तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

शुक्रवार, अप्रैल 25, 2025

सांड लाल कपडा देख कर भडकता क्यों है?

दोस्तो, नमस्कार। आपको यह अनुभव होगा कि जब हम कहीं से गुजर रहे हों और लाल रंग का वस्त्र पहना हुआ व सामने से सांड आ रहा हो तो सलाह दी जाती है कि हम उससे नजर बचा कर चलें। अन्यथा वह हमला कर देगा। असल में यह एक बहुत ही आम धारणा है कि सांड लाल रंग देख कर भड़कता है। लेकिन यह दिलचस्प तथ्य है कि सांड कलर ब्लाइंड होते हैं। वे रंग अंधता से ग्रसित होते हैं। वे लाल और हरे रंग में अंतर नहीं कर पाते। सांड रंगों को इंसानों की तरह नहीं देख सकते। तो सवाल उठता है कि बुल फाइटिंग अर्थात सांड युद्ध में लाल कपडा देख कर वे भडकते क्यों हैं? असल में वे रंग की वजह से नहीं, बल्कि कपडे की हरकत के कारण प्रतिक्रिया देते हैं। सांड स्वाभाविक रूप से हिलती हुई वस्तुओं पर ध्यान देते हैं और उन्हें संभावित खतरे या चुनौती के रूप में देखते हैं। लहराता हुआ कपडा सांड का ध्यान आकर्षित करता है और उसे उत्तेजित करता है। बुल फाइटर जानबूझ कर कपड़े को इस तरह से हिलाता है कि सांड को उकसाया जा सके। जानकार लोग बताते हैं कि सांड स्वभाव से क्षेत्रीय होते हैं और किसी भी चीज को अपने क्षेत्र में घुसपैठ करते हुए देख कर आक्रामक हो सकते हैं। हिलता हुआ कपड़ा उनके क्षेत्र में एक चुनौती की तरह लगता है। सवाल यह भी उठता है कि सांड युद्ध में लाल रंग का ही कपडा क्यों लहराया जाता है, उसकी पक्की वजह का पता नहीं, वह परंरागत है। यह परंपरा क्यों पडी, पता नहीं, मगर समझा जाता है कि लाल रंग बहुत चमकीला होता है, खून का आभास देता है और देखने वालों को उत्तेजित करता है। इसी कारण लाल रंग का कपडा लहराया जाता है। और इसकी कारण यह धारणा बन गई कि लाल रंग से सांड भडकता है।


https://youtu.be/FGWMr_52EaY

गुरुवार, अप्रैल 24, 2025

गणेश चतुर्थी के दिन चांद को देखने पर लगता है झूठा आरोप

हालांकि आज के वैज्ञानिक चुग में जबकि मानव चंद्रमा की धरती पर पहुंच चुका है, ऐसे में इस प्रकार की अवधारणा खारिज सी होती है, मगर जैसा चलन में उसका जिक्र कर रहे हैं

यह एक बेहद रोचक मिथ है कि भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी अर्थात गणेश चतुर्थी के दिन चांद देखने पर आप पर झूठा आरोप लग जाता है। अर्थात जो अपराध आपने किया ही नहीं, वह आप पर मढ़ दिया जाता है। पुराणों के अनुसार ऐसा भगवान श्रीकृष्ण के साथ भी हो चुका है। एक प्रसंग में तो उन पर स्यमंतक मणि की चोरी झूठा आरोप लगा था।

सवाल उठता है कि आखिर गणेश चतुर्थी का चांद देखने पर झूठा आरोप लगता क्यों है? इस बारे में कथा है कि एक बार गणेश जी के लंबे पेट और हाथी के मुख को देख कर चंद्रमा को हंसी आ गई। गणेश जी इससे नाराज को गए और चंद्रमा से कहा कि तुम्हें अपने रूप का अहंकार हो गया है, अतरू अब तुम्हारा क्षय हो जाए। जो भी तुम्हें देखेगा, उसे झूठा कलंक लगेगा। गणेश जी के शाप से चन्द्रमा दुरूखी हो गए। उन्हें दुखी देख कर देवताओं ने राय दी कि गणेश जी की विधिवत पूजा करो। उनके प्रसन्न होने से शाप से मुक्ति मिल सकती है। चंद्रमा ने ऐसा ही किया। इस पर गणेश जी प्रसन्न तो हुए, मगर कहा कि शाप पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकता।ष्द्धड्डठ्ठस्र अपनी गलती चन्द्रमा को हमेशा याद रहे। तब से गणेश चतुर्थी के दिन जो भी चांद देखता है, उसे भगवान गणेश के प्रकोप का सामना करना पड़ता है। यदि भूल से चंद्र दर्शन हो जाये तो उसके निवारण के लिए श्रीमद्भागवत के 10 वें स्कंध के 56-57 वें अध्याय में उल्लेखित स्यमंतक मणि की चोरी कि कथा का श्रवण करना लाभकारक है। जिससे चंद्रमा के दर्शन से होने वाले मिथ्या कलंक का ज्यादा खतरा नहीं होगा।


https://www.youtube.com/watch?v=iaxBOFKtZKo


बुधवार, अप्रैल 23, 2025

क्या एक आत्मा की जगह दूसरी आत्मा को ले जाया जा सकता है?

हाल ही मेरे रिश्तेदारों के साथ एक ऐसा वाकया पेश आया, जिससे सवाल उठता है कि क्या यमदूत एक आत्मा की जगह दूसरी आत्मा को ले जा सकते हैं?

हुआ ये कि मेरे एक रिश्तेदार जयपुर से अहमदाबाद माइग्रेट हो रहे थे। सामान के साथ एक छोटे ट्रक में बैठ कर सफर कर रहे थे। रास्ते में उनकी छोटी बेटी अचानक अस्वस्थ हो गई। लगभग मरणासन्न हालत में आ जाने पर रास्ते में ही एक अस्पताल में भर्ती करवाया। मेरे रिश्तेदार की बुजुर्ग मां ने दुआ मांगी कि भगवान उसको तो उठा ले, लेकिन पोती को ठीक कर दे। अर्थात एक अर्थ में उन्होंने अपनी उम्र पोती को दान कर दी। इसे चमत्कार ही मानेंगे कि चंद घंटों में ही बुजुर्ग महिला की तो मौत हो गई, जबकि वह पूरी तरह स्वस्थ थी और उनकी पोती, जो कि मौत के करीब पहुंच चुकी थी, वह बिलकुल स्वस्थ हो गई।

इससे  सवाल उठता है कि क्या यह महज एक संयोग है यानि कि ऊपर से ऐसा प्रतीत होता है कि बुजुर्ग महिला की दुआ कबूल हो गई, जबकि वास्तविकता ये थी कि बच्ची की जिंदगी अभी बाकी थी और वह केवल बीमार हुई थी और बुजुर्ग की आयु समाप्त हो गई थी। सवाल ये भी है कि क्या दुआ वाकई कबूल हो गई? यानि कि किसी की उम्र किसी और के शरीर में शिफ्ट हो सकती है? अर्थात कोई अपनी सांसें किसी और को दान में दे सकता है। हमारे यहां ऐसा सुनने को मिलता है कि कई लोग अपनी उम्र किसी प्रियजन को लग जाने की दुआ मांगा करते हैं। समझा यही जाता है कि वह औपचारिक दुआ मात्र होती है। उसके फलित होने को सुनिश्चित नहीं माना जाता। वह मात्र प्रियजन के प्रति दुआगो के अनुराग का द्योतक है। लेकिन ताजा घटना, यदि संयोग नहीं है तो इस बात की पुष्टि करती है कि यदि दुआ सच्चे दिल से की जाए तो वह कबूल भी हो सकती है। इसका अर्थ ये भी हुआ कि उस बुजुर्ग महिला की जितनी उम्र बाकी थी, वह पोती में शिफ्ट हो गई तो वह अब उतने ही साल जीवित रहेगी, क्योंकि उसकी सांसें तो समाप्त होने वाली थीं।

आपने कई बार ये सुना होगा कि यमदूत कभी गलती से किसी की आत्मा ले जाते हैं, मगर जैसे ही उन्हें पता लगता है कि त्रुटि हो गई है तो वे वापस शरीर में आत्मा को प्रविष्ट कर देते हैं, अगर उसका अंतिम संस्कार न हुआ हो। ताजा प्रसंग में संभव है ऐसा हुआ हो कि लेने तो वे बुजुर्ग महिला की आत्मा आए हों और गलती से वे बच्ची की आत्मा लेने लगे हों और वह मरणासन्न अवस्था में आ गई हो, लेकिन जैसे ही उन्हें गलती का अहसास हुआ, तुरंत बच्ची को छोड़ कर बुजुर्ग की आत्मा को साथ ले गए हों। 

इस प्रसंग में एक बात ये भी गौर करने योग्य है कि बुजुर्ग महिला तनिक मंदबुद्धि थी। बेहद सहज व भोली-भाली अर्थात एकदम सच्ची इंसान। ऐसा संभव है कि भीतर से पवित्र इंसानों की इच्छा या दुआ शीघ्र मंजूर हो जाती हो।


https://www.youtube.com/watch?v=sqBxY9XZJcI


मंगलवार, अप्रैल 22, 2025

सिंधी समुदाय हर माह चांद उत्सव क्यों मनाता है?

सिंधी समुदाय नव हिंदू वर्श के आरंभ में चैत्र माह की प्रतिपदा यानि चेटीचंड को इस्ट देव झूलेलाल जी की जयंती बडे उत्साह के साथ मनाता है। इसके अतिरिक्त सिंधी समुदाय हर माह की अमावस्या के बाद पहली चांद रात यानि शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा या द्वितीया को चांद उत्सव मनाता है। इसी दिन माह की षुरूआत मानी जाती है। यह उत्सव चंद्र दर्शन से जुड़ा होता है और इसका धार्मिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक महत्व होता है। आराध्य देव झूलेलाल जी को भी इस दिन विशेष पूजा अर्पित की जाती है। वस्तुतः सिंधी संस्कृति में चांद का विशेष महत्व है। सिंध प्रदेश, जो कि अब पाकिस्तान में है, में चांद की पूजा और चंद्र दर्शन को शुभ माना जाता था। यह परंपरा विभाजन के बाद भी भारत व दुनिया भर के सिंधी समुदायों में जीवित है। यह उत्सव एक प्रकार का धन्यवाद होता है। ईश्वर व प्रकृति को एक और माह की शुरुआत के लिए आभार प्रकट करने का तरीका। इस दिन सिंधी परिवार एकत्र होते हैं, चंद्रमा के दर्शन करते हैं, प्रार्थना करते हैं और फिर मिठाई या विशेष व्यंजन बना कर एक-दूसरे को बांटते हैं। सभी छोटे बडों का आषीर्वाद लेते हैं। इससे समाज में भाईचारा बढता है। एक गहरा रहस्य ये है कि चंद्रमा मन, शांति और संतुलन का प्रतीक है। चांद उत्सव में लोग ध्यान, प्रार्थना और सकारात्मक ऊर्जा के लिए चंद्रमा से जुड़ते हैं। 


https://youtu.be/l6bjUToIcGU


शनिवार, अप्रैल 19, 2025

जप करते समय माला को ढ़कते क्यों हैं?

आपने देखा होगा कि अनेक श्रद्धालु जप करते समय हाथ में फेरी जा रही माला को कपड़े अथवा गौमुखी से ढ़क कर रखते हैं। गौमुखी अर्थात गौमुख की आकृति में सिला हुआ कपड़ा, जिसमें माला सहित हाथ डाल कर जप किया जाता है। इसकी वजह क्या है?

वस्तुतः हमारे यहां मान्यता है कि योग व भोग एकांत में अर्थात छिप कर करना चाहिए। किसी की दृष्टि या उपस्थिति का व्यवधान नहीं होना चाहिए। योग के मायने योगाभ्यास व ईश्वर के साथ संबंध स्थापित करना अर्थात पूजा-अर्चना या स्वाध्याय है। असल में योग व प्रार्थना पूर्णतः वैयक्तिक मानी जाती है। उसमें खलल नहीं पडऩा चाहिए। हालांकि योगाभ्यास व प्रार्थना सामूहिक भी की जाती है, मगर उसका वास्तविक लाभ एकांत में करने पर ही मिलता है। वजह ये कि तभी एकाग्रता कायम हो पाती है। कई बार ऐसा संभव नहीं होता। अगर अपने घर पर अथवा सार्वजनिक स्थान पर माला फेरने का समय हो जाए तो बेहतर ये है कि माला को ढ़क कर रखा जाए। यदि आप जप करते समय माला को खुला रखते हैं तो उस पर अन्य लोगों की नजर पड़ती है। उससे दोष उत्पन्न होता है। 

इसी कारण विद्वान कहते हैं कि जप करते समय दाहिने हाथ में फेरी जा रही माला को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए। आपने देखा होगा कि अनेक मुस्लिम भी तस्बीह फेरते समय उसे कपडे से ढक कर रखते हैं।

ऐसा प्रायः देखने में आता है कि कई लोग प्रवचन सुनते समय भी माला फेरते रहते हैं, मगर यह समझ से परे है कि वे प्रवचन व नाम स्मरण या मंत्रोच्चार के बीच कैसे सामंजस्य बैठा पाते होंगे। कभी प्रवचन पर ध्यान जाता होगा तो कभी जप पर। यानि कि दोनों ही अधूरे। किसी से बातचीत करते समय भी माला फेरने से कोई लाभ नहीं हो सकता। और अगर माला के मनकों को ही फेरा जा रहा है तो उसका कोई अर्थ ही नहीं है। 

तभी तो कबीरदास जी कहते हैं-

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,

कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

निहितार्थ यही है कि केवल माला के मनके फेरने से कुछ नहीं होगा, जब तक कि उनके साथ मन का संबंध नहीं होगा।

इसी प्रकार भोग अर्थात भोजन व मैथुन भी एकांत में करने की सीख दी हुई है। आम तौर पर एकांत में भोजन करने की सुविधा नहीं होती, इस कारण नियम में पालना कम ही हो पाती है। आजकल तो डायनिंग टेबल का चलन है, जिसमें परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठ कर भोजन करते हैं, मगर पुरानी मान्यता ये है कि भोजन करते वक्त किसी की दृष्टि नहीं पडऩी चाहिए। एक साथ बैठ कर भोजन करने से स्वाभाविक रूप से आपस में बातचीत भी होती ही है, ऐसे में हम जो भोजन करते हैं, उससे ख्याल हट जाता है। हम उसका पूरा रस नहीं ले पाते। भोजन का वास्तविक आनंद उसका पूरा रस लेने में ही तो है। इसके लिए बेहतर ये है कि हम विभिन्न सांसारिक बातों का चिंतन करने की बजाय केवल भोजन पर ही ध्यान दें। भोजन करते समय बातचीत न की जाए, इस कारण हमारे यहां कहा जाता है कि भोजन के वक्त बात न करें, वरना वह भोजन दुष्टात्माओं को प्राप्त हो जाता है। आपने देखा होगा कि कई दुकानदार मुंह फेर कर भोजन करते हैं। प्रयोजन ये है कि एक तो ग्राहक आए तो उसे ख्याल रहे कि दुकानदार भोजन कर रहा है और वह कुछ देर इंतजार करे, दूसरा ये कि भोजन पर ग्राहक की नजर न पड़े। ऐसा मानते हैं कि भोजन पर किसी की नजर पडऩे पर उसमें दृष्टि दोष हो जाता है। इस दोष का अर्थ ये है कि अगर देखने वाला के मन में भोजन के प्रति क्षुधा का भाव आ जाए तो वह अशुद्ध हो जाता है। कई लोग दुकानों में सजाई मिठाई केवल इसी कारण नहीं खरीदते, क्योंकि उस पर न जाने कितने लोगों की ललचाई नजर पड़ी होगी। हमारे यहां तो यह तक चलन है कि भगवान के भोग लगाते समय या तो थाली को कपड़े से ढ़क कर रखते हैं या पर्दा लगा देते हैं। जब भगवान तक को एकांत में भोजन करवाते हैं तो हमें क्यों नहीं इस नियम की पालना करनी चाहिए। इसके पीछे एक भाव ये है कि मूर्ति के भोजन ग्रहण करने के चमत्कार को देखने की क्षमता हमारे में नहीं है।

https://www.youtube.com/watch?v=x4XwsP3n68s&t=18s


शुक्रवार, अप्रैल 18, 2025

क्या फ्रिज में आटे का लोया रखने पर उसे भूत खाने को आते हैं?

आजकल की व्यस्त जिंदगी में आमतौर पर गृहणियां आटे को गूंथ कर उसका लोया फ्रिज में रख देती हैं, ताकि जब खाने का वक्त हो तो उसे तुरंत निकाल कर गरम रोटी बनाई जा सके। यह आम बात है। इसको लेकर संस्कृति की दुहाई देते हुए सोशल मीडिया में यह जानकारी फैलाई रही है कि यह उचित नहीं है। वो इसलिए कि आटे का लोया पिंड का रूप ले लेता है, जिसे ग्रहण करने के लिए भूत-प्रेत आ जाते हैं और अनेक प्रकार के अनिष्ट कर देते हैं। 

शास्त्रों का हवाला देते हुए कहा जाता है कि आटे के ये पिंड भूतों-प्रेतों को निमंत्रण देते हैं। ये उन अतृप्त आत्माओं को आकर्षित करते हैं, जिनके पिंड दान नहीं किए गए हैं । इस आटे पर उनकी नकारात्मक ऊर्जा का वास हो जाता है। इस आटे को खाने से पूरे परिवार पर इसका असर पड़ता है। प्रसंगवश बता दें कि इस तथ्य को इस बात से जोड़ा जाता है कि हिंदुओं में पूर्वजों एवं मृत आत्माओं को संतुष्ट करने के लिए पिंड दान की विधि बताई गई है। पिंडदान के लिए आटे का लोया, जिसे पिंड कहते हैं, बनाया जाता है। 

इसी संदर्भ में कहा जाता है कि आटे का लोया गोल होता है, वही मृतात्माओं को आमंत्रित करता है। यदि उस पर कुछ अंकित कर दिया जाए तो प्रेतात्माएं उस ओर आकर्षित नहीं होतीं। इस कारण कई महिलाएं आटे का लोया बनाने के बाद उस पर अंगुलियों के निशान अंकित कर देती हैं। यह निशान इस बात का प्रतीक होता है कि रखा हुआ पिंड पूर्वजों के लिए नहीं, बल्कि आम इंसानों के लिए है। जानकारी में ऐसा भी है कि महिलाएं आटा गूंथने के बाद उस पर अगुलियों के निशान बना कर उसमें पानी भर देती हैं। कुछ देर ऐसा करके रख देने से रोटियां मुलायम बनती हैं।

सवाल ये है कि सच क्या है? क्या वाकई भूत-प्रेत की धारणा के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार है? या यूं ही प्रचलित मान्यता? 

जहां तक वैज्ञानिक तथ्य का सवाल है, ऐसा बताया जाता है कि आटा पानी के संपर्क में आने के बाद उसमें कई रासायनिक बदलाव आते हैं। ज्यादा समय तक रखने पर वे नुकसानदायक हो जाते हैं। अगर उसे फ्रिज में रख दिया जाए तो हानिकारक किरणों पर भी प्रभाव पड़ता है। उस आटे से बनी रोटी खाने से कई तरह की बीमारियां होने का खतरा रहता है।

दूसरी ओर जो लोग भूत-प्रेत का अस्तित्व ही नहीं मानते, वे उनके आकर्षित होने को सिरे से नकार देते हैं। जो भूत-प्रेत का अस्तित्व मानते भी हैं, तो उनका मानना है कि आटा गूंथ कर फ्रिज में रखने से भले ही बीमारी का खतरा हो, मगर उसका भूत-प्रेत के आकर्षण से कोई भी सम्बन्ध नहीं है। किसी भी भौतिक वस्तु का सेवन करने के लिए इन्द्रियों की आवश्यकता होती है। बिना इन्द्रियों के भौतिक वस्तुओं का सेवन नहीं किया जाता सकता। मृत्यु के बाद मनुष्य का सूक्ष्म शरीर, जिसे अक्सर भूत-प्रेत समझ लिया जाता है, केवल महसूस कर सकता है, भोग करने के लिए उसे इन्द्रियों की आवश्यकता होती है, जो कि उसके पास नहीं होतीं।

असल में दिक्कत ये है कि आटे के लोये को खाने के लिए भूत-प्रेतों के आने जैसे सवालों का सवाल है, उसका प्रचार करने वाले उसे शास्त्रोक्त तो बता देते हैं, मगर कभी जिक्र नहीं करते कि किस शास्त्र में ऐसा लिखा हुआ है। वे इस बात का भी जिक्र नहीं करते कि अमुक ऋषि ने इतने हजार लोगों पर प्रयोग करके यह तथ्य सिद्ध किया है। इसी कारण ऐसी बातें अंध विश्वास की श्रेणी में गिनी जाती हैं। बावजूद इसके भय के कारण कई उसे मान भी लेते हैं कि मानने में हर्ज ही क्या है? दिलचस्प बात ये है कि पिंड को खाने के लिए मृतात्माओं के आने वाली बात को जानते हुए भी अधिसंख्य महिलाएं व्यस्त जिंदगी में समय को बचाने के लिए अथवा आलस्य के कारण आटे का लोया बना कर फ्रिज में रखती हैं। 

हो सकता है कि भूत-प्रेत वाली बातें सच हों, मगर ऐसी बातें करने वालों को बाकायदा उस शास्त्र का हवाला देना चाहिए, अन्यथा लोग उसे अंध विश्वास ही करार देंगे। उनका मकसद भले ही संस्कृति को बचाना हो, मगर उनके बिना आधार के, केवल शास्त्र शब्द का हवाला देते हुए ऐसी बातें करने से उलटा संस्कृति का नुकसान ही होने वाला है। वे संस्कृति का बचाव नहीं, बल्कि उसका नुकसान कर रहे हैं।


https://www.youtube.com/watch?v=oISPhoRYOL0&t=12s

गुरुवार, अप्रैल 17, 2025

क्या मोक्ष प्राप्त संत की समाधि फल दे सकती है?

हम संत-महात्माओं की समाधियां बनाते हैं। वहां अपना सिर झुकाते हैं। हर साल उन समाधियों पर मेले लगते हैं। उनकी महिमा गाई जाती है। अपनी किसी मनोकामना को लेकर हम भी अरदास करते हैं। बिना किसी स्वार्थ के केवल श्रद्धा भाव से किसी समाधि पर मत्था टेकने वाले भी होंगे, मगर अमूमन किसी इच्छा की पूर्ति के लिए ही लोग समाधि की पूजा करते हैं।

जो महान आत्माएं अच्छे कार्य करके स्वर्ग चली गईं, मैं उनकी बात नहीं करता, वे कदाचित हमारी मनोकामना पूरी करती ही होंगी, चूंकि वे देवताओं की श्रेणी में मानी जा सकती हैं। मैं उनकी बात कर रहा हूं, जिनके बारे में हमारी मान्यता है कि वे मोक्ष को प्राप्त हो गईं। मोक्ष का अर्थ ही है कि संसार से पूर्ण मुक्ति और परम सत्ता में विलीन हो जाना। उसके बाद भौतिक जगत से उनका कोई वास्ता ही नहीं रहता। यानि कि अगर हम ऐसी महान आत्मा की समाधि बनाते हैं तो वह वहां तो मौजूद नहीं हो सकती। उसका कोई अंश भी वहां नहीं है, चूंकि वे तो यहां से छूट कर परम धाम को चली गईं। तो फिर वहां किसी मनोरथ से सिर झुकाने का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता। हां, समाधि स्थल उनकी याद के लिए तो ठीक है, उनके गुणों का स्मरण कर उन्हें आत्मसात करने के लिए उचित है, लेकिन यदि हम अगर ये सोचें कि वह हमारी मनोकामना भी पूरी करेंगी तो यह हमारा भ्रम मात्र है। चूंकि वह वहां है ही नहीं, हमारी बात सुनने के लिए। न ही हमारा उससे कोई कनैक्शन है, चूंकि वह तो मुक्त ही हो चुकी। उसका जगत से संबंध ही विच्छेद हो गया। बुलाएंगे कैसे, सुनने वाला ही नहीं रहा। परम सत्ता में भी उसका अलग से कोई अस्तित्व नहीं है, चूंकि वह तो उसमें विलीन ही हो गई। फिर भी यदि हम समाधि के आगे खड़े हो कर उनका आह्वान करते हैं तो यह न केवल बेवकूफी है, अपितु घोर स्वार्थपरता है। हम कितने मतलबी हैं। उनको मोक्ष मिल गया, इसके प्रति अहोभाव तो है नहीं, उलटे खींच कर इसी जगत में रखना चाहते हैं, ताकि वे हमारे काम आते रहें।

इस सिलसिले में मैने एक महंत से चर्चा की व मेरी शंका का समाधान करने का आग्रह किया तो वे कुछ सोच कर बोले कि मेरी सोच बौद्धिक स्तर पर तर्कपूर्ण ही है। उनका कहना था कि बेशक मोक्ष प्राप्त संत की समाधि इच्छा पूर्ति का स्थल नहीं हो सकता। वह हमारी श्रद्धा का केन्द्र जरूर हो सकता है। वहां मन की शांति भी मिल सकती है। वहां से अच्छे कार्य करने की प्रेरणा भी मिल सकती है। लेकिन अगर हम वहां जा कर इच्छाओं का इजहार करते हैं, तो वह बेमानी है। आम आदमी इस बात को समझ नहीं पाता। वह तो स्वार्थ लेकर ही वहां जाता है। और अगर उसकी मनोकामना पूरी नहीं हुई तो फिर उसे निराशा ही हाथ लगेगी। सिद्धांततः उन महंत के मन्तव्य से मेरी सोच मिलती है, वे मेरे नजरिये पर मुहर लगा रहे हैं, बावजूद इसके यही अंतिम सत्य है, ऐसा कहना इसलिए उचित नहीं क्योंकि हो सकता है कि मेरी समझ से भी परे कोई रहस्य हो, जो मुझे दिखाई न दे रहा हो। अगर आपको इस बारे में कोई जानकारी हो तो जरूर मेरा ज्ञानवर्द्धन कीजिएगा।

https://www.youtube.com/watch?v=C8-3ViWd4Ic