तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

शनिवार, जुलाई 18, 2026

सवाये का क्या महत्व है?

आजकल या तो दूध थैलियों में आता है या दूध वाला नाप कर भी देता है तो पूरा उतना ही, जितना उसे कहा जाता है। एक समय था, जब दूध वाले से एक या दो किलो, जो भी उसे कहा जाता था, तो वह उतना दूध देने के बाद ऊपर से थोड़ा अलग से दूध दिया करता था। यह लोगों की आदत में शुमार था। हो सकता है, गांवों में इसका चलन अब भी हो। इतना ही नहीं, आम तौर पर हम देखते हैं कि सब्जी वाला भी कहे गए तोल से कुछ ज्यादा, भले ही दस-बीस ग्राम ही सही, मगर देता है। हमारी भी यही अपेक्षा होती है कि सामान वाला पलड़ा थोड़ा भारी रहे। इतना ही नहीं सब्जी के साथ ऊपर से फ्री में थोड़ा धनिया या मिर्ची देने का भी चलन है। इसे सवाया कहा जाता है। असल में इसका मतलब इससे नहीं है कि हम मांगी गई वस्तु से कुछ ज्यादा की अपेक्षा करते हैं। अपितु इस का मतलब सवाये है, जिसे कि शुभ माना जाता है।

आप देखिए न कि हम यदि भगवान को प्रसाद चढ़ाने का संकल्प लेते हैं या प्रसाद चढ़ाते हैं तो तब भी सवाये का ख्याल रखते हैं। अब तो पचीस पैसे अर्थात चवन्नी चलन से बाहर हो गई, मगर किसी जमाने में सवा रुपया या सवाल ग्यारह रुपए चढ़ाए जाते थे। जब चवन्नी बंद हो गई तो भी राउंड फिगर से एक रुपया ज्यादा का चलन आया। ग्यारह, इक्कीस, इक्यावन। लेकिन चूंकि कई बार एक रुपए का सिक्का जेब में नहीं होता है, इस कारण गिफ्ट वाले ऐसे लिफाफे आ गए हैं, जिनमें एक रुपया पहले से चिपका हुआ होता है। मकसद सिर्फ ये है यदि हम उसमें सौ रुपये या दो सौ रुपए डालें तो एक रुपया स्वतरू जुड़ जाए। यह भी सवाये का ही रूप है। अर्थात हम पूर्णांक से एक अंक ज्यादा को प्राथमिकता देते हैं।

वस्तुतरू सनातन धर्म में सवा (एक और एक चौथाई) का महत्व है और इसी क्रम में सवा, ग्यारह, इक्कीस, इक्यावन को शुभ माना जाता है। अर्थात् सबसे छोटी प्राकृत संख्या जो शुभ मानी जाती है, वह 11 ही है। इसी से जुड़े तथ्य रोचक हैं। जैसे अपोलो 11, चन्द्रमा पर भेजा गया पहला मानवयुक्त अन्तरिक्ष यान था। बहुत से खेलों में 11 खिलाड़ी मैदान पर उतरते हैं, जैसे क्रिकेट, फुटबॉल आदि।

शायद आपकी जानकारी में हो कि ज्योतिषी कोई भी काम करते वक्त  सवाये की सलाह देते हैं। जैसे नौ, दस, ग्यारह बजे, या जो भी, वे कहते हैं कि पूर्णांक की बजाय कुछ ज्यादा मिनट होने पर ही काम की शुरुआत करनी चाहिए। वे पौने से बचने की राय देते हैं, अर्थात पौ नौ, पौने दस या पौने ग्यारह बजे काम शुरू करने से बचने की कहते हैं, क्योंकि वह पूर्ण से कम है, इस कारण उस वक्त शुरू किए गए काम के पूर्ण होने में संशय हो सकता है। 

कुल मिला कर यह स्थापित तथ्य है कि हमारे जीवन में सवाये का बड़ा महत्व है। लेकिन तथ्य स्थापित होने के पीछे क्या कारण है, इसके बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। जहां तक मेरी समझ है, इसके पीछे कहीं न कहीं अध्यात्म है। दर्शन को गहराई जानने वाले कहते हैं कि पूर्ण और शून्य  में कोई अंतर नहीं। दोनों एक ही सिक्के के पहलु हैं। जैसे ही पूर्णता आती है,  उसी के साथ शून्य आ कर खड़ा हो जाता है। कदाचित इसीलिए पूर्णांक की बजाय उसमें सवाया जोड़ा जाता है।

गुरुवार, जुलाई 16, 2026

योगी को पसीना कम क्यों आता है?

आज आपको एक दिलचस्प जानकारी देते हैं। वो यह कि योगी को पसीना कम आता है। हालांकि यह कोई नियम नहीं है, बल्कि प्राकृतिक परिणाम है। योग शास्त्र के अनुसार पसीना केवल गर्मी से नहीं, अपितु असंतुलित प्राण-प्रवाह से भी आता है। सामान्य व्यक्ति के प्राण पिंगला, जो कि उश्ण होती है, में अधिक रहता है, जबकि योगी की इड़ा व पिंगला नाडी संतुलित तथा सुषुम्ना सक्रिय रहती है। संतुलन बढ़ने से शरीर को ताप-नियंत्रण के लिए अधिक पसीने की जरूरत नहीं पड़ती। योगी का शरीर खिंचा हुआ नहीं होता, अतः वह अनावश्यक ऊर्जा नहीं जलाता। इससे आंतरिक ऊष्मा कम उत्पन्न होती है, और पसीना भी कम आता है।

योगी चूंकि नाड़ी शोधन, शीतली, शीतकारी जैसे प्राणायाम करते हैं, इस कारण वे शरीर की ऊष्मा संतुलित करते हैं व स्वेद यानि पसीना की मात्रा घटाते हैं। योग ग्रंथों में अत्यधिक पसीने को

प्राण-क्षय का संकेत माना गया है।

सामान्य व्यक्ति क्रोध, भय, उत्तेजना, घबराहट में रहता है, जो कि “मानसिक गर्मी” पैदा करते हैं। योगी का चित्त शांत होने से

तनाव जन्य पसीना स्वतः कम हो जाता है। चूंकि योगी का आहार सादा, सात्त्विक व कम मसालेदार होता है, इस कारण शरीर की उष्णता और पसीने की मात्रा कम रहती है। वैसे योगी को पसीना न आए, यह सिद्धि नहीं है। गर्मी, श्रम या कठिन आसन में योगी को भी पसीना आता है।

योगशास्त्र कहता है “न अति स्वेदः, न अति शैत्यं कृ समत्व।”

निष्कर्ष यह है कि नियमित योगाभ्यास करने वाले व्यक्ति को

सामान्यतः पसीना कम आता है।यह देह के नहीं, प्राण और चित्त के संतुलन का फल है। योग का लक्ष्य पसीना रोकना नहीं,

स्वाभाविक संतुलन प्राप्त करना है। लोक कथाओं में कहा गया है कि जो भीतर से शीतल हो, उसे बाहर की गर्मी नहीं सताती। यह कथन देह से अधिक चेतना की बात करता है।

 


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रविवार, जुलाई 12, 2026

चिता में लकडी समर्पित क्यों की जाती है?

आप जानते हैं कि किसी भी व्यक्ति के अंतिम संस्कार का समापन मौजूद लोगों की ओर से लकडी के समर्पण से होता है। हर व्यक्ति पूरी श्रद्घा से चिता में लकडी डालता है। लेकिन आपने कभी विचार किया है कि ऐसा क्यों किया जाता है। यह केवल ईंधन नहीं, बल्कि अंतिम सहभागिता का प्रतीक है कि मैं भी इस विदाई का साक्षी और सहभागी हूँ।

धार्मिक दृष्टि से यह माना जाता है कि लकड़ी देना पितृ ऋण से मुक्त होने का संकेत है। मृतक के प्रति अंतिम कर्तव्य (अंत्येष्टि -संस्कार) में सहभागिता है। लोकभावना में यह भी था कि जिसने लकड़ी दी, उसने मृतात्मा के कष्ट को थोड़ा कम किया।

आज अधिकतर श्मशानों में यह दृश्य मिलता है कि लकड़ी का एक ही टुकड़ा रखा जाता है। सभी लोग उसे छूकर या आगे बढ़ा कर प्रतीकात्मक रूप से लकड़ी देने की प्रक्रिया को पूरा कर लेते हैं। यह बदलाव अचानक नहीं, बल्कि व्यावहारिक कारणों से आया है। असल में शहरीकरण के चलते स्थान की कमी है। शहरों में श्मशान सीमित हैं। ऐसे में सैकड़ों लकड़ियां रखना अव्यवहारिक हो गया। लकड़ी की अत्यधिक खपत पर सवाल भी उठते हैं, इसलिए प्रतीकात्मक अर्पण की परंपरा बनी रहे और प्रकृति पर बोझ भी न बढ़े।  महामारी और संक्रमण के अनुभवों के बाद कम वस्तुओं का साझा उपयोग अधिक सुरक्षित माना जाता है। सवाल उठता है कि क्या इससे परंपरा का महत्व कम हुआ? 

नहीं। यह समझना जरूरी है कि संस्कार का भाव प्रधान है, वस्तु नहीं। शास्त्रों में भी कहा गया है भावेन देवाः तुष्यन्ति

(देवता और संस्कार भावना से तृप्त होते हैं)। यदि मन में श्रद्धा है, तो एक लकड़ी छूना भी सौ लकड़ियाँ देने के बराबर माना जा सकता है। कुल मिला कर लकड़ी देने की परंपरा समाप्त नहीं हुई, केवल उसका रूप बदला है।


शनिवार, जुलाई 11, 2026

छछुंदर के सिर पर चमेली का तेल

लोकजीवन की सबसे बड़ी ताकत उसकी कहावतें हैं। बिना भाषण दिए, बिना तर्कों का बोझ लादे, वे पूरी बात कह जाती हैं। ऐसी ही एक तीखी, व्यंग्य से भरी कहावत है “छछुंदर के सिर पर चमेली का तेल।” यह कहावत जितनी साधारण दिखती है, उतनी ही गहरी सामाजिक टिप्पणी अपने भीतर समेटे हुए है।

छछुंदर लोकमानस में बदबू, अराजकता और असभ्यता का प्रतीक है। वह न सौंदर्य को समझता है, न सुगंध का मोल जानता है। दूसरी ओर चमेली का तेल भारतीय संस्कृति में कोमलता, शृंगार और सौंदर्य का प्रतीक रहा है। जब लोकबुद्धि ने इन दोनों को एक ही वाक्य में पिरो दिया, तो व्यंग्य अपने चरम पर पहुँच गया। कहावत मानो पूछती है, जिसे गंध और सौंदर्य की पहचान ही नहीं, उसके सिर पर इत्र मलने का क्या अर्थ?

यह कहावत केवल किसी व्यक्ति पर टिप्पणी नहीं करती, बल्कि पूरे सामाजिक व्यवहार पर प्रश्नचिह्न लगाती है। अयोग्य हाथों में अधिकार सौंप देना, समझ से परे लोगों पर संसाधन लुटा देना, और जहाँ कद्र नहीं वहाँ सम्मान उड़ेल देना। इन सब स्थितियों के लिए यह कहावत सटीक बैठती है। समाज अक्सर ऐसी मूर्खताओं पर खुलकर बहस नहीं करता, बल्कि एक वाक्य में सब कह देता है, यह तो छछुंदर के सिर पर चमेली का तेल है।

आज के समय में यह कहावत और भी प्रासंगिक हो गई है। जब पद योग्यता से नहीं, सिफारिश से मिलते हैं। जब ज्ञान का मूल्य समझ से नहीं, दिखावे से आँका जाता है, और जब संस्कृति को केवल सजावट बना दिया जाता है, तब चमेली का तेल खूब बहता है, पर बदबू जस की तस रहती है। वस्तुतः लोक कहावतें हमें आईना दिखाती हैं। वे बताती हैं कि हर चीज हर जगह शोभा नहीं देती। सम्मान, साधन और सौंदर्य, तीनों तभी सार्थक हैं, जब उन्हें ग्रहण करने वाला उसके योग्य हो। अन्यथा समाज को बस इतना ही कहना पड़ता है, इतनी मेहनत, इतना खर्च, और नतीजा? छछुंदर के सिर पर चमेली का तेल।


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सोमवार, जुलाई 06, 2026

हमारा हमजाद हमसे भी अधिक ताकतवर होता है?

क्या आपको पता है कि हमारी ही फोटोकॉपी, हमारा ही प्रतिरूप, हमारा ही प्रतिबिंब, हमारी ही छाया या उसे क्लोन की भी संज्ञा दे सकते हैं, हमारे साथ हर वक्त मौजूद है? इतना ही नहीं, वह हमसे भी अधिक ताकतवर होता है। हम चूंकि शरीर में कैद हैं, इस कारण हमारी सीमा है, मगर हमारा हमजाद अनेक प्रकार की सीमाएं लांघ कर काम कर सकता है।

इस विषय पर चर्चा से पहले मैं बात करना चाहता हूं, मेरे पूर्व के एक ब्लॉग के बारे में, जिसमें मैंने सवाल रखा था कि दर्पण में दिखाई देने वाले प्रतिबिंब का वजूद क्या है? वह आखिर है क्या? जब तक हम दर्पण के सामने खड़े रहते हैं, तब तक वह दिखाई देता है और हटते ही वह भी हट जाता है। तो जो दिखाई दे रहा था, वह क्या था? हटते ही वह कहां खो जाता है? यह सही है कि उसका अपने आप में कोई वजूद नहीं, मगर वह कुछ तो है। 

आपको जानकारी होगी कि ज्योतिषी व तांत्रिक बताते हैं कि तेल, विशेष रूप से सरसों के तेल में अपना प्रतिबिंब देख कर उस तेल को दान करने से शनि का प्रकोप कम होता है। अर्थात प्रतिबिंब अपने साथ हमारी कुछ ऊर्जा, जिसे नकारात्मक ऊर्जा कह सकते हैं, ले जाता है। प्रतिबिंब का कितना महत्व है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सामुद्रिक शास्त्र में बताया जाता है कि अगर पानी में हमारा प्रतिबिंब दिखाई देना बंद हो जाए तो जल्द ही मृत्यु हो जाती है। अर्थात मृत्यु से पहले प्रतिबिंब बनना बंद हो जाता है।

हमारे यहां तो परंपरा है कि छोटे बच्चे को उसका चेहरा दर्पण में नहीं दिखाया जाता। मुंडन के बाद ही बच्चे को उसका चेहरा दर्पण में दिखाने की छूट होती है। इसकी वजह क्या है, यह खोज का विषय है। ऐसी भी परंपरा है कि दूल्हा जब तोरण मारने आता है तो उसे दुल्हन को सीधे नहीं दिखाया जाता। उनको एक दूसरे के दर्शन पहले दर्पण में कराए जाते हैं। इसका भी कारण जाना चाहिए। 

आज हम बड़ी आसानी से दर्पण में अपना चेहरा देख पाते हैं, लेकिन जब इसका अविष्कार नहीं हुआ था, तब ठहरे हुए पानी में चेहरा देखा जाता था। 

इसके बाद एक अन्य ब्लॉग में लिखा था कि छाया का अपना कोई अलग अस्तित्व नहीं। वह हमारी अथवा किसी वस्तु की परछाई मात्र है। उसका भला क्या महत्व हो सकता है? बात ठीक भी लगती है। मगर हमारी संस्कृति में इस पर भी बहुत काम हुआ है। शिव स्वरोदय के अनुसार सूर्य के प्रकाश में पीठ करके खड़े होने पर बनने वाली छाया पर ध्यान केन्द्रित किया  जाता है। साधना पूरी होने पर छाया की आकृतियों के अनेक निहितार्थ होते हैं। 

जिन लोगों ने तंत्र विद्या के बारे में पढ़ा अथवा सुना है, उनकी जानकारी में होगा कि तांत्रिक लक्षित परिणाम पाने के लिए पर छाया का प्रयोग करते हैं। आपने ये भी सुना होगा कि ऐसे सिद्ध भी हैं, जो आपके पीछे चलते हुए  आपकी छाया को अपने वश में कर लेते हैं और इच्छित काम आपसे करवाते हैं। 

अब चर्चा करते हैं मूल विषय पर। आखिर ये छाया पुरुष या हमजाद है क्या, है कौन? जानकार लोग बताते हैं कि हमारे शरीर में अनेक प्रकार की शक्तियां विद्यमान हैं, मगर सोयी हुई अवस्था में। हमजाद भी एक प्रकार की शक्तिशाली व मायावी शक्ति है। यदि हम उसे जागृत कर लें तो वह हमारे आदेश पर अनेक प्रकार के असंभव कार्य भी कर सकती है। ठीक उसी तरह, जैसे किस्से-कहानियों में कहा जाता है कि वश में किया हुआ जिन्न हमारे हुक्म की तामील करने को तत्पर रहता है। जैसे वह सामने वाले के पर्स में रखे रुपयों तक की जानकारी दे सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि तांत्रिक इसी शक्ति का उपयोग कर हमें चमत्कृत करते हैं। किसी दूरस्थ शिष्य की मदद के लिए उसके गुरू का संकट के समय उपस्थित होना, कदाचित इसी शक्ति का प्रयोग है।

जानकार लोग बताते हैं कि हमजाद को जागृत करने के लिए चालीस दिन की साधना की जाती है। इसके लिए या तो दर्पण में अपने प्रतिबिंब पर त्राटक किया जाता है, या फिर दीपक की ओर पीठ करने पर बनने वाली छाया पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है। इसमें अनेक प्रकार की सावधानियां रखनी होती हैं।

विशेष रूप से इस्लाम में हमजाद पर बहुत काम हुआ है। हमजाद का अमल बुलाने के लिए रोजाना ये पंक्ति 777 बार पढ़ी जाती है- लाइल्लाहा इल्ला अनता सुभानल्लाह इन्नि कुंतु मिन्ज ज़वू यावाल्लिन। यह दुआ पढऩे से पहले और बाद में दुरूद इब्राहिम पढऩा होता है।

आज के वैज्ञानिक युग में हमजाद कोरी कल्पना लग सकती है, मगर जानकार लोग बताते हैं कि हमजाद का न केवल वजूद है, बल्कि वह बहुत सारे असंभव काम कर सकता है।


शनिवार, जुलाई 04, 2026

नेत्रहीन स्मृति कैसे संग्रहित करते हैं?

नेत्रहीन स्मृति को कैसे संग्रहित करते हैं, आम तौर पर यह प्रश्न लोगों के जेहन में उठता है। इस बारे में चैट जीपीटी से सवाल किया गया तो उसका कहना था कि यह मनोविज्ञान, तंत्रिका-विज्ञान और दर्शन, तीनों से जुड़ा हुआ है। नेत्रहीन व्यक्ति के मस्तिष्क में भी चित्र बनते हैं, लेकिन उनका स्वरूप इस बात पर निर्भर करता है कि वह जन्म से नेत्रहीन है या बाद में दृष्टि खोई है। जो व्यक्ति जन्म से ही कभी देख नहीं पाया, उसके मस्तिष्क में दृश्य चित्र वैसे नहीं बनते जैसे दृष्टिवान लोगों के मन में बनते हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप लाल गुलाब सोचते हैं तो आपके मन में उसका रंग और आकार उभर सकता है। जन्मजात नेत्रहीन व्यक्ति के लिए गुलाब की स्मृति उसकी सुगंध, स्पर्श, आकार, कांटों और उससे जुड़े अनुभवों के रूप में होती है। अर्थात् उसकी मानसिक दुनिया ध्वनि, स्पर्श, गंध, स्वाद और स्थानिक अनुभवों पर आधारित होती है।

यदि कोई व्यक्ति जीवन के किसी चरण में देखने के बाद नेत्रहीन हुआ है, तो उसके मस्तिष्क में पहले से संचित दृश्य स्मृतियां बनी रहती हैं। वह वर्षों बाद भी अपने घर, परिवार या प्राकृतिक दृश्यों की कल्पना कर सकता है। कई लोग सपनों में भी चित्र देखते रहते हैं। आधुनिक न्यूरो साइंस के अनुसार स्मृति किसी फोटो एलबम की तरह नहीं रखी जाती। मस्तिष्क विभिन्न अनुभवों को न्यूरॉन्स के नेटवर्क में संग्रहित करता है। नेत्रहीन व्यक्ति भी स्मृतियों को उसी प्रकार संग्रहीत करता है, लेकिन उनमें दृश्य सूचनाओं के स्थान पर अन्य इंद्रियों से प्राप्त सूचनाएं अधिक होती हैं। उदाहरण के लिए, वह किसी व्यक्ति को उसके कदमों की आहट, आवाज, बोलने के ढंग, हाथ मिलाने के स्पर्श, या किसी विशेष सुगंध से पहचान सकता है।

अनुसंधानों से पता चला है कि जन्मजात नेत्रहीनों के मस्तिष्क का दृश्य प्रांतस्था जो सामान्यतः देखने के काम आती है, निष्क्रिय नहीं रहती। वह ब्रेल पढ़ने, ध्वनियों की पहचान करने और स्थानिक जानकारी को समझने में सहायता करने लगती है। यानी मस्तिष्क स्वयं को पुनर्गठित कर लेता है।

यह प्रश्न हमें यह भी सोचने पर विवश करता है कि चित्र वास्तव में क्या है। क्या चित्र केवल आंखों से देखा गया दृश्य है, या अनुभवों का कोई भी आंतरिक रूप? यदि दूसरा उत्तर सही है, तो नेत्रहीन व्यक्ति भी अपने मन में संसार की उतनी ही समृद्ध छवियां रचता है, बस उनका माध्यम दृष्टि नहीं, बल्कि स्पर्श, ध्वनि और अनुभूति होती है। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि नेत्रहीन व्यक्ति के मन में चित्र नहीं बनते, ऐसा नहीं है, बल्कि उसके चित्र हमारी दृश्य कल्पनाओं से भिन्न प्रकार के होते हैं।


शुक्रवार, जून 26, 2026

क्या शुभ मुहूर्त बेमानी है?

भारतीय संस्कृति में सभी कार्य शुभ मुहूर्त में ही करने की परंपरा है। ऐसा कार्य की सफलता के लिए किया जाता है। इसके प्रति लोगों में गहरी आस्था है। विवाह, भवन निर्माण, दुकान के उद्घाटन इत्यादि बड़े कार्यों में तो शुभ मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा ही जाता है, कई लोग छोटे-छोटे कार्य भी चोघडिय़ा देख कर करते हैं। यह तो हुआ तस्वीर का एक रुख। दूसरा रुख ये है कि शुभ मुहूर्त में काम आरंभ करने पर भी कई बार असफलता हाथ लगती है। यह सर्वविदित है कि लगभग हर विवाह शुभ मुहूर्त में ही होता है, कुंडलियों का मिलान किया जाता है, बावजूद इसके गृह क्लेश और संबंध विच्छेद की घटनाएं होती हैं। शुभ मुहूर्त में दुकान का आरंभ करने पर भी कई बार दुकान नहीं चलती या फिर घाटा होने पर बंद करनी पड़ती है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या शुभ मुहूर्त बेमानी है?

किसी सज्जन ने हाल ही एक पोस्ट सोशल मीडिया पर डाली, जिसका सारांश आपकी नजर पेश है- राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त में किए गए, फिर भी न वैवाहिक जीवन सफल हुआ, न ही राज्याभिषेक। जब मुनि वसिष्ठ से इसका जवाब मांगा गया तो उन्होंने साफ कह दिया-

सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेहूं मुनिनाथ। 

लाभ हानि, जीवन मरण, यश-अपयश विधि हाथ।

इसका तात्पर्य ये है कि विधि ने जो निर्धारित कर रखा है, वही होता है, चाहे आप कोई भी कार्य शुभ मुहूर्त में आरंभ करें। 

विशेष रूप से मरण के मामले में हमारा कोई दखल नहीं। वह अवश्यंभावी है। उसे टाला नहीं जा सकता। बेशक चिरंजीवी होने का वरदान तो होता है, मगर कभी न मरने का वरदान कभी किसी को नहीं मिला। यदि कोई मृत्यु से बचने के अनेक प्रकार के वरदान किसी के पास थे तो भी विधि ने उसकी मृत्यु का युक्तिसंगत रास्ता निकाल दिया। पितामह भीष्म को भले ही इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था, मगर उन्हें भी एक दिन मरना था। बस फर्क इतना था कि वे अपनी मृत्यु को टाल सकते थे। 

उस पोस्ट में यह भी लिखा है कि भगवान राम व भगवान कृष्ण को विधि अनुसार ही फल भोगने पड़े। इसी प्रकार शिव जी सती की मृत्यु को नहीं टाल सके, जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है। इसी प्रकार रामकृष्ण परमहंस भी अपने कैंसर को न टाल सके। न साईं बाबा अपनी मृत्यु को और न ईसा मसीह अपने पीड़ादायक मृत्यु को। रावण व कंस बहुत शक्ति संपन्न थे, मगर उनका अंत भी विधि ने तय कर रखा था।

प्रश्न ये उठता है कि जब सब कुछ विधि के ही हाथ है तो मुहूर्त निकलवाने की जरूरत क्या है?

ऐसा प्रतीत होता है कि विधि का विधान तो काम करता ही है, मगर किसी भी कार्य की सफलता में कई फैक्टर काम करते हैं। वस्तुतः विधि अपनी ओर से कुछ भी निर्धारित नहीं करती। वह हमारे कर्मों, काम के प्रति समर्पण, लगन, मेहनत आदि से ही गणना कर निर्धारण करती है। कदाचित पूर्व जन्म के कर्म व संस्कार भी भूमिका अदा करते हैं। शुभ समय में काम आरंभ करना भी एक फैक्टर है, मगर अकेले इससे काम नहीं चलता, अन्य फैक्टर भी काम करते हैं। इसी कारण शुभ मुहूर्त में कार्यारंभ करने पर भी कई बार असफलता हाथ लगती है। 

एक और बात ये भी लगती है कि जीवन के सोलह संस्कार व अन्य बड़े काम पूर्व कर्मों के आधार पर पहले से निर्धारित होते हैं, मगर दैनिक दिनचर्या से जुड़े छोटे-मोटे कार्य में शुभ मुहूर्त अपनी भूमिका निभाता है। इसका आप स्पष्ट अनुभव भी कर सकते हैं। चूंकि शुभ मुहूर्त का अस्तित्व माना गया है, इस कारण यह जानते हुए भी कि होगा वही जो मंजूरे खुदा होगा, हम शुभ मुहूर्त निकलवाते हैं। और सफलता नहीं मिलने पर हम यह मान कर अपने आप को संतुष्ट करते हैं कि हमारी किस्मत में नहीं था, या फिर हमसे कोई त्रुटि हो गई होगी।


बुधवार, जून 24, 2026

क्या भूत-प्रेत के पैर उलटे होते हैं?

लोकविश्वासों और कथाओं में भूत-प्रेत के पैर उलटे होने की धारणा बहुत प्रचलित है, लेकिन इसे समझना जरूरी है कि यह आस्था और लोककथा का विषय है, वास्तविकता या विज्ञान का नहीं। उत्तर भारत, राजस्थान, सिंधी लोकविश्वास और बंगाल की कथाओं में कहा जाता है कि डायन, चुड़ैल या प्रेत के पैर आगे से नहीं, पीछे की ओर मुड़े होते हैं। माना जाता है कि यह उनकी पहचान छिपाने का तरीका है, ताकि देखने वाला धोखा खा जाए। कई लोककथाओं में बताया जाता है कि यदि किसी सुंदर स्त्री के पैरों की दिशा उलटी दिखे, तो वह साधारण मनुष्य नहीं होती। वस्तुतः उलटे पैर प्रकृति-विरोध का प्रतीक हैं, यानी जो सामान्य व्यवस्था से बाहर हो। मनोवैज्ञानिक रूप से यह डर पैदा करने की एक युक्ति है, क्योंकि मनुष्य को असामान्यता से भय लगता है। समाज में यह कथा अक्सर रात, सुनसान रास्तों और अज्ञात भय से जुड़ी है।

राजस्थानी में कहा जाता है कि “जिण रात जी खामोशी में, सुंदर नारीं मिलै, ता पहिंजां पग जरूर देखिजे।” मरुधरा में कहते हैं, रात का रास्ता और औरत की मुस्कान,

दोनों पर भरोसा मत करना। राजस्थानी में कथा है कि एक बार राणावत जी देर रात खेत से लौट रहे थे। पीपल के नीचे एक गोरी-सी बाई बैठी रो रही थी। उससे पूछा “बाईसा, क्यां बात है?” वह बोली, “घर सूं बिछुड़ गई हूँ, थोड़ो साथ दे दो।” आवाज में ऐसा जादू,

कि राणावत जी आगे बढ़ गए। पर जैसे ही चाँद बादलों से निकला, नजर नीचे गई, पांव की एड़ी आगे थी, उँगलियाँ पीछे।

राणावत जी चिल्लाए, “जय माताजी!”

सिंधी में कथा है कि एक व्यापारी लखूमल ऊंटों का कारवां लेकर उजैन से लौट रहा था। रात पड़ गई। दूर एक दीपक जलता दिखा। वहीं एक स्त्री खड़ी थी। लंबे केश, काजल भरी आंखें, स्वर मीठा जैसे सिंधु की धारा। उसने कहा, “पानी पिलायो, मुसाफिर”। लखूमल का मन पिघल गया।

ज्यों ही उसने मशक नीचे रखी, नजर पैरों पर पड़ी। पैर आगे नहीं, पीछे की ओर मुड़े थे। उसके मुंह से अनायास निकला, “सांईं सच्चो!” 

तस्वीर का दूसरा पहलु यह है कि हिंदू शास्त्रों, उपनिषदों, गीता या पुराणों में कहीं भी भूत-प्रेत के उलटे पैरों का वर्णन नहीं मिलता। यह धारणा पूरी तरह लोकपरंपरा और कथाओं से आई है। जहां तक वैज्ञानिक दृश्टिकोण का सवाल है तो आज तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि किसी प्राणी के पैर उलटे हों और वह मनुष्य जैसा दिखे।


शुक्रवार, जून 19, 2026

नंगे पैर रहने से अनेकानेक लाभ

नंगे पैर रहने या चलने के कई शारीरिक, मानसिक और पारंपरिक लाभ माने गए हैं। कुछ विज्ञान से जुड़े हैं, कुछ अनुभव और संस्कृति से। नंगे पैर रहने से पैरों की मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं। जूते पैरों को सहारा देते हैं, जबकि नंगे पैर चलने से प्राकृतिक संतुलन बनता है और मांसपेशियाँ सक्रिय रहती हैं। इसके अतिरिक्त रक्त संचार बेहतर होता है। तलवों में अनेक नर्व पॉइंट्स होते हैं। जमीन से सीधा संपर्क रक्त प्रवाह को उत्तेजित करता है। साथ ही पैरों की बनावट सुधरती है। लंबे समय तक जूते पहनने से अंगुलियाँ दबती हैं। नंगे पैर रहने से पैर अपनी प्राकृतिक आकृति में रहते हैं। नंगे पैर रहने से घुटनों और कमर पर दबाव कम पडता है। सही मुद्रा बनती है, जिससे जोड़ों पर अनावश्यक तनाव घटता है। एक महत्वपूर्ण बात। मानसिक व तंत्रिका लाभ होता है। तनाव कम होता है। घास, मिट्टी या रेत पर नंगे पैर चलना (जिसे ग्राउंडिंग या अर्थिंग कहा जाता है) मन को शांत करता है। एक लाभ यह भी है कि इससे एकाग्रता बढ़ती है। शरीर और मस्तिष्क का तालमेल बेहतर होता है, जिससे ध्यान और सजगता बढ़ती है। भारतीय परंपरा में माना जाता है कि नंगे पैर रहने से शरीर की नकारात्मक ऊर्जा पृथ्वी में चली जाती है। मंदिरों में नंगे पैर जाना विनम्रता और आत्म-नियंत्रण का प्रतीक माना गया है। ध्यान रखने योग्य बातें यह हैं। बहुत गरम, ठंडी या गंदी सतह पर नंगे पैर न चलें। 

कुछ शोधों में पाया गया है कि जब शरीर के तलवे पृथ्वी की सतह से सीधे संपर्क में आते हैं, तो इससे कुछ एंटीऑक्सिडेंट- जैसे इलेक्ट्रॉनों का प्रभाव शरीर में बढ़ सकता है, जिससे सूजन से जुड़े बायोमार्कर कम होते हैं, जो शरीर में जलन और दर्द को घटा सकते हैं। एक अध्ययन में पाया गया कि ग्राउंडिंग के एक सत्र (लगभग 1 घंटे) के बाद रक्त की मोटाई कम हो सकती है। इसका मतलब बेहतर रक्त प्रवाह और संभावित रूप से दिल पर सकारात्मक असर पडता है। कुछ शोध बताते हैं कि पृथ्वी के संपर्क से कॉटिसोल (तनाव-हार्मोन) का स्तर संतुलित हो सकता है और स्लीप-वेक चक्र में सुधार हो सकता है, जिससे नींद बेहतर होती है।


गुरुवार, जून 18, 2026

नाम में बहुत कुछ रखा है

कर्म प्रधान लोगों को आपने अमूमन यह कहते हुए देखा होगा कि नाम में क्या रखा है, काम ही महत्वपूर्ण है। जो कर्मठ हैं, उनकी यह सोच बिलकुल सही है। वे काम इसलिए करते हैं कि इससे उनको आत्म संतोष मिलता है, सुकून मिलता है। उन्हें इस बात की कोई फिक्र नहीं होती कि उनका नाम हो रहा है या नहीं। लोग वाहवाही कर रहे हैं या नहीं। उन्हें तो अपने कर्तव्य पालन से ही मतलब होता है। आपने यह भी देखा होगा कि कई लोग प्रसिद्धि की चाह के बिना परोपकार करते हैं। ये नहीं देखते कि कोई देख भी रहा है या नहीं। हमारे यहां तो यह तक कहा जाता है कि एक हाथ से दान दें तो दूसरे हाथ को पता नहीं लगना चाहिए, वही असली दान है। इसके विपरीत अधिसंख्य लोग प्रसिद्धि की चाह में ही काम करते हैं। तभी तो कहा जाता है कि संन्यस्थ हो कर वन को प्रस्थान कर जाने वाले भी लोकेषणा से मुक्त नहीं हो पाते। गृहस्थी छोड़ कर एकांत में जा कर रहने वाले भले ही भौतिक सुख से परे हो जाते हों, मगर जंगल में भी उनका आत्मिक पोषण इससे होता है कि उनके शिष्य कितने हैं। उनका नाम कितना हो रहा है। इसको लेकर संतों के बीच प्रतिस्पर्द्धा तक होती है।

वस्तुतः प्रथम महिमा काम की ही है। तभी तो कहते हैं कि काम बोलता है। बोलता है अर्थात नाम की स्थापना करता है। यानि कि काम का बाय प्रोडक्ट है नाम। मगर इसका ये भी अर्थ नहीं कि नाम का कोई महत्व नहीं। भले ही दूसरे नंबर पर हो, मगर नाम की भी भारी महिमा है। विद्वान कहते हैं कि कलियुग में भगवान अवतार रूप में तो हैं नहीं, ऐसे में उनके नाम की ही महिमा है। राम से बड़ा राम का नाम। उनका नाम लेने व स्मरण करने मात्र से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। भगवान राम के नाम का कितना चमत्कार है, इसका उल्लेख यह बताते हुए कहा जाता है कि लंका विजय के लिए जाते समय समुद्र को लांघने के लिए जो पुल बनाया गया, उनमें इस्तेमाल किए गए पत्थरों पर राम नाम लिखा गया और वे पानी में तैरने लगे।

नाम की महिमा का दूसरा उदाहरण देखिए। जब गुरू द्रोणाचार्य ने एकलव्य को शिष्य बनाने से इंकार कर दिया तो उसने एकांत में उनके नाम से एक प्रतिमा बनाई और उसी के सामने धनुर्विद्या सीखी। एकनिष्ठ भाव के कारण वह अर्जुन से भी अधिक योग्य धनुर्धर बना।

नाम स्मरण का एक चमत्कार यह भी माना जाता है कि कोई शिष्य जब एकाग्रता के साथ दिवंगत गुरू का नाम स्मरण करता है तो वे सशरीर तो आ नहीं सकते, मगर गंध के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं।

कल्याण नामक पत्रिका में मैने एक दृष्टांत पढ़ा था। वह इस प्रकार है। एक बार हनुमानजी का एक भक्त, जो कि शिक्षक था, प्रातरूकाल हनुमानजी की आराधना में इतना तल्लीन हो गया कि उसे स्कूल पहुंचने में देर हो गई। वह भागता-भागता स्कूल पहुंचा और प्रधानाध्यापक से क्षमा याचना की कि वह विलंब से आया है। इस पर प्रधानाध्यापक ने कहा कि क्यों मजाक करते हो, आप तो समय पर आ गए थे। हनुमानजी का भक्त चकित रह गया। वह समझ गया कि उसकी जगह हनुमानजी ने उपस्थिति दर्ज करवाई है।

हालांकि दुराचार के मामले में आसाराम बापू आजकल जेल में हैं, मगर जब वे प्रसिद्धि के चरमोत्कर्ष पर थे, तब उनकी सभाओं में उनके अनुयायी अपना अनुभव बताते थे कि संकट के समय उन्होंने आसाराम बापू को याद किया और वे किसी न किसी रूप में वहां मौजूद हुए और उन्हें संकट से उबारा।

जरा और विस्तार में जाएं तो आपने देखा होगा कि कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करने से पहले गुरू के नाम का स्मरण करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इससे उनके गुरू की शक्ति उनमें प्रविष्ठ कर जाती है। मैने ऐसी कई महिलाओं को देखा है, जो कोई व्यंजन विशेष बनाने से पहले उसको याद किया करती हैं, जिनसे उन्होंने वह व्यंजन बनाना सीखा था। मैने स्वेटर की बुनाई शुरू करते वक्त महिलाओं को अपनी गुरू को याद करते हुए देखा है। कई रसोइये भी अपने गुरू का नाम स्मरण करके रसोई बनाना आरंभ करते हैं। हो सकता है ऐसा सम्मान देने या कृतज्ञता प्रकट करने के लिए किया जाता हो, मगर माना यही जाता है कि नाम का स्मरण करने से शक्ति मिलती है।

नाम के एक मायने ब्रांड भी होता है। नाम स्थापना के लिए बाकायदा ब्रांडिंग की जाती है। कई प्रॉडक्ट ब्रांडिंग के कारण ही मार्केट में छाये हुए हैं। इसका एक उदाहरण बाबा रामदेव हैं। उनकी ब्रांडिंग इतनी तगड़ी है कि पतंजलि के नाम से उनके प्रॉडक्ट धड़ल्ले से बिकते हैं। ठीक इसी प्रकार मोदी भी एक नाम है, जो कि ब्रांड बन गया है। इसके लिए ढ़ेर सारे जतन किए गए थे। उनके नाम से भाजपा की नैया पार लग गई। भाजपा सरकार के दुबारा प्रचंड बहुमत से सत्ता में आने का सारा श्रेय मोदी ब्रांड को ही जाता है।

इन सभी उदाहरणों से यह सिद्ध होता है कि नाम की वाकई महिमा है। किसी का नाम लेकर काम करने से उनकी शक्ति भी काम करती है। जो इंसान सिद्ध, साहसी, धार्मिक या शुभ-फलदायी हो, उसका नाम लेने से उसके गुण काम में उतरते हैं। किसी मुश्किल काम से पहले बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि फलाँ का नाम लेके जा, काम बन जाएगा।


रविवार, जून 07, 2026

देवी-देवताओं के वाहन पशु-पक्षी

देवी और देवता 33 प्रकार के होते हैं। प्रत्येक देवी और देवता का एक वाहन होता है। देवी-देवताओं ने अपने वाहन के रूप में कुछ पशु या पक्षियों को चुना है, तो इसके पीछे उनकी विशिष्ठ योग्यता ही रही है। अध्यात्मिक, वैज्ञानिक और व्यवहारिक कारणों से भारतीय मनीषियों ने भगवानों के वाहनों के रूप में पशु-पक्षियों को जोड़ा है। यह भी माना जाता है कि देवताओं के साथ पशुओं को उनके व्यवहार के अनुरूप जोड़ा गया है। अगर पशुओं को भगवान के साथ नहीं जोड़ा जाता तो शायद पशु के प्रति हिंसा का व्यवहार और ज्यादा होता। भारतीय मनीषियों ने प्रकृति और उसमें रहने वाले जीवों की रक्षा का एक संदेश दिया है। हर पशु किसी न किसी भगवान का प्रतिनिधि है, उनका वाहन है, इसलिए इनकी हिंसा नहीं करनी चाहिए।

ग्रंथों के अनुसार विष्णु का वाहन गरुड़ है। माना जाता है कि गिद्धों (गरुड़) की एक ऐसी प्रजाति थी, जो बुद्धिमान मानी जाती थी और उसका काम संदेश को इधर से उधर ले जाना होता था, जैसे कि प्राचीनकाल से कबूतर भी यह कार्य करते आए हैं। प्रजापति कश्यप की पत्नी विनता के 2 पुत्र हुए- गरुड़ और अरुण। गरुड़जी विष्णु की शरण में चले गए और अरुणजी सूर्य के सारथी हुए। सम्पाती और जटायु इन्हीं अरुण के पुत्र थे।

मां लक्ष्मी का वाहन उल्लू है। पश्चिमी मान्यता अनुसार किस व्यक्ति को मूर्ख बनाना अर्थात उल्लू बनाना कहा जाता है। इसका यह मतलब कि मूर्ख व्यक्ति को उल्लू समझा जाता है, लेकिन यह धारणा गलत है। उल्लू सबसे बुद्धिमान निशाचारी प्राणी होता है। उल्लू को भविष्य का ज्ञान पहले से ही हो जाता है। उल्लू को भारतीय संस्कृति में शुभता और धन संपत्ति का प्रतीक माना जाता है। 

मां सरस्वती का वाहन हंस है। हंस पवित्र, जिज्ञासु और समझदार पक्षी होता है। इसकी खासियत हैं कि यह अन्य पक्षियों की अपेक्षा सबसे ऊंचाई पर उड़ान भरता है और लंबी दूरी तय करने में सक्षम होता है। जो ज्ञानी होते हैं वे हंस के समान ही होते हैं और जो बुद्धत्व प्राप्त कर लेते हैं, उनको परमहंस कहा गया है। मां सरस्वती का हंस पर विराजमान होना यह बताता है कि ज्ञान से ही जिज्ञासा को शांत किया जा सकता है। ज्ञान से ही जीवन में पवित्रता, नैतिकता, प्रेम और सामाजिकता का विकास होता है।

शिव का वाहन नंदी बैल है। शिव के एक गण का नाम है नंदी। प्राचीनकालीन किताब कामशास्त्र, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और मोक्षशास्त्र में से कामशास्त्र के रचनाकार नंदी ही थे। विश्व की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं में बैल को महत्व दिया गया है। जिस तरह गायों में कामधेनु श्रेष्ठ है उसी तरह बैलों में नंदी श्रेष्ठ है। वह बल और शक्ति का भी प्रतीक है। बैल को मोह-माया और भौतिक इच्छाओं से परे रहने वाला प्राणी भी माना जाता है। यह सीधा-साधा प्राणी जब क्रोधित होता है तो सिंह से भी भिड़ लेता है। यही सभी कारण रहे हैं, जिसके कारण भगवान शिव ने बैल को अपना वाहन बनाया। शिवजी का चरित्र भी बैल समान ही माना गया है। मां पार्वती का वाहन बाघ है, तो मां दुर्गा का वहन शेर। माता दुर्गा को शेरावाली कहा जाता है।

स्कंद पुराण के तमिल संस्करण कांडा पुराणम में उल्लेख है कि देवासुर संग्राम में भगवान शिव के पुत्र मुरुगन (कार्तिकेय) ने दानव तारक और उसके दो भाइयों सिंहामुखम एवं सुरापदम्न को पराजित किया था। अपनी पराजय पर सिंहामुखम माफी मांगी तो मुरुगन ने उसे एक शेर में बदल दिया और अपना माता दुर्गा के वाहन के रूप में सेवा करने का आदेश दिया। 

यमराज का वाहन भैंसा है। भैंसे का रूप जिस तरह से भयानक होता है उसी तरह यमराज का रूप भी भयानक है। अतः यमराज उसको अपने वाहन के तौर पर प्रयोग करते हैं।

देवी गंगा का वाहन मगरमच्छ है। सिंधु, गंगा, नर्मदा, ब्रह्मपुत्र, कावेरी आदि नदियों में जल में विचरण करने वाला प्रमुख प्राणी मगरमच्छ ही है।

बहुत कम लोगों को पता होगा कि शनिदेव की सवारी कौवा या गिद्ध ही नहीं बल्कि पूरे 9 सवारी शनिदेव की है। जैसे- गिद्ध, घोड़ा, गधा, कुत्ता, शेर, सियार, हाथी, मोर और हिरण हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि शनिदेव जिस वाहन पर सवार होकर जिसके पास भी जाते हैं, वह व्यक्ति उसी के हिसाब से फल का उत्तरदायी होता है। हालांकि कौवे को उनकी मुख्य सवारी माना जाता है।

भगवान भैरव का वाहन कुत्ता माना जाता है। हालांकि भगवान भैरव ने इसे अपना वाहन तो नहीं बनाया, लेकिन वे हमेशा इसे अपने साथ रखते हैं। मान्यता है कि कुत्ते को भोजन देने से भैरव महाराज प्रसन्न होते हैं और हर तरह के आकस्मिक संकटों से वे भक्त की रक्षा करते हैं। हनुमानजी पिशाच को अपना आसन बनाकर उस पर बैठते हैं।

गणेष जी का वाहन मूषक अर्थात चूहा है। इसकी विशेषता है कि वह हर चीज को कुतर डालता है। वह यह नहीं देखता की वस्तु आवश्यक है या अनावश्यक। इसी प्रकार कुतर्की भी यह विचार नहीं करते की यह कार्य शुभ है या अशुभ। श्रीगणेश बुद्धि एवं ज्ञान के देवता हैं तथा कुतर्क मूषक है, जिसे गणेशजी ने अपने नीचे दबा कर अपनी सवारी बना रखा है। कार्तिकेय का वाहन मयूर है। इंद्र ने अपना वाहन ऐरावत नामक एक हाथी को बनाया। समुद्र मंथन के दोरान 14 रत्नों में से एक ऐरावत की भी उत्पत्ति हुई थी। हाथी शांत, समझदार और तेज बुद्धि का प्रतीक है।


शनिवार, जून 06, 2026

पीछे से आवाज क्यों नहीं दी जाती?

हम सब जानते हैं कि जब भी कोई किसी काम से रवाना होता है तो जाते समय उसको पीछे से आवाज नहीं दिया करते। इसे अपशकुन माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि पीछे से आवाज देने पर उस कार्य के संपन्न होने में संशय उत्पन्न हो जाता है, जिसके लिए वह निकला है। इसके अतिरिक्त इसे किसी अनिष्ट की आशंका का संकेत भी माना जाता है। सलाह यही दी जाती है कि रवाना होने की बजाय कुछ पल ठहर लिया जाए। उस वक्त को टाल दिया जाए। यानि कि घर आ कर कुछ पल वापस पलंग या कुर्सी पर बैठा जाए या फिर पानी का एक गिलास पी लिया जाए। उसके बार रवाना हुआ जाए।

जरा गहराई में जाएं तो पाएंगे कि यकायक पीछे से आवाज देने का भाव हमारे मन में प्रकृति ही पैदा करती है। अर्थात जिस पल में वह भाव उत्पन्न होता है, वह किसी काम के निकलने के लिए उचित नहीं होता। प्रकृति उसे टाले जाने की सलाह दे रही होती है। अगर हम उसे अनसुना करते हैं तो उसका परिणाम विपरीत आ जाता है।

अगर इसको अंध विश्वास भी मान लें तो भी काम की सफलता इस कारण संदिग्ध हो जाती है, क्यों कि हमारे मन में यह धारणा पहले से बैठी हुई है कि पीछे से आवाज आई है, यानि कि कुछ गड़बड़ होगी ही, हमारी आत्मशक्ति में कुछ कमजोरी आ जाती है। हम वह कार्य उतने मनोयोग से नहीं कर पाते, जितने से किये जाने की जरूरत होती है। और वाकई काम ठीक से पूरा नहीं होता।

कई बार ऐसा भी होता है कि जैसे ही कोई रवाना होता है, और यकायक हमारे मन में उसे किसी बात की याद दिलाने का ख्याल आता है, मगर चूंकि हम मानते हैं कि पीछे से आवाज देना ठीक नहीं है, हम अपने आपको रोक लेते हैं और व्यक्ति को जाने देते हैं और पाते हैं कि वह स्वतः ही कुछ पल बाद वापस चला आता है, चूंकि तब तक टेलीपैथी से उसके मस्तिष्क में हमारा मस्तिष्क लौटने का संकेत भेज चुका होता है। ऐसा भी होता है कि भले ही हमने अपने आप को टोकने से रोक लिया हो फिर भी काम बिगड़ जाता है। इसका सीधा अर्थ है कि प्रकृति ने तो हमें संकेत दिया था, मगर हमने ही या तो अनसुना कर दिया या फिर बलात खुद को रोक दिया।

ऐसा नहीं कि केवल अन्य व्यक्ति के मन में ही पीछे से आवाज देने का भाव आता है, कई बार हम खुद काम के लिए निकलते हुए महसूस करते हैं कि पीछे से आवाज आ रही है, कुछ अधूरा-अधूरा सा है, या फिर हम कुछ भूल रहे हैं। कई बात तो दिमाग पर जोर डालने पर पकड़ लेते हैं कि हम क्या भूल रहे हैं, मगर कई बार ऐसा नहीं हो पाता। मजे की बात ये है कि क्या भूल रहे हैं, यह घर के भीतर जा कर उसी स्थान पर खड़े होने पर ही याद आता है, जहां से हमारे विचार या दृश्य की शृंखला टूटी है। ऐसा भी होता है कि लाख याद करने पर भी हमें याद नहीं आता तो हम काम के लिए रवाना हो जाते हैं और गन्तव्य स्थान पर पहुंचने के बाद ही पता लगता है कि अमुक चीज भूल गए।

सच में प्रकृति ने हमें मस्तिष्क नामक गजब का सुपर कंप्यूटर दिया है, जो अपने आस-पास से संकेत ग्रहण करता है और संकेत प्रेषित भी करता है। वैज्ञानिक भी इसे स्वीकार करने लगे हैं। हालांकि वे इसका वैज्ञानिक विवेचन नहीं कर पाते, मगर इसे टेली रेस्पोंस पॉवर के नाम से संबोधित करते हैं। टेली रेस्पोंस पॉवर के अनेक सफल प्रयोग हो चुके हैं। यह पूर्ण प्रमाणिक विज्ञान नहीं है, चूंकि यह हमारी मानसिक शक्ति पर निर्भर करता है। यह हमारे संदेश प्रसारण की क्षमता व संदेश ग्रहण करने की पात्रता पर निर्भर करता है। टेली रेस्पोंस पॉवर पर फिर कभी विस्तार से चर्चा करेंगे।

इस संदर्भ में चैट जीपीटी बताता है कि पीछे से किसी को आवाज देना असभ्यता माना जाता है, सामने से बुलाना सम्मान और शालीनता का प्रतीक है। पीछे से पुकारना ऐसे लगता है जैसे आदेश दिया जा रहा हो, अनुरोध नहीं। बुजुर्गों, गुरुओं या सम्मानित व्यक्तियों को पीछे से आवाज देना विशेष रूप से अनुचित माना गया है।

मनोवैज्ञानिक दृश्टि से पीछे से अचानक आवाज आने पर व्यक्ति चौंक सकता है। भय, असहजता या भ्रम पैदा हो सकता है। यह असुरक्षा की भावना जगाता है। कई परंपराओं में पीछे से आवाज देने को अशुभ या अमंगल संकेत माना गया है। कुल मिला कर पीछे से आवाज देना सिर्फ एक आदत नहीं, बल्कि असभ्यता, असावधानी और अशिष्ट व्यवहार का प्रतीक माना गया है, इसलिए कहा गया है कि “पीछे से आवाज नहीं दी जाती।”


सोमवार, मई 25, 2026

दो कोडी की कोडी है बेशकीमती जनाब

 

आपने कोडी देखी होगी। यूं तो उसकी कोई कीमत नहीं मानी जाती, मगर है वह बेषकीमती। आइये, जानते हैं कि वह अनूठी और बेषकीमती कैसे है। आज भले ही मुद्रा के रूप में सिक्के चलन में है, मगर पुराने समय में उसका उपयोग सिक्के के रूप में प्रयोग होता था। विवाह, पूजा, तांत्रिक साधनाओं, खेल-कूद, जैसे चौपड़ आदि में भी उसका उपयोग होता रहा है। कुछ पारंपरिक खेलों में कोड़ियां फेंककर अंक निकाले जाते थे। कोड़ी कई खेल जैसे चौसर और चंग पो में इस्तेमाल होती है। वैसे आम बोलचाल में उसकी कीमत अत्यंत सस्ती मानी जाती है, जिसका मूल्य नगण्य है। तभी तो किसी के लिए यह कहा जाता है कि यह तो कोड़ी भर भी कीमत नहीं रखता। या यह तो दो कोडी का आदमी है। कोड़ी को लेकर आपने बहुत सी कहावतें सुनी होंगी, जैसे दो कोड़ी की औकात ना होना, कल के हजार से आज की कौड़ी अच्छी, पैसा न कोड़ी-बाजार जाए दौड़ी, कोड़ी-कोड़ी पर जान देना, दूर की कौड़ी, कोड़ी के भाव बिकना।

वस्तुतः कोडी एक तरह का छोटा सा समुद्री शंख है, जो छोटा, चिकना, गोलाई लिए हुए होता है। कोड़ी समुद्र से निकले एक जीव का आवरण है, जिसे वह मर जाने के बाद छोड़ देता है। कोड़ी कई रंगों में मिलती है जैसे सफेद, पीली और हरी। समुद्र से निकलने के कारण इसे लक्ष्मी का रूप भी माना जाता है। इसलिए कुछ लोग इसे लक्ष्मी कोडी भी कहते हैं। इसका इस्तेमाल पुराने जमाने में धन  और सामान के अदल-बदल में पैसे के रूप में भी किया जाता था। लक्ष्मी के पूजन में कोड़ी रखी जाती है। तांत्रिक भी इस इस्तेमाल बहुधा जादू-टोने में किया करते हैं। वषीकरण, अर्थात किसी को बस में करने के लिए कोड़ी ब्रह्मास्त्र का काम करती है। एक टोटका है कि कोई पैसा न लौटाए तो 3 कोड़ी उसके घर के सामने फेंक देते हैं या जमीन में दबा देते हैं। इसके अतिरिक्त सजावट और भगवान की आंख बनाने में भी कोड़ी का इस्तेमाल किया जाता है।

पुराने जमाने में एक नई और साफ-सुथरी कोड़ी तीन फूटी कोड़ी के बराबर मानी जाती थी। दस कोड़ी देने पर एक दमड़ी (तांबे का सिक्का) मिलती थी। दो दमड़ी देने पर एक धेला मिलता था। एक धेले के बदले में डेढ पाई मिलती थी। तीन पाई का एक पैसा और चार पैसे के बराबर एक आना होता था। सोलह आने के बराबर 64 पैसे होते थे। उसकी कीमत एक रुपया होती थी। आज भले ही एक रुपए की कोई कीमत नहीं रही, मगर कोड़ी आज भी अनमोल है। दिलचस्प बात है कि अजमेर में आज भी दरगाह इलाके में इसका उपयोग किया जाता है। 

कोड़ी, जिसे आम बोलचाल में हम अक्सर तुच्छ मानकर “दो कोड़ी का” कहकर किसी की अवहेलना कर देते हैं, वास्तव में अपनी प्रकृति, इतिहास और उपयोग में बेहद अनूठी और बेशकीमती रही है। आपने कोड़ी अवश्य देखी होगीकृछोटी, चिकनी, गोलाई लिए हुए समुद्र की लहरों से निकली यह सुंदर सी वस्तु कभी मुद्रा, कभी पूजन सामग्री, कभी तांत्रिक साधना और कभी खेल-कूद का अभिन्न हिस्सा रही है। आज भले ही सिक्कों और नोटों ने मुद्रा का स्थान ले लिया हो, लेकिन पुराने समय में कोड़ी का आर्थिक और सामाजिक महत्व आश्चर्यजनक रूप से बड़ा था।

दिलचस्प तथ्य यह भी है कि अजमेर के दरगाह क्षेत्र में आज भी कोड़ी का उपयोग देखने को मिल जाता है। यह इस बात का प्रमाण है कि कोड़ी केवल एक समुद्री वस्तु नहीं, बल्कि भारत की परंपरा, अर्थव्यवस्था, आस्था और लोकजीवन का जीवित प्रतीक है। जो वस्तु कभी मुद्रा, श्रद्धा, शक्ति और खेलकृचारों रूपों में उपयोगी रही, वह वास्तव में “बेशकीमती” ही कही जा सकती है, चाहे हम उसे दो कोड़ी की ही क्यों न कहें।

शुक्रवार, मई 22, 2026

क्या गायब हुआ जा सकता है?

 गायब या अंतर्ध्यान शब्द के मायने है, अदृश्य होना। इसका उल्लेख आपने शास्त्रों, पुराणों आदि में सुना होगा। अनेक देवी-देवताओं, महामानवों व ऋषि-मुनियों से जुड़े प्रसंगों में इसका विवरण है कि वे आह्वान करने पर प्रकट भी होते हैं, साक्षात दिखाई देते हैं और अंतर्ध्यान भी हो जाते हैं। मौजूदा वैज्ञानिक युग में यह वाकई अविश्वनीय है। विज्ञान आज तक भी इस पुरातन कला को समझ नहीं पाया है। हालांकि कुछ वैज्ञानिकों ने इस पर काम किया है और सिद्धांततः यह मानते हैं कि ऐसा संभव है, मगर कोई भी ऐसा कर नहीं पाया है। बताते हैं कि ओशो ने दुनिया के चंद शीर्ष वैज्ञानिकों की टीम बना कर इस पर काम किया था और उन्हें पूरी उम्मीद थी कि कामयाबी मिल जाएगी।

इस बारे में उपलब्ध जानकारी के अनुसार वैज्ञानिक नैनो किरणों पर काम कर रहे हैं। इस सिलसिले में एक लबादा बनाने की कोशिश की जा रही है, जिसे पहनने के बाद उस पर नैनो किरणें डालने पर दिखाई देना बंद हो जाता है। कुछ वैज्ञानिक इस पर भी काम कर रहे हैं कि विशेष तापमान व दबाव यदि मनुष्य के आसपास क्रियेट किया जाए तो वह अदृश्य हो सकता है। कुछ प्रयोग कनाडा, जापान और अमेरिका में चल रहे हैं। जापान के वैज्ञानिक डॉ. सुसुमु ताची ने ऐसा “इनविजिबिलिटी क्लोक” बनाया था, जो कैमरा और प्रोजेक्टर से पीछे की पृष्ठभूमि को आगे दिखा देता है। यानी पहनने वाला लगभग गायब सा दिखाई देता है। यह तकनीक कुछ सैन्य वाहनों और ड्रोन में प्रयोग की जा रही है। यह परिवेश के रंग और प्रकाश को नकल कर आंखों को भ्रमित करती है।

जानकारी के अनुसार एक उपकरण बनाया जा चुका है, जिसके भीतर रखी वस्तु एक दिशा से तो दिखाई देती है, मगर दूसरी दिशा से नहीं दिखाई देती। एक उपकरण, जिसका नाम फोटोनिक क्रिस्टल बताया गया है, वह वस्तुओं को दिखाई देने में बाधक बनता है, अर्थात अदृश्य कर देता है। प्रसंगवश एक शब्द ख्याल में आता है- मृग मरीचिका। कहते हैं न कि रेगिस्तान में तेज धूप में किरणों की तरंगों में दूर से हिरण को ऐसा आभास होता है कि वहां समुद्र है या पानी है, जबकि वास्तव में ऐसा होता नहीं है। अर्थात हिरण को दृष्टि भ्रम होता है। हो सकता है कि कल इसी प्रकार का दृष्टि भ्रम बना कर आदमी को अदृश्य किया जा सके। 

एक जानकारी ये भी है कि देवी देवता सशरीर प्रकट हो सकते हैं, जो कि पंचमहाभूत से बने हैं, मगर अन्य आत्माएं वायु अथवा प्रकाश के रूप में विचरण करती हैं और उसका आभास भी करवा सकती हैं। भारतीय ग्रंथों में कई पात्रों के अदृश्य होने का उल्लेख मिलता है। जैसे हनुमानजी, जो इच्छा से आकार बदल सकते थे (सूक्ष्म रूप धारण करना)। बताते हैं कि हिमालय की पहाडियों में एक जड़ी पाई जाती है, जिसे मुंह में रखने पर आदमी दिखाई देना बंद हो जाता है। मगर इसके भी प्रमाणिक उदाहरण हमारे संज्ञान में नहीं हैं। इसी प्रकार जनश्रुति है कि एक पक्षी विशेष का पंख अपने पास रखने वाला व्यक्ति दूसरों को दिखाई नहीं देता, मगर इसके भी पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं।

गायब हो जाने के संबंध में कुछ रहस्यमयी किस्से जानकारी में आए हैं। बताते हैं कि एक महिला क्रिस्टीन जांसटन और उनके पति एलन जांसटन 1975 की गर्मियों में उत्तरी धु्रव की यात्रा पर गए थे। वहां एलन अचानक गायब हो गए। बाद में पुलिस तेज घ्रांण शक्ति वाले कुत्ते ले कर खोजने गई तो जिस स्थान से एलन गायब हुए थे, वहां पर आ कर कुत्ते रुक गए। 

एक किस्सा ये भी है। अमेरिका के टेनेसी स्थित गैलेटिन के निवासी डेविड लांग 23 सितम्बर, 1808 को दोपहर में घर से बाहर निकले। उनकी मुलाकात उनके एक न्यायाधीश मित्र आगस्टस पीक से हुई। शिष्टाचार के बाद जैसे ही डेविड लांग आगे बढ़ा तो वह अचानक गायब हो गया।

इसी प्रकार पूरी बस्ती ही गायब होने का भी किस्सा है। घटना अगस्त 1930 की बताई जाती है। कनाडा के चर्चिल थाने के पास अंजिकुनी नामक एस्किमो की बस्ती थी। एक दिन अचानक पूरी बस्ती के लोग न जाने कहां गायब हो गए। 

इसी प्रकार 1885 में वियतनाम में सैनिकों की छह सौ सैनिकों की एक टुकड़ी ने सेगॉन शहर की ओर कूच किया। कोई एक मील दूर जाने पर वह पूरी टुकड़ी गायब हो गई। आज तक उस रहस्य से पर्दा नहीं उठ पाया है। अनुमान यही लगाया गया कि धरती से इतर कोई और ग्रह है, जहां के प्राणी लोगों को पकड़ कर ले जाते हैं।

वस्तुओं के गायब हो जाने के किस्से भी आम हैं। आप के साथ भी ऐसा हो चुका होगा। जैसे किसी स्थान विशेष पर रखी वस्तु आप लेने जाते हैं तो वह वहां नहीं मिलती। आपको अचरज होता है कि वह कहां गायब हो गई। कुछ समय बाद जब फिर देखते हैं तो वह वहीं मिल जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह कुछ समय के लिए गायब हो जाती है। ऐसा भ्रम की वजह से भी हो सकता है।

आपने ऐसे मदारियों को भी करतब दिखाते हुए देखा होगा कि वे गुलाब जामुन या कोई मिठाई मांगने पर हवा में हाथ धुमा कर वह वस्तु पेश कर देते हैं। हालांकि यह ऐसे जादू के रूप में माना जाता है, जिसके पीछे कोई तकनीक काम करती है, जबकि आम मान्यता है कि मदारी कुछ समय के लिए मांगी गई वस्तु किसी दुकान या ठेले से मंगवाते हैं और कुछ समय बाद वह वस्तु वापस वहीं पहुंच जाती है, जहां से मंगाई गई है।


मंगलवार, मई 19, 2026

हनुमान जी की भिन्न मुद्राओं की उपासना के भिन्न फल

 ऐसी मान्यता है कि हनुमान जी की विभिन्न मुद्राओं की उपासना के भिन्न-भिन्न फल प्राप्त होते हैं। उनकी प्रत्येक मुद्रा एक विशेष गुण, शक्ति या आशीर्वाद का प्रतीक होती है। हनुमान जी की उपासना भक्त की निष्ठा और भाव पर निर्भर करती है। उनकी किसी भी मुद्रा में ध्यान और भक्ति से उपासना करने पर इच्छित फल प्राप्त होता है।

विद्वान बताते हैं कि हनुमान जी की वीर मुद्रा उनके वीर और पराक्रमी रूप का प्रतीक है, जिसमें वे युद्ध के लिए तैयार मुद्रा में दिखते हैं। इसकी उपासना से साहस और शक्ति में वृद्धि होती है। शत्रु पर विजय मिलती है। जीवन के कठिन संघर्षों में सफलता प्राप्त होती है।

हनुमान जी की भक्त मुद्रा भक्ति और समर्पण का प्रतीक है। इस मुद्रा में हनुमान जी भगवान राम और माता सीता के चरणों में समर्पित रहते हैं। इसकी उपासना से सच्ची भक्ति और समर्पण का विकास होता है। मन की शांति प्राप्त होती है। ईश्वर के प्रति श्रद्धा और प्रेम बढ़ता है।

हनुमान जी की ज्ञान मुद्रा विद्या और ज्ञान का प्रतीक है। इस मुद्रा में हनुमान जी अपने हाथ में ग्रंथ धारण किए हुए होते हैं।

इस मुद्रा की उपासना से विद्या, बुद्धि और स्मरण शक्ति का विकास होता है। विद्यार्थियों और विद्वानों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है। इससे आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है।

हनुमान जी की पंचमुखी मुद्रा सर्वत्र रक्षा का प्रतीक है। इस मुद्रा में हनुमान जी के पांच मुख होते हैं - नरसिंह, गरुड़, वराह, हयग्रीव और हनुमान।

इस मुद्रा की उपासना से हर दिशा में सुरक्षा प्राप्त होती है। नकारात्मक शक्तियों और बुरी नजर से रक्षा होती है। बाधाओं और संकटों से मुक्ति मिलती है। हनुमान जी की आशीर्वाद मुद्रा करुणा और कृपा का प्रतीक है।

इस मुद्रा में हनुमान जी अपने दाहिने हाथ से आशीर्वाद देते हैं। इस मुद्रा की उपासना से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। मानसिक और शारीरिक समस्याओं से छुटकारा मिलता है। भक्त के सभी कार्य सफल होते हैं।

हनुमान जी की उड़ान मुद्रा द्रुत गति और साहस का प्रतीक है।

इस मुद्रा में हनुमान जी गदा और पर्वत लेकर आकाश में उड़ते हुए दिखाई देते हैं। इस मुद्रा की उपासना से कार्यों में तेजी और सफलता प्राप्त होती है। समय पर समस्याओं का समाधान होता है। जीवन के संकट दूर होते हैं।

हनुमान जी की लालित्य मुद्रा सेवा और समर्पण का प्रतीक है। इस मुद्रा में हनुमान जी भगवान राम और माता सीता के प्रति सेवा भाव में दिखते हैं। इसकी उपासना से सेवा और परोपकार का भाव बढ़ता है। परिवार और समाज में आदर और प्रेम प्राप्त होता है। आध्यात्मिक उन्नति होती है।

धार्मिक दृष्टि से यह आस्था और श्रद्धा का विषय है, जबकि मनोवैज्ञानिकों का मत है कि यह सब हमारी धारणा का ही परिणाम है। जैसी हमारी आंतरिक धारणा होती है, वैसा ही हमें फल प्राप्त होता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो यह सब व्यक्ति की मानसिक धारणा और आत्मसुझाव अर्थात ऑटो सजेशन का परिणाम है। जिस रूप की उपासना करते हुए व्यक्ति अपने मन में जो भाव उत्पन्न करता है, वही भाव उसकी चेतना पर गहरा प्रभाव डालता है।

मनोविज्ञान यह मानता है कि मनुष्य का व्यवहार और निर्णय उसकी अवचेतन धारणा से प्रभावित होता है। अतः हनुमान जी की उपासना, वस्तुतः, व्यक्ति के भीतर सकारात्मक भावनाओं और मानसिक ऊर्जा को सक्रिय करने का साधन बन जाती है।

सोमवार, मई 18, 2026

मृत्यु होने पर घर को बारह दिन अशुभ क्यों मानते हैं?

मृत्यु पर घर को 12 दिन अशुभ क्यों मानते हैं? ऐसा ही किसी का जन्म होने पर भी होता है। इसका धार्मिक और परंपरागत कारण ये है कि मृत्यु के बाद 10-12 दिन ‘अशौच’ (सूतिक मृतक-अपवित्रता) की अवधि कहलाता है। इसके पीछे विचार यह है कि जीवन और मृत्यु को संसार का महान संक्रमण (ट्रांजिशन) माना गया है। मृत्यु के तुरंत बाद परिवार शोक की अवस्था में रहता है, इसलिए वे धार्मिक कर्मकांडों या शुभ कार्यों से दूर रहते हैं। इसके अतिरिक्त पितृलोक की यात्रा, प्रेत-शांति और आत्मा की स्थिरता के लिए संस्कारिक समय दिया जाता है। इस अवधि के दौरान पुरोहित द्वारा शुद्धिकरण, तर्पण, पिंडदान आदि होते हैं। यह काल वास्तव में अशुभ नहीं, बल्कि अनुष्ठानिक विराम है, जिसमें घर के लोग स्वयं को व्यवस्थित करते हैं।

जहां तक वैज्ञानिक-सामाजिक संदर्भ की बात है तो पुराने समय में यह अवधि व्यावहारिक कारणों से भी रखी जाती थी। मृत्यु अक्सर किसी बीमारी से होती थी, इसलिए परिवार को आराम, सफाई और पुनर्गठन के लिए समय चाहिए होता था। लगातार संवेदना व्यक्त करने आने वाले आगंतुकों, भोजन-पानी की व्यवस्था और मानसिक थकान, इन सबके कारण परिवार के सदस्य किसी भी शुभ कार्य के लिए तैयार नहीं होते थे। साधारणतः 12 दिन तक परिवार गहन शोक, मानसिक अस्थिरता और थकान से गुजरता है। यह अवधि मन को संयत करने के लिए भी मानी जाती थी।

इसका मनोवैज्ञानिक कारण भी है। शोक एक मानसिक प्रक्रिया है। किसी प्रियजन की मृत्यु के बाद मन से विस्मय, अविश्वास, दुख, स्मृति-पीड़ा की लहरें उठती हैं। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि किसी बड़े भावनात्मक धक्के से निकलने में 10 से 14 दिन का समय लगना स्वाभाविक है। ऐसे में कोई उत्सव, शुभ कार्य या भीड़-भाड़ मन को और आहत कर सकती है। इसलिए समाज ने एक निर्धारित समय-सीमा बना दी, जिसे हम अशुभ मानते हैं, पर इसका उद्देश्य था मानव मन की रक्षा।

अब सवाल यह कि बच्चे के जन्म पर भी सूतक काल होता है। यह भी शाब्दिक अर्थ में अशुभ नहीं है। सूतक (सूतिका शौच) वास्तव में मां और नवजात की सुरक्षा अवधि है। प्रसव के बाद मां को आराम की आवश्यकता होती है। नवजात का रोग-प्रतिरोधक तंत्र कमजोर होता है, इसलिए बाहर-भीतर आने वाले लोगों पर नियंत्रण रखा जाता था।

पुराने समय में संक्रमण बड़ा खतरा होता था, इसलिए 10-12 दिन की सीमाएं बनाई गईं। इसी वजह से मां पूजा-पाठ का काम नहीं करती थी, उद्देश्य धार्मिक अशुद्धि नहीं, बल्कि शारीरिक सुरक्षा था।

अब सवाल कि सूतक 12 दिन का ही क्यों? भारतीय संस्कृति में दशगात्र-एकादश-द्वादश जैसे संस्कार क्रम हैं। प्रायः दसवां

दिन शरीर और घर का शुद्धिकरण, कपाल क्रिया के कर्म, ग्यारहवां दिन पितृ-तर्पण, 12वां दिन नवपात्रिका या समापन संस्कार और तेरहवां दिन यानि तेरहवीं सामाजिक रूप से शोक का अंत। यह पूरी प्रक्रिया 12 दिन का ढांचा बनाती है।

शनिवार, मई 09, 2026

पंचक में मरने वाला 4 अन्य को भी ले जाता है?

हमारे यहां लोकविश्वास और ज्योतिषीय परंपराओं में यह मान्यता है कि पंचक में मरने वाला व्यक्ति चार अन्य को भी साथ ले जाता है। पहले यह जानते हैं कि पंचक क्या होता है? पंचक पांच नक्षत्रों का समूह है। धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती। जब चंद्रमा इन पांच नक्षत्रों में से किसी में होता है, तो उसे पंचक काल कहा जाता है। पुरानी ज्योतिष परंपराओं में यह कहा गया है कि पंचक में मृत्यु होने पर व्यक्ति अकेला नहीं जाता, बल्कि चार और लोगों को अपने साथ ले जाता है। इस विश्वास के पीछे तर्क यह था कि यह समय अशुभ या असंतुलित ऊर्जा वाला माना जाता था। इसलिए उस काल में अंत्येष्टि, बिस्तर या लकड़ी का काम, दक्षिण दिशा में यात्रा आदि कार्य वर्जित माने गए। ऐसा प्रतीत होता है कि यह धारणा केवल परंपरागत चेतावनी है, ताकि लोग अशुभ समय में बड़े कार्यों से बचें। भला किसी व्यक्ति की मृत्यु का दूसरों के जीवन पर सीधा प्रभाव कैसे पड सकता है? बावजूद इसके लोग परंपरा पर यकीन करते हैं। पंचक में मृत्यु होने पर अंत्येष्टि से पहले कुछ विशेष शांति उपाय किए जाते हैं, ताकि मृत व्यक्ति के साथ अन्य लोगों पर कोई अशुभ प्रभाव न पड़े।

एक उपाय यह है- कुश या घास से चार पुतले बनाए जाते हैं। इन्हें “प्रेत पुतला” कहा जाता है। फिर उस पुतलों की मृतक के साथ ही प्रतीकात्मक अंत्येष्टि कर दी जाती है। मान्यता है कि ऐसा करने से बाकी चार की मृत्यु का दोष समाप्त हो जाता है। कुछ जगहों पर “पंचक शांति” या “पंचक निवारण हवन” किया जाता है। इसमें विशिष्ट मंत्रों से अग्निहोत्र, हवन, और पितृ शांति की क्रिया कराई जाती है। यह क्रिया अक्सर “गरुड़ पुराण” या “पंचक शांति विधि” के अनुसार होती है।

पंचक दोष से बचने के लिए ब्राह्मणों को भोजन, दक्षिणा या अनाज का दान किया जाता है। कहीं-कहीं कंबल या वस्त्र दान भी किया जाता है। कुछ परंपराओं में कहा जाता है कि पंचक के समय चिता में लकड़ी की पांच गांठें या टुकड़े अधिक नहीं डालने चाहिए, ताकि पंचक का दोष न बढ़े।


गुरुवार, मई 07, 2026

क्या चीन के गणेशजी हैं लाफिंग बुद्धा?

भारतीय संस्कृति में जिस प्रकार गणेश जी को षुभ का प्रतीक माना जाता है, उसी प्रकार चीन में लाफिंग बुद्धा को शुभ व संपत्ति का देवता माना जाता है। गणेश जी की पूजा हर शुभ कार्य से पहले होती है, उसी प्रकार वर्तमान दौर में लाफिंग बुद्धा को घर-दुकान में वास्तु को बेहतर बनाने व सकारात्मक ऊर्जा के लिए रखा जाता है। जैसे गणेश जी भारतीय परंपरा में प्रथम पूज्य हैं, ठीक वैसे ही लाफिंग बुद्धा चीन में सर्वमान्य देवता के रूप में आस्था है। ऐसे में कौतुहल होता है कि क्या उनमें कोई समानता है? मोटे तौर पर लंबोदर व लाफिंग बुद्धा का मोटा पेट उनमें एक दूसरे का पर्याय होने का आभास देता है।

हालांकि गणेश जी और लाफिंग बुद्धा दो अलग-अलग परंपराओं के प्रतीक हैं, फिर भी जनमानस में इनके बीच कई समानताएं देखी जाती हैं। यही कारण है कि लोग दोनों को सुख-समृद्धि और सौभाग्य से जोड़ते हैं। गणेश जी को प्रसन्नवदन कहा गया है, वे मुस्कुराते हुए विघ्न हरते हैं। इसी प्रकार लाफिंग बुद्धा का पूरा व्यक्तित्व ही हंसी और खिलखिलाहट का प्रतीक है। गणेश जी को धन, बुद्धि और सफलता का दाता माना जाता है। लाफिंग बुद्धा को धन, भाग्य और संतोष से जोड़ा जाता है। 

दोनों अभाव से नहीं, पूर्णता से जीने का भाव सिखाते हैं। गणेश जी का बड़ा उदर ब्रह्मांड को धारण करने का प्रतीक है। लाफिंग बुद्धा का पेट तृप्ति, उदारता और भरपूर जीवन दर्शाता है। गणेश जी और लाफिंग बुद्धा, दोनों हंसी, संतोष, समृद्धि और जीवन की बाधाओं को सहजता से पार करने का संदेश देते हैं। एक भक्ति के मार्ग से, दूसरा जीवन दर्शन के माध्यम से।

लाफिंग बुद्धा के बारे में बहुत सारी बातें प्रचलित हैं। ऐसी मान्यता है कि आप उदास रहते हैं, आर्थिक बोझ तले दबे हुए हैं, घर में उदासी जैसी स्थिति बनी रहती है, तो लाफिंग बुद्धा को अपने घर लाकर इन समस्याओं का समाधान पा सकते हैं। फेंगशुई में अनेक प्रकार की वस्तुएं उपलब्ध हैं, जिसका हम प्रयोग करके अपने घर, किसी भी भवन या व्यावसायिक स्थल में उत्पन्न हो रहे वास्तु दोष से छुटकारा पा सकने में सक्षम हो जाते हैं। 

लाफिंग बुद्धा की मूर्ति को सुख, संपदा एवं प्रगति का प्रतीक माना जाता है। घर में इसके होने से संपन्नता, सफलता आती है। लाफिंग बुद्धा की मूर्ति मकान, व्यापार स्थल, लॉबी या फिर बैठक कक्ष में होनी चाहिए, लेकिन ध्यान रहे, यह जमीन से ढाई फीट ऊपर एवं मुख्य दरवाजे के सामने होनी चाहिए। मूर्ति का मुख हमेशा प्रवेश द्वार की ओर होना चाहिए। घर में इसे मुख्य द्वार के सामने स्थापित करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। आगंतुकों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। इसकी अलग-अलग मुद्राएं होती हैं, जिनका फल भी अलग-अलग बताया गया है। चीनी मान्यतानुसार इसे बैड रूम में नहीं रखें। घर में इनकी स्थापना से धन-दौलत का आगमन निश्चित मान लिया जाता है। इनका मोटा पेट संपन्नता का प्रतीक है। इनके पेट को छूने की परंपरा है। चीन में लाफिंग बुद्धा को धन-वैभव-संपन्नता, सफलता और सुख-शांति का देवता मानते हैं।

हमारे यहां भगवान के कई अवतार हैं। हम भगवान को कई रूपों में मानते हैं। इसी तरह लाफिंग बुद्धा के भी कई रूप हैं। इनमें खासकर धन की पोटली लिए हुए, दोनों हाथों में कमंडल लिए हुए, वु लु (एक प्रकार का फल) लिए हुए, ड्रैगन के साथ बैठे हुए, कमंडल में बैठे हुए और कई बच्चों के साथ बैठे हुए बुद्धा प्रमुख हैं।

हंसता हुआ लाफिंग बुद्धा को भवन में मुख्य द्वार के अंदर इस प्रकार रखा जाता है. कि मुख्य द्वार से प्रवेश करने वाले व्यक्ति को प्रवेश करते ही यह दिखाई पड़े तथा ऐसा प्रतीत हो मानो कि बुद्धा हंस कर स्वागत कर रहा हो, लाफिंग बुद्धा को ढाई से तीन फुट की ऊंचाई पर किसी मेज या स्टूल पर रखना चाहिए। यदि मुख्य द्वार से प्रवेश करने पर सामने ही कोई कोना हो, तो लाफिंग बुद्धा को रखना अधिक अनुकूल होगा। लाफिंग बुद्धा को इस प्रकार नहीं रखें कि द्वार से प्रवेश करने वाला व्यक्ति उससे टकरा सके। शयनकक्ष में, रसोईघर या अन्य कमरों में हंसता हुआ बुद्धा नहीं रखना चाहिए।


बुधवार, मई 06, 2026

दूध पी कर हम बछडे का हक मार रहे हैं?

यह सवाल अरसे से बहस का विषय रहा है कि गाय-भैंस का दूध किसके लिए है, क्या हम उसे पी कर बछड़े का हक मारते हैं? प्रकृति के अनुसार हर स्तनधारी का दूध उसके नवजात शिशु के लिए ही होता है, यह बात मनुष्य, गाय, बकरी, भैंस, हाथी और व्हेल, सब पर लागू होती है। इस दृष्टि से देखें तो दूध मूलतः बछड़े का अधिकार है। अब सवाल उठता है कि क्या दूध पी कर मनुष्य उसका हक छीन लेते हैं? इसका उत्तर हां और नहीं, दोनों हो सकता है, यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है। पारंपरिक देसी पद्धतियों के अनुसार पहले बछड़े को पीने दिया जाता है, उसके बाद ही शेष दूध मनुष्य उपयोग में लेता है। कई स्थानों पर दूध निकालते समय बछड़ा पास खड़ा रहता है, तभी गाय स्तनों में दूध उतारती है। इस व्यवस्था में बछड़े का हक नहीं मारा जाता, सिर्फ अतिरिक्त दूध मनुष्य लेता है।

आधुनिक औद्योगिक डेयरी सिस्टम में नैतिक चिंता बढ़ जाती है। कई बडी डेयरियों में बछड़े को जन्म के कुछ दिन बाद अलग कर दिया जाता है। उसकी हिस्सेदारी सीमित या कभी-कभी कम कर दी जाती है। गाय लगातार गर्भाधान के चक्र में रखी जाती है। यह व्यवस्था कई लोगों को अनैतिक लगती है। यही कारण है कि कई लोग दूध-उद्योग को मांसाहार जैसा शोषण बताते हैं।

एक सवाल यह कि क्या दूध को मांसाहार की श्रेणी में रखा जा सकता है? कुछ लोग उसे भी मांसाहार से जोडते हैं। कई लोग दूध को मांसाहार मानते हुए दूध से बने सभी उत्पादों यथा दही, पनीर व घी आदि का सेवन नहीं करते। यह दो तरह से देखा जाता है। एक धार्मिक-परंपरागत दृष्टिकोण के अनुसार हिंदू, जैन, बौद्ध परंपराओं में दूध को सतोगुणी, शाकाहारी माना गया है। आयुर्वेद में दूध को ओज-वर्धक बताया गया है। धार्मिक ग्रंथों में दुग्ध-उत्पादों को अहिंसक माना गया है, जब बछड़े को उसका हिस्सा मिलता है।

आधुनिक नैतिक-वीगन दृष्टिकोण में दूध को मांसाहार नहीं, लेकिन पशु-शोषण का हिस्सा अवष्य कहा जाता है। उनका तर्क है कि यदि पशु का दूध मनुष्य ले रहा है, तो वह किसी स्तर पर स्वार्थपूर्ण हस्तक्षेप है। उपयोगकर्ता किस दृष्टिकोण को स्वीकार करता है, यह उसकी संवेदनशीलता और तर्कशक्ति पर निर्भर करता है।

कुल मिला कर हम इस निर्णय पर पहुंच सकते हैं कि प्रकृति ने दूध बछड़े के लिए उत्पन्न किया है। यदि बछड़े को पूरा दूध मिले और अतिरिक्त ही मनुष्य ले, तो यह शोषण नहीं बनता। औद्योगिक डेयरियों में यह संतुलन अक्सर बिगड़ जाता है, यहीं से नैतिक प्रश्न उठते हैं। औद्योगिक पशु-उत्पीड़न के संदर्भ में इसमें आपत्ति की गुंजाइश है। यदि कोई व्यक्ति दूध पीना चाहता है और साथ ही नैतिकता भी बनाए रखना चाहता है, तो यह उपाय अपनाए जा सकते हैं- स्थानीय, देसी, छोटे डेयरी किसानों से दूध लिया जाए, जहां बछड़ा प्राथमिकता पाता है। देशी नस्ल की गायों का दूध, जहां उत्पादन स्वाभाविक रूप से सीमित और प्राकृतिक होता है।


मंगलवार, मई 05, 2026

बहुत महिमा है परिक्रमा की

 हमारे यहां धार्मिक-आध्यात्मिक स्थलों, मंदिरों में मूर्तियों, पेडों आदि की परिक्रमा की परंपरा है। यह सदियों पुरानी है, जिसका वर्णन हमारे वेदों में धर्म ग्रंथों में मिलता है। दरअसल जिन पवित्र स्थानों की परिक्रमा की जाती है, उसके चारों तरफ एक शक्तिशाली आध्यात्मिक आभा ऊर्जा मौजूद होती है, जो हमारे अंदर प्रवेश कर एक दिव्यता प्रदान करती है। परंपरा के अनुसार तीर्थ स्थल व मंदिर के अतिरिक्त नदी, पर्वत, वृक्ष आदि की भी परिक्रमा की जाती है। मनु स्मृति में विवाह के समय वर-वधू अग्नि के चारों ओर 7 बार प्रदक्षिणा करते हैं तो विवाह संपन्न माना जाता है।

कथा है कि एक बार भगवान शंकर की अर्धांगिनी माता पार्वती द्वारा अपने पुत्रों कार्तिकेय तथा गणेश को सांसारिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए पृथ्वी का एक चक्कर लगा कर उनके पास वापस लौटने का आदेश दिया गया। यह सुन कार्तिकेय अपनी सुंदर सवारी मोर पर सवार हुए तथा पृथ्वी का चक्कर लगाने के लिए निकल पड़े। उन्हें यह भ्रमण समाप्त करने में युग लग गए, लेकिन दूसरी ओर गणेश द्वारा माता की आज्ञा को पूरा करने का तरीका काफी अलग था, जिसे देख सभी हैरान रह गए। भगवान गणेश ने अपने दोनों हाथ जोड़े तथा माता पार्वती के चक्कर लगाना शुरू कर दिया। जब कार्तिकेय पृथ्वी का चक्कर लगाकर वापस लौटे और गणेश को अपने सामने पाया तो वह हैरान हो गए। उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि कैसे गणेश उनसे पहले दौड़ का समापन कर सकते हैं। गणेश जी ने बताया कि उनका संसार तो स्वयं उनकी माता हैं, इसलिए उन्हें ज्ञान प्राप्ति के लिए विश्व का चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं है। पुराण में दर्ज इस कथा के बाद ही हिन्दू धर्म में परिक्रमा करने की रीति का आरंभ हुआ। तब से लेकर आज तक विभिन्न धार्मिक स्थलों पर परिक्रमा करने का रिवाज है।

हिंदू धर्म के अनुसार देवी-देवताओं की पूजा के लिए पेड-पौधों की परिक्रमा का विधान है। वस्तुतः भिन्न-भिन्न पेड-पौधों में अलग-अलग देवी-देवता का वास माना जाता है। आम तौर पर बेल, केले, तुलसी, बरगद, पीपल कर परिक्रमा की जाती है। प्रदक्षिणा घड़ी की सुई की दिशा में करने प्रावधान है। वह इसलिए कि इस तरह से चलते हुए प्रभु हमेशा हमारे दाईं ओर रहते हैं, जिससे हमें सही दिशा में रहने की ही सीख मिलती है।

प्रत्येक देवता के लिए की जाने वाली प्रदक्षिणाओं की न्यूनतम संख्या अलग अलग होती है। गणेश जी की 1, हनुमान जी की 3, शिव जी की आधी, विष्णु जी की 3, अयप्पा जी की 5, कार्तिकेय जी की 6, देवी दुर्गा जी की 9, पीपल के पेड़ की 7 परिक्रमा की जाती है। शिव मंदिर में परिक्रमा करते समय यदि रास्ते में शिवलिंग पर अर्पित किया गया जल, दूध, घी आदि निकासी आती है, तो उसे पार नहीं करना किया जाता। यानि परिक्रमा आधी ही की जाती है। फिर घड़ी की सुई की उल्टी दिशा में घूम जाना चाहिए। एक मान्यता है कि शिवजी की जटा से गंगा प्रवाहित होती है, अतः उसे कैसे पार किया जा सकता है।

प्रदक्षिणा का प्राथमिक कारण सूर्यदेव की दैनिक चाल से संबंधित है। जिस तरह से सूर्य प्रातः पूर्व में निकलता है, दक्षिण के मार्ग से चलकर पश्चिम में अस्त हो जाता है। इसका एक दार्शनिक महत्व यह भी है कि संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रत्येक ग्रह-नक्षत्र किसी न किसी तारे की परिक्रमा कर रहा है। यह परिक्रमा ही जीवन का सत्य है। व्यक्ति का संपूर्ण जीवन ही एक चक्र है। इस चक्र को समझने के लिए ही परिक्रमा जैसे प्रतीक को निर्मित किया गया।