2 मिली ग्राम तांबा सुरक्षित माना जाता है। यदि बहुत अधिक मात्रा में लिया जाए तो यह कॉपर टॉक्सिसिटी का कारण बन सकता है, जिससे उल्टी, पेट दर्द, लीवर पर असर आदि हो सकते हैं।

इसी प्रकार चांदी के आयन आम तौर पर नॉन-टॉक्सिक माने जाते हैं। सिल्वर आयन कई रोगजनकों को निष्क्रिय करने में सक्षम होते हैं।

आयुर्वेद में ‘सिल्वर वॉटर’ या चांदी के बर्तन का उपयोग मानसिक शांति और प्रतिरक्षा शक्ति बढ़ाने के लिए किया जाता था। यदि लंबे समय तक अधिक मात्रा में सिल्वर का सेवन किया जाए तो इससे आर्गेरिया नामक स्थिति हो सकती है, जिसमें त्वचा नीली-रंगी हो जाती है, हालांकि बर्तन से इतना अधिक सिल्वर लेना संभव नहीं होता।

बताया जाता है कि रोजाना 6 से 8 घंटे तक पानी को तांबे-चांदी के बर्तन में रख कर पीना सुरक्षित और लाभदायक माना जाता है, लेकिन बहुत लंबे समय तक पानी स्टोर न करें। विषेश रूप से तांबे के बर्तन में 24 घंटे से अधिक नहीं।

अब सवाल यह कि क्या बर्तन का वजन कम होता है? इसका जवाब यह है कि तकनीकी रूप से हां, परन्तु यह कमी बहुत ही सूक्ष्म और नगण्य होती है, इतने कम स्तर पर कि वह मानव तुला से मापी नहीं जा सकती, खासकर सामान्य उपयोग में। अगर रोजाना कुछ माइक्रोग्राम तांबा घुल भी जाता है, तो भी कई वर्षों तक उपयोग करने पर ही बर्तन के वजन में कोई मापन योग्य बदलाव आ सकता है।


https://youtu.be/4DDLmOUbpKM

शुक्रवार, मई 02, 2025

पितरों को श्राद्ध की वस्तुएं कैसे मिलती हैं?

हालांकि सभी हिंदू श्राद्ध में विश्वास रखते हैं, और परंपरागत रूप से श्राद्ध कर्म करते भी हैं, मगर कुछ लोग यह सवाल खडा करते हैं कि जो प्राणी मरने के बाद दूसरी योनि में जन्म ले चुका, वह श्राद्ध पक्ष के दौरान हमारी ओर से उसके निमित्त ब्राह्मण को कराए गए भोजन को कैसे ग्रहण कर पाता होगा। 

तार्किक रूप से यह प्रश्न बिलकुल ठीक प्रतीत होता है। इसी कडी में कई लोग कहते हैं कि गया में पिंडदान करके दिवंगत परिजन को जब आप विदा कर चुके हैं तो क्यों उन्हें श्राद्ध के नाम पर फिर से बुलाने की गुस्ताखी की जाए। इससे भी बडा सवाल है कि हम भी निश्चत रूप से पूर्व जन्मों में किन्हीं के पूर्वज थे, यदि वे हमारा श्राद्ध करते हैं तो उससे होने वाली संतुष्टि का अनुभव हमें क्यों नहीं होता?

दूसरी ओर शास्त्र बताता है कि पितृ ऋण चुकाने के लिए किए जाने वाले श्राद्ध कर्म की कीमिया क्या है? इस सिलसिले में हाल ही अजमेर के शिव सागर, आगरा गेट स्थित मराठा कालीन श्री पंचमुखी हनुमानजी व वैभव महालक्ष्मी मंदिर के पंडित प्रकाश चन्द्र शर्मा एक पोस्ट सोशल मीडिया पर जारी की है। जाहिर है उन्होंने श्राद्ध कर्म के प्रति उत्पन्न हो रही अश्रद्धा की प्रतिक्रिया में यह कोशिश की है।

बहरहाल, यह जानते हैं कि श्राद्ध कर्म के बारे में शास्त्र क्या बताता है?

श्राद्ध का अर्थ - ‘श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्ध।’

‘श्राद्ध’ का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए। पितरों के लिए श्रद्धापूर्वक किए गए पदार्थ-दान (हविष्यान्न, तिल, कुश, जल के दान) का नाम ही श्राद्ध है। श्राद्धकर्म पितृऋण चुकाने का सरल व सहज मार्ग है। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितरगण वर्षभर प्रसन्न रहते हैं।

कर्मों की भिन्नता के कारण मरने के बाद गतियां भी भिन्न-भिन्न होती हैं। कोई देवता, कोई पितर, कोई प्रेत, कोई हाथी, कोई चींटी, कोई वृक्ष और कोई तृण बन जाता है। तब मन में यह शंका होती है कि छोटे से पिण्ड से अलग-अलग योनियों में पितरों को तृप्ति कैसे मिलती है? इस शंका का स्कन्दपुराण में बहुत सुन्दर समाधान मिलता है।

एक बार राजा करन्धम ने महायोगी महाकाल से पूछा ’मनुष्यों द्वारा पितरों के लिए जो तर्पण या पिण्डदान किया जाता है तो वह जल, पिण्ड आदि तो यहीं रह जाता है फिर पितरों के पास वे वस्तुएं कैसे पहुंचती हैं और कैसे पितरों को तृप्ति होती है?’

भगवान महाकाल ने बताया कि विश्व नियन्ता ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि श्राद्ध की सामग्री उनके अनुरुप होकर पितरों के पास पहुंचती है। इस व्यवस्था के अधिपति हैं अग्निष्वात आदि। पितरों और देवताओं की योनि ऐसी है कि वे दूर से कही हुई बातें सुन लेते हैं, दूर की पूजा ग्रहण कर लेते हैं और दूर से कही गयी स्तुतियों से ही प्रसन्न हो जाते हैं। वे भूत, भविष्य व वर्तमान सब जानते हैं और सभी जगह पहुंच सकते हैं। पांच तन्मात्राएं, मन, बुद्धि, अहंकार और प्रकृति इन नौ तत्वों से उनका शरीर बना होता है और इसके भीतर दसवें तत्व के रूप में साक्षात् भगवान पुरुषोत्तम उसमें निवास करते हैं। इसलिए देवता और पितर गन्ध व रस तत्व से तृप्त होते हैं। शब्द तत्व से रहते हैं और स्पर्श तत्व को ग्रहण करते हैं। पवित्रता से ही वे प्रसन्न होते हैं और वर देते हैं।

पितरों का आहार है अन्न-जल का सारतत्व!

जैसे मनुष्यों का आहार अन्न है, पशुओं का आहार तृण है, वैसे ही पितरों का आहार अन्न का सार-तत्व (गंध और रस) है। अतः वे अन्न व जल का सार तत्व ही ग्रहण करते हैं। शेष जो स्थूल वस्तु है, वह यहीं रह जाती है।

नाम व गोत्र के उच्चारण के साथ जो अन्न-जल आदि पितरों को दिया जाता है, विश्वेदेव एवं अग्निष्वात (दिव्य पितर) हव्य-कव्य को पितरों तक पहुंचा देते हैं। यदि पितर देव योनि को प्राप्त हुए हैं तो यहां दिया गया अन्न उन्हें ‘अमृत’ होकर प्राप्त होता है। यदि गन्धर्व बन गए हैं तो वह अन्न उन्हें भोगों के रूप में प्राप्त होता है।

यदि पशु योनि में हैं तो वह अन्न तृण के रूप में प्राप्त होता है। नाग योनि में वायु रूप से, यक्ष योनि में पान रूप से, राक्षस योनि में आमिष रूप में, दानव योनि में मांस रूप में, प्रेत योनि में रुधिर रूप में और मनुष्य बन जाने पर भोगने योग्य तृप्ति कारक पदार्थों के रूप में प्राप्त होता हैं।

जिस प्रकार बछड़ा झुण्ड में अपनी मां को ढूंढ़ ही लेता है, उसी प्रकार नाम, गोत्र, हृदय की भक्ति एवं देश-काल आदि के सहारे दिए गए पदार्थों को मन्त्र पितरों के पास पहुंचा देते हैं। जीव चाहे सैकड़ों योनियों को भी पार क्यों न कर गया हो, तृप्ति तो उसके पास पहुंच ही जाती है।

इस बारे में एक दष्टांत है कि श्रीराम द्वारा श्राद्ध में आमन्त्रित ब्राह्मणों में सीताजी ने राजा दशरथ व पितरों के दर्शन किए थे।

वाकया इस प्रकार है कि एक बार पुष्कर में श्रीरामजी अपने पिता दशरथजी का श्राद्ध कर रहे थे। रामजी जब ब्राह्मणों को भोजन कराने लगे तो सीताजी वृक्ष की ओट में खड़ी हो गयीं। ब्राह्मण-भोजन के बाद रामजी ने जब सीताजी से इसका कारण पूछा तो वे बोलीं

‘मैंने जो आश्चर्य देखा, उसे आपको बताती हूँ। आपने जब नाम-गोत्र का उच्चारण कर अपने पिता-दादा आदि का आवाहन किया तो वे यहां ब्राह्मणों के शरीर में छाया रूप में सट कर उपस्थित थे। ब्राह्मणों के शरीर में मुझे अपने श्वसुर आदि पितृगण दिखाई दिए फिर भला मैं मर्यादा का उल्लंघन कर वहां कैसे खड़ी रहती इसलिए मैं ओट में हो गई।’


श्राद्ध की महत्ता के बारे में बताया गया है कि और वंश वृद्धि के लिए तो पितरों की आराधना ही एकमात्र उपाय है। पितर गण स्वास्थ्य, बल, श्रेय, धन-धान्य आदि सभी सुख, स्वर्ग व मोक्ष प्रदान करते हैं।

श्राद्ध-कर्म से मनुष्य की आयु बढ़ती है।

श्राद्ध-कर्म मनुष्य के शरीर में बल-पौरुष की वृद्धि करता है और यश व पुष्टि प्रदान करता है।

श्राद्ध न करने से होने वाली हानि के बारे में बताया गया है कि मृत व्यक्ति के दाह कर्म के पहले ही पिण्ड-पानी के रूप में खाने-पीने की व्यवस्था कर दी गयी है। यह तो मृत व्यक्ति की इस महायात्रा में रास्ते के भोजन-पानी की बात हुई। परलोक पहुंचने पर भी उसके लिए वहां न अन्न होता है और न पानी। यदि सगे-सम्बन्धी भी अन्न-जल न दें तो भूख-प्यास से उसे वहां बहुत ही भयंकर दुख होता है।

आश्विन मास के पितृ पक्ष में पितरों को यह आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें अन्न-जल से संतुष्ट करेंगे यही आशा लेकर वे पितृ लोक से पृथ्वी लोक पर आते हैं लेकिन जो लोग पितर हैं ही कहां? यह मान कर उचित तिथि पर जल व शाक से भी श्राद्ध नहीं करते हैं, उनके पितर दुखी व निराश होकर शाप देकर अपने लोक वापिस लौट जाते हैं।

ब्रह्मपुराण में बताया गया है कि धन के अभाव में श्रद्धापूर्वक केवल शाक से भी श्राद्ध किया जा सकता है। यदि इतना भी न हो तो अपनी दोनों भुजाओं को उठा कर कह देना चाहिए कि मेरे पास श्राद्ध के लिए न धन है और न ही कोई वस्तु। अत मैं अपने पितरों को प्रणाम करता हूँ वे मेरी भक्ति से ही तृप्त हों।


https://www.youtube.com/watch?v=c5WP7qh0d7g&t=7s

बुधवार, अप्रैल 30, 2025

देवी-देवताओं को भी खुषामद पसंद हैं?

इस दुनिया में आम तौर पर हर आदमी अपना मतलब सिद्ध करने के लिए चमचागिरी करता है। हालांकि ऐसे भी लोग हैं जो कि आत्म सम्मान के नाम पर चमचागिरी से परहेज रखते हैं। उनमें से एक मैं भी हूं। मैं किसी को पूरी सहृदयता से अपेक्षित सम्मान तो दे सकता हूं, मगर चमचागिरी नहीं कर सकता। उसका खामियाजा भी बहुत उठाया है, क्यों कि अधिसंख्य लोग चमचागिरी पसंद हैं। वे योग्यता व पात्रता की बजाय चमचों को प्राथमिकता देते हैं। और मैं उन चमचों से पिछड़ जाता हूं। यह बात भलीभांति समझने के बावजूद अगर मैं सफलता के विशेष सूत्र, चमचागिरी का इस्तेमाल नहीं करता तो मुझ से ज्यादा बेवकूफ भला कौन होगा? मैं झूठ नहीं बोलूंगा। भौतिक जगत में भले ही मैं किसी की चमचागिरी नहीं करता, मगर आध्यात्मिक जगत में उससे कोई परहेज नहीं रखता। यह बात दीगर है कि मैं ऐसा करके क्या मांगता हूं? सच तो ये है कि कुछ नहीं मांगता। तर्क ये कि उसे ये पता होगा कि मुझे क्या चाहिए। अगर उसे मेरी जरूरत का ही पता नहीं चलता तो फिर मांगना क्या? उसे जो उचित लगेगा, वह दे देगा। हालांकि मेरे कुछ मित्रों का तर्क है कि मां भी रोये बिना दूध नहीं पिलाती, मगर ये बात आज तक मेरे दिमाग में नहीं बैठी। 

चलो मुद्दे पर आते हैं। आपने एक कहावत सुनी ही होगी। जिसकी लाठी, उसकी भैंस। यह जंगल में तो लागू है ही, सामाजिक व्यवस्था में भी फिट बैठती है। हर जगह ताकत की ही महत्ता है। हर ताकतवर अपने से कम ताकतवर को दबा रहा है और हर कम शक्तिमान अपने से अधिक शक्तिमान की खुषामद करने को मजबूर है। इस सत्य को मैने वृहत्तर स्तर पर देखने की कोशिश की है। यह पूरी प्रकृति में भी तो यह लागू होता है।

हम सब जानते हैं कि आदमी सर्वगुणसंपन्न नहीं है। न ही हो सकता है। कोई कितना भी शक्ति संपन्न क्यों न हो, एक सीमा के बाद उसे हाथ खड़े करने ही होते हैं। और तब उसे प्रकृति को सलाम ठोकना पड़ता है। वह सर्वशक्तिमान ईश्वर या किसी न किसी देवता के आगे आत्म समर्पण कर देता है। हालांकि हम उसे आस्था का नाम देते हैं, मगर असल में है वह खुषामद ही। ऋगवेद में ईश्वर का महिमा गान हो अथवा किसी भी देवी-देवता की चालीसा या आरती, उसमें आपको विरुदावलि ही नजर आएगी। यानि कि हम देवी-देवताओं को रिझाने के लिए, स्वार्थ पूर्ति के लिए उनके गुणों का गान करते हैं। वह भी खुषामद ही तो है। बस फर्क ये है कि गुणगान शब्द सुसंस्कृत है और खुषामद शब्द घटिया। चलो गुणगान तक तो ठीक है, मगर खुषामद का आलम ये है कि हम देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए उन्हें प्रसाद तक अर्पित करते हैं। अर्जी लगाते हैं कि हमारी अमुक मनोकामना पूरी होगी तो इतने रुपये का प्रसाद चढ़ाऊंगा। देवता का अर्थ है, जो हमें देता है। जैसे वरुण देवता, वायु देवता, सूर्य देवता, अग्नि देवता, धरती माता इत्यादि। वे सब हमारे जीवन के आधार हैं। कैसा विरोधाभास है कि जो हमें देते हैं, उन्हीं को हम दे कर पटाने की कोशिश करते हैं। प्रसाद चढ़ाने के विधान का जो भी रहस्य हो, मगर मोटे तौर पर तो यही सही है न कि तेरा तुझ को अर्पण, क्या लागे मेरा करके हम उन्हें प्रसन्न कर रहे हैं और वे भी अपनी दी हुई भौतिक वस्तु के अर्पण से प्रसन्न हो रहे हैं।

यदि ये सही है कि प्रसाद चढ़ाने व गुणगान करने से देवी-देवता राजी होते हैं, तो इसका अर्थ ये है कि वे भी खुषामद पसंद हैं। उन्हें भी अपनी जय जयकार पसंद है। देवी-देवता ही क्यों, इस सृष्टि को उत्पन्न करने, पालन करने और संहार करने वाले ब्रह्मा-विष्णु-महेश भी आराधना करने पर वर देते हैं। उसमें मेरिट-डिमेरिट कुछ नहीं देखते। तभी तो राक्षस उन्हें रिझा कर वर हासिल कर लेते हैं। बाद में उसी वर का उपयोग वे देवताओं के खिलाफ करते हैं। देवता परेशान हो कर त्राहि-त्राहि माम करते हैं, तब जा कर वे उनकी रक्षा करते हैं। समझ में नहीं आता कि क्या वर दाताओं को यह ख्याल नहीं होता कि वे जिसे वर दे रहे हैं, वह उसका पात्र है भी या नहीं? या फिर उन्हें यह पता ही नहीं होता कि जिसे वे वर दे रहे हैं, उसके मन में क्या दुर्भावना है? या फिर आराधना के वक्त राक्षस पूर्ण सद्भावी होते हैं और वर हासिल करने के बाद उसका दुरुपयोग करते हैं? या उनको तो इससे सरोकार है कि किसने उनकी आराधना के लिए कितनी कठोर तपस्या की है? जो कुछ भी हो, मगर इतना तय है कि आराधना अर्थात चमचागिरी से वे प्रसन्न होते हैं। हो सकता है कि मुझे इस सत्य का दर्शन पूर्ण रूप से नहीं हो रहा हो, नहीं ही हो रहा होगा, मगर जहां तक मेरी समझ पहुंच पाई है, उससे मेरा नजरिया ये ही बना है कि खुषामद कोई बुरी बात नहीं है, वह करनी ही चाहिए, चूंकि पूरी प्रकृति का विधान यही है।


https://www.youtube.com/watch?v=_w6-GNeWrKo&t=9s

गीता में बाल होने का राज क्या है?

दोस्तो, नमस्कार। कुछ कथा वाचक व संत श्रोताओं का विष्वास जीतने के लिए एक अनूठी तरकीब का इस्तेमाल किया करते हैं। इसकी जानकारी मुझे अरसे पहले मेरी मां के माध्यम से हुई। वे आध्यात्मिक प्रवत्ति की थीं। अमूमन संतों के प्रवचन व कथा सुनने जाती थीं। एक बार कथा सुन कर आने पर उन्होंने बताया कि आज अमुक संत ने कहा कि यदि आपको मेरी बातों पर यकीन न हो तो घर जा कर देखना। गीता की जिस पुस्तक का आप पठन किया करती हैं, उसमें कहीं न कहीं बाल मिल जाएगा। उन्होंने पुस्तक को खंगाला तो एक जगह बाल मिल गया। मैं भी चकित रह गया। बाद में उन्होंने बताया कि उनके साथ कथा सुनने गईं अन्य महिलाओं को भी उनकी पुस्तकों में बाल मिला है। तब तो मैं सन्न रह गया। कि क्या कोई संत इस प्रकार घरों में रखी हुई गीता पुस्तकों में बाल भेज सकते हैं। हो सकता है कि ऐसा करना किन्हीं संतों की सामर्थ्य में हो, मैं उसे सिरे से तो नहीं नकारता, मगर मेरी भेद बुद्धि इस पर सहसा विष्वास नहीं करती। मुझे लगता है कि जो महिलाएं नियमित गीता का पाठ करती हैं, उनका बाल पुस्तक में गिरने की प्रबल संभावना हो सकती है। जैसे कई बार रोटी व सब्जी में बाल गिर जाता है। अच्छा, एक दिलचस्प बात और। वो यह कि कथा सुनने के बाद जिस महिला को पुस्तक में बाल नहीं मिलता, वह यही मानती है कि वह भाग्यवान नहीं है। उसे लगता है कि जब इतनी सारी महिलाओं को बाल मिले हैं, और अकेले उसको ही बाल क्यों नहीं मिला, तो कोई तो वजह होगी ही। यानि कि वह संत की बात पर षंका नहीं करती। और इसके पीछे है आस्था। आस्था तर्क को नहीं मानती। श्रद्धा उसे ऐसा करने से रोकती है।


मंगलवार, अप्रैल 29, 2025

सत्ताधीश पर जादू या मंत्र असर नहीं डालता?

दोस्तो, नमस्कार। वर्शों पहले मैने सुना था कि राजाओं, सत्ताधीषों और प्रशासनिक तंत्र के लिए काम करने वालों पर जादू या तंत्र-मंत्र का असर नहीं होता। इस बारे में विद्वानों से चर्चा की तो समझ में आया कि इसकी वजह क्या हो सकती है? अव्वल तो जादू-टोने के अस्तित्व पर ही सवाल खडे किए जाते हैं, कई लोग नहीं मानते कि जादू-टोना किया जा सकता है, मगर यदि यह धारणा बनी है कि सत्ताधीषों पर जादू असर नही करता तो जरूर को आधार होगा। 

असल में प्राचीन काल में राजाओं को अक्सर देवताओं का प्रतिनिधि या स्वयं देवता माना जाता था। इस दैवीय अधिकार के कारण, यह माना जाता था कि वे अलौकिक शक्तियों की वजह से सुरक्षित हैं। इसी प्रकार सत्ताधीष भी पूरी व्यवस्था के केन्द्र में स्थित होते हैं, षक्ति संपन्न होते हैं, इस कारण कोई जादूगर अथवा तांत्रिक चाहे तो उन पर अपने जादू या तंत्र-मंत्र का उपयोग नहीं कर सकता। जैसे कोई तांत्रिक प्रधानमंत्री से असहमत है, उसके खिलाफ है, तो वह चाह कर भी उस पर तंत्र का अस्त्र नहीं चला सकता। अगर वह ऐसा करने में सक्षम होता तो सारी सत्ता उसके षिकंजे में होती। मगर ऐसा हो नहीं सकता। प्रधानमंत्री को छोडिये, एक सामान्य सिपाही तक में भी सत्ता की प्रतिश्ठा होती है, इस कारण उस पर जादू-टोना काम नहीं कर सकता। आपके ख्याल में होगा कि किसी अनिश्ठकारी स्थान के पास जाने से आम आदमी घबराता है, मगर सत्ता के आदेष पर उसे ध्वस्त करने वाले सिपाही व मजदूर का कुछ नहीं बिगडता।

एक तर्क यह है कि सत्ताधीष के पद और अधिकार उन्हें एक प्रकार की स्वाभाविक सुरक्षा प्रदान करते हैं। उनकी शक्ति और प्रभाव इतना अधिक होता है कि सामान्य जादू या मंत्र उन तक नहीं पहुंच पाते। इसके अतिरिक्त सत्ता में बैठे लोग अक्सर कड़ी सुरक्षा के घेरे में रहते हैं। उनके आसपास हमेशा पहरेदार और सेवक होते हैं, जिससे किसी बाहरी व्यक्ति के लिए उन तक पहुंच कर जादू करना मुश्किल हो जाता है। 

यह भी संभव है कि यह विश्वास सत्ता में बैठे लोगों के प्रति एक प्रकार का भय और सम्मान दर्शाता है। लोगों का मानना हो सकता है कि उनकी शक्ति इतनी अधिक है कि कोई भी जादू उन पर काम नहीं कर सकता। राजा और प्रशासनिक तंत्र के पास संसाधनों और लोगों पर नियंत्रण होता है। यह संभव है कि वे अपने प्रभाव का उपयोग करके किसी भी जादू या मंत्र के प्रभाव को नकार सकते हैं या उससे बच सकते हैं।

आप देखिए न, कोई कथित योगी या तांत्रिक, जो कि आम तौर पर चमत्कार दिखाता है, लेकिन अगर किसी दुश्कर्म की वजह से उसे गिरफ्तार किया जाए तो वह पुलिस कर्मियों को कोई भी नुकसान नहीं पहुंचा पाता। जेल में रहने के दौरान प्रहरियों व न्यायाधीष का कुछ नहीं बिगाड पाता है। ऐसे कई कथित तांत्रिक व साधु इन दिनों जेल में बंद हैं, मगर वे अपने कथित योग बल से जेल के बाहर नहीं आ पा रहे। उन्हें न्यायिक प्रक्रिया से गुजरना ही पड रहा है।


https://youtu.be/jwTK9Gy7yBk


सोमवार, अप्रैल 28, 2025

सात पीढी ही क्यों, आठ या नौ क्यों नहीं?

दोस्तो, नमस्कार। आपको जानकारी होगी कि हम पूर्वजों अथवा भावी पीढी के बारे में बात करते हैं तो सात पीढी का जिक्र आता है। इस सात के आंकडे के क्या मायने हैं? पीढी सात ही क्यों, आठ या नौ क्यों नहीं?

वस्तुतः सात पीढ़ी का उल्लेख खास तौर पर भारतीय संस्कृति, धर्म और सामाजिक परंपराओं में मिलता है। विद्वानों ने इसके पीछे धार्मिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक कारण बताए हैं। सनातन धर्म के अनुसार कर्म और पाप-पुण्य का प्रभाव सात पीढ़ियों तक चलता है। अर्थात किसी व्यक्ति के कर्म उसके पूर्वजों की सात पीढ़ियों से प्रभावित होते हैं। और उसके वंशजों की सात पीढ़ियों पर भी असर डाल सकते हैं। इसी कारण तर्पण, श्राद्ध आदि में सात पीढ़ियों का स्मरण किया जाता है। आधुनिक आनुवंशिकी यानि जेनेटिक्स में भी माना जाता है कि किसी व्यक्ति के जीन का प्रभाव लगभग 5-7 पीढ़ियों तक साफ तौर पर रह सकता है। उसके बाद जीन के बदलाव इतने हो जाते हैं कि मूल प्रभाव क्षीण होने लगता है। इसलिए सात पीढ़ी एक प्राकृतिक चक्र की तरह समझा जाता है। पूर्व में विवाह और वंश परंपरा में भी यह नियम था कि एक ही गोत्र अर्थात में सात पीढ़ियों तक शादी नहीं करनी चाहिए, ताकि रक्त संबंध बहुत पास-पास न हों और वंश में आनुवांशिक दोष न आएं। इसी से स्वस्थ संतति यानि औलाद का विचार भी जुड़ा था। भारतीय दर्शन में सात के अंक को एक पवित्र और संपूर्ण संख्या माना जाता है, जैसे सप्तर्षि, सप्तलोक, सप्तस्वर, सप्तसागर आदि। इसीलिए सात पीढ़ी का भी विशेष महत्व बन गया। कुल जमा सात एक तरह का पूर्ण और संतुलित चक्र माना गया है। आठवीं पीढ़ी से असर इतना क्षीण हो जाता है कि उसे सामाजिक या धार्मिक जिम्मेदारी के दायरे में रखना आवश्यक नहीं समझा गया। इसी प्रकार विवाह में सात फेरे व सात जन्मों का साथ रहने के पीछे भी यही साइंस प्रतीत होती है।

https://youtu.be/du_bXxZp0OU

शनिवार, अप्रैल 26, 2025

...तो वैज्ञानिकों की पूजा क्यों नहीं होनी चाहिए?

हाल ही मेरे एक मित्र ने मेरे सामने एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया, जिसने मुझे सोचने को मजबूर कर दिया। उनकी बात तर्क के लिहाज से ठीक प्रतीत होती है, मगर होना क्या चाहिए, इस पर आप सुधि पाठक विचार कर सकते हैं।

सवाल है कि सुखी रहने के लिए हम देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। उनके चित्रों-मूर्तियों के आगे दिया-बत्ती, अगरबत्ती जलाते हैं, मगर जिन वैज्ञानिकों ने हमारी जिंदगी में भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए एक से बढ़ कर एक अविष्कार किए, उनकी पूजा तो दूर, याद तक नहीं करते। उनके सवाल में तनिक नास्तिकता झलकती है, वो इसलिए कि उन्होंने जिस ढ़ंग से सवाल किया, वह ऐसा आभास देता है। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि पंक्चर ठीक करने वाला एक दुकानदार सुबह दुकान खोलने पर किसी न किसी देवता के आगे अगरबत्ती जलाता है, इस उम्मीद में कि उसकी रोजी-रोटी ठीक से चले। पता नहीं, अगरबत्ती करने से ऐसा होता भी है या नहीं, पता नहीं, क्योंकि बावजूद पूजा के उसके जीवन में कष्ट होते ही हैं। सुख के साथ सारे दुःख भी भोगता है। कोरोना महामारी में लॉक डाउन के दौरान सभी देवी-देवताओं के मंदिरों के पट बंद हो गए। वे पूजा-अर्चना से वंचित रह गए। वे महामारी के असर से अपने आपको नहीं बचा पाए। इसके आगे वे कहते हैं कि वह दुकानदार ऐसे ही देवी-देवता के आगे अगरबत्ती करता है, मगर जिन वैज्ञानिकों के अविष्कारों के बदोलत वह पंक्चर ठीक कर पाता है, उनका उसे ख्याल ही नहीं। जिन विज्ञान ऋषियों के सदके उसकी रोजी-रोटी चलती है, उनका उसे कोई स्मरण ही नहीं। जिस वैज्ञानिक ने बिजली की खोज की, जिस वैज्ञानिक ने प्रेशर पंप बनाया, क्या उसके चित्र के आगे उसे अगरबत्ती नहीं करनी चाहिए? उसके मन में ये विचार क्यों नहीं आता कि जिन वैज्ञानिकों के कारण उसकी आजीविका चल रही है, उनका चित्र लगा कर भी अगरबत्ती कर दे। सच तो ये है जिन वैज्ञानिकों ने विज्ञान के मूलभूत सिद्धांतों का प्रतिपादन किया, उसी की बदोलत में हमारे जीवन में सारे भौतिक सुख-सुविधाओं के साधन मौजूद हैं। जिस प्रकार ज्ञान के भंडार वेदों की ऋचाएं किसी एक ऋषि ने नहीं लिखी, एक लंबी शृंखला है ऋषियों की। उनकी वजह से ही हमें आध्यात्मिक समझ है। ठीक उसी प्रकार वैज्ञानिकों की भी एक लंबी शृंखला है, जिन्होंने उत्तरोत्तर नई नई खोजें कीं। सुख-सुविधाओं के साधनों के नाम पर आज क्या नहीं है हमारे पास।

बहरहाल, मेरे मित्र का सवाल सीधे-सीधे तो मेरे गले नहीं उतरा, क्योंकि देवी-देवता अपनी जगह हैं, वैज्ञानिक अपनी जगह। वस्तुतरू देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना आस्था का सवाल है। हमें यकीन है कि हमारे शास्त्रों में जो कुछ भी बताया गया है, वह सही है। कई लोगों ने अनुभव भी किया होगा कि देवी-देवता आराधना, पूजा-अर्चना करने पर वे फल देते हैं। अतरू उस पर तो सवाल बनता ही नहीं। हां, ये ठीक है कि जिन वैज्ञानिकों ने वास्तव में प्रत्यक्षतरू हमारे जीवन में सुख के साधन जुटाएं हैं, वे भी सम्मान के पात्र हैं। जब हम अपने पूर्वजों, अपने नेताओं की मूर्तियों के आगे हर साल जयंती व पुण्य तिथी पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, तो वैज्ञानिकों को क्यों नहीं श्रद्धा के साथ याद करना चाहिए? क्या उनके नाम भी एक दिया नहीं बनता?


https://www.youtube.com/watch?v=7fXGG--x040&t=14s