तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

बुधवार, अप्रैल 02, 2025

नशे का दुष्प्रभाव न पडने का उपाय

 दोस्तो, नमस्कार। षास्त्रों का अध्ययन करने वाले एक बुजुर्ग ने एक बार अनूठी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अव्वल तो नषा करना ही नहीं चाहिए। वह नुकसान करता है। लेकिन नषे की आदत हो गई हो और न छूटती न हो तो नषे से होने वाले नुकसान से बचने के लिए एक उपाय करना चाहिए। उन्होंने बताया कि प्रतिदिन स्नान करने के दौरान आप अगर षिषन पर तीन चार मिनट ठंडे पानी की धार बहाएंगे तो नषे से होने वाले दुश्प्रभाव नश्ट हो जाएंगे। नषे से उत्पन्न गर्मी षीतल हो जाएगी। जाहिर है कि उन्होंने अनुभव व अध्ययन के आधार पर यह जानकारी दी होगी, लेकिन साथ ही उन्होंने एक तर्क भी दिया। उनका कहना था कि भगवान षिव भांग-धतूरे का सेवन करते थे, इसके अतिरिक्त एक बार उन्होंने गरल अर्थात विश का सेवन कर लिया था, जिसे उन्होंने कंठ पर रोक लिया था, कंठ नीला पड गया, जिसकी वजह से उनका नाम नील कंठ कहा जाने लगा। और नषे व विश का दुश्प्रभाव रोकने यानि निश्प्रभावी करने के लिए षिव लिंग पर निरंतर जलधारा बहाने की परंपरा है। उनकी यह बात कितनी सही है, पता नहीं, मगर अर्थपूर्ण तो लगती है। वैसे भी यह एक सामान्य कौतुहल तो है ही कि आखिर क्यों लिंग के आकार के पत्थर पर निरंतर पानी की धारा बहाई जाती है। इस मामले में एक सोच यह भी बताई जाती है कि शिव को संहारकर्ता माना जाता है और जलधारा से उनका क्रोध शांत होता है। यह भक्तों की आस्था है कि इससे शिव जी प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद देते हैं।


https://youtu.be/IFeRSoZ0VX0



सोमवार, मार्च 31, 2025

हजारों खिज्र पैदा कर चुकी है नस्ल आदम की

दोस्तो, नमस्कार। टीम एज में मैं थोडा सा पागल था। कोई कहता था कि मेरा दिमाग थोडा सरका हुआ है तो कोई फिलोसोपर कहा करता था। तब एक ही सवाल दिमाग में कुलबुलाया करता था कि इस धरती पर कितने भगवान, ऋशि-मुनि, दार्षनिक, विद्वान, धर्मगुरू अवतरित हुए, मगर हम जैसे जैसे कथित रूप से सभ्य होते जा रहे हैं, उतने ही चालाक और भ्रश्ट बनते जा रहे हैं। धर्म और पंथ के नाम पर एक दूसरे के दुष्मन बने हुए हैं। क्यों? क्या महात्माओं का जन्म बेमानी हो गया? फिर गीता का सुपरिचित सूत्र संज्ञान में आया। श्रीकृश्ण कहते हैं, यदा यदा हि धर्मस्य ग्यानिर्भिवति भारतः, अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मनं सृजाम्यहम। जब जब धर्म की हानि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूं, अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूं। यानि प्रकृति में ऐसी व्यवस्था है कि धर्म की हानि होगी ही, वह अवष्यंभावी है। मतलब अंधेरा षाष्वत है, उसे मिटाने को प्रकाष को आना पडता है। और जैसे ही प्रकाष मद्धम पडता है, अंधेरा उभर कर आ जाता है। कदाचित यही वजह है कि अवतार आते हैं, मगर फिर फिर आदमी अधार्मिक होता रहता है। इस सिलसिले में किसी षायर का यह षेर ख्याल में आता है- हजारों खिज्र पैदा कर चुकी है नस्ल आदम की, ये सब तस्लीम, मगर आदमी अब तक भटकता है। खिज्र यानि पथ प्रदर्षक और तस्लीम का मतलब स्वीकार। है न कडवी सच्चाई। बहरहाल, उसी दौर में मेरे अंग्रेजी के षिक्षक, जो कि दार्षनिक थे, उन्होंने उपदेष दिया कि दुनिया की चिंता छोडो, फालतू के सवाल करना बंद करो, यह दुनिया ऐसी ही है, कभी बुरी कभी भली। जब अवतार भी इसे स्थाई रूप से नहीं सुधार पाए तो तुम एक मामूली से इंसान क्या कर पाओगे? चिंता सिर्फ अपनी करो, चिंतन केवल आत्म कल्याण का किया करो।


https://youtu.be/eOsAkZ_zC7s


रविवार, मार्च 30, 2025

यह टोटका है सच है या अंधविष्वास?

दोस्तो, नमस्कार। सालों पहले जोधपुर में मेरे चचेरे भाई ने एक जानकारी दी थी, जो कि उन्हें किसी विद्वान ने बताई थी। आप भी जानिए, षायद आपके काम आ जाए। असल में यह एक टोटका है। वो यह कि जब भी हम अपना वाहन मोटर साइकिल, स्कूटर, कार इत्यादि पार्क कर किसी काम से जा रहे होते हैं, तो जाते समय पीछ मुड कर एक बार उसे ठीक से निहार लेने और सुरक्षित रहने का आग्रह करने से उसके चोरी होने की संभावना खत्म हो जाती है। हालांकि मैने भी इसे कई बार आजमाया और ठीक ही पाया, मगर आज तक सुनिष्चित नहीं हूं कि यह कीमिया है क्या? और यह कि इस टोटके का साइंस क्या है? प्रत्यक्षतः अंधविष्वास ही प्रतीत होता है। मगर जिसने भी यह टोटका इजाद किया है तो जरूर उसका कोई आधार होगा। कदाचित ऐसा हो सकता है कि जब हम अपने वाहन को निहारते हुए उसके सुरक्षित रहने की कामना करते हैं तो उसे मानसिक सुरक्षा घेरा मिल जाता है। इस वजह से चोरी करने वाले की नियत उस ओर नहीं हो पाती। अगर यह टोटका मिथ्या है तो भी इसे अपनाने में बुराई ही क्या है? 


शुक्रवार, मार्च 28, 2025

दरवाजे पर सी ऑफ करने की परंपरा क्यों?

दोस्तो, नमस्कार। आपने अमूमन देखा होगा कि जब भी परिवार का कोर्इ्र सदस्य घर से बाहर जा रहा हो, यानि बाजार जा रहा हो, ऑफिस जा रहा हो, घूमने जा रहा हो या यात्रा पर जा रहा हो तो उसकी माताजी, धर्मपत्नी या अन्य सदस्य उसे दरवाजे तक सी ऑफ करते हैं। अपनत्व गहरा हो तो दरवाजे के बाद गली के नुक्कड तक भी निहारते रहते हैं और बाय बाय करते हैं। यह एक परंपरा है, जिसे कि षिश्टाचार व औपचारिकता की संज्ञा दी जा सकती है। विदाई के समय दरवाजे पर आकर किसी को देखना यह दर्शाता है कि हम उनकी परवाह करते हैं। यह प्रेम और अपनापन दिखाने का एक तरीका है। ऐसा माना जाता है कि जब कोई घर से बाहर जाता है और पीछे मुड़ कर देखता है कि उनके प्रियजन उन्हें विदा कर रहे हैं, तो इससे यात्रा के प्रति एक सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। यह मानसिक रूप से व्यक्ति को आश्वस्त करता है कि उसका परिवार उसके साथ है। दरवाजे तक आकर विदा करना यह दर्शाता है कि हम चाहते हैं कि जाने वाला व्यक्ति जल्द ही लौटे और हमारे साथ फिर से जुड़े।

बाहर जा रहा सदस्य भी यह अपेक्षा रखता है कि जाते समय कोई सदस्य दरवाजे तक छोडने आए। अन्यथा, उसे अधूरा अधूरा सा लगता है। वह अधूरापन क्या है? ऐसा लगता है कि बाहर जाने वाले का अपने घर व परिजन के प्रति जो अटैचमेंट है, उसे कायम रखने के लिए ऐसा किया जाता होगा। जिसमें यह भाव भी होता है कि जो भी काम करने जा रहा है, वह पूर्ण हो और वह वापस सुरक्षित लौटे। बाहर जाने वाला भी अपने घर के प्रति अटैचमेंट कायम रखने के लिए ऐसा करता है। हालांकि यह बात अतिषयोक्तिपूर्ण हो जाएगी, मगर मन के सूक्ष्मतम तल में कहीं न कहीं यह भाव होता है कि घर से जा रहा है तो एक बार देख ही लूं। कुल जमा यही समझ में आता है कि दरवाजे तक आकर किसी को विदा करने की परंपरा सिर्फ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक गहरी भावनात्मक और सांस्कृतिक प्रथा है।


https://www.youtube.com/watch?v=z1I4XLYMsME


बुधवार, मार्च 26, 2025

किसी की आंख में मत झांकिये

दोस्तो, नमस्कार। यदि आप किसी से सम्मोहित नहीं होना चाहते या अप्रभावित रहना चाहते हैं या नहीं चाहते कि वह आप पर मानसिक रूप से दबाव बनाए तो एक ही काम कीजिए। आप जब भी उससे बात करें तो उसकी आंख में नहीं झांकिये। यथासंभव उसके चेहरे को नहीं देखिए। इधर उधर देखते हुए बात कीजिए। यदि आपको लगता है कि वह समझ सकता है कि आप उसकी बात पर ध्यान ही नहीं दे रहे तो उसके चेहरे पर देखिए, लेकिन उसके होंठ, दंत पंक्ति, ठुड्डी, कान आदि पर नजर रखिए। उससे उसको लगेगा कि आप उसकी ओर देख रहे हैं, उसको तवज्जो दे रहे हैं। लेकिन भूल कर भी उसकी आंख में नहीं झांकिए। आप उसके आभा मंडल की गिरफ्त में आने से बच जाएंगे। वस्तुतः आंख ही वह खिडकी है, जिसके माध्यम से कोई अपनी भीतरी मानसिक षक्ति को आपकी ओर फेंकता है। और आंख ही वह खिडकी है, जिसके जरिए हम सामने वाले की मानसिक षक्ति को ग्रहण करते हैं। अगर हम आंख से आंख नहीं मिलाएंगे तो प्रभावित होने से बच जाते हैं। यह तथ्य उसी मूल मंत्र का हिस्सा है कि कोई भी आपको तभी सम्मोहित कर सकता है, जब कि आप उसके लिए तैयार हों। अगर आप सम्मोहित नहीं होना चाहते तो कोई भी आपको सम्मोहित नहीं कर पाएगा। इसका विपरीत तथ्य यह है कि अगर आप किसी को सम्मोहित करना चाहते हैं या उसे प्रभावित करना चाहते हैं तो बात करते हुए पूरे मनायोग से उसकी आंख में झांकिये। आंख की महत्ता को यूं भी समझ सकते हैं कि प्रेमी-प्रेमिका के बीच आंतरिक संवाद आंख के जरिए ही होता है। वे आंख के माध्यम से ही एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। आपको ख्याल में होगा कि यदि हम किसी को डराना धमकाना चाहते हैं तो षब्दों के साथ साथ आंख का ही उपयोग करते हैं।

https://ajmernama.com/thirdeye/429077/

https://youtu.be/j100TW_4KZU

सोमवार, मार्च 24, 2025

शोकाकुल महिला को जानबूझ कर क्यों रुलाया जाता है?

दोस्तो, आपका ख्याल में होगा कि किसी का निधन हो जाने पर बारहवें तक नियमित बैठक में नाते-रिश्तेदार महिलाएं आ कर रुदन का करती हैं। शोकाकुल महिला को जानबूझ कर रुलाया जाता है। क्यों?

देहात में यह चलन अब भी है, लेकिन षहरों में आजकल कई लोग परिवार में किसी सदस्य का निधन हो जाने पर तीये की बैठक के साथ ही घोशणा कर देते हैं कि आज के बाद कोई नियमित बैठक नहीं होगी। उसकी वजह यह है कि दुकानदार तीये की बैठक के बाद दुकान नियमित खोलना चाहता है या नौकरीपेषा नौकरी पर जाना चाहता है। जिन परिवारों में नियमित बैठक होती है, उनमें नाते-रिष्तेदार महिलाएं आ कर रूदन करती हैं। जाहिर तौर पर परिवार की षोकाकुल महिलाएं भी बहुत रोती हैं। विषेश रूप से जिस महिला के पुत्र, पुत्री अथवा पति का निधन हो चुका होता है, वह फूट फूट कर रोती है। कई बार रोते-रोते बेहोष तक हो जाती है। ऐसे में परिवार के पुरूश सदस्य क्रोधित हो जाते हैं और महिलाओं से रूदन बंद करने को कहते है। इस पर बुजुर्ग महिलाएं बताती हैं कि रूदन की परंपरा यूं ही नहीं बनाई गई है। अच्छा हमें भी नहीं लगता, मगर रूदन से षोकाकुल महिला की रूलाई बाहर आ जाती है। दिल का दर्द आंसुओं के जरिए बह जाता है। इसलिए जानबूझ कर रूलाया जाता है। अगर उसे रोने नहीं दिया जाएगा तो परिजन की मौत का सदमा उसके दिल में बैठ जाएगा, जो उसके स्वास्थ्य के लिए बहुत नुकसानदेह हो सकता है।

https://www.youtube.com/watch?v=Rakeb588bgY


रविवार, मार्च 23, 2025

बांयी ओर खडे हो कर की गई गुहार पूरी होती है?

दोस्तों, हम लोग भले ही अंध विश्वास की आलोचना करते रहते हैं, मगर अपना कोई काम अटक जाए और कोई रास्ता नजर न आए तो साथियों की सलाह पर कई प्रकार के टोटके भी करते हैं। इनका कोई वैज्ञानिक 

आधार नहीं होता। फिर भी परंपरा के चलते अथवा ज्योतिषी पर विश्वास रख कर इन्हें आजमाते हैं। उन पर केवल यही सोच कर हम भरोसा करते हैं कि जिसने भी टोटका ईजाद किया होगा, तो जरूर उसके पीछे कोई साइंस होगा। हमारा उन पर यकीन हो तब तो ठीक, लेकिन अगर उन पर भरोसा न भी हो तो भी उन्हें आजमाने से परहेज नहीं करते। सोचते हैं कि क्या पता काम सिद्ध हो जाए।

आइये, एक ऐसे टोटके पर चर्चा करते हैं, जिसका उपयोग हमारे दैनिक जीवन में हो सकता है। 

ऐसी मान्यता है कि अगर आपको किसी अधिकारी या किसी ओर से कोई काम हो तो उसके बायीं ओर खड़े हो कर अपनी बात कहिये, वह आसानी से आपकी बात मान जाएगा। इसके पीछे तर्क ये दिया जाता है कि हर व्यक्ति के बायीं ओर हृदय होता है। हृदय अर्थात दिल, जो कि संवेदना का केन्द्र है। वाम अंग पर चंद्रमा का प्रभाव होता है। जब हम बायीं ओर खड़े हो कर उससे कोई मांग रखते हैं तो वह संवेदनापूर्वक हमारी बात मान जाता है। अर्थात दायीं ओर की तुलना में बायीं ओर खड़े होने पर काम सिद्ध होने की संभावना अधिक रहती है। इसलिए जब भी किसी अधिकारी के पास जाएं तो कोशिश करके उसके बायीं ओर खड़े होइये। 

एक बात और। कदाचित ऐसा भी हो सकता है कि टोटका इस्तेमाल करने के दौरान हमारा आत्मविश्वास मजबूत होता हो कि हम टोटके का उपयोग कर रहे हैं। और इसी वजह से अपनी बात पूरी ऊर्जा के साथ कहते हैं, जो सामने वाले पर असर कर जाती हो।

मैने स्वयं इसे आजमाया है। मुझे तो यह तथ्य सही लगा। यह मेरा भ्रम भी हो सकता है, अतः आप स्वयं आजमाइये। संभव है, हम इस तथ्य की बारीकी को न समझ पाएं, मगर बायीं ओर खडे होने में हर्ज ही क्या है? क्या पता तथ्य सही हो। अगर विद्वानों ने बताया है तो कोई तो राज होगा।

https://www-youtube-com/watch\v¾OUsVrDu02W0