आपको यह भी जानकारी होगी कि जब ज्योतिशी चौराहे, तिराहे अथवा वृक्ष इत्यादि पर कोई टोटका करने की सलाह देते हैं तो साथ हिदायत देते हैं कि टोटके के बाद पीछे मुड कर नहीं देखना है। कदाचित इसके पीछे भी वही दर्षन है कि आप जो भी टोटका कर रहे हैं, वह स्वतंत्र रूप से तभी काम करेगा, जबकि आप उससे संबंध विच्छेद कर लेंगे। “पीछे न देखना” का असली संदेश यह है कि आपने जो कर्म किया है, उसे पूर्ण मानो। उससे भावनात्मक या ऊर्जात्मक जुड़ाव न रखो।
तीसरी आंख
रविवार, जनवरी 25, 2026
शवदाह के बाद पीछे मुड़ कर क्यों नहीं देखते?
शुक्रवार, जनवरी 23, 2026
शुभ-अशुभ का संकेत जानने के लिए डाली जाती है फार
शुभ-अशुभ संकेत जाना जाता है, मन का संशय दूर किया जाता है, बड़े निर्णय से पहले दैवी संकेत लिया जाता है और पारंपरिक आस्था के अनुसार मार्गदर्शन लिया जाता है। फार डालना ज्योतिष से अधिक लोक-विश्वास पर आधारित प्रक्रिया है। सिंधी समाज में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और विशेषकर विवाह, यात्रा, व्यापार प्रारंभ, रोग या संकट जैसे समयों में आज भी प्रचलित है। सिंधी समाज में फार डालने की एक बहुत प्रचलित और सरल विधि “कौड़ी की फार” मानी जाती है। इसे आज भी कई परिवारों में श्रद्धा के साथ अपनाया जाता है। सिंधी परंपरा के अनुसार 5 या 7 साबुत कौड़ियां, लाल कपड़ा या साफ थाली, दीपक आदि लिए जाते हैं। हाथ-पैर धोकर शांत चित्त से बैठते हैं। मन में उस घटना या प्रश्न को स्पष्ट रूप से सोचते हैं, जिसका फल जानना है। सिंधी परंपरा में प्रायः कहा जाता है, “झूलेलाल साईं, सच्चो फार बुधायो बतायो”। कुछ लोग अपनी कुल देवी का स्मरण करते हैं। सभी कौड़ियों को दोनों हथेलियों में लेकर प्रश्न दोहराते हैं। फिर कौड़ियों को लाल कपड़े या थाली पर एक साथ गिरा देते हैं। यदि अधिक कौडियां खुली हों तो इसे षुभ संकेत मानते हैं। सभी कौडियां खुली हों तो कार्य को सिद्ध माना जाता है यानि उसमें कोई विलंब नहीं होगा।
अधिक कोडियां बंद हों तो माना जाता है कि कार्य में रुकावट आएगी। सभी कौडियां बंद हों तो यह अर्थ निकाला जाता है कि कार्य को स्थगित कर दीजिए। खुली और बंद कौडियां लगभग बराबर हों तो इसका अर्थ है कि परिणाम अनुकूल तो होगा, लेकिन उसके लिए धैर्य पूर्वक प्रयास करने होंगे।
अगर कौड़ियां एक-दूसरे पर चढ़ जा तो इसका मतलब है कि कार्य में बाहरी हस्तक्षेप होगा या भ्रम की स्थिति बनेगी। कोई कौड़ी थाली से बाहर गिरे, तो इसका मतलब है कि प्रश्न पुनः पूछना उचित नहीं है। फार तीन बार से अधिक नहीं डालते। कुल मिला कर फार को अंतिम निर्णय नहीं, बल्कि दैवी संकेत माना जाता है। एक ही प्रश्न बार-बार नहीं दोहराया जाता। कुछ लोग सुपारी की फार व चावल-दाने की फार डालते हैं।
सोमवार, जनवरी 19, 2026
महान लोगों की उम्र कम क्यों होती है?
असंख्य उदाहरण ऐसे मिलते हैं, जहां अत्यधिक परिश्रम और तनाव से मधुमेह, हार्ट अटैक, स्ट्रोक आदि का खतरा बढ़ता है।
एक बात और ऊँचाई पर पहुंचने पर अकेलापन झेलते हैं। अधिसंख्य लोग जब शीर्ष पर पहुँचते हैं, तो उन्हें कई तरह के दबाव घेर लेते हैं। सार्वजनिक छवि बनाए रखने की जुगत, असफल न दिखने का डर, सतत प्रतिस्पर्धा और आलोचना, ईर्श्या की राजनीति के अतिरिक्त् उन पर और भी ऊँचा जाने का निरंतर दबाव रहता है।
यह सब मानसिक थकान, अवसाद, चिंता तथा आत्म-देखभाल की कमी पैदा करता है। अक्सर सफलता जितनी चमकीली दिखती है, उतनी ही अकेली भी होती है।
शीर्ष पर पहुँचे कई लोगों का जीवन एकदम अनियमित हो जाता है। देर रात तक काम, अत्यधिक यात्राएँ, असंतुलित खान-पान, कभी-कभी नशे या उत्तेजक पदार्थों की ओर झुकाव और व्यायाम का अभाव, यह सब स्वास्थ्य को दीर्घकाल में नुकसान पहुंचाता है।
प्रसिद्ध दार्शनिकों और परंपराओं में एक विचार मिलता है कि जो जीवन बहुत तीव्र लौ की तरह जलता है, वह प्रायः कम आयु का होता है। यानि जो लोग कम समय में अत्यधिक ऊर्जा, रचनात्मकता, प्रतिभा और परिश्रम झोंक देते हैं, वे जीवन की बैटरी बहुत तेजी से खर्च कर देते हैं।
कुछ उदाहरण यह साबित करते हैं कि ज्यादातर महान लोग जल्दी मरते हैं, जबकि आँकड़ों के स्तर पर यह सार्वभौमिक सत्य नहीं है। संतुलित जीवन वाले महान लोग लंबी आयु तक जिए- नेल्सन मंडेला, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, शिवाजी महाराज की माता जीजाबाई, बेंजामिन फ्रैंकलिन, टॉलस्टॉय, रतन टाटा। इन सबने लंबी और सार्थक आयु पाई क्योंकि सफलता और जीवन में संतुलन बनाए रखा।
एक अवधारणा यह भी है कि महान लोग बहुत कुछ पूर्व जन्म में ही हासिल कर लेते हैं और मौजूदा जन्म में कम उम्र में ही पूरी सफलता हासिल कर लेते हैं।
शुक्रवार, जनवरी 16, 2026
पेशाब या शौच के वक्त नए आइडिया क्यों आते हैं?
शनिवार, जनवरी 10, 2026
चैट जीपीटी से मौलिक लेखकों पर संकट?
ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है, क्या इससे मौलिक लेखकों के सामने संकट खड़ा हो रहा है? जब मशीन लेखन उपलब्ध है, तो कोई प्रकाशक या संपादक किसी मौलिक लेखक को प्राथमिकता क्यों देगा? दिलचस्प है कि यही प्रश्न जब चैट जीपीटी से पूछा गया, तो उसका उत्तर अपेक्षाकृत ईमानदार और संतुलित था। उसके अनुसार, मौलिक लेखकों का अंत नहीं होगा, लेकिन लेखन की दुनिया का स्वरूप अवश्य बदलेगा।
चैट जीपीटी जैसे एआई टूल साधारण, फॉर्मूलानुमा और सूचना-आधारित लेखन में बेहद सक्षम हैं। खबरों का पुनर्लेखन, सामान्य ज्ञान, सतही विश्लेषण या एसईओ आधारित सामग्री, इन क्षेत्रों में एआई तेज, सस्ता और पर्याप्त साबित हो सकता है। निस्संदेह, इससे औसत स्तर के कॉलम और कंटेंट लेखन में मानव लेखकों की मांग घट सकती है।
लेकिन यहीं से मौलिक लेखक की असली पहचान शुरू होती है। मौलिक लेखन अनुभव से जन्म लेता है और अनुभव मशीन के पास नहीं होता। भूख की टीस, सत्ता का दमन, प्रेम की विफलता, लोकजीवन की गंध, विस्थापन का दर्द या समय की बेचौनी, इन सबको लेखक जीता है, तब लिखता है। एआई इन भावनाओं की नकल कर सकता है, अनुभूति नहीं।
व्यवस्था से टकराने वाला लेख, जोखिम उठाने वाली कविता और समय के विरुद्ध खड़ा निबंध,यह दृष्टि है, विजन है, जो अभी भी मानवीय चेतना की देन है। मशीन आंकड़े दे सकती है, संदर्भ जोड़ सकती है, लेकिन नैतिक साहस और वैचारिक टकराव नहीं रच सकती।
हां, जो लेखक नई भाषा नहीं गढ़ता, नए प्रश्न नहीं उठाता और पुरानी लकीरों पर ही चलता रहता है, उसके लिए एआई सचमुच खतरा है। लेकिन जो लेखक अपने समय को पढ़ता है, लोक, दर्शन, इतिहास और निजी अनुभव को जोड़कर अपनी अलग आवाज पहचानता है, उसके लिए एआई केवल एक औजार है, प्रतिद्वंद्वी नहीं।
भविष्य में संभवतः श्रेष्ठ लेखन का नया मॉडल सामने आएगा, जहां लेखक सोच देगा, दृष्टि देगा और एआई संरचना, संपादन तथा संदर्भ में सहायक बनेगा। जैसे कैमरे के आने से चित्रकार समाप्त नहीं हुए, बल्कि चित्रकला के नए रूप सामने आए, वैसे ही एआई से लेखक समाप्त नहीं होंगे।
कुल मिलाकर, चैट जीपीटी मौलिक लेखकों के लिए खतरा नहीं, बल्कि औसत और यांत्रिक लेखन के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है।
शुक्रवार, जनवरी 09, 2026
पैर हिलाना व चाबी को घुमाना अशुभ?
शिष्टाचार की दृष्टि से अनुचित है। यदि व्यक्ति सचेत, स्थिर और संयमित रहने का अभ्यास करे, तो ये आदतें स्वतः कम हो सकती हैं।
मंगलवार, जनवरी 06, 2026
क्या खुशबूदार अगरबत्ती से भगवान प्रसन्न होते हैं?
आमतौर पर जब भी हम अगरबत्ती या धूप खरीदते हैं तो यह ख्याल रखते हैं कि हमें कौन सी खुशबूू पसंद है? भाव भले ही भगवान को प्रसन्न करने का हो, मगर खुशबूू का चयन अपनी पसंद के अनुसार ही करते हैं। हाल ही किराने के दुकानदार से जब अगरबत्ती खरीद रहा था तो उसने दो तरह की अगरबत्तियां दिखाईं, एक सामान्य खुशबूू वाली सस्ती अगरबत्ती व दूसरी बेहतरीन खुशबूू वाली थोडी महंगी अगरबत्ती। मैने उनसे कहा कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए तो अगर नामक जडी वाली अगरबत्ती या धूप जलाई जाती है। उसमें भांति भांति की खुशबूू तो हम स्वयं अपने आनंद लेने के लिए जलाते हैं, भगवान के लिए नहीं। इस पर वहां मौजूद एक बुजुर्ग ने कहा कि ऐसी बात नहीं है। खुशबूू का आनंद भगवान भी लेते हैं। खुशबूू वाली अगरबत्ती से भगवान अधिक प्रसन्न होते हैं। यह बात मेरे गले नहीं उतरी, मगर मैने इस विषय में डुबकी लगाने की सोची।
दरअसल भारतीय परंपरा में भगवान की पूजा के पांच उपचार बताए गए हैं, गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य। शास्त्रों में यह नहीं कहा गया कि भगवान को किस ब्रांड या कितनी महंगी खुशबूूदार अगरबत्ती चाहिए। वस्तुतः भगवान को भाव प्रिय है, वस्तु नहीं। इस सिलसिले में भगवतगीता में कहा गया है कि “पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति” अर्थात भाव से अर्पित की गई साधारण वस्तु भी भगवान स्वीकार करते हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि अगर आपके पास भगवान को चढाने के लिए फूल नहीं हैं तो आप आंख मूंद कर कल्पना करें कि आपके पास फूल हैं और आप उन्हें भगवान को चढा रहे हैं, भगवान उन्हें भी स्वीकार करते हैं। स्पष्ट है कि भगवान फूल को नहीं भाव को देखते हैं। तो फिर सवाल उठता है कि हम खुशबूूदार अगरबत्ती क्यों जलाते हैं? ऐसी प्रतीत होता है कि भगवान को भले ही खुशबूूदार अगरबत्ती से कोई सरोकार नहीं, वह तो हम इसलिए जलाते हैं, ताकि मन की विक्षेपता शांत हो, वातावरण पवि़त्र बने, मन की प्रसन्नता से इंद्रियां एकाग्र हों, जिससे अहंकार और सांसारिक दुर्गंध यथा क्रोध, ईर्श्या, लोभ आदि का दहन हो। यानी सुगंधित धूप बाहरी से अधिक आंतरिक शुद्धि का प्रतीक है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो खुशबू से मन शांत होता है। जब मन शांत होता है तो प्रार्थना सच्ची बनती है, ध्यान गहरा होता है, श्रद्धा स्वाभाविक होती है। यह स्थिति भक्त के लिए लाभकारी है, न कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए कोई आवश्यकता।
ज्ञातव्य है कि कबीर, तुलसी, मीरा जैसे संतों ने बार-बार कहा है कि भगवान धूप-दीप से नहीं, हृदय की निर्मलता से प्रसन्न होते हैं। भगवान खुशबू से नहीं, भावना से प्रसन्न होते हैं।
यहां एक पहलु भी गौर करने लायक है। हमारे यहां परंपरा है कि अमुक देवी-देवता को उनकी पसंद के अमुक गंध के अमुक फूल-फल व मिश्ठान्न अर्पित करते हैं। इससे तो यही अर्थ निकलता है कि वे हमारी ओर से अर्पित वस्तु को भोग करते हैं और प्रसन्न होते हैं। इस तथ्य से इस बात की पुष्टि होती है कि भगवान सुगंधित अगरबत्ती को स्वीकार करते हैं और प्रसन्न होते हैं।
रविवार, जनवरी 04, 2026
क्या मृतात्मा को बुलाया जा सकता है?
लगभग सभी धर्मों में माना गया है कि मृत आत्मा को बुलाना या उससे संपर्क करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। हिंदू मत के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा अपने कर्मों के अनुसार यमलोक या पितृलोक की यात्रा करती है। जब तक वह अपने अगले जन्म या मोक्ष की स्थिति में नहीं पहुंचती, तब तक उसे बाधित करना अधर्म माना जाता है। इसलिए “आत्मा बुलाना” जैसे प्रयोग प्लेन चिट बोर्ड करने को पाप या अपवित्र माना जाता है। इसी प्रकार इस्लाम में आत्माओं से संपर्क करना वर्जित है, क्योंकि माना जाता है कि आत्माओं के नाम पर अक्सर जिन्न या दुष्ट शक्तियां धोखा देती हैं। ईसाई मत में भी स्पिरिट कॉलिंग को निषिद्ध कहा गया है। आपको जानकारी होगी कि कुछ लोग प्लेन चिट बोर्ड के जरिए इच्छित मृतात्मा को बुलाने का दावा करते हैं, मगर उसमें मृतात्मा से संवाद संकेतों में होता है, जिसको पक्के तौर पर नहीं माना जा सकता कि मृतात्मा से वास्तव में संवाद हो रहा है।
विज्ञान के अनुसार अब तक कोई प्रमाण नहीं कि किसी मृत व्यक्ति की आत्मा को सचमुच बुलाया जा सकता है या उससे संपर्क संभव है।
स्पिरिट कॉलिंग, टेबल टर्निंग या ओइजा बोर्ड जैसे प्रयोग मनुष्य के अवचेतन मन और आटो-सजेशन से जुड़ी मानी जाती हैं, यानी दिमाग स्वयं वह अनुभव गढ़ लेता है।
कुछ साधक या तांत्रिक दावा करते हैं कि वे आत्माओं से संवाद कर सकते हैं, लेकिन ऐसे अनुभव प्रायः ऊर्जात्मक या मानसिक कंपन के रूप में होते हैं, न कि वास्तव में आत्मा के आगमन के रूप में। अधिकतर मामलों में यह भ्रम या मानसिक प्रभाव साबित हुआ है।
इस सिलसिले में मेरा अनुभव यह है कि मैं दरगाह के एक खादिम के हुजने में बैठा था। उन्होंने बताया कि वह अपने दिवंगत गुरू को उनकी कृपा पाने के लिए बुला सकते हैं। उन्होंने आंख बंद कर गुरू को याद किया और यकायक बहुत मोहक सुगंध पूरे हुजरे में फैल गई। उनका दावा था कि उनके गुरू हुजरे में आ गए हैं। इस बारे में मैने कुछ जानकारों से पूछा तो उन्होंने बताया कि आत्मा का अस्तित्व वायु रूप है, और उसका आव्हान करने पर वह गंध के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती है। इस बारे में मेरा एक अनुभव यह है कि जब मेरी माताश्री का निधन हुआ तो जिस कमरे में वे रहती थीं, वहां लगातार तीन दिन तक गुलाब की महक आती रही, जबकि वहां न तो कोई अगरबत्ती जलाई हुई थी और न ही किसी ने इत्र लगा रखा था।


