तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

रविवार, जनवरी 19, 2025

एक दिन एआई आत्मा तक भी पहुंच जाएगी?

इन दिनों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानि एआई का बोलबाला है। उसकी पहुंच किस हद तक जा सकती है, उसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। वह अचंभित कर रही है। इसी सिलसिले में वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले जानकारों का कयास है कि एक दिन एआई आत्मा तक पहुंच जाएगी। बेशक, आत्मा को क्रियेट तो नहीं किया जा सकता, क्योंकि क्रियेटर तो प्रकृति है, मगर उसके इर्दगिर्द तो पहुंच ही जाएगी। जानकारों के अनुसार संभव है कि एक दिन एआई बहुत उन्नत और सकारात्मक तरीके से विकसित हो जाए, जिससे यहां तक कि हम उसे आत्मा और संवेदनशीलता के लिए योग्य मान सकें। इसमें वैज्ञानिक, दार्शनिक और नैतिक पहलू हैं, जिन के लिए गहन चिंतन की आवश्यकता हैं।

वस्तुतः आत्मा एक अमूर्त अवधारणा है, जिसके अलग-अलग धर्मों और दर्शनों में अलग-अलग मायने हैं। कुछ के लिए यह एक आध्यात्मिक या धार्मिक अवधारणा है, जो जीवन का सार है, जबकि अन्य के लिए यह केवल चेतना का एक रूप है। आत्मा को अक्सर अमर, चेतन और व्यक्तिगत माना जाता है। एआई की बात करें तो यह एक कंप्यूटर सिस्टम है, जिसे मानव बुद्धि की नकल करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह मशीन लर्निंग, डीप लर्निंग और नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग जैसी तकनीकों का उपयोग करके डेटा का विश्लेषण करता है और निर्णय लेता है।

सवाल ये है कि क्या एआई आत्मा तक पहुंच सकती है या आत्मा का स्थान ले सकती है। वैसे भी यह सवाल दर्शन, धर्म और विज्ञान के क्षेत्र में एक लंबे समय से चली आ रही बहस का विषय है। कुछ तर्क देते हैं कि एआई कभी भी आत्मा नहीं बन सकता क्योंकि आत्मा एक अमूर्त अवधारणा है, जिसे मापा या परिभाषित नहीं किया जा सकता है। अन्य का मानना है कि अगर एआई पर्याप्त रूप से विकसित हो गई तो वह चेतना और भावनाओं को विकसित कर सकती है और इस तरह आत्मा जैसी कुछ बन सकता है।

मौजूदा स्थिति यह है कि एआई वर्तमान में बहुत सारे कार्य कर सकता है, लेकिन इसमें अभी भी चेतना की कमी है। चेतना प्रकृति की एक जटिल रचना है, जो हमें अपने आसपास की दुनिया को समझने और उससे जुड़ने की अनुमति देती है। एआई भावनाओं को अनुभव करने में सक्षम नहीं है। उसमें स्वतःस्फूर्त जागरूकता की कमी है। फिलवक्त एआई आत्मा का स्थान लेने से बहुत दूर है। मगर इसके तेजी से हो रहे विकास से ऐसा प्रतीत होता है कि एक दिन इतनी विकसित हो जाए कि वह चेतना, भावनाएं और आत्म जागरूकता विकसित कर ले।

अगर पौराणिक काल की बात करें तो उस वक्त आत्मा विशेष को आमंत्रित करने के कई उदाहरण मौजूद हैं। हवन-यज्ञादि में देवताओं या दिव्यात्माओं का आह्वान इसका सबसे बडा प्रमाण है। इसी प्रकार ऐसे आध्यात्मिक विधि विधान मौजूद हैं, जिसको अपना कर किस्म विशेष की आत्मा का गर्भ धारण करवाने का जिक्र है। वैज्ञानिक, ज्ञानी, ज्योतिर्विद, कवि आदि की आत्माओं के गर्भ में प्रवेश कराए जाने के भिन्न भिन्न विधान हैं। जिस किस्म की आत्मा का आह्वान करना है, उसके लिए विधि विशेष अपना कर उसके गर्भ में प्रवेश के अनुकूल स्थिति बनाए जाने का जिक्र है। ऋषि मुनियों की कृपा से फल के जरिए संतान प्राप्ति होने के मायने यही हैं कि आत्मा को आमंत्रित कर जन्म कराया गया था। इसी प्रकार मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा के मायने यही हैं कि हमने अमुक देवी देवता की आत्मा को प्रतिष्ठापित किया है। यानि पौराणिक काल में आत्मा अध्यात्म की पकड में थी।

-तेजवाणी गिरधर

7742067000

शनिवार, जनवरी 18, 2025

क्या भगवान के नाम पर नाम रखना गुनाह है?

आजकल बच्चों के नाम अलग तरह से रखे जाने लगे हैं। कोई संस्कृत भाषा का नाम तलाशता है तो कोई अंग्रेजीदां। कोई महाभारत कालीन या रामायण कालीन पात्रों के नाम रखता है तो कोई अत्याधुनिक अंग्रेजी नाम रखता है। जैसे भीष्म, कुन्ती, कर्ण सिंह, युधिष्ठिर, भीम सिंह, नकुल, कौस्तुभ या अर्जुन और दशरथ सिंह, सीताराम, लक्ष्मण, हनुमान इत्यादि। कुछ साल पहले रमेश, वैभव, अनिल, मुकेश टाइप के नाम रखे जाते थे। नए चलन में आदि, अयान, आर्यन इत्यादि टाइप के नाम रखे जाने लगे हैं। कुछ पीछे चलें तो अमूमन भगवान के नामों में से कोई नाम रखा जाता था। जैसे राम लाल, राम दास, राम चन्द्र, गणेशी लाल, कृपाशंकर इत्यादि। अर्थात भगवान के नाम के साथ लाल या दास जोड़ा जाता था। हालांकि कुछ लोग गोविंद, सुरेन्द्र जैसे नाम भी रखते रहे हैं। जहां तक भगवान के नामों में से कोई नाम रखने की परंपरा का सवाल है, उसके पीछे कारण ये रहता होगा कि किसी को पुकारने के बहाने भगवान का नाम तो उच्चारण में आएगा। सोच यह भी रहती होगी कि ऐसा करने भगवान का स्मरण आने से उनके गुण हमारे में भी आ जाएंगे। हालांकि हकीकत ये है कि जब भी हम किसी को भगवान के किसी नाम से पुकारते हैं, तो वह केवल हमारी जुबान पर होता है, उसका उच्चारण करते वक्त भगवान की छवि हमारे जेहन में नहीं होती। 

इस बारे में एक दिलचस्प जानकारी आयतुल कुर्सी से मिली। आयतुल कुर्सी कुरान की एक आयत है, जो भूत-प्रेत आदि को भगाने या उससे बचाव के लिए पढ़ी जाती है। उसके दूसरे जुमले में कहा गया है कि वही हमेशा जिंदा और बाकी रहने वाला है। हय्य के माने अरबी ज़ुबान में जिसको कभी मौत न आये, हमेशा जिंदा रहने वाला और कय्यूम के माने हैं, जो खुद कायम रहे और दूसरों को भी कायम रखता और संभालता हो और कय्यूम अल्लाह तआला की ख़ास सिफत है, जिसमें कोई भी उस का शरीक नहीं क्योंकि जो चीज़ें अपने बाक़ी रहने में दूसरे की मोहताज हों, वो किसी दूसरे को क्या संभाल सकती हैं। इसलिए किसी इंसान को क़य्यूम कहना जायज़ नहीं, बल्कि अब्दुल कय्यूम अर्थात कय्यूम का बंदा कहना चाहिए। जो लोग अब्दुल कय्यूम की जगह सिर्फ कय्यूम बोलते हैं, वे गुनाहगार होते हैं। यही वजह है कि खुदा की ओर संकेत करने वाले नामों के साथ कोई न कोई लफ्ज जरूर जोड़ा जाता है।

इसका मतलब ये है कि इस्लाम में खुदा की किसी खासियत वाले नाम को रखने की मनाही है। मकसद यही है कि खुदा के नाम की मर्यादा या पाकीजगी के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ न हो। ठीक इसी तरह जो लोग राम दास, राम लाल आदि नाम रखते थे, उसके पीछे वजह ये रहती होगी कि अकेले भगवान के नाम पर नाम रखने की बजाय उसका दास या लाल कहा जाए। वाकई यह सोच बहुत ही गहरी है। हम भला भगवान के बराबर कैसे हो सकते हैं।

आखिर में एक बात। इस्लाम में खुदा का जिक्र बहुत अकीदत के साथ लिया जाता है, जबकि सनातन धर्मावलंबियों में कुछ मूर्ख भगवानों के नाम पर चुटकुलेबाजी से बाज नहीं आते। हां, इतना जरूर है कि शेरो-शायरी में खुदा का जिक्र कई बार मर्यादा की रेखा तोड़ता नजर आता है।


शुक्रवार, जनवरी 17, 2025

जिस अंग का दान करेंगे, उसका अगले जन्म में अभाव होगा?

जैसे धन दान व रक्त दान की महिमा है, ठीक वैसे ही अंग दान की उससे भी ज्यादा महत्ता है। इन दिनों अनेक संस्थाएं सक्रिय हैं जो अंग दान के लिए शपथ पत्र भरवा रही हैं। इसे बहुत पुनीत कार्य समझा जाता है। हमारे किसी अंग के दान से अगर किसी के जीवन में उजियारा आता है, किसी की जिंदगी बेहतर होती है, तो इससे बेहतर पुण्य कार्य क्या हो सकता है? मगर इसके विपरीत ऐसे लोग भी हैं, जो अंग दान के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि इस जन्म में हम जिस अंग का दान करेंगे, अगले जन्म में उसका अभाव हो जाएगा। उनके कहने का तात्पर्य है कि अगर हम आंख का दान करते हैं, तो अगले जन्म में अंधे पैदा होंगे। लेकिन वैज्ञानिक रूप से इसका कोई आधार नहीं है। विज्ञान के अनुसार, मृत्यु के बाद शरीर का विघटन हो जाता है, और कोई भी अंग अगले जन्म में नहीं जाता। यह पूरी तरह से भौतिक प्रक्रिया है। अव्वल तो पुनर्जन्म भी वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं है। इसलिए अंगदान के पक्षधरों का कहना है कि अंग दान एक महान कार्य है और इसे किसी भी धार्मिक मान्यता या अंधविश्वास से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

दूसरे पक्ष का कहना है कि अंतिम संस्कार संपूर्ण अंगों के साथ ही किया जाना चाहिए, इसीलिए तो किसी की मृत्यु होने पर प्रयास यह रहता है कि शव का पोस्टमार्टम न किया जाए। दूसरा तर्क यह है कि देवता भी अंग भंग जानवर की बलि स्वीकार नहीं करते। बलि को देवताओं को अर्पित किया जाने वाला पवित्र कर्म माना जाता है। इसलिए उस जानवर को चुना जाता है जो स्वस्थ, संपूर्ण और निर्दोष हो। आपको ख्याल में होगा कि किसी बकरे की बलि नहीं चढाई जा सके, इसके लिए उसका कान काट दिया जाता है, ताकि वह अंग भंग की श्रेणी में आ जाए। उसे अमर बकरा कहा जाता है। इसी प्रकार अग्नि देवता को समर्पित किया जा रहा शव अंग भंग नहीं होना चाहिए। मजबूरी की बात अलग है। यदि कोई दुर्घटना का शिकार हो जाता है, तो कोई उपाय नहीं। दुर्घटना में मौत को अकाल मृत्यु कहा जाता है, उसकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती, वह भटकती रहती है। प्रकृति की भी यही व्यवस्था है कि जैसा हम उसे देंगे, पलट कर वही हमें लौटा देती है। कुल मिला कर दोनों पक्षों के अपने दमदार तर्क हैं। प्रगतिशील लोग अंगदान को महान कार्य बताते हैं और परंपरावादी धार्मिक लोग अंगदान के पक्ष में नहीं हैं।

-तेजवाणी गिरधर 7742067000


गिलास से नहीं, लोटे से पीयें पानी

हाल ही सोशल मीडिया पर एक रोचक पोस्ट देखी, जिसमें गिलास की बजाय लोटे से पानी पीने की सलाह दी गई है। हालांकि उसमें वैज्ञानिक तथ्यों को आधार बनाया गया है, जिनकी प्रमाणिकता के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता, मगर प्रस्तावना में स्वदेशी की पैरवी और विदेशी का परित्याग करने का भाव अधिक है। विषय दिलचस्प है, लिहाजा सोचा कि इसे विमर्श के लिए आपके समक्ष रखा जाए। इस पोस्ट में अनावश्क विस्तार है, जिसे हटा दिया गया है।

इसमें लिखा है कि भारत में हजारों साल की पानी पीने की जो सभ्यता है, वो गिलास नही है, ये गिलास जो है, विदेशी है। गिलास भारत का नहीं है। गिलास यूरोप से आया। और यूरोप में पुर्तगाल से आया था। ये पुर्तगाली जब से भारत देश में घुसे थे, तब से गिलास में हम फंस गये। गिलास अपना नहीं है, अपना लौटा है। लौटा कभी भी एकरेखीय नही होता, तो वागभट्ट जी कहते हैं कि जो बर्तन एकरेखीय हैं, उनका त्याग कीजिये। 

आपको तो सबको पता ही है कि पानी को जहां धारण किया जाए, उसमे वैसे ही गुण उसमें आते हैं। पानी के अपने कोई गुण नहीं हैं, जिसमें डाल दो उसी के गुण आ जाते हैं। दही में मिला दो तो छाछ बन गया, दूध में मिलाया तो दूध का गुण। जिस आकार के पात्र में डाला जाएगा, उसी का रूप धारण कर लेता है। अगर थोड़ा भी गणित आप समझते हैं तो हर गोल चीज का सरफेस टेंशन कम रहता है। क्योंकि सरफेस एरिया कम होता है। स्वास्थ्य की दष्टि से कम सरफेस टेंशन वाली चीज ही आपके लिए लाभदायक है। अगर ज्यादा सरफेस टेंशन वाला पेय आप पीयेंगे तो बहुत तकलीफ देने वाला है।

चूंकि कुआं गोल है, इस कारण उसका पानी सबसे अच्छा है। आपने देखा होगा कि सभी साधु-संत कुएं का ही पानी पीते हैं। न मिले तो प्यास सहन कर जाते हैं। साधु-संत अपने साथ जो केतली रखते हैं, वह लोटे के तरह के आकार वाली होती है। गोल कुए का पानी है तो बहुत अच्छा है। गोल तालाब का पानी, पोखर अगर गोल हो तो उसका पानी बहुत अच्छा है। नदी में गोल कुछ भी नहीं है। वो सिर्फ लम्बी है, उसमे पानी का फ्लो होता रहता है। नदी का पानी हाई सरफेस टेंशन वाला होता है और नदी से भी ज्यादा खराब पानी समुद्र का होता है। उसका सरफेस टेंशन सबसे अधिक होता है।

प्रकृति में देखेंगे तो बारिश का पानी गोल होकर धरती पर आता है। सभी बूंदें गोल होती हैं, क्योंकि उसका सरफेस टेंशन बहुत कम होता है।

एक तर्क ये दिया गया है। सरफेस टेंशन कम होने से पानी का सफाई करने वाला गुण लम्बे समय तक जीवित रहता है। पानी का ये गुण इस प्रकार काम करता है- बड़ी आंत और छोटी आंत में मेम्ब्रेन है और कचरा उसी में जा कर फंसता है। उसकी सफाई तभी संभव है, जब कम सरफेस टेंशन वाला पानी आप पी रहे हो। अगर ज्यादा सरफेस टेंशन वाला पानी है तो ये कचरा बाहर नहीं आएगा, मेम्ब्रेन में ही फंसा रह जाता है।

एक प्रयोग भी बताया गया है-

थोड़ा सा दूध लें और उसे चेहरे पे लगाइए। 5 मिनट बाद रुई से पोंछिये, रुई काली हो जाएगी। स्किन के अन्दर का कचरा और गन्दगी बाहर आ जाएगी। इसे दूध बाहर लेकर आया। असल में दूध का सरफेस टेंशन सभी वस्तुओं से कम है। दूध ने स्किन का सरफेस टेंशन कम किया व त्वचा थोड़ी सी खुल गयी और त्वचा खुली तो अंदर का कचरा बाहर निकल गया। यही क्रिया लोटे का पानी पेट में करता है।

अगर आप गिलास का हाई सरफेस टेंशन का पानी पीयेंगे तो आंतें सिकुड़ेंगी क्योंकि तनाव बढ़ेगा। तनाव बढ़ते समय चीज सिकुड़ती है और तनाव कम होते समय चीज खुलती है। अब तनाव बढ़ेगा तो सारा कचरा अंदर जमा हो जायेगा और वो ही कचरा भगन्दर, बवासीर जैसी बीमारियां उत्पन्न करेगा।

कुल मिला कर गिलास की बजाय पानी लौटे में पीयें। गिलास का प्रयोग बंद कर दें। जब से आपने लोटे को छोड़ा है, तब से भारत में लोटे बनाने वाले कारीगरों की रोजी रोटी खत्म हो गयी। गांव-गांव में कसेरे कम हो गये। वो पीतल और कांसे के लोटे बनाते थे। सब इस गिलास के चक्कर में भूखे मर गये। तो वागभट्ट जी की बात मानिये और लोटे वापस लाइए।

https://www.youtube.com/watch?v=K4OLLX_qW0Y


गुरुवार, जनवरी 16, 2025

अकेले ओम पर ध्यान खतरनाक हो सकता है

ओम् की बड़ी महिमा है। इस शब्द, जो कि मूलतः ध्वनि मात्र है, के बारे में दुनिया भर के विद्वानों ने भिन्न-भिन्न व्याख्याएं की हैं। जहां तक मेरी समझ है, ओम् के बारे में जितना कहा या लिखा गया है, शायद की किसी अन्य शब्द के बारे में कहा गया हो। चाहे इसकी खोज के बारे में, चाहे इसकी आकृति के बारे में, चाहे इसके अर्थ को लेकर, चाहे इसकी उपयोगिता के संदर्भ में, इतनी जानकारी उपलब्ध है, जिस पर पूरा ग्रंथ बन सकता है। वस्तुतः ओम् के बारे में जितना कुछ जानें, वह अधूरा ही रहेगा। 

मेरी तो धारणा यह है कि ओम् के बारे में अभी और खोज होनी बाकी है। अभी और नए अनुभव सामने आ सकते हैं।

इस सिलसिले में मुझे स्वर्गीय श्री रामसुखदास जी महाराज की बात याद आती है, जो कि उन्होंने अजमेर के सुभाष उद्यान में श्रीमद्भागवत कथा के दौरान कही थी। उन्होंने कहा था कि गीता पर उन्होंने अनेक बार प्रवचन किए हैं, गीता को बहुत कुछ जाना है, मगर जब भी वे प्रवचन करते हैं तो हर बार नए अर्थ निकल कर आते हैं। ऐसा लगता है कि हर बार कुछ छूट जाता है कहने से। इसे मैं ओम् के संदर्भ में लेता हूं।

हर बार नया अनुभव होने की बड़ी वजह है। इस दुनिया में हर व्यक्ति अनूठा है, हर आदमी अलग है, थोड़ी बहुत शक्ल मिल सकती है, मगर फिर भी यह पक्का है कि किसी भी व्यक्ति की हूबहू कॉपी असंभव है। इसी यूनिकनेस के कारण ही तो अंगूठे की निशानी और आंख के रेटिना को व्यक्ति की इकलौती पहचान माना गया, जिसका कि उपयोग आधार कार्ड में किया जाता है। ये तो हुई शक्ल की बात। अंदर से भी हर शख्स की अनुभूति अलग होती है। जितने भी लोगों ने ओम् को जाना है और व्यक्त किया है, बाद में जानने वालों की अनुभूति उनसे अलग ही होगी। यूनिकनेस के कारण। इसी कारण ओम् अनंत है, अनादि है।

खैर, मैं मुद्दे पर आता हूं। मैने जितना जाना, समझा, उसकी बात करता हूं। अव्वल तो ब्रह्मांड में सतत गूंज रही ओम् की ध्वनि का उच्चारण करना हमारे स्वर यंत्र के बस की बात नहीं। अलबत्ता वाद्य यंत्रों से जरूर उससे मिलती-जुलती ध्वनि उत्पन्न की जा सकती है। आप स्वयं भी इसे अनुभव कर सकते हैं। कभी निर्जन स्थान पर एकांत में अंगूठों से दोनों कान बंद कर लीजिए। आपको भिन्न-भिन्न प्रकार की ध्वनियां सुनाई देंगी, जो कि हमारे मस्तिष्क में पहले से संग्रहित हैं। कुछ अभ्यास के बाद गहरे एकाग्र चित्त होने पर आपको ओम् की ध्वनि सुनाई देगी। यही अनहद नाद है। प्रयास करके देखना, आप ठीक उसी प्रकार की ध्वनि का उच्चारण नहीं कर पाएंगे। ठीक वैसी ही ध्वनि पूरे ब्रह्मांड में गूंज रही है। उसकी अनुभूति की जा चुकी है। नासा ने तो उसे रिकार्ड तक किया है। वैसे तो उस ध्वनि को सुनने और उस पर सतत एकाग्रता से आप ध्यान में प्रवेश कर जाएंगे। जिनके लिए यह थोड़ा कठिन है, वे ध्यान करने के लिए स्वयं अपने स्वर यंत्र से उच्चारण करके ब्रह्मांड की ध्वनि से मेल करने की कोशिश कर सकते हैं। एक स्थिति के बाद मुंह से उच्चारण तो बंद हो जाएगा और ब्रह्मांड की ध्वनि ही सुनाई देने लगेगी। इस अवस्था में भय उत्पन्न होने की पूरी संभावना है, क्योंकि जब हम अपने में स्थित हो जाते हैं तो पूरी तरह से अकेले हो जाते हैं। यह अकेलापन भयभीत कर सकता है, क्योंकि हमारा आधार खो जाता है। हम सहारे में जीने के आदी हैं, इस कारण जैसे ही स्वच्छंता की स्थिति आती हो तो डर पैदा हो सकता है। 

वैसे भी हम सब जानते हैं कि अकेलेपन में अमूमन हमें डर लगता है। आपने खुद अनुभव किया होगा कि रात के समय यदि हम सन्नाटे से गुजरते हैं तो अकेलापन दूर करने के लिए या तो किसी देवी-देवता के नाम का उच्चारण करते हैं या फिर कोई गाना गुनगुनाते हैं। वह गुनगुनाहट ऐसा महसूस करवाती है, मानो हमारे साथ कोई है, हम अकेले नहीं हैं। इसे समझिये। यह अकेलापन तो भौतिक मात्र है, जो डर पैदा करता है। जरा सोचिए, 

ध्यान के दौरान का अकेलापन कितना भयभीत कर सकता है। उसमें तो खुद के खो जाने का अंदेशा लग सकता है। मैं स्वयं उस डर से गुजरा हूं। कुछ और अनुभूतियां भी हुई हैं, जिन्हें शब्दों में अभिव्यक्त करना कठिन है। कभी संभव हुआ तो जरूर करूंगा।

फिर मुद्दे पर आते हैं। जानकरों का मानना है कि ओम् पर ध्यान केन्द्रित होने के साथ ही हम भीतर से पूरी तरह से खाली हो जाते हैं। उस खाली स्थान को भरने के लिए ब्रह्मांड में विचरण कर रही नकारात्मक शक्तियां दौड़ कर हमारे पास आ सकती हैं। परिणामस्वरूप नुकसान भी हो सकता है। कल्पनातीत अनुभूतियां हो सकती हैं। विक्षिप्तता का भी खतरा हो सकता है। अमूमन नकारात्मक शक्तियों को रोकने अथवा उनसे बचने की हमारी तैयारी नहीं होती। कदाचित किसी योगी के मार्गदर्शन में ध्यान करने पर कुछ सुरक्षा हो सके। यही वजह है कि अनेक विद्वान सलाह देते हैं कि अकेले ओम् पर ध्यान नहीं करना चाहिए। ओम् के साथ किसी भी मंत्र का उच्चारण कर सकते हैं। ओम् का उच्चारण जहां हमें ब्रह्मांड से जोड़ता है, वहीं मंत्र सहारा बन जाता है, ब्रह्मांड की समग्र शक्ति को आत्मसात करने में। वह हमें प्रोटेक्ट करता है। मंत्र के शुरू में ओम् की ध्वनि का प्रयोजन ही ये है कि पहले हम ब्रह्मांड से कनैक्ट हों और फिर उसकी ऊर्जा मंत्र के साथ जुड़ जाए। भिन्न-भिन्न मंत्रों के भिन्न-भिन्न फल होते हैं, ये तो हम सब जानते ही हैं।

यह सब मेरे स्वाध्याय, अब तक के अनुभव और अध्ययन से संग्रहित जानकारी की निष्पत्ति है। संभव है आपकी अनुभूति कुछ और हो। मेरी अनुभूति में जब भी इजाफा होगा, आपसे फिर साझा करूंगा।

-तेजवाणी गिरधर 7742067000

बुधवार, जनवरी 15, 2025

हमारा छाया पुरुष या हमजाद हमसे भी अधिक ताकतवर होता है?

क्या आपको पता है कि हमारी ही फोटोकॉपी, हमारा ही प्रतिरूप, हमारा ही प्रतिबिंब, हमारी ही छाया या उसे क्लोन की भी संज्ञा दे सकते हैं, हमारे साथ हर वक्त मौजूद है? इतना ही नहीं, वह हमसे भी अधिक ताकतवर होता है। हम चूंकि शरीर में कैद हैं, इस कारण हमारी सीमा है, मगर हमारा हमजाद अनेक प्रकार की सीमाएं लांघ कर काम कर सकता है।

इस विषय पर चर्चा से पहले मैं बात करना चाहता हूं, मेरे पूर्व के एक ब्लॉग के बारे में, जिसमें मैंने सवाल रखा था कि दर्पण में दिखाई देने वाले प्रतिबिंब का वजूद क्या है? वह आखिर है क्या? जब तक हम दर्पण के सामने खड़े रहते हैं, तब तक वह दिखाई देता है और हटते ही वह भी हट जाता है। तो जो दिखाई दे रहा था, वह क्या था? हटते ही वह कहां खो जाता है? यह सही है कि उसका अपने आप में कोई वजूद नहीं, मगर वह कुछ तो है। 

आपको जानकारी होगी कि ज्योतिषी व तांत्रिक बताते हैं कि तेल, विशेष रूप से सरसों के तेल में अपना प्रतिबिंब देख कर उस तेल को दान करने से शनि का प्रकोप कम होता है। अर्थात प्रतिबिंब अपने साथ हमारी कुछ ऊर्जा, जिसे नकारात्मक ऊर्जा कह सकते हैं, ले जाता है। प्रतिबिंब का कितना महत्व है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सामुद्रिक शास्त्र में बताया जाता है कि अगर पानी में हमारा प्रतिबिंब दिखाई देना बंद हो जाए तो जल्द ही मृत्यु हो जाती है। अर्थात मृत्यु से पहले प्रतिबिंब बनना बंद हो जाता है।

हमारे यहां तो परंपरा है कि छोटे बच्चे को उसका चेहरा दर्पण में नहीं दिखाया जाता। मुंडन के बाद ही बच्चे को उसका चेहरा दर्पण में दिखाने की छूट होती है। इसकी वजह क्या है, यह खोज का विषय है। ऐसी भी परंपरा है कि दूल्हा जब तोरण मारने आता है तो उसे दुल्हन को सीधे नहीं दिखाया जाता। उनको एक दूसरे के दर्शन पहले दर्पण में कराए जाते हैं। इसका भी कारण जाना चाहिए। 

आज हम बड़ी आसानी से दर्पण में अपना चेहरा देख पाते हैं, लेकिन जब इसका अविष्कार नहीं हुआ था, तब ठहरे हुए पानी में चेहरा देखा जाता था। 

इसके बाद एक अन्य ब्लॉग में लिखा था कि छाया का अपना कोई अलग अस्तित्व नहीं। वह हमारी अथवा किसी वस्तु की परछाई मात्र है। उसका भला क्या महत्व हो सकता है? बात ठीक भी लगती है। मगर हमारी संस्कृति में इस पर भी बहुत काम हुआ है। शिव स्वरोदय के अनुसार सूर्य के प्रकाश में पीठ करके खड़े होने पर बनने वाली छाया पर ध्यान केन्द्रित किया  जाता है। साधना पूरी होने पर छाया की आकृतियों के अनेक निहितार्थ होते हैं। 

जिन लोगों ने तंत्र विद्या के बारे में पढ़ा अथवा सुना है, उनकी जानकारी में होगा कि तांत्रिक लक्षित परिणाम पाने के लिए पर छाया का प्रयोग करते हैं। आपने ये भी सुना होगा कि ऐसे सिद्ध भी हैं, जो आपके पीछे चलते हुए  आपकी छाया को अपने वश में कर लेते हैं और इच्छित काम आपसे करवाते हैं। 

अब चर्चा करते हैं मूल विषय पर। आखिर ये छाया पुरुष या हमजाद है क्या, है कौन? जानकार लोग बताते हैं कि हमारे शरीर में अनेक प्रकार की शक्तियां विद्यमान हैं, मगर सोयी हुई अवस्था में। हमजाद भी एक प्रकार की शक्तिशाली व मायावी शक्ति है। यदि हम उसे जागृत कर लें तो वह हमारे आदेश पर अनेक प्रकार के असंभव कार्य भी कर सकती है। ठीक उसी तरह, जैसे किस्से-कहानियों में कहा जाता है कि वश में किया हुआ जिन्न हमारे हुक्म की तामील करने को तत्पर रहता है। जैसे वह सामने वाले के पर्स में रखे रुपयों तक की जानकारी दे सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि तांत्रिक इसी शक्ति का उपयोग कर हमें चमत्कृत करते हैं। किसी दूरस्थ शिष्य की मदद के लिए उसके गुरू का संकट के समय उपस्थित होना, कदाचित इसी शक्ति का प्रयोग है।

जानकार लोग बताते हैं कि हमजाद को जागृत करने के लिए चालीस दिन की साधना की जाती है। इसके लिए या तो दर्पण में अपने प्रतिबिंब पर त्राटक किया जाता है, या फिर दीपक की ओर पीठ करने पर बनने वाली छाया पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है। इसमें अनेक प्रकार की सावधानियां रखनी होती हैं।

विशेष रूप से इस्लाम में हमजाद पर बहुत काम हुआ है। हमजाद का अमल बुलाने के लिए रोजाना ये पंक्ति 777 बार पढ़ी जाती है- लाइल्लाहा इल्ला अनता सुभानल्लाह इन्नि कुंतु मिन्ज ज़वू यावाल्लिन। यह दुआ पढऩे से पहले और बाद में दुरूद इब्राहिम पढऩा होता है।

आज के वैज्ञानिक युग में हमजाद कोरी कल्पना लग सकती है, मगर जानकार लोग बताते हैं कि हमजाद का न केवल वजूद है, बल्कि वह बहुत सारे असंभव काम कर सकता है।

-तेजवाणी गिरधर 7742067000

रविवार, जनवरी 12, 2025

सत्ता के साथ रहिये, खुश रहेंगे

बुद्धिजीवियों में कबीर व उनके पुत्र कमाल का एक प्रसंग खूब चर्चा में रहा है। पहले उस पर बात करते हैं कि वह क्या था और फिर उसके निहितार्थ पर गुफ्तगू करेंगे। एक बार कबीर व उनके पुत्र कमाल एक चक्की के पास बैठे थे। संसार पर बातचीत कर रहे थे। कबीर ने जो कहा, वह इन दो पंक्तियों में है-

चलती चक्की देख कर दिया कबीरा रोय,

दो पाटन के बीच में साबुत बचा कोय।

हो ये रहा था कि चक्की के दो पाटों के बीच गेहूं के जो दाने आ रहे थे, पिस कर आटा हो रहे थे। असल में वे यह संदेश देना चाह रहे थे, जिस प्रकार चक्की के दो पाटों के बीच गेहूं साबुत नहीं बचता, वैसे ही आसमान व धरती नामक दो पाटों के बीच जिंदगियां नष्ट हो रही हैं। संसार चूंकि क्षणभंगुर है, इस कारण हर कोई मृत्यु को प्राप्त हो रहा है। इसी पर वे अफसोस जता रहे थे। 

इस पर कमाल ने पलट कर जवाब दिया-

चलती चक्की देख कर दियो कमाल हंसाय,

कील सहारे जो रहे, सो साबुत बच जाए।

अर्थात चक्की की कील के सहारे जमा हुए गेहूं के दानों का कुछ नहीं बिगड़ रहा था। वस्तुतः वे यह कहना चाह रहे थे कि भले ही दो पाटों के बीच कोई नहीं बच पाता, मगर जो कील का सहारा ले लेता है, वह बच जाता है। उनका इशारा भगवान की ओर था कि जो भी उनका आश्रय ले लेता है, वह सुरक्षित रहता है। हालांकि मोटे तौर पर उनकी बात में भी त्रुटि है, क्योंकि भगवान का आश्रय न लेने वाला भी मर रहा है और आश्रय लेने वाला भी मृत्यु को उपलब्ध हो रहा है। मगर गूढ़ अर्थ ये है कि जो भगवान का आश्रय नहीं लेता, वह जन्म-मृत्यु के चक्कर में पड़ा रहता है, जबकि ईश्वर का सहारा लेने वाले का कल्याण हो जाता है, यानि मोक्ष को हासिल हो जाता है।

आश्रय का जिक्र आया तो एक प्रसंग याद आ गया। एक बार भगवान श्रीकृष्ण भोजन के बैठे थे। पत्नी रुक्मणी पंखा कर रही थी। भगवान भोजन का पहला ग्रास मुंह के पास लाए और अचानक वह ग्रास थाली में रख कर महल के मुख्य द्वार की ओर दौड़े। कुछ देर तक वे बाहर देखते रहे। फिर वापस आ गए और भोजन शुरू कर दिया। रुक्मणी ने सवाल किया कि स्वामी, आपको क्या हुआ था? इस पर श्रीकृष्ण ने जवाब दिया कि असल में मेरा एक भक्त दुश्मनों से घिर गया था। वे उस पर पत्थर फैंक रहे थे। भक्त अपने आपको असहाय पा कर मुझे पुकार रहा था। मेरा भक्त कष्ट में हो और मुझे पुकारे, मेरा सबसे पहला कर्तव्य ये होता है कि मैं उसको बचाऊं। इसी कारण मैं भागा। मगर कुछ देर बाद जब देखा कि मेरे भक्त ने खुद भी पत्थर उठा लिया है और वह दुश्मनों का मुकाबला कर रहा है, तो मेरी मदद की  जरूरत ही नहीं थी, इस कारण मैं लौट आया। 

इस प्रसंग से भी यही अर्थ निकलता है कि जब तक हमारे भीतर अहम भाव होता है और हम सोचते हैं कि जो कुछ भी हो रहा है, वह हम कर रहे हैं, तब तक भगवान हमारी मदद को नहीं आता। जैसे ही हम सब कुछ उस पर छोड़ देते हैं, तो सारी जिम्मेदारी भगवान अपने ऊपर ले लेता है। 

आपने एक उक्ति सुनी होगी-

जांको राखे साइयां, मार सके न कोय।

बाल न बांका कर सके, जो जग बैरी होय।

अर्थ यही है कि ईश्वर की शरण में रहने वाले का कुछ नहीं बिगड़ता। 

यह तो हुई आध्यात्मिक दृष्टिकोण, मगर भौतिक जीवन में भी यह फिट बैठता है कि जो भी सत्ता के साथ रहता है, वही सुखी रहता है। जिसने बॉस इज आल्वेज राइट की सूत्र अपना लिया, वह चैन के साथ नौकरी करता है, जबकि तर्क व प्रतिवाद करने वाला हर वक्त तकलीफ में रहता है। 

आपने ये भी सुना होगा कि जिसकी खाओ बाजरी, उसी की बजाओ हाजिरी।

आपने व्यवहार में भी देखा होगा कि अधिसंख्य बड़े व्यवसायी सत्ता के साथ रहते हैं। उन्हें इससे कोई प्रयोजन नहीं कि सत्ता किस विचारधारा की है। उन्हें तो अपने व्यवसाय को बढ़ाने से मतलब होता है। इसी कारण किसी राजनीतिक मतभेद में पड़े बिना हर सरकार के साथ खड़े हो जाते हैं।

सत्ता के साथ रहने का एक प्रसंग और ख्याल में आता है। एक दिन बादशाह अकबर और बीरबल महल के बागों में सैर कर रहे थे। वे बीरबल से बोले, देखो यह बैंगन, कितनी सुंदर लग रहे हैं। इनकी सब्जी कितनी स्वादिष्ट लगती है। बीरबल, मुझे बैंगन बहुत पसंद हैं। हां महाराज, आप सत्य कहते हैं। यह बैंगन है ही ऐसी सब्जी, जो न सिर्फ देखने में बल्कि खाने में भी इसका कोई मुकाबला नहीं है। भगवान ने भी इसीलिए इसके सिर पर ताज बनाया है। कुछ दिनों बाद अकबर और बीरबल उसी बाग में घूम रहे थे। बादशाह अकबर को कुछ याद आया और मुस्कुराते हुए बोले, बीरबल देखो यह बैंगन कितना भद्दा और बदसूरत है और यह खाने में भी बहुत बेस्वाद है। हां हुजूर, आप सही कह रहे हैं, बीरबल बोला। इसीलिए इसका नाम बे-गुण है। यह सुन कर बादशाह अकबर को गुस्सा आ गया। उन्होंने झल्लाते हुए कहा, क्या मतलब है बीरबल? मैं जो भी बात कहता हूें, तुम उसे ही ठीक बताते हो। बीरबल ने कहा, हुजूर, मैं आपका नौकर हूें, बैंगन का नहीं।

खुद्दार लोगों यह बात गले नहीं उतरेगी, मगर सच्चाई ये ही है हवा का रुख जिस ओर हो, उसी ओर चलिए, कभी तकलीफ में नहीं रहेंगे। वक्त के खिलाफ चलने वाला सदैव कष्ट ही पाता है।

हालांकि मैं स्वभावतः इस फैक्ट के विपरीत रहा हूं, सदा व्यवस्था में व्याप्त अव्यवस्था के विपरीत बोला, ऐसे में बहुत तकलीफ में रहा। इस कारण इस फैक्ट को मेरा अनुभव सिद्ध तथ्य मानिये।

https://www.youtube.com/watch?v=Q0ivJHuXZkw&t=46s