तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

मंगलवार, फ़रवरी 03, 2026

मृतक को कफन देने से कष्ट दूर होते हैं?

परंपरा है किसी मृतक को कफन देना बहुत पुण्य का कार्य है और इससे व्यक्ति के कष्ट दूर होते हैं। हिंदू धर्म में मृतक की सेवा अंत्येष्टि संस्कार कहलाती है। शव को वस्त्र पहनाना, मुखाग्नि देना, तिल-जल अर्पण करना,ये सब पुण्यकर्म माने गए हैं। ग्रंथों में कहा गया है कि जो मृतक को सम्मान देता है, वह पितृ-ऋण से मुक्त होता है। पितरों की तृप्ति से कष्ट, रोग और बाधाएं दूर होती हैं। कई संस्थाएं जनसहयोग से लावारिस मृतकों का अंतिम संस्कार करवाती हैं।

खासकर इस्लामी परंपरा में इसकी खास मान्यता है। मान्यता है कि सम्मानपूर्वक कफन देने से अंत समय सहज होता है। हदीसों में भी मृतक की सेवा को सदका (पुण्य) बताया गया है। यह पुण्य केवल मृतक के लिए नहीं, बल्कि करने वाले के आत्मिक उत्थान का कारण माना जाता है। 

वस्तुतः मृत देह असहाय होती है। उसे ढकना, सम्मान देना, अंतिम यात्रा के योग्य बनाना, यह मनुष्य की करुणा और नैतिक जिम्मेदारी है। जब कोई व्यक्ति निस्वार्थ भाव से यह कार्य करता है, तो उसके भीतर की अहंकार-ग्रंथी ढीली पड़ती है, और मानसिक कष्ट स्वतः कम होने लगते हैं। इससे मन में यह अनुभूति होती है कि “मैं किसी के अंतिम क्षणों में काम आया।” यह भावना आत्मसंतोष देती है, जो चिंता, भय और अपराधबोध जैसे मानसिक कष्टों को कम करती है। जब मनुष्य दूसरों के अंतिम कष्ट में सहभागी बनता है, तो प्रकृति या ईश्वर उसे अपने कष्टों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है।

कफन केवल कपड़ा नहीं है, यह समानता का प्रतीक है, यानि अमीर-गरीब सब एक से हैं। यह अस्थायित्व का भी बोध कराता है। एक अर्थ में यह इस तथ्य की भी पुष्टि करती है कि मृत्यु अटल है। जो व्यक्ति इस सत्य को हृदय से स्वीकार कर लेता है, उसके जीवन के कई मोहजन्य कष्ट स्वतः कम हो जाते हैं।

बहुत पुरानी बात है। रेगिस्तान के किनारे बसा एक छोटा-सा कस्बा था। वहां एक गरीब बुनकर रहता था। नाम था रहमतू। उसके घर में न धन था, न सुख। बीमारी, कर्ज और रोजी की चिंता, तीनों ने मिलकर उसका जीवन बोझ बना दिया था। लोग कहते थे, “रहमतू के भाग्य में ही कष्ट लिखा है।” एक दिन कस्बे में एक अनजान मुसाफिर मर गया। न उसका कोई रिश्तेदार था, न पहचान। शव मस्जिद के पास पड़ा रहा। लोग आते-जाते रहे, मगर सबने मुंह फेर लिया। रहमतू भी वहीं से गुजर रहा था। उसके पास सिर्फ एक पुरानी चादर थी। वही, जिसे वह ठंड में ओढ़ता था। वह रुका, देर तक शव को देखता रहा। उसने बिना किसी से पूछे अपनी चादर उतारी और उस मुसाफिर को कफन की तरह ढक दिया। न कोई नाम पूछा, न कोई दुआ मांगी। बस इतना कहा, “या अल्लाह, इसे सुकून दे देना।”

लोग हंसे, “अपने कष्ट छोड़ कर मुर्दों के काम आया है!”

पर अजीब बात हुई। उसी रात रहमतू को बरसों बाद गहरी नींद आई। सपने में उसने देखा, एक उजला चेहरा मुस्करा कर कह रहा है, “जिसने मेरी लाज रखी, उसकी लाज खुदा रखेगा।” कुछ ही दिनों में उसके जीवन की दिशा बदलने लगी। बीमारी ने दम तोड़ा, काम मिलने लगा, कर्ज उतरने लगा। कष्ट एक-एक कर ऐसे दूर हुए, जैसे रेत पर पड़ी लकीरें हवा में मिट जाती हैं। लोग हैरान थे। रहमतू बस इतना कहता, “मैंने कोई करिश्मा नहीं किया। मैंने बस एक बेबस को ढक दिया था।” तब से उस कस्बे में एक कहावत चल पड़ी, “जो मुर्दे को कफन देता है, खुदा उसके कष्ट ढक देता है।”


गुरुवार, जनवरी 29, 2026

बारात रवाना होने से पहले दूल्हा मां का दूध पीता है?

क्या आपको जानकारी है कि एक बहुत पुरानी परंपरा के अनुसार दूल्हा बारात में षामिल होने से पहले मां का दूध पीता है? यह परंपरा अब लुप्त प्रायः हो गई है। अधिसंख्य को तो इसकी जानकारी तक नहीं है। इस परंपरा का कुछ क्षेत्रों और लोककथाओं में इसका रूपकात्मक उल्लेख मिलता है। इसे माँ के ऋण की अंतिम स्वीकृति की संज्ञा दी जा सकती है। लोकधारणा में माना जाता है कि माँ के दूध का ऋण चुकाया नहीं जा सकता। बारात में जाने से पहले दूध पीना या उसका प्रतीक यह दर्शाता है कि बेटा जीवन के सबसे बड़े मोड़ पर माँ के उपकार को स्मरण कर रहा है। एक तरह से यह कृतज्ञता और विनम्रता का भाव है। यह मातृत्व से गृहस्थ जीवन की ओर प्रस्थान का क्षण है। विवाह को दो जन्मों के बीच की रेखा माना गया है। पहला जन्म माँ की गोद और दूसरा जन्म पत्नी के साथ गृहस्थ जीवन का आरंभ। माँ के दूध का स्मरण या प्रतीकात्मक सेवन यह बताता है कि अब पुत्र माँ की छाया से निकल कर अपनी नई जिम्मेदारियों की ओर बढ़ रहा है।

कुछ लोक कथाओं में माँ का दूध बल, संस्कार और नैतिक शक्ति का स्रोत माना गया है। बारात एक तरह से युद्ध की ओर उन्मुख होना है, जिसकी लंबी यात्रा में जोखिम व अनजान भविष्य छिपा है। ऐसे में माँ के दूध का स्मरण मातृ-आशीर्वाद का कवच

समझा जाता था। आज यह प्रथा अधिकतर कहावत, कथा या रस्म के प्रतीक के रूप में रह गई है। कहीं-कहीं दूध, दही या मिठाई माँ के हाथ से खिलाई जाती है। असल उद्देश्य भावनात्मक होता है, शाब्दिक नहीं। यह परंपरा शरीर से ज्यादा मन की रस्म है। दूल्हा दूध नहीं, माँ का आशीर्वाद, संस्कार और जीवन-भर का ऋण अपने साथ लेकर बारात में जाता है।


सोमवार, जनवरी 26, 2026

रामचरितमानस में है भविष्य जानने की तालिका

जिन लोगों ने रामचरितमानस का अध्ययन किया है अथवा फौरी तौर पर उसे देखा है, उन्हें जानकारी होगी कि रामचरितमानस के आरंभिक पेज पर भविष्य जानने की एक तालिका है। रामचरितमानस के प्रति श्रद्धा रखने वाले उसके माध्यम से भविष्य के संकेत हासिल करते हैं। वस्तुतः रामचरितमानस में ‘रामश्लाका’ तालिका लोक-विश्वास, भक्ति और जन-ज्योतिष का एक अनूठा समन्वय है। यह न तो शास्त्रीय ज्योतिष है और न ही शुद्ध कर्मकाण्ड, बल्कि भक्ति के माध्यम से भविष्य-संकेत जानने की एक लोकप्रचलित विधि है।

रामश्लाका का अर्थ है कि श्रीराम के नाम व चरित्र के सहारे भविष्य या किसी प्रश्न का उत्तर जानना। इसमें व्यक्ति अपनी समस्या या जिज्ञासा मन में रख कर रामचरितमानस के किसी दोहा-चौपाई का चयन करता है, और उसी के भावार्थ से फलादेश ग्रहण करता है। यह विधि यह मान कर चलती है कि रामचरितमानस केवल कथा नहीं, जीवंत धर्मग्रंथ है, उसमें जीवन के हर प्रश्न का उत्तर निहित है। यद्यपि ‘रामश्लाका’ शब्द मानस में प्रत्यक्ष नहीं मिलता, पर उसका भावात्मक आधार कई स्थानों पर है। “रामहि केवल प्रेमु पियारा” “कलियुग केवल नाम अधारा”। इन पंक्तियों से यह विश्वास दृढ़ होता है कि रामनाम स्वयं मार्गदर्शक हैं, और उसी पर आश्रित होकर संकेत प्राप्त किया जा सकता है।

रामश्लाका करने की प्रचलित विधि इस प्रकार है। स्नान के बाद शांत चित्त हो कर श्रीराम का ध्यान किया जाता है। फिर मन में एक ही प्रश्न स्पष्ट रूप से रखा जाता है। श्लाका डालने की प्रक्रिया में प्रचलन में दो विधियां अधिक प्रसिद्ध हैं। एक पुस्तक खोलकर श्लाका मानस को बंद आंखों से खोला जाता है। उसमें कहीं पर अंगुली रखी जाती है। जिस दोहा या चौपाई पर अंगुली पड़े, वही उत्तर माना जाता है। दूसरी पद्धति में अंक आधारित रामश्लाका है। इसमें मानस के 7 काण्डों को आधार बनाकर प्रश्नकर्ता मन में एक संख्या चुनता है। उसी काण्ड का चयन कर दोहा निकाला जाता है।

अब सवाल यह कि फलादेश कैसे किया जाता है। फल शब्दशः नहीं, बल्कि भावार्थ से ग्रहण किया जाता है। जैसे “होइहै सोई जो राम रचि राखा” अर्थात ईश्वर की इच्छा सर्वोपरि है, धैर्य रखें। इसी प्रकार “संकट कटै मिटै सब पीरा” अर्थात कठिनाई दूर होगी। इसी तरह “बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं” अर्थात सावधान रहें, संगति बिगाड़ सकती है। आम तौर पर रामश्लाका का प्रयोग विवाह संबंध, संतान, रोग, यात्रा, मुकदमा, व्यापार, नौकरी, संकट या शत्रु भय आदि के लिए किया जाता है।

तुलसीदास की दृष्टि में संकेत ज्ञान भविष्य बताने से अधिक मानसिक बल दिया जाना चाहिए। “धीरज धरम मित्र अरु नारी, आपद काल परखिए चारी”। रामश्लाका का उद्देश्य भी यही है कि निर्णय से पहले विवेक और धैर्य जाग्रत कीजिए।

अब सवाल यह कि क्या रामश्लाका अंधविश्वास है? यदि इसे ईश्वर से संवाद, आत्मनिरीक्षण, सांत्वना और प्रेरणा के रूप में लिया जाए, तो नहीं। पर यदि इसे यांत्रिक भविष्यवाणी मान लिया जाए, तो वह मानस की आत्मा के विपरीत है। कुल मिला कर रामश्लाका रामचरितमानस की वह लोक परंपरा है जिसमें, भक्ति प्रश्न करती है और विवेक उत्तर देता है। यह विधि बताती है कि उत्तर बाहर नहीं, भीतर है, रामनाम केवल दिशा दिखाता है।


रविवार, जनवरी 25, 2026

क्या पक्षियों से बात करना संभव है?

पुराणों और अन्य प्राचीन ग्रंथों में पक्षियों से संवाद के कई प्रसंग मिलते हैं। वैज्ञानिक चिंतन के अनुसार ऐसा संभव नहीं है, लेकिन ऐसा माना जाता है कि पक्षियों की बोली को आध्यात्मिक, प्रतीकात्मक एवं कभी-कभी मनोवैज्ञानिक दृष्टि से समझा जाता है। प्राचीन काल में पक्षियों को संदेशवाहक, देवदूत या भविष्यवक्ता के रूप में भी देखा जाता था। सवाल है कि वह विधा कहां खो गई?

पुराणों एवं शास्त्रों में पक्षियों से बात करने के अनेक प्रसंग मिलते हैं। जब रावण सीता का हरण कर रहा था, तब गरुड़वंशी पक्षी जटायु ने रावण से लड़ते हुए राम को सीता का संदेश दिया। राम ने जटायु से बात भी की। उन्होंने कहा कि हे पक्षिराज, आपने पिता का धर्म निभाया। यह संवाद मानव और पक्षी के बीच हुआ माना गया। गरुड़ (विष्णु का वाहन) पक्षियों के राजा हैं। वे देवताओं, ऋषियों और स्वयं भगवत्कथाओं में संवाद करते हैं। गरुड़ पुराण में गरुड़ और विष्णु के बीच लम्बा संवाद है। इसी प्रकार शुकदेव (शुक = तोता) महर्षि व्यास के पुत्र थे। कहा जाता है कि वे तोते के रूप में ज्ञान सुनते थे और अर्थ समझते थे। भागवत पुराण में शुकदेव-व्यास संवाद आता है।

कहा जाता है कि राजा भोज ने एक चिड़िया से बात की थी, जो भविष्यवाणी करती थी। श्राद्ध के समय कौवे को पितर की ओर से संदेशवाहक मानते है। पुराणों में कौवे को भी यमदूत कहा गया है। सवाल उठता है कि पक्षियों से संवाद क्या वास्तविक था या प्रतीकात्मक? वस्तुतः पक्षी से बात करना मनुष्य के उच्च चेतना स्तर को दर्शाता है। साधक जब एकाग्रता, योग या अध्यात्मिक स्थिति में पहुंचता है, तब प्रकृति की भाषा समझ सकता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार संभवतः ऋषि-मुनि पक्षियों की ध्वनि, दिशा, उड़ान के संकेतों और व्यवहार से अनुमान लगाते थे, जिसे बाद में “संवाद” के रूप में वर्णित किया गया। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से मनुष्य प्रकृति से जुड़कर अपने मन की बात को पक्षियों के व्यवहार में उत्तर के रूप में महसूस करता है।

कुल मिला कर पुराणों में पक्षियों से बात करने का तात्पर्य प्रकृति से गहरे सामंजस्य, अंतर्ज्ञान और उच्च आध्यात्मिक स्थिति को दर्शाता है। यह शाब्दिक कम, और संकेतात्मक एवं योगिक अधिक है। अर्थात 

पक्षी बात तो करते हैं, पर मनुष्य उसे सीधे भाषा की तरह सुन-समझ नहीं सकता। उनकी ध्वनियां (चहकना, सुर, पुकार, चेतावनी आदि) एक प्रकार की संचार प्रणाली होती हैं, पर वह मानव भाषा जैसी संरचना वाली नहीं होती। पक्षी अपनी आवाजों से कई तरह की बातें व्यक्त करते हैं। जैसे मधुर चहक से साथी को आकर्षित करना, क्षेत्र घोषित करना, बिल्ली, बाज आदि की ओर से तेज चेतावनी स्वर कर खतरे की सूचना देना। आपने देखा होगा कि जब किसी कौए की मृत्यु होती है तो आस पास के सभी कौए एकत्र हो कर आसमान में विचरण करते हुए चेतावनी के स्वर निकालते हैं। अन्य पक्षी भी इस तरह के चेतावनी सूचक स्वर निकालते हैं। अब सवाल उठता है कि क्या पक्षी की आवाज क्या मनुष्य समझ सकता है? इसका उत्तर यह है कि सुर और लय को सुन कर उसके भाव का अनुमान लगा सकता है, सटीक मतलब नहीं, मनुष्य पूर्ण अर्थ नहीं समझ पाता।

वैज्ञानिक शोध कहते हैं कि कुछ पक्षी जैसे तोता, मैना मानव ध्वनि की नकल तो कर सकते हैं, पर यह समझ आधारित नहीं, प्रशिक्षण आधारित नकल होती है। जापान और ऑस्ट्रेलिया के अध्ययनों में पाया गया कि कुछ पक्षी अलग-अलग शिकारी के लिए अलग चेतावनी स्वर देते हैं, पर मनुष्य इसे सीधे नहीं समझ सकता, सिर्फ शोध द्वारा पता चलता है। आपको जानकारी होगी कि तोता मानव भाषा बोल सकता है, पर बोलते वक्त अर्थ समझे बिना। लब्बोलुआब मनुष्य पक्षियों की भाषा नहीं सीख सकता, क्योंकि वह लय, आवृत्ति और ध्वनि पैटर्न का सिस्टम है, शब्दों का नहीं। पक्षी आपस में बातें करते हैं मगर अपनी खुद की पक्षी भाषा में। 


शवदाह के बाद पीछे मुड़ कर क्यों नहीं देखते?

आपको जानकारी होगी कि षव का अंतिम संस्कार करने के बाद पीछे मुड कर न देखने की सलाह दी जाती है। क्या आपने सोचा है कि इसकी वजह क्या है? इस बारे में गरूड पुराण में कहा गया है कि जब षव को अग्नि के हवाले करने के बाद नाते-रिष्तेदार लौट रहे होते हैं तो मृतक की आत्मा उनको देख रही होती है और मोहवष उनके साथ लौटना चाहती है, जब कि मृत्योपरांत अंत्येश्टि के बाद उसे आगे की यात्रा करनी होती है। यदि परिजन पीछे मुड कर देखते हैं तो मृतात्मा को मोह के बंधन से मुक्त होने में कठिनाई होती है। उसकी आगे की यात्रा (यमनाड, पितृलोक या पुनर्जन्म की प्रक्रिया) में बाधा आती है। कुल जमा बात यह है कि मृत आत्मा के इस जगत से संबंध विच्छेद के वक्त किसी तरह का मोह उत्पन्न न हो इसके लिए परिजन को पीछे मुड कर न देखने को कहा जाता है।

आपको यह भी जानकारी होगी कि जब ज्योतिशी चौराहे, तिराहे अथवा वृक्ष इत्यादि पर कोई टोटका करने की सलाह देते हैं तो साथ हिदायत देते हैं कि टोटके के बाद पीछे मुड कर नहीं देखना है। कदाचित इसके पीछे भी वही दर्षन है कि आप जो भी टोटका कर रहे हैं, वह स्वतंत्र रूप से तभी काम करेगा, जबकि आप उससे संबंध विच्छेद कर लेंगे। “पीछे न देखना” का असली संदेश यह है कि आपने जो कर्म किया है, उसे पूर्ण मानो। उससे भावनात्मक या ऊर्जात्मक जुड़ाव न रखो।


शुक्रवार, जनवरी 23, 2026

शुभ-अशुभ का संकेत जानने के लिए डाली जाती है फार

सिंधी समाज सहित कुछ अन्य समाजो में किसी घटना-विशेष का फलित यानि शुभ-अशुभ संकेत जानने के लिए एक पारंपरिक विधि अपनाई जाती है, उसे प्रायः “फार डालना” कहा जाता है। कुछ स्थानों पर इसे “देव-फार”, “शकुन-फार” या केवल “फार” कहा जाता है। फार वस्तुतः एक प्रकार की दैव-प्रश्न या शकुन-प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से यह जाना जाता है कि कोई कार्य, यात्रा, विवाह, व्यापार, बीमारी या अन्य घटना शुभ फल देगी या नहीं। फार कैसे डाली जाती है? क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार इसमें थोड़ा अंतर मिलता है, पर सामान्य रूप से कौड़ी, सुपारी, चावल के दाने, फूल, दीपक या धागा लिया जाता है। कभी-कभी सिंधी पंचांग (तिथि-वार) या लोक-गणना का सहारा लिया जाता है। किसी देवता या कुलदेवी को स्मरण कर प्रश्न मन में रखा जाता है और वस्तुओं की गणना, दिशा, गिरावट या बनावट देखकर फलित निकाला जाता है। और इस प्रकार 

शुभ-अशुभ संकेत जाना जाता है, मन का संशय दूर किया जाता है, बड़े निर्णय से पहले दैवी संकेत लिया जाता है और पारंपरिक आस्था के अनुसार मार्गदर्शन लिया जाता है। फार डालना ज्योतिष से अधिक लोक-विश्वास पर आधारित प्रक्रिया है। सिंधी समाज में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और विशेषकर विवाह, यात्रा, व्यापार प्रारंभ, रोग या संकट जैसे समयों में आज भी प्रचलित है। सिंधी समाज में फार डालने की एक बहुत प्रचलित और सरल विधि “कौड़ी की फार” मानी जाती है। इसे आज भी कई परिवारों में श्रद्धा के साथ अपनाया जाता है। सिंधी परंपरा के अनुसार 5 या 7 साबुत कौड़ियां, लाल कपड़ा या साफ थाली, दीपक आदि लिए जाते हैं। हाथ-पैर धोकर शांत चित्त से बैठते हैं। मन में उस घटना या प्रश्न को स्पष्ट रूप से सोचते हैं, जिसका फल जानना है। सिंधी परंपरा में प्रायः कहा जाता है, “झूलेलाल साईं, सच्चो फार बुधायो बतायो”। कुछ लोग अपनी कुल देवी का स्मरण करते हैं। सभी कौड़ियों को दोनों हथेलियों में लेकर प्रश्न दोहराते हैं। फिर कौड़ियों को लाल कपड़े या थाली पर एक साथ गिरा देते हैं। यदि अधिक कौडियां खुली हों तो इसे षुभ संकेत मानते हैं। सभी कौडियां खुली हों तो कार्य को सिद्ध माना जाता है यानि उसमें कोई विलंब नहीं होगा।

अधिक कोडियां बंद हों तो माना जाता है कि कार्य में रुकावट आएगी। सभी कौडियां बंद हों तो यह अर्थ निकाला जाता है कि कार्य को स्थगित कर दीजिए। खुली और बंद कौडियां लगभग बराबर हों तो इसका अर्थ है कि परिणाम अनुकूल तो होगा, लेकिन उसके लिए धैर्य पूर्वक प्रयास करने होंगे।

अगर कौड़ियां एक-दूसरे पर चढ़ जा तो इसका मतलब है कि कार्य में बाहरी हस्तक्षेप होगा या भ्रम की स्थिति बनेगी। कोई कौड़ी थाली से बाहर गिरे, तो इसका मतलब है कि प्रश्न पुनः पूछना उचित नहीं है। फार तीन बार से अधिक नहीं डालते। कुल मिला कर फार को अंतिम निर्णय नहीं, बल्कि दैवी संकेत माना जाता है। एक ही प्रश्न बार-बार नहीं दोहराया जाता। कुछ लोग सुपारी की फार व चावल-दाने की फार डालते हैं।


सोमवार, जनवरी 19, 2026

महान लोगों की उम्र कम क्यों होती है?

शिखर पर पहुंचने वाले, चाहे वे महान कलाकार हों, उद्यमी, खिलाड़ी, वैज्ञानिक या आध्यात्मिक नेता हों, हम अक्सर देखते हैं कि उनमें से कई अपेक्षाकृत कम आयु में ही संसार छोड़ देते हैं। यह प्रश्न मन को झकझोरता है, लेकिन इसका उत्तर भाग्य या दैवी न्याय से अधिक मानव-जीवन, मनोविज्ञान, शरीर विज्ञान और सामाजिक दबावों से जुड़ा होता है। जो लोग शीर्ष पर पहुंचते हैं, वे अक्सर वर्षों तक असाधारण परिश्रम करते हैं। उनका कार्यदिवस बहुत लंबा होता है। उनका भोजन अमूमन अनियमित होता है। इसके अतिरिक्त वे मानसिक तनाव में रहते हैं और उनका नींद पूरी नहीं आती। वे अपने शरीर से उसकी सीमा से अधिक काम में लेते हैं। यह सब मिलकर हृदय, नर्वस सिस्टम और इम्युनिटी पर गहरा प्रभाव डालता है।

असंख्य उदाहरण ऐसे मिलते हैं, जहां अत्यधिक परिश्रम और तनाव से मधुमेह, हार्ट अटैक, स्ट्रोक आदि का खतरा बढ़ता है।

एक बात और ऊँचाई पर पहुंचने पर अकेलापन झेलते हैं। अधिसंख्य लोग जब शीर्ष पर पहुँचते हैं, तो उन्हें कई तरह के दबाव घेर लेते हैं। सार्वजनिक छवि बनाए रखने की जुगत, असफल न दिखने का डर, सतत प्रतिस्पर्धा और आलोचना, ईर्श्या की राजनीति के अतिरिक्त् उन पर और भी ऊँचा जाने का निरंतर दबाव रहता है।

यह सब मानसिक थकान, अवसाद, चिंता तथा आत्म-देखभाल की कमी पैदा करता है। अक्सर सफलता जितनी चमकीली दिखती है, उतनी ही अकेली भी होती है।

शीर्ष पर पहुँचे कई लोगों का जीवन एकदम अनियमित हो जाता है। देर रात तक काम, अत्यधिक यात्राएँ, असंतुलित खान-पान, कभी-कभी नशे या उत्तेजक पदार्थों की ओर झुकाव और व्यायाम का अभाव, यह सब स्वास्थ्य को दीर्घकाल में नुकसान पहुंचाता है।

प्रसिद्ध दार्शनिकों और परंपराओं में एक विचार मिलता है कि जो जीवन बहुत तीव्र लौ की तरह जलता है, वह प्रायः कम आयु का होता है। यानि जो लोग कम समय में अत्यधिक ऊर्जा, रचनात्मकता, प्रतिभा और परिश्रम झोंक देते हैं, वे जीवन की बैटरी बहुत तेजी से खर्च कर देते हैं।

कुछ उदाहरण यह साबित करते हैं कि ज्यादातर महान लोग जल्दी मरते हैं, जबकि आँकड़ों के स्तर पर यह सार्वभौमिक सत्य नहीं है। संतुलित जीवन वाले महान लोग लंबी आयु तक जिए- नेल्सन मंडेला, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, शिवाजी महाराज की माता जीजाबाई, बेंजामिन फ्रैंकलिन, टॉलस्टॉय, रतन टाटा। इन सबने लंबी और सार्थक आयु पाई क्योंकि सफलता और जीवन में संतुलन बनाए रखा।

एक अवधारणा यह भी है कि महान लोग बहुत कुछ पूर्व जन्म में ही हासिल कर लेते हैं और मौजूदा जन्म में कम उम्र में ही पूरी सफलता हासिल कर लेते हैं।