तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

मंगलवार, अप्रैल 09, 2013

आम आदमी से सीधे जुड़ रही हैं वसुंधरा


राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्रीमती वसुंधरा राजे अपनी सुराज संकल्प यात्रा के दौरान एक ओर जहां कांग्रेस, राज्य सरकार व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर तीखे प्रहार कर रही हैं, वहीं आम लोगों का दिल जीतने के लिए अपना हाई प्रोफाइल रूप त्याग कर लो प्रोफाइल शख्सियत को भी उभार रही हैं। इस यात्रा के दौरान उन्हें देखने, सुनने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ रहा है, जो कि उनके प्रति लोगों में मौजूद क्रेज को उजागर करता है। कदाचित अपने प्रति आम लोगों की चाहत को वे गहराई से समझ रही हैं, और इसी कारण उनसे नजदीकी का कोई भी मौका नहीं चूकना चाहतीं। इसी सिलसिले में वे सारे सुरक्षा इंतजामों को दरकिनार करते हुए आदिवासी महिलाओं से इस प्रकार घुल मिल गईं, मानों वे उनकी सहेलियां हों। इससे भी एक कदम आगे बढ़ कर उन्होंने एक कार्यकर्ता के इस आग्रह को भी स्वीकार कर लिया कि वे उसकी मोटर साइकिल पर बैठें।
हुआ यूं कि डूंगरपुर जिले के बीजामाता मोड़़ से बीजामाता मंदिर तक रथ से जाने का मार्ग नहीं था। जैसे ही श्रीमती राजे रथ से नीचे उतर कर उनकी कार में बैठने लगी तो एक कार्यकर्ता ने कहा मेरी इच्छा है कि मैं अपनी मोटर साईकिल से आपको बीजामाता मंदिर तक ले जाऊं, फिर क्या था, श्रीमती राजे बैठ गई कार्यकर्ता शंकर मीणा की मोटरसाइकिल पर। और पहुंच गई बीजामाता मंदिर। जहां उन्होंने दर्शन और पूजा-अर्चना की। उनकी इस सहजता को देख कर वहां मौजूद लोग अभिभूत हो गए।
ऐसा प्रतीत होता है कि इस बार वे सत्ता में लौटने के लिए कोई कोर कसर बाकी नहीं छोडऩा चाहतीं। स्वाभाविक भी है, यदि ये मौका चूकीं तो उनके राजनीतिक कैरियर पर बे्रक लग जाएगा, कम से कम राजस्थान में, क्योंकि उनकी जिद के आगे झुक कर ही हाईकमान ने उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया है।

मंगलवार, अप्रैल 02, 2013

मोदी की टांग खींची तो भाजपा डूब जाएगी?


gujratहालांकि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का अधिकृत दावेदार घोषित किया जाना बाकी है, या यूं कहें कि फिलहाल प्रबल संभावना मात्र है, मगर ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी को लेकर अभी से पार्टी में घमासान शुरू हो गया है। प्रधानमंत्री पद के अन्य दावेदारों को मोदी का नाम पचाना मुश्किल हो रहा है। इस स्थिति को मोदी के समर्थक भांप रहे हैं। भीलवाड़ा के एक मोदी समर्थक संजीव पाठक ने तो बाकायदा इस आशय की एक पोस्ट फेसबुक पर लगाई भी है, जिसमें आगाह किया गया है कि यदि मोदी की टांग खींची गई तो भाजपा नाम की रह जाएगी।
उनकी इस पोस्ट में एक फोटो भी लगाई गई है, जो यह साबित करती है कि मोदी के समर्थक बाकायदा मोदी को प्रोजेक्ट करने में लगे हुए हैं, जिसका संकेत मैं मोदी विषयक पूर्व आलेख में दे चुका हूं कि मोदी जितने बड़े हैं नहीं, उससे कहीं अधिक मीडिया और सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए प्रोजेक्ट किए जा रहे हैं।
बहरहाल, संजीव पाठक की पोस्ट को यहां हूबहू यहां दिया जा रहा है, जिससे आपको सब कुछ समझ में आ जाएगा:-
संजीव पाठक
संजीव पाठक
अब अन्दर खाते समझ में आने लगा है कि भाजपा के कुछेक वरिष्ठ नेता नरेन्द्र मोदी को पार्टी का नेतृत्व संभलाने से कतरा रहे हैं .पार्टी नेता यह मान बैठे हैं कि देश कांग्रेस की बुराइयों से त्रस्त होकर भाजपा को माला पहना ही देगी ! फिर क्यों न " मैं " ही प्रधानी करूँ ! क्या जरुरत है मोदी की ? 
मेरे भाजपाइयों , कृपया यह कत्तई न भूलें कि देश का मतदाता कांग्रेस से नाखुश है तो खुश आप से भी नहीं है . उत्तराखण्ड और हिमाचल में मिली हार से भी यदि आप अभी भी कुछ नहीं समझे हैं तो फिर तरस आता है आप पर . 
यह तो नरेन्द्र मोदी जैसा निष्ठावान , देशभक्त , खालिस ईमानदार , योग्य प्रशासक , नीतिवान नेता आपकी पार्टी में हैं नहीं तो आप भी कहीं कांग्रेस से कम नहीं है . कर्नाटक , झाड़खंड के उदाहरण आपके लिए नासूर से कम नहीं है . 
यह बात भी भली भांति समझ लें कि जिन राज्यों में आप सत्तासुख भोग रहे हैं वहाँ भी वहीं के नेतृत्व की ही करामात है . आप लोग यदि इतने ही सक्षम हैं तो क्यों उत्तरप्रदेश में हारे ? क्यों नहीं अभी तक पूर्वोत्तर या सुदूर दक्षिण में अपने पैर जमा सके ? यदि ऐसा नहीं तो क्यों नहीं अटलजी की तरह अडवाणीजी भी स्वयं को सन्यासी घोषित करने में देरी कर रहे हैं ? हाँ , इस बात में कोई दो राय नहीं है कि
अटलजी - अडवाणीजी भाजपा के दो कीर्तिस्तंभ हैं किन्तु समयानुसार अपनी भावी पीढी को व्यवस्थापक बना कर स्वयं को संरक्षक बना लेना चाहिए .
एक बार पूर्ण जिम्मेदारी से पुनः ( एक जागरूक मतदाता की हैसियत से ) चेतावनी देना चाहता हूँ कि मोदी जी नीतिज्ञ की राह में कांटे बिछाने का काम न करें वरना भाजपा नाम की ही रह जाएगी....
अब तो आप समझ गए होंगे कि मोदी के समर्थकों अथवा भाजपा के तथाकथित सच्चे हितेषियों के मन में कैसे धुकधुकी है।
-तेजवानी गिरधर

सोमवार, अप्रैल 01, 2013

मीडिया ने ही पैदा की है मोदी की आंधी

इसमें कोई दोराय नहीं कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी वर्तमान में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में सबसे आगे आ चुके हैं, मगर इसमें हकीकत ये है कि यह सब मीडिया का करा धरा है और मोदी के मीडिया मैनेजमेंट का कमाल है। आज भले ही निचले स्तर पर भाजपा के कार्यकर्ता को मोदी में ही पार्टी के तारणहार के दर्शन हो रहे हों, मगर सच ये है कि उन्हें भाजपा नेतृत्व ने जितना प्रोजेक्ट नहीं किया, उससे कहीं गुना अधिक मीडिया ने शोर मचाया है। और जैसा कि हमारे देश में भेड़ चाल चलन है, भाजपा की दूसरी पंक्ति के नेता, छुटभैये और कार्यकर्ता उनके नाम की रट लगाए हुए हैं। उनके विकास का मॉडल भी धरातल पर उतना वास्तविक नहीं है, जितना की मीडिया और सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने खड़ा किया है। इसका बाद में खुलासा भी हुआ। पता लगा कि ट्विटर पर उनकी जितनी फेन्स फॉलोइंग है, उसमें तकरीबन आधे फाल्स हैं। फेसबुक पर ही देख लीजिए। मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताने वाली पोस्ट बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से डाली जाती रही हैं। गौर से देखें तो साफ नजर आता है कि इसके लिए कोई प्रोफेशनल्स बैठाए गए हैं, जिनका कि काम पूरे दिन केवल मोदी को ही प्रोजेक्ट करना है। बाकी कसर भेड़चाल ने पूरी कर दी। हां, इतना जरूर है कि चूंकि भाजपा के पास कोई दमदार चेहरा नहीं है, इस कारण मोदी की थोड़ी सी भी चमक भाजपा कार्यकर्ताओं को कुछ ज्यादा की चमकदार नजर आने लगती है। शाइनिंग इंडिया व लोह पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी का बूम फेल हो जाने के बाद यूं भी भाजपाइयों को किसी नए आइकन की जरूरत थी, जिसे कि मोदी के जरिए पूरा करने की कोशिश की जा रही है।
आपको जानकारी होगी कि मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताने की शुरुआत उनके तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने से पहले की शुरू हो गई थी। मुख्यमंत्री पद पर फिर काबिज होने के लिए मोदी ने मीडिया के जरिए ऐसा मायाजाल फैलाया कि विशेष रूप से गुजरात में उनके पक्ष में एक लहर सी चलने लगी। और जीतने के बाद तो मानो भूचाल ही आ गया। सच तो ये है कि प्रधानमंत्री पद के दावेदारों तक ने कभी अपनी ओर से यह नहीं कहा कि मोदी भी दावेदार हैं। वे कहने भी क्यों लगे। मीडिया ने ही उनके मुंह में जबरन मोदी का नाम ठूंसा। मीडिया ही सवाल खड़े करता था कि क्या मोदी प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं तो भाजपा नेताओं को मजबूरी में यह कहना ही पड़ता था कि हां, वे प्रधानमंत्री पद के योग्य हैं। इक्का-दुक्का को छोड़ कर अधिसंख्य भाजपा नेताओं ने कभी ये नहीं कहा कि मोदी ही प्रधानमंत्री पद के दावेदार हो सकते हैं। वे यही कहते रहे कि भाजपा में मोदी सहित एकाधिक योग्य दावेदार हो सकते हैं। और इसी को मीडिया ने यह कह कर प्रचारित किया कि मोदी प्रबल दावेदार हैं। सीधी सी बात है कि भला कौन यह कहता कि नहीं, वे इस पद के योग्य नहीं हैं अथवा दावेदार नहीं हो सकते। और आज हालत ये है कि चारों ओर मोदी की ही आंधी चल पड़ी है।
मोदी को भाजपा का आइकन बनाने में मीडिया की कितनी बड़ी भूमिका है, इसका अंदाजा आप इसी बात ये लगा सकते हैं कि हाल ही एक टीवी चैनल पर लाइव बहस में एक वरिष्ठ पत्रकार ने मोदी को अपरिहार्य आंधी कह कर इतनी सुंदर और अलंकार युक्त व्याख्या की, जितनी कि पैनल डिस्कशन में मौजूद भाजपा नेता भी नहीं कर पाए। आखिर एंकर को कहना पड़ा कि आपने तो भाजपाइयों को ही पीछ़े छोड़ दिया। इतना शानदार प्रोजेक्शन तो भाजपाई भी नहीं कर पाए।
यह मीडिया की ही देन है कि हाल ही अमरीकी प्रतिनिधिमंडल की मोदी से मुलाकात को इस रूप में स्थापित करने की कोशिश की कि अब अमरीका का रुख मोदी के प्रति सकारात्मक हो गया है। उन्हें अमरीका अपने यहां बुलाने को आतुर है। बाद में पता लगा कि वह प्रतिनिधिमंडल अधिकृत नहीं था और एक टूर प्रोग्राम के तहत उस प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों से राशि वसूली गई थी।
खैर, जहां तक उनके लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने का सवाल है तो वे पहले व्यक्ति नहीं है। और भी उदाहरण हैं। और लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनना यानि प्रधानमंत्री पद का दावेदार हो जाना भी गले उतरने वाली बात नहीं है। इसी प्रकार इस बार जब मोदी को भाजपा संसदीय दल में शामिल किया गया तो मीडिया ने उसे इतना उछाला है, मानो कोई अजूबा हो गया है। संसदीय बोर्ड में तो वे पहले भी रहे हैं।
भाजपा के थिंक टैंक रहे गोविंदाचार्य ने इसको कुछ इस तरीके से कहा है-मोदी 6 साल पहले भी संसदीय बोर्ड में थे और अगर फिर उनको शामिल कर दिया गया है तो इसमें कौन सी बड़ी बात हो गई है। गोविंदाचार्य ने आगे कहा कि मोदी को देश के बारे में कोई ठोस समझ नहीं है, मीडिया प्रबंधन की वजह से कई बार व्यक्ति पद तो पा जाता है, लेकिन काम नहीं कर पाता। अभी मोदी को बहुत कुछ सीखने और समझने की जरूरत है। जरूरी नहीं की जो अच्छा पत्रकार हो वो अच्छा सम्पादक ही हो जाए या अच्छा अध्यापक बहुत अच्छा प्रधानाध्यापक बन जाए, उसी तरह जरूरी नहीं की एक अच्छा मुख्यमंत्री, अच्छा प्रधानमंत्री ही बन जाए।
कुल मिला कर आज हालत ये हो गई है कि मोदी भाजपा नेतृत्व और संघ के लिए अपरिहार्य हो गए हैं। व्यक्ति गौण व विचारधारा अहम के सिद्धांत वाली पार्टी तक में एक व्यक्ति इतना हावी हो गया है, उसके अलावा कोई और दावेदार नजर ही नहीं आता। संघ के दबाव में फिर से हार्ड कोर हिंदूवाद की ओर लौटती भाजपा को भी उनमें अपना भविष्य नजर आने लगा है। यह दीगर बात है कि उनके प्रति आम सहमति बन पाती है या नहीं, उसकी घोषणा करना मीडिया की जिम्मेदारी नहीं, फिर भी वह करने से बाज नहीं आ रहा। सहयोगी दलों की स्वीकार्यता तो अभी दूर की कौड़ी है।
-तेजवानी गिरधर

मंगलवार, मार्च 26, 2013

घनश्याम तिवाड़ी ने बनाई नई राजनीतिक पार्टी

भाजपा के नाराज नेता घनश्याम तिवाड़ी ने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्रीमती वसुंधरा राजे की नादिरशाही और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाब चंद कटारिया की बेबसी से दु:खी हो कर नई राजनीतिक पार्टी बना ली है। इसका नाम उन्होंने राजस्थान देशम रखा है। पार्टी के नाम का ऐलान करने के बाद उन्होंने कहा कि वे पहले देवदर्शन यात्रा करके वसुंधरा के खिलाफ माहौल बनाएंगे, ताकि भाजपा सहित राजस्थान को उनके चंगुल से बचाया जा सके। उनका कहना है कि वसुंधरा की वजह से ही शुचिता वाली पार्टी का हालत खराब हुई है। विभिन्न क्षेत्रों में मिलने वाले जनसमर्थन के आधार पर वे यह तय करेंगे, कहां-कहां से उनकी पार्टी के प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारे जाएंगे। वे इस बात का विशेष ध्यान रखेंगे कि जिन सीटों पर वसुंधरा ने अपने गैर संघी शागिर्दों को मैदान में उतारा है, उनके सामने सशक्त उम्मीदवार उतारे जाएं, ताकि वे पराजित हो जाएं। दूसरी ओर वे संघ पृष्ठभूमि के प्रत्याशियों के सामने कोई प्रत्याशी नहीं उतारेंगे। ऐसे प्रत्याशियों को उनकी पार्टी अंदर से समर्थन करेगी, ताकि ज्यादा से ज्यादा संघी विधायक चुन कर आएं और सरकार बनने पर वसुंधरा का पाटिया गोल किया जा सके। संभव हुआ तो वे खुद वसुंधरा के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरेंगे और जनता को बताएंगे कि जो नेता पूरे चार साल जनता से दूर रह कर लंदन जा कर बैठ गया हो और चुनाव के मौके पर भाजपा व राजस्थान पर कब्जा करना चाहता हो, उसे कत्तई नहीं जीतने देना है। परिणाम आने के बाद उनकी पार्टी राजस्थान देशम भाजपा के संघनिष्ठ नेता को मुख्यमंत्री बनाने के लिए समर्थन देगी। बुरा न मानो होली है।

शुक्रवार, मार्च 15, 2013

आरएसएस के संग क्यों नहीं जुड़ रही युवा पीढ़ी?

MOHAN BHAGVATआगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की ओर से हिंदू आतंकवाद का मुद्दा उठाकर भाजपा को घेरने की आशंका को ध्यान में रखते हुए जयपुर के जामडोली केशव विद्यापीठ में हो रही आरएसएस की प्रतिनिधि सभा में एक ओर जहां विशेष रणनीति बनाई जा रही है, मगर यह तभी कामयाब होगी, जबकि ताजा परिवेश में पल-बढ़ रही युवा पीढ़ी भी उसे आत्मसात करे। मगर यह एक नग्न सत्य है कि पिछले कुछ वर्षों से संघ के प्रति आकर्षण कम होने से संघ की शाखाओं में युवाओं की संख्या कम होने से शिथिलता आती जा रही है, जो कि सांप्रदायिकता के आरोप से कहीं ज्यादा चिंताजनक है।
वस्तुत: संघ के प्रति युवकों के आकर्षण कम होने का सिलसिला हाल ही में शुरू नहीं हुआ है अथवा अचानक कोई कारण नहीं उत्पन्न हुआ है, जो कि आकर्षण कम होने के लिए उत्तरदायी हो। पिछले करीब 15 साल के दरम्यान संघ की शाखाओं में युवाओं की संख्या में गिरावट महसूस की गई है। यह गिरावट इस कारण भी संघ के नीति निर्धारकों को ज्यादा महसूस होती है, क्योंकि जितनी तेजी से जनसंख्या में वृद्धि हुई है, उसी अनुपात में युवा जुड़ नहीं पाया है। भले ही यह सही हो कि जो स्वयंसेवक आज से 10-15 साल पहले अथवा उससे भी पहले जुड़ा, वह टूटा नहीं है, लेकिन नया युवा उतने उत्साह के साथ नहीं जुड़ रहा, जिस प्रकार पहले जुड़ा करता था। इसके अनेक कारण हैं।
मोटे तौर पर देखा जाए तो इसकी मुख्य वजह है टीवी और संचार माध्यमों का विस्तार, जिसकी वजह से पाश्चात्य संस्कृति का हमला बढ़ता ही जा रहा है। यौवन की दहलीज पर पैर रखने वाली हमारी पीढ़ी उसके ग्लैमर से सर्वाधिक प्रभावित है। गांव कस्बे की ओर, कस्बे शहर की तरफ और शहर महानगर की दिशा में बढ़ रहे हैं। सच तो यह है कि भौतिकतावादी और उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण शहरी स्वच्छंदता गांवों में भी प्रवेश करने लगी है। युवा पीढ़ी का खाना-पीना व रहन-सहन तेजी से बदल रहा है। बदलाव की बयार में बह रहे युवाओं को किसी भी दृष्टि से संघ की संस्कृति अपने अनुकूल नहीं नजर आती। संघ के स्वयंसेवकों में आपस का जो लोक व्यवहार है, वह किसी भी युवा को आम जिंदगी में कहीं नजर नहीं आता। व्यवहार तो दूर की बात है, संघ का अकेला डे्रस कोड ही युवकों को दूर किए दे रहा है।
जब से संघ की स्थापना हुई है, तब से लेकर अब तक समय बदलने के साथ डे्रस कोड में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। सच्चाई तो ये है कि चौड़े पांयचे वाली हाफ पैंट ही मजाक की कारक बन गई है। यह कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि अपने आप को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी मानने वालों के प्रति आम लोगों में श्रद्धा की बजाय उपहास का भाव है और वे स्वयंसेवकों को चड्ढा कह कर संबोधित करते हैं। स्वयं सेवकों को भले ही यह सिखाया जाता हो कि वे संघ की डे्रस पहन कर और हाथ में दंड लेकर गर्व के साथ गलियों से गुजरें, लेकिन स्वयं सेवक ही जानता है कि वह हंसी का पात्र बन कर कैसा महसूस करता है। हालत ये है कि संघ के ही सियासी चेहरे भाजपा से जुड़े नेता तक संघ के कार्यक्रम में हाफ पैंट पहन कर जाने में अटपटा महसूस करते हैं, लेकिन अपने नंबर बढ़ाने की गरज से मजबूरी में हाफ पैंट पहनते हैं। हालांकि कुछ वर्ष पहले संघ में ड्रेस कोड में कुछ बदलाव करने पर चर्चा हो चुकी है, लेकिन अभी तक कोर गु्रप ने ऐसा करने का साहस नहीं जुटाया है। उसे डर है कि कहीं ऐसा करने से स्वयंसेवक की पहचान न खो जाए। ऐसा नहीं है कि डे्रस कोड की वजह से दूर होती युवा पीढ़ी की समस्या से केवल संघ ही जूझ रहा है, कांग्रेस का अग्रिम संगठन सेवादल तक परेशान है। वहां भी ड्रेस कोड बदलने पर चर्चा हो चुकी है।
जहां तक संघ पर सांप्रदायिक आरोप होने का सवाल है, उसकी वजह से भी युवा पीढ़ी को संघ में जाने में झिझक महसूस होती है, चूंकि व्यवहार में धर्मनिरपेक्षता का माहौल ज्यादा बन गया है। भले ही भावनाओं के ज्वार में हिंदू-मुस्लिम दंगे होने के कारण ऐसा प्रतीत होता हो कि दोनों संप्रदाय एक दूसरे के विपरीत हैं, लेकिन व्यवहार में हर हिंदू व मुसलमान आपस में प्रेम से घुल-मिल कर ही रहना चाहता है। देश भले ही धार्मिक कट्टरवाद की घटनाओं से पीडि़त हो, मगर आम जनजीवन में कट्टरवाद पूरी तरह अप्रासंगिक है। युवकों को इस बात का भी डर रहता है कि यदि उन पर सांप्रदायिक संगठन से जुड़े होने का आरोप लगा तो उनका कैरियर प्रभावित होगा। आज बढ़ती बेरोजगारी के युग में युवकों को ज्यादा चिंता रोजगार की है, न कि हिंदू राष्ट के लक्ष्य को हासिल करने की और न ही राष्ट्रवाद और राष्ट्र की। असल में राष्ट्रीयता की भावना और जीवन मूल्य जितनी तेजी से गिरे हैं, वह भी एक बड़ा कारण हैं। युवा पीढ़ी को लगता है कि संघ में सिखाए जाने वाले जीवन मूल्य कहने मात्र को तो अच्छे नजर आते हैं, जब कि व्यवहार में भ्रष्टाचार का ही बोलबाला है। सुखी वह नजर आता जो कि शिष्टाचार बन चुके भ्रष्टाचार पर चल रहा है, ईमानदार तो कष्ट ही कष्ट ही झेलता है।
जरा, राजनीति के पहलु को भी देख लें। जब तक संघ के राजनीतिक मुखौटे भाजपा से जुड़े लोगों ने सत्ता नहीं भोगी थी, तब तक उन्हें सत्ता के साथ आने वाले अवगुण छू तक नहीं पाए थे, लेकिन जैसे ही सत्ता का स्वाद चख लिया, उनके चरित्र में ही बदलाव आ गया है। इसकी वजह से संघ व भाजपा में ही दूरियां बनने लगी हैं। संघर्षपूर्ण व यायावर जिंदगी जीने वाले संघ के प्रचारकों को भाजपा के नेताओं से ईष्र्या होती है। हिंदूवादी मानसिकता वाले युवा, जो कि राजनीति में आना चाहते हैं, वे संघ से केवल इस कारण थोड़ी नजदीकी रखते हैं, ताकि उन्हें चुनाव के वक्त टिकट आसानी से मिल जाए। बाकी संघ की संस्कृति से उनका दूर-दूर तक वास्ता नहीं होता। अनेक भाजपा नेता अपना वजूद बनाए रखने के लिए संघ के प्रचारकों की सेवा-चाकरी करते हैं। कुछ भाजपा नेताओं की केवल इसी कारण चलती है, क्योंकि उन पर किसी संघ प्रचारक व महानगर प्रमुख का आशीर्वाद बना हुआ है। प्रचारकों की सेवा-चाकरी का परिणाम ये है कि प्रचारकों में ही भाजपा नेताओं के प्रति मतभेद हो गए हैं। संघ व पार्टी की आर्थिक बेगारियां झेलने वाले भाजपा नेता दिखाने भर को प्रचारक को सम्मान देते हैं, लेकिन टिकट व पद हासिल करते समय अपने योगदान को गिना देते हैं। भीतर ही भीतर यह माहौल संघ के नए-नए स्वयंसेवक को खिन्न कर देता है। जब स्वयं स्वयंसेवक ही कुंठित होगा तो वह और नए युवाओं को संघ में लाने में क्यों रुचि लेगा। ऐसा नहीं है कि संघ के कर्ताधर्ता इन हालात से वाकिफ न हों, मगर समस्या इतनी बढ़ गई है कि अब इससे निजात कठिन ही प्रतीत होता है।
एक और अदृश्य सी समस्या है, महिलाओं की आधी दुनिया से संघ की दूरी। भले ही संघ के अनेक प्रकल्पों से महिलाएं जुड़ी हुई हों, मगर मूल संगठन में उन्हें कोई स्थान नहीं है। इस लिहाज से संघ को यदि पुरुष प्रधान कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। संघ ने महिलाओं की भी शाखाएं गठित करने पर कभी विचार नहीं किया। आज जब कि महिला सशक्तिकरण पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है, महिलाएं हर क्षेत्र में आगे आ रही हैं, संघ का महिलाओं को न जोडऩे की वजह से संघ उतना मजबूत नहीं हो पा रहा, जितना कि होना चाहिए।
बहरहाल, देखना ये है कि देश के बदलते हालात में भगवा आतंकवाद के आरोप से तिलमिलाया संघ शाखाओं के विस्तार व युवा स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ाने के लिए क्या कारगर उपाय करता है।
-गिरधर तेजवानी

रविवार, मार्च 10, 2013

वसुंधरा से ज्यादा अपनों की बेवफाई से दुखी हैं तिवाड़ी

बुरी तरह से रूठे भाजपा नेता घनश्याम तिवाड़ी ने देव दर्शन यात्रा की शुरुआत के दौरान जिस प्रकार नाम लिए बिना अपनी ही पार्टी के कई नेताओं पर निशाना साधा, उससे साफ है कि वे नई प्रदेश अध्यक्ष श्रीमती वसुंधरा राजे से तो पीडि़त हैं ही, वसुंधरा के खिलाफ बिगुल बजाने वालों के साथ छोड़ जाने से भी दुखी हैं।
वसुंधरा का नाम लिए बिना उन पर हमला बोलते हुए जब वे बोले कि राजस्थान को चरागाह समझ रखा है तो उनका इशारा साफ था कि उन जैसे अनेक स्थानीय नेता तो बर्फ में लगे पड़े हैं और बाहर से आर्इं वसुंधरा उनकी छाती पर मूंग दल रही हैं। वसुंधरा और पार्टी हाईकमान की बेरुखी को वे कुछ इन शब्दों में बयान कर गए-लोग कहते हैं कि घनश्यामजी देव दर्शन यात्रा क्यों कर रहे हैं? घनश्यामजी किसके पास जाएं? सबने कानों में रुई भर रखी है। न कोई दिल्ली में सुनता है, न यहां। सारी दुनिया बोलती है उस बात को भी भी नहीं सुनते।
अब तक वसुंधरा राजे खिलाफ मुहिम चलाने वाले साथियों पर निशाना साधते हुए वे बोले कि जिन लोगों ने गंगा जल हाथ में लेकर न्याय के लिए संघर्ष करने की बात कही थी, वे भी छोटे से पद के लिए छोड़ कर चले गए। उनका सीधा-सीधा इशारा वसुंधरा राजे की कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष बने अरुण चतुर्वेदी व औंकार सिंह लखावत और नेता प्रतिपक्ष बने गुलाब चंद कटारिया की ओर था। इसकी पुष्टि उनके इस बयान से होती है कि मेरे पास भी बहुत प्रलोभन आए हैं, पारिवारिक रूप से भी आए हैं, अरे यार क्यों लड़ते हो, आपके बेटे को भी एक टिकट दे देंगे। आप राष्ट्रीय में बन जाओ, उसे प्रदेश में बना दो। हमारी पारिवारिक लड़ाई नहीं है, हजारों कार्यकर्ताओं की लड़ाई है, जो सत्य के लिए लड़ रहे हैं। वे कार्यकर्ताओं की हमदर्दी भुनाने के लिए यह भी बोले कि जो बेईमान, चापलूस, भ्रष्ट हैं वो ऊपर हैं, जो कार्यकर्ता हैं वो नीचे हैं।
खुद को मानते हैं संस्कृति का पोषक
तिवाड़ी ने खुद को और नेताओं से ऊपर बैठाते हुए कहा कि हम विधायक दल की बैठक में बैठे थे, हमें सूचना दी गई कि राज्यपाल विधानसभा में अंग्रेजी में भाषण करेगी, अपने को विरोध नहीं करना है। तब मैंने उसी समय खड़े होकर कहा था, कि 199 एमएलए भी पक्ष लेंगे तो तिवाड़ी हिंदी में भाषण कराएगा। समर्थन करेंगे तो भी तिवाड़ी हिंदी में भाषण की मांग करेगा। हम भाजपा में हैं, भाजपा में रहेंगे लेकिन कोई हिंदी और संस्कृति को समाप्त करने का कोई प्रयास करेगा, वह बर्दाश्त नहीं होगा। तब मैंने कहा था कि जिसको न निज देश का अभिमान है वह नर नहीं निरा पशु समान। अंग्रेजी पढ़ के सब गुण होत प्रवीण, निज भाषा ज्ञान के रहत हीन के हीन। हीन बनकर नहीं रहना चाहते। अर्थात भाजपा में अकेले वे ही बचे हैं, जिन्हें अपनी संस्कृति की पीड़ा है।
कांग्रेस के बराबर ला खड़ा किया
उन्होंने अपने उद्बोधन में भाजपा को कांग्रेस के बराबर ला खड़ा किया। शुचिता और सिद्धांतों की राजनीति करने वाली मौजूदा भाजपा पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि कोई कहे दाल में काला है, मैं तो कहता हूं इस राजनीति में तो पूरी दाल ही काली है। किसी भी पार्टी में जाकर देख लीजिए। जो बेईमान, चापलूस, भ्रष्ट हैं वो ऊपर हैं, जो कार्यकर्ता हैं वो नीचे हैं। जातिवाद का जहर फैलाया जा रहा है। यह सब क्यों किया जा रहा है?
एक पाटी के नेता ने कहा कि आप राजस्थान में कैसे हो, वो बोले एक घर राजस्थान में है, एक हिमाचल में। दोनों पार्टियों में यही स्थिति है। आजकल दोनों पार्टियों के नेताओं से पूछते हैं कि कितनी सीटें आएंगी तो कहते हैं 215 सीटें। 200 तो राजस्थान की है, बाकी प्रांतों से आने वाले 15 तो लाएंगे, यह स्थिति हो रही है राजस्थान की।
तब खुद भी तो चर रहे थे
उनके इस बयान पर खासा चर्चा हो रही है कि देव दर्शन में सबसे पहले जाकर भगवान के यहां अर्जी लगाऊंगा कि हे भगवान, हिंदुस्तान की राजनीति में जितने भी भ्रष्ट नेता हैं उनकी जमानत जब्त करा दे, यह प्रार्थना पत्र दूंगा। भगवान को ही नहीं उनके दर्शन करने आने वाले भक्तों से भी कहूंगा कि राजस्थान को बचाओ। राजस्थान को चारागाह समझ रखा है। सवाल उठता है कि जब वे राजस्थान को चरागाह समझने वालों के साथ चर रहे थे, तब उन्हें यह ख्याल क्यों नहीं आया कि राजस्थान लुटा जा रहा है?
-तेजवानी गिरधर

मंगलवार, मार्च 05, 2013

चतुर्वेदी लायक ही नहीं थे अध्यक्ष पद के

arun chaturvedi 3राजस्थान प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वसुंधरा राजे की कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष का पद स्वीकार कर निवर्तमान अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी ने सभी को चौंकाया है। पार्टी कार्यकर्ताओं व नेताओं को समझ में ही नहीं आ रहा है कि ऐसा उन्होंने कैसे किया? क्या वे हाईकमान की किसी रणनीति का शिकार हुए हैं? क्या वे स्वयं वसुंधरा की टीम के शामिल होना चाहते थे? या वसुंधरा उन्हें अपनी छतरी के नीचे लाना चाहती थीं? अगर उनको टीम में शामिल होने का ऑफर था तो भी उन्होंने उसे स्वीकार करने से पहले सौ बार सोचा क्यों नहीं? क्या उन्हें अपने पूर्व पद की मर्यादा व गौरव का जरा भी भान नहीं रहा? अपनी पहले ही प्रतिष्ठा का जरा भी ख्याल नहीं किया? क्या वे इतने पदलोलुप हैं कि अध्यक्ष के बाद उपाध्यक्ष बनने को उतारू थे? ये सारे सवाल भाजपाइयों के जेहन में रह-रह कर उभर रहे हैं।
स्वाभाविक सी बात है कि जो खुद अभी हाल तक अध्यक्ष पद पर रहा हो, वह भला किसी और की अध्यक्षता वाली कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष पद के लिए राजी होगा तो ये सवाल पैदा होंगे? इससे एक शक और होता है, वो ये कि शायद वे अध्यक्ष पद के लायक थे ही नहीं। गलती से उन्हें अध्यक्ष बना दिया गया, जिसे उन्होंने संघ के दबाव में ढ़ोया। वे थे तो उपाध्यक्ष पद का टैग लगाने योग्य, मगर गलती से पार्टी ने उन पर अध्यक्ष का टैग लगा रखा था। असल में उन्होंने संस्कृत की स्वजाति द्रुतिक्रमा वाली कहानी को चरितार्थ कर लिया, जैसे एक चूहा विभिन्न योनियों के बाद आखिर चूहा पर बन कर ही संतुष्ट हुआ। अध्यक्ष रह चुकने के बाद भी उन्हें उपाध्यक्ष बन कर ही संतुष्टि हुई। और वह भी उसके नीचे, जिसे टक्कर देने के लिए उन्हें खड़ा किए रखा गया। आत्म समर्पण की इससे बड़ी मिसाल कहीं नहीं मिल सकती। धरातल का सच भी ये है कि उन्हें वसुंधरा की जिस दादागिरी को समाप्त करने और उन पर नियंत्रण करने का जिम्मा दिया गया था, उसमें वे कत्तई कामयाब नहीं हो पाए। वे कहने भर को पार्टी के अध्यक्ष थे, मगर प्रदेश में वसुंधरा की ही तूती बोलती रही। वह भी तब जब कि अधिकतर समय वसुंधरा ने जयपुर से बाहर ही बिताया। चाहे दिल्ली रहीं या लंदन में, पार्टी नेताओं का रिमोट वसुंधरा के हाथ में ही रहा। अधिसंख्य विधायक वसुंधरा के कब्जे में ही रहे। यहां तक कि संगठन के पदाधिकारी भी वसुंधरा से खौफ खाते रहे। परिणाम ये हुआ कि वसुंधरा ने जिस विधायक दल के पद से बमुश्किल इस्तीफा दिया, वह एक साल तक खाली ही रहा। आखिरकार अनुनय-विनय करने पर ही फिर से वसुंधरा ने पद ग्रहण करने को राजी हुई। जब-जब वसुंधरा को दबाने की कोशिश की गई, वे बिफर कर इस्तीफों की राजनीति पर उतर आईं, मगर पार्टी हाईकमान उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाया।
कुल मिला कर चतुर्वेदी का उपाध्यक्ष बनना स्वीकार करना पार्टी कार्यकर्ताओं गले नहीं उतर रहा, चतुर्वेदी भले ही संतुष्ट हों।
-तेजवानी गिरधर