तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

सोमवार, जुलाई 23, 2018

राजस्थान में तो वसुंधरा ही भाजपा है

महारानी के आगे घुटने टेके मोदी व शाह ने

-तेजवानी गिरधर-
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पद से अशोक परनामी को हटाने और मदनलाल सैनी को कमान सौंपे जाने के बीच चली लंबी रस्साकशी की निष्पत्ति मात्र यही है कि राजस्थान में वसुंधरा ही भाजपा है और भाजपा ही वसुंधरा है। ज्ञातव्य है कि इंडिया इस इंदिरा एंड इंदिरा इज इंडिया की तर्ज पर पंचायती राज मंत्री राजेन्द्र सिंह राठौड़ एक बार इस आशय का बयान दे चुके हैं।
सर्वविदित है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व पार्टी अध्यक्ष अमित शाह केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को प्रदेशाध्यक्ष बनाना चाहते थे, लेकिन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे इस नाम पर सहमत नहीं थीं। इस चक्कर में प्रदेश अध्यक्ष पद ढ़ाई महीने से खाली पड़ा था। ऐसा नहीं कि हाईकमान ने वसुंधरा को राजी करने की कोशिश नहीं की, मगर महारानी राज हठ पर अड़ी रहीं। आखिरकार मोदी-शाह की पसंद पर वसुंधरा का वीटो भारी पड़ गया। यूं तो वसुंधरा पूर्व में भी मोदी से नाइत्तफाकी जाहिर कर चुकी हैं, मगर यह पहला मौका है, जबकि मोदी के प्रधानमंत्री व शाह के अध्यक्ष बनने के बाद किसी क्षत्रप ने उनको चुनौती दे डाली। न केवल चुनौती दी, अपितु उन्हें घुटने टेकने को मजबूर कर दिया। जिस पार्टी पर मोदी व शाह का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा हो, उनके वजूद को एक राज्य स्तरीय नेता का इस प्रकार नकारना अपने आप में उल्लेखनीय है।
दरअसल मोदी के साथ वसुंधरा की ट्यूनिंग शुरुआती दौर में ही बिगड़ गई थी। हालांकि स्वयंसिद्ध तथ्य है कि मोदी लहर के कारण भाजपा को राजस्थान में बंपर बहुमत मिला, मगर वसुंधरा उसका पूरा श्रेय मोदी को देने के पक्ष में नहीं थीं। यह मोदी जैसे एकछत्र राज की महत्वाकांक्षा वाले नेता को नागवार गुजरा। उन्होंने कई बार वसुंधरा को राजस्थान से रुखसत करने की सोची, मगर कर कुछ नहीं पाए। इस आशय की खबरें कई बार मीडिया में आईं। आखिर विधानसभा चुनाव नजदीक आ गए। पार्टी को एक तो यह परेशानी थी कि प्रदेश भाजपा पर वसुंधरा ने कब्जा कर रखा है, दूसरा ये कि उसकी रिपोर्ट के अनुसार इस बार वसुंधरा के चेहरे पर चुनाव जीतना कठिन था। इसी ख्याल से प्रदेश अध्यक्ष परनामी पर गाज गिरी। मोदी व शाह वसुंधरा पर शिकंजा कसने के लिए गजेंद्र सिंह शेखावत को अध्यक्ष बनाना चाहते थे, मगर वसुंधरा ने उन्हें सिरे से नकार दिया। उनका तर्क था कि शेखावत को अध्यक्ष बनाने से भाजपा का जीत का जातीय समीकरण बिगड़ जाएगा। असल में उन्हें ऐसा करने पर जाटों के नाराज होने का खतरा था।
खैर, जैसे ही वसुंधरा ने विरोध का सुर उठाया तो मोदी व शाह और सख्त हो गए। उन्होंने इसके लिए सारे हथकंडे अपनाए, मगर राजनीति की धुरंधर व अधिसंख्य विधायकों पर वर्चस्व रखने वाली वसुंधरा भी अड़ ही गईं। पार्टी हाईकमान जानता था कि अगर वसुंधरा को नजरअंदाज कर अपनी पसंद के नेता को अध्यक्ष बना दिया तो पार्टी में दोफाड़ हो जाएगी। वसुंधरा के मिजाज से सब वाकिफ हैं। इस प्रकार की खबरें प्रकाश में आ चुकी हैं कि राजनाथ सिंह के पार्टी अध्यक्ष रहते हुए एक बार वसुंधरा जिद ही जिद में नई पार्टी बनाने का मानस बना चुकी थीं। आखिर उन्हें ही चुनाव की पूरी कमान सौंपनी पड़ी थी।
बहरहाल, अब जबकि वसुंधरा अपना वर्चस्व साबित कर चुकी हैं, यह साफ हो गया है कि अगला चुनाव उनके नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। इतना ही नहीं टिकट वितरण में भी उनकी ही ज्यादा चलने वाली है। संघ को तो उसका निर्धारित कोटा दे दिया जाएगा। साफ है कि अगर भाजपा जीती तो वसुंधरा ही फिर मुख्यमंत्री बनेंगी। जहां तक मदन लाल सैनी की भूमिका का सवाल है तो हैं भले ही वे संघ पृष्ठभूमि से, मगर वसुंधरा के आगे वे ज्यादा खम ठोक कर टिक नहीं पाएंगे। यानि कि अध्यक्ष पद पर चेहरे का बदलाव मात्र हुआ है, स्थिति जस की तस है। अर्थात मोदी-शाह की सारी कवायद ढ़ाक के तीन पात साबित हुई है।
रहा सवाल वसुंधरा के नेतृत्व में भाजपा के चुनाव लडऩे और परिणाम का तो यह स्पष्ट है कि उन्हें एंटी इन्कंबेंसी का सामना तो करना ही होगा। कांग्रेस भी अब मजबूत हो कर चुनाव मैदान में आने वाली है। वे किस दम पर पार्टी सुप्रीमो से टशल ले कर फिर सत्ता में आने का विश्वास जता रही हैं, ये तो वे ही जानें कि उनके पास आखिर कौन सा जादूई पासा है कि बाजी वे ही जीतेंगी।

सोमवार, जुलाई 09, 2018

ऐन चुनाव से पहले तिवाड़ी ने दिया भाजपा को झटका

-तेजवानी गिरधर-
यूं तो भाजपा के वरिष्ठ नेता घनश्याम तिवाड़ी पिछले काफी समय से पार्टी के अंदर व बाहर, विधानसभा के भीतर भी और जनता के समक्ष भी राज्य की मौजूदा भाजपा सरकार, विशेष रूप से मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे पर हमले बोलते रहे हैं, मगर अब ऐन चुनाव से ठीक पांच माह पहले ने पार्टी को तिलांजलि दे कर उन्होंने बड़ा झटका दिया है। इस पूरे प्रकरण में सर्वाधिक गौरतलब बात ये है कि तिवाड़ी लगातार सरकार की रीति-नीति पर प्रहार करते रहे, मगर भाजपा हाईकमान उनके खिलाफ कार्यवाही करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। मात्र अनुशासन समिति में जवाब-तलब होते रहे, मगर वह वसुंधरा के धुर विरोधी नेता के खिलाफ कदम उठाने से बचता रहा। अब जब कि तिवाड़ी पार्टी छोड़ कर नई पार्टी भारत वाहिनी का गठन कर सभी दो सौ विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े करने की घोषणा कर चुके हैं, भले ही भाजपा की ओर से यह कहा जा रहा हो कि उसको कोई नुकसान नहीं होगा, मगर इसके साथ सवाल ये भी उठता है कि अगर तिवाड़ी इतने ही अप्रभावी नेता हैं तो लगातार अनुशासन तोडऩे के बाद भी उनके विरुद्ध कार्यवाही करने से क्यों बचा गया?
असल में तिवाड़ी भाजपा के भीतर ही उस वर्ग के प्रतिनिधि थे, जो मूलत: संघ पोषित रहा है और जिसके कई नेताओं को वसुंधरा राजे बर्फ में दफ्न कर चुकी हैं। सच तो ये है कि संघ पृष्ठभूमि के कई प्रभावशाली नेता या तो काल कलवित हो गए या फिर महारानी शरणम् गच्छामी हो गए। कुछ ऐसे भी हैं, जो विरोधी तो हैं, मगर उनमें तिवाड़ी जैसा माद्दा नहीं और चुपचाप टाइम पास कर रहे हैं। तिवाड़ी उस सांचे या कहिये कि उस मिट्टी के आखिरी बड़े नेता बचे थे, जिन्होंने पार्टी के भीतर रह कर भी लगातार वसुंधरा का विरोध जारी रखा। वसुंधरा का आभा मंडल इतना प्रखर है कि उनका विरोध नक्कार खाने में तूती की सी आवाज बन कर रह गया। वे चाहते थे कि वसुंधरा उन्हें बाहर निकालें ताकि वे अपनी शहादत को भुना सकें, मगर वसुंधरा ने उन्हें ये मौका नहीं दिया। आखिर तिवाड़ी को खुद को ही पार्टी छोडऩे को मजबूर होना पड़ा। जाहिर तौर पर यह शह और मात का खेल है। इसमें कौन जीता व कौन हारा, यह तय करना अभी संभव नहीं, विशेष रूप से विधानसभा चुनाव से पहले, मगर इतना तय है कि उनके लगातार विरोध प्रदर्शन के चलते न केवल वसुंधरा की कलई उतरी, अपितु उनकी पूरी लॉबी, जो कि सरकार चला रही है, उसके नकारा होने को रेखांकित हुई है। जातीय समीकरण अथवा अन्य जोड़-बाकी-गुणा-भाग के लिहाज से तिवाड़ी का ताजा कदम क्या गुल खिलाएगा, ये तो वक्त ही बताएगा, मगर उन्होंने जिस आवाज की दुंदुभी बजाई है, वह सरकार के खिलाफ काम कर रही एंटी इन्कंबेंसी को और हवा देगी। तिवाड़ी ने जो मुहिम चलाई, उसका लाभ उनको अथवा उनकी पार्टी को कितना मिलेगा, कहा नहीं जा सकता, मगर इतना तय है कि उन्होंने कांग्रेस का काम और आसान कर दिया है। कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन को राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता कहा जा सकता है, मगर चूंकि भाजपा के अंदर का ही खांटी नेता भी अगर वे ही मुद्दे उठा रहा है, तो इससे कांग्रेस के तर्कों पर ठप्पा लग गया है।
प्रसंगवश, यह चर्चा करना प्रासंगिक ही रहेगा कि भाजपा मूलत: दो किस्म की धाराओं की संयुक्त पार्टी है। विशेष रूप से राजस्थान में। इसमें एक धारा सीधे संघ की तथाकथित मर्यादित आचरण वाली है तो दूसरी वसुंधरा के शक्ति केन्द्र के साथ चल रही है, जहां साम-दाम-दंड-भेद जायज हैं। हालांकि पार्टी का मातृ संगठन संघ ही है, जिसकी भीतरी ताकत हिंदूवाद से पोषित होती है, मगर वसुंधरा के इर्द-गिर्द ऐसा जमावड़ा है, जिसका संघ से सीधा नाता नहीं है, या कहिये कि उस जमात ने पेंट के नीचे चड्डी नहीं पहन रखी है। संघ निष्ठों को यही तकलीफ है कि पार्टी उनके दम पर ही सत्ता में है, मगर उसमें सत्ता का मजा अधिसंख्य वे ही ले रहे हैं, जिन्होंने लालच में आ कर बाद में चड्डी पहनना शुरू किया है। कुल मिला कर पार्टी की कमान भले ही संघ के हाथ में है, जो कहने भर को है, मगर खुद संघ को भी वसुंधरा के साथ तालमेल करके चलना पड़ रहा है। जब से देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह बने हैं, तब से वसुंधरा नामक शक्ति केन्द्र को ध्वस्त करने की ख्वाहिश तो रही है, मगर उसमें अब तक कामयाबी नहीं मिल पाई है।
हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगा कि तिवाड़ी को ताकत सीधे संघ से ही मिल रही है या फिर संघ ही इस साजिश का सूत्रधार है, मगर इतना तय है कि तिवाड़ी उसी जनमानस को अपने साथ जोडऩे की कोशिश कर रहे हैं, जो संघ के नजदीक है। ऐसे में जो विश्लेषक उन्हें मात्र ब्राह्मण नेता मान कर राजनीतिक समीकरणों का आकलन कर रहे हैं, वे जरूर त्रुटि कर रहे हैं। वे सिर्फ ये देेख रहे हैं कि प्रदेश में 9 विधानसभा सीटें ब्राह्मण बाहुल्य वाली हैं और 18 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर सर्वाधिक वोटरों की संख्या में ब्राह्मण वोटर नंबर 2 या 3 पर है, इन पर तिवाड़ी कितना असर डालेंगे? कुछ अंश में यह फैक्टर काम करेगा, मगर एक फैक्टर और भी दमदार काम करेगा। वो यह कि एंटी इन्कंबेंसी देखते हुए बड़ी संख्या में मौजूदा भाजपा विधायकों के टिकट काटे जाएंगे। ऐसे में पार्टी में भितरघात की स्थिति का फायदा तिवाड़ी की नई पार्टी को मिल सकता है। निश्चित रूप से वे जो भी वोट तोड़ेंगे, वे भाजपा के खाते से छिटकेंगे। भले ही तिवाड़ी की पार्टी का एक भी विधायक न जीत पाए, मगर भाजपा को तकरीबन 25 सीटों पर बड़ा नुकसान दे जाएंगे।

गुरुवार, जून 14, 2018

पेट्रोल चाहे जितने का हो जाए, वोट तो मोदी को ही दूंगा?

-तेजवानी गिरधर-
हाल ही जब केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने चार साल पूरे किए तो स्वाभाविक रूप से कांग्रेस ने सरकार की उपलब्धि शून्यता पर हंगामा किया, जो कि विपक्ष का फर्ज भी है, मगर साथ ही भाजपा वाले, जिन्हें कि मोदी भक्त कहना ज्यादा उपयुक्त होगा, भी पूरा राशन पानी लेकर सोशल मीडिया पर तैयार थे। हर सरकार अपनी उपलब्धियां गिनाती है, उसमें कुछ भी गलत नहीं है, मगर यदि दलीलें तर्क की पराकाष्ठा को पार कर जाएं तो उस पर ध्यान जाना स्वाभाविक ही है।
असल में भाजपा वाले भी ये जानते हैं कि जिन मुद्दों को लेकर मोदी प्रचंड बहुमत के साथ सरकार पर काबिज हुए, उनमें सरकार पूरी तरह से विफल रही है। मगर वे तो इस बात से आत्मविमुग्ध हैं कि आज मोदी ने चार साल पूरे कर लिए और यह इच्छा भी बलवती है कि अगले साल के बाद आने वाले पांच साल भी मोदी ही राज करें, भले ही कोई उपलब्धि हो या नहीं। और जब विपक्ष सरकार की अनुपलब्धि पर सवाल करे तो पूरी ढि़ठाई के साथ ऐसे जवाब देना ताकि उससे केवल और केवल हिंदुत्व मजबूत हो व पक्के वोट नहीं बिखरें।
आप जरा तर्क देखिए:- पेट्रोल चाहे जितने का हो जाए, मगर मैं तो मोदी को ही वोट दूंगा। कल्पना कीजिए कि ये वे ही लोग हैं कि जो मात्र एक रुपया बढ़ जाने पर भी आसमान सिर पर उठा लेते थे, मगर आज जब पेट्रोल अस्सी को भी पार कर गया है तो इसमें उन्हें कुछ भी अनुचित नहीं लगता। वे जानते हैं कि पेट्रोल के दाम इतने ऊंचे होने और कमरतोड़ महंगाई के साथ अन्य अनेक मुद्दों पर सरकार की विफलता के कारण जनता पर छाया मोदी का जादू खत्म हो सकता है तो वे इसके लिए ऐसे तर्क जुटा रहे हैं ताकि मोदी का नशा बरकरार रहे।
एक बानगी देखिए:- मोदी ने महंगाई बढ़ा रखी है, व्यापार में दिक्कत है, जीएसटी रिटर्न भरने में परेशानी है, महंगा कर रखा है, आरक्षण खत्म नहीं किया, राम मंदिर नहीं बनवाया, 15 लाख नहीं दिए, अच्छे दिन नहीं आए, नोटबन्दी की वजह से जनता मरी, फलाना-ढ़ीकाना। इसलिए अब हम मोदी की दुकान बंद कराएंगे, आने वाले चुनाव में वोट नहीं देंगे।
बंधुओं, रही मोदी की दुकान बंद कराने की बात, तो आपको बता दें कि मोदी की उम्र अब 67 वर्ष है और उनके पीछे न परिवार है और बीवी-बच्चे। उन्होंने जिंदगी में जो पाना था वो पा लिया है। अब अगर आप वोट नहीं भी देंगे और वो हार भी जाएंगे, तब भी वो पूर्व प्रधानमंत्री कहलाएंगे, आजीवन दिल्ली में घर, गाड़ी, पेंशन, एसपीजी सुरक्षा, कार्यालय मिलता रहेगा। दस-पंद्रह साल जीकर चले जाएंगे। लेकिन सवाल ये उठता है कि आप क्या करेंगे? जब कांग्रेस+लालू+मुलायम+मायावती+ममता+केजरीवाल मिल कर इस देश का इस्लामीकरण और ईसाईकरण करेंगे, रोहिंग्याओं को बसाएंगे, भगवा आतंकवाद जैसे नए-नए शब्द बनेंगे और आतंकवादी सरकारी मेहमान बनेंगे। हिंदुओं का खतना करवाएंगे, मुसलमानों को आरक्षण देंगे, लव जिहाद को बढ़ावा देंगे, पप्पू देश लूट कर इटली घूमने जायेगा।
मोदी तो संतोष के साथ मरेंगे कि मैंने एक कोशिश तो की अपना देश बचाने की, लेकिन आप लोग तो हर दिन मरेंगे, और अंतिम सांस कैसे लेंगे? अपने बच्चों के लिए कैसा भारत छोड़ कर मरेंगे? जरा विचार कीजिए और तब निर्णय लीजिए।
ऐसी ही अनेक बानगियां पूरे सोशल मीडिया पर छायी हुई हैं, जिनमें सीधे-सीधे तर्क की बजाय कि भी प्रकार मोदी की भक्ति ही साफ नजर आती है।
कुल मिला कर इन तर्कों से समझा जा सकता है कि उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितनी महंगाई है, कितनी बेरोजगारी है, लोग कितने परेशान हैं, उन्हें तो इस बात से मतलब है कि पहली बार सरकार पर काबिज भाजपा व हिंदुत्व को पोषित करने वाले मोदी कैसे सरकार में बने रहें। उन्हें इससे भी कोई मतलब नहीं कि अच्छे दिन आए या नहीं, चाहे बुरे से बुरे दिन ही क्यों आ जाएं, उन्हें तो केवल इससे सरोकार है कि मोदी ब्रांड के दम पर हिंदुत्व वाली विचारधारा सरकार पर सवार हो गई। इससे यह भी आभास होता है कि जनता से जुड़ी आम समस्याओं के निवारण में असफल होने के कारण उन्हें भाजपा सरकार के दुबारा न आने का अंदेशा है, लिहाजा आखिरी विकल्प के रूप में हिंदुत्व के नाम पर येन-केन-प्रकारेण धु्रवीकरण करना चाह रहे हैं। यदि वाकई मोदी सरकार की उपलब्धियां होतीं या फिर मोदी ने जिन जुमलों पर सवार हो कर सरकार पर कब्जा किया, उनके पूरा होने का बखान करते। तर्क के साथ बताते कि मोदी ने ये किया, वो किया। विपक्ष सरकार को विफल बताए, उस पर आप भरोसा करें न करें, खुद वे ही अप्रत्यक्ष रूप से बखान कर रहे हैं कि हां, मोदी असफल हैं, मगर चूंकि वे हिंदुत्व को पोषित कर रहे हैं, इस कारण उन्हें अगली बार भी प्रधानमंत्री बनाएं। यानि कि जनहित के मुद्दों से ध्यान हटा कर कोशिश यही की जा रही है कि किसी भी प्रकार हिंदुत्व के नाम पर लोगों को एकजुट किया जाए।
चलो, ये मान भी लिया जाए कि हर पार्टी को अपने हिसाब से जनता को आकर्षित करने का अधिकार है, चाहे हिंदुत्व के नाम पर चाहे जातिवाद के नाम पर, मगर असल सवाल ये है कि क्या यह वास्तविक लोकतंत्र है? जिसमें जनता की जरूरतों के मुद्दे तो ताक पर रखे जा रहे हैं और कोरी भक्ति के नाम पर तिलिस्म कायम किया जा रहा है।

मंगलवार, मई 08, 2018

... फिर भी लाखों लोग आसाराम के मुरीद क्यों हैं?

-गिरधर तेजवानी-
नाबालिगा के साथ दुष्कर्म के आरोपी संत आसाराम अब सजायाफ्ता कैदी हैं। कोर्ट ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। अस्सी साल की उम्र में उम्र कैद का सीधा सा अर्थ ये है कि मृत्यु पर्यंत उन्हें कैद में रहना होगा। कोर्ट के इस फैसले से जहां कानून का इकबाल ऊंचा हुआ है, करोड़ों लोग इस फैसले से संतुष्ट हैं, वहीं लाखों लोग ऐसे भी हैं, जो अब भी उन्हें निर्दोष मानते हैं और कोई गुरू के रूप में तो कोई भगवान के रूप में पूजता है। कैसा विरोधाभास है? न्यायालय की ओर से दोषी करार दिए जाने के बाद भी उनके भक्त अंध श्रद्धा के वशीभूत हैं। आखिर ऐसी क्या वजह है कि निकृष्टमत अपराध के बाद भी लोग अपराधी के प्रति श्रद्धा से लबरेज हैं। भक्तों की अगाध श्रद्धा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे इस बारे में कोई तर्क नहीं सुनना चाहते। इतनी दृढ़ आस्था आखिर क्यों कर है? हम भारतवासी तो फिर भी इस विरोधाभास को पी सकते हैं, मगर सोचिए कि अमेरिका में बैठा व्यक्ति क्या सोचता होगा? कैसा देश है भारत? कैसा है भारतवासियों का मिजाज? अपराधी को पूजा जा रहा है?
असल में इस प्रकरण को रावण प्रकरण की रोशनी में देखें तो आसानी से समझ आ जाएगा कि यह विरोधाभास क्यों है। रावण के बारे में कहा जाता है कि वह प्रकांड पंडित, महाशक्तिवान व चतुर राजनीतिज्ञ था। उसकी महिमा अपार थी। मगर अकेले परनारी के प्रति आसक्ति के भाव ने उसको नष्ट होने की परिणति तक पहुंचा दिया। अकेले एक दोष ने उसकी सारी महिमा को भस्मीभूत कर दिया। इससे यह समझ में आता है कि महान से महान व सर्वगुण संपन्न व्यक्ति भी बुद्धि पथभ्रष्ट होने पर अपराध कर सकता है और अपराध किए जाने पर दंडित उसी तरह से होता है, जैसा कि आम आदमी।
आसाराम के मामले में देखिए। जेल में जाने से पहले तक बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ, सीनियर आईएएस, यहां तक कि न्यायाधिकारी तक उनकी महिमा का गुणगान किए नहीं थकते थे। मीडियाकर्मी भी उनके भक्त रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब का आसाराम के साथ का वीडियो सोशल मीडिया खूब चला। ऐसे ही अनेक धार्मिक व राजनीतिक नेताओं के साथ के फोटो फेसबुव वाट्सऐप पर छाए हुए हैं।  जेल जाने के बाद राजनीति भी हुई और कुछ हिंदू नेताओं ने उनसे मिलने बाद कहा कि उनके साथ साजिश हुई है। इसके लिए सोनिया गांधी तक को जिम्मेदार ठहराया गया, कि ईसाइयत का विरोध करने की वजह से उन्हें फंसाया। मगर अब हालत ये है कि कांग्रेस नीत सरकार गए चार साल हो गए हैं और भाजपा की सरकार है तो भी उनकी खैर खबर लेने वाला कोई नहीं है। मीडिया तो हाथ धो कर पीछे पड़ा है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है, क्योंकि उनका कृत्य ही ऐसा रहा, जिसकी घोर निंदा होनी ही चाहिए।
बहरहाल, बड़ा सवाल ये कि आखिर क्यों लाखों लोगों को आसाराम निर्दोष नजर आते हैं। यदि दीवानगी की हद तक लोगों की श्रद्धा है तो इसका कोई तो कारण होगा ही। हम भले ही उन्हें अंधभक्त कहें या बेवकूफ करार दें, मगर उन लोगों ने जरूर आसाराम में कुछ देखा होगा, जो उन्हें सम्मोहित किए हुए है। केवल सम्मोहित ही नहीं, अपितु अनेकानेक लोगों के जीवन में परिवर्तन आ गया है। उनका व्यवहार पावन हो गया है। पूरा जीवन अध्यात्म की ओर रुख कर गया है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो कि पता नहीं झूठे हैं या सच, मगर उनमें यह बताया गया है कि विपत्ति के समय उन्होंने आसाराम को याद किया और उनकी परेशानी खत्म हो गई या टल गई। कई लोगों को तो उनमें भगवान के दर्शन होते हैं। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि जरूर आसाराम में कुछ ऐसे गुण रहे होंगे, विद्या रही होगी, जो भक्तों को प्रभावित करती है। इसी वजह से उनके अनन्य भक्त हैं। सरकार भी इस बात को जानती है, तभी तो उनको सजा सुनाए जाने वाले दिन अतिरिक्त सुरक्षा प्रबंध किए गए, ताकि उनके भक्त अराजकता न फैला दें।
आसाराम को पूर्वाभास भी होता था, जो कि एक वीडियो से परिलक्षित होता है। उसमें वे कहते दिखाई देते हैं कि उनके मन में जेल जाने का संकल्प आता है और उनका संकल्प देर-सवेर पूरा होता ही है। किस निमित्त, ये पता नहीं। आखिर हुआ भी यही।
खैर, उनमें चाहे जितने गुण रहे हों, मगर मात्र एक अवगुण ने उनकी जिंदगी नारकीय कर दी। अरबों-खरबों का उनका साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया। उसी अवगुण अथवा कृत्य के कारण उनके सारे गुण दिखाई देना बंद हो गए। दूसरी ओर उनके भक्तों को वे तमाम गुण नजर आते हैं, जबकि एक कृत्य साजिश दिखाई देता है।
दुर्भाग्य से आसाराम की तरह अन्य अनेक संत भी गंभीर आरोपों के कारण जेल में हैं। उनका भी अरबों का धार्मिक साम्राज्य बिखर गया है। इन सब की कटु आलोचना इस कारण है कि जो व्यक्ति दूसरों को सदाचार की सीख देता है, जिसके लाखों अनुयायी हैं, अगर वही कदाचार में लिप्त हो जाता है, तो वह घोर निंदनीय है।
कुल जमा बात ये है कि जिस कुकृत्य की वजह से आसराम को आजीवन कैद की सजा सुनाई गई है, उसने उनके जीवन का एक तरह से अंत ही कर दिया है। दूसरा ये कि कोई व्यक्ति कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कानून के सामने वह एक सामान्य व्यक्ति है। अपराध करेगा तो दंड का भागी होगा ही। ताजा फैसले से कानून की प्रभुसत्ता स्थापित हुई है, जो हर आम-ओ-खास के लिए एक नजीर व सबक है।

मोदी के सामने खम ठोक कर खड़ी हैं वसुंधरा

पिछले विधानसभा व लोकसभा चुनाव से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे के बीच चल रही नाइत्तफाकी आखिर आगामी विधानसभा चुनाव से सात माह पहले परवान चढ़ गई है। यूं तो कई बार इस आशय की राजनीतिक अफवाहें उड़ीं कि मोदी वसुंधरा को जयपुर से हटा कर दिल्ली शिफ्ट करेंगे, मगर ऐसा कुछ हुआ नहीं। वजह थी वसुंधरा को डिस्टर्ब करना आसान नहीं था। उनकी राजस्थान पर अपनी निजी पकड़ है। अब जब कि विधानसभा चुनाव नजदीक हैं तो लोकसभा उपचुनाव में करारी हार के बाद स्वाभाविक रूप से भाजपा हाईकमान को यहां नए सिरे से जाजम बिछानी ही है। उसी के तहत प्रदेश अध्यक्ष अशोक  परनामी को हटाया गया, मगर नया अध्यक्ष कौन हो, इसको लेकर मोदी व वसुंधरा के बीच टकराव की नौबत आ ही गई। हालांकि इस टकराव का क्या अंजाम होगा, यह कहना मुश्किल है, मगर यह सुनिश्चित है कि वसुंधरा इतनी आसानी से हथियार डालने वाली नहीं हैं।
ज्ञातव्य है कि भाजपा हाईकमान से टकराव की हिम्मत वसुंधरा पूर्व में भी दिखा चुकी हैं, मगर तब भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह थे। तब भाजपा विपक्ष में होने के कारण कमजोर भी थी। इस कारण वसुंधरा के आगे हाईकमान को झुकना पड़ा। लंबे अरसे तक विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष किसी को नहीं बनने दिया। चुनावी साल में आखिरकार हाईकमान को मजबूर हो कर उन्हें ही पार्टी की कमान सौंपनी पड़ी। लेकिन जैसे ही मोदी लहर के साथ भाजपा पहली बार स्पष्ट बहुमत के साथ केन्द्र पर काबिज हुई और पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष मोदी के ही हनुमान अमित शाह को बनाया गया तो हाईकमान का पलड़ा काफी भारी हो गया। ऐसे में वसुंधरा को दिक्कतें आने लगीं। कई बार उन्हें हाईकमान के आगे मनमसोस कर चुप रहना पड़ा। बहुत प्रयासों के बाद भी अपने बेटे दुष्यंत को केन्द्र में मंत्री नहीं बनवा पायीं। मोदी लगातार इसी कोशिश में थे कि वसुंधरा सरंडर कर दें, मगर रजपूती महारानी का विल पॉवर कमजोर नहीं पड़ा।
ताजा विवाद नए प्रदेश अध्यक्ष को लेकर है। वसुंधरा को हाईकमान की ओर सुझाए जा रहे अध्यक्ष मंजूर नहीं हैं। वे अपने ही इशारे पर काम करने वाला अध्यक्ष चाहती हैं। उधर अमित शाह इस फिराक में हैं कि ऐसा अध्यक्ष बनाया जाए, जो केवल हाईकमान के कहने पर चले और वसुंधरा के आभामंडल का शिकार न हो। वस्तुत: भाजपा हाईकमान किसी भी सूरत में राजस्थान पर कब्जा बरकरार रखना चाहता है। वसुंधरा के फ्रंट पर रहते यह संभव नहीं है। वसुंधरा की पार्टी विधायकों व नेताओं पर तो पकड़ है, मगर जनाधार अब खिसक चुका है। उनके ताजा कार्यकाल में जातीय संतुलन भी काफी बिगड़ा है। ऐसे में उनके नेतृत्व में चुनाव लडऩे के जोखिम उठाया नहीं जा सकता। इसके लिए पार्टी को नए सिरे से तानाबाना बुनना होगा। बड़े पैमाने पर मौजूदा विधायकों के टिकट काटने होंगे। नए जातीय समीकरण बनाने होंगे। उसी के तहत परनामी का इस्तीफा हुआ, मगर नए अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर गाडी गेर में आ गई। इसका प्रमाण ये है कि हाईकमान को नया अध्यक्ष घोषित करने में देरी हो रही है। अब देखना ये है कि वह वसुंधरा कैसे सैट करता है।
बड़ा सवाल ये भी है कि क्या वसुंधरा को अब हटाने का दुस्साहस हाईकमान में है, वो भी तब जबकि चुनाव नजदीक हैं और लोकसभा उपचुनाव के परिणामों ने साबित कर दिया है कि राजस्थान में एंटी इंकंबेंसी फैक्टर काम कर रहा है। लगता यही है कि वह कोई अतिवादी कदम उठाने की स्थिति में नहीं हैं। अगर ऐसा हुआ तो भाजपा के दोफाड़ होने का अंदेशा है। यह सुविज्ञ है कि पिछली बार जब टकराव हुआ था तो इस आशय की खबरें तक आ चुकी थीं कि हाईकमान नहीं माना तो वे अलग पार्टी खड़ी कर लेंगी। ऐसे में बीच का ही रास्ता अपनाया जाएगा। वसुंधरा भी तभी मानेंगी, जब कि उन्हें विधानसभा चुनाव टिकट वितरण में आनुपातिक रूप से पर्याप्त सीटें मिलेंगी। हो सकता है कि वसुंधरा को अनुमान हो कि आखिरकार उन्हें हाईकमान के आगे झुकना होगा या समझौता करना पड़ेगा, मगर फिर भी वे खम ठोक कर खड़ी हैं। असल में उन्हें इस बात का बड़ा गुमान है कि भाजपा वह पार्टी है, जिसे खड़ा करने में उनकी माताजी स्वर्गीया श्रीमती विजयाराजे सिंधिया का अहम योगदान रहा है। इस नाते वे पार्टी की एक ट्रस्टी हैं और बाद में आगे आए नेता उन्हें पीछे नहीं धकेल सकते। इसके अतिरिक्त उन्होंने राजस्थान भाजपा पर मजबूत पकड़ बना रखी है। बहुत से विधायक उनके व्यक्तिगत अनुयायी हैं। और सबसे बड़ी बात ये कि मोदी व शाह कितने भी पावरफुल व शातिर क्यों न हों, मगर राजनीतिक चालों में वसुंधरा भी कम नहीं हैं। राजनीति उनके खून में है। ऐसी महारानी भला इतनी आसानी से कैसे झुक सकती हैं।
-गिरधर तेजवानी

बुधवार, अप्रैल 25, 2018

सांप्रदायिकता व जातिवाद की पराकाष्ठा से गुजर रहा है देश

-तेजवानी गिरधर-
यह सही है कि सांप्रदायिकता व जातिवाद हमारे देश की प्रमुख समस्याओं में से हैं, और ये अरसे से कायम हैं, मगर विशेष रूप से इन दिनों ये पराकाष्ठा को छूने लगी हैं। गनीमत है कि हमारा संविधान कठोर व स्पष्ट है और सामाजिक व्यवस्था में विशेष किस्म की उदारता व सहिष्णुता है, वरना स्थिति इतनी भयावह है कि गृह युद्ध छिड़ जाए या देश के टुकड़े हो जाएं।
तेजवानी गिरधर
कठुआ की घटना को ही लीजिए। कैसी विडंबना है कि वीभत्स बलात्कार व हत्या जैसे जघन्य अपराधों को भी अब संप्रदाय से जोड़ कर देखा जा रहा है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और प्रगतिशील कहलाने वाला हमारा देश आज कैसे दुष्चक्र में फंसा हुआ है। इस तरह के दुष्चक्र पहले भी चलते रहे हैं, मगर सत्ता के संरक्षण में आज जो कुछ हो रहा है, वह बेहद अफसोसनाक है। हालत ये है कि संयुक्त राष्ट्र संघ को ऐसे मामले में दखल देना पड़ रहा है। भारी दबाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कड़े रुख के बाद जरूर जिम्मेदार राजनेता रेखांकित हुए, मगर तब तक आक्रोष पूरे देश में फैल चुका है।
यूं हमारे देश के बहुसंख्यक नागरिक शांति प्रिय हैं, मगर उन्हें बरगलाने वाले साधन अब बहुत अधिक हो गए हैं। सूचना के आदान-प्रदान का काम जब केवल प्रिंट व इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के पास रहा, तब तक वे मर्यादा की सीमा से बंधे हुए रहे, कमोबेश अब भी हैं, मगर जब से सोशल मीडिया का बोलबाला है, किसी पर कोई अंकुश ही नहीं रहा। वाट्स ऐप व फेसबुक सांप्रदायिकता व जातिवाद के साथ राजनीतिक विद्वेष वाली पोस्टों से भरे पड़े हैं। भड़ास निकालने का स्तर इतना घटिया हो चला है कि ऐसा प्रतीत होता है कि मानो हम पूरी तरह से अराजक हो गए हैं। समय-समय पर सरकारों की ओर से चेतावनियां दी जाती हैं, पुलिस आखिरी हथियार के रूप में साइबर सेवाओं को कुछ दिन के लिए ठप कर देती हैं, मगर कानून का भय तो मानो बच ही नहीं गया है। आज अगर सांप्रदायिकता चरम पर है तो उसकी बड़ी वजह ये है कि सांप्रदायिक लोग ऊलजलूल हरकतें करके अपने आपको गौरवान्वित महसूस करते हैं। दुर्भाग्य से उन्हें शाबाशी देने वाले भी कम नहीं हैं। सरकार पर उनका कोई नियंत्रण नहीं। कभी कभी तो लगता है कि कहीं राजनीतिक लाभ के लिए जानबूझ कर समाज में ध्रुवीकरण को बढ़ावा तो नहीं दिया जा रहा।
पिछले दिनों एससी एसटी के मामले में सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था के बाद जिस प्रकार देश जल उठा, उससे तो हिंदू भी आपस में बंटा नजर आया। जैसे ही उसका राजनीतिकरण हुआ, सत्तारूढ़ भाजपा भी घबरा गई। उसे लगने लगा कि पिछले कई साल की मशक्कत के बाद मुख्य धारा से जोड़ा गया कुछ प्रतिशत अनुसूचित जाति का तबका कहीं छिटक न जाए। एक ओर तो वह कट्टर हिंदूवाद के अंदरूनी दबाव में है तो दूसरी ओर अनुसूचित जाति की मिजाजपुर्सी के लिए अंबेडकवाद को पूजने को मजबूर है। अंबेडकर के नाम पर अब क्या कुछ नहीं हो रहा। एक ओर संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण विरोध विचार का कड़वा घूंट पिया जा रहा है तो दूसरी ओर राजनीतिक घाटा होते देख आरक्षण समाप्त नहीं किए जाने की ताबड़तोड़ बयानबाजी देनी पड़ रही है। आरक्षण का पूरा दोष कांग्रेस पर मढ़ तो दिया जाता है, मगर संस्कारवान पीढ़ी बनाने की दुहाई देने वाले दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ वाले इस देश में सामाजिक समरसता कायम नहीं की जा सकी है। गांवों में आज भी सामाजिक स्तर पर अनुसूचित जाति का तबका दमन का शिकार है। आपको ख्याल होगा कि पिछले दिनों एससी एसटी आंदोलन के दौरान सर्वाधिक पूजित हनुमान जी के चित्र के साथ घृणित दुव्र्यवहार होने का वीडियो वायरल हुआ तो उस पर बड़ा विवाद हुआ, मगर इसका किसी के पास जवाब नहीं था कि हनुमान जी और अन्य देवी-देवताओं के मंदिरों में प्रवेश नहीं करने देने के लिए कौन जिम्मेदार है? जब हम उन्हें मंदिर में जोने से रोकते हैं तो यह उम्मीद कैसे करके बैठे हैं कि जिन देवी-देवताओं को हम रोजाना श्रद्धा से पूजते हैं, उनको वे भी पूजनीय मानेंगे। अर्थात कड़वी सच्चाई यही है कि हमारी सामाजिक व्यवस्था आज भी पिछड़ों को बराबरी का दर्जा नहीं दे रही, केवल कानूनी रूप से ही पिछड़े आगे लाए जा रहे हैं। कानून का दुरुपयोग अगर हो रहा है तो उसकी वजह यही है कि हम मानसिक रूप से पिछड़ों को स्वीकार नहीं कर रहे, ऐसे में वे अतिरेक करने पर आमादा हो जाते हैं।
केवल अनुसूचित जातियां ही क्यों, हिंदुओं की अन्य जातियां भी अलग-अलग केन्द्रों पर ध्रुवीकृत हो चुकी हैं। यही वजह है कि चुनावों में टिकटों का निर्धारण ही जातियों के आधार पर हो रहा है।
कुल जमा सांप्रदायिकता व ऊंच-नीच की इस समस्या का समाधान इस कारण नहीं हो पा रहा है कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था उसमें सहयोग करने की बजाय बढ़ावा देने पर आमादा है। ऐसे में इस देश का भगवान ही मालिक है।

शुक्रवार, मार्च 23, 2018

वसुंधरा को न निगलते बन रहा है, न उगलते

-तेजवानी गिरधर-
हाल ही संपन्न लोकसभा उपचुनाव में 17 विधानसभा क्षेत्रों में बुरी तरह से पराजित होने के बाद भाजपा सकते में है। न तो वह यह निश्चय कर पा रही है कि मोदी लहर कम हो गई है और न ही ये कि यह केवल मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की अकुशल शासन व्यवस्था का परिणाम है। आरएसएस खेमा जहां इस हार को वसुंधरा के अब तक के शासन काल के प्रति जनता की नाराजगी से जोड़ कर देख रही है तो वहीं वसुंधरा खेमा यह मानता है कि ऐसे परिणाम आरएसएस की चुप्पी की वजह से आये हैं। असलियत ये है कि यह दोनों ही तथ्य सही है। एक सोची समझी रणनीति के तहत इस उपचुनाव को पूरी तरह से वसुंधरा राजे के मत्थे मढ़ दिया गया, जिसमें प्रत्याशियों के चयन से लेकर चुनावी रणनीति व प्रचार का जिम्मा वसुंधरा पर ही था। आरएसएस की चुप्पी असर ये हुआ कि घर-घर से मतदाता को निकाल कर वोट डलवाने का माहौल कहीं भी नजर नहीं आया। यह सही है कि एंटी इन्कंबेंसी फैक्टर ने काम किया गया, मगर संघ की अरुचि के कारण उसे रोका नहीं जा सका। दिलचस्प बात ये है कि भले ही इसे राज्य सरकार के प्रति एंटी इन्कंबेंसी से जोड़ा गया, मगर सच ये है कि इसमें मुख्य भूमिका केन्द्र सरकार की नोटबंदी व जीएसटी ने अदा की। अर्थात जनता की नाराजगी राज्य के साथ केन्द्र की सरकार के प्रति भी उजागर हुई। ऐसे में अकेले वसुंधरा को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा पा रहा।
आपको ज्ञात होगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की वसुंधरा के प्रति नाइत्तफाकी काफी समय से चल रही है और यही वजह है कि कई बार उनको हटा कर किसी और को मुख्यमंत्री बनाने की चर्चाएं हुईं। अब जबकि वसुंधरा के नेतृत्व में लड़े गए उपचुनाव में भाजपा चारों खाने चित्त हो गई तो यही माना जाना चाहिए कि भाजपा हाईकमान नई रणनीति के तहत वसुंधरा को हटाए, मगर ऐसा होना आसान नहीं लग रहा। इस तथ्य को आसानी से समझा जा सकता है कि आज जब वसुंधरा राजस्थान में हैं, तब भाजपा की ये हालत हुई है तो उन्हें दिल्ली बुलाए जाने पर क्या होगा। वसुंधरा के एरोगेंस के बारे हाईकमान अच्छी तरह से वाकिफ है। अगर उनके कद के साथ कुछ भी छेडख़ानी की जाती है तो वे किसी भी स्तर पर जा सकती हैं। अब दिक्कत ये है कि मजबूरी में भाजपा यदि वसुंधरा के चेहरे पर ही चुनाव लड़ती है तो परिणाम नकारात्मक आने का खतरा है और हटाती है तो और भी अधिक नुकसान हो सकता है। कुल मिला कर भाजपा ही हालत ये है कि वसुंधरा न निगलते बन रही है और न ही उगलते। यदि वजह है कि वसुंधरा के नेतृत्व में ही नई सोशल इंजीनियरिंग पर काम हो रहा है। मंत्रीमंडल में फेरबदल पर गंभीरता से विचार हो रहा है। डेमेज कंट्रोल के लिए पिछले दिनों किरोड़ी लाल मीणा की पूरी पार्टी का भाजपा में विलय होना इसी कवायद का हिस्सा है। ऐसा करके भाजपा ने मीणा समाज को जोडऩे का काम किया है। भाजपा अभी आनंदपाल प्रकरण से नाराज राजपूतों व वरिष्ठ नेता घनश्याम तिवाड़ी के कारण छिटक रहे ब्राह्मण समाज को भी साधने की जुगत में लगी हुई है। कदाचित इसी वजह से राजपूत व ब्राह्मण समाज से एक-एक उप मुख्यमंत्री तक की अफवाहें फैल रही हैं। हालांकि यह एक फार्मूला है, मगर अन्य फार्मूलों पर भी चर्चा हो रही है। संभव है, जल्द ही मंत्रीमंडल का नया स्वरूप सामने आ जाए।
राजनीति में कब क्या होगा, कुछ नहीं कहा जा सकता। हो सकता है कि वसुंधरा पर इतना दबाव बना दिया जाए कि वे राजस्थान छोड़ कर दिल्ली जाने को राजी हो जाएं, मगर जिस तरह की हलचल चल रही है, उसे देखते हुए नहीं लगता कि पार्टी इतना बड़ा कदम उठाने का दुस्साहस करेगी। हद से हद ये होगा कि वसुंधरा यथावत रहेंगी और मोदी व पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के दबाव में विधानसभा चुनाव में संघ कोटे की सीटें बढ़ा दी जाएं। आगे आगे देखते हैं होता है क्या?