तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

शनिवार, अप्रैल 04, 2020

बत्ती गुल : बेवकूफी या बुद्धिमत्ता

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जैसे ही 5 अप्रैल की रात को 9 बजे 9 मिनट के लिए बिजली बंद करके दीये, मोमबत्ती या मोबाइल फोन की रोशनी में दुआ करने की अपील की है, पूरा सोशल मीडिया उनके समर्थन व विरोध की पोस्टों से अट गया है। कोई इसे उनकी अत्यंत बुद्धिमत्ता की संज्ञा दे कर अंक ज्योतिष के हिसाब से जस्टीफाई कर रहा है तो कोई इसे निरी मूर्खता बता रहा है। कुछ तो मानो तैयार ही बैठे थे, कि मोदी अपील करेंगे और वे तुरंत उनके समर्थन में धड़ाधड़ पोस्ट डालना शुरू करेंगे। खिल्ली भी खूब उड़ रही है। सवाल एक साथ पूरे देश में नौ मिनट के लिए बिजली बंद करने से इलैक्ट्रिसिटी ग्रिड सिस्टम के गड़बड़ा जाने को लेकर भी उठ रहे हैं। मोदी के समर्थक कह रहे हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, जबकि विरोधियों का मानना है कि असर पडऩे की पूरा अंदेशा है। दोनों के अपने-अपने तर्क हैं।
मोदी ने नजाने क्या सोच कर यह आयोजन करने का समय तय किया, ये वे ही जाने, मगर उसकी व्याख्या करने वालों को पता लग गया कि मोदी ने अमुक दिन व समय क्यों तय किया।
किशनगढ़ के जैन ज्योतिषाचार्य राहुल जैन पाटोदी ने इसकी व्याख्या की है कि मोदी ने 5 तारीख ही क्यों चुनी?
रविवार ही क्यों चुना?
9 बजे का वक्त ही क्यों चुना?
9 मिनट का समय ही क्यों चुना?
जब पूरा लॉक डाउन ही है तो शनिवार, शुक्रवार या सोमवार कोई भी चुनते क्या फर्क पड़ता? जिनको अंक शास्त्र की थोड़ी भी जानकारी होगी, उनको पता होगा कि 5 का अंक बुध का होता है। यह बीमारी गले व फेफड़े में ही ज्यादा फैलती है। मुख, गले, फेफड़े का कारक भी बुध ही होता है। बुध राजकुमार भी है। रविवार सूर्य का होता है। सूर्य ठहरे राजा साहब। दीपक या प्रकाश भी सूर्य का ही प्रतीक है।
9 अंक होता है मंगल.. सेनापति। रात या अंधकार होता है शनि का। अब रविवार 5 अप्रैल को, जो कि पूर्णिमा के नजदीक है, मतलब चन्द्र यानी रानी भी मजबूत, सभी प्रकाश बंद करके, रात के 9 बजे, 9 मिनट तक टॉर्च, दीपक, फ्लैश लाइट आदि से प्रकाश करना है। चौघडिय़ा अमृत रहेगी, होरा भी उस वक्त सूर्य का होगा। शनि के काल में सूर्य को जगाने के प्रयास के तौर पर देखा जा सकता है। 9-9 करके सूर्य के साथ मंगल को भी जागृत करने का प्रयास है। मतलब शनि राहु रूपी अंधकार (महामारी) को उसी के शासनकाल में बुध, सूर्य, चन्द्र और मंगल मिल कर हराने का संकल्प लेंगे। जब किसी भी राज्य के राजा, रानी, राजकुमार व सेनापति सुरक्षित व सशक्त हैं, तो राज्य का कौन अनिष्ट कर सकता है।
एक और महाशय की अद्भुत वैज्ञानिक गणना देखिए:- एक मोमबत्ती 2 द्मष्ड्डद्य गर्मी देती है। एक मोबाइल फ्लैश 0.5 द्मष्ड्डद्य गर्मी, एक तिल के तेल का दिया 3 द्मष्ड्डद्य गर्मी देता है। मान लीजिए130 करोड़ में से 70 करोड़ लोगों ने भी इस आदेश का पालन किया और उसमें 35 करोड़ मोमबत्ती, 20 करोड़ फ्लैश और 15 करोड़ दिए जलाए गए तो 125 करोड़ द्मष्ड्डद्य गर्मी उत्पन्न होगी। ष्टशह्म्शठ्ठड्ड हृड्डड्डद्व ्यड्ड दरिंदा तो 10 द्मष्ड्डद्य गर्मी में ही मर जाता है। इसलिए 5 अप्रैल को सारे विषाणु मर सकते हैं। अगर हम मिल कर इस अभियान को सफल बनाएं। 5 अप्रैल को दीपावली समझ कर दिए अवश्य जलाएं।
अब आप मोदी के कदम की समाालोचना देखिए। एक ब्लॉगर, जो कि अमूमन मोदी के हर कदम की सराहना करते हैं, उन्होंने लिखा है कि 3 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने वीडियो संदेश के माध्यम से जो अपील की है, उसके मुताबिक यह बताने का पूरा प्रयास होगा कि देश नरेन्द्र मोदी के आव्हान पर एकजुट है। प्रधानमंत्री मोदी ने जो आव्हान किया है, उसका स्वागत भी हो रहा है, लेकिन सवाल उठता है कि पिछले दस दिनों से अपने घरों में कैद जनता आखिर प्रधानमंत्री से क्या सुनना चाहती थी? लोगों को उम्मीद थी कि लॉक डाउन में  राहत की कोई घोषणा होगी या फिर ऐसी जानकारी मिलेगी, जिससे मन को तसल्ली मिले, लेकिन 3 अप्रैल के प्रधानमंत्री के संदेश में ऐसा सुनने को नहीं मिला। माना कि पूरा देश कोरोना वायरस के प्रकोप की दहशत में है और सरकार हर संभव लोगों की जान बचाने का प्रयास कर रही है। दिहाड़ी मजदूर दो वक्त की रोटी के लिए दानदाताओं पर निर्भर है तो यह मध्यमवर्गीय परिवार का भी जीना मुश्किल हो गया है। सबसे ज्यादा परेशानी व्यापारी वर्ग को हो रही है। फैक्ट्री, दुकान सहित होटल, रेस्टोरेंट आदि सब बंद पड़े हैं। जिन प्रगतिशील युवाओं ने बैंक से लोन लेकर कारोबार शुरू किया था, उनकी स्थिति तो मरने जैसी है।  लोग अब प्रधानमंत्री अथवा किसी राज्य के मुख्यमंत्री से सिर्फ राहत की बात सुनना चाहते हैं। सत्ता में बैठे लोगों को परेशान लोगों की भावनाओं को समझना चाहिए।
एक अन्य लेखक ने लिखा है कि आज फिर मुझे लिखने पर विवश होना पड़ा। प्रधानमंत्री जी ने जो निर्णय लिया वह काबिले तारीफ है, लेकिन ताली बजाना, थाली बजाना, टॉर्च दिखाना, इस तरह की बेवकूफी की गुंजाइश अभी इस वक्त समाज में नहीं दिखाई देनी चाहिए। अभी समय सख्त कार्रवाई करने का है और पूरा देश और देश के लोग इस वक्त अपनी सरकारों  को बहुत उम्मीदों से देख रहे हैं।
एक विद्वान का कहना है कि दिया जलाना कोई टोटका नही है। प्रधानमंत्री जी ने अगर कहा है कि 5 तारिख को 9 बजे 9 मिनट के लिए दिया जलाना है, तो इसका एक कारण है। इस दिन आमद एकादशी है। जब मेघनाथ का वध नहीं हो पा रहा था तो इसी आमद एकादशी को भगवान राम ने घी के दीपक जला कर उर्जा पुंज का निर्माण किया था और मेघनाथ का वध किया था। इसलिए आप सभी दीपक जलाएं, टॉर्च, मोमबत्ती, मोबाइल जो भी सुविधा आपके पास है, वो जलायें और उर्जा पुंज का निर्माण करें।
जहां तक विद्युत सिस्टम पर असर पडऩे का सवाल है, भले ही ये कहा जा रहा हो कि इसका कोई असर नहीं पड़ेगा, मगर विशेषज्ञ मानते हैं कि असर तो पड़ेगा, मगर उपाय किए जाएंगे तो सुरक्षा भी की जा सकती है। जानकारी तो ये है कि जैसे ही इस मुद्दे पर सवाल उठाए गए, विद्युत व्यवस्था को मॉनीटर करने वाले विशेषज्ञों ने तुरंत वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कर समस्या का समाधान करने पर चर्चा की। अर्थात समस्या को आ बैल मुझको मार की तरह न्यौता दे दिया गया। विशेषज्ञों दावा है कि अतिरिक्त निगरानी रखेंगे और स्थिति को कंट्रोल कर लेंगे। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या प्रधानमंत्री ने अपनी आदत के मुताबिक बिना विशेषज्ञों की राय लिए बिजली बंद करने की अपील जारी कर दी, जैसा नोटबंदी व जीएसटी के दौरान किया?
इस बीच एक दिलचस्प पोस्ट भी खूब वायरल हो रही है। वो ये कि दरअसल 6 अप्रैल भाजपा के स्थापना दिवस पर लॉक डाउन की वजह से भाजपा कोई बड़ी रैली या जनसभा नहीं कर सकती। इसलिये भाजपा ने पूर्व संध्या पर कोरोना के नाम पर दिवाली मनाने का फैसला किया है। लेकिन दिवाली मनाने का यह समय अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि भारत समेत पूरा विश्व कोरोना महामारी की चपेट में है। यह समय, उत्सव मनाने का नहीं बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने का है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

गुरुवार, फ़रवरी 06, 2020

क्या विकास के मुद्दे को भुना पाएंगे अरविंद केजरीवाल?

दिल्ली का राजनीतिक पारा इन दिनों आसमान छू रहा है। देश की राजधानी होने के कारण पूरा राष्ट्रीय मीडिया पर इसी का हल्ला है। दिल्ली विधानसभा के आसन्न चुनाव को लेकर जहां मौजूदा मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने वजूद को बरकरार रखने के लिए पूरी ताकत झोंक रखी है, वहीं भाजपा उनकी जमीन खिसकाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रख रही है। खासकर सोशल मीडिया पर जबरदस्त जंग चल रही है। ऐसा लग रहा है, मानो यह विधानसभा का चुनाव न हो कर देश का आम चुनाव हो रहा है। हालांकि कांग्रेस का परंपरागत वोट पहले ही आम आदमी पार्टी की ओर खिसक चुका है, मगर कांग्रेस पहले से बेहतर प्रदर्शन करने में लगी हुई है। सीएए व एनआरसी को लेकर शाहीद बाग में चल रहा धरने का चुनाव से सीधा कोई लेना-देना नहीं है, वह केन्द्र की मोदी सरकार के खिलाफ है, मगर इसका भी असर पडऩे से इंकार नहीं किया जा सकता।
वस्तुत: केजरीवाल अपना सारा ध्यान पिछले पांच साल में कराए गए विकास कार्यों पर केन्द्रित किए हुए हैं। इस कारण विवादास्पद राष्ट्रीय मुद्दों  को छूने से बच रहे हैं। अपने कार्यकाल में शुरुआती दो-तीन साल जरूर उनके निशाने पर मोदी ही हुआ करते थे, मगर वे समझ गए कि यह तकनीक नुकसान देगी, इस कारण पिछले कुछ समय से मोदी के बारे में व्यक्तिगत टीका टिप्पणी करने से बच रहे हैं। वे जान रहे हैं कि ये मुद्दे मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं और उनका सारा किया धरा बेकार हो जाएगा। इस कारण केवल अपने विकास कार्यों को ही चर्चा में रखना चाह रहे हैं। संयोग से इन्हीं दिनों दिल्ली में शाहीन बाग जैसी ज्वाला धधक रही है। वे चाहे लाख इससे बच रहे हों, मगर मतदाता के बीच धु्रवीकरण का अंडर करंट दौड़ रहा है। इस मुद्दे की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक शख्स ने बड़ी चतुराई से आगामी आठ फरवरी को भारत-पाकिस्तान होने का ट्वीट कर दिया। गृह मंत्री अमित शाह के भाषण में आई यह बात कि आठ तारीख को वोटिंग मशीन का बटन इतनी जोर से दबाना कि उसका करंट शाहीन बाग तक पहुंचे, का अर्थ समझा जा सकता है। यह भी आसानी से समझ में आ रहा है कि भाजपा इस चुनाव मेें स्थानीय मुद्दों की बजाय राष्ट्रीय मुद्दों पर वोट लेना चाहती है। स्थानीय मुद्दे उसके पास हैं भी नहीं। स्थानीय मुद्दे चूंकि केजरीवाल के पक्ष में जाते दिखाई दे रहे हैं, भाजपा मानसिकता के पत्रकार व लेखकों को भी यही संभावना लगती है कि इस बार फिर केजरीवाल जीत सकते हैं। स्वाभाविक रूप से भाजपा इस संभावना को समाप्त करना चाहती है। वह अब भी मोदी ब्रांड और उनकी ओर से उठाए गए राष्ट्रीय कदमों के नाम पर वोट लेना चाहती है। भाजपा की दूसरी बड़ी समस्या ये है कि उसके पास केजरीवाल की टक्कर में स्थानीय विकल्प नहीं है। पिछली बार आखीर में किरण बेदी का पत्ता फेल हो जाने के बाद इस बार उसकी हिम्मत ही नहीं हुई कि किसी चेहरे को केजरीवाल के मुकाबले में खड़ा कर सके। उसकी उम्मीद नैया मोदी की चमक के सहारे ही है।
केजरीवाल को जहां वोटों के सांप्रदायिक धु्रवीकरण से आशंकित हैं, वहीं इस बार कांग्रेस के कुछ बेहतर प्रदर्शन को लेकर चिंतित हैं। कांग्रेस इस बार कितना अर्जित कर पाएगी, कुछ नहीं कहा जा सकता, मगर ये समीकरण सुस्पष्ट है कि यदि कांग्रेस पहले के मुकाबले कुछ बेहतर कर पाई तो उसका नुकसान सीधे सीधे आम आदमी पार्टी को ही होगा। भाजपा के स्थाई वोट बैंक में सेंध तो मार नहीं सकती।
चुनाव का आखिरी दौर आते आते केजरीवाल इस बात की कोशिश कर रहे हैं कि दिल्ली की जनता स्थानीय मुद्दों पर वोट डाले। उनके समर्थक आम जनता को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि इस चुनाव में काम के नाम पर वोट आम आदमी पार्टी को दें, आम चुनाव में जचे जो करना। यह प्रयास कितना सफल होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। एयर स्ट्राइक, धारा 370 व राम मंदिर के मुद्दों तक तो यही उम्मीद थी कि उनकी बजाय केजरीवाल के काम का मुद्दा ज्यादा असरकारक रहेगा, मगर जब से देशभर में सीएए व एनआरसी का मुद्दा गरमाया है, वोटों का मिजाज केजरीवाल को परेशान किए हुए है। वे अपने इस दुर्भाग्य को कोस रहे होंगे कि ऐन चुनाव के मौके पर सीएए व एनआरसी गले की फांसी बन गई है। भाजपा के लिए यह चुनाव जीतना इसलिए जरूरी है क्योंकि उसे हाल ही महाराष्ट्र व झारखंड में झटका लग चुका है। इसके बाद उसे पश्चिम बंगाल की कठिन परीक्षा से भी गुजरना है। हालांकि दिल्ली का वोटर चतुर है, मगर कुछ कहा नहीं जा सकता। देखते हैं होता है क्या?
-तेजवानी गिरधर
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tejwanig@gmail.com

बुधवार, जनवरी 22, 2020

क्या अपने ही जाल में फंस गई है भाजपा सरकार?

लोकसभा में स्पष्ट बहुमत और राज्यसभा में जुगाड़ करके भाजपा ने पहले धारा 370 को हटाने जैसा ऐतिहासिक कदम उठाया और फिर चंद दिन बाद ही सीएबी भी पारित करवा लिया। यह भाजपा की अपने एजेंडे को लागू करने की सफलता ही कही जाएगी। इस पर वह अपनी पीठ थपथपा सकती है, मगर जिस प्रकार पूरे देश में माहौल बिगड़ा है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार अपने ही जाल में फंस गई है। संसद में तो संख्या बल से कामयाबी अर्जित कर ली, मगर धरातल पर वह दाव उलटा पड़ गया। यानि कि सरकार जनता में अपने कदमों के लिए माहौल तैयार कर पाने में विफल हो गई है।
ऐसी दो बड़ी गलतियां भाजपा सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में भी की थीं। यकायक नोटबंदी तो लागू कर दी, मगर उसके बाद जमीन पर जो हालात पैदा हुए उससे पूरा देश फडफ़ड़ा गया। काला धन बाहर आना तो दूर, उलटे काला धन सफेद हो गया। बाइ प्रोडक्ट के रूप में बेरोजगारी बढ़ गई। यानि कि सरकार ने अपने फैसले से पहले न तो इन्फ्रास्टक्चर तैयार किया और न ही उसके इम्पैक्ट का अनुमान लगाया। दूसरी बड़ी गलती बिना तैयारी के जीएसटी लागू करके की। देश में भारी आर्थिक मंदी के हालात उत्पन्न हो गए। बावजूद इसके भाजपा को जब लगातार दूसरी बार चुनाव में अप्रत्याशित सफलता मिली तो उसके हौसले बढ़ गए। जिस धारा 370 को पिछले सत्तर साल में नहीं हटाया जा सका था, उसे एक झटके में ही हटा दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसके लिए खूब वाहवाही लूटी। हालांकि उसका यह कदम आगे चल कर क्या हालात उत्पन्न करेगा, अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार सरकार ने सीएबी को संसद में पारित तो करवा लिया, मगर आम जनता में इसका जिस तरह विरोध हो रहा है और बढ़ता ही जा रहा है, उससे भाजपा सकते में है। हालात तब और ज्यादा बेकाबू हो गए, जब गृहमंत्री अमित शाह ने ठोक-ठोक कर कहा कि सीएए के बाद देश में एनआरसी भी लागू की जाएगी। उनके कहने का जो अंदाज रहा, कदाचित उसने ही प्रतिक्रिया को तल्ख किया है। जब स्थिति संभले नहीं संभली तो मोदी को खुद आगे आ कर कहना पड़ा कि एनआरसी शब्द तक पर चर्चा नहीं हुई है। उन्होंने जोर दे कर तीन बार कहा कि यह झूठ है, यह झूठ है, यह झूठ है। विपक्ष राजनीतिक लाभ के लिए जनता को भ्रमित कर रहा है। गृह मंत्री शाह के लिए तो अजीब स्थिति हो गई। प्रधानमंत्री मोदी ने ही उन्हें झूठा ठहरा दिया। गृह मंत्री क्या राष्ट्रपति का अभिभाषण तक झूठा हो गया, जिसमें उन्होंने सरकार के हवाले से ही कहा था कि एनआरसी लाई जाएगी। इस मुद्दे पर सरकार की बड़ी छीछालेदर हुई है। शाह को भी कहना पड़ा कि मोदी सही कह रहे हैं। उहोंने स्पष्ट किया कि एनआरसी लाई जाएगी, मगर अभी नहीं, अभी तो उस पर चर्चा तक नहीं हुई है।
इस बीच आम जनता में इतना भ्रम फैल गया कि अब उसे दूर करने के लिए भाजपा को न केवल सरकार के स्तर पर, अपितु संगठन के स्तर पर भी बड़े पैमाने पर सफाई देनी पड़ रही है। संगठन की छोटी से छोटी इकाई भी समझाइश में जुट गई है कि सीएए नागरिकता छीनने का नहीं, बल्कि नागरिकता देने का कानून है।
सवाल ये उठता है कि आखिर किस स्तर पर चूक हुई कि विपक्ष को जनता को भ्रमित करने का मौका मिल गया। साफ दिखाई दे रहा है कि सरकार बैकफुट पर आ गई है। ऐसे में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का यह सवाल वाजिब है कि आपने की ही ऐसी लापरवाही है, वरना क्यों गांव-गांव शहर-शहर आपको सफाई देनी पड़ रही है। ताजा प्रकरण से भी यही साबित होता है कि सरकार ने जमीनी स्तर पर माहौल तैयार किए बिना ही संसद में संख्या बल के दम पर कानून लागू कर दिया। अब तो यह तक कहा जाने लगा है कि इस मामले में कहीं न कहीं विपक्ष भी संसद में विफल रहा है, वरना क्या वजह है कि जो सवाल संसद में उठने चाहिए थे, वे जनता उठा रही है?
इधर कांग्रेस व अन्य गैर भाजपा राज्य सरकारें नए नागरिकता कानून व एनआरसी का विरोध करने लगी हैं। बहस यहां तक पहुंच गई है कि नया नागरिकता कानून केन्द्र सरकार के क्षेत्राधिकार में आता है, अत: राज्य सरकारें इस कानून को लागू करने के लिए बाध्य हैं। केन्द्र सरकार चाहे तो    लागू न करने वाली राज्य सरकारों को बर्खास्त करने की सिफारिश कर सकती है। कुल मिला कर पूरा देश नागरिकता के मुद्दे पर उबल रहा है। बढ़ती बेरोजगारी, आर्थिक मंदी व महंगाई से ध्यान हट कर पूरा देख नागरिकता की बहस में उलझ गया है। हो सकता है कि इससे आगे चल कर भाजपा आम जनता को और अधिक पोलराइज कर राजनीति लाभ हासिल करने की स्थिति में आ जाए, मगर देश तो डूब रहा है।
इस मसले का दिलचस्प पहलु ये भी है कि अब भाजपा की सहयोगी पार्टियां आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत के हिंदू संबंधी बयान पर सवाल खड़ा कर रही हैं कि यदि संघ सभी भारतीयों को हिंदू मानता है तो उसने नए नागरिकता कानून में मुसलमानों को शरण नहीं देने का समर्थन क्यों किया है? यदि आप पाकिस्तान, बांग्लादेश व अफगानिस्तान से आने वाले मुसलमानों को शरण नहीं देते तो इसका अर्थ ये है कि आप भागवत के दर्शन को नहीं मानते। भागवत की हिंदुत्व पर की गई नई व्याख्या से आप सहमत नहीं हैं। 
कुल मिला कर जिस जनता ने मोदी को प्रचंड बहुमत इसलिए दिया था कि वे देश में विकास के नए कीर्तिमान स्थापित करेंगे, वह ठगी सी महसूस कर रही है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
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गुरुवार, दिसंबर 05, 2019

महाराष्ट्र ने किया नई राजनीतिक दिशा का आगाज

देवेन्द्र फडनवीस ने कर दी बहुत बड़ी चूक
गेम चेंजर के रूप में उभरे शरद पवार
-तेजवानी गिरधर-
सत्ता की खातिर हालांकि धुर विरोधी पार्टियों के एक मंच पर आने की शुरुआत पहले ही हो चुकी है, मगर महाराष्ट्र में जिस प्रकार शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस व कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए एक हो कर जो सरकार बनाई है, उससे देश में राजनीति की नई दिशा का आगाज हो गया है। भाजपा ने केन्द्र में स्पष्ट व प्रचंड बहुमत पा कर एनडीए की मजबूती पर ध्यान देना बंद किया तो अब उसके घटक दल छिटक रहे हैं, वहीं महाराष्ट्र के प्रयोग ने देश के अन्य राज्यों में भाजपा के खिलाफ विभिन्न दलों को एकजुट होने को हवा दे दी है।
बेशक धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस व हिंदूवादी शिवसेना के साथ होने पर इसे नापाक गठबंधन करार दिया जा रहा है, मगर भाजपा आलोचना का अधिकार इसलिए खो चुकी है, क्योंकि वह खुद भी इसी प्रकार जम्मू-कश्मीर में महबूबा मुफ्ती व बिहार में नीतीश कुमार के साथ मिल कर सरकार बना चुकी है। इस मसले पर टीवी डिबेट में सभी दलों के प्रवक्ताओं की बोलती बंद हो जाती है। ऐसे में वे डिबेट को डीरेल करने की कोशिश करते हैं। जब हमाम में सब नंगे हैं तो आप किस पर हंसियेगा। कांग्रेस चूंकि वर्षों तक सत्ता में रही है, इस कारण साम, दाम, दंड, भेद नीति अपनाने को लेकर वह तथाकथित पार्टी विथ द डिफ्रेंस पर गुरूर करने वाली भाजपा के निशाने पर रहती थी, मगर अब जब कि भाजपा ने भी वे ही सारी नीतियां पूरी तरह से अपना ली है, तो उसके नेताओं को आरोपों पर चुप्पी साधनी पड़ती है। कुल मिला कर देश की राजनीति में अब सिद्धांत व वैचारिक मतभिन्नता गड्ड मड्ड हो चुकी है। यह राजनीति का विद्रूप चेहरा है। अब सिर्फ सत्ता को हासिल करने के लिए मनी व मसल्स का पावर गेम खेला जाने लगा है। उसके लिए संवैधानिक मूल्यों का पूरी तरह से परित्याग कर दिया गया है।
महाराष्ट्र में जिस प्रकार प्रधानमंत्री ने बिना मंत्रीमंडल की अनुमति के अपने विशेष अधिकारों का उपयोग कर रातों रात राष्ट्रपति शासन हटवा दिया और राज्यपाल ने बिना ठीक से पुष्टि किए नए मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री को झटपट शपथ दिलवाई, उसने यह साबित कर दिया कि संवैधानिक मर्यादाओं को बड़ी आसानी से तिलांजलि दी जाने लगी है। शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस व कांग्रेस ने जब सुप्रीम कोर्ट की शरण ली तो जैसे ही उसने मामला निपटाने में तीन दिन का समय लिया, उससे वह भी निशाने पर आ गया था, मगर जब उसने विधानसभा में फ्लोर टैस्ट चौबीस घंटे में करवाने का आदेश दिया, तब जा कर उसकी साख बच पाई। उसमें एक भी एक पेच फंस गया कि राज्यपाल प्रोटेम स्पीकर बनाने में परंपरा को तोड़ेंगे और अजित पवार को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी विधायक दल का नेता मानेंगे, जो कि भाजपा के पक्ष में व्हिप जारी देंगे व उसका पालन न करने पर पार्टी के विधायकों की सदस्यता पर तलवार लटक जाएगी। हालांकि पार्टी ने पवार को हटा कर नया नेता चुन लिया, मगर उसे मान्यता न दिए जाने का संदेह था। खेल तो यही था, इस कारण आखिर तक भाजपाई किसी चमत्कार का दावा करते रहे। वो तो खुद पवार ने ही उपमुख्मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, तब मजबूरी में मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस को भी त्यागपत्र देना पड़ गया।
इस पूरे घटनाक्रम में फडनवीस से बहुत बड़ी चूक हुई। शपथ लेने की इतनी जल्दी थी कि केवल पवार की समर्थन की चि_ी पर ही भरोसा कर लिया और इसको सुनिश्चित नहीं किया कि उनके विधायक हैं कहां पर। हालत ये हो गई कि पवार को छोड़ कर सारे विधायक पार्टी अध्यक्ष शरद पवार की शरण में पहुंच गए। अजित पवार निहत्थे हो गए, साथ ही पूरे परिवार का दबाव भी था, इस कारण बेकफुट पर आ गए और फडनवीस चौखाने चित्त हो गए। सबसे ज्यादा किरकिरी उनकी हुई है। उन्होंने मोदी की लहर पर सवार भाजपा की भी भद पिटवा दी। अब पार्टी में ही उनके लिए विपरीत हालात बन सकते हैं। उन पर ये आरोप भी आ गया कि जिस सिंचााई घोटाले के नाम पर उन्होंने अजित पवार सेे जेल में चक्की पिसवाने का ऐलान कर रखा था, सत्ता की खातिर उन्हीं से हाथ मिला लिया और उपमुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवा दी।
राजनीति के इस खेल में पार्टियां ही नहीं, मीडिया भी नंगा हुआ है। पूरे घटनक्रम में वह लगातार भाजपा के प्रवक्ता की सी भूमिका निभाता रहा और जब देखा कि अब तो बाजी पलट गई तो लगा सियापा करने। अब भी उसका सारा ध्यान इस पर है कि यह गठबंधन कब और कैसे टूटेगा?
महाराष्ट्र के इस खेल में जहां राजनीति के चाणक्य कहलाने वाले अमित शाह को झटका लगा है, वहीं शरद पवार गेम चेंजर के रूप में उभर कर आए हैं। जिस किस्म का बेमेल मगर अनोखा गठबंधन उन्होंने बनाया है, उसे राजनीति को नई दिशा मिलने का संकेत माना जा रहा है। रहा सवाल शिवसेना का तो यह देखने वाली बात होगी कि वह अपने आक्रामक हिंदूवाद के कितना दूर रह पाती है। सुखद बात ये है कि उसे भी अब धर्मनिरपेक्षता के साथ समझौता करना पड़ा है। समीक्षक अब मोदी के जादू को कम होता हुआ आंक रहे हैं। हालांकि अभी इस निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। रहा सवाल मुद्दों का तो माना जा रहा है कि धारा 370 व राम मंदिर का मुद्दा भाजपा को कुछ खास लाभ देने वाले नहीं हैं। ऐसे में अब वह नागरिकता के मुद्दे पर जोर देने वाली है, जिसका असर राज्यों की राजनीति पर क्या पड़ेगा,यह आने वाला वक्त ही बताएगा।

शुक्रवार, नवंबर 01, 2019

निकाय प्रमुख के मुद्दे पर सरकार अपने स्टैंड पर कायम

निकाय प्रमुखों के चुनाव की प्रक्रिया को लेकर पिछले दिनों जिस प्रकार विवाद हुआ और जिस तरह से उसका पटाक्षेप हुआ, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ने यूटर्न लिया है, जबकि हकीकत ये है कि सरकार अब भी अपने स्टैंड पर अब भी कायम है। इसको लेकर जारी अधिसूचना अब भी अस्तित्व में है, सिर्फ स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल की ओर से स्पष्टीकरण जारी हुआ है कि निर्वाचित पार्षदों में से ही निकाय प्रमुख चुना जाएगा, लेकिन विशेष परिस्थिति में बिना चुनाव लड़ा नागरिक भी निकाय प्रमुख के चुनाव में भाग ले सकेगा।
असल में पूर्व में जारी अधिसूचना में जैसे ही यह एक नया प्रावधान रखा गया था कि पार्षद का चुनाव लड़े बिना भी कोई व्यक्ति निकाय प्रमुख का चुनाव लड़ सकेगा, उसका अर्थ ये निकाला गया कि सरकार की मंशा निकाय प्रमुख के पदों पर अनिर्वाचित व्यक्तियों को बैठाने की है और चुने हुए पार्षदों से कोई निकाय प्रमुख नहीं बन पाएगा, जबकि अधिसूचना में ऐसा कहीं नहीं कहा गया है। उसमें केवल अनिर्वाचित व्यक्ति के लिए रास्ता खोला गया है। अर्थ का अनर्थ निकला, इसका प्रमाण ये है कि मीडिया ने भी ऐसे नामों पर चर्चा शुरू कर दी कि कांग्रेस व भाजपा में कौन-कौन बिना चुनाव लड़े निकाय प्रमुख पद के दावेदार होंगे। पार्षद पद के दावेदार भी ये मान बैठे कि उनको तो मौका मिलेगा ही नहीं। इससे एक भ्रम ये भी फैला कि शहर से बाहर का व्यक्ति भी चुनाव लड़ सकेगा, जिसकी सफाई देते हुए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने साफ कह दिया कि ऐसा कैसे हो सकता था, पार्षद ही बगावत कर देते।
यह बात सही है कि इस मुद्दे पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के साथ केबिनेट मंत्री रमेश मीणा व प्रताप सिंह खाचरियावास ने विरोध जताया था कि नई व्यवस्था अलोकतांत्रिक है। कांग्रेस में मतभिन्नता के चलते भाजपा को भी हमला बोलने का मौका मिल गया और उसने आंदोलन की रूपरेखा तक तय कर ली। अंतत: धारीवाल को स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा, जिसमें स्पष्ट किया गया कि आगामी निकाय चुनाव में जनता द्वारा चुने हुए पार्षदों में से ही मेयर-सभापति-अध्यक्ष का निर्वाचन होगा। केवल विशेष परिस्थिति में जब एससी, एसटी, ओबीसी, महिला वर्ग के मेयर-सभापति की आरक्षित सीट के लिए अगर किसी पार्टी विशेष का सदस्य नहीं जीत पाया तो राजनीतिक दल की प्रदेश इकाई को यह अधिकार होगा कि वह आरक्षित वर्ग के नेता को खड़ा कर सकेगी। अर्थात निकाय प्रमुख के निर्वाचन को लेकर राज्य सरकार की ओर से 16 अक्टूबर को जारी की गई अधिसूचना में कोई बदलाव नहीं किया गया। मौलिक बदलाव सिर्फ ये है कि पूर्व में सरकार ने निकाय प्रमुख का चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से करने की घोषणा की थी, जिसे बदल कर अप्रत्यक्ष प्रणाली लागू की गई है। उसको लेकर धारीवाल का कहना है कि ऐसा इस कारण किया जा रहा है, क्योंकि भाजपा ने राष्ट्रवाद के नाम पर घृणा, हिंसा व भय का माहौल बनाया है, जबकि कांग्रेस सभी जाति व समुदाय में सद्भाव व भाईचारा बनाए रखना चाहती है।
धारीवाल ने एक तर्क और दिया है, जो कि दमदार है। उन्होंने कहा है कि सरकार ने तो उलटे अच्छा कार्य किया है, वो यह कि उसने राजनीतिक दलों को यह अधिकार दिया है कि विशेष परिस्थिति में अगर जब एससी, एसटी, ओबीसी, महिला वर्ग के मेयर-सभापति की आरक्षित सीट के लिए अगर किसी पार्टी विशेष का सदस्य नहीं जीत पाता है तो दूसरी पार्टी के पार्षदों को तोडऩे के लिए खरीद फरोख्त करने की बजाय अपनी ही पार्टी के आरक्षित वर्ग के किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ा दे और जनहित के काम बिना बाधा के कर सके।
अब जरा इस मसले की बारीकी में जाएं। यदि ये मान लिया जाए कि सरकार अनिर्वाचित को निकाय प्रमुख के रूप में थोपने की कोशिश में थी तो वह कोरी कल्पना है। वो इस प्रकार कि निकाय प्रमुख के चुनाव के दौरान यदि अनिर्वाचित व्यक्ति फार्म भरता तो निर्वाचित पार्षद ही बगावत कर देते।  वे अपनी ओर भी किसी पार्षद को चुनाव लड़वा देते, क्योंकि पार्षदों के चुनाव लडऩे पर रोक थोड़े ही थी। एक बात और गौर करने लायक है, वो यह कि निकाय प्रमुख के चुनाव में जो नया प्रावधान लाया गया, वो कोई बिलकुल नया नहीं है। ऐसा तो प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री अथवा मंत्री पद को लेकर भी है। निर्वाचित सांसद व विधायक उनका निर्वाचन कर लेते हैं और बाद में छह माह में उन्हें किसी सांसद व विधायक से सीट खाली करवा कर चुनाव जीतना होता है। जहां तक निकाय प्रमुख का सवाल है, शायद उसमें इस स्थिति को स्पष्ट नहीं किया गया है, जो कि किया जाना चाहिए।
कुल मिला कर ताजा स्थिति ये है कि पार्षद ही निकाय प्रमुख चुनेंगे, लेकिन विशेष परिस्थिति में अनिर्वाचित व्यक्ति के लिए रास्ता खुला रखा गया है। केवल सामंजस्य की कमी के चलते असमंजस उत्पन्न हुआ, था जिसका निस्तारण हो गया है। जैसा कि नेरेटिव बना है कि सरकार ने विरोध के चलते यू टर्न लिया है, वैसा कुछ भी नहीं है। अधिसूचना अब भी कायम है।
-तेजवानी गिरधर
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बुधवार, अक्तूबर 30, 2019

क्या वाकई मजबूरी का नाम महात्मा गांधी है?

-तेजवानी गिरधर-
जब भी किसी काम की मजबूरी होती है तो महात्मा गांधी को याद किया जाता है। याद है न ये जुमला - मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। यह जुमला कब और किसने फैंका, कैसे ईजाद हुआ, इसका तो पता नहीं, मगर अब यह चरितार्थ हो गया है। संघ व भाजपा की जिस विचारधारा ने सदैव गांधीजी को निशाने पर रखा, वही आज उनकी पूजा करने लगी है। ऐसे में यह चौंकाने वाला सवाल उठता है कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि संघ व भाजपा गांधीजी को सिर पर उठाए घूम रहे हैं? जिन गांधीजी के राष्ट्रपिता होने पर सवाल उठाए जाते रहे, आज बड़े गर्व से उन्हीं को राष्ट्रपिता मान कर अभिनंदन किया जा रहा है? जिन गांधीजी को हिंदुस्तान के विभाजन का जिम्मेदार माना गया, जिन पर मुस्लिम तुष्टिकरण पर आरोप लगाया जाता रहा, वही आज प्रात: स्मरणीय कैसे हो गए? जिस भाजपा सरकार ने गांधीजी के समानांतर अथवा उनसे कहीं बड़ा करके सरदार वल्लभ भाई पटेल को खड़ा करने की भरपूर कोशिश की, आज वही गांधीजी की 150 वी जयंती को धूमधाम से मना रही है, देशभर में पदयात्राएं कर रहे है? गांधीजी की हत्या के लिए जिस विचारधारा पर आरोप लगाए जाते हैं, वही विचारधारा आज गांधीजी के सामने नतमस्तक है? यह बात पब्लिक डोमेन में है कि वर्षों से सत्ता में रही कांग्रेस की वजह से ही गांधीजी की जयंती व पुण्यतिथि मनाई जाती है, भाजपा तो हाल के कुछ वर्षों में ऐसा करने लगी है। आखिर यकायक ऐसा हो कैसे गया? क्या मजबूरी है?
आपको याद होगा कि हाल ही महात्मा गांधी 150 वी जयंती पर आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बकायदा लेख लिखकर गांधी के प्रति अपनी वैचारिक और कार्यशील प्रतिबद्धता को सार्वजनिक किया। संभवत: यह पहला मौका है कि संघ इस प्रकार खुल कर गांधीजी के साथ खड़ा हो गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी स्वच्छता अभियान में गांधीजी को ही आगे रखा।
मसले का दूसरा पहलु ये है कि जहां मजलिसे-इतेहादुल मुसलमीन के नेता असदुद्दीन औवेसी का कहना है कि उन्हें गांधी का नाम लेने का कोई अधिकार नहीं है, तो कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने कहा कि भाजपा वोटों के खातिर गांधी के नाम को भुना रही है।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या गांधी के साथ संघ का कोई जमीनी रिश्ता वास्तव में कायम है? भागवत ने गांधी के भारतीयता के विचार को जिस प्रकार रेखांकित किया है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि संघ कांग्रेस की तुलना में गांधीजी के अधिक नजदीक है। यह सर्वविदित है कि गांधीजी ने अपने पूरे दर्शन में भारतीयता को प्रमुखता प्रदान की। रामराज्य, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, मधनिषेध जैसे आधारों पर अपनी वैचारिकी खड़ी की। ये सभी आधार भारतीयों के लोकजीवन को हजारों साल से अनुप्राणित करते आ रहे हैं। राम भारतीय समाज के आदर्श पुरुष हैं और गांधी के प्रिय आराध्य। अब यह आसानी से समझा जा सकता है कि गांधी किस भारतीयता के धरातल पर खड़े थे। ऐसे में संघ का दावा है कि भले ही उसके बारे में जो भी धारणा हो, मगर संघ ने गांधीजी को अपने दैनिक दिनचर्या में शामिल कर रखा है। इसका प्रमाण ये है कि एक पक्के स्वयंसेवक और एक पक्के गांधीवादी की जीवन शैली लगभग एक समान है।
संघ का दावा है कि जिस प्रकार गांधीजी का सारा जोर सेवा कार्यों पर था, उसी के अनुरूप सेवा कार्यों के मामले में संघ दुनिया का सबसे बड़ा और व्यापक संगठन है। सेवा भारती, वनवासी कल्याण परिषद, एकल विद्यालय, परिवार प्रबोधन, विद्या भारती जैसे बीसियों अनुषांगिक संगठन दिन रात देश भर में सेवा के ऐसे ऐसे प्रकल्पों में जुटे हैं।
तस्वीर का दूसरा पहलु ये है कि संघ व भाजपा औपचारिक व घोषित रूप से भले ही आज गांधीजी की पूजा कर रहे हों, मगर इनकी विचारधारा से इत्तेफाक रखने वाले कई लोग आज भी गांधीजी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के प्रति श्रद्धा रखते हैं। भोपाल की सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के गोडसे के बारे में सार्वजनिक रूप से दिए गए बयान से इसकी पुष्टि होती है। दूसरी ओर इस पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यह तल्ख टिप्पणी कभी नहीं भुलाई जा सकेगी कि वे निजी तौर पर साध्वी को कभी माफ नहीं करेंगे। इस अंतर्विरोध से भाजपा कैसे उबरेगी, यह तो उसी की चिंता का विषय है।
वैसे यह स्थिति वाकई सिर चकरा देने वाली है। तभी तो यह जुमला सामने आया कि भाजपा के मुख में गांधीजी व दिल में गोडसे है। इसी मसले पर एक लेखक का यह कथन भी विचारणीय है- नाथूराम गोडसे के साथ संघ का रिश्ता खोजने और थोपने वाले आलोचक गांधी के संग संघ का नाता भी खोजने की कोशिशें करें।
ऐसा प्रतीत होता है कि सत्ता में आने के लिए राजनीतिक कारणों से जो विचारधारा गांधीजी का विरोध करती रही, सत्तारूढ़ होने के बाद उसे समझ में आ गया कि देश में हम भले ही गांधीजी को गाली देते हैं, मगर पूरी दुनिया में गांधीजी की बड़ी मान्यता है, गांधी दर्शन की बड़ी महत्ता है। उसे नकारा नहीं जा सकता। यदि कोई ऐतिहासिक भूल हो गई तो उसे सुधारने में बुराई क्या है? तभी तो प्रख्यात चिंतक डॉ. वेद प्रताप वैदिक ने एक लेख में लिखा है कि यदि वर्तमान सरकार, भाजपा और संघ गांधी का नाम आज ले रहे हैं तो उन्हें क्यों न लेने दें ? उनकी आंखें खुल रही हैं, दिल बड़ा हो रहा है, समझ गहरी हो रही है तो उसे वैसा क्यों न होने दें ? यह ठीक है कि इस सरकार को मोदी और शाह चला रहे हैं लेकिन हम यह न भूलें कि ये दोनों गुजराती हैं। वे गांधी और सरदार पटेल को कंधे पर उठा रहे हैं तो इसमें बुराई क्या है?
कई लेखक ये मानते हैं कि हम गांधीजी को पूजते जरूर हैं, मगर हमारे में गांधीदर्शन कहां है? ऐसा लगता है कि गांधीजी की प्रासंगिकता, जो मजबूरी के रूप में उभर कर आई है, उसे बड़ी चतुराई से यह कह कर उपयोग किया जाने वाला है कि उन्होंने तो केवल गांधीजी को स्थापित मात्र किए रखा, जबकि हम उन्हें अपने जीवन में उतारने को आतुर हैं।

शनिवार, अक्तूबर 05, 2019

क्या मोदी ट्रंप का चुनाव प्रचार करने ह्यूस्टन गए?

-तेजवानी गिरधर-
अमेरिका के ह्यूस्टन में पचास हजार भारतीयों के बड़े व ऐतिहासिक जलसे में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदगी को भले ही मोटे तौर पर दोनों देशों के संबंध मजबूत होने के रूप में देखा गया हो, मगर मोदी के, अगली बार ट्रंप सरकार, के नारे ने यह संदेह उत्पन्न कर दिया है कि मोदी की इस यात्रा का साइलेंट एजेंडा क्या ट्रंप के लिए प्रवासी भारतीयों के वोट जुटाना था। हो सकता है कि ट्रंप की गरिमामय मौजूदगी में मोदी ने अति उत्साहित हो कर यह जुमला दिया हो, मगर इसकी जम कर मजम्मत हो रही है।
असल में ऐसा होता ही है कि किन्हीं भी दो राष्ट्रों के शासनाध्यक्ष जब एक मंच शेयर कर रहे होते हैं तो शिष्टाचार में एक दूसरे तारीफ ही करते हैं। दोनों देशों के बीच संबंध और बेहतर होने की बात भी कही जाती है। यह एक सामान्य सी बात है। जैसे मोदी ने भारत और अमेरिकी के बीच गहरे मानवीय संबंधों का जिक्र करते हुए दोनों देशों के संबंधों को मजबूत बनाने में 'विशेष शख्सियतÓ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के योगदान की सराहना की, वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में दुनिया मजबूत, फलता-फूलता और संप्रभु भारत देख रही है। मगर जैसे ही मोदी ने यह नारा दिया कि अगली बार ट्रंप सरकार, तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति व कूटनीति के जानकार भौंचक्क रह गए। असल में मोदी को यह समझना होगा कि तारीफ मोदी की नहीं हो रही, बल्कि इसलिए हो रही है कि वे भारत के प्रधानमंत्री हैं। वरना जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो अमेरिका उनको वीजा देने को ही तैयार नहीं था।
जानकारी के अनुसार ऐसा पहली बार हुआ कि किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर आसीन व्यक्ति को अगली बार चुने जाने का नारा दिया हो, मानो वे किसी चुनावी रैली में बोल रहे हों, और ये रैली ट्रंप के लिए जनसमर्थन जुटाने के लिए ही आयोजित की गई हो। यह बात ठीक है कि प्रधानमंत्री के रूप में मोदी को वहां जो सम्मान मिला, वह हम सभी भारतीयों के लिए गर्व की बात है, मगर सम्मान से अभिभूत हो कर इस प्रकार ट्रंप के लिए प्रवासी भारतीयों से वोट की अपील करना अच्छी हरकत नहीं है। न तो नैतिक रूप से न कूटनीतिक रूप से। समझ में नहीं आता कि ऐसा मोदी के सलाहकारों की राय पर हुआ या फिर मोदी ने अपने स्तर पर ही ऐसा कर दिया। ट्रंप के लिए निजी तौर पर अपील करने से भले ही दोनों के बीच व्यक्तिगत दोस्ती प्रगाढ़ हो जाए, मगर सोचने वाली बात ये है कि भारत को इससे क्या मतलब कि अमेरिका में ट्रंप दुबारा सरकार बनाएं या कोई और? क्या ऐसा करके हमने दूसरे देश की भीतरी राजनीति में हिस्सेदारी नहीं निभा दी है? क्या ऐसा करने से चलते रास्ते डमोक्रेट्स व्यर्थ ही हमारे विरोधी नहीं बन जाएंगे? हो सकता है कि मोदी को ये लगा हो कि ट्रंप ही दुबारा चुने जाएंगे, इस कारण ऐसी अपील कर दी हो। अगर उनका अनुमान सही निकलता है तो न केवल अमेरिका में रह रहे भारतीयों के लिए अच्छी बात होगी, अपितु दोनों देशों के संबंधों में और सुधार आएगा। लेकिन यदि डेमोक्रट्स जीते तो  उनका प्रवासी भारतीयों व भारत के प्रति कैसा नजरिया होगा, ये समझा जा सकता है।
जलसे के तुरंत बाद डेमोक्रेट्स की प्रतिक्रिया आ भी गई। डेमोक्रेट्स नेता बर्नी सैंडर्स ने अपने ट्वीट में कहा कि भारत में धर्म स्वातंत्र्य और मानवाधिकारों पर हो रहे हमलों को नजरअंदाज कर ट्रंप, मोदी का समर्थन कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ''जब धार्मिक उत्पीडऩ, दमन और निष्ठुरता पर डोनाल्ड ट्रंप चुप रहते हैं तो वे पूरी दुनिया के निरंकुश नेताओं को यह संदेश देते हैं कि तुम जो चाहे करो तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगाÓÓ। हालांकि सीधे तौर पर उन्होंने वहां की स्थानीय राजनीति के तहत ट्रंप की आलोचना की, मगर अप्रत्यक्ष रूप से हम भी तो आलोचना के शिकार हो गए।
अमरीका में हुए जबरदस्त जलसे के समानांतर कई घटनाएं हुईं। मीडिया, मोदी के कार्यक्रम में भारतीयों की भारी भीड़ उमडऩे के बारे में तो बहुत कुछ कहता रहा, परंतु इससे जुड़ी कई अन्य घटनाओं को नजरअंदाज किया गया। उदाहरण के लिए, मोदी की नीतियों के विरोध में जो प्रदर्शन वहां हुए, उनकी कोई चर्चा नहीं हुई। यद्यपि अधिकांश दर्शकों ने मोदी का भाषण बिना सोचे-विचारे निगल लिया परंतु स्टेडियम के बाहर बड़ी संख्या में विरोध प्रदर्शनकारियों ने मोदी राज में देश की असली स्थिति की ओर ध्यान आकर्षित करवाने का प्रयास किया। बेशक अमरीका में रह रहे भारतीयों का एक बड़ा हिस्सा हिन्दू राष्टवाद का समर्थक और मोदी भक्त है, परंतु वहां के कई भारतीय, भारत में मानवाधिकारों की स्थिति और प्रजातांत्रिक अधिकारों के साथ हो रहे खिलवाड़ से चिंतित भी हैं।
ज्ञातव्य है कि मोदी की मानसिकता को जानने वाले इस बात को रेखांकित करते रहे हैं कि मोदी हर वक्त चुनावी मूड में ही रहते हैं। पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद पूरे पांच साल तक सदैव कांग्रेस को ऐसे ललकारते रहे, मानों कांग्रेस उनको गंभीर चुनाती दे रही हो। खुद के दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में सफल होने से ही यह सिद्ध हो गया था कि मतदाता ने कांग्रेस को पूरी तरह से नकार दिया है, ऐसे में कांग्रेस, जवाहर लाल नेहरू व राहुल गांधी पर ताबड़तोड़ हमलों से यह भ्रम होता रहा कि क्या मोदी अब भी अपने आपको विरोधी दल का नेता मानते हैं। बावजूद इसके वे कांग्रेस को ही कोसते रहे। दूसरी बार केवल और केवल अपने दम पर प्रचंड बहुमत के साथ जीतने के बाद भी वे कांग्रेस की कमियां गिनाते रहते हैं। कुछ इसी तरह की चुनावी मानसिकता के चलते वे ट्रंप के लिए वोट की अपील कर आए।