तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

रविवार, जनवरी 25, 2026

शवदाह के बाद पीछे मुड़ कर क्यों नहीं देखते?

आपको जानकारी होगी कि षव का अंतिम संस्कार करने के बाद पीछे मुड कर न देखने की सलाह दी जाती है। क्या आपने सोचा है कि इसकी वजह क्या है? इस बारे में गरूड पुराण में कहा गया है कि जब षव को अग्नि के हवाले करने के बाद नाते-रिष्तेदार लौट रहे होते हैं तो मृतक की आत्मा उनको देख रही होती है और मोहवष उनके साथ लौटना चाहती है, जब कि मृत्योपरांत अंत्येश्टि के बाद उसे आगे की यात्रा करनी होती है। यदि परिजन पीछे मुड कर देखते हैं तो मृतात्मा को मोह के बंधन से मुक्त होने में कठिनाई होती है। उसकी आगे की यात्रा (यमनाड, पितृलोक या पुनर्जन्म की प्रक्रिया) में बाधा आती है। कुल जमा बात यह है कि मृत आत्मा के इस जगत से संबंध विच्छेद के वक्त किसी तरह का मोह उत्पन्न न हो इसके लिए परिजन को पीछे मुड कर न देखने को कहा जाता है।

आपको यह भी जानकारी होगी कि जब ज्योतिशी चौराहे, तिराहे अथवा वृक्ष इत्यादि पर कोई टोटका करने की सलाह देते हैं तो साथ हिदायत देते हैं कि टोटके के बाद पीछे मुड कर नहीं देखना है। कदाचित इसके पीछे भी वही दर्षन है कि आप जो भी टोटका कर रहे हैं, वह स्वतंत्र रूप से तभी काम करेगा, जबकि आप उससे संबंध विच्छेद कर लेंगे। “पीछे न देखना” का असली संदेश यह है कि आपने जो कर्म किया है, उसे पूर्ण मानो। उससे भावनात्मक या ऊर्जात्मक जुड़ाव न रखो।


शुक्रवार, जनवरी 23, 2026

शुभ-अशुभ का संकेत जानने के लिए डाली जाती है फार

सिंधी समाज सहित कुछ अन्य समाजो में किसी घटना-विशेष का फलित यानि शुभ-अशुभ संकेत जानने के लिए एक पारंपरिक विधि अपनाई जाती है, उसे प्रायः “फार डालना” कहा जाता है। कुछ स्थानों पर इसे “देव-फार”, “शकुन-फार” या केवल “फार” कहा जाता है। फार वस्तुतः एक प्रकार की दैव-प्रश्न या शकुन-प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से यह जाना जाता है कि कोई कार्य, यात्रा, विवाह, व्यापार, बीमारी या अन्य घटना शुभ फल देगी या नहीं। फार कैसे डाली जाती है? क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार इसमें थोड़ा अंतर मिलता है, पर सामान्य रूप से कौड़ी, सुपारी, चावल के दाने, फूल, दीपक या धागा लिया जाता है। कभी-कभी सिंधी पंचांग (तिथि-वार) या लोक-गणना का सहारा लिया जाता है। किसी देवता या कुलदेवी को स्मरण कर प्रश्न मन में रखा जाता है और वस्तुओं की गणना, दिशा, गिरावट या बनावट देखकर फलित निकाला जाता है। और इस प्रकार 

शुभ-अशुभ संकेत जाना जाता है, मन का संशय दूर किया जाता है, बड़े निर्णय से पहले दैवी संकेत लिया जाता है और पारंपरिक आस्था के अनुसार मार्गदर्शन लिया जाता है। फार डालना ज्योतिष से अधिक लोक-विश्वास पर आधारित प्रक्रिया है। सिंधी समाज में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और विशेषकर विवाह, यात्रा, व्यापार प्रारंभ, रोग या संकट जैसे समयों में आज भी प्रचलित है। सिंधी समाज में फार डालने की एक बहुत प्रचलित और सरल विधि “कौड़ी की फार” मानी जाती है। इसे आज भी कई परिवारों में श्रद्धा के साथ अपनाया जाता है। सिंधी परंपरा के अनुसार 5 या 7 साबुत कौड़ियां, लाल कपड़ा या साफ थाली, दीपक आदि लिए जाते हैं। हाथ-पैर धोकर शांत चित्त से बैठते हैं। मन में उस घटना या प्रश्न को स्पष्ट रूप से सोचते हैं, जिसका फल जानना है। सिंधी परंपरा में प्रायः कहा जाता है, “झूलेलाल साईं, सच्चो फार बुधायो बतायो”। कुछ लोग अपनी कुल देवी का स्मरण करते हैं। सभी कौड़ियों को दोनों हथेलियों में लेकर प्रश्न दोहराते हैं। फिर कौड़ियों को लाल कपड़े या थाली पर एक साथ गिरा देते हैं। यदि अधिक कौडियां खुली हों तो इसे षुभ संकेत मानते हैं। सभी कौडियां खुली हों तो कार्य को सिद्ध माना जाता है यानि उसमें कोई विलंब नहीं होगा।

अधिक कोडियां बंद हों तो माना जाता है कि कार्य में रुकावट आएगी। सभी कौडियां बंद हों तो यह अर्थ निकाला जाता है कि कार्य को स्थगित कर दीजिए। खुली और बंद कौडियां लगभग बराबर हों तो इसका अर्थ है कि परिणाम अनुकूल तो होगा, लेकिन उसके लिए धैर्य पूर्वक प्रयास करने होंगे।

अगर कौड़ियां एक-दूसरे पर चढ़ जा तो इसका मतलब है कि कार्य में बाहरी हस्तक्षेप होगा या भ्रम की स्थिति बनेगी। कोई कौड़ी थाली से बाहर गिरे, तो इसका मतलब है कि प्रश्न पुनः पूछना उचित नहीं है। फार तीन बार से अधिक नहीं डालते। कुल मिला कर फार को अंतिम निर्णय नहीं, बल्कि दैवी संकेत माना जाता है। एक ही प्रश्न बार-बार नहीं दोहराया जाता। कुछ लोग सुपारी की फार व चावल-दाने की फार डालते हैं।


सोमवार, जनवरी 19, 2026

महान लोगों की उम्र कम क्यों होती है?

शिखर पर पहुंचने वाले, चाहे वे महान कलाकार हों, उद्यमी, खिलाड़ी, वैज्ञानिक या आध्यात्मिक नेता हों, हम अक्सर देखते हैं कि उनमें से कई अपेक्षाकृत कम आयु में ही संसार छोड़ देते हैं। यह प्रश्न मन को झकझोरता है, लेकिन इसका उत्तर भाग्य या दैवी न्याय से अधिक मानव-जीवन, मनोविज्ञान, शरीर विज्ञान और सामाजिक दबावों से जुड़ा होता है। जो लोग शीर्ष पर पहुंचते हैं, वे अक्सर वर्षों तक असाधारण परिश्रम करते हैं। उनका कार्यदिवस बहुत लंबा होता है। उनका भोजन अमूमन अनियमित होता है। इसके अतिरिक्त वे मानसिक तनाव में रहते हैं और उनका नींद पूरी नहीं आती। वे अपने शरीर से उसकी सीमा से अधिक काम में लेते हैं। यह सब मिलकर हृदय, नर्वस सिस्टम और इम्युनिटी पर गहरा प्रभाव डालता है।

असंख्य उदाहरण ऐसे मिलते हैं, जहां अत्यधिक परिश्रम और तनाव से मधुमेह, हार्ट अटैक, स्ट्रोक आदि का खतरा बढ़ता है।

एक बात और ऊँचाई पर पहुंचने पर अकेलापन झेलते हैं। अधिसंख्य लोग जब शीर्ष पर पहुँचते हैं, तो उन्हें कई तरह के दबाव घेर लेते हैं। सार्वजनिक छवि बनाए रखने की जुगत, असफल न दिखने का डर, सतत प्रतिस्पर्धा और आलोचना, ईर्श्या की राजनीति के अतिरिक्त् उन पर और भी ऊँचा जाने का निरंतर दबाव रहता है।

यह सब मानसिक थकान, अवसाद, चिंता तथा आत्म-देखभाल की कमी पैदा करता है। अक्सर सफलता जितनी चमकीली दिखती है, उतनी ही अकेली भी होती है।

शीर्ष पर पहुँचे कई लोगों का जीवन एकदम अनियमित हो जाता है। देर रात तक काम, अत्यधिक यात्राएँ, असंतुलित खान-पान, कभी-कभी नशे या उत्तेजक पदार्थों की ओर झुकाव और व्यायाम का अभाव, यह सब स्वास्थ्य को दीर्घकाल में नुकसान पहुंचाता है।

प्रसिद्ध दार्शनिकों और परंपराओं में एक विचार मिलता है कि जो जीवन बहुत तीव्र लौ की तरह जलता है, वह प्रायः कम आयु का होता है। यानि जो लोग कम समय में अत्यधिक ऊर्जा, रचनात्मकता, प्रतिभा और परिश्रम झोंक देते हैं, वे जीवन की बैटरी बहुत तेजी से खर्च कर देते हैं।

कुछ उदाहरण यह साबित करते हैं कि ज्यादातर महान लोग जल्दी मरते हैं, जबकि आँकड़ों के स्तर पर यह सार्वभौमिक सत्य नहीं है। संतुलित जीवन वाले महान लोग लंबी आयु तक जिए- नेल्सन मंडेला, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, शिवाजी महाराज की माता जीजाबाई, बेंजामिन फ्रैंकलिन, टॉलस्टॉय, रतन टाटा। इन सबने लंबी और सार्थक आयु पाई क्योंकि सफलता और जीवन में संतुलन बनाए रखा।

एक अवधारणा यह भी है कि महान लोग बहुत कुछ पूर्व जन्म में ही हासिल कर लेते हैं और मौजूदा जन्म में कम उम्र में ही पूरी सफलता हासिल कर लेते हैं।


शुक्रवार, जनवरी 16, 2026

पेशाब या शौच के वक्त नए आइडिया क्यों आते हैं?

ऐसी मान्यता है कि पेषाब करते वक्त या षौच के वक्त दिमाग में नए आइडिया आते हैं। या कोई गुत्थी सुलझने का रास्ता ख्याल में आता है। समझा जाता है कि पेशाब या शौच के वक्त नए आइडिया आने के पीछे कई शारीरिक, मानसिक और न्यूरोलॉजिकल वजहें होती हैं। वस्तुतः दिमाग “रिलैक्स मोड” में चला जाता है। दिमाग फोकस्ड सोच  से निकल कर डिफ्यूज सोच में चला जाता है। और यही मोड रचनात्मकता का सबसे बड़ा स्रोत है। इसलिए अचानक समाधान व आइडिया टपक पड़ते हैं। वैज्ञानिक को किसी अविष्कार का ख्याल आ सकता है। कवि के मन में कविता की पंक्तियां उभर सकती हैं। ऐसा माना जाता है कि पेषाब या षौच के वक्त वेगस नर्व अपनी भूमिका अदा करती है। वह दिल की धड़कन धीमी करती है, शरीर को शांत करती है, दिमाग यकायक खुल जाता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि जब मूत्राशय या आंत भरी होती है तो दिमाग का एक हिस्सा असुविधा में लगा रहता है, जैसे ही दबाव हटता है, मानसिक ऊर्जा अचानक मुक्त हो जाती है। यही मुक्त ऊर्जा सोच में छलांग लगाती है। पेषाब या षौच के वक्त आदमी निपट अकेला होता है, एकांत में होता है और एकांत में ज्ञानेन्द्री सक्रिय हो जाती है। न्यूरो साइंस के अनुसार जब हम कुछ खास नहीं सोच रहे होते, तब दिमाग का “डिफॉल्ट मोड नेटवर्क” एक्टिव हो जाता है। यही नेटवर्क यादों को जोड़ता है, पुराने अनुभवों से नए अर्थ निकालता है, अचानक वाह वाला पल देता है। लोकबुद्धि में कहें तो जब देह खाली होती है, तब चेतना भरती है। इसलिए अगर कभी शौचालय में कोई जबरदस्त आइडिया आए, तो उसे हल्के में मत लीजिए। हो सकता है वही आपके अगले लेख, समाधान या दर्शन की शुरुआत हो।

शनिवार, जनवरी 10, 2026

चैट जीपीटी से मौलिक लेखकों पर संकट?

इन दिनों चैट जीपीटी का बोलबाला है। लेखन से लेकर शोध तक, हर क्षेत्र में इसका प्रयोग तेजी से बढ़ा है। खासकर किसी विषय पर आलेख तैयार करने के लिए लोग केवल एक हेडिंग देते हैं और क्षण भर में तैयार लेख प्राप्त कर लेते हैं। वस्तुतः चैट जीपीटी इंटरनेट पर उपलब्ध तथ्यों, सूचनाओं और शैलियों को समेटकर उन्हें सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत कर देता है।

ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है, क्या इससे मौलिक लेखकों के सामने संकट खड़ा हो रहा है? जब मशीन लेखन उपलब्ध है, तो कोई प्रकाशक या संपादक किसी मौलिक लेखक को प्राथमिकता क्यों देगा? दिलचस्प है कि यही प्रश्न जब चैट जीपीटी से पूछा गया, तो उसका उत्तर अपेक्षाकृत ईमानदार और संतुलित था। उसके अनुसार, मौलिक लेखकों का अंत नहीं होगा, लेकिन लेखन की दुनिया का स्वरूप अवश्य बदलेगा।

चैट जीपीटी जैसे एआई टूल साधारण, फॉर्मूलानुमा और सूचना-आधारित लेखन में बेहद सक्षम हैं। खबरों का पुनर्लेखन, सामान्य ज्ञान, सतही विश्लेषण या एसईओ आधारित सामग्री, इन क्षेत्रों में एआई तेज, सस्ता और पर्याप्त साबित हो सकता है। निस्संदेह, इससे औसत स्तर के कॉलम और कंटेंट लेखन में मानव लेखकों की मांग घट सकती है।

लेकिन यहीं से मौलिक लेखक की असली पहचान शुरू होती है। मौलिक लेखन अनुभव से जन्म लेता है और अनुभव मशीन के पास नहीं होता। भूख की टीस, सत्ता का दमन, प्रेम की विफलता, लोकजीवन की गंध, विस्थापन का दर्द या समय की बेचौनी, इन सबको लेखक जीता है, तब लिखता है। एआई इन भावनाओं की नकल कर सकता है, अनुभूति नहीं।

व्यवस्था से टकराने वाला लेख, जोखिम उठाने वाली कविता और समय के विरुद्ध खड़ा निबंध,यह दृष्टि है, विजन है, जो अभी भी मानवीय चेतना की देन है। मशीन आंकड़े दे सकती है, संदर्भ जोड़ सकती है, लेकिन नैतिक साहस और वैचारिक टकराव नहीं रच सकती।

हां, जो लेखक नई भाषा नहीं गढ़ता, नए प्रश्न नहीं उठाता और पुरानी लकीरों पर ही चलता रहता है, उसके लिए एआई सचमुच खतरा है। लेकिन जो लेखक अपने समय को पढ़ता है, लोक, दर्शन, इतिहास और निजी अनुभव को जोड़कर अपनी अलग आवाज पहचानता है, उसके लिए एआई केवल एक औजार है, प्रतिद्वंद्वी नहीं।

भविष्य में संभवतः श्रेष्ठ लेखन का नया मॉडल सामने आएगा, जहां लेखक सोच देगा, दृष्टि देगा और एआई संरचना, संपादन तथा संदर्भ में सहायक बनेगा। जैसे कैमरे के आने से चित्रकार समाप्त नहीं हुए, बल्कि चित्रकला के नए रूप सामने आए, वैसे ही एआई से लेखक समाप्त नहीं होंगे।

कुल मिलाकर, चैट जीपीटी मौलिक लेखकों के लिए खतरा नहीं, बल्कि औसत और यांत्रिक लेखन के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है।


शुक्रवार, जनवरी 09, 2026

पैर हिलाना व चाबी को घुमाना अशुभ?

आपने देखा होगा कि अमूमन कई लोग पलंग या कुर्सी पर बैठे हुए पैर हिलाते हैं या अंगुली में चाबी घुमाते हैं। भारतीय परंपरा में इसे अषुभ माना जाता है और ऐसा न करने की सलाह दी जाती है। हालांकि इसे वैज्ञानिक दृश्टि से प्रमाणित नहीं माना जाता, मगर लोकविश्वास, शिष्टाचार और मनोवैज्ञानिक दृष्टि इसके अर्थ निकाले जाते हैं। भारतीय लोकमान्यता के अनुसार पैर हिलाने को चंचलता या अस्थिरता का संकेत माना जाता है। बुजुर्ग कहा कहते हैं कि इससे लक्ष्मी नहीं ठहरती। यह मन के भटकाव का संकेत माना जाता है। इसे सामने बैठे व्यक्ति के प्रति असम्मान भी कहा जाता थे। अंगुली में चाबी का छल्ला घुमाने को भी अच्छा नहीं माना जाता। मानते हैं कि इससे विवाद हो सकता है। इससे यह संकेत मिलता है कि मन में बेचैनी व अधीरता है। ऐसा माना जाता है कि व्यक्ति भौतिक रूप से मौजूद है, मगर उसका मन कहीं और है। भीतर ही भीतर कुछ चल रहा है। कोई न कोई चिंता है। मनोविज्ञान कहता है कि पैर हिलाना या चाबी घुमाना तनाव व बेचैनी का द्योतक है। इससे आंतरिक ऊर्जा का क्षय होता है। वह अनजाने में व्यर्थ ही बाहर निकालती है। षास्त्रीय दृश्टि से यह भले ही अशुभ नहीं हो, मगर सार्वजनिक जगह पर

शिष्टाचार की दृष्टि से अनुचित है। यदि व्यक्ति सचेत, स्थिर और संयमित रहने का अभ्यास करे, तो ये आदतें स्वतः कम हो सकती हैं।


मंगलवार, जनवरी 06, 2026

क्या खुशबूदार अगरबत्ती से भगवान प्रसन्न होते हैं?

 

आमतौर पर जब भी हम अगरबत्ती या धूप खरीदते हैं तो यह ख्याल रखते हैं कि हमें कौन सी खुशबूू पसंद है? भाव भले ही भगवान को प्रसन्न करने का हो, मगर खुशबूू का चयन अपनी पसंद के अनुसार ही करते हैं। हाल ही किराने के दुकानदार से जब अगरबत्ती खरीद रहा था तो उसने दो तरह की अगरबत्तियां दिखाईं, एक सामान्य खुशबूू वाली सस्ती अगरबत्ती व दूसरी बेहतरीन खुशबूू वाली थोडी महंगी अगरबत्ती। मैने उनसे कहा कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए तो अगर नामक जडी वाली अगरबत्ती या धूप जलाई जाती है। उसमें भांति भांति की खुशबूू तो हम स्वयं अपने आनंद लेने के लिए जलाते हैं, भगवान के लिए नहीं। इस पर वहां मौजूद एक बुजुर्ग ने कहा कि ऐसी बात नहीं है। खुशबूू का आनंद भगवान भी लेते हैं। खुशबूू वाली अगरबत्ती से भगवान अधिक प्रसन्न होते हैं। यह बात मेरे गले नहीं उतरी, मगर मैने इस विषय में डुबकी लगाने की सोची।

दरअसल भारतीय परंपरा में भगवान की पूजा के पांच उपचार बताए गए हैं, गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य। शास्त्रों में यह नहीं कहा गया कि भगवान को किस ब्रांड या कितनी महंगी खुशबूूदार अगरबत्ती चाहिए। वस्तुतः भगवान को भाव प्रिय है, वस्तु नहीं। इस सिलसिले में भगवतगीता में कहा गया है कि “पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति” अर्थात भाव से अर्पित की गई साधारण वस्तु भी भगवान स्वीकार करते हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि अगर आपके पास भगवान को चढाने के लिए फूल नहीं हैं तो आप आंख मूंद कर कल्पना करें कि आपके पास फूल हैं और आप उन्हें भगवान को चढा रहे हैं, भगवान उन्हें भी स्वीकार करते हैं। स्पष्ट है कि भगवान फूल को नहीं भाव को देखते हैं। तो फिर सवाल उठता है कि हम खुशबूूदार अगरबत्ती क्यों जलाते हैं? ऐसी प्रतीत होता है कि भगवान को भले ही खुशबूूदार अगरबत्ती से कोई सरोकार नहीं, वह तो हम इसलिए जलाते हैं, ताकि मन की विक्षेपता शांत हो, वातावरण पवि़त्र बने, मन की प्रसन्नता से इंद्रियां एकाग्र हों, जिससे अहंकार और सांसारिक दुर्गंध यथा क्रोध, ईर्श्या, लोभ आदि का दहन हो। यानी सुगंधित धूप बाहरी से अधिक आंतरिक शुद्धि का प्रतीक है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो खुशबू से मन शांत होता है। जब मन शांत होता है तो प्रार्थना सच्ची बनती है, ध्यान गहरा होता है, श्रद्धा स्वाभाविक होती है। यह स्थिति भक्त के लिए लाभकारी है, न कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए कोई आवश्यकता।

ज्ञातव्य है कि कबीर, तुलसी, मीरा जैसे संतों ने बार-बार कहा है कि भगवान धूप-दीप से नहीं, हृदय की निर्मलता से प्रसन्न होते हैं। भगवान खुशबू से नहीं, भावना से प्रसन्न होते हैं।

यहां एक पहलु भी गौर करने लायक है। हमारे यहां परंपरा है कि अमुक देवी-देवता को उनकी पसंद के अमुक गंध के अमुक फूल-फल व मिश्ठान्न अर्पित करते हैं। इससे तो यही अर्थ निकलता है कि वे हमारी ओर से अर्पित वस्तु को भोग करते हैं और प्रसन्न होते हैं। इस तथ्य से इस बात की पुष्टि होती है कि भगवान सुगंधित अगरबत्ती को स्वीकार करते हैं और प्रसन्न होते हैं।


रविवार, जनवरी 04, 2026

क्या मृतात्मा को बुलाया जा सकता है?

यह कौतुहल लंबे समय से बना हुआ है कि क्या मृतात्मा को बुलाया जा सकता है या क्या मृतात्मा से बात की जा सकती है? इसका उत्तर धर्म, आध्यात्म, और विज्ञान, तीनों दृष्टियों से अलग-अलग है।

लगभग सभी धर्मों में माना गया है कि मृत आत्मा को बुलाना या उससे संपर्क करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। हिंदू मत के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा अपने कर्मों के अनुसार यमलोक या पितृलोक की यात्रा करती है। जब तक वह अपने अगले जन्म या मोक्ष की स्थिति में नहीं पहुंचती, तब तक उसे बाधित करना अधर्म माना जाता है। इसलिए “आत्मा बुलाना” जैसे प्रयोग प्लेन चिट बोर्ड करने को पाप या अपवित्र माना जाता है। इसी प्रकार इस्लाम में आत्माओं से संपर्क करना वर्जित है, क्योंकि माना जाता है कि आत्माओं के नाम पर अक्सर जिन्न या दुष्ट शक्तियां धोखा देती हैं। ईसाई मत में भी स्पिरिट कॉलिंग को निषिद्ध कहा गया है। आपको जानकारी होगी कि कुछ लोग प्लेन चिट बोर्ड के जरिए इच्छित मृतात्मा को बुलाने का दावा करते हैं, मगर उसमें मृतात्मा से संवाद संकेतों में होता है, जिसको पक्के तौर पर नहीं माना जा सकता कि मृतात्मा से वास्तव में संवाद हो रहा है।

विज्ञान के अनुसार अब तक कोई प्रमाण नहीं कि किसी मृत व्यक्ति की आत्मा को सचमुच बुलाया जा सकता है या उससे संपर्क संभव है।

स्पिरिट कॉलिंग, टेबल टर्निंग या ओइजा बोर्ड जैसे प्रयोग मनुष्य के अवचेतन मन और आटो-सजेशन से जुड़ी मानी जाती हैं, यानी दिमाग स्वयं वह अनुभव गढ़ लेता है।

कुछ साधक या तांत्रिक दावा करते हैं कि वे आत्माओं से संवाद कर सकते हैं, लेकिन ऐसे अनुभव प्रायः ऊर्जात्मक या मानसिक कंपन के रूप में होते हैं, न कि वास्तव में आत्मा के आगमन के रूप में। अधिकतर मामलों में यह भ्रम या मानसिक प्रभाव साबित हुआ है।

इस सिलसिले में मेरा अनुभव यह है कि मैं दरगाह के एक खादिम के हुजने में बैठा था। उन्होंने बताया कि वह अपने दिवंगत गुरू को उनकी कृपा पाने के लिए बुला सकते हैं। उन्होंने आंख बंद कर गुरू को याद किया और यकायक बहुत मोहक सुगंध पूरे हुजरे में फैल गई। उनका दावा था कि उनके गुरू हुजरे में आ गए हैं। इस बारे में मैने कुछ जानकारों से पूछा तो उन्होंने बताया कि आत्मा का अस्तित्व वायु रूप है, और उसका आव्हान करने पर वह गंध के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती है। इस बारे में मेरा एक अनुभव यह है कि जब मेरी माताश्री का निधन हुआ तो जिस कमरे में वे रहती थीं, वहां लगातार तीन दिन तक गुलाब की महक आती रही, जबकि वहां न तो कोई अगरबत्ती जलाई हुई थी और न ही किसी ने इत्र लगा रखा था।