तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

शनिवार, सितंबर 16, 2017

मोदी के साम, दाम, दंड, भेद को जस्टीफाई किया जा रहा है

एक समय में पार्टी विथ द डिफ्रेंस का तमगा लगाने वाली भाजपा जब से अपनी रीति-नीति बदल कर सत्ता में आई है, उसके कार्यकर्ताओं को लग तो ये रहा है कि अब वे उस पार्टी के नहीं रहे हैं, जिसकी वे दुहाई दिया करते थे। वे सब समझ रहे हैं कि जिन बातों को लेकर वे कांग्रेस की आलोचना करते नहीं थकते थे, आज वही बातें खुद की पार्टी में हो रही हैं, मगर उन्हें लगता है कि सत्ता में बने रहने का यही फंडा है। यहां तक कि कांग्रेस मुक्त  भारत का नारा देने वाले अपनी ही पार्टी को कांग्रेस युक्त होता देख रहे हैं तो उन्हें उसमें कुछ भी गलत नजर नहीं आता। स्वभाविक रूप से अब जबकि भाजपा निशाने पर है तो उसके कार्यकर्ताओं को लगता है कि बचाव का एक मात्र तरीका यही है कि मौजूदा रीति-नीति को जस्टीफाई किया जाए। ढ़ीठ हो लिया जाए।
एक बानगी देखिए:-
जब तक भाजपा वाजपेयी जी जैसों की विचारधारा पर चलती रही, वो राम के बताये मार्ग पर चलती रही। मर्यादा, नैतिकता, शुचिता इनके लिए कड़े मापदंड तय किये गये थे, परन्तु आज तक कभी भी पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर सकी। मात्र एक लाख रुपये लेने पर भाजपा ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्षमण को हटाने में तनिक भी विलंब नहीं किया, परन्तु चुनावों में नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात...। ताबूत घोटाले के आरोप पर जार्ज फर्नांडिस का इस्तीफा, परन्तु चुनावों में नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात...। कर्नाटक में येदियुरप्पा पर भ्रष्ट्राचार के आरोप लगते ही येदियुरप्पा को भाजपा ने निष्कासित करने में कोई विलंब नहीं किया, परन्तु चुनावों में नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात...। आखिरकार मोदी के कार्यकाल वाली भाजपा ने अपनी नीति बदल दी और अब साम, दाम, दंड, भेद वाली नीति अपना कर सत्ता पर काबिज है। काबिज ही नहीं है, तोड़-फोड़ कर लगातार विस्तार करती जा रही है।
जो भाजपा भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस को पानी पी पी कर कोसती थी,  उसी के कार्यकर्ता अब नई भाजपा को यह कह कर जस्टीफाई कर रहे हैं कि हमारी रंगों में पूर्ववर्ती सरकारों ने ऐसे भ्रष्टाचार के वायरस डाल दिये हैं कि हम स्वयं भ्रष्ट हो गये हैं। हमें जहां मौका मिलता है, हम भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने से नहीं चूकते हैं। पुलिस का चालान हो, या सरकारी विभागों में काम हो, हम कुछ ले देकर अपने काम को निपटाने में ही यकीन रखते हैं।
भाजपा के नए अवतार पर एक कार्यकर्ता ने लिखा है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नक्शे कदम पर चलने वाली भाजपा को मोदी कर्मयोगी कृष्ण के राह पर ले आये हैं। कृष्ण अधर्मी को मारने में किसी भी प्रकार की गलती नहीं करते हैं। छल हो तो छल से, कपट हो तो कपट से, अनीति हो तो अनीति से। अधर्मी को नष्ट करना ही उनका ध्येय होता है। इसलिए वो अर्जुन को सिर्फ मछली की आंखों को ही देखने को कहते हैं।
भाजपा कार्यकर्ता की मानसिकता में आए परिवर्तन की बानगी देखिए:-
येदियुरप्पा को फिर से भाजपा में शामिल किया गया, नतीजा लोकसभा चुनावों में सामने है। पीडीपी से गठबंधन करके कम से कम काश्मीर के अंदरूनी हालात से रूबरू तो हो रहे हैं..। कुल मिलाकर सार यह है कि, अभी देश दुश्मनों से घिरा हुआ है, नाना प्रकार के षडयंत्र रचे जा रहे हैं। अभी भी हम नैतिकता को अपने कंधे पर ढ़ोकर नहीं चल सकते हैं। नैतिकता को रखिये ताक पर, और यदि इस देश के बचाना चाहते हैं तो सत्ता अपने पास ही रखना होगा। वो चाहे किसी भी प्रकार से हो। साम दाम दंड भेद, किसी भी प्रकार से.... । बिना सत्ता के आप कुछ भी नहीं कर सकते हैं। इसलिए भाजपा के कार्यकर्ताओं को चाहिए कि कर्ण के अंत करते समय के विलापों पर ध्यान न दें (येदियुरप्पा, पीडीपी, ललित मोदी), सिर्फ ये देखें कि.......अभिमन्यु की हत्या के समय उनकी नैतिकता कहां चली गई थी?
कुल मिला कर भाजपा कार्यकर्ताओं में एक नई सोच जन्म ले रही है, कि सत्ता में रहना है तो उसके लिए कुछ भी करना जायज है। महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी इत्यादि को लेकर आसमान सिर पर उठाने वाले भाजपा कार्यकर्ता इन समस्याओं के पहले से ज्यादा हो जाने पर भी आंख मूंदने को मजबूर हैं, क्योंकि सत्ता पर सवार हैं।
-तेजवानी गिरधर
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रविवार, सितंबर 10, 2017

क्या केवल बाबा राम रहीम ही जिम्मेदार है?

अपनी ही शिष्या साध्वी के साथ बलात्कार करने के मामले में दोषी ठहराये जाने के बाद हुई हिंसा, आगजनी, तोडफ़ोड़ को लेकर कोर्ट तो सख्त है ही, पूरा मीडिया भी बाबा राम रहीम की जम कर मजम्मत कर रहा है। यह स्वाभाविक भी है। धर्म व आस्था की आड़ में यौन शोषण कोई निराधम प्राणी ही कर सकता है, जिसकी जितनी निंदा की जाए कम है। इस घटना के कारण एक ओर जहां इसी किस्म के बाबाओं को लानत दी जा रही है, वहीं देश की राजनीति, धर्म और हमारी सामाजिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
सबसे पहले बात राजनीति की। इस घटना के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में कहा कि आस्था के नाम पर हिंसा को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसी पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। यह बात ठीक है कि प्रधानमंत्री को ऐसा ही वक्तव्य देना चाहिए, मगर आस्था के नाम पर राजनीति के सहारे पनपने वाले व बाद में राजनीतिज्ञों को ही सहारा देने वाले ऐसे मठ व डेरे क्यों बर्दाश्त किए जा रहे हैं? क्या ये सही नहीं है कि वोटों की खातिर ऐसे बाबाओं को पनपाने में राजनीतिज्ञों का ही हाथ है? बाबा राम रहीम के मामले में तो जानते बूझते हुए भी राजनीतिक संरक्षण दिया जाता रहा। यह हरियाणा सरकार की की नरमी का ही नतीजा रहा कि राम रहीम के समर्थकों को सिरसा, पंचकूला और अन्य शहरों में एकत्रित होने से रोकने के लिए उपयुक्त कदम नहीं उठा सकी। इसके दुष्परिणाम सबके सामने हैं। यदि हम बाबाओं के प्रति अंध भक्ति रखने वालों को दोषी ठहराते हैं तो बाबाओं के मंचों पर जा कर उनकी ब्रांडिंग करने वाले राजनीतिज्ञों को निर्दोष कैसे मान सकते हैं? सच तो ये है कि बाबाओं का सहारा लेने और उन्हें संरक्षण देने के मामले में भाजपा ही सबसे आगे नजर आती है। डेरा समर्थकों की राजनीति में इतना अहमियत उनके वोट के कारण है, जो हार जीत तय कराती है। सिरसा के अलावा हरियाणा के कई जिलों में डेरा का प्रभाव है, जिसका फायदा 2014 के चुनाव में बीजेपी को कई सीटों पर मिला और जीत हासिल हुई। जीत हासिल होने के बाद गुरमीत रामरहीम को धन्यवाद अदा करने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव के साथ बीजेपी के उम्मीदवार सिरसा गए थे। जब सत्ताधारी पार्टी के विधायक और मंत्री किसी संत के आगे माथा टेकता है तो अधिकारियों को क्या सन्देश जाएगा?
वहीं मीडिया जो, आज चिल्ला चिल्ला कर बाबाओं का पोस्टमार्टम कर रहा है, क्या उनका ऐसे बाबाओं को स्थापित करने में मीडिया की भूमिका नहीं है? सोशल मीडिया पर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की जम कर आलोचना हो रही है। एक बानगी देखिए:-
आज हर न्यूज़ चैनल पर दिखाया जा रहा है- बाबा की अय्याशी का अड्डा, गुफा का रहस्य, दत्तक पुत्री का सच इत्यादि। ऐसी कितनी ही कहानियां और गुफा के आभासी वीडियो, जिन्हें दिखा कर लोगों को भ्रमित किया जा रहा है। प्रश्न उठता है कि इतने खोजी मीडिया चैनल अब तक कहां थे? न तो बाबा नया है न ही गुफा रातों-रात बन गई है, फिर ये कैसी पत्रकारिता? जो अब तक सो रही थी, अब बाबा के जेल जाते ही मुखरित होने लगी। इन अवसरवादी चैनलों पर भी जानबूझकर जुर्म छिपाने का आरोप लगना चाहिए।
सोशल मीडिया, जो कि पूरी तरह से स्वच्छंद है, उस पर तो बाबाओं के चक्कर में पडऩे वाली महिलाओं पर भी तंज कसे जा रहे हैं-
बाबा राम रहीम को गालियां दे लो या आशाराम को। उन मूर्ख महिलाओं को भी कुछ बोलो, जो अपने सास, ससुर, घर-परिवार की सेवा को छोड़ कर बाबाओं के चरण दबाती हैं। उन महिलाओं का क्या जो, पति परेमश्वर को छोड़ कर बाबाओं को पूजती हैं, माता-पिता समान सास-ससुर का प्रताडि़त करती हैं? सच तो ये है कि इन बाबाओं की सेवा में लगी महिलाएं अगर दस प्रतिशत भी अपने परिवार की सेवा में मन लगा लें तो उनका जीवन धन्य हो जाए।
बाबाओं के प्रति अंध भक्ति रखने वालों की मूर्खता की भी खूब मजम्मत हो रही है। देखिए- अंधभक्त श्रद्धा से सुनते हैं, वे सोचते नहीं हैं। बाबा जी दौलत के ढ़ेर पर बैठ कर बोलते हैं कि मोह-माया छोड़ दो, लेकिन उत्तराधिकारी अपने बेटे को ही बनायेंगे। भक्तों को लगता है कि उनके सारे मसले बाबा जी हल करते हैं, लेकिन जब बाबा जी मसलों में फंसते हैं, तब बाबा जी बड़े वकीलों की मदद लेते हैं, अंधभक्त बाबा जी के लिये दुखी होते हैं, लेकिन सोचते नहीं हैं। भक्त बीमार होते हैं, डॉक्टर से दवा लेते हैं, मगर बाबाओं के आगे भी सिर झुकाते हैं, जब ठीक हो जाते हैं तो कहते हैं, बाबा जी ने बचा लिया, जबकि बाबा जी बीमार होते हैं तो बड़े डॉक्टरों से महंगे अस्पतालों में इलाज करवाते हैं। अंधभक्त अपने बाबा को भगवान समझते हैं, उनके चमत्कारों की सौ-सौ कहानियां सुनाते हैं, लेकिन जब बाबा किसी अपराध में जेल जाते हैं, तब वे कोई चमत्कार नहीं दिखाते।
एक के बाद एक बाबा के जेल जाने के बाद कुल जमा बात ये सामने आती है कि वे बाबा भले ही सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं, मगर हमारी अंध श्रद्धा और राजनीतिक व्यवस्था भी उतनी ही दोषी है। इस पर गंभीर चिंतन की जरूरत है।

-तेजवानी गिरधर
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गुरुवार, अगस्त 10, 2017

कोई टपोरी ही श्रीकृष्ण को दुनिया का सबसे बड़ा डॉन बता सकता है

आगामी 15 अगस्त को महायोगी, सर्वगुणसंपन्न भगवान श्रीकृष्ण की जन्माष्ठमी है। उसे मनाने के लिए तैयारियां शुरू हो गई हैं। उसी सिलसिले में  कुछ सिरफिरे एक पोस्ट सोशल मीडिया पर कट-पेस्ट कर रहे हैं।
आइये, पहले वह पोस्ट देख लें:-
15-08-2017 तारीख को  दुनिया के सबसे
बड़े डॉन का बर्थडे है!

कोई ऐसा गुनाह नहीं, जो उन्होंने नहीं किया हो.....
जेल में जन्म.....
मां-बाप की हेराफेरी...
बचपन से लड़कियों का चक्कर.....
नाग देवता को भी मार दिया......
कंकर मार कर लड़कियों को छेडऩा....
16108 लफड़ा........
दो-दो बीवियां......
अपने मामू का मर्डर......
मथुरा से तड़ीपार.......
फिर भी भाई कभी पकड़े नहीं गए...
इसलिए तो उसे मैं भगवान् मानता हूं

जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं
जय श्रीकृष्ण

आप देखिए, भगवान श्रीकृष्ण की जय भी कर रहे हैं, उनके जन्म की शुभकामनाएं भी दे रहे हैं, यानि कि उनके प्रति श्रद्धा भी है, फिर भी कैसी उपमाएं दी हैं? निश्चित ही यह काम किसी टपोरी का है। उसे श्रीकृष्ण की लीलाओं में सांसारिक कृत्य नजर आ रहे हैं। अर्थात जैसा वह है, या होना चाहता है, वैसा ही श्रीकृष्ण को देख रहा है। जैसे हम मानव ईश्वर की कल्पना महामानव के रूप में करते हैं, ठीक वैसे ही टपोरी उसे महाटपोरी मान रहा है। नैतिकता का पतन देखिए कि वह ऐसा कह कर अपने कृकृत्यों को जायज करार दे रहा है। ...कि उसने किया या अब करे तो क्या हुआ, श्रीकृष्ण भी तो ऐसा करते थे। ऐसा भ्रष्ट बुद्धि की वजह से ही हो सकता है। मगर अफसोस जिस महान संस्कृति ही हम दुहाई देते हैं, हमारे जिन महापुरुषों की बदोलत भारत को विश्व गुरू मानते हैं, उसी संस्कृति में ऐसे लोग भी हैं, जो कुसंस्कृत होने का प्रमाण दे रहे हैं। ऐसा नहीं है कि उनकी श्रीकृष्ण के प्रति अश्रद्धा होगी, वे भी श्रीकृष्ण की मूर्ति के आगे वैसे ही नतमस्तक होते होंगे, जैसे आम श्रद्धालु, मगर उन्हें अपने ही भगवान की मजाक बनाने में तनिक भी शर्म नहीं आती। चलो, उनकी श्रद्धा न सही, मगर वे इतने बेखौफ हैं कि उन्हें अन्य की श्रद्धा का भी डर नहीं। ऐसा अन्य धर्मों में नहीं। चाहे मुसलमान हों या ईसाई, बौद्ध हों या जैन, किसी को भी अपने भगवान या ईष्ट के प्रति ऐसी घटिया टिप्पणी करते नहीं देखा होगा। अव्वल तो कोई ऐसा करता ही नहीं, खुदानखास्ता गलती से कर भी दे तो समझो उसकी खैर नहीं। मगर हिंदू धर्म को मानने वालों में ऐसे भ्रष्टबुद्धि लोग मौजूद हैं, जो कि न केवल बेहद शर्मनाक है, अपितु असहनीय है। केवल भगवान श्रीकृष्ण ही क्यों, जिनकी मति मारी हुई है, वे भगवान राम, माता सीता, हनुमान जैसे देवी देवताओं तक पर चुटकले बनाते हैं। राजनीतिक कारणों से महात्मा गांधी पर भी अभद्र टिप्पणियां करने से लोग बाज नहीं आते। और तो और गणेश चतुर्थी, नवरात्र आदि के जुलूस या कावड़ यात्रा के दौरान मद्यपान व अन्य मादक पदार्थों का सेवन किए हुए लोग मिल जाएंगे। आस्था व नैतिकता का यह हृास बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। फिर भी यदि हम फिर विश्व गुरू बनने का ख्वाब देखते हैं तो यह कोरी कल्पना ही है।
ऐसा नहीं कि टपोरियों की पोस्ट को लेकर सज्जन चिंतित नहीं, वे खूब अपील करते हैं कि जन्माष्टमी आ रही है, सभी से विनम्र निवेदन है कि भगवान श्रीकृष्ण के बारे में उलटे-सीधे मेसेज पोस्ट न करें और कोई भी गलत पोस्ट करके धर्म का अपमान न करे, मगर उनकी सुनता कौन है?
-तेजवानी गिरधर
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बुधवार, अगस्त 02, 2017

साधु-संत भी लोकेषणा से मुक्त नहीं

इसमें कोई शक नहीं कि साधु-संत हमारे लिए सम्माननीय हैं। वे समाज का मार्गदर्शन करते हैं और आमजन में धर्म के प्रति आस्था कायम रखे हुए हैं और उसी वजह से इस अर्थ प्रधान व मतलबी दुनिया में संस्कार व नैतिक जीवन मूल्य मौजूद हैं, मगर वे भी वैसी ही लोकेषणा रखते हैं, जैसी कि हम लोग रखते हैं। इसका नजारा हाल ही जयपुर में देखने को मिला, जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के आगमन पर साधु-संतों का सम्मेलन किया गया।
इस मौके पर अमित शाह व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सहित अन्य नेताओं ने उनसे आशीर्वाद लिया। न केवल मीडिया ने ऐसे क्षणों को कैमरे में कैद कर यह दिखाया कि देखो किस प्रकार सत्ताधीश साधुओं के आगे नतमस्तक होते हैं, अपितु कुछ संतों ने भी अमित शाह व वसुंधरा को आशीर्वाद देते हुए खींचे गए फोटो सोशल मीडिया पर जारी किए। मीडिया की तो चलो ड्यूटी है कि वह समाज में जो कुछ चल रहा है, उसकी रिपोर्ट करे, मगर यदि संत भी ऐसे फोटोज का प्रचार-प्रसार करते हैं, तो इसका अर्थ ये है कि वे भी हमारी तरह लोकेषणा से मुक्त नहीं हैं। लोकेषणा भी ऐसी कि देखो कैसे सत्ता के शिखर पर बैठे नेता हमारे आगे शीश नवा रहे हैं। यानि कि जितना बड़ा नेता आशीर्वाद ले रहा है, उतना ही संत का स्टेटस बढ़ जाता है, कद बढ़ जाता है। अर्थात बड़े नेता को आशीर्वाद देना भी ब्रॉन्डिंग  के काम आता है। इसका अनुमान इस प्रकार लगाया जा सकता है कि भविष्य में वे ही फोटोज आप संतों के ड्राइंग रूप में टंगे मिलेंगे। उनके शिष्य भी ऐसे फोटोज का प्रचार-प्रसार करते हैं कि देखो, अमुक बड़ा नेता हमारे गुरू के आगे झुक रहा है।
इसके विपरीत जैसी कि हमारी संस्कृति है, वह यह दर्शाती है कि हमारे साधु-संत सभी प्रकार की एषणाओं से मुक्त हैं। वे इसी कारण हमारे लिए सम्मानीय हैं कि हम सभी तरह की एषणाओं से घिरे हुए हैं, जबकि हमारे आदर्श विरक्त हैं। उनके लिए छोटा-बड़ा एक समान है। सभी पर एक जैसी कृपा बरसाते हैं।
रहा सवाल राजनीतिज्ञों का तो वे इस कारण शीश झुकाते हैं क्यों कि या तो वाकई उनकी संतों के प्रति श्रद्धा है या फिर जनता को संदेश दे रहे होते हैं कि आप भी संतों का सम्मान करें। जबकि साइलेंट एजेंडा ये होता है जिस भी संत के आगे वे झुकें, उसके फॉलोअर्स में उनकी लोकप्रियता बढ़े। इसी कारण नेता लोग हर संत के आगमन पर भरी सभा में जा कर आशीर्वाद लेते हैं। यानि वोटों की खातिर यह प्रहसन किया जाता है। सच तो ये है कि कई बार संतों के ही शिष्य नेताओं से संपर्क कर उनसे आग्रह करते हैं कि उनके गुरू की सभा में आ कर आशीर्वाद लें। ऐसे शिष्यों में विशेष रूप से वे होते हैं, जो कि किसी न किसी राजनीतिक दल अथवा नेता के अनुयायी होते हैं और  ये जताते हैं कि देखो अमुक संत और नेता तक उनकी पहुंच है।
लब्बोलुआब नेताओं की लोकेषणा तो समझ में आती है, मगर साधु-संत भी इससे मुक्त नहीं तो इसका ये अर्थ है कि वे भी संसार में रस ले रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि नेता ने सफेद कपड़े पहन रखे हैं और साधु ने गेरुआ।  और चूंकि गेरुआ रंग हमारी श्रद्धा का प्रतीक है, इस कारण हम हर उस जगह झुक जाते हैं, जहां गेरुआ रंग होता है। मन में श्रद्धा हो न हो, हम भी इस वजह से झुक जाते हैं, क्योंकि हमारे इर्द-गिर्द अन्य झुक रहे होते हैं।
-तेजवानी गिरधर
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शनिवार, जुलाई 29, 2017

मुख्यमंत्री हेल्पलाइन : नई बोतल में पुरानी शराब

राज्य सरकार आमजन की समस्याओं के समाधान के लिए आगामी 15 अगस्त से मुख्यमंत्री हेल्पलाइन लॉन्च करने जा रही है। यह निश्चित ही स्वागत योग्य कदम है, क्योंकि इसके लिए जो प्रक्रिया बनाई गई है, वह परिणाममूलक नजर आती है, मगर हमारा जो प्रशासनिक ढ़ांचा है, वह इसे कामयाब होने देगा, इसमें तनिक संदेह है। संदेह की वजह भी है। राज्य की जनता का पिछला अनुभव अच्छा नहीं रहा है।
आपको ज्ञात होगा कि पिछली सरकार के दौरान लोक सेवा गारंटी कानून लागू कर हर शिकायत का निपटारा करने के लिए चालीस दिन की अवधि तय की गई थी। बेशक वह भी जनता को राहत देने वाला एक अच्छा कदम था, मगर उसका हश्र क्या हुआ, सबको पता है। आरंभ में जरूर इस पर काम हुआ और वह गति पकड़ता, इससे पहले ही सत्ता परिवर्तन हो गया। प्रशासनिक ढ़ांचे ने राहत की सांस ली। हालांकि कानून आज भी लागू है, मगर न तो उसके तहत समाधान तलाशा जा रहा है और न ही प्रशासन को उसकी चिंता है। कुछ इसी तरह का सूचना का अधिकार कानून बना, मगर सूचना देने में अधिकारी कितनी आनाकानी या कोताही बररते हैं, यह सर्वविदित है। अव्वल तो वे अर्जी में ही कोई न कोई तकनीकी गलती बताते हुए सूचना देने से इंकार कर देते हैं। अगर कोई पीछे ही पड़ जाए तो सूचना देने से बचने के उपाय के बतौर शब्दों की बारीकी में उलझा देते हैं। सच बात तो ये है कि आम आदमी थोड़ी बहुत बाधा आने पर आगे रुचि ही नहीं लेता। अगर कोई पीछे पड़ता है तो कई बाधाओं को पार करने के बाद ही संबंधित अधिकारी पर जुर्माना करवा पाता है।
खैर, अब बात करते हैं मौजूदा सरकार की ओर से शुरू किए गए मुख्यमंत्री संपर्क पोर्टल की। इसमें भी समस्याओं के ऑन लाइन समाधान की व्यवस्था है, मगर कितनों का समाधान मिलता है, यह किसी से छिपा नहीं है। असल में जो व्यवस्था बनाई गई है, वह तो पूरी तरह से दुरुस्त है, मगर उस पर अमल का जो तरीका है, वह पूरी तरह से बाबूगिरी स्टाइल का है। उसमें कहीं न कहीं टालमटोल नजर आती है। शिकायतकर्ता को जवाब तो आता है, मगर उसमें समाधान कहीं नजर आता। वस्तुत: हमारे सरकारी अमले में कागजी खानापूर्ति की आदत पड़ गई है, समाधान हो या न हो, उसकी कोई फिक्र नहीं।
अब अगर मुख्यमंत्री हेल्पलाइन लॉन्च की जा रही है तो यह अपने आप में इस बात का सबूत है कि मुख्यमंत्री संपर्क पोर्टल कारगर नहीं हो पाया। बेशक मुख्यमंत्री हेल्पलाइन की व्यवस्था भी बड़ी चाक-चौबंद नजर आती है, मगर असल में ये है पुरानी व्यवस्था का ही नया तकनीकी रूप।  जैसे नई बोतल में पुरानी शराब। पहले पोर्टल पर शिकायत ऑन लाइन, दर्ज होती रही है, और अब भी वह ऑन लाइन ही है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब अनपढ़ शिकायतकर्ता भी मोबाइल फोन पर अपनी आवाज में अपनी परेशानी दर्ज करवा सकता है। रहा सवाल शिकायत के निपटाने का तो पहले भी संबंधित विभाग के पास शिकायत जाती थी, अब भी जाएगी। रहा सवाल समस्या समाधान की समय सीमा का तो वह लोक सेवा गारंटी कानून के तहत भी थी और मुख्यमंत्री संपर्क पोर्टल में भी। मगर हुआ क्या?
असल में हमारे यहां गणेश जी की बड़ी महिमा है, इस कारण हर योजना का श्रीगणेश बहुत बढिय़ा, गाजे-बाजे के साथ किए जाने की परंपरा रही है। योजनाएं बनाते वक्त भी उसकी हर बारीकी को ध्यान में रखा जाता है, मगर बाद में वही ढर्ऱे पर चल पड़ती है। एक छोटे से उदाहरण से आप हमारी मानसिकता को समझ सकते हैं। आपने देखा होगा कि जब भी कहीं सार्वजनिक मूत्रालय बनाया जाता है तो बाकायदा में चिकनी टाइलें लगाई जाती हैं, पॉट भी लगाया जाता है, निकासी की भी पुख्ता व्यवस्था की जाती है, यहां तक कि पानी की टंकी का भी इंतजाम होता है, मगर चंद दिन बाद ही उसकी हालत ऐसी हो जाती है कि वहां जाने पर घिन्न सी आती है। टंकी में पानी नहीं भरा जाता, टाइलें टूट जाती हैं, पॉट साबूत बचता है तो उसका पाइप गायब होता है। कहीं कहीं तो निकासी ही ठप होती है। यानि कि बनाते समय जरूर सारी जरूरतों का ध्यान रखा जाता है, मगर बाद में मॉनिटरिंग पर कोई ध्यान नहीं देता। कुछ ऐसा ही है सरकारी योजनाओं का हाल।
आपने देखा होगा कि दैनिक भास्कर में भी भास्कर हस्तक्षेप कॉलम में स्थानीय संपादक डॉ. रमेश अग्रवाल ने भी मुख्यमंत्री हैल्पलाइन को यद्यपि   नई आजादी की संज्ञा दी है, मगर साथ ही यह भी आशंका जता दी है कि दफ्तरी पैंतरों के शातिर, नौकरशाह उम्मीदों से भरी नई व्यवस्था को भी अपने पंजों का शिकार बना डालें। दफ्तरों से फाइल की फाइल गायब कर डालना, किसी अर्जी पर एक बार में सारी आपत्तियां डालना, स्पष्ट कानूनों में भी भ्रम के पेंच डालकर मार्गदर्शन मांगने के नाम पर आवेदनों को अटका देना, कानूनों की नकारात्मक व्याख्या निकालना, ये सब वे फंदे हैं, जिनमें उलझकर बड़े से बड़े लोक कल्याणकारी कानून जमीन सूंघ चुके हैं।
कुल मिला कर योजना निश्चित रूप से सराहनीय है, मगर यदि सरकार की यह मंशा है कि इससे वाकई आमजन को राहत मिले तो उसे इसे परिणाममूलक बनाने के लिए दंडात्मक बनाना होगा, वरना हमारा प्रशासनिक तंत्र कितना चतुर है, उसकी व्याख्या करने की जरूरत नहीं है।
-तेजवानी गिरधर
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शुक्रवार, जुलाई 28, 2017

सत्ता की खातिर भ्रष्टाचार को छोड़ सांप्रदायिकता से नाता जोड़ा

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर यह स्थापित कर दिया है कि राजनीति अब सिद्धांत विहीन होती जा रही है। सत्ता की खातिर कुछ भी किया जा सकता है। कैसी विडंबना है कि सांप्रदायिकता के नाम पर जिन को पानी पी-पी कर कोसा और सत्ता भी हासिल की, उन्हीं से हाथ मिला लिया। हालांकि उन्होंने लालू से नाता तोड़ कर ये संदेश देने की कोशिश की है कि वे भ्रष्टाचार के साथ कोई समझौता नहीं कर सकते, मगर सांप्रदायिकता के जिस मुद्दे को लेकर भाजपा से पुराना नाता तोड़ा, आज उसी से गलबहियां कर रहे हैं, तो यह भी तो संदेश जा रहा है कि सत्ता की खातिर आप जमीर व जनभावना को भी ताक पर रख सकते हैं। केवल इतना ही क्यों, जब आपने भाजपा का साथ छोड़ कर लालू का हाथ पकड़ा था, तब भी चारा घोटाले में उन्हें सजा सुनाई जा चुकी थी, मगर चूंकि आपको जीत का जातीय समीकरण समझ आ गया था, इस कारण उस वक्त भ्रष्टाचार के साथ समझौता करने में जरा भी देर नहीं की। यानि की आपका मकसद केवल सत्ता हासिल करना है, जब जो अनुकूल लगे, उसके साथ। न आपको सांप्रदायिकता से परहेज है और न ही भ्रष्टाचार से।
और सबसे बड़ा सवाल ये कि जिस जनता का वोट आपने सांप्रदायिकता के खिलाफ बोल कर हासिल किया, उसके प्रति भी आपकी कोई जिम्मेदारी बनती है या नहीं। इन सबसे अफसोसनाक पहलु ये है कि जो नरेन्द्र मोदी लोकतंत्र का भारी समर्थन पा चुके हैं, वे लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनस्र्थापना करने की बजाय लोकतांत्रिक अनैतिकता को खुले आम बढ़ावा दे रहे हैं।
यह ठीक है कि तेजस्वी यादव पर कानूनी शिकंजा कसने के बाद उनके पास लालू यादव के साथ रहना मुश्किल हो रहा था, ऐसे में इस्तीफा  दे कर उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक अच्छा संदेश दिया, मगर उनकी अंतरआत्मा की आवाज व नैतिकता तभी स्थापित हो सकती थी, जबकि  वे विपक्ष में बैठने को राजी हो जाते। यदि आपने सत्ता और केवल सत्ता को ही ख्याल में रखा है, तो भ्रष्टाचार और सिद्धांत परिवर्तन में क्या अंतर है? एक आर्थिक भ्रष्टाचार है तो दूसरा नैतिक भ्रष्टाचार। यदि आप अपना जमीर बेच रहे हैं तो आप भी भ्रष्टाचारी हैं।
हां, इतना जरूर है कि उन्होंने अपने आपको एक चतुर राजनीतिज्ञ साबित कर दिया है। वो ऐसे कि यदि अचानक इस्तीफा दे कर सत्ता के गणित को नहीं बदलते तो खुद उनकी ही पार्टी में सेंध पडऩे वाली थी। तेजस्वी यादव के समर्थक जेडीयू विधायक उनके खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे। जेडीयू में ऐसे विधायकों की संख्या करीब डेढ़ दर्जन बतायी जा रही है। इनमें से ज्यादातर यादव और मुस्लिम विधायक हैं। इसके अतिरिक्त उनके खुद के विधायक भी तेजस्वी के साथ जाने को तैयार थे। यानि कि तेजस्वी को हटाने की हिम्मत तो उनकी थी ही नहीं। जैसे ही वे उन्हें हटाते तेजस्वी सहानुभूति का फायदा उठाते और सारा गणित उलटा पड़ जाता।
खैर, अब जबकि नीतीश की कथित सुशासन बाबू की छवि और लालू के जातीय गणित की संयुक्त ढ़ाल तोड़ कर भाजपा ने बिहार में सेंध लगा दी है, वहां नई कुश्ती शुरू होगी। फिलहाल भले ही नीतीश ने कुर्सी बचा ली हो, मगर अगले चुनाव में उनको अपना खुद का जनाधार कायम रखना मुश्किल होगा। और अगर भाजपा कोई बहुत बड़ा ख्वाब देख रही है तो फिलहाल तो ये हवाई किला ही होगा, क्योंकि उसके पास मोदी लहर के अलावा कोई और बड़ा वजूद नहीं है, जो कि अगले चुनाव तक कितनी बाकी रहती है, कुछ नहीं कहा जा सकता।
-तेजवानी गिरधर
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बुधवार, जुलाई 19, 2017

पार्टी में बगावत के सुर उठे, तब जा कर झुकी सरकार

कुख्यात आनंदपाल के एनकाउंटर मामले में एक ओर जहां भाजपा का राजपूत वोट बैंक खिसकने का खतरा उत्पन्न हो गया था, वहीं पार्टी में भी बगावत के हालात पैदा हो गए थे, तब जा कर सरकार को मामले की सीबीआई जांच के लिए घुटने टेकने पड़े।
असल में राजपूत आंदोलन जिस मुकाम पर आ कर खड़ा हो गया था, वहां पार्टी के राजपूत विधायकों व मंत्रियों की स्थिति अजीबोगरीब हो गई थी। जिस जाति के नाम पर वे राजनीति कर सत्ता का सुख भोग रहे हैं, अगर वही जनाधार ही खिसकने की नौबत आ गई तो उनके लिए पार्टी में बने रहना कठिन हो गया। वे हालात पर गहरी नजर रखे हुए थे। कैसी भी स्थिति आ सकती थी। इसी बीच वरिष्ठ भाजपा नेता व विधायक नरपत सिंह राजवी मुखर हो गए। ज्ञातव्य है कि वे पूर्व उपराष्ट्रपति व पूर्व मुख्यमंत्री स्व. भैरोंसिंह शेखावत के जंवाई हैं और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से उनके राजनीतिक रिश्ते किसी से छिपे हुए नहीं हैं। उन्होंने प्रदेश नेतृत्व को दरकिनार करके सीधे राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को पत्र लिख कर आनंदपाल मामले में राजपूतों पर पुलिस द्वारा की जा रही मनमानीपूर्ण कार्रवाई में दखल देने की मांग कर दी। उन्होंने कहा कि राजस्थान में राजपूत समाज के साथ पुलिस द्वारा अत्यंत निंदनीय बर्ताव किया जा रहा है। राजपूत समाज में असमंजस और आक्रोश की स्थिति उत्पन्न हो गई है। यह समाज अब तक के सभी चुनावों में 90 प्रतिशत तक पार्टी के साथ खड़ा रहा है, लेकिन दुख की बात है कि उसी भाजपा की सरकार में यही राजपूत समाज अपने आपको ठगा सा महसूस कर रहा है। इस पत्र के मायने साफ समझे जा सकते हैं। अगर सरकार सीबीआई जांच के लिए राजी नहीं होती तो अन्य विधायक भी मुखरित हो सकते थे।
शायद ही ऐसी भद पिटी किसी गृहमंत्री की
आनंदपाल मामले में गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया की जितनी भद पिटी, उतनी शायद ही किसी की पिटी हो। पहले जब आनंदपाल राजनीतिक संरक्षण की वजह से पकड़ से बाहर था तो उनसे जवाब देते नहीं बनता था और एनकाउंटर के बाद पुलिस कार्यवाही को सही बताते हुए सीबीआई जांच की मांग किसी भी सूरत में नहीं मानने पर अड़े तो मुख्यमंत्री के कहने पर उसी बैठक में सरकार की ओर से बैठना पड़ा, जिसमें सीबीआई जांच  का समझौता करना पड़ा। इससे बड़ी कोई विडंबना हो नहीं सकती। होना तो यह चाहिए कि इतनी किरकिरी के बाद उन्हें पद त्याग देना चाहिए। उनकी जिद के कारण ही आंदोलन इतना लंबा खिंचा, जिसमें हिंसा और जन-धन की हानि हुई। प्रदेश के कुछ हिस्सों में तो अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई। एनकाउंटर को सही ठहराने के लिए पुलिस के तीन आला अधिकारियों को प्रेस वार्ता करनी पड़ी। खुद भी यही बोले कि अपनी पुलिस का मनोबल नहीं  गिरने दे सकता। चाहो हाईकोर्ट से जांच के आदेश करवा दो। और फिर यकायक यू टर्न ले लिया। सवाल ये उठता है कि अगर मांग माननी ही थी तो क्यों आनंदपाल के शव की दुर्गति करवाई? क्यों प्रदेश को हिंसक आंदोलन के मुंह में धकेला?
क्या पुलिस ने खो दिया है विश्वास?
क्या अब समय आ गया है कि पुलिसकर्मियों को अपने हथियार मालखाने में जमा करा देने चाहिए, क्योंकि अब पुलिस को दिए गए हथियारों के इस्तेमाल पर जनता को भरोसा नहीं रहा है। देशभर के न्यायालय, राजनेता, सामाजिक संगठना व मीडिया अब पुलिस के हथियारों के प्रयोग पर इतना गहरा संदेह करने लग गए हैं कि पुलिसकर्मी चाहे जितनी गोलियां खा कर घायल हो जाये, तब भी पुलिस के कामकाज पर भरोसा नहीं है। बहुत सोचनीय है कि सोसायटी पुलिस की बजाय खूंखार अपराधी के साथ खड़ी हो जाती है। वस्तुत: कुख्यात अपराधियों के साथ हुए तथाकथित एनकाउंटर की घटनाओं में सुप्रीम कोर्ट व सीबीआई की दखलंदाजी के बाद एनकाउंटर की थ्योरी गलत साबित होने लगी है व कई पुलिसकर्मी जेलों में बंद हुए हैं। क्या ऐसी स्थिति में पुलिस को जनता का विश्वास फिर से हासिल करने के बाद ही हथियारों का इस्तेमाल करना चाहिए? एक तरह से पुलिस की सच्चाई व अस्मिता पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। इस पर यदि समय रहते गंभीर चिंतन कर रास्ता नहीं निकाला गया तो समाज को बहुत बुरे अंजाम देखने होंगे।
तेजवानी गिरधर
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