तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

बुधवार, जनवरी 22, 2025

प्रसाद चढ़ाते समय पर्दा क्यों किया जाता है?

आप जानते ही हैं कि जब भी भगवान की मूर्ति को प्रसाद चढ़ाया जाता है तो प्रसाद चढ़ाने के बाद पर्दा किया जाता है, ताकि वे प्रसाद ग्रहण कर लें। यदि मंदिर में पर्दे की व्यवस्था नहीं है तो प्रसाद की थाली पर ही कपड़ा ढ़क दिया जाता है। बिना पर्दे के भी तो प्रसाद चढ़ाया जा सकता है, उसमें दिक्कत क्या है? मगर नहीं, पर्दा करते ही हैं। आखिर वजह क्या है?

कल्पना कीजिए कि आपने बिना पर्दे के प्रसाद चढ़ाया और मूर्ति से एक हाथ निकल कर प्रसाद उठाए तो आप पर क्या बीतेगी? या आपकी आंखों के सामने ही प्रसाद कम होता जाए, तो क्या आप उस दृश्य को देख पाएंगे? हम जानते हैं कि भगवान की मूर्ति से हाथ निकल कर प्रसाद ग्रहण करने आने वाला नहीं है। आ सकता होगा तो भी नहीं आएगा, क्योंकि भगवान रहस्य में ही रहना चाहता है। हालांकि पर्दा करने के बाद भी भगवान के प्रसाद ग्रहण करने के बाद प्रसाद का तौल वही रहता है। अर्थात वे सूक्ष्म रूप से प्रसाद ग्रहण करते हैं। उससे भी बड़ा सच ये है कि वे प्रसाद नहीं, बल्कि हमारे भाव ग्रहण करते हैं। फिर भी प्रसाद चढ़ाने के दौरान पर्दा करने की परंपरा है।

आप देखिए कि नागौर जिले बवाल माता मंदिर में देवी मां की प्रतिमा ढ़ाई प्याला शराब पीती है। यह रहस्यपूर्ण और चमत्कार है। मंदिर से श्रद्धालु को इतना दूर रख जाता है कि उसे यह तो पता लगे कि प्याला खत्म हो गया है, मगर खत्म होता दिखाई देता नहीं है। जब पुजारी मूर्ति के होंठों पर प्याला रखता है तो वह उसे देखता नहीं है, बल्कि अपना चेहरा विपरीत दिशा में कर देता है। क्यों? एक तो वह मर्यादा का पालन कर रहा होता है, दूसरा उसमें भी सामर्थ्य नहीं कि वह प्याले को खत्म होता देख सके। आपने लोक देवताओं के परचों की चर्चा भी सुनी होगी। वे चमत्कार करते हैं, मगर प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप में। 

एक बात और। जब भी किसी की मृत्यु होती है तो उसका सजीव शरीर निर्जीव हो जाता है। हलचल खत्म हो जाती है। मान्यता है कि उसमें से आत्मा निकल गई है। कल्पना कीजिए कि आत्मा निकलते वक्त दिखाई दे जाए तो हमारा क्या हाल होगा? इसीलिए प्रकृति ने ऐसी व्यवस्था की है। अपने उस रहस्य को छिपा लिया है। ऐसे ही मृत्यु के साथ ही जीवन भर की स्मृति पर ताला जड़ देती है। अगले जन्म में उसे कुछ भी याद नहीं रहता। कल्पना कीजिए कि हर किसी को पिछले जन्म की याद रह जाए तो पूरे संसार में आपाधापी मच जाएगी। इसीलिए प्रकृति ने रहस्य को ओढ़ दिया है।

असल में प्रकृति बहुत रहस्यपूर्ण है। वह रहस्यपूर्ण ही रहेगी। प्रकृति न तो रहस्य को उघाड़ती है और न ही उसने इमें इतनी शक्ति दी है कि हम पूरी तरह से उघाड़ सकें। इस तथ्य को हमने भी उसे स्वीकार कर लिया है। बेशक इंसान ने इसके राज के बहुत पर्दे उठाए हैं, मगर आज भी उसके अधिकतर रहस्य बापर्दा हैं। उन्हें उठाया नहीं जा सकेगा। अलबत्ता संकेत जरूर हासिल किए जा पाए हैं, आगे भी किए जा सकते हैं, मगर प्रकृत्ति को कभी भी नग्न नहीं किया जा सकेगा। अर्थात कोरा सच कभी नहीं देखा जा सकेगा। यदि किसी विरले को दिखाई भी दे जाता है तो उसकी जुबान पर ताला पड़ जाता है। वह जरूरी भी है।

असल में प्रकृति इसलिए रहस्यपूर्ण है, क्योंकि यह हमारी समझ की सीमा से परे है। प्रकृति में इतना कुछ है कि हमारी इंद्रियों की क्षमता उन तक नहीं पहुंच पाती। जैसे ब्रह्मांड में अनेक ध्वनियां विचरण कर रही हैं, मगर हमारे कान उन सब को सुनने की क्षमता नहीं रखते। हमें सीमित फ्रिक्वेंसी की आवाजें ही सुनाई देती है। हां, हमने ऐसे ट्रांसमीटर जरूर बना लिए हैं, जो उन ध्वनियों को पकड़ लेते हैं, मगर हमारे कान सीधे उनको नहीं पकड़ सकते। प्रकृति में और भी अनेक चीजें ऐसी हैं, जो हमारी बुद्धि से परे हैं। इसीलिए वे हमारे लिए रहस्यपूर्ण ही रहेंगी। सच बात तो यह है कि प्रकृति में चारों ओर चमत्कार बिखरे पड़े हैं। कई चमत्कारों की जड़ तक हम पहुंचे भी हैं। जैसे गुरुत्वाकर्षण की शक्ति। जब तक न्यूटन ने इस शक्ति का पता नहीं लगाया, तब तक कोई वस्तु ऊपर फैंकने पर वापस नीचे आ जाना हमारे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। इसी प्रकार जब तक विज्ञान को यह पता नहीं था कि बारिश होती कैसे है, तब तक वह चमत्कार ही था कि आसमान से पानी कैसे बरस रहा है? विज्ञान बहुत अंदर तक गया है, लेकिन आज भी बहुत कुछ अछूता है। चिकित्सा विज्ञान ने शरीर को बहुत गहरे में जाना है, बीमारियों के इलाज तलाशे हैं, अंग प्रत्यारोपण तक करने में कामयाब हो गया है, मगर आज तक आत्मा नामक तत्व का पता नहीं लगाया जा सका है। शरीर मृत हो पर ऐसी कौन सी चीज है, जो निकल जाती है और कहां चली जाती है, इसका पता विज्ञान नहीं लगा पा रहा है। अलबत्ता, अध्यात्म ने इस पर काम किया है, लेकिन वह भी उसे तर्कपूर्ण तरीके से सिद्ध नहीं कर पाया है। आत्मा भ्रूण मे कब प्रवेश करती है, शरीर को छोडऩे पर उसकी आगे की यात्रा क्या होती है, उसे कर्म के अनुसार कैसे और कहां दंड दिया जाता है, वह सब कुछ शास्त्र बताता है, मगर वह विज्ञान की तरह उसे दो और दो चार की तरह साबित नहीं कर सकता। क्योंकि वह अनुभूति की वस्तु है और सारी अनुभूतियां अभिव्यक्त नहीं की जा सकतीं, क्योंकि प्रकृति की व्यवस्था रहस्यपूर्ण है।

यूं ते सारी प्राकृतिक शक्तियां अपने आप में चमत्कार ही हैं। क्या सूर्य का रोज उगना और अस्त होना चमत्कार नहीं है? वो तो हम आदी हो गए हैं, इस कारण हमें उसमें कुछ अनोखा नहीं दिखाई देता। क्या हमारा शरीर किसी चमत्कार से कम है? चमड़ी के एक हिस्से को दिखाई देता है, एक को सुनाई देता है, एक स्वाद का पता लगाता है तो एक गंध को महसूस करता है? मगर हमें सब कुछ सामान्य सा लगता है। वजह सिर्फ इतनी है कि कि हम अब उसके अभ्यस्त हो चुके हैं।

लब्बोलुआब, प्रकृति बहुत रहस्यपूर्ण है। कभी पूरी तरह से अनावृत्त नहीं की जा सकेगी। कम से कम सार्वजनिक रूप से तो नहीं। इसीलिए कई सुधि जन कहते हैं कि इसमें मत उलझो की प्रकृति कर रहस्य क्या है, बल्कि प्रकृति को केवल जीयो। उसका आनंद लो।

https://www.youtube.com/watch?v=TZkvDX589N8&t=18s


परिजन के बाहर जाते ही दरवाजा बंद न कीजिए

आज एक ऐसी दिलचस्प परंपरा आपसे साझा कर रहा हूं, जिसका पालन अनेक लोग किया करते हैं। परंपरा यह है कि जब भी परिवार का कोई सदस्य घर से बाहर जाता है, तो उसके जाने के तुरंत बाद दरवाजा बंद नहीं किया जाता। कुछ देर तक खुला ही रखा जाता है।  यहां तक कि जब तक वह गली के मोड पर वह ओझल न हो जाए, तब तक उसे देखते रहते हैं। यदि तुरंत बंद किया जाएगा तो उससे यह भाव आता है, यह आभास जागता है कि हमने उसके बाहर जाते ही उससे तुरंत संबंध विच्छेद कर लिया है। कहीं यह वास्तव में घटित न हो जाए। यह बहुत भयावह है। कुछ समय दरवाजा खुला रखने के ये मायने हैं कि बाहर गया सदस्य मकान व परिवारजन से कनैक्टेड है। वह अपना काम पूरा करके लौटेगा। यह उम्मीद संबंधों को प्रगाढ करती है। हो सकता है कि दरवाजा तुरंत बंद करना या न करना केवल सोच ही हो, इसका धरातल पर कोई असर नहीं पडता हो, मगर कुछ ऐसे लोग भी हो सकते हैं, जो इसे बहुत अधिक महत्व देते हों, और दरवाजा तुरंत बंद करने पर परिजन को खो देने की आषंका रखते हों।

https://www.youtube.com/watch?v=ISS2EbDoi_M

मंगलवार, जनवरी 21, 2025

रोंगटे क्यों खड़े होते हैं?

आपने कई बार महसूस किया होगा कि अचानक भय, उत्साह, खुशी या भावुकता की तीव्र अवस्था में आपके हाथ-पैरों के बाल खड़े हो जाते हैं। इसे रोंगटे खड़ा होना कहते हैं। अचानक ठंड लगने पर भी हाथ व पैर के बाल खड़े हो जाते हैं। हमारी तरह जानवरों के बाल भी खड़े होते हैं, जो साफ दिखाई देते हैं। उसकी वजह ये है कि उनके बालों का घनत्व अधिक होता है। आपने अचानक संकट आने पर बिल्ली के पूरे शरीर के बाल खड़े हो जाते हैं।

सवाल ये उठता है कि आखिर ऐसा होता क्यों है? वस्तुत: रोंगटे खड़े होने का सीधा संबंध हमारे स्नायु तंत्र है। जब भी हम किसी घटना की वजह से अति संवेदित होते हैं तो उसका सीधा असर स्नायु तंत्र पर पड़ता है। अर्थात जो व्यक्ति जितना संवेदनशील होगा, उसका स्नायु तंत्र भी उतना ही सक्रिय होगा। अचानक किसी कारण से भयभीत होने, संगीत के सुर गहरे तक छू जाने, यकायक खुशी मिलने, किसी वजह से अचानक उत्साहित होने पर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यानि कि संवेदना की अतिरेक अवस्था में स्नायु तंत्र प्रभावित होता है और त्वचा की निचली सतह में हलचल होती है। विज्ञान की भाषा में समझें तो स्नायु तंत्र सक्रिय होने पर त्वचा के नीचे हेयर फॉलिकल्स पर असर पड़ता ओर उनमें संकुचन होता है। ऐसा होते ही बाल खड़े हो जाते हैं। इसको पाइलोरेक्शन कहा जाता है। 

जरा और गहरे से समझने की कोशिश करते हैं। यकायक खतरा या भय महसूस होता है तो हमारा स्नायु तंत्र उससे निपटने के लिए तैयार हो जाता है। इस दौरान दिल की धड़कन बढ़ जाती है, पसीना आता है और रोंगटे खड़े हो जाते हैं। भीतर का मौलिक मानव जाग जाता है। कुछ जानकारों का मानना है कि रोंगटे इसलिए खड़े होते हैं, ताकि हम संभावित खतरे के सामने बड़े नजर आएं।

ये ठीक उस बिल्ली की तरह होता है, जो भय या गुस्से की अवस्था में बड़ी नजर आती है, क्योंकि उसके पूरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

संगीत सुनने के दौरान उसकी विशेष स्वर लहरी अथवा शब्दावली दिल को छू जाती है तो रोम-रोम खड़ा हो जाता है। इसे शरीर विज्ञानियों ने इस तरह से अभिव्यक्त किया है। वे कहते हैं कि दिमाग के दो भाग होते हैं। पहला इमोशनल और दूसरा कॉग्निटिव। इमोशनल भाग अपेक्षाकृत अधिक तेजी से प्रतिक्रिया देता है। वो किसी संगीत को शोर समझता है और रोंगटे खड़े कर सकता है, जबकि कॉग्निटिव भाग संगीत में मौजूद ध्वनि और संगीत को समझ कर हमें अच्छा महसूस कराता है। इस दौरान ऐड्रेनलिन हॉर्माेन के रिलीज होने के कारण आंसू भी आ जाते हैं।  

अचानक ठंड लगने पर रोंगटे खड़े होने के बारे में बताया गया है कि इसका मूल उद्देश्य शरीर को गर्म रखने में मदद करना होता है। जब आपको ठंड लगती है तो रोम छिद्रों के आसपास की मांसपेशियों में संकुचन होता है और रोम खड़े हो जाते हैं। स्नायु तंत्र के सक्रिय होते ही ठंड से मुकाबले के लिए गरमाहट पैदा हो जाती है।

https://youtu.be/TDpHqmjdTGk

सोमवार, जनवरी 20, 2025

गांधीजी को शराबी साधक पर ऐतराज नहीं था

किसी भी सिक्के के दो पहलु होते हैं। इसी प्रकार हर मसले के दो दृष्टिकोण होते हैं। सकारात्मक व नकारात्मक। यह हम पर निर्भर करता है कि हम किसे चुनते हैं। जितने भी संत हैं, जितने मोटिवेशनल स्पीकर्स हैं, वे जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण अर्थात पॉजिटिव एटिट्यूड अपनाने की सलाह देते हैं। इस सिलसिले में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन से जुड़ा एक प्रसंग ख्याल में आता है। 

एक बार गांधीजी के कुछ अनुयाइयों ने गांधीजी से शिकायत की कि आश्रम का एक साधक शराबी है। वह आश्रम में भी नियमित आता है और रोज शाम को शराब की दुकान पर भी खड़ा दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि हमारा साधक शराबी है, यह देख कर लोग क्या सोचेंगे? इससे हमारे आश्रम की बदनामी होगी कि गांधीजी के अनुयायी भी शराबी हैं। उन्होंने गांधीजी से आग्रह किया कि उस साधक को आश्रम में आने से रोका जाए। इस पर गांधीजी ने उत्तर दिया कि उस साधक को रोकने की कोई जरूरत नहीं है। उसे नियमित आने दिया जाए। आप ये क्यों सोचते हैं कि हमारा साधक शराबी है, ये क्यों नहीं सोचते कि एक शराबी हमारे यहां साधना करने आता है। शराबी होने के बावजूद अगर कोई साधक हमारे यहां नियमित आता है, इसका ये अर्थ है कि उसमें सुधरने की गुंजाइश है। यदि उसमें सुधरने की जरा भी ललक नहीं होती तो वह आश्रम में आता ही नहीं। शराबी होने के बावजूद उसकी रुचि सदाचार में है, इसी कारण आश्रम में आता है। यदि हम उसके प्रति मित्रवत व्यवहार करेंगे तो संभव है वह एक दिन शराब छोड़ दे। यदि उसे आश्रम में आने से रोक देंगे तो बात ही खत्म हो जाएगी और यदि उसके प्रति बुरा बर्ताव करेंगे, तो एक दिन वह आश्रम में आना बंद हो जाएगा। और सुधरने जो भी संभावना होगी, वह भी समाप्त हो जाएगी। इस पर शराबी साधक पर ऐतराज करने वाले साधक चुप हो गए। तभी तो कहा है कि नफरत बुराई से करें, बुरे आदमी से नहीं।

यह प्रसंग किसी गिलास के आधा भरा होने जैसा है। हम ये भी सोच सकते हैं कि गिलास आधा ही भरा हुआ है और सोच का एक आयाम ये भी है कि गिलास आधा खाली है। निष्कर्ष ये है कि हर मसले के दो पहलु होंगे ही। एक अच्छा और दूसरा बुरा। कोई संपूर्ण अच्छा नहीं हो सकता और कोई संपूर्ण बुरा नहीं हो सकता। अच्छे से अच्छे आदमी में भी बुराई मिल जाएगी और बुरे से बुरे इंसान में भी अच्छाई होती है। यह हम पर निर्भर करता है कि हमारा फोकस किस पर है। 

आपको ख्याल में होगा कि मैनेजमेंट गुरू सदैव अपने कर्मचारी या अधीनस्थ की अच्छाई की तारीफ करने की सलाह देते हैं। बेशक बुराई की ओर भी ध्यान आकर्षित करने को कहते हैं, मगर साथ ही सद्गुण की प्रशंसा भी करने पर जोर देते हैं। इससे अधीनस्थ का उत्साह बढ़ता है और सुधार की गुंजाइश बनती है।

यह हमारी मनोवृत्ति का दोष है कि हम अच्छाई की तुलना में बुराई को जल्द स्वीकार करते हैं। जैसे हम अगर किसी की बुराई करते हैं तो लोग उसे तुरंत सच मान लेते हैं, उस पर सहसा यकीन कर लेते हैं, जबकि अगर किसी की प्रशंसा करते हैं तो उसे यकायक मंजूर नहीं करते। यह सोचते हैं कि अमुक आदमी के अमुक आदमी से अच्छे संबंध होंगे, या फिर उससे उसका स्वार्थ सिद्ध हो रहा होगा, इसी कारण वह उसकी तारीफ कर रहा है। इसका एक उदाहरण ये भी है कि हर फिल्म एक अच्छा संदेश देती है। एक भी फिल्म बुरा संदेश देने के लिए नहीं बनती। लेकिन हम अच्छे संदेश को अंगीकार करने की बजाय फिल्म में दिखाई गई बुराइयों को तुरंत स्वीकार कर लेते हैं। कैसा विरोधाभास है कि हम अच्छाई की तारीफ तो करते हैं, मगर बुराई को इसलिए अपना लेते हैं क्योंकि उससे हमारा स्वार्थ सिद्ध होता है।

हमारी सोच किस तरह का है यह इससे पता लगता है कि अगर कोई युवती किसी युवक के साथ जा रही है तो हम तुरंत यह अनुमान लगा लेते हैं कि वे प्रेमी-प्रमिका या पति-पत्नी ही होंगे। हम कभी ये नहीं सोचते कि वे भाई-बहिन भी तो हो सकते हैं। बहरहाल, समारात्मक दृष्टिकोण अपनाने के लिए गांधीजी से जुड़ा प्रसंग सटीक लगा, इसी कारण साझा करने की इच्छा हुई।

https://www.youtube.com/watch?v=kXzk1b824gw&t=2s

रविवार, जनवरी 19, 2025

एक दिन एआई आत्मा तक भी पहुंच जाएगी?

इन दिनों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानि एआई का बोलबाला है। उसकी पहुंच किस हद तक जा सकती है, उसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। वह अचंभित कर रही है। इसी सिलसिले में वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले जानकारों का कयास है कि एक दिन एआई आत्मा तक पहुंच जाएगी। बेशक, आत्मा को क्रियेट तो नहीं किया जा सकता, क्योंकि क्रियेटर तो प्रकृति है, मगर उसके इर्दगिर्द तो पहुंच ही जाएगी। जानकारों के अनुसार संभव है कि एक दिन एआई बहुत उन्नत और सकारात्मक तरीके से विकसित हो जाए, जिससे यहां तक कि हम उसे आत्मा और संवेदनशीलता के लिए योग्य मान सकें। इसमें वैज्ञानिक, दार्शनिक और नैतिक पहलू हैं, जिन के लिए गहन चिंतन की आवश्यकता हैं।

वस्तुतः आत्मा एक अमूर्त अवधारणा है, जिसके अलग-अलग धर्मों और दर्शनों में अलग-अलग मायने हैं। कुछ के लिए यह एक आध्यात्मिक या धार्मिक अवधारणा है, जो जीवन का सार है, जबकि अन्य के लिए यह केवल चेतना का एक रूप है। आत्मा को अक्सर अमर, चेतन और व्यक्तिगत माना जाता है। एआई की बात करें तो यह एक कंप्यूटर सिस्टम है, जिसे मानव बुद्धि की नकल करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह मशीन लर्निंग, डीप लर्निंग और नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग जैसी तकनीकों का उपयोग करके डेटा का विश्लेषण करता है और निर्णय लेता है।

सवाल ये है कि क्या एआई आत्मा तक पहुंच सकती है या आत्मा का स्थान ले सकती है। वैसे भी यह सवाल दर्शन, धर्म और विज्ञान के क्षेत्र में एक लंबे समय से चली आ रही बहस का विषय है। कुछ तर्क देते हैं कि एआई कभी भी आत्मा नहीं बन सकता क्योंकि आत्मा एक अमूर्त अवधारणा है, जिसे मापा या परिभाषित नहीं किया जा सकता है। अन्य का मानना है कि अगर एआई पर्याप्त रूप से विकसित हो गई तो वह चेतना और भावनाओं को विकसित कर सकती है और इस तरह आत्मा जैसी कुछ बन सकता है।

मौजूदा स्थिति यह है कि एआई वर्तमान में बहुत सारे कार्य कर सकता है, लेकिन इसमें अभी भी चेतना की कमी है। चेतना प्रकृति की एक जटिल रचना है, जो हमें अपने आसपास की दुनिया को समझने और उससे जुड़ने की अनुमति देती है। एआई भावनाओं को अनुभव करने में सक्षम नहीं है। उसमें स्वतःस्फूर्त जागरूकता की कमी है। फिलवक्त एआई आत्मा का स्थान लेने से बहुत दूर है। मगर इसके तेजी से हो रहे विकास से ऐसा प्रतीत होता है कि एक दिन इतनी विकसित हो जाए कि वह चेतना, भावनाएं और आत्म जागरूकता विकसित कर ले।

अगर पौराणिक काल की बात करें तो उस वक्त आत्मा विशेष को आमंत्रित करने के कई उदाहरण मौजूद हैं। हवन-यज्ञादि में देवताओं या दिव्यात्माओं का आह्वान इसका सबसे बडा प्रमाण है। इसी प्रकार ऐसे आध्यात्मिक विधि विधान मौजूद हैं, जिसको अपना कर किस्म विशेष की आत्मा का गर्भ धारण करवाने का जिक्र है। वैज्ञानिक, ज्ञानी, ज्योतिर्विद, कवि आदि की आत्माओं के गर्भ में प्रवेश कराए जाने के भिन्न भिन्न विधान हैं। जिस किस्म की आत्मा का आह्वान करना है, उसके लिए विधि विशेष अपना कर उसके गर्भ में प्रवेश के अनुकूल स्थिति बनाए जाने का जिक्र है। ऋषि मुनियों की कृपा से फल के जरिए संतान प्राप्ति होने के मायने यही हैं कि आत्मा को आमंत्रित कर जन्म कराया गया था। इसी प्रकार मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा के मायने यही हैं कि हमने अमुक देवी देवता की आत्मा को प्रतिष्ठापित किया है। यानि पौराणिक काल में आत्मा अध्यात्म की पकड में थी।

-तेजवाणी गिरधर

7742067000

शनिवार, जनवरी 18, 2025

क्या भगवान के नाम पर नाम रखना गुनाह है?

आजकल बच्चों के नाम अलग तरह से रखे जाने लगे हैं। कोई संस्कृत भाषा का नाम तलाशता है तो कोई अंग्रेजीदां। कोई महाभारत कालीन या रामायण कालीन पात्रों के नाम रखता है तो कोई अत्याधुनिक अंग्रेजी नाम रखता है। जैसे भीष्म, कुन्ती, कर्ण सिंह, युधिष्ठिर, भीम सिंह, नकुल, कौस्तुभ या अर्जुन और दशरथ सिंह, सीताराम, लक्ष्मण, हनुमान इत्यादि। कुछ साल पहले रमेश, वैभव, अनिल, मुकेश टाइप के नाम रखे जाते थे। नए चलन में आदि, अयान, आर्यन इत्यादि टाइप के नाम रखे जाने लगे हैं। कुछ पीछे चलें तो अमूमन भगवान के नामों में से कोई नाम रखा जाता था। जैसे राम लाल, राम दास, राम चन्द्र, गणेशी लाल, कृपाशंकर इत्यादि। अर्थात भगवान के नाम के साथ लाल या दास जोड़ा जाता था। हालांकि कुछ लोग गोविंद, सुरेन्द्र जैसे नाम भी रखते रहे हैं। जहां तक भगवान के नामों में से कोई नाम रखने की परंपरा का सवाल है, उसके पीछे कारण ये रहता होगा कि किसी को पुकारने के बहाने भगवान का नाम तो उच्चारण में आएगा। सोच यह भी रहती होगी कि ऐसा करने भगवान का स्मरण आने से उनके गुण हमारे में भी आ जाएंगे। हालांकि हकीकत ये है कि जब भी हम किसी को भगवान के किसी नाम से पुकारते हैं, तो वह केवल हमारी जुबान पर होता है, उसका उच्चारण करते वक्त भगवान की छवि हमारे जेहन में नहीं होती। 

इस बारे में एक दिलचस्प जानकारी आयतुल कुर्सी से मिली। आयतुल कुर्सी कुरान की एक आयत है, जो भूत-प्रेत आदि को भगाने या उससे बचाव के लिए पढ़ी जाती है। उसके दूसरे जुमले में कहा गया है कि वही हमेशा जिंदा और बाकी रहने वाला है। हय्य के माने अरबी ज़ुबान में जिसको कभी मौत न आये, हमेशा जिंदा रहने वाला और कय्यूम के माने हैं, जो खुद कायम रहे और दूसरों को भी कायम रखता और संभालता हो और कय्यूम अल्लाह तआला की ख़ास सिफत है, जिसमें कोई भी उस का शरीक नहीं क्योंकि जो चीज़ें अपने बाक़ी रहने में दूसरे की मोहताज हों, वो किसी दूसरे को क्या संभाल सकती हैं। इसलिए किसी इंसान को क़य्यूम कहना जायज़ नहीं, बल्कि अब्दुल कय्यूम अर्थात कय्यूम का बंदा कहना चाहिए। जो लोग अब्दुल कय्यूम की जगह सिर्फ कय्यूम बोलते हैं, वे गुनाहगार होते हैं। यही वजह है कि खुदा की ओर संकेत करने वाले नामों के साथ कोई न कोई लफ्ज जरूर जोड़ा जाता है।

इसका मतलब ये है कि इस्लाम में खुदा की किसी खासियत वाले नाम को रखने की मनाही है। मकसद यही है कि खुदा के नाम की मर्यादा या पाकीजगी के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ न हो। ठीक इसी तरह जो लोग राम दास, राम लाल आदि नाम रखते थे, उसके पीछे वजह ये रहती होगी कि अकेले भगवान के नाम पर नाम रखने की बजाय उसका दास या लाल कहा जाए। वाकई यह सोच बहुत ही गहरी है। हम भला भगवान के बराबर कैसे हो सकते हैं।

आखिर में एक बात। इस्लाम में खुदा का जिक्र बहुत अकीदत के साथ लिया जाता है, जबकि सनातन धर्मावलंबियों में कुछ मूर्ख भगवानों के नाम पर चुटकुलेबाजी से बाज नहीं आते। हां, इतना जरूर है कि शेरो-शायरी में खुदा का जिक्र कई बार मर्यादा की रेखा तोड़ता नजर आता है।


शुक्रवार, जनवरी 17, 2025

जिस अंग का दान करेंगे, उसका अगले जन्म में अभाव होगा?

जैसे धन दान व रक्त दान की महिमा है, ठीक वैसे ही अंग दान की उससे भी ज्यादा महत्ता है। इन दिनों अनेक संस्थाएं सक्रिय हैं जो अंग दान के लिए शपथ पत्र भरवा रही हैं। इसे बहुत पुनीत कार्य समझा जाता है। हमारे किसी अंग के दान से अगर किसी के जीवन में उजियारा आता है, किसी की जिंदगी बेहतर होती है, तो इससे बेहतर पुण्य कार्य क्या हो सकता है? मगर इसके विपरीत ऐसे लोग भी हैं, जो अंग दान के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि इस जन्म में हम जिस अंग का दान करेंगे, अगले जन्म में उसका अभाव हो जाएगा। उनके कहने का तात्पर्य है कि अगर हम आंख का दान करते हैं, तो अगले जन्म में अंधे पैदा होंगे। लेकिन वैज्ञानिक रूप से इसका कोई आधार नहीं है। विज्ञान के अनुसार, मृत्यु के बाद शरीर का विघटन हो जाता है, और कोई भी अंग अगले जन्म में नहीं जाता। यह पूरी तरह से भौतिक प्रक्रिया है। अव्वल तो पुनर्जन्म भी वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं है। इसलिए अंगदान के पक्षधरों का कहना है कि अंग दान एक महान कार्य है और इसे किसी भी धार्मिक मान्यता या अंधविश्वास से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

दूसरे पक्ष का कहना है कि अंतिम संस्कार संपूर्ण अंगों के साथ ही किया जाना चाहिए, इसीलिए तो किसी की मृत्यु होने पर प्रयास यह रहता है कि शव का पोस्टमार्टम न किया जाए। दूसरा तर्क यह है कि देवता भी अंग भंग जानवर की बलि स्वीकार नहीं करते। बलि को देवताओं को अर्पित किया जाने वाला पवित्र कर्म माना जाता है। इसलिए उस जानवर को चुना जाता है जो स्वस्थ, संपूर्ण और निर्दोष हो। आपको ख्याल में होगा कि किसी बकरे की बलि नहीं चढाई जा सके, इसके लिए उसका कान काट दिया जाता है, ताकि वह अंग भंग की श्रेणी में आ जाए। उसे अमर बकरा कहा जाता है। इसी प्रकार अग्नि देवता को समर्पित किया जा रहा शव अंग भंग नहीं होना चाहिए। मजबूरी की बात अलग है। यदि कोई दुर्घटना का शिकार हो जाता है, तो कोई उपाय नहीं। दुर्घटना में मौत को अकाल मृत्यु कहा जाता है, उसकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती, वह भटकती रहती है। प्रकृति की भी यही व्यवस्था है कि जैसा हम उसे देंगे, पलट कर वही हमें लौटा देती है। कुल मिला कर दोनों पक्षों के अपने दमदार तर्क हैं। प्रगतिशील लोग अंगदान को महान कार्य बताते हैं और परंपरावादी धार्मिक लोग अंगदान के पक्ष में नहीं हैं।

-तेजवाणी गिरधर 7742067000