तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

मंगलवार, सितंबर 10, 2019

चंद्रयान : कौन कहा रहा है कि मोदी फेल हो गए?

चंद्रयान 2 से संपर्क टूटने के बाद इसरो प्रमुख सीवन की पीठ पर हाथ रख कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह कहना कि विज्ञान में कभी असफलतायें नहीं होती, विज्ञान में सिर्फ प्रयोग और प्रयास किये जाते हैं, बिलकुल सही है। ऐसा करके उन्होंने न केवल इसरो के वैज्ञानिकों को निराश न होने की सीख दी है, अपितु हौसला अफजाई का काम किया है। प्रधानमंत्री रूप में उनका यह रुख बेशक सराहनीय है। मगर दुर्भाग्य से हम ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जहां हर चीज को राजनीति से जोड़ कर देखा जाने लगा है। हर सफलता-अफलता के साथ मोदी का नाम जोड़ा जा रहा है। चूक तकनीकी की है, मगर उसे मोदी भक्तों ने अपने दिल पर ले लिया है। अरे भाई, मोदी को असफल कह कौन रहा है? समझ नहीं आता कि वे आखिर किस मानसिकता से गुजर रहे हैं?
सीधी से बात है कि हमारे वैज्ञानिकों ने पूरी ईमानदारी व मेहनत से काम किया, उसमें वे तनिक विफल हो गए तो इसमें मोदी का क्या दोष है? इसे मोदी से जोड़ कर देखना ही बेवकूफी है। अगर जिम्मेदार ठहराया जाना जरूरी हो तो वो हैं, हमारे वैज्ञानिकों की टीम, जिससे कहीं चूक रह गई होगी। या ऐसा भी हो सकता है कि कोई अपरिहार्य गड़बड़ी हो गई होगी। जानबूझ कर तो किसी ने लापरवाही की नहीं होगी। कम से कम इस मामले में प्रधानमंत्री तो कत्तई जिम्मेदार नहीं हैं। यह एक वैज्ञानिक प्रयोग था, जो कि किसी चूक की वजह से कोई और प्रधानमंत्री होता तो भी विफल हो सकता था। इसमें मोदी है तो मुमकिन है, वाला राजनीतिक जुमला लागू नहीं होता।
तेजवानी गिरधर
चूंकि यह मामला ऐसा था ही नहीं कि मोदी की आलोचना की जाती, लिहाजा विपक्ष की ओर से कोई प्रतिक्रिया आई भी नहीं। सोशल मीडिया पर किसी इक्का-दुक्का ने मसखरापन किया हो अलग बात है। शायद उसी पर एक वाट्स ऐपिये ने प्रतिक्रिया दी कि भारत में कुछ लोग मोदीजी की गलती का इंतजार ऐसे करते हैं, जैसे ढ़ाबे के बाहर बैठा कुत्ता जूठी प्लेट का इंतजार करता है। मगर सवाल उठता है कि इस मामले में मोदी जी गलती है ही कहां?
पता नहीं ये नेरेटिव कैसे हो गया है कि देश के हर मसले के केन्द्र में मोदी को रख दिया जाता है। एक प्रतिक्रिया देखिए:-
चंद्रयान 2 से संपर्क टूटने के बाद जहां पूरा देश इसरो के साथ खड़ा है, वहीं कुछ टुच्चे कांग्रेसी इसमें मोदी जी को कोसने का मौका ढूंढ़ रहे हैं। ये लोग वही हैं, जो अपने भाई की भी मौत पर सिर्फ इसलिए खुश होते है कि चलो भाई मरा तो गम नहीं, कम से कम भाभी तो विधवा हुई।
दूसरी प्रतिक्रिया देखिए:- चंद्रयान की सफलता या असफलता को मोदी से जोड़ कर देखने वाले लोग मात्र मनोरोगी ही हो सकते हैं। इसरो के लिए केंद्र में बैठी सरकार मात्र इतने ही मतलब की है कि वो उनके किसी प्रोजेक्ट के लिए फंडिंग करने में दिलचस्पी दिखाती है या नहीं। इससे ज्यादा कुछ नहीं। यह प्रतिक्रिया सटीक व सही है। मगर सवाल उठता है कि चंद्रयान की असफलता को मोदी से जोड़ कर देख कौन रहा है?
कुछ ऐसी प्रतिक्रियाएं भी आई हैं, जो इसरो की हौसला अफजाई करती हैं। यदि ये भी किसी साइलेंट प्रोजेक्ट के तहत एक मुहिम की तरह चलाई जा रही हैं तो भी कोई गिला नहीं।
यथा-
चंद्रयान 2 की कुल लागत लगभग 900 करोड़। देश मे 100 करोड़ देशभक्त हैं। सिर्फ 9-9 रुपये हिस्से में आये। इसरो हम आपके साथ हैं। फिर से जुट जाओ और फिर से चंद्रयान को तैयार करो। देशभक्त धन की कमी नहीं होने देंगे। भारतमाता की जय।
नासा ने ग्यारहवीं बार में सफलता हासिल की थी। ओर इसरो सिर्फ 2 बार में ही 99.99 प्रतिशत सफलता हासिल की है। बधाई हो इसरो।
जिस मिशन पर अमेरिका ने 100 बिलियन डॉलर्स खर्च किये, वही काम हमारे वैज्ञानिकों ने महज 140 मिलियन में कर दिखाया।
मोदी जी से अनुरोध। इसरो के नाम पर एक अकाउंट खुलवा दो। 978 करोड़ तो बहुत छोटी रकम पड़ जाएगी। हमारे देश वासी उस अकाउंट को भर देंगे।
लाखों किलोमीटर का सफर तय करके मैं अपनी गाड़ी से गंतव्य तक तो पहुंचा, लेकिन मुझे पार्किंग नहीं मिली और मैं गाड़ी को पार्क नहीं कर सका तो क्या मेरा सफर अधूरा रह गया? तो क्या मैं गंतव्य तक नहीं पहुंचा? तो क्या मैं फेल हो गया? नहीं, बिलकुल नहीं।
आपकी बेटी या बेटा परीक्षा की कड़ी तैयारी कर 98 प्रतिशत अंक लाए और 2 प्रतिशत अंक नहीं ला पाए तो आप उसे सफल कहेंगे या असफल? बधाई हो। ये वैज्ञानिकों के साथ हर भारतवासी की सफलता है। यात्रा जारी रखिए।
इसरो के मिशन की असफलता अपनी जगह है, मगर उसमें भी मोदी के महिमामंडन को कैसे तलाशा जा रहा है, ये प्रतिक्रियाएं देखिए:-
आज से पहले कभी आपने देखा या सुना था कि कोई प्रधानमंत्री देर रात को अपने वैज्ञानिकों के प्रोत्साहन के लिए उनके साथ बैठा हो?
36 घंटे की रूस यात्रा के बाद। जब चन्द्रयान का संपर्क टूटा, तो कोई और नेता होता तो वहां से चला जाता, पर मोदी जी वहीं रहे, बच्चों से बात की, वैज्ञानिकों का हौसला बढ़ाया। ये भारत में एक अप्रत्याशित बात है। और ये सिर्फ मोदीजी ही कर सकते हैं।
चन्द्रयान-2 ने आज एक चमत्कारिक दृश्य दिखाया है। शीर्ष राजनीतिक और शीर्ष वैज्ञानिक पदों पर आसीन व्यक्ति के बीच हमने तीव्र भावनात्मक सम्बन्ध देखा। दोनों ऐसे गले मिले, मानो एकाकार हो गए हों। सत्ता ने विज्ञान की पीठ थपथपाई। सत्ता ने विज्ञान के कंधे सहलाए। सत्ता ने विज्ञान को भरोसा दिया।
सफलता के सौ बाप होते हैं, असफलता अनाथ होती है। प्रधानमंत्री मोदी भारत के रॉकस्टार हैं। रात भर खुद कंट्रोल रूम में बैठ मिशन देखा और मिशन के अंतिम फेस के असफल होने पर वह सारा दोष वैज्ञानिकों पर छोड़ भाग नहीं गए। उनका साथ दिया।
आज मोदी जी का इसरो को भाषण सुन के बहुत गर्व हुआ है, अपने आप पर कि मैंने देश की कमान एक अच्छे लीडर के हाथ मे दी है क्योंकि अच्छा लीडर वही होता है, जो अपनी टीम का मनोबल टूटने नहीं देता। अगर इसकी जगह कोई कांग्रेसी होता तो मुंह छुपाते घूमता। हमे आप पर गर्व है मोदी जी।
किसी कांग्रेसी ने प्रतिक्रिया दी हो या नहीं, मगर फिर भी कांग्रेस पर हमले जारी रहे। देखिए:-
70 साल हरामखोर अलगाववादियों, पत्थरबाजों, अब्दुल्ला-मुफ्ती फैमिली को मुफ्तखोरी कराने से तो चंद्रयान पर कम ही खर्च आया है।
आज असफल हुआ तो एक दिन सफल भी होगा। ये चंद्रयान-2 है यार कोई राहुल गांधी नहीं।
अगर कांग्रेस की सरकार होती तो विक्रम कभी क्रैश नहीं करता, क्योंकि तब विक्रम के प्रक्षेपण से पहले ही 2-4 वैज्ञानिकों को जहन्नुम प्रक्षेपित कर दिया जाता और मिशन का डब्बा बन्द हो जाता। फिर न विक्रम उड़ता, न क्रैश करता।
चंद्रयान लैंडर के संपर्क टूटने से वही लोग खुश हो रहे हैं, जो गलती से इस धरती पर पड़ोसियों की मदद से लैंड कर गए हैं।
चंद्रयान सफल नहीं हो पाया तो मोदी विरोधी हंस रहे हैं।  अब इनको देख कर ये समझ नहीं आता है कि ये मोदी विरोधी हैं या देश विरोधी?
असल में मोदी मौके पर वैज्ञानिकों का उत्साह बढ़ाने के लिए गए थे। प्रतीत ये भी होता है कि अगर मिशन कामयाब हो जाता तो पूरे देश में मोदी के जयकारे से आसमान सिर पर उठा लिया जाता। दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं। विपक्ष ने कुछ कहा ही नहीं फिर भी मोदी भक्तों को लगा कि कहीं मोदी को ट्रोल न कर दिया जाए, लिहाजा उन्होंने उन्हें डिफेंड करने की मुहिम छेड़ दी, जिसकी कत्तई जरूरत नहीं थी।
चूंकि इस संदर्भ में एक प्रतिक्रिया किसी मोदी विरोधी भी नजर आई, तो उसे भी शेयर किए देते हैं, ताकि सनद रहे:-
चन्द्रयान के जिन महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षणों में इसरो विज्ञानियों का सारा ध्यान अपने मिशन पर केंद्रित होना चाहिए था, तभी वहां मोदी द अंडरटेकर जा धमके। इसरो प्रमुख उनकी आगवानी को लपके। निष्ठावान वैज्ञानियों का ध्यान बंटा। बाहर से आए सुरक्षाकर्मियों ने सुरक्षा की दृष्टि से प्रत्येक वैज्ञानिकों की चेकिंग करनी शुरू कर दी। जरा सोचिए, अपने काम में व्यस्त वैज्ञानिकों के ऊपर क्या प्रभाव पड़ा होगा। भोंपू चैनल पहले ही भीषण मनोवैज्ञानिक दबाव क्रिएट कर चुके थे। तोपों की तरह कैमरे तने थे। अन्यथा मिशन सफल था। यान अपने अंतिम गन्तव्य को छू चुका था। उसे प्रचार प्रियता के हल्केपन ने असफल किया। जटिल ऑपरेशन कर रहे किसी सर्जन की बगल में कोई सेल्फी बाज जा खड़ा हो जाये, तो परिणाम क्या होगा?
-तेजवानी गिरधर
7742067000

गुरुवार, सितंबर 05, 2019

क्या संघ प्रमुख मोहन भागवत दरगाह जियारत करेंगे?

हाल ही देश के प्रमुख मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत से मुलाकात हुई। बताया जाता है कि इस दौरान दोनों के बीच हिन्दू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने और भीड़ द्वारा हत्या की घटनाओं (मॉब लिंचिंग) सहित कई मुद्दों पर बातचीत हुई। जानकारी के अनुसार दोनों की मुलाकात की भूमिका लंबे से तैयार हो रही थी और इसके लिए भाजपा के पूर्व संगठन महासचिव राम लाल मुख्य रूप से प्रयासरत थे। मौलाना मदनी ने आरएसएस प्रमुख से कहा कि हिंदू-मुस्लिम एकता और सांप्रदायिक सद्भाव के बिना हमारा देश बड़ी ताकत नहीं बन सकता। उन्होंने भीड़ द्वारा हत्या, घृणा अपराधों की घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत पर भी जोर दिया। एनआरसी और कुछ अन्य मुद्दों पर भी बात हुई।
 दोनों की मुलाकात ने मीडिया में खासी सुर्खियां बटोरीं। मीडिया में इस पर भी बहस हुई कि क्या इस मुलाकात के मायने ये निकाले जाएं कि संघ अब मुस्लिमों के प्रति कुछ उदार होने की दिशा में कदम उठा रहा है, वरना उन्हें मुस्लिम नेता कर क्या हासिल करना था। ज्ञातव्य है कि इससे पूर्व भागवत इस आशय का बयान भी दे चुके हैं कि इस हिंदुस्तान का हर नागरिक हिंदू है, अर्थात वे मुस्लिमों को अलग कर के नहीं देखते। इसके पीछे उनके अपने तर्क हैं। संघ की मूल अवधारणा भी है कि हिंदू कोई धर्म नहीं, अपितु एक संस्कृति है, जीवन पद्धति है, जिसमें यहां पल रहे सभी धर्मावलम्बी शामिल हैं।
इसे इस संदर्भ में भी देखा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में सबका साथ, सबका विकास नारा दिया था, जिसे दूसरे कार्यकाल में बदल कर उसके साथ सबका विश्वास भी जोड़ दिया गया। इसका अर्थ यही निकाला जा रहा है कि वे सभी धर्मों के लोगों का विश्वास भी जीतना चाहते हैं। आपको ख्याल होगा कि किसी जमाने में जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो मंच पर एक मुस्लिम नेता के हाथों टोपी पहनने से इंकार कर दिए जाने के कारण उन्हें कट्टरवादी करार दिया गया। बाद में प्रधानमंत्री बनने पर इस्लामिक देशों की यात्रा के दौरान उनका नरम हुआ रुख सबके सामने है।
हमें यह बात भी ख्याल में रखनी होगी कि मुस्लिमों को मुख्य हिंदूवादी धारा या राष्ट्रवाद से जोडऩे के लिए संघ के ही प्रमुख नेता इन्द्रेश कुमार पिछले कई साल से सतत प्रयास कर रहे हैं। मुस्लिम आत्मिक रूप से कितने जुड़ पाए हैं, इसका तो पता नहीं, मगर उनके सम्मेलनों में भारी तादाद में मुस्लिमों को शिरकत करते देखा गया है।
इसी संदर्भ में संघ के ही एक प्रमुख विचारक ने लिखा है कि आजादी से पूर्व संघ के संस्थापक डॉ0 केशवराव बलिराम हेडगेवार की सबसे बड़ी पीड़ा यह थी कि इस देश का सबसे प्राचीन समाज यानि हिन्दू समाज राष्ट्रीय स्वाभिमान से शून्यप्राय:, आत्म विस्मृति में डूबा था। इसी परिप्रेक्ष्य में संघ का उद्देश्य हिन्दू संगठन यानि इस देश के प्राचीन समाज में राष्ट्रीय स्वाभिमान, नि:स्वार्थ भावना व एकजुटता का भाव निर्माण करना बना। डॉ. हेडगेवार का यह विचार सकारात्मक सोच का परिणाम था। किसी के विरोध में या किसी क्षणिक विषय की प्रतिक्रिया में से यह कार्य नहीं खड़ा हुआ। अत: इस कार्य को मुस्लिम विरोधी या ईसाई विरोधी कहना संगठन की मूल भावना के ही विरुद्ध हो जायेगा।
विषय के विस्तार में जाएं तो हिन्दू के मूल स्वभाव - उदारता व सहिष्णुता के कारण दुनिया के सभी मत-पंथों को भारत में प्रवेश व प्रश्रय मिला। संघ की प्रार्थना में प्रार्थना में मातृभूमि की वंदना, प्रभु का आशीर्वाद, संगठन के कार्य के लिए गुण, राष्ट्र के परम वैभव (सुख, शांति, समृद्धि) की कल्पना की गई है। प्रार्थना में हिन्दुओं का परम वैभव नहीं कहा है, राष्ट्र का परम वैभव कहा है। अर्थात संघ मुसलमानों को अपने से अलग करके नहीं मान रहा, भले ही उनकी पूजा पद्धति भिन्न है।
तेजवानी गिरधर  
तस्वीर का दूसरा रुख ये है कि आज तक अधिकतर मुस्लिमों ने संघ से दूरी बना रखी है। ऐसे में संघ के समक्ष यह चुनौती है कि मोहन भागवत अजमेर की सरजमीं से यह संदेश दें कि संघ मुस्लिमों अथवा उनके धर्मस्थलों के प्रति घृणा का भाव नहीं रखता। विशेष रूप से सूफी मत की इस कदीमी दरगाह के प्रति, जो कट्टरवादी इस्लाम से अलग हट कर सभी धर्मों में भाईचारे का संदेश दे रही है।
प्रचंड बहुमत से सत्ता पर काबिज भाजपा के मातृ संगठन के प्रमुख के नाते उनकी ऐतिहासिक व पौराणिक पुष्कर में गरिमामय मौजूदगी विशेष अर्थ रखती है। तीर्थराज पुष्कर व सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह को अपने आचंल में समेटे ऐतिहासिक अजमेर दुनिया भर को सांप्रदायिक सौहाद्र्र का संदेश देता है। यह शहर इस बात का भी गवाह रहा है कि राजा हो या रंक, हर कोई दोनों अंतर्राष्ट्रीय धर्मस्थलों पर हाजिरी जरूर देता है। ऐसे में आमजन में यह सवाल कुलबुला रहा है कि क्या आप भी पुष्कर के अतिरिक्त दरगाह के प्रति भी अपनी श्रद्धा व्यक्त करेंगे। अजमेर में अपनी मौजूदगी का लाभ उठाएंगे? क्या दरगाह जियारत करके अथवा दरगाह में सिर्फ औपचारिकता मात्र के लिए श्रद्धा सुमन अर्पित करके कोई उदाहरण पेश करेंगे? क्या भाजपा से जुड़े मुस्लिमों को अपनी जमात में गर्व से सिर उठाने का मौका देंगे? या फिर इस सवाल को अनुत्तरित ही छोड़ देंगे?
उल्लेखनीय है कि तकरीबन दस साल बाद भागवत अजमेर की सरजमीं  पर उपस्थित हुए हैं। पूर्व में वे अजयनगर के अविनाश माहेश्वरी पब्लिक स्कूल परिसर में ठहरे थे। तीन दिन के अजमेर प्रवास और अंत में आजाद बाग में उन्होंने संघ कार्यकर्ताओं को संबोधित किया था। ठीक दस साल बाद मोहन भागवत अजमेर की धरती पर आए हैं और इस बार ब्रह्मा की नगरी तीर्थराज पुष्कर की धरा पर प्रवास कर रहे हैं। दस साल पूर्व भी अजमेर आगमन पर ये सवाल उठा था कि क्या वे दरगाह जियारत को जाएंगे? आज भी यह सवाल मौजूं है। विशेष रूप से मौलाना अरशद मदनी से हुई मुलाकात से तनिक उदार होने का संकेत मिलने के बाद।
-तेजवानी गिरधर 
7742067000

शुक्रवार, अगस्त 30, 2019

धारा 370 का विरोध पाक परस्ती कैसे हो गया?

जो काम पिछले सत्तर साल में कोई सरकार नहीं कर पाई, वह भाजपा ने पूर्ण बहुमत हासिल करने के बाद कर दिखाया। जी, बात जम्मू-कश्मीर में धारा 370 व 35 ए को हटाने की है। यह भाजपा का जन्मजात चुनावी मुद्दा था। जाहिर तौर पर वह अपनी पीठ भी थपथपा रही है। पिछले पांच अगस्त को सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठा तो लिया, चक्रव्यूह भेद तो दिया, मगर अब उसमें से कैसे निकला जाएगा, यह भविष्य के गर्भ में है, क्यों कि मामला दिन ब दिन पेचीदा होता जा रहा है। कश्मीर, विशेष रूप से घाटी सेना के पूर्ण कब्जे में है। जनजीवन ठप है। सरकार हालांकि हालात सामान्य जताने की कोशिश कर रही है, मगर मीडिया व संचार माध्यमों पर नियंत्रण के बावजूद छन-छन कर आ रही खबरें इशारा कर रही हैं कि हालात काफी गंभीर हैं।
इस बीच मौलिक अधिकारों के हनन व अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश की कड़ी आलोचना भी होने लगी है। लोकतंत्र में विरोध के इन सुरों को पाकिस्तान परस्ती करार दिया जा रहा है। जो भी खिलाफत कर रहा है, उसके प्रति नफरत फैलाई जा रही है। सवाल ये उठता है कि जब कश्मीर हमारा आंतरिक मामला है तो उस पर पाकिस्तान के रुख व संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका की फिक्र क्यों की जा रही है? कश्मीर निस्संदेह हमारा ही है तो पाकिस्तान के रवैये का कॉग्लीजेशन काहे को ले रहे हैं? कहा जा रहा है कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कश्मीर के हालात पर टिप्पणी करके पाकिस्तान परस्ती का काम किया है। पाकिस्तान को उनकी टिप्पणी को संयुक्त राष्ट्र संघ में कोट करने का मौका मिल गया है। केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने तो यहां तक कह दिया कि राहुल पाक के हाथ खेल रहे हैं।
असल में हुआ ये कि पाकिस्तान के मानवाधिकार मंत्री डॉ. चिरीन मजारी ने यूएनओ को आठ पेज की एक पिटीशन भेजी है, जिसमें न केवल राहुल के बयान का जिक्र है, अपितु हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर व खतौली के भाजपा विधायक विक्रम सैनी के बयान का भी हवाला है। ज्ञातव्य है कि राहुल ने कश्मीर में हालात खराब होने का बयान दिया है। इसी प्रकार खट्टर ने कहा था कि हमारे युवक अब कश्मीर की गोरी लड़कियों से शादी कर सकते हैं। सैनी ने कहा था कि अब हमारे मुस्लिम वर्कर अब कश्मीर में विवाह कर सकते हैं। आठ पेज के पत्र में राहुल का मामूली जिक्र है, मगर भाजपा प्रवक्ता राहुल पर बढ़-चढ़ कर हमले बोल रहे हैं। विपक्ष के धारा 370 को हटाने के विरोध को यूनए में वेटेज मिलेगा। दूसरी ओर खट्टर व सैनी के बयानों को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट में भी इसी मुद्दे पर हुए वाकये से जाहिर होता है कि सरकार प्रकरण यूएन में जाने से घबरा रही है। जब कुछ यचिकाओं की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पांच जजों की एक संविधान पीठ बनाने की मंशा जताई तो सरकार के अटार्नी जनरल के के वेनु गोपाल व सोलिसटिर जनरल तुषार महेता ने कहा कि आपके फैसले को पाकिस्तान यूएन में ले जाएगा।
प्रश्र ये है कि जो भी कश्मीर पर सरकार के कदम से इतर राय रखता है, उसे पाक परस्त बताया जा रहा है, तो क्या सुप्रीम कोर्ट का समीक्षा के लिए संविधान पीठ बनाना भी पाक परस्ती है? सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया की आजादी पर अंकुश को लेकर सरकार को नोटिस जारी किया है, तो वह भी क्या पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र संघ में मुद्दा उठाने का हथियार माना जाए?
घूम फिर कर बात यही है कि राहुल गांधी की टिप्पणी व सुप्रीम कोर्ट के कदम से पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दा उठाने का मौका मिल गया है तो सरकार को चिंता क्यों हो रही है? जब आप कहते हैं कि कश्मीर हमारा है और वहां धारा 370 हटाने का निर्णय हमारा पूर्णत: आतंरिक मामला है तो हम पाकिस्तान के विरोध से क्यों घबरा रहे हैं? पाकिस्तान अगर संयुक्त राष्ट्र संघ में हमारा विरोध करता भी है तो हम उससे क्यों डर रहे हैं? जब हम कह रहे हैं कि पूरी दुनिया के देश हमारे साथ हैं और पाकिस्तान अकेला है तो फिर डर काहे का है।
आपको याद होगा कि जब संसद में बहस के दौरान कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन ने यह सवाल किया था कि क्या कश्मीर द्विपक्षीय मामला है तो उन पर ताबड़तोड़ हमला किया गया था। आज सरकार खुद मामला द्विपक्षीय होते देख चिंतित है। वह यह उम्मीद करती है कि कोई भी सरकार के फैसले के खिलाफ न बोले।
अब बात करते हैं धारा 370 की। बेशक सरकार को यह अख्तियार था कि वह धारा 370 हटा दे। उसने संसद में बहुमत के आधार पर हटा भी दी। मगर क्या यह जरूरी है कि अन्य विपक्षी दल भी सरकार के कदम से सहमत हों। बेशक कुछ कांग्रेसी नेताओं ने सहमति जताई है, मगर धारा 370 को हटाने के तरीके पर सवाल भी उठाए हैं। उनका कहना है कि इसके लिए कश्मीर की जनता व वहां के जनप्रतिधियों को विश्वास में लिया जाना चाहिए था? अहम बात ये है कि धारा 370 हटाने की आलोचना करना पाकिस्तान परस्ती कैसे हो गई? धारा 370 को देशभक्ति व राष्ट्रवाद से जोड़ कर कैसे देखा जा सकता है? जो धारा 370 को हटाए जाने अथवा इसे हटाने के असंवैधानिक तरीके पर सवाल उठा रहे हैं, वे देश विरोधी कैसे हो गए? बेशक पाकिस्तान बिना हक के विरोध कर रहा है, मगर हम उसे दरकिनार भी तो कर रहे हैं। चूंकि धारा 370 पर हमारी राय पाकिस्तान से मेल खा रही है तो इसका मतलब ये तो नहीं हो सकता कि हम पाक के डर से हमारे आंतरिक मसले पर अपनी राय भी जाहिर न करें। कहीं हम पाकिस्तान का डर दिखा कर भारत के आंतरिक विषय को जानबूझ कर राष्ट्रवाद से तो नहीं जोड़ रहे? जब पाकिस्तान हमारे सामने पिद्दी है और उसके विरोध के कोई मायने नहीं हैं तो क्यों पाकिस्तान का हौवा खड़ा कर रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि चूंकि हर आम भारतीय के मन में पाकिस्तान के प्रति नफरत है, इस कारण जानबूझकर पाक खौफ दिखा कर इस मुद्दे को राष्ट्रीय हित का गढ़ रहे हैं?
एक अहम बात और। हाल ही कश्मीर के राज्यपाल ने जो बयान दिया कि चुनाव में लोग धारा 370 का विरोध करने वालों को जूते मारेगी, वह किस बात का संकेत है? यानि कि या तो आप सहमत हो जाएं वरना आपको जूते मारे जाएंगे। ये किस किस्म की तानाशाही है? बाद में क्या आप तो अब भी सवाल खड़े करने वालों को जूते मार रहे हैं। जूते तो बहुत कम बात है, आप तो उन्हें देश विरोधी ही करार दिए जा रहे हैं। समझा जा सकता है कि किसी भी भारतीय के लिए देश विरोधी शब्द डूब मरने के समान गाली है।
लब्बोलआब, मामला उलझता जा रहा है और कैसे सुलझेगा, कश्मीर के हालात कैसे सामान्य होंगे, कुछ कहा नहीं जा सकता।
तेजवानी गिरधर
7742067000

सोमवार, अगस्त 12, 2019

कांग्रेस का परिवारवाद : ऐतराज भी, अनिवार्यता भी

लोकसभा चुनाव में बुरी तरह से पराजित होने के बाद नैतिकता के आधार पर राहुल गांधी के अध्यक्ष पद छोडऩे के पश्चात काफी दिन बाद भी नया पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं बनने से कांग्रेस के नेता व कार्यकर्ता चिंतित हैं। यह स्वाभाविक भी है, क्यों कि इस मसले के साथ उनका राजनीतिक भविष्य जुड़ा हुआ है। मगर ऐसा प्रतीत होता है कि उनसे भी अधिक चिंता मीडिया को है। यह वही मीडिया है जो कि कांग्रेस के परिवारवाद पर लगातार हमले करता है, मगर साथ यह भी कहता है कि नेहरू-गांधी परिवार के बिना कांग्रेस का वजूद ही खत्म हो जाएगा। जब राहुल इस्तीफा देते हैं तो पहले कहते हैं कि वे नौटंकी कर रहे हैं, मगर जब राहुल अपने इस्तीफे पर अड़ ही जाते हैं तो कहता है कि उन्हें रणछोड़दास नहीं बनना चाहिए, इससे आम कांग्रेस कार्यकर्ता हतोत्साहित है और कांग्रेस बिखर जाएगी। गहन चिंतन-मनन के बाद जब पार्टी के अधिसंख्य नेता दबाव बनाते हैं तो सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष बनने को राजी हो जाती हैं, इस पर फिर वही राग छेड़ते हैं कि देखा, आखिर पार्टी परिवारवाद से छुटकारा नहीं कर पा रही। इस मुद्दे पर वाट्स ऐप यूनिवर्सिटी के आदतन टिप्पणीकार बाकायदा मुहिम छेड़ हुए हैं, जिनमें कई अभद्र टिप्पणियां हैं।
चलो मीडिया को तो करंट मुद्दा चाहिए होता है, डिस्कशन करने को, मगर भाजपा नेता भी बड़े परेशान हैं। बात वे यह कह कर शुरू करते हैं कि यह कांग्रेस का आंतरिक मामला है, मगर फिर घूम फिर कर इस बात पर आ जाते हैं कि कांग्रेस परिवारवाद से बाहर नहीं आ पाएगी।
पहले मीडिया की बात। अमूमन कांग्रेस विरोधी व प्रो. मोदी रहे जाने-माने पत्रकार डॉ. वेद प्रताप वैदिक ने हाल ही एक पोस्ट शाया की है। उनकी चिंता है कि कांग्रेस अपना अध्यक्ष कैसे चुने। वे कहते हैं कि कांग्रेस-जैसी महान पार्टी कैसी दुर्दशा को प्राप्त हो गई है ? राहुल गांधी के बालहठ ने कांग्रेस की जड़ों को हिला दिया है। कांग्रेस के सांसद और कई प्रादेशिक नेता रोज-रोज पार्टी छोडऩे का ऐलान कर रहे हैं। मुझे तो डर यह लग रहा है कि यही दशा कुछ माह और भी खिंच गई तो कहीं कांग्रेस का हाल भी राजाजी की स्वतंत्र पार्टी, करपात्रीजी की रामराज्य परिषद, लोहियाजी की समाजवादी पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की तरह न हो जाए।
वे सीधे तौर पर कांग्रेस की हालत बयां कर रहे हैं, मगर साथ ही यह भी स्वीकार कर रहे हैं कि भारतीय लोकतंत्र के लिए यह अत्यंत चिंताजनक चुनौती होगी। इस समय देश को एक मजबूत, परिपक्व और जिम्मेदार विपक्ष की बहुत जरूरत है। उसके बिना भारत एक बिना ब्रेक की मोटर कार बनता चला जाएगा।
इसी प्रकार एक लेखक को चिंता है कि आखिर कौन संभालेगा अब सौ वर्ष से भी ज्यादा पुरानी पार्टी को? विशेष रूप से धारा 370 हटने के बाद जिस प्रकार पार्टी के बड़े नेताओं ने पार्टी लाइन से हट कर निर्णय का स्वागत किया है, उससे बगावत के हालात बन रहे हैं। उन्हें चिंता है कि जब कांग्रेस का स्वयं का नेतृत्व ही कमजोर है, तो विपक्ष की एकता क्या होगा? यानि कि वे कांग्रेस की अहमियत को भी समझ रहे हैं। इसी लिए सलाह देते हैं कि कांग्रेस को अपनी भूमिका जल्द तय करनी चाहिए। साथ ही राहुल गांधी को ये सलाह देते हैं कि वे यह अच्छी तरह समझ लें कि गांधी परिवार के बगैर कांगे्रस का कोई वजूृद नहीं है।
एक लेखक को दिक्कत है कि जिन सोनिया गांधी ने कभी राहुल गांधी को कहा था कि सत्ता जहर है, उन्होंने वापस कांग्रेस अध्यक्ष का पद इसलिए संभाल लिया, क्योंकि उन्हें पता है कि अब कांग्रेस को कई साल तक यह जहर पीना नसीब नहीं होगा। वे घोषित कर रहे हैं कि भले ही सोनिया ने पार्टी के उद्धार के लिए उसे अपने आंचल में समेट लिया है, मगर अब वह शायद जल्द संभव नहीं है। अधिसंख्य पत्रकारों की तरह उनको भी चिंता है कि कांग्रेस हालत देश और लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। ये स्थिति सत्ता पक्ष को बेलगाम और तानाशाह बना सकती है।
कुल जमा निष्कर्ष ये है कि सभी कांग्रेस के परिवारवाद की आलोचना भी कर रहे हैं, साथ ये भी स्वीकार कर रहे हैं कि नेहरू-गांधी परिवार के बिना कांग्रेस खत्म हो जाएगी। साथ ही यह चिंता भी जता रहे हैं कि अगर कांग्रेस की हालत खराब हुई तो मजबूत विपक्ष का क्या होगा, लोकतंत्र का क्या होगा? कैसा विरोधाभास है? अपने तो समझ से बाहर है। अपुन को तो यही लगता है कि मीडिया का जो भी मकसद हो, मगर ये मीडिया ही कांग्रेस के वजूद को कायम करने वाला है।
वैसे असल बात ये है कि भले ही कांग्रेस एक परिवार पर ही टिकी हो, मगर दरअसल यह एक पार्टी से कहीं अधिक एक विचारधारा है। चाहे हिंदूवादी विचारधारा कितनी भी प्रखर हो जाए, मगर धर्मनिरपेक्षता की विचारधारा सदैव कायम रहेगी। किसी भी नाम से। कहते हैं न कि विचार कभी समाप्त नहीं होता। एक जमाना था, जब भाजपा के महज दो ही सांसद लोकसभा में थे। मगर पार्टी हतोत्साहित नहीं हुई। अपने विचार को लेकर चलती रही और आज सत्ता पर प्रचंड बहुमत के साथ काबिज है।
एक बड़ी सच्चाई ये भी है कि आम भारतीय कट्टर नहीं है, कभी हवा में बहता जरूर है, मगर फिर लिबरल हो जाता है, क्यों कि यही उसका स्वभाव है। ठीक वैसे ही, जैसे पानी को कितना भी गरम कर लो, मगर फिर अपने स्वभाव की वजह से शीतल हो जाता है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

गुरुवार, अगस्त 08, 2019

राष्ट्रवाद की खातिर संविधान को ताक पर रखने में क्या ऐतराज है?

ऐसा लगता है कि भारत के संविधान निर्माताओं से एक गलती हो गई।  उन्हें संविधान में यह भी लिख देना चाहिए था कि अगर देश हित का मुद्दा हो तो संविधान को तोडऩे-मरोडऩे में कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए। उनकी इसी गलती का परिणाम ये है कि कश्मीर में धारा 370 व 35 ए हटाने के मसले पर आज कुछ बुद्धजीवी यह हिमाकत कर रहे हैं कि वे केन्द्र सरकार के निर्णय को असंवैधानिक बता रहे हैं।
आज जब अधिसंख्यक भारतीय देशभक्ति के नाम पर सरकार के निर्णय को सही ठहरा रहे हैं, ऐसे में चंद बुद्धिजीवी यह कह कर सरकार की आलोचना कर रहे हैं कि सरकार ने पूरे कश्मीर को नजरबंद करने के साथ वहां के नेताओं व अवाम  को विश्वास में लिए बिना अपना निर्णय थोप दिया है। यह अलोकतांत्रिक है। कानूनी लिहाज से भले ही कश्मीर का मुद्दा संविधान की बारिकियों से जुड़ा हुआ हो, मगर सच्चाई ये है कि आज धारा 370 का मुद्दा राष्ट्रवाद से जोड़ा जा चुका है। जो भी इस धारा को हटाने के खिलाफ है, उसे राष्ट्रद्रोही करार दिया जा रहा है।
तेजवानी गिरधर
उन चंद बुद्धिजीवियों का कहना है कि संविधान में यह स्पष्ट रूप से लिखा है कि राष्ट्रपति धारा 370 को हटा सकते हैं, मगर उससे पहले उन्हें जम्मू कश्मीर विधानसभा से राय मश्विरा करना होगा। चूंकि वर्तमान में जम्मू कश्मीर में विधानसभा अस्तित्व में नहीं है और राज्य पर केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर राज्यपाल का नियंत्रण है, इस कारण सरकार का निर्णय असंवैधानिक है। उनका तर्क ये है कि चूंकि राज्यपाल केन्द्र का ही प्रतिनिधि है, इस कारण उसकी राय के कोई मायने ही नहीं रह जाते। एक तरह से यह एकतरफा निर्णय है, जिसमें कश्मीर की जनता या वहां के प्रतिनिधियों को नजरअंदाज किया गया है। उनके मुताबिक चूंकि इस मामले में संविधान की अवहेलना की गई है, इस कारण इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौति दी जा सकती है। एक व्यक्ति ने चुनौति दे भी दी है। संभव है कुछ और लोग या कांग्रेस की ओर से भी चुनौति दी जाए। मगर उससे भी बड़ा सवाल ये है कि जब भाजपा, जिसके चुनावी एजेंडे में शुरू से इस धारा को हटाने पर जोर दिया जाता रहा है, के साथ अन्य विपक्षी दल भी सरकार के निर्णय से सहमत हैं, तो हमारे महान लोकतंत्र में बहुसंख्यक की राय को गलत कैसे कहा जा सकता है? यहां तक कि पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त जम्मू कश्मीर को केन्द्र शासित प्रदेश बनाए जाने पर भी आम आदमी पार्टी के कर्ताधर्ता अरविंद केजरीवाल, जो कि दिल्ली के मुख्यमंत्री भी हैं, ने निर्णय का स्वागत किया है, जबकि वे जब से मुख्यमंत्री बने हैं, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की पैरवी करते रहे हैं। संभवत: यह पहला मौका है, जबकि किसी पूर्ण राज्य, जो कि विशेषाधिकार प्राप्त भी है, को केन्द्र शासित प्रदेश बनाया गया है। कई बड़े कांग्रेसी नेताओं ने भी सरकार के निर्णय का स्वागत किया है। कुछ लोग कांग्रेस के सरकार के इस ऐतिहासिक निर्णय के खिलाफ खड़े होने को आत्मघाती कदम बताया जा रहा है। कांग्रेस देश के मूड को समझने की बजाय उस पाले में खड़ी है, जहां से वह रसातल में चली जाएगी। समझा जा सकता है कि अरविंद केजरीवाल सहित कुछ कांग्रेसी इस कारण सरकार के निर्णय के साथ खड़े होने को मजबूर हैं, क्योंकि विरोध करने पर बहुसंख्यक हिंदूवादी समाज पूरी तरह से उनके खिलाफ जो जाएगा। केजरीवाल को तो जल्द ही चुनाव का सामना भी करना है। ऐसा सिद्धांत जाए भाड़ में, जिसके चक्कर में सत्ता हाथ से निकल जाए।
वैचारिक रूप से भाजपा से भिन्न बसपा भी सरकार के साथ है। बताया जा रहा है कि चूंकि मायावती का मूलाधार दलित वोट हैं, वे समझती हैं कि फैसले से जम्मू-कश्मीर में दलित हिन्दुओं को नागरिकता एवं अच्छी नौकरी मिल सकेगी। कुछ मानते हैं कि मायावती ने स्वयं और अपने भाई को जेल जाने से बचाने के लिए ऐसा किया है। मायावती ने आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में भाई आनन्द सहित जेल जाने से बचने एवं हाल ही में उनके भाई के लगभग 4 सौ करोड़ रूपए के जब्त किए गए बेनामी प्लाट्स को वापस हासिल करने के लिए यह कदम उठाया है।
असल में धारा 370 का मसला पाकिस्तान से चिर दुश्मनी, देश भक्ति, राष्ट्रवाद और हिंदू-मुस्लिम से जुड़ गया है। उसके अपने अनेक कारण हैं। पाकिस्तान आए दिन सीमा पर गड़बड़ी करता है। अशांति फैलाने के लिए अपने आतंकवादियों को लगातार वहां भेज रहा है। कश्मीर के अनेक अलगाववादी अपने आप को भारतीय ही नहीं मानते। विशेष रूप से घाटी तो कश्मीरी पंडितों से विहीन हो गई है। अलगाववादियों के बहकावे में कश्मीर के युवक सरकारी सैनिकों पर पत्थरबाजी करते हैं। नतीजा ये हुआ है कि आम भारतीयों, विशेष रूप से हिंदूवादियों को मुस्लिम कश्मीरियों से नफरत सी हो गई है। अब तकलीफ इस बात से नहीं कि भारी तादाद में सेना व पैरामिलिट्री फोर्सेस की तैनाती से कश्मीरी कितनी यंत्रणा भुगत रहा है। मतलब इस बात से है कि कश्मीर की जमीन पर हमारा नियंत्रण है। ऐसे माहौल में जो भी कश्मीरियों के नागरिक अधिकारों या संविधान की बात करेगा, वह देशद्रोही व पाकिस्तान परस्त माना जाएगा।
बुद्धिजीवियों का एक तबका ऐसा भी है, जो सरकार के निर्णय के बाद देशभर के सोशल मीडिया पर हो रही छींटाकशी से आशंकित है कि कहीं इससे हालात और न बिगड़ जाएं। एक पोस्ट में लिखा है कि इस ऐतिहासिक फैसले को सही साबित करना भी हमारी जिम्मेदारी है, क्योंकि नोटबंदी भी एक ऐतिहासिक फैसला था, जिसे अपने ही भ्रष्ट तंत्र ने विफल कर दिया था। भाषायी संयम बनाए रखें।  कश्मीरवासियों को भी यह अहसास करवाएं कि हम आपके साथ हैं। प्लॉट खरीदने जैसे लालची उपहास बना कर घृणा मत बोइये। यह कोई कबड्डी का मैच नहीं था, जो कोई हार गया है और उसे हारग्या जी हार ग्या कह कर चिढ़ाओ। फब्तियां कभी भी मोहब्बत के बीज नहीं बो सकती, नफरत ही पैदा करेगी।
एक और बानगी देखिए:-
न कश्मीर की कली चाहिए
न हमें प्लॉट चाहिए
मेरे किसी फौजी भाई का
शरीर तिरंगे में लिपट कर न आये
बस यही हिंदुस्तान चाहिए
इस पोस्ट से समझा जा सकता है कि ये उन लोगों को नसीहत है, जो कश्मीर की लड़की से शादी करने व वहां प्लॉट खरीदने वाली पोस्टें डाल रहे हैं।
मोदी के भक्तों के फैसले के समर्थन तक तो ठीक है, मगर बाकायदा मोदी का महिमामंडन और फारुख अब्दुल्ला व महबूबा मुफ्ती पर तंज कसती अपमानजनक टिप्पणियां करने से माहौल के सुधरने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। कश्मीरी युवतियों के बारे में बेहद अश्लील पोस्टें डाली जा रही हैं, मानों वे इसी दिन का इंतजार कर रहे थे। मोदी भक्त उन बुद्धिजीवियों व कानून विशेषज्ञों को भी ट्रोल कर रहे हैं, जो फैसले की कानूनी व संवैधानिक समीक्षा कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि कोई भी किसी भी प्रकार का विरोध न करे। बस मोदी-शाह ने जो कर दिया, उसे चुपचाप मान जाओ।
फैसले की खिलाफत करने वालों के अपने तर्क हैं, जिनमें दम भी है। वो है:-
आर्टिकल 371 ए नागालैंड, आर्टिकल 371 बी असम, आर्टिकल 371 सी मणिपुर, आर्टिकल 371 एफ सिक्किम और आर्टिकल 371जी मिज़ोरम, इतने स्टेट हैं, वर्तमान गृहमंत्री को केवल जम्मू-कश्मीर का ही आर्टिकल 370 और आर्टिकल 35 ए ही नजऱ आ रहा है। बदलाव करना है, तो सब में करो, दिक्कत क्या है। एक और तर्क ये कि नागालैंड को अलग संविधान, अलग झंडा और विशेष अधिकार आपकी सरकार ने ही दिया है न, तो फिर ये तो दोगलापन ही हुआ न। बदलाव हो रहा है, तो सब में करो।
बहरहाल, अब जब कि सरकार फैसला कर ही चुकी है, तो अब चिंता इस बात की है कि कहीं फोर्स हटाने पर बवाल न हो जाए। फैसले से पहले पूरे कश्मीर को कैद में करने से ही ये जाहिर है कि सरकार को भी उत्पात होने की आशंका है।
रहा सवाल पूर्व सीएम फारुख अब्दुल्ला व महबूबा मुफ्ती के वजूद का तो वह भी अधर में है। आजाद होने पर उनका रुख क्या होगा, कुछ पता नहीं।
कुल जमा बात ये है कि भले ही ताजा फैसले से भाजपा के एजेंडे का एक वादा पूरा हो गया हो, मगर जिस प्रकार मोदी वादी इस मामले में बढ़-चढ़ कर अंटशंट टिप्पणियां कर रहे हैं, उससे माहौल बिगड़ेगा ही।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

सोमवार, जुलाई 15, 2019

क्या भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत का सपना कभी साकार हो पाएगा?

यह एक सर्वविदित सत्य है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल के आखिरी दिनों तक जब प्रमुख विपक्षी दल भाजपा अपनी भूमिका में पूरी तरह से नाकामयाब रहा, तब समाजसेवी अन्ना हजारे का आंदोलन खड़ा हुआ। वह इतना प्रचंड था कि कांग्रेस की जड़ें ही हिला कर रख दीं। अन्ना हजारे की गलती ये थी कि वे व्यवस्था परिवर्तन की जमीन तो बनाने में कामयाब हो गए, मगर उसका विकल्प नहीं दे पाए। अर्थात वैकल्पिक राजनीतिक दल नहीं दे पाए। नतीजतन उनके ही शिष्य अरविंद केजरीवाल को उनसे अलग हो कर नया दल आम आदमी पार्टी का गठन करना पड़ा।  मगर चूंकि वह भ्रूण अवस्था में था, इस कारण खाली जमीन पर भाजपा को कब्जा करने का मौका मिल गया। वह भी तब जबकि उसने नरेन्द्र मोदी को एक ब्रांड के रूप में खड़ा किया। ब्रांडिंग के अपने किस्म के भारत में हुए इस अनूठे व पहले प्रयोग को जबरदस्त कामयाबी मिली और कांग्रेस के खिलाफ आंदोलित हुई जनता ने कांग्रेस मुक्त भारत के नारे के साथ मोदी को प्रतिष्ठापित कर दिया। मोदी ने प्रयोजित तरीके से पूरी भाजपा पर कब्जा कर लिया और अपने से कई गुना प्रतिष्ठित व वरिष्ठ नेताओं यथा लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी सरीखों को सदा के लिए हाशिये पर डाल दिया। पूरे पांच साल के कार्यकाल को उन्होंने एक तानाशाह की तरह जिया और मंत्रीमंडल के अपने समकक्ष सहयोगियों अरुण जेठली, राजनाथ सिंह व सुषमा स्वराज सरीखे नेताओं को दबा कर रखा।
पांच साल तक नोटबंदी व जीएसटी जैसे पूरी तरह से नाकायाब कदमों और महंगाई, रोजगार व धारा 370 जैसे मुद्दों पर रत्तीभर की सफलता हासिल न कर पाने के कारण ऐसा लगने लगा कि मोदी ब्रांड की जीवन अवधि बस पांच साल ही थी। इसके संकेत कुछ विधानसभाओं के चुनाव में भाजपा की हार से मिल रहे थे। मगर चुनाव के नजदीक आते ही संयोग से उन्हें सर्जिकल स्ट्राइक करने का मौका मिल गया और यकायक उपजे नए राष्ट्रवाद ने मोदी की सारी विफलताओं पर चादर डाल दी। चुनाव आयोग सहित अन्य प्रमुख सवैंधानिक संस्थाओं को कमजोर कर उन्होंने बड़ी आसानी ने पहले से भी ज्यादा बहुमत से सत्ता अपने शिकंजे में ली ली। उन्होंने न केवल उत्तर प्रदेश में महागठबंध को धाराशायी कर दिया, अपितु पश्चिम बंगाल में धमाकेदार एंट्री भी की। यहां तक कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी पुश्तैनी सीट तक को नहीं बचा पाए। हार की जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया। ये पंक्तियां लिखे जाने तक गांधी-नेहरू परिवार से बाहर के नए अध्यक्ष को लेकर उहापोह दिखाई दे रही है। ऐसे में भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत का नारा कामयाब होता दिखाई दे रहा है। गोवा व कर्नाटक में हुई उठापटक उसी दिशा में बढ़ते कदम हैं। यहां तक कि राजस्थान व मध्यप्रदेश की बारी आने के दावे किए जा रहे हैं।
इन सब के बावजूद यदि ये कहा जाए कि कांग्रेस मुक्त भारत का सपना कभी साकार नहीं हो पाएगा, वह अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकता है, मगर यह एक सच्चाई है। कोई माने या न माने। हां, प्रयोग के बतौर गांधी-नेहरू परिवार मुक्त कांग्रेस जरूर बनाई जा सकती है, मगर पलेगी वह इसी परिवार के आश्रय में। रहा सवाल कांग्रेस मुक्त भारत का तो वह इसीलिए संभव नहीं है, क्योंकि कांग्रेस महज एक पार्टी नहीं, वह एक विचारधारा है। धर्मनिरपेक्षता की। ठीक वैसे ही जैसे मोदी एक आइकन हैं, मगर उनकी पृष्ठभूमि को ताकत हिंदूवाद की विचारधारा से मिलती है। हिंदूवाद जिंदा रहेगा, और भी बढ़ सकता है, मगर साथ ही धर्मनिरपेक्षता भी सदा जिंदा रहेगी। और सच तो ये है कि देश का आम आदमी लिबरल है। देश में अस्सी फीसदी हिंदुओं के बावजूद हिंदूवाद की झंडाबरदार भाजपा को अपेक्षित कामयाबी इस कारण नहीं मिल पाती, चूंकि हिंदुओं का एक बड़ा तबका धर्मनिरपेक्षता में यकीन रखता है। इसके साथ ही हिंदू जातिवाद व क्षेत्रवाद में भी बंटा हुआ है।  पाकिस्तान के प्रति सहज नफरत के चलते उपजाया गया तथाकथित राष्ट्रवाद उसे प्रभावित तो करता है, नतीजतन भाजपा को 303 सीटें मिल जाती हैं, मगर फिर भी वह धार्मिक रूप से कट्टर नहीं है। कभी उफनता भी है तो फिर शांत भी हो जाता है, जैसे पानी को कितना भी गरम किया जाए, सामान्य होते ही शीतल हो जाता है। अकेली इसी फितरत की वजह से उग्र हिंदूवाद को लंबे समय तक जिंदा रखना आसान नहीं है। ऐसे में धर्मनिरपेक्षता सदा कायम रहने वाली है। भले ही कांग्रेस कमजोर हो जाए, मगर विचारधारा के नाम पर कांग्रेस का वजूद बना रहेगा। अगर कांग्रेस किसी दिन खत्म होने की कल्पना कर भी ली जाए, तब भी धर्मनिरपेक्षता किसी और नाम से जिंदा रहेगी, उसे खत्म करने की किसी में ताकत नहीं है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

बुधवार, जुलाई 10, 2019

मीडिया अब भी हमलावर है कांग्रेस पर

हमने पत्रकारिता में देखा है कि आमतौर पर मीडिया व्यवस्था में व्याप्त खामियों को ही टारगेट करता था। सरकार चाहे कांग्रेस व कांग्रेस नीत गठबंधन की या भाजपा नीत गठबंधन की, खबरें सरकार के खिलाफ ही बनती थीं। वह उचित भी था। यहां तक कि यदि विपक्ष कहीं कमजोर होता था तो भी मीडिया लोकतंत्र में चौथे स्तम्भ के नाते अपनी भूमिका अदा करता था। आपको ख्याल होगा कि जेपी आंदोलन व वीपी सिंह की मुहिम में भी मीडिया सरकार के खिलाफ साथ दे रहा था। जब मनमोहन सिंह का दूसरा कार्यकाल अंतिम चरण में था, और भाजपा विपक्ष की भूमिका ठीक से नहीं निभा पाया तो अन्ना आंदोलन को मीडिया ने भरपूर समर्थन दिया। मगर लगता है कि अब सारा परिदृश्य बदल गया है।
नरेन्द्र मोदी के पिछले कार्यकाल में लगभग सारा मीडिया उनका पिछलग्गू हो गया था। विपक्ष में होते हुए भी जब-तब कांग्रेस ही निशाने पर रहती थी। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले और चुनाव प्रचार के दौरान तो मीडिया बाकायदा विपक्ष में बैठी कांग्रेस पर प्रयोजनार्थ हमलावर था ही, नरेन्द्र मोदी को दूसरी बार मिली प्रचंड जीत के बाद भी उसका निशाना कांग्रेस ही है। न तो उसे तब पुरानी मोदी सरकार के कामकाज की फिक्र थी और न ही नई मोदी सरकार की दिशा व दशा की परवाह है। उसे चिंता है तो इस बात की कि कांग्रेस का क्या हो रहा है? राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा क्यों दिया? पहले कहा कि सब नौटंकी है, मान-मुनव्वल के बाद मान जाएंगे, अब जब यह साफ हो गया है कि उन्होंने पक्के तौर पर इस्तीफा दे दिया है तो कहा जा रहा कि वे कायर हैं और कांग्रेस को मझदार में छोड़ रहे हैं। या फिर ये कि अगर पद पर नहीं रहे तो भी रिमोट तो उनके ही हाथ में रहेगा। रहेगा तो रहेगा। कोई क्या कर सकता है? अगर कांग्रेसी अप्रत्यक्ष रूप से कमान उनके ही हाथों में रखना चाहते हैं तो इसमें किसी का क्या लेना-देना होना चाहिए। कुल मिला कर बार-बार राहुल गांधी का पोस्टमार्टम किए जा रहा है। कभी कभी तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह राहुल को हर दम के लिए कुचल देना चाहता है। मोदी तो कांग्रेस मुक्त भारत की बात करते रहे हैं, जबकि टीवी एंकरों का सारा जोर इसी बात है कि कांग्रेस गांधी-नेहरू परिवार मुक्त हो जाए। एक यू ट्यूब चैनल के प्रतिष्ठित एंकर तो कल्पना की पराकाष्ठा पर जा कर इस पर बहस करते दिखाई दिए कि अगर वाकई राहुल ने पूरी तौर से कमान छोड़ दी तो कांग्रेस नष्ट हो जाएगी।
मीडिया के रवैये को देखना हो तो खोल लीजिए न्यूज चैनल। अधिसंख्य टीवी एंकर कांग्रेसी प्रवक्ताओं अथवा कांग्रेसी पक्षधरों के कपड़े ऐसे फाड़ते हैं, मानो घर में लड़ कर आए हों। साफ दिखाई देता है कि वे भाजपा के प्रति सॉफ्ट हैं, जबकि कांग्रेस के प्रति सख्त। कई टीवी एंकर कांग्रेस प्रवक्ताओं पर ऐसे झपटते हैं, मानो भाजपा प्रवक्ताओं की भूमिका में हों। और ढ़ीठ भी इतने हैं कि कांग्रेस प्रवक्ता उन पर बहस के दौरान खुला आरोप लगाते हैं कि आप ही काफी हो, भाजपा वालों को काहे बुलाते हो।
इलैक्ट्रॉनिक मीडिया भाजपा के प्रति कितना नरम है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पर्दे के पीछे भाजपा की भूमिका की चर्चा करने की बजाय कांग्रेस की रणनीति कमजोरी को ज्यादा उभार रहा है। भाजपा के अश्वमेघ यज्ञ के प्रति उसकी स्वीकारोक्ति इतनी है कि उसे बड़ी सहजता से यह कहने में कत्तई संकोच नहीं होता कि भाजपा का अगला निशाना मध्यप्रदेश व राजस्थान की सरकारें होंगी। वस्तुत: इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की यह हालत इस वजह से है कि एक तो इसका संचालन करने वालों में अधिसंख्य मोदी से प्रभावित हैं और दूसरा ये कि चैनल चलाना इतना महंगा है कि बिना सत्ता के आशीर्वाद के उसे चलाया ही नहीं जा सकता। बस संतोष की बात ये है कि हमारे लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है और सत्ता से प्रताडि़त कुछ दिग्गज पत्रकार जरूर अपने-अपने यू ट्यूब चैनल्स के जरिए दूसरा पक्ष भी खुल कर पेश कर पा रहे हैं।
लब्बोलुआब, मीडिया के इस रूप के आज हम गवाह मात्र हैं, कर कुछ नहीं सकते।
-तेजवानी गिरधर
7742067000