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सोमवार, मई 18, 2026

मृत्यु होने पर घर को बारह दिन अशुभ क्यों मानते हैं?

मृत्यु पर घर को 12 दिन अशुभ क्यों मानते हैं? ऐसा ही किसी का जन्म होने पर भी होता है। इसका धार्मिक और परंपरागत कारण ये है कि मृत्यु के बाद 10-12 दिन ‘अशौच’ (सूतिक मृतक-अपवित्रता) की अवधि कहलाता है। इसके पीछे विचार यह है कि जीवन और मृत्यु को संसार का महान संक्रमण (ट्रांजिशन) माना गया है। मृत्यु के तुरंत बाद परिवार शोक की अवस्था में रहता है, इसलिए वे धार्मिक कर्मकांडों या शुभ कार्यों से दूर रहते हैं। इसके अतिरिक्त पितृलोक की यात्रा, प्रेत-शांति और आत्मा की स्थिरता के लिए संस्कारिक समय दिया जाता है। इस अवधि के दौरान पुरोहित द्वारा शुद्धिकरण, तर्पण, पिंडदान आदि होते हैं। यह काल वास्तव में अशुभ नहीं, बल्कि अनुष्ठानिक विराम है, जिसमें घर के लोग स्वयं को व्यवस्थित करते हैं।

जहां तक वैज्ञानिक-सामाजिक संदर्भ की बात है तो पुराने समय में यह अवधि व्यावहारिक कारणों से भी रखी जाती थी। मृत्यु अक्सर किसी बीमारी से होती थी, इसलिए परिवार को आराम, सफाई और पुनर्गठन के लिए समय चाहिए होता था। लगातार संवेदना व्यक्त करने आने वाले आगंतुकों, भोजन-पानी की व्यवस्था और मानसिक थकान, इन सबके कारण परिवार के सदस्य किसी भी शुभ कार्य के लिए तैयार नहीं होते थे। साधारणतः 12 दिन तक परिवार गहन शोक, मानसिक अस्थिरता और थकान से गुजरता है। यह अवधि मन को संयत करने के लिए भी मानी जाती थी।

इसका मनोवैज्ञानिक कारण भी है। शोक एक मानसिक प्रक्रिया है। किसी प्रियजन की मृत्यु के बाद मन से विस्मय, अविश्वास, दुख, स्मृति-पीड़ा की लहरें उठती हैं। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि किसी बड़े भावनात्मक धक्के से निकलने में 10 से 14 दिन का समय लगना स्वाभाविक है। ऐसे में कोई उत्सव, शुभ कार्य या भीड़-भाड़ मन को और आहत कर सकती है। इसलिए समाज ने एक निर्धारित समय-सीमा बना दी, जिसे हम अशुभ मानते हैं, पर इसका उद्देश्य था मानव मन की रक्षा।

अब सवाल यह कि बच्चे के जन्म पर भी सूतक काल होता है। यह भी शाब्दिक अर्थ में अशुभ नहीं है। सूतक (सूतिका शौच) वास्तव में मां और नवजात की सुरक्षा अवधि है। प्रसव के बाद मां को आराम की आवश्यकता होती है। नवजात का रोग-प्रतिरोधक तंत्र कमजोर होता है, इसलिए बाहर-भीतर आने वाले लोगों पर नियंत्रण रखा जाता था।

पुराने समय में संक्रमण बड़ा खतरा होता था, इसलिए 10-12 दिन की सीमाएं बनाई गईं। इसी वजह से मां पूजा-पाठ का काम नहीं करती थी, उद्देश्य धार्मिक अशुद्धि नहीं, बल्कि शारीरिक सुरक्षा था।

अब सवाल कि सूतक 12 दिन का ही क्यों? भारतीय संस्कृति में दशगात्र-एकादश-द्वादश जैसे संस्कार क्रम हैं। प्रायः दसवां

दिन शरीर और घर का शुद्धिकरण, कपाल क्रिया के कर्म, ग्यारहवां दिन पितृ-तर्पण, 12वां दिन नवपात्रिका या समापन संस्कार और तेरहवां दिन यानि तेरहवीं सामाजिक रूप से शोक का अंत। यह पूरी प्रक्रिया 12 दिन का ढांचा बनाती है।

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