तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

रविवार, नवंबर 27, 2016

राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के लिए बच्चों का इस्तेमाल

राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप तो होता ही रहता है। मतभिन्नता और उसकी अभिव्यक्ति लोकतंत्र की पहचान भी है। हर किसी को अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है। पहले अपना पक्ष रखने के लिए पर्याप्त मंच नहीं मिलता था, लेकिन अब सोशल मीडिया इतना व्यापक हो गया है कि बड़ी आसानी से बाकायदा वीडियो बना कर अपनी बात कहने लगे हैं लोग। इतना ही नहीं, बात को और अधिक प्रभावोत्पादक बनाने केलिए इसके लिए बच्चों का भी इस्तेमाल किया जाने लगा है। ऐसा करके हमारी भड़ास निकालने की क्षुधा तो शांत होती ही है, मगर ऐसा करके हम अपनी भावी पीढ़ी को क्या संस्कार दे रहे हैं, ये सोचने का विषय है। कहते हैं न कि पूत का पग पालने में ही दिख जाते हैं, कुछ वैसा ही जयश्री राम वाली सेना का भावी रूप कैसा होगा, इसकी हल्की झलक इस वीडियो में:-
https://youtu.be/ZNAIQZvN38Q

ये पढ़ाया और सिखाया जा रहा है स्कूल में?

नोटबंदी के बाद सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप की बाढ़ आई हुई है। कई तरह के वीडियो शेयर किए जा रहे हैं। विपक्षी जहां नोटबंदी से हुई परेशानी के वीडियो डाल रहे हैं तो मोदी समर्थक नोटबंदी को जायज ठहराने वाले वीडियो जारी कर रहे हैं। इस भीड़ में एक वीडियो ऐसा भी नजर आया, जहां नोटबंदी के पक्ष में बने एक गाने पर एक सरकारी स्कूल के बच्चे झूम कर नाच रहे हैं। साफ नजर आ रहा है कि यह सुनियोजित है, क्योंकि मौके पर जिम्मेदार शिक्षक भी मौजूद हैं। सवाल ये उठता है कि क्या हमारे सरकारी स्कूल अब इस काम में आने लगे हैं?
ये पढ़ाया और सिखाया जा रहा है स्कूल में?
नोटबंदी के बाद सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप की बाढ़ आई हुई है। कई तरह के वीडियो शेयर किए जा रहे हैं। विपक्षी जहां नोटबंदी से हुई परेशानी के वीडियो डाल रहे हैं तो मोदी समर्थक नोटबंदी को जायज ठहराने वाले वीडियो जारी कर रहे हैं। इस भीड़ में एक वीडियो ऐसा भी नजर आया, जहां नोटबंदी के पक्ष में बने एक गाने पर एक सरकारी स्कूल के बच्चे झूम कर नाच रहे हैं। साफ नजर आ रहा है कि यह सुनियोजित है, क्योंकि मौके पर जिम्मेदार शिक्षक भी मौजूद हैं। सवाल ये उठता है कि क्या हमारे सरकारी स्कूल अब इस काम में आने लगे हैं?
वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक कीजिए:-
https://youtu.be/rs3cirGqHek

शुक्रवार, नवंबर 25, 2016

मोदी के नाम पर कहीं ये अराजकता के संकेत तो नहीं

नोटबंदी की वजह से देश में फैली आर्थिक अराजकता के विरोध में आगामी 28 नवंबर को विपक्ष की ओर से आहूत भारत बंद के दौरान जगह-जगह मोदी समर्थकों व विरोधियों के बीच भिड़ंत होने का अंदेशा नजर आ रहा है। कम से कम सोशल मीडिया पर जिस प्रकार की पोस्ट धड़ल्ले से डाली जा रही हैं, उससे तो यही लगता है कि कहीं ये आभासी दुनिया हकीकत के धरातल पर न उतर आए। दिलचस्प बात ये है कि बंद के समर्थन से संबंधित जितनी पोस्ट हैं, उससे कहीं अधिक बंद के विरोध में हैं। आम तौर पर बंद के समर्थन में न होने की सामान्य पोस्ट हैं, मगर कई जगह बाकायदा चेतावनी युक्त पोस्ट डाली गई हैं, जिसमें कानून हाथ में लेने की अपील की गई है। इस प्रकार की पोस्ट को लेकर सोशल मीडिया पर भी लेखन युद्ध छिड़ा हुआ है, जिसमें एक दूसरे को चैलेंज तक दिया जा रहा है।
बानगी के बतौर एक पोस्ट देखिए:-
राष्ट्र हित में जारी सूचना :-
सभी सच्चे भारतीयों से निवेदन है कि वो सभी भारतीय जो देश का भला चाहते हैं, वे 28 नवम्बर को अपने घर व अपनी दुकान के मुख्य दरवाजे पर एक अच्छा सा ल_ तैयार रखें। भारत बन्द के दौरान जो भी आपकी दुकान बन्द करवाने के लिए आये, उसकी अच्छे से धुलाई करें। देश हित में ऐसे मौके बार-बार नहीं आते।
सवाल ये उठता है कि कानून हाथ में लेना कैसा राष्ट्र हित है। हो सकता है, ऐसे अतिवादी लोग गिनती में ज्यादा न हों, मगर इन पर अंकुश लगना ही चाहिए।
राजनीतिक मतभिन्नता किस प्रकार निजी वितृष्णा का रूप ले सकती है, इसका उदाहरण ये पोस्ट है-
जो दुकान 28 नवम्बर को भारत बंद में बंद होगी, उस दुकान से मैं आजीवन कुछ नहीं खरीदूंगा। ये मेरी अखंड प्रतिज्ञा है।
एक पोस्ट ऐसी भी है, जिसमें नोटबंदी की वजह से हो रही परेशानी की स्वीकारोक्ति तो है, मगर साथ ही बंद का सफल न होने देने का आग्रह किया गया है। देखिए:-
तमाम मतभेदों और नोट चेंज के अभियान की जो भी कमियां या खामियां हैं, उनको भुला कर हम लोगों को विपक्षी दलों के 28 तारीख के भारत बंद को सफल नहीं होने देना चाहिए। यदि आज ये संगठन 28 तारीख के बंद को सफल कर लेते हैं, तो आप और हम सभी को इससे भी ज्यादा बुरे दिनों को देखने के लिए तैयार रहना होगा, क्योंकि जो पार्टिया बंद आहूत कर रही हैं, वे और उनके समर्थक वर्ग से सभी परिचित हैं। इसलिए 28 को 10 बजे खुलने वाला बाजार 9 बजे ही खुलना चाहिए, और जिन स्थानों पर सोमवार की छुट्टी रहती है, वहां स्थानीय प्रशासन से विशेष अनुमति ले कर बाजार खोलने का प्रयास करना चाहिये। देश प्रथम है हमारे लिए।
कदाचित देश के इतिहास में ऐसा व्यापक अभियान पहली बार अंजाम दिया जा रहा है, वरना अब तक तो यही देखा गया है कि जब भी कोई विरोधी दल किसी मुद्दे पर बंद आहूत करता है तो सत्तापक्ष शांत रहता है। स्थानीय स्तर पर छिटपुट टकराव जरूर होता है, मगर आम तौर पर शांति ही रहती है। अगर अशांति होती भी है तो प्रदर्शनकारियों व पुलिस के बीच टकराव की वजह से।
ऐसा प्रतीत होता है कि नोटबंदी का यह मुद्दा पार्टीगत से हट कर व्यक्ति केंद्रित होने से हुआ है, जहां विरोध व्यक्ति का है तो समर्थन के केन्द्र में भी व्यक्ति ही है। एक दूसरी वजह ये है कि एक ओर जहां नोटबंदी के तरीके का विरोध हो रहा है तो दूसरी ओर तकलीफ पा कर भी इस कदम का समर्थन करने वाले खम ठोक कर खड़े हैं। एक ऐप के जरिए सर्वे करवा कर तो बाकायदा यह साबित करने की कोशिश की गई है कि देश की अधिसंख्य जनता नोटबंदी के समर्थन में है, हालांकि जितने छोटे पैमाने पर यह हुआ है, इसको लेकर विपक्ष का कहना है कि चंद लाख लोगों की राय को सवा करोड़ लोगों का सर्वे कैसे माना जा सकता है। वैसे यह भी एक अजीब बात है कि कदम पहले उठा लिया गया और जनमतसंग्रह बाद में उसे सही बताने के लिए किया जा रहा है।
बहरहाल, यह स्पष्ट है कि मोदीवादी और भाजपाई कदम को सही ठहराने के लिए विरोध में हो रहे बंद को विफल करना चाहते हैं। राजनीतिक दाव पेच तक तो इसमें कोई आपत्ति नहीं, मगर यदि इसको लेकर हो रही ल_बाजी की अपील आभासी दुनिया से निकल कर कार्य रूप में परिणित हो गई तो यह ठीक नहीं होगा। नोटबंदी सही है या गलत, ये विवाद का विषय हो सकता है, मगर यह निर्विवाद होना चाहिए कि इसको लेकर यदि लड़ाई-झगड़ा होता है तो वह देशहित में कत्तई नहीं। भगवान करे, सोशल मीडिया पर लाठियां भांजने वाले देश हित में वहीं बने रहें।
-तेजवानी गिरधर
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मंगलवार, नवंबर 22, 2016

मोदीवादी इतने आशंकित क्यों?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से 8 नवंबर की रात यकायक पांच सौ व एक हजार का नोट बंद करने की घोषणा के बाद बाजार में जो अफरातफरी मची, बैंकों व एटीएम मशीनों पर जो लंबी लंबी कतारें लगीं, और जिस प्रकार आम लोगों का गुस्सा फूट रहा है, उसे देखते हुए लगता है कि मोदीवादी आशंकित हैं कि जिस कदम से मोदी के और अधिक लोकप्रिय होने की उम्मीद थी, उसके विपरीत कहीं आम जनता मोदी विरोधी तो नहीं हो जाएगी? खुद मोदी के बाद के भाषणों से भी यही परिलक्षित हो रहा है कि वे जल्दबाजी में उठाए गए इस कदम से हुई परेशानी को देखते हुए मरहम लगाने की कोशिश कर रहे हैं। कष्ट पा रही जनता को मस्का लगाने के लिए महान बता रहे हैं। काम के अतिरिक्त बोझ के तले दबे बैंक कर्मियों की तारीफ कर रहे हैं। जब देखा कि स्थिति बेहद विस्फोटक हो गई है तो उन्हें पचास दिन की मोहतल मांगनी पड़ गई। और उसकी पराकाष्ठा ये है कि एक प्रधानमंत्री को यह कहना पड़ गया कि अगर पचास दिन में हालात न सुधरें तो उन्हें सार्वजजिनक रूप से चाहे जो सजा दी जाए। सवाल उठता है कि यकायक फैसला लेते वक्त इन पचास दिनों का ख्याल क्यों नहीं रहा? इतना ही नहीं, इस मुद्दे पर उनका भावुक हो जाना भी यह संदेह पैदा कर रहा है कि भले ही वे अपने आप को बहादुर बता रहे हों, मगर कहीं न कहीं खुद को कमजोर महसूस कर रहे हैं। संदेह ये भी है कि कहीं भाजपा के अंदर ही एक प्रेशर ग्रुप तैयार नहीं हो गया है जो नोटबंदी के तरीके की आलोचना कर रहा है। लाडपुरा के भाजपा विधायक भवानी सिंह राजावत के वायरल हुए वीडियो, जिसका कि उन्होंने खंडन किया है, से तो यह साफ नजर आ रहा है कि खुद मोदी की पार्टी के लोग ही कसमसा रहे हैं, मगर पार्टी अनुशासन के कारण चुप हैं या फिर मोदी की तारीफ करने को मजबूर हैं। एक बात और ख्याल में आती है, वो यह कि चाहे गोपनीयता के चलते या फिर एकाधिकारवादी वृत्ति के कारण नोटबंदी के निर्णय और उसके बाद दिन प्रति दिन हो रहे सुधारात्मक कदमों के बीच वित्त मंत्री अरुण जेटली बेहद कमजोर नजर आ रहे हैं।
बेशक, विरोधी दलों का विरोध लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है, मगर जिस प्रकार नकदी की कमी से त्रस्त लोग गुस्सा रहे हैं, गालियां दे रहे हैं, वह मोदीवादियों के लिए चिंता का विषय है। सोशल मीडिया पर एक ओर जहां मोदी के इस कदम से उत्पन्न समस्याओं से जुड़े संदेश व वीडियो चल रहे हैं, कदाचित वे विरोधी दलों की सुनियोजित रणनीति का हिस्सा भी हों, ठीक उसी तरह मोदीवादियों ने भी मोर्चा संभाल लिया है। उनकी पोस्टों के जरिए यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि मोदी ने देश हित में एक महान काम किया है। उसकी सराहना की जानी चाहिए। देशवासियों को संयम बरतना चाहिए। यदि थोड़ी तकलीफ हो भी रही है तो देश की खातिर उसे सहन करना चाहिए और मोदी के हाथ मजबूत करने चाहिए। यानि कि मोदी के पक्ष की ओर से डेमेज कंट्रोल की पूरी कोशिश की जा रही है। उसमें भी तुर्रा ये कि इस कदम से को आम आदमी का भरपूर समर्थन मिलने का दावा किया जा रहा है। न केवल खुद मोदी, बल्कि उनका हर समर्थक यही दावा करता दिखाई दे रहा है कि जनता बेहद खुश है।
सवाल उठता है कि यदि यह कदम सराहनीय है, तो फिर क्यों इस कदम की तारीफ पर इतना जोर दिया जा रहा है। हकीकत ये है कि आम आदमी परेशान है। भले ही उस तक यह संदेश देने में मोदी सफल रहे हों कि यह कदम देशहित में है, मगर धरातल पर हो रही परेशानी को वह सहन नहीं कर पा रहा। यह स्वाभाविक भी है। देशहित कब होगा, कब इसके परिणाम आएंगे और कितना लाभ होगा, ये तो भविष्य के गर्त में छिपा है, या फिर अर्थशास्त्री बेहतर समझ सकते हैं, मगर मौजूदा स्थिति ये है कि आम आदमी त्राहि त्राहि कर उठा है।
उसी का परिणाम है कि अब मोदी वादियों की ओर से या तो मरहम लगाने की कोशिश की जा रही है या फिर कई तरीके से इसे उचित बताने  की कोशिश की जा रही है। अब यह स्पष्ट हो चुका है कि बैंकों के घंटों लाइनों में लगने वालों की परेशानी का मोदी और उनके सलाहकारों को तनिक भी भान नहीं था और न ही उन्होंने इसके लिए कोई उपाय किए। सारे उपाय बाद में शनै: शनै: किए जा रहे हैं। सरकार के स्तर पर लापरवाही बरते जाने का ही परिणाम है कि सत्तारूढ़ भाजपा संगठन को बैंकों के बाहर जनसेवा के कैंप लगाने पड़ रहे हैं।
लब्बोलुआब, कैसी विडंबना है कि जो कदम वाकई सही था, अकेले इस वजह से कि ठीक से लागू नहीं किया गया, आलोचना के चरम पर जा कर भद्दी गालियों का शिकार हो गया है। अफसोस कि अब उसी सही कदम को सही ठहराने में पूरी ताकत झोंकनी पड़ रही है।
बतौर बानगी कुछ वीडियोज की लिंक यहां दी जा रही है:-

https://youtu.be/HAM1fBi0PsI

https://youtu.be/zNdr9GedrNE

https://youtu.be/JTQLlrPIs4g

https://youtu.be/nCPcm8Ks5M4

https://youtu.be/uGJO_LK1vNk

https://youtu.be/gw3OWiYC15o

-तेजवानी गिरधर
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शुक्रवार, नवंबर 18, 2016

क्या मोदी अकेले पड़ रहे हैं?

क्या नोटबंदी के मामले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अकेले पडऩे वाले हैं? यह सवाल चौंकाने वाला है। निहायत काल्पनिक और हास्यास्पद भी। इसे बेतुका व तुक्का भी कहा जा सकता है। सोशल मीडिया पर गंदी गालियों  और बेशर्म दलीलों के बीच जब मैने भी इससे संबंधित पोस्ट पढ़ी तो चौंक उठा। जहां तक मेरी जानकारी है, इस आशय का विचार पहली बार नजर आया है। मगर विचार तो विचार है। चाहे किसी एक के मन में आया हो। जरूर उसका भी कोई दर्द होगा। उसकी भी कोई सोच होगी। यह विचार शेयर करने वाले शख्स का नाम लेना व्यर्थ है, मगर इतना जरूर तय है कि वे हैं मोदी के परम भक्त। फेसबुक पर उसकी अब तक की सभी पोस्ट नोटबंदी के पक्ष में और सवाल उठाने वालों पर तंज कसने वाली ही नजर आई हैं। कॉपी-पेस्ट के जमाने में हो सकता है कि ये उन्होंने भी कहीं से चुरा कर पोस्ट की हो, मगर है दिलचस्प।
आइये, पहले उनकी पोस्ट पढ़ लें, फिर उस पर थोड़ी चर्चा:-
कोई मुगालते में मत रहिये... मोदी ने संघ और बीजेपी से भी पंगा ले लिया है। शीर्ष पर ये आदमी बहुत अकेला है। कल उनके भाषण में ये बात बहुत उभर कर सामने आई है। ये शख्स बहुत जिद्दी भी है। भले ये बर्बाद हो जायेगा, लेकिन अब यहां से ये लौटेगा नहीं। अब मोदी आर-पार की लड़ाई में है। अब इनको सिर्फ देशवासियों का ही सहारा है। व्यवस्था के खिलाफ एक लड़ाई राजीव गांधी ने भी लड़ी थी, लेकिन वो अभिमन्यु साबित हुये। मारे गये। पहले उनकी ईमानदार छवि को मारा गया, फिर उनके शरीर को।
प्रधानमंत्री तो देश को लगभग सभी अच्छे ही मिले हैं। लेकिन जहां तक विजनरी लीडर का सवाल है, मोदी नेहरू और राजीव गांधी को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। जमीनी नेता होने की वजह से इनमें एक खास किस्म का साहस भी है, जो कभी-कभी दुस्साहस की सीमा को भी छू आता है।
अगर मोदी इन 50 दिनों में फेल होते हैं तो ये खुद तो खत्म हो ही जायेंगे लेकिन देश भी मुसीबत में फंस जायेगा। निजी स्वार्थ में ही सही, लेकिन अगले 50 दिन हमें इस आदमी का साथ देना ही पड़ेगा। अब देश दाव पर है।
आप भी साथ दें, क्योंकि बात अब हमारे वर्तमान की नहीं है, बल्कि हमारे बच्चों के भविष्य की है और हमारे जमीर की है कि क्या हम नये बनते हुये भारत के निर्माण में अपना योगदान देना चाहते हैं या नहीं।
है न बिलकुल अजीब पोस्ट। ऐसा प्रतीत होता है कि लाइनों में खड़े लोगों की गालियों और सोशल मीडिया पर चल रही फोकटी जंग के बीच उन्हें लगा हो कि मामला वाकई गंभीर है। कदाचित भाजपा विधायक भवानी सिंह राजावत के नोटबंदी के प्रतिकूल वायरल हुए वीडियो, जिसका कि राजावत खंडन कर चुके हैं, को सुन कर उन्हें लगा हो कि अब तो भाजपाई भी दबे स्वर में आलोचना करने लगे। संभव है ऐसे और भी हों, जो पार्टी अनुशासन के कारण ही चुप हों। यदि ऐसा है तो फिर धीरे-धीरे मोदी अकेले पड़ते जाएंगे। उनकी सोच कुछ कुछ उचित जान पड़ती है। वो इसलिए कि मुख्य आलोचना नोटबंदी की नहीं है, बल्कि बिना मजबूत योजना के लागू करने से आम जनता को हो रही परेशानी की है। विपक्ष भी मोटे तौर पर निर्णय के खिलाफ नहीं, बल्कि जनता में मची अफरा तफरी को मुद्दा बना कर मोर्चा संभाले हुए है। भाजपाइयों का बैंकों के बाहर जनसेवा करने का भी मतलब ये है कि सरकार की नाकामी की भरपाई उन्हें करनी पड़ रही है। यानि कि वे भी कहीं न कहीं मन ही मन यह तो स्वीकार कर ही रहे होंगे कि मोदी के इस देशहितकारी कड़े कदम के साइड इफैक्ट पार्टी को नुकसान न पहुंचा दें।
खैर, हो सकता है कि लेखक को लग रहा हो कि विपक्ष के हमलों का बरबस मुकाबला कर रही भाजपा कहीं कमजोर न पड़ जाए। उन्हें लग रहा है कि पचास दिन का वादा पूरा नहीं हो पाएगा। ऐसे में मोदी को पुरजोर समर्थन करना जरूरी है।
हो सकता है कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा में भी कोई अंतर्विरोध चल रहा हो, जिसकी अब तक कोई भनक नहीं पड़ी है, मगर यदि एक सच्चे मोदी भक्त को पूर्वाभास युक्त चिंता सता रही है तो उसे तनिक गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
आगे क्या होगा, अभी से कुछ कहना व्यर्थ है, मगर अपुन को केवल एक बात समझ में आती है कि नोटबंदी का निर्णय भले ही देशहितकारी राजनीतिक कदम हो, मगर मोदी के आर्थिक मामलों के सलाहकारों ने जाने-अनजाने चूक की है। या तो उन्हें खुद ही अंदाजा नहीं था कि हालात इतने खराब हो सकते हैं या फिर अंदाजा होने के बाद भी मोदी के इच्छित फैसले पर चुपचाप सहमति दे दी। और उनकी चूक का खामियाजा आज पूरा देश भुगत रहा है।
-तेजवानी गिरधर
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मंगलवार, नवंबर 01, 2016

... तो फिर खत्म कीजिए अदालतें, पुलिस को ही दे दीजिए सजा ए मौत का अधिकार

भोपाल एनकाउंटर अगर असली है... तो पुलिस वालों को सौ-सौ सलाम...और अगर फर्जी है तब तो उनको ...लाखों सलाम..!! ये एक पोस्ट है, जो फेसबुक और वाट्स ऐप पर धड़ल्ले से चल रही है।
कदाचित तथाकथित देशभक्त ही ऐसी पोस्ट को आगे से आगे बढ़ा रहे हैं। अंदाजा लगाया जा सकता है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश में हम किस दौर से गुजर रहे हैं। क्या धर्मांध लोग इतने ताकतवर और बेखौफ हो गए हैं कि वे चाहे जो जहर देश में फैलाएं, उन पर कोई कानून लागू नहीं होता और उनका कुछ भी नहीं बिगडऩे वाला।
इस पोस्ट का सीधा सा मतलब है कि एनकाउंटर अगर फर्जी है तो लाखों सलाम इसलिए क्योंकि मरने वाले कथित रूप से सिमी के आतंकी थे। समझा जा सकता है कि किस प्रकार का मन और मानसिकता ऐसा कह रही है? मगर सवाल ये उठता है कि क्या ऐसा कह कर आप कानून को ठेंगा नहीं दिखा रहे? क्या सत्ता पा कर आप इतने निरंकुश हो गए हैं कि कुछ भी मनमानी करेंगे और गुर्राएंगे अलग? क्या धार्मिक तुष्टिकरण के लिए आप पुलिस को ही अधिकार दिए दे रहे हैं कि वो ही तय करे कि कौन आतंकी है और मृत्युदंड भी वही दे दे, तो फिर न्यायपालिका क्यों बना रखी है? काहे को वे जेल में बंद थे और उन पर मुकदमा चल रहा था? क्यों नहीं पकड़े जाते ही पुलिस ले उनको गोली मार दी? बेशक हम लोकतांत्रिक देश हैं और अभिव्यक्ति की हमें पूरी आजादी है, मगर क्या ऐसी विचारधारा को पूरे तंत्र को तहस नहस करने की छूट दे दी जानी चाहिए?
हर बार की तरह यह मुद्दा भी राजनीति की भेंट चढ़ गया है। जिसके मूल में कहीं न कहीं हिंदू-मुस्लिम मौजूद है। अफसोसनाक बात ये है कि जिस पत्रकार जमात से निष्पक्षता की उम्मीद की जानी चाहिए, उसी के कुछ लोग एनकाउंटर को फर्जी मानने के बावजूद ये लिखने-कहने से नहीं चूक रहे कि मारे जाने वाले सिमी के ही तो आतंकी थे। उनको एनकाउंटर में मार डाला तो उनके प्रति सहानुभूति कैसी? यानि कि आप चुप रहिये, सरकार को निरंकुश कर दीजिए और अगर किसी गलत कृत्य पर सवाल खड़ा करेंगे तो आप को भी सिमी के साथ खड़ा  कर दिया जाएगा।
इसी सिलसिले में एक अतिवादी पंक्ति देखिए-आतंक को कुचलने के लिए अब उनकी मौत पर सवाल उठना बंद होने चाहिए। भले ही मौत कैसे भी, कहीं भी, कभी भी हो। भई वाह।
बेशक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की इस बात में कुछ तथ्य जान पड़ता है कि देश की राजनीति इतनी घटिया हो गई है कि देश के लिए जान गंवाने वालों की चिंता नहीं होती, बल्कि देश को नुकसान पहुंचाने वालों की हिमायत की जाती है। बिलकुल सही है कि आज उन कथित आतंकियों के हाथों मारे गए पुलिस कर्मी की चर्चा नहीं हो रही, बल्कि कथित एनकाउंटर में मारे गए कथित आतंकियों पर बहस हो रही है, मगर इसका अर्थ कहीं ये तो नहीं कि ऐसा कहते हुए हम न्यायपालिका को दरकिनार कर खुद ही कथित आतंकियों को मार डालने की पैरवी कर रहे हैं?
किसी ने लिखा है कि दिग्विजय सिंह, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, अरविंद केजरीवाल, वृंदा करात, ममता बनर्जी, असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं को ये समझना चाहिए कि कट्टरवादियों की हिमायत करेंगे तो देश की एकता व अखंडता खतरे में पड़ जाएगी। अब इस देश में सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के सूफीवाद से ही अमन चैन कायम हो सकता है। कदाचित उन्हें यह ख्याल नहीं कि अतिवादी तो ख्वाजा साहब को भी नफरत की नजर से देखते हैं, क्योंकि आखिरकार सूफीवाद इस्लाम की ही एक शाखा है। बहरहाल, यानि कि ये जनाब भी कथित आतंकियों को मार डालने का अधिकार सीधे पुलिस को देना चाहते हैं। और अगर आप फर्जी एनकाउंटर पर सवाल उठाएंगे तो आपको देशद्रोही ठहरा दिए जाएंगे।

एक पोस्ट और देखिए:-
गब्बर - कितने आदमी थे?
सांभा - सरदार पूरे 8 थे और सभी अल्लाह को प्यारे हो गये।
गब्बर - हा हा हा, बहुत नाइंसाफी है, एक भी जिन्दा नहीं छोड़ा रोने के लिये।
सांभा - नहीं सरदार...रोने के लिये तो आम आदमी पार्टी...कांग्रेस का पूरा झुंड है..।
क्या इस पोस्ट में विशुद्ध राजनीति की बू नहीं आ रही? क्या यह एक मानसिकता विशेष वाली पार्टी की भावना को उजागर नहीं कर रही? यानि कि फर्जी एनकाउंटर पर सवाल मत उठाओ, उठाओगे तो इसी प्रकार के तंज कसे जाएंगे।

एक और बानगी लीजिए:-
मध्य प्रदेश एटीएस ने सिर्फ 8 घंटे के अंदर आठों को मार गिराया गया।
एटीएस को दस में से दस नंबर।
आरोप है कि फरारी और एनकाउंटर की पूरी कहानी ही फर्जी है। अगर सचमुच ऐसा हुआ है और इस तरह टपकाया है तो शिवराज सरकार, एपी पुलिस और एमपी की एटीएस को 100 में से 200 नंबर।
देश की जेलों में बंद सभी आतंकियों को ऐसा ईच टपकाना मांगता।

जिस तरह के लोग ये पोस्ट कर रहे हैं, क्या वे देश की न्यायपालिका के वजूद को ही समाप्त कर सारे अधिकार सरकार और पुलिस को देने को नहीं उकसा रहे? अगर ऐसी ही सोच है तो कानून और संविधान को ताक पर रख दीजिए और पुलिस को कथित आतंकियों को सीधे मृत्युदंड देने का कानूनन अधिकार दे दीजिए। कम से कम तब फिर इस प्रकार के फर्जी एनकाउंटर पर कोई सवाल तो नहीं उठाएगा।

इस पोस्ट का आखिरी हिस्सा देखिए:-
कांग्रेस देश की नब्ज पकडऩे में चूक रही है। उसे समझना चाहिए कि आज देश में जो माहौल है, उसमें यदि यह एक असली एनकाउंटर था तो बीजेपी को 100 पैसा फायदा होगा, पर अगर वाकई ये फर्जी था और आतंकियों को जान बूझ के मार दिया गया तो ये मान लीजिए की भाजपा को 200 पैसे फायदा होगा।
यानि कि जो कुछ हो रहा है, वो केवल और केवल वोट की खातिर हो रहा है। अगर आरोप ये है कि कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण कर रही है तो आरोप लगाने वाले को भी यह सोच लेना चाहिए कि वे भी इस आरोप नहीं बच पाएंगे कि चूंकि हिंदू बहुसंख्यक है, इस कारण आप भी तो वोट की खातिर हिंदू तुष्टिकरण के लिए ऐसा कर रहे हैं।
खैर, इस मुहिम से किसको कितना फायदा होगा, ये तो पता नहीं, मगर इतना तय है कि इन दिनों जो कुछ हो रहा है, वह मात्र और मात्र हिंदू और मुसलमान के बीच नफरत की खाई को और चौड़ा कर देने वाला है। उसका अंजाम खुदा जाने।
-तेजवानी गिरधर
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गुरुवार, अक्तूबर 27, 2016

मोदी के गले की हड्डी हैं वसुंधरा

राजनीति के जानकार मानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भाजपा में एक तानाशाह के रूप में स्थापित हैं। वजह साफ है कि अकेले उनके नाम पर ही भाजपा पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज हुई है। उन्हें राज्य स्तर पर क्षत्रपों की मौजूदगी कत्तई पसंद नहीं। विशेष रूप से राजस्थान की बात करें तो यह सब जानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को मुख्यमंत्री वसुंधरा कत्तई पसंद नहीं हैं, उनका बस चले तो वे उन्हें एक झटके में हटा दें, मगर उनकी सबसे बड़ी परेशानी ये है कि उनके पास उनका विकल्प भी नहीं है। उनकी इसी उधेड़बुन के चलते राजस्थान में उहापोह के हालात हैं। वसुंधरा राजे का दूसरा कार्यकाल निस्तेज सा बीता जा रहा है। उपलब्धि शून्य। महारानी में पहले जैसी चमक भी नजर नहीं आ रही। और इसी वजह से कांग्रेस में ऊर्जा का संचार हो रहा है। हालांकि चुनाव अभी दूर हैं, मगर मौजूदा हालात को देखते हुए भाजपाइयों को भी यही लगता है कि शायद इस बार जीत के दीदार नहीं हो पाएंगे। आखिरी वक्त मोदी कोई बड़ा दाव खेल जाएं तो कुछ कह नहीं सकते।
अत्यंत विश्वसनीय सूत्रों से जानकारी मिल रही है कि वसुंधरा राजे को अपदस्त करने का ताना-बाना बुना जा रहा है, मगर ऐसा कदम उठाने का साहस भी नहीं हो रहा, क्योंकि वह आत्मघाती भी हो सकता है। यूं वसुंधरा राजे इतनी कमजोर भी नहीं कि उन्हें आसानी से हटाया जा सके। वे व्यक्ति नहीं, एक पार्टी हैं। पार्टी में ही विधायकों का एक बड़ा समूह उनका दीवाना है। वे विधायक वसुंधरा के कहने पर कुछ भी करने को तैयार हैं। कई बार ये अफवाह उठी है कि अगर उनके साथ छेडख़ानी की गई तो वे अलग पार्टी भी बना सकती हैं। अपनी ताकत का अहसास वे पहले भी भाजपा आलाकमान को करवा चुकी हैं। भारी दबाव बना कर उन्हें नेता प्रतिपक्ष पद से हटा तो दिया गया, मगर किसी और को यह पद नहीं दिया जा सका। आखिरकार न केवल उन्हें मान मनुहार कर नेता प्रतिपक्ष बनने को राजी किया गया, अपितु उनके नेतृत्व में ही चुनाव लडऩे का भी ऐलान किया गया। तब और अब में फर्क सिर्फ ये है कि तब भाजपा केन्द्र में सत्ता में नहीं थी और अभी पूरी मजबूती के साथ सत्ता पर काबिज है। तब राजनाथ सिंह जैसे संजीदा नेता के हाथ में भाजपा की कमान थी, अब तेजतर्रार नरेन्द्र मोदी के खास सिपहसालार चतुर-चालाक अमित शाह बागडोर संभाले हुए हैं। फिर भी साहस नहीं जुटा पा रहे। बीच बीच में खबरें आती हैं कि उन्हें हटा कर ओम प्रकाश माथुर या भूपेन्द्र यादव को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है, मगर हर बार खबर अफवाह ही साबित होती है। यानि कि किसी न किसी वजह से मामला टल जाता है।
असल में मोदी की वजह से ही इस बार वसुंधरा वैसा नहीं कर पा रहीं, जैसा वे करने का मानस रखती हैं, या जो वादे करके उन्होंने बहुमत हासिल किया था। कार्यकर्ता निराश हैं। सरकार के कामकाज में कहीं भी सुराज संकल्प नजर नहीं आता। शासन-प्रशासन एक ढर्रे पर चल रहा है। कहीं से लगता ही नहीं कि सरकार जनता के लिए कुछ अतिरिक्त भी करना चाहती है। खासकर तब जब कि प्रदेश में भाजपा प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता पर सवार है। जनता में भी यह संदेश साफ जा चुका है कि इस बार के कार्यकाल में गिनाने लायक कुछ नहीं। यानि कि इस बार वसुंधरा के चेहरे पर चुनाव जीतना कठिन होगा। मगर दिक्कत ये है कि उनसे बेहतर, बेहतर क्या उनके समकक्ष भी कोई चेहरा भाजपा के पास नहीं, जिसको आगे रख कर चुनाव जीता जा सके। अजीब गुत्थी है। पहले जैसी लहर भी नहीं चलने वाली नहीं है, क्योंकि मोदी का जादू शनै: शनै: ढ़लता जा रहा है। हां, इतना जरूर सही है कि भाजपा-भाजपा-भाजपा की जगह मोदी-मोदी-मोदी करने की वजह से पार्टी पूरी तरह से मोदी के नाम पर ही टिकी हुई है। उनकी चमक के आवरण में राज्य सरकार की उपलब्धि शून्यता को ढंका जा रहा है। मगर एक सच ये भी है कि जिस तरह से पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत का श्रेय मोदी को दिया गया, ठीक उसी तरह यदि इस बार भाजपा हारती है तो उसकी एक मात्र वजह मोदी ही होंगे, क्योंकि उन्होंने वसुंधरा राजे को इस लायक ही नहीं छोड़ा कि वे स्वछंद रूप से काम कर सकें।
ऐसे में कांग्रेस यदि अगली बार सत्ता पर काबिज होने की सपना देख रही है तो वह जायज ही लगता है। इस वजह से भी कि जब से सचिन पायलट को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी गई है, वे लगातार सक्रिय रह कर कांग्रेस में जान फूंक रहे हैं। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस जिस तरह से चौखाने चित हुई थी, उससे काफी उबर कर आ चुकी है। हां, ये जरूर है कि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के व्यक्तिगत समर्थक उन्हें जिंदा रखे हुए हैं, जो फूट का संकेत है। चुनाव में बुरी तरह से हार का ठीकरा उन पर ही फूटा है, मगर आज भी उनकी छवि कमजोर नहीं हुई है। स्वाभाविक रूप से लंबे समय तक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और दो बार मुख्यमंत्री रहने के दौरान उनसे निजी रूप से उपकृत हुए नेता उनके मुरीद है। मगर लगता यही है कि कांग्रेस आलाकमान नए जोश के प्रतीक सचिन को ही आगे लाना चाहता है। हां, गहलोत के सम्मान का भी ध्यान रखा जा रहा है। संभव है उन्हें उनके हिसाब की सीटें दे कर राजी कर लिया जाए। मुख्यमंत्री के रूप में सचिन को ही प्रोजेक्ट किया जाएगा। नहीं भी किया जाएगा तो बहुमत मिलने पर उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाया जाएगा और गहलोत को अंतत: केन्द्र में शिफ्ट किया जाएगा।
-तेजवानी गिरधर
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