तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

सोमवार, अप्रैल 09, 2012

पाक राष्ट्रपति जरदारी की जियारत के साथ जुड़ गए विवाद


पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की महान सूफी संत हजरत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह जियारत तो सुकून से हो गई, मगर इसके साथ ही दो बड़े विवाद जुड़ गए हैं। एक तो दरगाह दीवान सैयद जैनुल आबेदीन अली खान द्वारा उचित पास न मिलने के कारण बहिष्कार और जरदारी की ओर से की गई पांच करोड़ रुपए देने की घोषणा।
दरगाह दीवान
दरगाह के दीवान सैयद जैनुल आबेदीन अली खान को पूरे परिसर को अधिकृत पास नहीं देने से वे काफी खफा हैं। उनके सचिव सैयद अलाऊद्दीन आरिफ ने बाकायदा लिखित बयान जारी कर संकेत दिया है कि इस घटना के बाद दरगाह दीवान साहब ने अपने कानूनी अधिकार का इस्तेमाल करते हुए हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट जाने का मानस बना लिया है।
उनका कहना है कि जरदारी की की दरगाह पर यात्रा के समय जिला प्रशासन ने सैकड़ों साल पुरानी परंपरा को तिलांजलि दे दी। प्रशासन ने दीवान पूरे दरगाह परिसर का अधिकृत पास नहीं दिया, जिसके चलते उन्होंने जरदारी की यात्रा का बॉयकाट किया। उन्होंने कहा कि हजरत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में सज्जादानशीन, खादिम और दरगाह कमेटी की अपनी अपनी भूमिका है। जहां दरगाह कमेटी दरगाह एक्ट के अनुसार प्रबंधन का कार्य करती है, वहीं सज्जादानशीन ख्वाजा साहब के वंशज की हैसियत से धार्मिक रस्में अदा करते आ रहे हैं। प्राचीन परंपराओं के अनुसार दरगाह दीवान किसी भी राष्ट्राध्यक्ष के निजाम गेट पर आगवानी करने के बाद मजार तक साथ जाते हैं। मजार शरीफ पर खादिम द्वारा जियारत कराई जाती है। उनका कहना है कि इस मरतबा अतिविशिष्ट व्यक्ति की यात्रा के दौरान दीवान साहब को निजाम गेट तक का पास दिया गया था।
 दरगाह दीवान के सचिव ने सैयद जैनुल आबेदीन अली खान क े हवाले से कहा कि  सैकड़ों साल पुरानी परंपरा को प्रशासन कैसे तोड़ सकता है? पाकिस्तानी राष्ट्रपति के लिए परंपराओं को नहीं तोड़ा जा सकता है। प्रशासन में कुछ ऐसे तत्व हैं जो दोनों देशों के बीच दोस्ती का माहौल  नही चाहते हैं और उन्होने बेवजह का विवाद पैदा कर दीवान साहब और खादिमों के कथित विवाद की आड़ लेकर सैकड़ों वर्षो की परंपराओं को तोड़ा है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2005 में पाक के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के आगमन, बंगलादेश की राष्ट्रपति शेख हसीना के अलावा इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के यात्रा के दौरान दरगाह दीवान साहब पुरानी रस्मों के साथ आगवानी की थी। इस समय नए विवाद को जन्म दिया गया है। उन्होंने बताया कि बंगलादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की अजमेर जियारत के दौरान भी इस तरह का विवाद उत्पन्न हुआ था, लेकिन प्रशासन ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए ऐन वक्त पर समस्त दरगाह परिसर का पास जारी किया। उन्होंने कहा कि ताजा प्रकरण में सरकार का रवैया दगाह पर आस्था रखने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं की धार्मिक अस्था को ठेस पहुंचाने वाला है।
असल में ऐसा प्रतीत होता है कि दरगाह दीवान, खुद्दामे ख्वाजा व दरगाह कमेटी के बीच चलती वर्षों पुरानी खींचतान के चलते ही प्रशासन ने विवाद से बचने के लिए दीवान को पास नहीं दिया होगा, मगर उसे यह ख्याल नहीं रहा कि उसने एक नई बला को न्यौता दे दिया है। हालांकि ख्वाजा साहब के वंशज के मामले में वर्षों से विवाद होता रहता है, मगर इतना तो तय है कि परंपरा के मुताबिक दरगाह दीवान किसी भी राष्ट्राध्यक्ष के निजाम गेट पर अगवानी करने के बाद मजार तक साथ जाते हैं और परंपरा के ही मुताबिक मजार शरीफ पर जियारत खादिम द्वारा कराई जाती है। इस मरतबा दीवान को केवल निजाम गेट तक का ही पास दिया गया था।
यहां उल्लेखनीय है कि दरगाह दीवान अपने हकों के लिए वर्षों से लड़ रहे हैं और इसके लिए वे किसी भी सीमा तक चले जाते हैं। दरगाह ख्वाजा साहब एक्ट से संबंधित किताबें तो उन्हें कंठस्थ याद हैं। कानून के भी पक्के जानकार हैं। और कोई छोटा मसला होता तो कदाचित गम भी खा जाते, मगर पाक राष्ट्रपति का मसला काफी बड़ा है। प्रशासन के पास भले ही नगर निगम मेयर कमल बाकोलिया, भाजपा विधायक वासुदेव देवनानी, पाकिस्तान की जेल में बंद सरबजीत की बहिन व पुत्री आदि को पास जारी न करने का कोई संतोषजनक जवाब हो, मगर दरगाह शरीफ की धार्मिक परंपरा से जुड़े मसले पर उठे विवाद से निपटने में प्रशासन को जोर आएगा।
जरदारी की इस यात्रा के साथ जुड़ा विवाद ये है कि उन्होंने जियारत के दौरान पांच करोड़ रुपए देने की घोषणा की। इस पर उनको जियारत कराने वाले खादिम और खादिमों की संस्था अंजुमन सैयद जादगान का कहना है कि वे नजराने के तौर पर घोषणा करके गए हैं, इस कारण उस राशि पर उनका हक है, दूसरी ओर दरगाह कमेटी का मानना है कि वे दरगाह के विकास के लिए घोषणा करके गए हैं, अत: यह राशि उसको मिलनी चाहिए, ताकि वह उसका दरगाह के विकास में उपयोग कर सके। बहरहाल, अब यह विवाद तभी समाप्त होगा, जब जरदारी राशि भेजते समय उसका क्या उपयोग करना है, यह साफ करते हैं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

रविवार, अप्रैल 08, 2012

जरदारी की उम्मीद अलबत्ता पूरी हो जाए, हमारी नहीं होगी

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी भारत की यात्रा पर हैं। उनकी यह यात्रा पूरी तरह से निजी है और उनका असल मकसद महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह में हाजिरी देना है। जाहिर सी बात है कि वे फिर कोई उम्मीद ले कर आ रहे हैं। बेहद परेशानी में हैं। उन पर लगे भ्रष्टाचार के मामलों को दोबारा खोलने के लिए पाकिस्तान का सुप्रीम कोर्ट प्रधानमंत्री गिलानी पर दबाव बना रहा है। जरूर उससे राहत पाने की दुआ करने को वे ख्वाजा साहब के दर पर आ रहे हैं। इससे पहले भी उनकी उम्मीद पूरी हो चुकी है। जेल से रिहाई होने पर वे अपनी बेगम पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती बेनजीर भुट्टो के साथ मन्नत का धागा खोलने और शुक्राना अदा करने आ चुके हैं। जैसा कि सब जानते हैं कि ख्वाजा सबकी झोली भरते हैं, सो उम्मीद है कि इस बार भी वे जो उम्मीद ले कर आ रहे हैं, वह पूरी होगी, मगर उनसे भारत को उम्मीद करना बेमानी है।
हालांकि इस निजी यात्रा के दौरान वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भी मिल रहे हैं, मगर वह औपचारिक ही है। बातचीत का कोई एजेंडा नहीं है। ज्ञातव्य है कि इन दिनों आतंकवादी हाफिज सईद के सिर पर इनाम रखा हुआ है, इस कारण वह मुद्दा बेहद गर्माया हुआ है, मगर इस मुलाकात में इस पर कोई चर्चा होने की कोई उम्मीद नहीं है। उम्मीद करनी भी नहीं चाहिए। खुद जरदारी ने भी लाहौर में रवाना होने से पहले उम्मीद जता दी है कि मनमोहन इस मुद्दे को नहीं उठाएंगे। उनके पास कुछ जवाब देने को है ही नहीं।
असल में जरदारी का भारत आना तय होते ही पाकिस्तान में रोना-धोना शुरू हो गया था। कई विरोधी दल और कट्टरपंथी संगठन छाती पीट रहे हैं कि एक ओर आतंकवादी हाफिज सईद के सिर पर इनाम रखा जा रहा है और दूसरी ओर हमारे राष्ट्रपति दुश्मन देश की यात्रा कर रहे हैं। वस्तुत: जरदारी पाकिस्तान के बेहद कमजोर राष्ट्रपति हैं, जो अपनी पत्नी बेनजीर भुट्टो की शहादत की वजह से इस कुर्सी तक पहुंच तो गए, लेकिन ख़ुद पाकिस्तान में कोई उन्हें कोई खास तवज्जो नहीं देता। हालत तो ये है कि वहां तख्ता पलट तक की चर्चा होती रहती हैं। हकीकत ये है कि पाकिस्तान में सरकार जरदारी या गिलानी नहीं, बल्कि सेना, आईएसआई और आतंकवादी चलाते हैं। जाहिर सी बात है कि जिस मुल्क में अवाम ने भी आतंकवादियों को ही अपना रहनुमा मान लिया हो, उस मुल्क में बेचारा प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति क्या कर सकता है। आतंकवादियों के डर से जब उसने अपने आका अमेरिका को ओसामा बिन लादेन नहीं सौंपा, तो एक दुश्मन देश को हाफिज सईद को सौंपने की हिम्मत कैसे जुटा सकता है। ऐसे में भारत का उनसे सईद के मामले में उम्मीद करना पूरी तरह से बेमानी है, भले वे शहंशाहों के शहंशाह ख्वाजा गरीब नवाज से अपनी उम्मीद पूरी करवा कर लौटें।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

शुक्रवार, मार्च 30, 2012

पश्यंति वाणी सुन कर गीता पर लिखी अनूठी पुस्तक

सूफी संत मिश्राजी द्वारा गीता के एक श्लोक की 110 पेज में व्याख्या
अजमेर। गत दिनों अजमेर से एक यादगार पुस्तक प्रकाशित हुई है। इस पुस्तक में सूफी संत हजरत हरप्रसाद मिश्रा उवैसी ने गीता के एक श्लोक की 110 पेज में व्याख्या कराई है। प्राचीन ऋषि-मुनियों वाली मनोसंवाद विधि से कराए गए इस कार्य के लिए आपने अपने मुरीद अजमेर के जाने-माने इतिहासविद व पत्रकार श्री शिव शर्मा को माध्यम बनाया।
गीता शास्त्र में दूसरे अध्याय के सर्वाधित चर्चित श्लोक है-
कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफल हेतुर्भूमा, ते संगोस्तव कर्मणि।
इस एक ही श्लोक में गीता के कर्मयोग का सार निहित है। इसका अर्थ समझने के लिए कर्म के उनतीस रूपों की विवेचना की गई है-स्वकर्म, स्वधर्म, नियतकर्म, अकर्म, विकर्म, निषिद्ध कर्म आदि। आपने स्पष्ट किया है कि कर्म के शास्त्रीय, प्रासंगिक, मनोवैज्ञानिक और परिस्थितिगत व्यावहारिक पक्षों को ज्ञात लेने के बाद ही इस श्लोक के वास्तविक अर्थ को समझा जा सकता है। गुरुदेव ने 22 नवंबर 2008 को महासमाधि ले ली थी और यह कार्य आपने 2011 में करवाया। आपकी रूहानी चेतना के माध्यम बने आपके शिष्य श्री शिव शर्मा ने बताया कि शक्तिपात के द्वारा आपने नाम दीक्षा के वक्त ही मेरी कुंडलिनी शक्ति को आज्ञाचक्र पर स्थित कर दिया था। फिर मेरी आंतरिक चेतना को देह से समेट कर आप इसी जगह चैतन्य कर देते थे। उसी अवस्था में आप इस श्लोक की व्याख्या समझाते थे। यह कार्य पश्यन्ती वाणी के सहारे होता था। वाणी के चार रूप होते हैं-परा यानि जिसे आकाश व्यापी ब्रह वाणी जो केवल सिद्ध संत महात्मा सुनते हैं, पश्यन्ति यानि नाभी चक्र में धड़कने वाला शब्द जो आज्ञा चक्र पर आत्मा की शक्ति से सुना जाता है और देखा भी जाता है, मध्यमा यानि हृदय क्षेत्र में स्पंदित शब्द और बैखरी यानि कंड से निकलने वाली वाणी जिसके सहारे में हम सब बोलते हैं। कामिल पूर्ण गुरू हमारे अंतर्मन में पश्यन्ती के रूप में बोलते हैं। गुरुदेव ने मुझ पर इतनी बड़ी कृपा क्यों की, मैं नहीं जानता, किंतु जिन दिनों आप मुझसे यह कार्य करवा रहे थे, उन दिनों ध्यान की खुमारी चढ़ी रहती थी। ध्यान में गीता, मौन में गीता, इबादत में गीता, सत्संग में गीता, अध्ययन में गीता और चिंतन में भी गीता ही व्याप्त रहती थी। बाहरी स्तर पर जीवन सामान्य रूप से चलता रहता था, लेकिन अंतर्मन में गुरु चेतना, गीता शास्त्र और भगवान वासुदेव श्री कृष्ण की परा चेतना धड़कती रहती थी।
हजरत मिश्रा जी ने भगवान श्री कृष्ण के दो बार दर्शन किए थे। उनके दीक्षा गुरू सूफी कलंदर बाबा बादामशाह की भी श्रीकृष्ण में अटूट निष्ठा थी। संभवत: इसीलिए पर्दा फरमाने के बाद भी आपने गीता के इस एक ही श्लोक की विराट व्याख्या वाला लोककल्याणकारी कार्य कराया है। इस पुस्तक में गुरुदेव ने कहा है कि मनुष्य मन का गुलाम है और गीता इस गुलामी से छूटने की बात करती है। आप कामनाओं के वश में हैं और गीमा इनसे मुक्त होने की राह दिखाती है। आप पर अहंकार हावी है, जबकि गीता इस अहंकार को जड़मूल से उखाड़ फैंकने की बात समझाती है। आप भोग की तरफ भागते हैं, गीता कर्मपथ पर दौड़ाती है। आप स्वर्ग के लिए ललचाते हैं और गीता आपको जन्म-मरण से छुटकारा दिलाने वाले परमधाम तक पहुंचाना चाहती है। इसलिए गीता से भागो मत, उसे अपनाओ, कर्मयोग से घबराओ मत, उसे स्वीकार करो। तुम मोक्षदायी कर्मयोग के पथ पर कदम तो रखो, भगवान स्वयं तुम्हें चलाना सिखा देंगे।
पुस्तक में गुरू महाराज ने कहा है कि मनुष्य को केवल कर्तव्य कर्म करने का अधिकार है। स्वैच्छाचारी कर्म उसका पतन करते हैं। यह पुस्तक अजमेर के अभिनव प्रकाशन ने प्रकाशित की है। इसके बाद नारी मुक्ति से संबंधित अगली पुस्तक में गुरूदेव गीता के ही आधे श्लोक की व्याख्या करा रहे हैं।
लेखक शिव शर्मा स्वभाव से दार्शनिक हैं और अजमेर के इतिहास के अच्छे जानकार हैं। इससे पहले वे अनेक पुस्तकें लिख चुके हैं। उनमें प्रमुख हैं-भाषा विज्ञान, हिंदी साहित्य का इतिहास, ऊषा हिंदी निबंध, केशव कृत रामचन्द्रिका, कनुप्रिया, चंद्रगुप्त, रस प्रक्रिया, भारतीय दर्शन, राजस्थान सामान्य ज्ञान, हमारे पूज्य गुरुदेव, पुष्कर: अध्यात्म और इतिहास, अपना अजमेर, अजमेर : इतिहास व पर्यटन, दशानन चरित, सदगुरू शरणम, मोक्ष का सत्य, गुरू भक्ति की कहानियां।
उनका संपर्क सूत्र है:-
101-सी-25, गली संख्या 29, नई बस्ती, रामगंज, अजमेर
मोबाइल नंबर- 9252270562

मंगलवार, मार्च 27, 2012

...इसलिए नहीं निभा पा रही भाजपा सशक्त विपक्ष की भूमिका


बहुदलीय प्रणाली और छोटे व क्षेत्रीय दलों का राष्ट्रीय राजनीति में दखल के चलते एक ओर जहां देश में कमजोर गठबंधन सरकारों का दौर चल रहा है, वहीं पार्टी विथ द डिफ्रेंस का विशेषण खोती भाजपा भी कमजोर विपक्ष साबित होती जा रही है। भले ही उसने कई मुद्दों पर कांग्रेस नीत सरकार को घेरने की कोशिश की हो और कुछ कामयाब भी रही हो, मगर यह उसकी कमजोरी का ही प्रमाण है कि काला धन, भ्रष्टाचार और लोकपाल बिल जैसे मुद्दों पर उसकी पकड़ नहीं होने के कारण ही बाबा रामदेव व अन्ना हजारे यकायक उभर कर आ गए हैं।
असल में परिवारवाद और भ्रष्टाचार की मिसाल बनी कांग्रेस की तुलना में भाजपा की अहमियत थी ही इस कारण कि उसमें आम लोगों को चरित्र व शुचिता नजर आती थी। संसद में भले ही वह संख्या बल में कमजोर रही, मगर उसके प्रति एक अलग ही सम्मान हुआ करता था। उसकी यह विशिष्ट पहचान तभी तक रही, जब तक कि वह लगातार विपक्ष में ही रही। जैसे ही उसने सत्ता का मजा चखा, उसी प्रकार के दुर्गुण उसमें भी आते गए, जैसे कि कांग्रेस में कूट-कूट कर भरे हुए थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में जिस प्रकार भाजपा ने अपने असली ऐजेंडे को साइड में रख कर ममता, जयललिता व माया से समझौते दर समझौते कर सरकार चलाई, उसकी अपनी मौलिक पहचान खोती चली गई। आज भले ही मनमोहन सिंह की सरकार गठबंधन की मजबूरी के लिए रेखांकित हो कर जानी जाने लगी है, मगर वाजपेयी भी कम मजबूर नहीं थे। अगर यह कहा जाए कि भाजपा सत्ता के साथ जुड़ी जरूरी बुराइयों का पता ही तब लगा, धरातल की राजनीति के आटे-दाल का भाव ही तब पता चला, जबकि उसने सत्ता को पाया तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। हिंदुत्व, स्वदेश व देश प्रेम की ऊंची व आदर्शपूर्ण बातें उसने विपक्ष में रहते तो बड़े जोर शोर से की और वह लोगों को अच्छी भी लगती थी, मगर जैसे ही भारतीय विमान यात्रियों को अपहरणकर्ताओं के चंगुल से छुड़ाने के लिए आतंवादियों को सौंपने जैसी हालत से गुजरना पड़ा, सबको पता लग गया कि उसे भी सत्ता में आने के बाद पूरा विश्व और उसकी व्यवस्था समझ में आ गई है। कदाचित इसी कारण उसे कट्टर हिंदूवाद से हट कर राजनीति करनी पड़ी और वही उसके लिए घातक हो गई। इंडिया शाइनिंग के नारे और मजबूत बनाम सशक्त प्रधानमंत्री के नारे के बाद भी जब सत्ता नहीं मिली तो उसके थिंक टैंकों को यह सोचने को मजबूर होना पड़ गया कि कहीं न कहीं मौलिक भूल हो रही है। एक ओर तो सत्ता के लिए धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढऩे की मजबूरी तो दूसरी ओर मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कान मरोडऩे के बीच उसे समझ में नहीं आ रहा कि वह आखिर कौन सा रास्ता अख्तियार करे। हालांकि अब भी वह संघ से ही संचालित होती है, मगर उसके भीतर दो वर्ग पैदा हो गए हैं। एक वे जो कट्टर हिंदूवादी हैं तो दूसरे वे जो नरमपंथी हैं। इन्हीं के बीच संघर्ष मचा हुआ है। यह ठीक वैसी स्थिति है, जैसी जनता पार्टी के दौर में थी, जब एक मौलिक वर्ग को अलग हो कर भारतीय जनता पार्टी बनानी पड़ी थी। आज दिल्ली से ले कर ठेठ नीचे तक असली और दूसरे दर्जे के नेता व कार्यकर्ता का संघर्ष चल रहा है।
इतना ही नहीं, एक और समस्या भी उसके लिए सिरदर्द बन गई है। कांग्रेस के परिवारवाद की आलोचना कर अपने अपने भीतर आंतरिक लोकतंत्र की दुहाई देने वाली भाजपा में राज्य स्तर पर व्यक्तिवाद उभर आया है। उसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है कर्नाटक, जहां पार्टी को खड़ा करने वाले निवर्तमान मुख्यमंत्री येदियुरप्पा का कद पार्टी से भी बड़ा हो गया है। वो तो लोकायुक्त की रिपोर्ट का भारी दबाव था, वरना पार्टी के आदेश को तो वे साफ नकार ही चुके थे। हालांकि पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारक इकाई संसदीय बोर्ड के एकमत से इस्तीफा देने के फैसले को मानने के लिए मजबूर हुए, मगर एक बार फिर सिर उठाने लगे हैं।
इसी प्रकार राजस्थान का मामला भी सर्वाधिक चर्चित रहा, जिसकी वजह से पार्टी की प्रदेश इकाई खूंटी पर लटकी नजर आई। यहां पार्टी आलाकमान के फैसले के बावजूद पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने नेता प्रतिपक्ष के पद से इस्तीफा देने से इंकार कर दिया था। बड़ी मुश्किल से उन्होंने पद छोड़ा, वह भी राष्ट्रीय महासचिव बनाने पर। उनके प्रभाव का आलम ये था कि तकरीबन एक साल तक नेता प्रतिपक्ष का पद खाली ही पड़ा रहा। आखिरकार पार्टी को झुकना पड़ा और फिर से उन्हें फिर से इस पद से नवाजा गया। ऐसे में भाजपा के इस मूलमंत्र कि 'व्यक्ति नहीं, संगठन बड़ा होता है, की धज्जियां उड़ गईं।
गुजरात, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, झारखण्ड, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे कई राज्य हैं, जहां के क्षत्रपों ने न सिर्फ पार्टी आलाकमान की आंख से आंख मिलाई, अपितु अपनी शर्तें भी मनवाईं। अफसोसनाक बात है कि उसके बाद भी पार्टी सर्वाधिक अनुशासित कहलाना चाहती है। आपको याद होगा कि दिल्ली में मदन लाल खुराना की जगह मुख्यमंत्री बने साहिब सिंह वर्मा ने हवाला मामले से खुराना के बरी होने के बाद उनके लिए मुख्यमंत्री पद की कुर्सी को छोडऩे से साफ इंकार कर दिया था। उत्तर प्रदेश में तो बगावत तक हुई। कल्याण सिंह से जब मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा लिया गया तो वे पार्टी से अलग हो गए और नई पार्टी बना कर भाजपा को भारी नुकसान पहुंचाया। मध्यप्रदेश में उमा भारती का मामला भी छिपा हुआ नहीं है। वे राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी को खुद पर कार्रवाई की चुनौती देकर बैठक से बाहर निकल गई थीं। शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बनाए जाने पर उन्होंने अलग पार्टी ही गठित कर ली। एक लंबे अरसे बाद उन्हें पार्टी में शामिल कर थूक कर चाटने का मुहावना चरितार्थ किया गया।
इसी प्रकार गुजरात में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का कद आज इतना बड़ा हो चुका है कि पार्टी पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगने के बाद भी हाईकमान में इतनी ताकत नहीं कि उन्हें कुछ कह सके। इसी प्रकार झारखण्ड में शिबू सोरेन की पार्टी से गठबंधन इच्छा नहीं होने के बावजदू अर्जुन मुण्डा की जिद के आगे भाजपा झुकी। इसी प्रकार जम्मू-कश्मीर में वरिष्ठ नेता चमन लाल गुप्ता का विधान परिषद चुनाव में कथित रूप से क्रास वोटिंग करना और महाराष्ट्र के वरिष्ठ भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे का दूसरी पार्टी में जाने की अफवाहें फैलाना भी पार्टी के लिए गंभीर विषय रहे हैं।
स्पष्ट है कि सिद्धांतों की दुहाई दे कर च्पार्टी विथ दि डिफ्रेंसज् का तमगा लगाए हुए भाजपा समझौता दर समझौता करने को मजबूर है। पार्टी की विचारधारा को धत्ता बताने वाले जसवंत सिंह व राम जेठमलानी को छिटक कर फिर से गले लगाना इसका साक्षात उदाहरण है।
पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष नितिन गडकरी पर हालांकि संघ का पूरा वरदहस्त है, मगर वे भी बड़बोलेपन की वजह से पद की गरिमा कायम नहीं रख पाए हैं। गडकरी ने अपने बेटे की शादी को जिस शाही अंदाज से अंजाम दिया है, उससे यह साबित हो गया है कि पार्टी अब तथाकथित दकियानूसी आदर्शवाद के मार्ग का परित्याग कर चुकी है। गडकरी ने ही क्यों इससे पहले भाजपा नेता बलबीर पुंज व राजीव प्रताप रूड़ी भी इसी प्रकार के आलीशान भोज आयोजित कर पार्टी कल्चर के हो रहे रिनोवेशन का प्रदर्शन कर चुके हैं। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के ठाठ कीकानाफूसी भी कम नहीं होती है।
कुल मिला कर ये सब कारण हैं, जिसकी वजह से भाजपा कमजोर हुई है और उसी कारण सशक्त विपक्ष की भूमिका नहीं निभा पा रही। भाजपा शासित राज्यों में हुए भ्रष्टाचार का परिणाम ये है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर वह कांग्रेस को घेरने में जब कामयाब नहीं हुई तो बाबा रामदेव व अन्ना के हाथ में ये मुद्दे आ गए। विपक्ष की सच्ची भूमिका नहीं निभा पाने का यह सबसे बड़ा उदाहरण है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

शनिवार, मार्च 24, 2012

अलग-अलग हैं शाहबाज लाल कलंदर व झूलेलाल?


जिस गीत दमा दम मस्त कलंदर को गा और सुन कर सिंधी ही नहीं, अन्य समुदाय के लोग भी झूम उठते है, उस पर यह सवाल आज भी मौजूं है उसका सिंधी समुदाय से कोई ताल्लुक है भी या नहीं? पाकिस्तान की मशहूर गायिका रेश्मा व बांग्लादेश की रूना लैला की जुबान से थिरक कर लोकप्रिय हुआ यह गीत किसकी महिमा या स्मृति में बना हुआ है, इसको लेकर विवाद है।
यह सच है कि आम तौर सिंधी समुदाय के लोग अपने विभिन्न धार्मिक व सामाजिक समारोहों में इसे अपने इष्ट देश झूलेलाल की प्रार्थना के रूप में गाते हैं, लेकिन भारतीय सिंधू सभा ने खोज-खबर कर दावा किया है कि यह गीत असल में हजरत कलंदर लाल शाहबाज की तारीफ में बना हुआ है, जिसका झूलेलाल से कोई ताल्लुक नहीं है। सभा ने एक पर्चा छाप कर भी इसका खुलासा किया है।
पर्चे में लिखा है कि यह गीत सिंधी समुदाय के लोग चेटीचंड व अन्य उत्सवों पर गाते हैं। आम धारणा है कि यह अमरलाल, उडेरालाल या झूलेलाल अवतार की प्रशंसा या प्रार्थना के लिए बना है। उल्लेखनीय बात है कि पूरे गीत में झूलेलाल से संदर्भित प्रसंगों का कोई जिक्र नहीं है, जैसा कि आम तौर पर किसी भी देवी-देवता की स्तुतियों, चालीसाओं व प्रार्थनाओं में हुआ करता है। सिर्फ झूलेलालण शब्द ही भ्रम पैदा करता है कि यह झूलेलाल पर बना हुआ है। असल में यह तराना पाकिस्तान स्थित सेहवण कस्बे के हजरत कलंदर लाल शाहबाज की करामात बताने के लिए बना है।
पर्चे में बताया गया है कि काफी कोशिशों के बाद भी कलंदर शाहबाज की जीवनी के बारे में कोई लिखित साहित्य नहीं मिलता। पाकिस्तान में छपी कुछ किताबों में कुछ जानकारियां मिली हैं। उनके अनुसार कलंदर लाल शाहबाज का असली नाम सैयद उस्मान मरुदी था। उनका निवास स्थान अफगानिस्तान के मरुद में था। उनका
जन्म 573 हिजरी यानि 1175 ईस्वी में हुआ। उनका बचपन मरुद में ही बीता। युवा अवस्था में वे हिंदुस्तान चले आए। सबसे पहले उन्होंने मंसूर की खिदमत की। उसके बाद बहाउवलदीन जकरिया मुल्तानी के पास गए। इसके बाद हिजरी 644 यानि 1246 ईस्वी में सेवहण पहुंचे। हिजरी 650 यानि 1252 ईस्वी में उनका इंतकाल हो गया। इस हिसाब से वे कुल छह साल तक सिंध में रहे।
कुछ किताओं के अनुसार आतताइयों के हमलों से तंग आ कर मुजाहिदीन की एक जमान तैयार हुई, जो तबलीगी इस्लाम का फर्ज अदा करती थी। उसमें कलंदरों का जिक्र आता था। आतताइयों में से विशेष रूप से चंगेज खान, हलाकु, तले और अन्य इस्लामी सुल्तानों पर चढ़ाई कर तबाही मचाई थी। इसमें मरिवि शहर का जिक्र भी है, जो शाहबाज कलंदर का शहर है। कलंदर शाह हमलों के कारण वहां से निकल कर हिंदुस्तान आए। वे मुल्तान से होते हुए 662 हिजरी में सेवहण आए और 673 में उनका वफात हुआ। यानि वे सेवहण में 11 साल से ज्यादा नहीं रहे। इस प्रकार उनके सेहवण में रहने की अवधि और वफात को लेकर मत भिन्नता है। पर्चे के अनुसार सेवहण शहर पुराना है। कई संस्कृतियों का संगम रहा। वहीं से सेवहाणी कल्चर निकल कर आया, जिसकी पहचान बेफिक्रों का कल्चर के रूप में थी। यह शहर धर्म परिवर्तन का भी खास मरकज रहा। इसी सिलसिले में बताया जाता है कि वहां एक सबसे बड़े शेख हुए उस्मान मरुंदी थे, जिन्हें लाल शाहबाज कलंदर के नाम से भी याद किया जाता है।
पर्चे में बताया गया है कि शाह कलंदर का आस्ताना सेवहण में जिस जगह है, वहां पहले शिव मंदिर था। वहां पर हर वक्त अलाव जलता रहता था, जिसे मुसलमान अली साईं का मच कहते थे। यह शहर जब सेवहण में शाह कलंदर का वफात हुआ तो हिंदुओं ने उनको अपने मुख्य मंदिर में दफन करने की इजाजत दी। बाद में वहां के पुजारी भी उनके मलंग हो गए। इस पर्चे के जरिए यह साबित करने की कोशिश की गई है कि कलंदर शाहबाज इस्लाम के प्रचारक थे। इसी को आधार बना कर सिंधी समुदाय को आगाह किया गया है कि भला इस्लाम के प्रचारक और धर्म परिवर्तन की खिलाफत करने वाले झूलेलाल एक कैसे हो सकते हैं। एक और शंका ये है कि यदि दोनों एक हैं तो इस गीत को केवल सिंधी ही क्यों गाते हैं, मुस्लिम क्यों नहीं? क्या इसकी वजह केवल इतनी है कि यह सिंधी भाषा में है?
अलबत्ता परचे में इसे जरूर स्वीकार किया गया है कि दमा दम मस्त कलंदर अकीदत से गाने से मुरादें पूरी होती हैं। आम धारणा है कि सात वर्ष की उम्र में उन्होंने कुरआन को जुबानी याद कर लिया था। यह भी पक्का है कि उनको अरबी व फारसी के साथ उर्दू जीनत जुबान भी बोलते थे। पूरी उम्र उन्होंने शादी नहीं की। उनके मन को जर और जमीन भी मैला नहीं कर पाए। अन्य दरवेश तो बादशाहों के नजराने कबूल कर लेते थे, मगर शाह कलंदर उस ओर आंख उठा कर भी नहीं देखते थे।
पर्चे में यह स्पष्ट नहीं है कि दमा दम मस्त कलंदर गीत में झूलेलालण शब्द कैसे शामिल हो गया, जिसकी वजह से सिंधी समुदाय के लोग इसे श्रद्धा के साथ गाते हैं। बहरहाल यह इतिहासविदों की खोज का विषय है कि शाहबाज कलंदर को झूलेलाल क्यों कहा गया है।
अजमेर में भी शाह कलंदर व झूलेलाल को लेकर असमंजस उभर चुका है। मौलाई कमेटी के कन्वीनर सैयद अब्दुल गनी गुर्देजी की ओर से पिछले तकरीबन 32 साल से हर साल चेटीचंड के मौके पर सिंधी समुदाय का हार्दिक अभिनंदन करने के लिए एक पर्चा जारी किया जाता है। इसमें वे लिखते हैं कि सिंधी समाज के आराध्यदेव झूलेलाल जी को ही मुसलमान सखी शाहबाज कलंदर या लाल शाहबाज कलंदर कहते हैं। गत 23 नवंबर 2004 को दैनिक भास्कर में छपी खबर के अनुसार जब इस सिलसिले में उनसे पूछा गया कि वे किस आधार पर दोनों को एक बताते हैं तो उनका कहना था कि उन्हें कोई जानकारी नहीं है कि दोनों में कोई फर्क है या गाने को लेकर कोई विवाद है। न ही किसी सिंधी भाई ने कभी ऐतराज किया। वे तो महज भाईचारे के लिए पर्चा छपवाते हैं। इसके बावजूद अगर वे पता कर पाए कि दोनों अलग-अलग हैं तो एक होने का जिक्र हटवा देंगे।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

गुरुवार, मार्च 22, 2012

श्रीश्री इतने तो समझदार हैं ही कि कौन सी बात कहां कहनी है


आध्यात्मिक गुरू श्रीश्री रविशंकर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था के केन्द्र हैं। बेवजह उनके प्रति असम्मान का भाव होने का सवाल ही नहीं उठता। मगर हाल ही उन्होंने एक ऐसा बयान दे दिया कि यकायक विवादास्पद हो गए। जब शिक्षक और सामाजिक संगठनों के अलावा जनप्रतिनिधियों ने उनके बयान को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है, राजस्थान भर में में कई जगह श्रीश्री के पुतले फूंके गए और जयपुर में सांगानेर न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट में उनके खिलाफ इस्तगासा भी दायर किया गया, तो उन्हें सफाई देनी पड़ गई कि हम इतने मूर्ख भी नहीं जो ऐसा बयान दें। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने तो उनके बयान पर हैरानी जताते हुए कहा कि मुझे नहीं लगता कि कोई भी व्यक्ति संतुलित मस्तिष्क से ऐसी कोई बात कह सकता है। इस पर श्रीश्री ने दी सफाई मानसिक संतुलन बिगडऩे की बात कहने वाले मेरे बयान को दोबारा पढ़ें। हमने ये नक्सली क्षेत्रों के लिए कहा था। वहां कुछ रुग्ण विद्यालय हैं। उन विद्यालयों के निजीकरण पर मैंने जोर दिया है। मैं बहुत सोच-समझ कर बोलता हूं। हम इतने मूर्ख नहीं जो यह कहें कि सारे सरकारी स्कूलों में नक्सलवाद पैदा हो रहा है। श्रीश्री ने कहा कि जो क्षेत्र नक्सलवाद से ग्रस्त हैं, वहां सरकारी स्कूलों में पढ़े बच्चे अक्सर हिंसा से ग्रस्त पाए गए हैं। पूर्वांचल और यूपी के क्षेत्रों में ऐसा पाया गया। अच्छा है राजस्थान में नक्सली प्रभाव नहीं है।
श्रीश्री की सफाई से यह स्पष्ट है कि वे सही बात गलत जगह कह गए। राजस्थान में जब नक्सलवाद नाम की कोई चिडिय़ा है ही नहीं तो यहां नक्सल प्रभावित इलाकों की समस्या का जिक्र सार्वदेशिक रूप से करने पर तो हंगामा होना ही था। इतना पक्का है कि वे इतने भी मूर्ख नहीं कि देश की सारी सरकारी स्कूलों के बारे में ऐसा कह दें, मगर इतने समझदार तो हैं ही कि कौन सी बात कहां पर कहनी है। माना कि वे दीन दुनिया से दूर हैं और यह संतों की मौज है कि वे समाज के भले के लिए कुछ भी कह दें, मगर उन्हें अब तो समझ में आ ही गया होगा कि संदर्भहीन बात करना कितना भारी पड़ जाता है। बात न बात, बेबात का बतंगड़ हो गया।
वैसे एक बात है श्रीश्री का बयान में कुछ ज्यादा की अतिरेक हो गया, मगर यह भी कम सच नहीं कि सरकारी स्कूलों की पढ़ाई इतनी लचर हो गई है कि औरों की छोडिय़े खुद सरकारी स्कूलों के अध्यापकों तक के बच्चे महंगी प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे हैं। उन्हें पता है कि उनके हमपेशा शिक्षक क्या पढ़ा रहे हैं। हालत ये है कि सरकारी स्कूल में बच्चे को वही पढ़ाता है, जो या तो गरीब है और या फिर जिसे अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा की कोई फिक्र नहीं। श्रीश्री रविशंकर के बयान पर तुरंत प्रतिक्रिया कर बवाल मचाने वाले शिक्षा कर्मियों के पास क्या इस बात का जवाब है कि बोर्ड परीक्षाओं व प्रतियोगी परीक्षाओं में सरकारी स्कूलों में पढ़े बच्चे फिसड्डी क्यों रह जाते हैं? हम भले की सरकारी स्कूलों के इन्फ्रास्ट्रक्चर की महत्ता जताने के लिए यह कह दें कि इनसे कई नेता, विद्वान, बड़े व्यापारी भी निकलते हैं, मगर सच यही है कि जब कभी किसी सरकारी स्कूल का बच्चा बोर्ड की मेरिट में स्थान पाता है तो वह उल्लेखनीय खबर बन जाती है। स्पष्ट है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई पर ठीक से ध्यान नहीं दिया जाता। चूंकि सरकार स्कूलों के शिक्षक संगठित हैं, इस कारण उन्होंने तौहीन होने पर तुरंत बवाल खड़ा कर दिया, मगर तब तौहीन नहीं लगती, जब अपने बच्चों को हरसंभव प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने की कोशिश करते हैं।
बहरहाल, जब सरकारी स्कूलों की बात चलती है तो वहां के हालात यकायक स्मृति में आ ही जाते हैं। स्कूलों की ही क्यों सरकारी नौकरी के कुछ और ही मजे हैं। इस बात पर एक एसएमएस याद आ गया। हमारे यहां सरकारी नौकरी का अजीबोगरीब हाल है। लोग अपने बच्चों को पढ़ाएंगे प्राइवेट स्कूल में, इलाज करवाएंगे प्राइवेट अस्पताल में, मगर नौकरी करेंगे सरकारी। सवाल उठता है क्यों? जवाब आपको पता ही है।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

बुधवार, मार्च 21, 2012

ममता की दीदीगिरी से उठे क्षेत्रीय दलों के वजूद पर सवाल


हाल ही रेल बजट पेश करने के बाद उस पर बहस से पहले ही रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी को इस्तीफा देने पर मजबूर करने वाली ममता की दीदीगिरी लोकतंत्र में एक काले अध्याय के रूप में अंकित हो गया है। साथ ही इसने एक बड़ी बहस को जन्म दिया है कि देशभर में छोटे-छोटे उद्देश्यों के गठित छोटे-छोटे दलों के कुकुरमुत्तों की तरह उग आने के बाद हो रही लोकतांत्रिक दादागिरी का अंत कैसे हो पाएगा?
ऐसा नहीं है कि गठबंधन सरकार की मजबूरी को केवल मौजूदा मनमोहन सिंह की सरकार ने भोगा हो। पूर्व में अटल बिहारी वाजपेयी भी लगभग ऐसी ही मजबूर सरकार चला चुके हैं। तब वे भी आए दिन ममता बनर्जी, मायावती व जयललिता की दादागिरी के आगे झुक जाने को मजबूर हुए थे। बस फर्क इतना है कि मनमोहन सिंह सरकार कुछ ज्यादा की रेखांकित हो गई। उसमें भी ताजा प्रकरण ने पुख्ता तौर पर साबित कर दिया है छोटे अथवा क्षेत्रीय उद्देश्यों के लिए गठित दल किस प्रकार देश की सरकार की दिशा और दशा तय करने की भूमिका में आ गए हैं। उत्तर प्रदेश का चुनाव भी इसी की मिसाल है। वहां दो राष्ट्रीय दलों कांग्रेस व भाजपा को नकार कर जनता ने जातीय व क्षेत्रीय उद्देश्यों की खातिर एक क्षेत्रीय दल को नकार कर दूसरे क्षेत्रीय दल को चुन लिया, जिसे कि वह पहले गुंडाराज के कारण नकार चुकी थी। और अफसोसनाक बात ये है कि इन्हीं दो क्षेत्रीय दलों की बैसाखियों पर केन्द्र की सरकार चल रही है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की यह कैसी विडंबना है।
हम आज भले ही गठबंधन सरकारों की मजबूरियों को समझने के आदी हो गए हैं, मगर क्या यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि देश का रेल मंत्री कौन होगा, यह देश का प्रधानमंत्री नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की तानाशाह तय करती है। यह केवल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए शर्मनाक नहीं, बल्कि हम सबके लिए भी है। और अफसोस कि इसके बाद भी यदि हम अपने देश को सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कह कर गौरवान्वित महसूस करते हैं। यह छद्म लोकतंत्र है। एक किस्म की तानाशाही ही है। इसे तानाशाही कहना इसलिए अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं कहेंगे क्योंकि ममता ने रेल बजट में संशोधन करवाने की लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाने की बजाय उस रेल मंत्री को ही हटवा दिया, जिन्हें कि अब बहस में जवाब देने का मौका नहीं ही मिलेगा, जब कि बजट उन्होंने ही पेश किया है। त्रिया हठ देखिए कि उन्हें लोकतांत्रिक मर्यादाओं को कूड़े में डाल कर अपनी जिद पूरा करना ही ज्यादा जरूरी लगा। त्रिवेदी भले ही यह कह कर अपनी शाब्दिक जीत मान रहे हों कि देश का रेल बजट कोलकाता से नहीं बनता है, मगर कोलकाता ने साबित कर दिया कि रेल बजट क्या, देश की सरकार ही कोलकाता के इशारे पर चलती है।
तस्वीर कर दूसरा रुख ये है कि ममता भले ही अपनी जिद पूरी करवाने में कामयाब हो गई हों, मगर इससे यकीनन उनकी छवि खराब हुई है। कैसा विचित्र खेल हुआ कि आम आदमी सबसे बड़ी पैराकार ममता के विरोध और त्रिवेदी के इस्तीफे के बाद भी आम जनता में यह संदेश चला गया कि त्रिवेदी ने जो कुछ किया, देश हित के लिए किया, जबकि ममता ने जो कुछ किया, मनमानी की खातिर किया। इससे बड़ी बात क्या होगी कि रेलवे कर्मचारी तक ममता के खिलाफ खड़े हो गए। एक अर्थ में त्रिवेदी की यह शहादत उनके कद को और ऊंचा कर गई। आज उनके प्रति सहानुभूति को साफ तौर देखा जा सकता है, जब कि ममता जैसों को सबक सिखाने के लिए क्षेत्रीय दलों की भूमिका पर बड़ी बहस छिड़ चुकी है।
इस मौके पर कुछ राजनीतिज्ञ यह कह कर मनमोहन सिंह को ज्ञान पिला रहे हैं कि उन्हें इस मौके पर तो गठबंधन धर्म की जगह राजधर्म निभाना चाहिए था, चाहे ममता समर्थन वापस ले लेतीं। सरकार तो मुलायम सिंह की सपा को शामिल करके भी बचाई जा सकती थी। मगर उसका क्या जब सपा भी बाद में उसी तरह दादागिरी करती। फर्क क्या है? ये तो मनमोहन या कांग्रेस ही बेहतर जानते हैं कि सपा को सरकार में शामिल करने के लिए उन्हें अपनी आत्मा पर कितने पत्थर और रखने पड़ते।
लब्बोलुआब मनमोहन सिंह की अनेक मजबूरियों को देख चुके देश के सामने अब यक्ष सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या अब भी हम इसी प्रकार क्षेत्रीय दलों के हाथों की कठपुतली बने रहना चाहते हैं? क्या देश की सरकान चुनते वक्त भी हम क्षेत्रीय जरूरतों के लिए बने संगठनों को ही तरजीह देते रहेंगे? क्या चुनाव आयोग प्रांतीय हितों के लिए गठित अथवा प्रांतों तक ही सीमित दलों की लोकसभा चुनाव में भागीदारी पर पुनर्विचार करने पर मंथन करेगा?

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com