पारस मणि की प्रसिद्धि और लोगों में इसके होने को लेकर इतना विश्वास है कि भारत में कई ऐसे स्थान हैं, जो पारस के नाम से जाने जाते हैं। कुछ लोगों के आज भी पारस नाम होते हैं। मान्यता है कि पारस मणि या पारस पत्थर से लोहे की किसी भी चीज को छुआ देने से वह सोने की बन जाती थी। इससे लोहा काटा भी जा सकता है। कहते हैं कि कौवों को इसकी पहचान होती है। बहुत सी पुरानी रचनाओं जैसे रस रत्नाकर, रसार्णव आदि में पारस का उल्लेख रस विद्या के संदर्भ में हुआ है। योग और तांत्रिक परंपराओं में पारस को ज्ञान का प्रतीक भी कहा गया है, यानी जो अज्ञान को ज्ञान में बदल दे। वैज्ञानिक दृश्टि से आज तक ऐसा कोई पत्थर या धातु वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं हुआ है जो वास्तव में लोहे को सोने में बदल सके। इसलिए पारस मणि को काल्पनिक या प्रतीकात्मक वस्तु माना जाता है।
तीसरी आंख
शुक्रवार, फ़रवरी 27, 2026
क्या पारस मणि का अस्तित्व है?
पारस मणि या पारस पत्थर, जिसे अंग्रेजी में फिलोसोपर स्टोन कहा जाता है, एक दुर्लभ और रहस्यमय रत्न माना जाता है, जिसका उल्लेख प्राचीन भारतीय, यूनानी और इस्लामी रसायन शास्त्र में मिलता है। इसका जिक्र पौराणिक और लोक कथाओं में खूब मिलता है। इसे धातु-परिवर्तन करने वाला जादुई पत्थर माना गया। इसके हजारों किस्से और कहानियां समाज में प्रचलित हैं। कई लोग यह दावा भी करते हैं कि हमने पारस मणि देखी है। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में जहां हीरे की खदान है, वहां से 70 किलोमीटर दूर दनवारा गांव के एक कुएं में रात को रोशनी दिखाई देती है। लोगों का मानना है कि कुएं में पारस मणि है। कहते हैं कि पारसमणि आज भी हिमालय से लगे राज्यों में पाई जाती है। जैसे जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल, सिक्किम, असम, अरुणाचल आदि।
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