तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

शुक्रवार, दिसंबर 27, 2024

गणेश चतुर्थी के दिन चांद को देखने पर लगता है झूठा आरोप

हालांकि आज के वैज्ञानिक चुग में जबकि मानव चंद्रता की धरती पर पहुंच चुका है, ऐसे में इस प्रकार की अवधारणा खारिज सी होती है, मगर जैसा चलन में उसका जिक्र कर रहे हैं

यह एक बेहद रोचक मिथ है कि भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी अर्थात गणेश चतुर्थी के दिन चांद देखने पर आप पर झूठा आरोप लग जाता है। अर्थात जो अपराध आपने किया ही नहीं, वह आप पर मढ़ दिया जाता है। पुराणों के अनुसार ऐसा भगवान श्रीकृष्ण के साथ भी हो चुका है। एक प्रसंग में तो उन पर स्यमंतक मणि की चोरी झूठा आरोप लगा था।

सवाल उठता है कि आखिर गणेश चतुर्थी का चांद देखने पर झूठा आरोप लगता क्यों है? इस बारे में कथा है कि एक बार गणेश जी के लंबे पेट और हाथी के मुख को देख कर चंद्रमा को हंसी आ गई। गणेश जी इससे नाराज को गए और चंद्रमा से कहा कि तुम्हें अपने रूप का अहंकार हो गया है, अतरू अब तुम्हारा क्षय हो जाए। जो भी तुम्हें देखेगा, उसे झूठा कलंक लगेगा। गणेश जी के शाप से चन्द्रमा दुरूखी हो गए। उन्हें दुखी देख कर देवताओं ने राय दी कि गणेश जी की विधिवत पूजा करो। उनके प्रसन्न होने से शाप से मुक्ति मिल सकती है। चंद्रमा ने ऐसा ही किया। इस पर गणेश जी प्रसन्न तो हुए, मगर कहा कि शाप पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकता। ताकि अपनी गलती चन्द्रमा को हमेशा याद रहे। तब से गणेश चतुर्थी के दिन जो भी चांद देखता है, उसे भगवान गणेश के प्रकोप का सामना करना पड़ता है। यदि भूल से चंद्र दर्शन हो जाये तो उसके निवारण के लिए श्रीमद्भागवत के 10 वें स्कंध के 56-57 वें अध्याय में उल्लेखित स्यमंतक मणि की चोरी कि कथा का श्रवण करना लाभकारक है। जिससे चंद्रमा के दर्शन से होने वाले मिथ्या कलंक का ज्यादा खतरा नहीं होगा।

https://www.youtube.com/watch?v=iaxBOFKtZKo

गुरुवार, दिसंबर 26, 2024

क्या अंतर्ध्यान होना संभव है?

अंतर्ध्यान शब्द के मायने है, अदृश्य होना। इसका उल्लेख आपने शास्त्रों, पुराणों आदि में सुना होगा। अनेक देवी-देवताओं, महामानवों व ऋषि-मुनियों से जुड़े प्रसंगों में इसका विवरण है कि वे आह्वान करने पर प्रकट भी होते हैं, साक्षात दिखाई देते हैं और अंतर्ध्यान भी हो जाते हैं। मौजूदा वैज्ञानिक युग में यह वाकई अविश्वनीय है। विज्ञान आज तक भी इस पुरातन कला को समझ नहीं पाया है। हालांकि कुछ वैज्ञानिकों ने इस पर काम किया है और सिद्धांततः यह मानते हैं कि ऐसा संभव है, मगर कोई भी ऐसा कर नहीं पाया है। बताते हैं कि ओशो ने दुनिया के चंद शीर्ष वैज्ञानिकों की टीम बना कर इस पर काम किया था और उन्हें पूरी उम्मीद थी कि कामयाबी मिल जाएगी।

इस बारे में उपलब्ध जानकारी के अनुसार वैज्ञानिक नैनो किरणों पर काम कर रहे हैं। इस सिलसिले में एक लबादा बनाने की कोशिश की जा रही है, जिसे पहनने के बाद उस पर नैनो किरणें डालने पर दिखाई देना बंद हो जाता है। कुछ वैज्ञानिक इस पर भी काम कर रहे हैं कि विशेष तापमान व दबाव यदि मनुष्य के आसपास क्रियेट किया जाए तो वह अदृश्य हो सकता है। 

जानकारी के अनुसार एक उपकरण बनाया जा चुका है, जिसके भीतर रखी वस्तु एक दिशा से तो दिखाई देती है, मगर दूसरी दिशा से नहीं दिखाई देती। एक उपकरण, जिसका नाम फोटोनिक क्रिस्टल बताया गया है, वह वस्तुओं को दिखाई देने में बाधक बनता है, अर्थात अदृश्य कर देता है। प्रसंगवश एक शब्द ख्याल में आता है- मृग मरीचिका। कहते हैं न कि रेगिस्तान में तेज धूप में किरणों की तरंगों में दूर से हिरण को ऐसा आभास होता है कि वहां समुद्र है या पानी है, जबकि वास्तव में ऐसा होता नहीं है। अर्थात हिरण को दृष्टि भ्रम होता है। हो सकता है कि कल इसी प्रकार का दृष्टि भ्रम बना कर आदमी को अदृश्य किया जा सके। 

बताते हैं कि हिमालयों की पहाडिय़ों में एक जड़ी पाई जाती है, जिसे मुंह में रखने पर आदमी दिखाई देना बंद हो जाता है। मगर इसके भी प्रमाणिक उदाहरण हमारे संज्ञान में नहीं हैं। इसी प्रकार जनश्रुति है कि एक पक्षी विशेष का पंख अपने पास रखने वाला व्यक्ति दूसरों को दिखाई नहीं देता, मगर इसके भी पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं। 

इसी से संबधित एक जानकारी ये भी है कि देवी देवता सशरीर प्रकट हो सकते हैं, जो कि पंचमहाभूत से बना है, मगर अन्य आत्माएं वायु अथवा प्रकाष के रूप में विचरण करती हैं और उसका आभास भी करवा सकती हैं। आपने सुना होगा कि अनेक लोगों को उनके दिवंगत गुरू याद करने पर गंध के रूप में अपनी उपस्थिति का आभास कराते हैं। इसी प्रकार भूत छाया के रूप में दिखाई देते हैं। मेरे एक मित्र का यकीन है कि रात कि समय उनके स्वर्गीय पिताश्री एक पक्षी की आवाज से अपनी उपस्थिति का आभास करवाते हैं।

वस्तुओं के गायब हो जाने के किस्से भी आम हैं। आप के साथ भी ऐसा हो चुका होगा। जैसे किसी स्थान विशेष पर रखी वस्तु आप लेने जाते हैं तो वह वहां नहीं मिलती। आपको अचरज होता है कि वह कहां गायब हो गई। कुछ समय बाद जब फिर देखते हैं तो वह वहीं मिल जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह कुछ समय के लिए गायब हो जाती है। ऐसा भ्रम की वजह से भी हो सकता है।

आपने ऐसे मदारियों को भी करतब दिखाते हुए देखा होगा कि वे गुलाब जामुन या कोई मिठाई मांगने पर हवा में हाथ धुमा कर वह वस्तु पेश कर देते हैं। हालांकि यह ऐसे जादू के रूप में माना जाता है, जिसके पीछे कोई तकनीक काम करती है, जबकि आम मान्यता है कि मदारी कुछ समय के लिए मांगी गई वस्तु किसी दुकान या ठेले से मंगवाते हैं और कुछ समय बाद वह वस्तु वापस वहीं पहुंच जाती है, जहां से मंगाई गई है।

गायब हो जाने के संबंध में कुछ रहस्यमयी किस्से जानकारी में आए हैं। बताते हैं कि एक महिला क्रिस्टीन जांसटन और उनके पति एलन जांसटन 1975 की गर्मियों में उत्तरी ध्रुव की यात्रा पर गए थे। वहां एलन अचानक गायब हो गए। बाद में पुलिस तेज घ्रांण शक्ति वाले कुत्ते ले कर खोजने गई तो जिस स्थान से एलन गायब हुए थे, वहां पर आ कर कुत्ते रुक गए। 

एक किस्सा ये भी है। अमेरिका के टेनेसी स्थित गैलेटिन के निवासी डेविड लांग 23 सितम्बर, 1808 को दोपहर में घर से बाहर निकले। उनकी मुलाकात उनके एक न्यायाधीश मित्र आगस्टस पीक से हुई। शिष्टाचार के बाद जैसे ही डेविड लांग आगे बढ़ा तो वह अचानक गायब हो गया।

इसी प्रकार पूरी बस्ती ही गायब होने का भी किस्सा है। घटना अगस्त 1930 की बताई जाती है। कनाडा के चर्चिल थाने के पास अंजिकुनी नामक एस्किमो की बस्ती थी। एक दिन अचानक पूरी बस्ती के लोग न जाने कहां गायब हो गए। 

इसी प्रकार 1885 में वियतनाम में सैनिकों की छह सौ सैनिकों की एक टुकड़ी ने सेगॉन शहर की ओर कूच किया। कोई एक मील दूर जाने पर वह पूरी टुकड़ी गायब हो गई। आज तक उस रहस्य से पर्दा नहीं उठ पाया है। अनुमान यही लगाया गया कि धरती से इतर कोई और ग्रह है, जहां के प्राणी लोगों को पकड़ कर ले जाते हैं।

कुल जमा बात ये है कि पौराणिक काल में जिस विधा से अथवा जिस शक्ति से देवी-देवता अंतर्ध्यान हो जाते थे, वह भले ही इस युग में संभव न हो, मगर उम्मीद की जा रही है कि विज्ञान किसी दिन गायब होने की कोई न कोई तकनीक खोज ही लेगा।

https://www.youtube.com/watch?v=Slwq-zTLVEM

बुधवार, दिसंबर 25, 2024

क्या आत्मा की गंध होती है?

धारणा है कि पंच महाभूत से विलग होने के बाद आत्मा के पास भौतिक रूप से प्रकट होने का कोई उपाय नहीं होता, मगर अलबत्ता गंध के जरिए वह अपनी उपस्थिति दर्ज करवा सकती है। इसका अनुभव मैने मेरे एक खादिम मित्र के पास किया। अरसे पहले एक बार मैं उनके हुजरे में बैठा था। आध्यात्मिक चर्चा के दौरान उनके गुरू की चर्चा चल रही थी। उनका कहना था कि वे उनसे मानिसक संवाद किया करते हैं। उनका कहना था कि आग्रह करने पर उपस्थित हो जाते हैं। मैने पूछा आपको कैसे पता लगता है कि वे आ चुके हैं। वे बोले उनके आने के साथ ही एक खास किस्म की खुषबू आती है और उनके विदा होने के साथ ही विलुप्त हो जाती है। मेरे आग्रह किया कि क्या ऐसा आप इसी समय कर सकते हैं। उन्होंने कहा अभी लो। उन्होंने अपने गुरू का आह्वान किया और यकायक एक खास गंध हुजरे में बिखर गई, जबकि उस वक्त हम दोनों ने कोई इत्र नहीं लगा रखा था, न ही अगरबत्ती जलाई थी।

इसी प्रकार का अनुभव मैने अपनी माताश्री के निधन पर किया। निधन के बाद तीन दिन तक मैने साफ महसूस किया कि जिस कमरे में वे सोती थीं, वहां गुलाब की महक बिखरी हुई थी। मैं चकित था। विष्वास ही नहीं हो रहा था। अच्छी तरह से पता किया कि किसी ने कोई परफ्यूम तो नहीं लगा रखा। या अगरबत्ती तो नहीं जलाई हुई है। पाया कि ऐसा कुछ भी नहीं था। खुषबू स्वतः ही आ रही थी। मैं समझ गया कि वे गंध के जरिए अपनी उपस्थिति दर्षा रही हैं।

ऐसी मान्यता भी है कि सुगंध देवी देवताओं, जिन्न आदि का भोजन है। इसी कारण हम पूजा के दौरान खुषबूदार अगरबत्ती जलाते हैं, ताकि वे प्रसन्न हो। 

उल्लेखनीय है कि भूत-प्रेत और लोक कथाओं में मृतात्मा की उपस्थिति को सड़ी-गली चीजों की गंध या अचानक आई किसी अप्राकृतिक सुगंध से जोड़ा जाता है।

जो लोग ध्यान, पूजा या किसी विशेष साधना में लीन होते हैं, वे कभी-कभी कुछ खास गंधों को अनुभव करते हैं, जिसे वे किसी आत्मा या देवता का संकेत मानते हैं। वैसे उनके साथ गंध का जुड़ाव वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं है। इस बारे में वैज्ञानिक दृश्टि कोण है कि कुछ मामलों में मनोवैज्ञानिक या भावनात्मक अनुभव के कारण गंध महसूस हो सकती है, जिसे साइकोसेंसरी अनुभव कहा जाता है। इसी प्रकार यादों और भावनाओं के कारण मस्तिष्क कभी-कभी गंधों को महसूस कर सकता है, भले ही वह वास्तव में वहां न हो। ज्ञातव्य है कि गंध, स्वाद, ध्वनि और दृष्य हमारी स्मृति में संग्रहित रहते हैं।

कुल मिला कर मृतात्मा की गंध का अनुभव मुख्यतः विश्वास और भावनाओं पर निर्भर करता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसे प्रमाणित करना मुश्किल है। प्रसंगवष बता दें कि हर प्राणी की भिन्न भिन्न गंध होती है, यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है।


सोमवार, दिसंबर 23, 2024

चोरी होना भी दान का एक रूप है?

सुना है कि चोरी होना भी दान का एक रूप है। अर्थात जब हमारी कोई वस्तु चोरी हो जाती है तो उसका वैसा ही महत्व है, जैसा कि अपनी ओर से किसी वस्तु का दान करना। इस सिलसिले में एक कहानी भी सुनी है। हुआ यूं कि एक बार एक ठेले वाले से नजर चुरा कर एक ग्राहक दो आम अपनी थैली में रख रहा था। उसे दूसरे ग्राहक ने देख लिया। वह चिल्लाया- अरे देखो, तुम्हारे ठेले से अमुक व्यक्ति आम चुरा रहा है। इस पर ठेले वाला नाराज हो कर बोला कि तुम्हारा क्या मतलब, तुम अपना काम करो। तुम मुझे मिलने वाले पुण्य में बाधा क्यों डाल रहे हो? मेरे यहां से भले ही आम चोरी हो रहे हैं, मगर असल में यह भी दान का ही रूप है। गुप्त दान। जिसका फल मुझे बाद में मिलेगा। शायद इसी वजह से चोरी या कोई नुकसान होने पर मन को यह तसल्ली देने का कहा जाता है कि मलाल न करो, जो वस्तु चली गई, वह या तो आपकी थी नहीं, या फिर वह दान के रूप में चली गई है।

असल में दान प्रकृति की आदान-प्रदान, लेन-देन, क्रिया-प्रतिक्रिया की व्यवस्था का ही रूप प्रतीत होता है। जैसे कोई वस्तु किसी स्थान से कहीं और जाएगी तो वह जो अंतराल उत्पन्न हुआ है, उसे प्रकृति किसी न किसी रूप में भर देती है। दान का सिद्धांत इसी व्यवस्था का आधार है। जब भी हम किसी को कोई वस्तु दान में देते हैं तो बाद में पलट कर वापस मिलती है। कब और कैसे, पता नहीं। प्रकृति की अपनी व्यवस्था है, जिसे समझना व जानना संभव नहीं है। कर्म का सिद्धांत भी तो ऐसा ही है। हम अच्छा कर्म करते हैं तो बाद में उसका फल भी अच्छा मिलता है। बुरे कर्म का बुरा फल। इसी सूत्र से जुड़ी एक उक्ति आपने सुनी होगी कि बोये पेड़ बबूल का, आम कहां से होय। 

दान के कई प्रकार हैं। अन्नदान, वस्त्रदान, विद्यादान, अभयदान और धनदान। इसी क्रम में रक्तदान, किडनी दान, मृत्योपरांत नेत्रदान व संपूर्ण शरीर का दान आदि आते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। इतना ही नहीं दान की प्रवृत्ति से सांसारिक आसक्ति यानी मोह माया से छुटकारा मिलता है। हवन-यज्ञ में अग्नि देवता को विभिन्न वस्तुओं की आहुति देने का भी अपना विधान है।

ज्योतिष के अनुसार दान करने से ग्रहों की पीड़ा से भी मुक्ति पाना आसान हो जाता है। अलग-अलग वस्तुओं के दान से अलग-अलग समस्याएं दूर होती हैं। ज्योतिष में तो इस पर पूरा विधान बना हुआ है कि अमुक वस्तु के दान को कब करने से क्या फल मिलता है। यहां तक बताया गया है कि उसी स्तर के कपड़ों का दान करें, जिस स्तर के कपड़े आप पहनते हैं। फटे-पुराने वस्त्रों का दान कभी न करें। ये भी बताया गया है कि मृत्यु आसान हो, इसके लिए दान किया जाता है। यही कारण है कि हमारे यहां मृत्यु शैया पर पड़े व्यक्ति के हाथों से दान करवाया जाता है, ताकि उसकी सद्गति हो। हमारे यहां मकर संक्रांति जैसी तिथियों पर दान करने की परंपरा है। और तो और अपनी बेटी का विवाह करने को कन्यादान कहा गया है, जिसका बड़ा महत्व बताया गया है। कहते हैं कि कन्यादान न करने से मुक्ति नहीं मिलती। इसी कारण जिन के बेटी नहीं होती, वे किसी अन्य की कन्या की शादी करवा का पुण्य कमाते हैं। हिंदुओं में कई लोग ऐसे हैं, जिनकी मान्यता है कि अपनी कमाई का दसवां हिस्सा दान करना चाहिए। इससे विभिन्न प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है।

इस्लाम में भी दान की बड़ी महिमा बताई गई है। हैसियतमंद मुसलमान को जकात देना जरूरी है। आमदनी से पूरे साल में जो बचत होती है, उसका 2.5 फीसदी हिस्सा किसी गरीब या जरूरतमंद को दिया जाता है, जिसे जकात कहते हैं। ईद से पहले यानी रमजान में जकात अदा करने की परंपरा है। यह जकात खासकर गरीबों, विधवा महिलाओं, अनाथ बच्चों या किसी बीमार व कमजोर व्यक्ति को दी जाती है। जकात और फितरे में बड़ा फर्क ये है कि जकात देना रोजे रखने और नमाज पढऩे जैसा ही जरूरी होता है, बल्कि फितरा देना इस्लाम के तहत जरूरी नहीं है। फितरे की कोई सीमा नहीं होती। इंसान अपनी हैसियत के हिसाब से कितना भी फितरा दे सकता है।

कई लोग संस्थागत दान की बजाय जांच-परख कर पात्र व्यक्ति को दान देने को अधिक उचित मानते हैं। यही वजह है कि अनेक लोग परंपरागत व आदतन भिखारी को दान देने की बजाय उसी को दान देना अधिक उपयुक्त मानते हैं जो कि वाकई जरूरतमंद हो। जरूरतमंद को सहायता करने से वह सच्चे दिल से दुआ करता है। कई लोग भिखारी को खाना तो खिलवा देते हैं, मगर धन नहीं देते। उनकी मान्यता है कि पेशे से भिखारी व्यक्ति उसका उपयोग नशे के लिए कर सकता है, जिससे पुण्य की बजाय उलटे पाप लगेगा। लोगों की इस प्रवृत्ति को भिखारी भी जान गए हैं, इस कारण वे खाने या दवाई के नाम पर पैसा मांगते हैं। सिद्धांत के पक्के लोग किसी भिखारी को पैसे देने की बजाय खुद भोजन व दवाई दिलवाते हैं। 

https://www.youtube.com/watch?v=mmerjdAIKzs

रविवार, दिसंबर 22, 2024

पृथ्वीराज चौहान को अश्वत्थामा ने दी थी शब्दभेदी बाण की विद्या?

भारत के अन्तिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान (तृतीय), जिनका कि अजमेर की तारागढ़ पहाड़ी पर स्मारक बना हुआ है, के देहांत के साथ शब्द भेदी बाण का जिक्र आवश्यक रूप से आता है। उन्हें शब्द भेदी बाण चलाना किसने सिखाया या यह विद्या वरदान में दी, इसको लेकर इंटरनेट पर अलग-अलग तरीके से जानकारी पसरी हुई है। हालांकि उसके पुख्ता ऐतिहासिक प्रमाण को लेकर सभी जानकार मौन हैं, मगर किसी न किसी के हवाले से वे बताते हैं कि उन्हें यह विद्या अश्वत्थामा ने दी। 

ज्ञातव्य है कि अश्वत्थामा के बारे में मान्यता है कि वे काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के सम्मिलित अंशावतार थे और आठ चिरंजीवियों में से एक हैं। वे गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र थे। द्वापर युग में जब कौरव व पांडवों में युद्ध हुआ था, तब उन्होंने कौरवों का साथ दिया था। अश्वत्थामा अत्यंत शूरवीर एवं प्रचंड क्रोधी स्वभाव के योद्धा थे। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को चिरकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया था। वे आज भी पृथ्वी पर अपनी मुक्ति के लिए भटक रहे हैं। यह भी मान्यता है कि मध्यप्रदेश के बुरहानपुर शहर से 20 किलोमीटर दूर असीरगढ़ के किले में भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर है। बताते हैं कि अश्वत्थामा प्रतिदिन इस मंदिर में भगवान शिव की पूजा करने आते हैं। अश्वत्थामा को अन्य कई स्थानों पर भी देखे जाने के किस्से हैं।

बताते हैं कि 1192 में पृथ्वीराज चौहान मुहम्मद गौरी से युद्ध में हार गए तो वे जंगल की ओर निकल पड़े। वे एक शिव मंदिर में प्रतिदिन आराधना करने जाते थे। वह शिव मंदिर क्या असीरगढ़ किले का ही मंदिर था, इस बारे में कोई उल्लेख नहीं है। एक बार उन्होंने पाया कि अलसुबह उनसे पहले कोई पूजा-अर्चना कर गया। इस पर उन्होंने इस रहस्य का पता लगाने के लिए भगवान शिव की आराधना की तो उन्हें एक बुजुर्ग ने दर्शन दिए। उसके सिर पर गहरा घाव था। पृथ्वीराज चौहान अच्छे वैद्य भी थे। उन्होंने उस व्यक्ति का घाव ठीक करने का प्रस्ताव रखा। वे मान गए। इलाज शुरू हुआ। जब एक हफ्ते के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ तो पृथ्वीराज चौहान चौंके। उन्होंने अपने अनुमान के आधार पर उस व्यक्ति से पूछा कि क्या वे अश्वत्थामा हैं, इस पर उस व्यक्ति ने हां में जवाब दिया। पृथ्वीराज चौहान अभिभूत हो गए और उनसे वरदान मांगा। अश्वत्थामा ने उन्हें शब्दभेदी बाण का वरदान दिया। साथ ही तीन शब्द भेदी तीर दिए, जो अचूक थे। ज्ञातव्य है कि महाभारत कथा में स्पष्ट अंकित है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा के सिर पर लगी मणि को युक्तिपूर्वक हटवाया था और उसकी वजह से उनके सिर पर गहरा घाव हो गया था। 

जहां तक पृथ्वीराज चौहान के शब्दभेदी बाण का उपयोग करने का सवाल है, तो उसका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार हैरू-

सन् 1192 में मोहम्मद गौरी ने तराइन के दूसरे युद्ध में उनको हरा दिया, तो वे जंगल में चले गए, बाद में मगर गुप्तचरों की सूचना के आधार पर गौरी ने उन्हें कैद कर लिया। कहीं यह उल्लेख है कि उन्हें अजयमेरू दुर्ग में रखा गया तो कहीं ये हवाला है कि गौरी उन्हें सीधे गौर (गजनी) ले गया। स्थानीय दुर्ग अथवा गौर में गौरी ने गर्म सलाखों से उनके दोनों नेत्रों जला दिया। पृथ्वीराज चौहान के बचपन के मित्र व राज कवि चंद वरदायी फकीर की वेशभूषा में पीछा करते हुए गौर पहुंच गए। चंद वरदायी ने सुल्तान मोहम्मद गौरी से संपर्क स्थापित किया व निवेदन किया कि आंखों के फूट जाने के बावजूद पृथ्वीराज चौहान शब्दभेदी बाण से अचूक निशाना लगाना जानते हैं, जिस अजूबे को सुल्तान को देखना चाहिए। गौरी ऐसी कला देखने को राजी हो गया। एक ऊंचे मंच पर बैठ कर मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को तीरंदाजी से लक्ष्य पर संधान करने का आदेश दिया। जैसे ही गौरी के सैनिक ने घंटा बजाया, कवि चंद वरदायी ने यह दोहा पढ़ारू-

चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण,

ता ऊपर सुल्तान है, मत चूके चौहान।

पृथ्वीराज चौहान ने मंच पर गौरी के बैठने की स्थिति का आकलन करके बाण चला दिया, जो सीधा गौरी को लगा और उसके उसी वक्त प्राण निकल गए। इसके बाद गौरी के सैनिकों के हाथों अपमानजनक मृत्यु से बचने के लिए कवि चंद वरदायी ने अपनी कटार पृथ्वीराज चौहान के पेट में भौंक दी और उसके तुरंत बाद वही कटार अपने पेट में भौंक कर इहलीला समाप्त कर ली।

प्रसंगवश यह जानना उचित रहेगा कि शब्दभेदी बाण चलाना तो बहुत से यौद्धाओं ने सीखा था, परंतु उसमें पारंगत चार या पांच ही थे। ज्ञातव्य है कि भगवान राम के पिताश्री महाराजा दशरथ के जिस बाण से मातृ-पितृ भक्त श्रवण कुमार की मृत्यु हुई, वह शब्द भेदीबाण था। श्रवण कुमार माता-पिता को एक तालाब के पास छोड़ पानी भरने गए तो पानी की कलकल की आवाज से आखेट को निकले महाराजा दशरथ को यह भ्रम हुआ कि कोई हिरण पानी पी रहा है और उन्होंने शब्दभेदी बाण चला दिया था। इस पर श्रवण कुमार के माता-पिता ने दशरथ को श्राप दिया कि वे भी अपने अंतिम समय में पुत्र का वियोग सहन करेंगे, और दोनों ने प्राण त्याग दिए। 

इसी प्रकार महाराज पांडु भी शब्दभेदी बाण की विद्या जानते थे। एक दिन राजा पांडु अपनी दोनों पत्नियों कुन्ती एवं माद्री के साथ तपस्या के लिए ऋषि कण्व के आश्रम में रहने गए। एक दिन माद्री के हठ करने पर पाण्डु आखेट करने गए। कहीं ये उल्लेख है कि सिंह की गर्जना सुन कर उन्होंने शब्दभेदी बाण चलाया तो कहीं ये जिक्र है कि उन्हें एक मृग की छाया दिखाई दी, जिस पर उन्होंने शब्दभेदी बाण चला दिया। बाण लगते ही ऋषि कण्व प्रकट हो गए, जो अपनी पत्नी के साथ सहवास कर रहे थे। उन्होंने पांडु को श्राप दिया कि जब भी वे अपनी पत्नी के साथ सहवास करेंगे तो उनकी मृत्यु हो जाएगी। एक दिन माद्री एक झरने के किनारे नहा रही थी, उनको इस रूप में देख कर पांडु विचलित हो गए और माद्री के साथ सहवास करने लगे। ऐसा करते ही कण्व ऋषि के श्राप  की वजह से उनकी वहीं मृत्यु हो गई। उनके वियोग में माद्री ने भी वहीं प्राण त्याग दिए।

इसी प्रकार महाभारत के महत्वपूर्ण पात्र कर्ण, जिन्होंने दुर्याेधन की मित्रता के चलते कौरवों का साथ दिया था, उनको भी शब्दभेदी बाण की विद्या हासिल थी। एक कथा के अनुसार उन्होंने एक बार केवल आवाज के आधार पर गाय के बछड़े को मार दिया था। इसी प्रकार द्रौणाचार्य को अपना गुरू मान कर तीरंदाजी सीखने वाले एकलव्य के बारे में भी एक कथा है कि उन्होंने शब्दभेदी बाण से एक कुत्ते को मार डाला था। जानकारी ये भी है कि शब्दभेदी बाण की विद्या भीम ने अर्जुन को दी थी।

विशेष बात ये है कि अन्य यौद्धाओं ने तो शब्द की ध्वनि के आधार पर शब्द भेदी बाण चलाया, जबकि पृथ्वीराज चौहान ने शब्दों को सुन कर उनके अर्थ के आधार पर अनुमान लगा कर शब्द भेदी बाण चलाया, जो कदाचित कहीं अधिक कठिन था।

https://www.youtube.com/watch?v=Foa3VxzkJDk&t=68s

शनिवार, दिसंबर 21, 2024

सोये हुए व्यक्ति के चरण स्पर्श क्यों नहीं किए जाते?

हमारे यहां मान्यता है कि सोये हुए व्यक्ति के चरण स्पर्श नहीं किए जाने चाहिए। अगर इस मान्यता से अनभिज्ञ कोई व्यक्ति सोये हुए व्यक्ति के चरण स्पर्श करता है तो उसे ऐसा करने से रोका जाता है। मान्यता तो यह तक है कि लेटे हुए व्यक्ति के भी चरण स्पर्श नहीं किए जाते। अगर कोई चरण स्पर्श करना चाहता है तो लेटा हुआ व्यक्ति बैठ जाता है। सवाल ये है कि आखिर इस मान्यता के पीछे क्या साइंस है, क्या कारण है?

विभिन्न जानकारों से इस बारे में चर्चा करने पर जो तथ्य सामने आए, वे आपसे साझा किए जा रहे हैं।

अव्वल तो अगर सोये हुए किसी व्यक्ति के चरण स्पर्श करेंगे तो उसका प्रयोजन पूरा ही नहीं होगा। आप आशीर्वाद या सम्मान की खातिर किसी के चरण स्पर्श करते हैं, मगर यदि वह सोया हुआ है तो उसे पता ही नहीं लगेगा कि आप उसके चरण स्पर्श कर रहे हैं। अर्थात वह आशीर्वाद देने की स्थिति में ही नहीं है और न ही उसको ये पता लगेगा कि आप उसके प्रति सम्मान का इजहार कर रहे हैं।

वैसे इसका मूल कारण दूसरा बताया जाता है। हालांकि सोते समय सांस चल रही होती है और आदमी जिंदा होता है, मगर सोना भी एक प्रकार की मृत्यु मानी गई है। अगर कोई आदमी गहरी नींद में हो तो उसकी ज्ञानेन्द्रियां-कर्मेन्द्रियां भी सुप्त हो जाती हैं। चूंकि उसकी आंखें बंद हैं, इस कारण दिखाई नहीं देता है, उसका मुख बंद है, इस कारण उसका स्वर यंत्र व जीभ की स्वाद तंत्रिका सुप्त होती है, उसे सुनाई भी नहीं देता। स्पर्श का भी अनुभव नहीं होता। यानि कि वह लगभग मृतक समान है। ज्ञातव्य है कि हमारे यहां मृतक के शव के चरण स्पर्श करने कर चलन है। जिस मान्यता की हम चर्चा कर रहे हैं, उसे इसी से जोड़ कर देखा जाता है। अर्थात हम यदि सोये हुए किसी व्यक्ति के चरण स्पर्श कर रहे हैं, इसका मतलब ये कि हम मृत व्यक्ति के चरण छू रहे हैं। इसे अपशकुन माना जाता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि हमारे चरण स्पर्श करने से वह मर ही जाएगा, मगर यह कृत्य उसी के तुल्य माना जाता है। 

लेटे हुए व्यक्ति के चरण स्पर्श नहीं करने के पीछे तर्क ये है कि ऐसा करने से चरण स्पर्श करने वाले के प्रति उपेक्षा का भाव महसूस होता है। यह सामान्य शिष्टाचार के विपरीत है। वाकई यह कितनी अभद्रता है कि कोई आपके प्रति सम्मान दर्शा रहा है और हम उसके सम्मान को स्वीकार करने के लिए उठ कर बैठ तक नहीं सकते।  

स्थितियों अथवा दृश्य के प्रति हम कितने सतर्क हैं, इसको लेकर एक आलेख में पहले भी चर्चा कर चुके हैं। इन उदाहरणों से उसे समझ सकते हैं। आपने देखा होगा कि हमारे यहां भोजन परोसते समय पहले जल पेश किया जाता है। उसके बाद भोजन की थाली। या फिर आगे-पीछे। अज्ञानतावश कोई यदि भोजन की थाली एक हाथ में व दूसरे हाथ में पानी का गिलास ले कर आए या पानी का गिलास भोजन की थाली में लाए तो इसे अपशगुन माना जाता है। ज्ञातव्य है कि हमारे यहां मान्यता है कि श्राद्ध के दौरान ऐसा मृतक के लिए किया जाता है। यदि हम जिंदा व्यक्ति के साथ ऐसा कर रहे हैं, तो इसका अर्थ ये हुआ कि हम मृतक के साथ ऐसा कर रहे हैं। इसी प्रकार अगर कोई मकान की चौखट पर बैठे तो उसे वहां न बैठने को कहा जाता है, क्यों कि मान्यता ये है कि चौखट पर बैठने से दरिद्रता आती है। इसके विपरीत तथ्य है कि जो दरिद्र हो जाता है, जिसके पास खाने को भी नहीं होता, वह चौखट पर आ कर बैठता है। ऐसे ही अनेक और उदाहरण हो सकते हैं। यथा दुकान बंद करने को दुकान मंगल करना कहते हैं। दीया बुझाने को दीया बढ़ाना कहते हैं। किसी अपने को अपशब्द कहने की जरूरत पड़ जाए तो उसका विलोमार्थ उपयोग में लेते हैं। जैसे यदि कोई लापरवाही करते हुए कुछ नुकसान कर दे तो यकायक मुंह से ये निकलता है कि अंधा है क्या, मगर सिंधी में कहते हैं कि सजा है क्या अर्थात आंख से पूरा दिखता है क्या? 

कुल जमा बात ये है कि हमारी संस्कृति में नकारात्मकता को भी सकारात्मक दृष्टि से देखते हैं।


https://www.youtube.com/watch?v=54z11Vs4Xg4&t=4s

गुरुवार, दिसंबर 19, 2024

अदृश्य शक्तियां किसी के सपने में आ सकती हैं?

बात तकरीबन 1978 की है। उन दिनों मैंने अनेक तांत्रिक प्रयोग किए थे। एक प्रयोग का जिक्र कर रहा हूं। मैं तब लाडनूं में था और निकटवर्ती जसवंतगढ़ में विज्ञान कॉलेज में प्रथम वर्ष मैथ्स का छात्र था। मेरे एक मित्र सी. एल. तिवाड़ी तृतीय वर्ष बायलॉजी में थे। मुझे एक तांत्रिक प्रयोग के लिए श्मशान से ताजा चिता की राख लानी थी। इसका जिक्र मैंने श्री तिवाड़ी से किया तो वे बोले कि वे भी साथ चलना चाहते हैं। मैं उन्हें साथ ले गया। श्मशान में जल कर पूर्ण हुई एक चिता मिल गई, जिसके अंगारे अभी सुलग रहे थे। मैंने उससे तांत्रिक विधि से थोड़ी सी राख ली। श्री तिवाड़ी ने हड्डी का एक टुकड़ा उठाया और बताया कि वह रीड़ की हड्डी का एक गुटखा है, जिसका उन्होंने बायलॉजिकल नाम भी बताया। हम वहां से रवाना हो गए। 

हमें किसी मीटिंग में जाना था, इस कारण हड्डी का टुकड़ा रास्ते में एक मकान की खिड़की पर रख दिया। मीटिंग से लौटने पर हड्डी का वह टुकड़ा मैने ले लिया और घर आ गया। घर में मैने उसे अपनी किताबों के पीछे छुपा कर रख दिया। कुछ दिन बात श्री तिवाड़ी बदहवास से मेरे पास आए और एक अजीब सी बात बताई। उन्होंने बताया कि उनके एक मित्र जनाब अजीज खान, जो कि उनके क्लास फैलो हैं, को एक सपना आया है। सपने में उन्होंने चिता से राख लाने की घटना को क्रमवार देखा है। उन्होंने बताया कि वह चिता किसी साध्वी की थी। 

                             उन्होंने चौंकाने वाली बात ये भी बताई कि साध्वी की आत्मा ने मेरे किताबों पीछे छुपी हड्डी गायब कर दी है। मैं हतप्रभ रह गया कि उस घटना का सपना किसी थर्ड पर्सन को कैसे आया? दूसरा ये कि हड्डी का टुकड़ा कैसे गायब हो सकता है, जिसे कि मैने एक दिन पहले ही सुरक्षित देखा है? मैने तुरंत जा कर देखा। वाकई हड्डी का टुकड़ा गायब था। श्री तिवाड़ी ने बताया कि जब उन्होंने चिता से हड्डी का टुकड़ा उठाया था, तब उनको किसी अज्ञात शक्ति ने झन्नाटेदार थप्पड़ मारा था, मगर मारे डर के उन्होंने इसका जिक्र नहीं किया था। उन्होंने ये भी बताया कि जिस दिन की यह घटना है, उसी दिन से हर शाम के वक्त उनके हाथों से मांस जलने की बदबू आती है और वे खाना नहीं खा पाते। 

इस पूरी घटना में मैं इस बात से चकित नहीं हुआ कि उस शक्ति ने हड्डी का टुकड़ा गायब कर दिया, लेकिन इस बात से अचंभित था कि एक थर्ड पर्सन को घटना का हूबहू सपना कैसे आया? श्री तिवाड़ी ने सवाल किया कि जनाब अजीज से न तो उन्होंने हमारी मित्रता और न ही घटना का कभी जिक्र कभी किया, फिर भी उनको पूरा सपना कैसे आयाड्ढ? मैं निरुत्तर था। इससे यह तो प्रमाणित होता ही है कि अदृश्य शक्तियां किसी घटना का सपना किसी को दिखा सकती हैं।

https://www.youtube.com/watch?v=-3QSW6V3eT4