तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

बुधवार, मार्च 21, 2012

ममता की दीदीगिरी से उठे क्षेत्रीय दलों के वजूद पर सवाल


हाल ही रेल बजट पेश करने के बाद उस पर बहस से पहले ही रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी को इस्तीफा देने पर मजबूर करने वाली ममता की दीदीगिरी लोकतंत्र में एक काले अध्याय के रूप में अंकित हो गया है। साथ ही इसने एक बड़ी बहस को जन्म दिया है कि देशभर में छोटे-छोटे उद्देश्यों के गठित छोटे-छोटे दलों के कुकुरमुत्तों की तरह उग आने के बाद हो रही लोकतांत्रिक दादागिरी का अंत कैसे हो पाएगा?
ऐसा नहीं है कि गठबंधन सरकार की मजबूरी को केवल मौजूदा मनमोहन सिंह की सरकार ने भोगा हो। पूर्व में अटल बिहारी वाजपेयी भी लगभग ऐसी ही मजबूर सरकार चला चुके हैं। तब वे भी आए दिन ममता बनर्जी, मायावती व जयललिता की दादागिरी के आगे झुक जाने को मजबूर हुए थे। बस फर्क इतना है कि मनमोहन सिंह सरकार कुछ ज्यादा की रेखांकित हो गई। उसमें भी ताजा प्रकरण ने पुख्ता तौर पर साबित कर दिया है छोटे अथवा क्षेत्रीय उद्देश्यों के लिए गठित दल किस प्रकार देश की सरकार की दिशा और दशा तय करने की भूमिका में आ गए हैं। उत्तर प्रदेश का चुनाव भी इसी की मिसाल है। वहां दो राष्ट्रीय दलों कांग्रेस व भाजपा को नकार कर जनता ने जातीय व क्षेत्रीय उद्देश्यों की खातिर एक क्षेत्रीय दल को नकार कर दूसरे क्षेत्रीय दल को चुन लिया, जिसे कि वह पहले गुंडाराज के कारण नकार चुकी थी। और अफसोसनाक बात ये है कि इन्हीं दो क्षेत्रीय दलों की बैसाखियों पर केन्द्र की सरकार चल रही है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की यह कैसी विडंबना है।
हम आज भले ही गठबंधन सरकारों की मजबूरियों को समझने के आदी हो गए हैं, मगर क्या यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि देश का रेल मंत्री कौन होगा, यह देश का प्रधानमंत्री नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की तानाशाह तय करती है। यह केवल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए शर्मनाक नहीं, बल्कि हम सबके लिए भी है। और अफसोस कि इसके बाद भी यदि हम अपने देश को सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कह कर गौरवान्वित महसूस करते हैं। यह छद्म लोकतंत्र है। एक किस्म की तानाशाही ही है। इसे तानाशाही कहना इसलिए अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं कहेंगे क्योंकि ममता ने रेल बजट में संशोधन करवाने की लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाने की बजाय उस रेल मंत्री को ही हटवा दिया, जिन्हें कि अब बहस में जवाब देने का मौका नहीं ही मिलेगा, जब कि बजट उन्होंने ही पेश किया है। त्रिया हठ देखिए कि उन्हें लोकतांत्रिक मर्यादाओं को कूड़े में डाल कर अपनी जिद पूरा करना ही ज्यादा जरूरी लगा। त्रिवेदी भले ही यह कह कर अपनी शाब्दिक जीत मान रहे हों कि देश का रेल बजट कोलकाता से नहीं बनता है, मगर कोलकाता ने साबित कर दिया कि रेल बजट क्या, देश की सरकार ही कोलकाता के इशारे पर चलती है।
तस्वीर कर दूसरा रुख ये है कि ममता भले ही अपनी जिद पूरी करवाने में कामयाब हो गई हों, मगर इससे यकीनन उनकी छवि खराब हुई है। कैसा विचित्र खेल हुआ कि आम आदमी सबसे बड़ी पैराकार ममता के विरोध और त्रिवेदी के इस्तीफे के बाद भी आम जनता में यह संदेश चला गया कि त्रिवेदी ने जो कुछ किया, देश हित के लिए किया, जबकि ममता ने जो कुछ किया, मनमानी की खातिर किया। इससे बड़ी बात क्या होगी कि रेलवे कर्मचारी तक ममता के खिलाफ खड़े हो गए। एक अर्थ में त्रिवेदी की यह शहादत उनके कद को और ऊंचा कर गई। आज उनके प्रति सहानुभूति को साफ तौर देखा जा सकता है, जब कि ममता जैसों को सबक सिखाने के लिए क्षेत्रीय दलों की भूमिका पर बड़ी बहस छिड़ चुकी है।
इस मौके पर कुछ राजनीतिज्ञ यह कह कर मनमोहन सिंह को ज्ञान पिला रहे हैं कि उन्हें इस मौके पर तो गठबंधन धर्म की जगह राजधर्म निभाना चाहिए था, चाहे ममता समर्थन वापस ले लेतीं। सरकार तो मुलायम सिंह की सपा को शामिल करके भी बचाई जा सकती थी। मगर उसका क्या जब सपा भी बाद में उसी तरह दादागिरी करती। फर्क क्या है? ये तो मनमोहन या कांग्रेस ही बेहतर जानते हैं कि सपा को सरकार में शामिल करने के लिए उन्हें अपनी आत्मा पर कितने पत्थर और रखने पड़ते।
लब्बोलुआब मनमोहन सिंह की अनेक मजबूरियों को देख चुके देश के सामने अब यक्ष सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या अब भी हम इसी प्रकार क्षेत्रीय दलों के हाथों की कठपुतली बने रहना चाहते हैं? क्या देश की सरकान चुनते वक्त भी हम क्षेत्रीय जरूरतों के लिए बने संगठनों को ही तरजीह देते रहेंगे? क्या चुनाव आयोग प्रांतीय हितों के लिए गठित अथवा प्रांतों तक ही सीमित दलों की लोकसभा चुनाव में भागीदारी पर पुनर्विचार करने पर मंथन करेगा?

-तेजवानी गिरधर
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tejwanig@gmail.com

सोमवार, मार्च 19, 2012

उमा की विफलता के बाद भी संघ गडकरी के पक्ष में


हालांकि उत्तर प्रदेश में भाजपा की ओर से चुनावी कमान उमा भारती को सौंपने का राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी का निर्णय कारगर नहीं रहा, उसके बावजूद संघ अब भी यही चाहता है कि आगामी लोकसभा चुनाव उनके अध्यक्ष रहते ही हो। संघ इसी साल दिसंबर में उनका कार्यकाल समाप्त होने के बाद पुन: कमान सौंपने के मूड में है। हालांकि संघ की यह मंशा दिल्ली में बैठे कुछ दिग्गजों को रास नहीं आ रही, क्योंकि उन्हें अंदेशा है कि गडकरी ऐन वक्त पर प्रधानमंत्री पद की दावेदारी कर सकते हैं। इन दिग्गजों ने संगठन महामंत्री संजय जोशी को फिर से मौका दिए जाने पर भी ऐतराज जताया है।
अपन ने इसी कॉलम में लिख दिया था कि भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उत्तरप्रदेश में कई दिग्गजों को हाशिये पर रख कर चुनाव की कमान उमा भारती को सौंप कर न केवल उनकी, अपितु अपनी भी प्रतिष्ठा दाव लगा दी है, फिर भी माना जा रहा है कि यदि उमा के प्रयासों से भाजपा को कोई खास सफलता नहीं मिली तो भी गडकरी का कुछ नहीं बिगड़ेगा।
असल में उमा को तरजीह दिए जाने से खफा नेता इसी बात का इंतजार कर रहे थे कि उत्तरप्रदेश का चुनाव परिणाम आने पर गडकरी को घेरा जाए। हाल ही जब नागपुर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में गडकरी को ही रिपीट करने की मंशा जताई गई तो दिग्गज भाजपा नेताओं अपनी असहमति जता दी। यही वजह रही कि इस मामले में फैसला सभी से चर्चा के बाद करने का निर्णय किया गया है।
वस्तुत: संघ यह नहीं मानता कि उत्तरप्रदेश में सफलता न मिलने की वजह उमा है। वह मानता है कि वहां आज भी जातीय समीकरणों की वजह से मतदाता केवल बसपा व सपा की पकड़ में है। हालांकि उमा को भी जातीय समीकरण के तहत कमान सौंपी गई, मगर मतदाता बसपा से सपा की ओर शिफ्ट हो गया है। यहां कि कांग्रेस के युवराज राहुल की धुंआधार सभाएं भी कुछ चमत्कार नहीं दिखा पाईं।
संघ आज भी गडकरी की कार्यशैली से संतुष्ठ है। हिन्दुत्व के लिए समर्पित संजय जोशी को तरजीह देने से हालांकि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी खफा हुए, इसके बावजूद संघ के कहने पर गडकरी ने उनको नजरअंदाज कर अपनी बहादुरी का प्रदर्शन किया है। संघ उनकी इसी कार्यशैली से खुश है। उनके पक्ष में ये बात जाती है कि उनके नेतृत्व में भाजपा ने बिहार में अच्छा प्रदर्शन किया। झारखंड में भाजपा की गठबंधन सरकार बनाने में कामयाबी हासिल की। भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को हटाने जैसा साहसिक कदम उठाया। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायकों को बाहर का रास्ता दिखाया।
संघ की सोच है कि आगामी लोकसभा चुनाव लड़ाने के लिए गडकरी के अतिरिक्त किसी और पर आम सहमति बनाना कठिन है। उन बनी हुई आम सहमति को न तो संघ छेडऩा चाहता है और न ही किसी नए को बनवा कर रिस्क लेना चाहता है। सच तो ये है कि आगामी चुनाव के लिए गडकरी ने पूरी तैयारी शुरू कर दी है। सर्वे सहित प्रचार अभियान को हाईटैक तरीके से अंजाम देने की तैयारी है। यह सब संघ के इशारे पर हो रहा है।
वस्तुत: संघ को यह समझ में आ गया है कि भाजपा को हिंदूवादी पार्टी के रूप में ही आगे रखने से लाभ होगा। लचीला रुख अपनाने की वजह से वह न तो मुसलमानों को ठीक से आकर्षित कर पाई और न ही जातिवाद में फंसे हिंदू को ही लामबंद कर पाई। बहरहाल, अब देखना ये है कि दिग्गज नेताओं का विरोध गडकरी को रिपीट करने पर संघ को रोक पाता है या नहीं।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

शुक्रवार, मार्च 16, 2012

मैथ्यू साहब, केवल खबरों का खंडन ही होगा, कार्यवाही कौन करेगा?


मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के निर्देश पर हाल ही राजस्थान सरकार के मुख्य सचिव सी. के. मैथ्यू ने अब सभी विभागों को नकारात्मक खबरों का नियमित रूप से खंडन जारी करने के निर्देश दिए हैं। इसके लिए सभी विभागों में विभागाध्यक्ष अथवा वरिष्ठतम उप शासन सचिव को नोडल अधिकारी बनाया जा रहा है। सरकार का मानना है कि राज्य सरकार की रीति-नीति और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के संबंध में नकारात्मक समाचार छपने से जनता में सरकार के बारे में गलत संदेश जाता है। साथ ही लोगों में भ्रम की स्थिति भी बनती है।
निश्चित रूप से यह जायज है कि यदि कोई समाचार गलत छपा है तो संबंधित पक्ष को उसका खंडन करना चाहिए अथवा अपना पक्ष रखना चाहिए। इससे कम से कम आम जनता दोनों पक्षों के तथ्य जानकार निर्णय तो कर सकेगी कि क्या सही है और क्या गलत। सरकार ने भले ही इसे अपनी छवि को सुधारने की गरज से लागू किया हो, मगर है यह स्वागत योग्य कदम। मगर अहम सवाल ये है कि सरकार को यदि अपने खिलाफ छप रही गलत या नकारात्मक खबरों से परेशानी है तो इस बात की चिंता क्यों नहीं कि आम जनता की समस्याओं से जुड़ी खबरों पर भी कार्यवाही उतनी ही मुस्तैदी से की जानी चाहिए। उसकी नजर इस बात पर तो है कि नकारात्मक खबर का खंडन करना है, मगर इस पर नहीं कि आखिर वह क्यों छपी है और उसका समाधान भी किया जाना चाहिए। सरकार ने नकारात्मक खबरों से निपटने के लिए जो कदम उठाया है, उसकी उसने कितनी पुख्ता व्यवस्था की है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुख्य सचिव मैथ्यू ने जो परिपत्र जारी किया है, उसके तहत सभी विभागों को नकारात्मक समाचार के बारे में वस्तुस्थिति (खंडन) सीधे ही सूचना एवं जन संपर्क विभाग की वेबसाइट पर अपलोड करने होंगे। खबरों की जानकारी रोजाना सुबह 11 बजे तक सीएमओ, मुख्य सचिव अथवा डीपीआर की ओर से मोबाइल, एसएमएस अथवा टेलीफोन से संबंधित अतिरिक्त मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव, विभागाध्यक्ष को दी जाएगी। दोपहर 12 बजे तक संबंधित विभागों को खबरों की कटिंग फैक्स अथवा ई-मेल से भेजी जाएंगी। संबंधित विभाग को शाम 4 बजे तक उस खबर से संबंधित वस्तुस्थिति और तथ्यात्मक टिप्पणी से ऑनलाइन न्यूज मॉनिटरिंग सिस्टम पर अपलोड करनी होगी। है न तगड़ी व्यवस्था। मगर अफसोस कि मुख्य सचिव को इस बात का ख्याल नहीं आया कि जो भी समाचार सरकार या सरकारी विभाग के खिलाफ छपते हैं, वे कोई हवाई तो होते नहीं हैं। यदि वाकई वे हवाई हैं तो उनका खंडन जायज है। मगर अमूमन समाचार वास्तविक समस्याओं से संबंधित होते हैं। वे छापे ही इस कारण जाते हैं कि सरकार का ध्यान उस ओर जाए, मगर उन पर कार्यवाही में सरकार कितनी गंभीरता दिखाती है, सब जानते हैं। बेहतर होता कि मैथ्यू साहब यह आदेश भी साथ ही जारी करते कि जनता की समस्याओं से संबंधित समाचार पर तुरंत कार्यवाही की जानी चाहिए और उससे उच्चाधिकारी को अवगत भी कराना चाहिए।
आपको ख्याल होगा कि एक जमाना था, जब किसी समाचार पत्र में कोई छोटी सी खबर भी छपती थी तो तुरंत कार्यवाही होती थी, मगर आज अखबार वाले पूरा पेज का पेज भी छाप देते हैं, मगर प्रशासन के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। यह आम रवैया सा बन गया कि किसी भी खबर पर अधिकारी वर्ग की यही प्रतिक्रिया होती है कि खबरें तो यूं ही छपती ही रहती हैं। और यही वजह है कि समाचारों का अवलोकन करने के लिए सूचना केन्द्र से कटिंग का पुलिंदा जिला कलेक्टर के पास नियमित रूप से जाता है, मगर वह या तो खुलता ही नहीं और खुलता भी तो उस पर कोई कार्यवाही नहीं की जाती। कई बार तो अधिकारी किसी सरकारी खबर पर अपनी प्रतिक्रिया मांगने पर भी नहीं देते। मोबाइल फोन स्विच ऑफ कर देते हैं या फिर नो कमेंट कह कर फोन रख देते हैं। इसी कारण एक पक्षीय समाचार छप जाता है। हकीकत तो यह है कि पत्रकार दूसरे पक्ष को भी पूरा तवज्जो देते हैं। उन्हें इसी की शिक्षा दी गई है कि एकपक्षीय समाचार न छापे जाएं। फिर भी दोष अखबार वालों को दिया जाता है कि सरकार के खिलाफ खबरें छापते हैं। मैथ्यू साहब को इस पर भी गौर करना चाहिए कि अखबार वाले तो चला कर सरकार का पक्ष जानना चाहते हैं, आपके अधिकारी ही तवज्जो नहीं देते। अगर वे ऐसा करते तो इस प्रकार के आदेश ही जारी नहीं करने पड़ते कि खबर छपने के बाद उसका खंडन किया जाए। नकारात्मक खबर के साथ ही सरकार का भी पक्ष छप जाता। मगर चूंकि सरकार ने इस पर कभी गौर नहीं किया, इस कारण नौबत यहां तक आ गई है कि उसे खंडन करने की व्यवस्था कायम करनी पड़ रही है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

शनिवार, मार्च 10, 2012

छह दिन हफ्ता क्यों नहीं कर दिया जाए?

होली की छुट्टी के बाद सरकारी दफ्तर खुले और जिला कलेक्टर श्रीमती मंजू राजपाल ने आकस्मिक निरीक्षण किया तो पाया कि एडीएम व एसीएम समेत 67 कर्मचारी नदारद हैं। यह तो उस दफ्तर की हालत है, जहां स्वयं जिला कलेक्टर व अन्य बड़े प्रशासनिक अधिकारी बैठते हैं। उसके बावजूद कर्मचारी अपनी ड्यूटी के प्रति लापरवाह हैं। लापरवाही की पराकाष्ठा का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि मुख्य सचिव ने हाल ही में वीडियो कॉन्फ्रेंसिग में कार्मिकों के ऑफिस में समय पर पहुंचना सुनिश्चित करने के निर्देश देते हुए आकस्मिक निरीक्षण शुरू करने का अभियान शुरू करने को कहा था। उसकी भी कर्मचारियों को कोई चिंता नहीं थी। जिला कलेक्टर इस बात से भली भांति वाकिफ थीं, इस कारण सर्वप्रथम कलेक्टर परिसर के दफ्तरों पर ही कार्यवाही को अंजाम दिया और पाया कि राजपत्रित अधिकारीअतिरिक्त कलेक्टर मोहम्मद हनीफ, सहायक कलेक्टर भगवत सिंह राठौड़, प्रोटोकाल अधिकारी सुनीता डागा, लेखाधिकारी लालचंद मूंदड़ा व सहायक विधि परामर्शी हरीश कुमार शर्मा सहित 67 कर्मचारी सीट पर नहीं हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अन्य सरकारी दफ्तरों का क्या हाल होगा।
असल में तीन साल से ज्यादा बीतने के बाद भी राज्य कर्मचारी पांच दिन के हफ्ते के साथ ड्यूटी समय बढ़ाए जाने के आदी नहीं हुए हैं। अधिसंख्य कर्मचारी पुराने ढर्रे पर ही दफ्तर आते हैं और शाम को भी जल्द ही बस्ता बांध लेते हैं। इससे आम लोगों को परेशानी होती है। यह परेशानी इस कारण भी बढ़ जाती है कि कई कर्मचारी छुट्टी के इन दो दिनों के साथ अन्य किसी सरकारी छुट्टी को मिला कर आगे-पीछे एक-दो दिन की छुट्टी ले लेते हैं और नतीजा ये रहता है कि उनके पास जिस सीट का चार्ज होता है, उसका काम ठप हो जाता है। अन्य कर्मचारी यह कह कर जनता को टरका देते हंै कि इस सीट का कर्मचारी जब आए तो उससे मिल लेना। यानि कि काम की रफ्तार काफी प्रभावित होती है।
कलेक्ट्रेट को छोड़ कर अधिकतर विभागों में पुराना ढर्रा चल रहा है। कलेक्ट्रेट में जरूर कुछ समय की पाबंदी नजर आती है, क्योंकि वहां पर राजनीतिज्ञों, सामाजिक संगठनों व मीडिया की नजर रहती है। आम जनता के मानस में भी आज तक सुबह दस से पांच बजे का समय ही अंकित है और वह दफ्तरों में इसी दौरान पहुंचती है। कोई इक्का-दुक्का ही होता है, जो कि सुबह साढ़े नौ बजे या शाम पांच के बाद छह बजे के दरम्यान पहुंचता है। यानि कि काम के जो घंटे बढ़ाए गए, उसका तो कोई मतलब ही नहीं निकला। बहुत जल्द ही उच्च अधिकारियों को यह समझ में आ गया कि छह दिन का हफ्ता ही ठीक था। इस बात को जानते हुए उच्च स्तर पर कवायद शुरू तो हुई और कर्मचारी नेताओं से भी चर्चा की गई, मगर यह सब अंदर ही अंदर चलता रहा। चर्चा कब अंजाम तक पहुंचेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता।
ज्ञातव्य है कि पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे सरकार के जाते-जाते कर्मचारियों के वोट हासिल करने के लिए पांच दिन का हफ्ता कर गई थीं। चंद दिन बाद ही आम लोगों को अहसास हो गया कि यह निर्णय काफी तकलीफदेह है। लोगों को उम्मीद थी कि कांगे्रस सरकार इस फैसले को बदलेगी। उच्च स्तर पर बैठे अफसरों का भी यह अनुभव था कि पांच दिन का हफ्ता भले ही कर्मचारियों के लिए कुछ सुखद प्रतीत होता हो, मगर आम जनता के लिए यह असुविधाजन व कष्टकारक ही है। हालांकि अधिकारी वर्ग छह दिन का हफ्ता करने पर सहमत है, लेकिन इसे लागू करने पर कर्मचारियों के विरोध का सामना करना पड़ सकता है। वस्तुत: यह फैसला न तो आम जन की राय ले कर किया गया और न ही इस तरह की मांग कर्मचारी कर रहे थे। बिना किसी मांग के निर्णय को लागू करने से ही स्पष्ट था कि यह एक राजनीतिक फैसला था, जिसका फायदा तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जल्द ही होने जा रहे विधानसभा चुनाव में उठाना चाहती थीं। उन्हें इल्म था कि कर्मचारियों की नाराजगी की वजह से ही पिछली गहलोत सरकार बेहतरीन काम करने के बावजूद धराशायी हो गई थी, इस कारण कर्मचारियों को खुश करके भारी मतों से जीता जा सकता है। हालांकि दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं पाया।
असल बात तो ये है कि जब वसुंधरा ने यह फैसला किया, तब खुद कर्मचारी वर्ग भी अचंभित था, क्योंकि उसकी मांग तो थी नहीं। वह समझ ही नहीं पाया कि यह फैसला अच्छा है या बुरा। हालांकि अधिकतर कर्मचारी सैद्धांतिक रूप से इस फैसले से कोई खास प्रसन्न नहीं हुए, मगर कोई भी कर्मचारी संगठन इसका विरोध नहीं कर पाया। रहा सवाल राजनीतिक दलों का तो भाजपाई इस कारण नहीं बोले क्योंकि उनकी ही सरकार थी और कांग्रेसी इसलिए नहीं बोले कि चलते रस्ते कर्मचारियों को नाराज क्यों किया जाए।
ऐसा नहीं कि लोग परेशान नहीं हैं, बेहद परेशान हैं, मगर बोल कोई नहीं रहा। कर्मचारी संगठनों के तो बोलने का सवाल ही नहीं उठता। राजनीतिक संगठन ऐसे पचड़ों में पड़ते नहीं हैं और सामाजिक व स्वयंसेवी संगठनों को क्या पड़ी है कि इस मामले में अपनी शक्ति जाया करें। ऐसे में जनता की आवाज दबी हुई पड़ी है। देखना ये है कि कांग्रेस सरकार आम लोगों के हित में फैसले को पलट पाती है या नहीं।
-tejwanig@gmail.com

शुक्रवार, मार्च 02, 2012

...यानि अब ट्रेफिक पुलिस की जेब ज्यादा गरम होगी


तकरीबन बाईस पुराने सेंट्रल मोटर वीइकल एक्ट में संशोधन के प्रस्तावित बिल को केंद्रीय कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद एक ओर जहां यह उम्मीद की जा रही है कि इससे भारी अर्थ दंड से डर कर चालक ट्रेफिक नियमों की पालना के प्रति सजग होंगे, वहीं इस बात की भी आशंका है कि इससे ट्रेफिक पुलिस में पहले से व्याप्त भ्रष्टाचार और बढ़ जाएगा। दरअसल सरकार का सोच यह है कि जुर्माना कम होने के कारण चालक सुधरने का नाम ही नहीं ले रहे। वे ले दे कर छूटने कोशिश में रहते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार करीब दो करोड़ लोगों ने पिछले साल ट्रैफिक नियमों को तोड़ा और जुर्माना भी चुकाया। अफसरों का कहना है कि जुर्माना राशि कम है। लोग नियम तोडऩे से नहीं डरते। ऐसे में सवाल यह है कि क्या वाकई में जुर्माना बढऩे के बाद लोग सुधर जाएंगे या हालात जस के तस बने रहेंगे। अक्सर यह देखने में आता है कि जिन नियमों के उल्लंघन में जुर्माने की राशि 100, 200 या 500 रुपये से ज्यादा है, उनमें जुर्माना भरने के बजाय मामला मौके पर ही निपटा लेने की कोशिशें की जाती हैं। यद्यपि आमतौर पर ये कोशिशें उल्लंघन करने वालों की तरफ से ही ज्यादा होती हैं, लेकिन कई ट्रैफिक पुलिसकर्मी भी मौके का फायदा उठाने से नहीं चूकते। ऐसे में जब जुर्माना बढ़ जाएगा, तो मामला मौके पर ही निपटा लेने की कोशिशें भी बढ़ जाएंगी। यह सही है कि ट्रेफिक पुलिस को यातायात सप्ताह के दौरान अपेक्षित लक्ष्य हासिल करने होते हैं, मगर लक्ष्य की पूर्ति के अतिरिक्त आम तौर पर घूसखोरी ही चलन में है। इसकी वजह ये है कि जहां नियम का उल्लंघन करने वाला नियमानुसार चुकाए जाने वाली राशि से कम दे कर छूट जाता है, इस कारण वह संतुष्ट रहता है, वहीं ट्रेफिक कर्मचारी को जेब गरम होने के कारण संतुष्ट होना ही है। यानि मियां बीवी राजी तो क्या करेगा काजी? चूना तो सरकार को ही लगता है। जब जुर्माना राशि बढ़ जाएगी तो स्वाभाविक रूप से घूसखोरी बढ़ जाएगी। यद्यपि इस आशंका भरी सोच को नकारात्मक माना जा सकता है, मगर जब तक घूसखोरी पर प्रभावी नियंत्रण नहीं लगाया जाएगा, जुर्माना बढ़ाए जाने मात्र से हालत सुधरने वाले नहीं हैं। सौ बात की एक बात। जुर्माना बढ़ाने का सीधा सा मतलब है कि चालक सुधर नहीं रहा है। सुधर नहीं रहा है, इसका मतलब ये नहीं कि वह गंवार है, अपितु वह अधिक चतुर है। चालक इसके प्रति इतने जागरूक नहीं है कि सारे नियम उनके हित की खातिर ही बने हैं, बल्कि वह इसके प्रति अधिक जागरूक है कि ट्रेफिक पुलिस से कैसे बचा जाए। चालक जानता है कि अमुक-अमुक जगह पर ट्रेफिक पुलिस वाला नहीं होगा, उन-उन जगहों पर वह हेलमेट उतार देता है, सीट बैल्ट खोल देता है। एक महत्वपूर्ण तथ्य ये है कि केवल नियम कड़े करने और दंड बढ़ाने से तब तक सकारत्मक परिणाम नहीं आएंगे, जब तक कि ट्रेफिक पुलिस के पास पर्याप्त संसाधन नहीं होंगे। हकीकत यही है कि संसाधनों की कमी के कारण ही नियमों का उल्लंघन होता है और दुर्घटनाएं होती हैं। रहा सवाल दुर्घटना में किसी की मृत्यु होने पर मुआवजा राशि चार गुना बढ़ाकर एक लाख रुपए करने की तो इसकी वजह से चालक दुर्घटना कारित कर किसी को मारेगा नहीं, ऐसा नहीं है, बल्कि महंगाई बढ़ जाने के कारण मौजूदा मुआवजा राशि ऊंट के मुंह में जीरे के समान है, इस कारण उसमें वृद्धि की गई है। लब्बोलुआब, दंड बढ़ाए जाने से कुछ तो फर्क की उम्मीद की जा सकती है, मगर इससे चालक जागरूक हो जाएगा, इसकी संभावना कुछ कम ही है। उलटे भ्रष्टाचार बढ़ जाएगा। इस सिलसिले में ओशो रजनीश की ओर से दिए गए उदाहरण को लीजिए- हमारे देश के एक मंत्री इंग्लैंड के दौरे पर गए। कड़ाके की ठंड थी। वे रात को करीब एक बजे किसी कार्यक्रम से होटल को लौट रहे थे। अचानक ड्राइवर ने कार रोक दी। मंत्री जी ने देखा कि चौराहे पर लाल बत्ती हो जाने के कारण कार रुकी है। उन्होंने जब यह देखा कि चौराहा पूरी तरह से सुनसान है तो ड्राइवर से बोले कि जब कोई वाहन व राहगीर नहीं है और उससे भी बढ़ कर ट्रेफिक पुलिस भी नहीं है तो कार रोकने का क्या मतलब है? इस पर ड्राइवर ने चौराहे पर एक ओर खड़ी ठंड में ठिठुर रही एक बुढिय़ा की ओर इशारा किया कि जो हरी लाइट होने का इंतजार कर रही थी तो मंत्री जी को समझ में आ गया कि हम भारतीय भले ही देशभक्ति की ऊंची ऊंची ढीगें हाकें, मगर राष्ट्रीयता और नियमों का पालन करने के मामले में अंग्रेज हमसे कई गुना बेहतर हैं। अफसोस कि अंग्रेज हमें अंग्रेजी तो सिखा गए, मगर एटीकेट्स और मैनर्स अपने साथ ले गए।
-tejwanig@gmail.com

मंगलवार, फ़रवरी 28, 2012

भड़ास blog: मीडिया में छाने को ले रहे हैं आयोग से पंगा

भड़ास blog: मीडिया में छाने को ले रहे हैं आयोग से पंगा

मीडिया में छाने को ले रहे हैं आयोग से पंगा


उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव के दौरान चुनाव आयोग को नाराज करने के एक के बाद एक मामले सामने आने से दो ही बातें समझ में आती हैं, या तो कांग्रेस के नेता वाकई आचार संहिता को नहीं जानते और मासूम हैं अथवा संयोग से गलती कर रहे हैं और या फिर जानबूझ कर ऐसी बयानबाजी कर रहे हैं, ताकि आयोग नाराज हो और कांग्रेस मीडिया में चर्चा में बनी रहे। संभव है कि कानून मंत्री सलमान खुर्शीद, गृह राज्य मंत्री प्रकाश जायसवाल व बेनीप्रसाद शर्मा के पास बयान देने का ठोस तार्किक आधार हो अथवा अपने बयान को अलग संदर्भ में कह कर बचने की कोशिश करें, मगर उनका जो रवैया दिखाई दे रहा था, वह साफ तौर पर आयोग को चिढ़ाने जैसा ही था। वे आयोग पर ऐसे गुर्रा रहे थे मानो उन्हें उसका कोई डर ही नहीं है। असल बात तो यह नजर आती है कि उन्होंने इतनी अधिक सीमा लांघी कि आयोग को नोटिस देना ही पड़ा। उनके बयानों से यह कहीं से भी नहीं दिखाई देता कि उन्हें इस बात का अहसास ही नहीं था कि उनके बयान पर आयोग ऐतराज जाहिर करते हुए नोटिस दे देगा। कम से कम ऐसा तो कत्तई नहीं लगा कि उनसे गलती हो गई अथवा जुबान फिसल गई थी, ठोक बजा कर जो बयान दे रहे थे। बयान आचार संहिता का उल्लंघन कर रहे थे या नहीं, इस में नहीं पड़ें, तब भी होना जाना क्या है? फांसी तो होनी नहीं है। हद से हद यही कहना है कि उनका मकसद आचार संहिता का उल्लंघन करना नहीं था, वे आयोग का सम्मान करते हैं अथवा आयोग के सामने पेश हो कर खेद प्रकट कर देने से मामला रफा-दफा हो जाएगा। वैसे भी इस प्रकार की विवादास्पद बयानबाजी का मतलब चुनाव पूरे होने तक है। उसके बाद पूछता कौन है कि आपने ऐसा कैसे कह दिया? असल में ऐसा प्रतीत होता कि कांग्रेस की यह सोची समझी चाल है। वह चुनाव की सरगरमी के दौरान मीडिया को अपनी ओर आकर्षित करने की फिराक में है, ताकि वहीं छायी रहे। वह असल मुद्दों से जनता का ध्यान हटाना चाहती है साथ ही अपने मकसद में कामयाब भी होना चाहती है। मुस्लिम आरक्षण का ही मामला लीजिए। माना कि इस पर बाद में माफीनामे अथवा खेद प्रकट करने की स्थिति आती है, मगर जिस मकसद से बयान दिया वह तो मुसलमानों को कम्युनिकेट हो ही गया। आयोग लाख माफी मंगवा ले, मगर उसे डीकम्युनिकेट कैसे करवा पाएगा। तब तक तो वोट ही पड़ चुके होंगे। मुस्लिम आरक्षण के मुद्दे पर कांग्रेस के आला मंत्रियों ने चुनाव आयोग पर वार पर वार करने की योजना चल ही रही थी कि कांग्रेस युवराज राहुल गांधी ने कानपुर में जानबूझ कर रोड शो किया और पूरे 24 घंटे तक वे मीडिया की सुर्खियां बने रहे। इतना ही नहीं, राहुल का सपा का घोषणा पत्र फाडऩे वाला नाटक भी साफ तौर पर मीडिया में सुर्खी पाने के लिए था। इससे मीडिया ही नहीं, बल्कि राजनीतिक दल भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। जाहिर तौर पर इससे भाजपा को बड़ी तकलीफ हुई होगी। मीडिया में छाये रहने के गुर तो भाजपाइयों को ही आते हैं। इस मामले में उनका कोई सानी नहीं। मगर पहली बार कांग्रेस के इस प्रकार मीडिया पर बने रहने से भाजपाई सकते में हैं। इसी बीच आयोग को कमजोर करने का मुद्दा उभर आया। आयोग ने जब इस प्रकार की किसी भी कोशिश का नाकाम करने की बात कही तो सरकार की ओर से कहा गया कि ऐसा कोई विचार ही नहीं था। ऐसे में भाजपा के दिग्गज अरुण जेटली ने मोर्चा संभाला और कांग्रेस को सीरियल अपराधी करार दे दिया, मगर मीडिया ने उसे कोई खास तवज्जो नहीं दी। पूरा प्रकरण मीडिया मैनेजमेंट से जुड़ा हुआ नजर आया।
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