धार्मिक मान्यता है कि हिंदू पंचांग में तिथि केवल कैलेंडर का दिन नहीं है, बल्कि एक ऊर्जा-चक्र है। जिस तिथि को किसी व्यक्ति का देहांत होता है, उसी तिथि को उसका सूक्ष्म शरीर (यानि पितृ) विशेष रूप से सक्रिय माना जाता है। उस तिथि पर पितरों की सूक्ष्म उपस्थिति अधिक होती है। वे अपने वंशजों द्वारा किए गए तर्पण, पिंडदान और भोजन दान (श्राद्ध) को स्वीकार कर पाते हैं। यह भी मान्यता है कि जिस तिथि को मृत्यु हुई, उसी दिन पितर लौकिक जीवन से परलोक की यात्रा पर जाते हैं। शास्त्र कहता है कि उस यात्रा-तिथि को किया गया तर्पण सबसे अधिक प्रभावकारी होता है। इसलिए हर साल वही तिथि “स्मृति-तिथि” बनती है। इसका मनोवैज्ञानिक कारण भी है। निर्धारित तिथि पर श्राद्ध करने से परिवार में स्मरण, सम्मान और पीढ़ीगत जुड़ाव बना रहता है। हर वर्ष एक निश्चित दिन पर आयोजन होने से भूलने, टालने की संभावना कम होती है। इसका भावनात्मक पक्ष यह है कि किसी प्रिय व्यक्ति का निधन जिस दिन होता है, वह परिवार की स्मृति में गहराई से अंकित होता है। उसी दिन श्राद्ध करने से मन को शांति मिलती है।
इसका सांस्कृतिक एवं पारिवारिक कारण भी है। भारतीय घरों में कुल परंपरा का बड़ा महत्व है। हर व्यक्ति का अपना वार्षिक श्राद्ध-दिवस होना परिवार की वंशावली को व्यवस्थित रखता है। पुराने समय में लोग पूरी तरह कृषि-आधारित जीवन जीते थे। निश्चित तिथि पर श्राद्ध होने से आस-पड़ोस व रिश्तेदारों को भी पता रहता था कि किस घर में कब वर्ष-श्राद्ध है, कब अमावस्या-श्राद्ध या महालया होगा।
यदि कोई व्यक्ति मृत्यु के वर्ष के अतिरिक्त वर्षों में पितृपक्ष (यानि महालया) के दौरान श्राद्ध करवाना चाहे तो वह भी मान्य है। लेकिन पारंपरिक व्यवस्था में व्यक्तिगत श्राद्ध उसी मृत्यु-तिथि पर किया जाता है।
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