तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

शुक्रवार, अक्तूबर 06, 2017

वसुंधरा को अब समझ आया कि पांच दिन का हफ्ता गलत है

मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे को अपने दूसरे कार्यकाल के आखीर में समझ में आया है कि राज्य सरकार के दफ्तरों में पांच दिन का हफ्ता ठीक नहीं है और छह दिन का हफ्ता किया जाना चाहिए। अजमेर के निकटवर्ती कस्बे में सर्व समाज के प्रतिनिधियों से संवाद करते हुए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने कहा कि सरकारी दफ्तरों में अब जल्द ही सिक्स डे वीक शुरू होगा। उनका कहना था कि मौजूदा समय में पांच दिन का सप्ताह महज चार दिन का रह गया है। हालत ये है कि दफ्तरों में शुक्रवार दोपहर से सोमवार दोपहर तक ज्यादातर कर्मचारी नहीं मिलते। इससे जनता को परेशानी का सामना करना पड़ता है।
यहां उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने अपने पिछले कार्यकाल में सरकार के जाते-जाते कर्मचारियों के वोट हासिल करने के लिए पांच दिन का हफ्ता किया था। सच्चाई ये है कि पांच दिन के सप्ताह का फैसला न तो आम जन की राय ले कर किया गया था और न ही इस तरह की मांग कर्मचारी कर रहे थे। बिना किसी मांग के निर्णय को लागू करने से ही स्पष्ट था कि यह एक राजनीतिक फैसला था, जिसका फायदा तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जल्द ही होने जा रहे विधानसभा चुनाव में उठाना चाहती थीं। उन्हें इल्म था कि कर्मचारियों की नाराजगी की वजह से ही पिछली गहलोत सरकार बेहतरीन काम करने के बावजूद धराशायी हो गई थी, इस कारण कर्मचारियों को खुश करके भारी मतों से जीता जा सकता है। हालांकि दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं पाया। असल बात तो ये है कि जब वसुंधरा ने यह फैसला किया, तब खुद कर्मचारी वर्ग भी अचंभित था, क्योंकि उसकी मांग तो थी नहीं। वह समझ ही नहीं पाया कि यह फैसला अच्छा है या बुरा। हालांकि अधिकतर कर्मचारी सैद्धांतिक रूप से इस फैसले से कोई खास प्रसन्न नहीं हुए, मगर कोई भी कर्मचारी संगठन इसका विरोध नहीं कर पाया।
अब जब कि पांच दिन के सप्ताह की व्यवस्था को काफी साल हो गए हैं, यह स्पष्ट हो गया है कि इससे आम लोगों की परेशानी बढ़ी है। पांच दिन का हफ्ता करने की एवज में प्रतिदिन के काम के घंटे बढ़ाने का कोई लाभ नहीं हुआ है। कर्मचारी वही पुराने ढर्ऱे पर ही दफ्तर आते हैं और शाम को भी जल्द ही बस्ता बांध लेते हैं। कलेक्ट्रेट को छोड़ कर अधिकतर विभागों में वही पुराना ढर्ऱा चल रहा है। कलेक्ट्रेट में जरूर कुछ समय की पाबंदी नजर आती है, क्योंकि वहां पर राजनीतिज्ञों, सामाजिक संगठनों व मीडिया की नजर रहती है। आम जनता के मानस में भी आज तक सुबह दस से पांच बजे का समय ही अंकित है और वह दफ्तरों में इसी दौरान पहुंचती है। कोई इक्का-दुक्का ही होता है, जो कि सुबह साढ़े नौ बजे या शाम पांच के बाद छह बजे के दरम्यान पहुंचता है। यानि कि काम के जो घंटे बढ़ाए गए, उसका तो कोई मतलब ही नहीं निकला। बहुत जल्द ही उच्च अधिकारियों को यह समझ में आ गया था कि छह दिन का हफ्ता ही ठीक था। इस बात को जानते हुए उच्च स्तर पर कवायद शुरू तो हुई और कर्मचारी नेताओं से भी चर्चा की गई, मगर यह सब अंदर ही अंदर चलता रहा। मगर हुआ कुछ नहीं।
बहरहाल, यदि तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो केन्द्र सरकार के दफ्तरों में बेहतर काम हो ही रहा है। पांच दिन डट कर काम होता है और दो दिन मौज-मस्ती। मगर केन्द्र व राज्य सरकार के दफ्तरों के कर्मचारियों का मिजाज अलग है। केन्द्रीय कर्मचारी लंबे अरसे से उसी हिसाब ढले हुए हैं, जबकि राज्य कर्मचारी अपने आपको उस हिसाब से ढाल नहीं पाए। वे दो दिन तो पूरी मौज-मस्ती करते हैं, मगर बाकी पांच दिन डट कर काम नहीं करते। कई कर्मचारी तो ऐसे भी हैं कि लगातार दो दिन तक छुट्टी के कारण बोर हो जाते हैं। दूसरा अहम सवाल ये भी है कि राज्य सरकार के अधीन जो विभाग हैं, उनसे आम लोगों का सीधा वास्ता ज्यादा पड़ता है। इस कारण हफ्ते में दो दिन छुट्टी होने पर परेशानी होती है। यह परेशानी इस कारण भी बढ़ जाती है कि कई कर्मचारी छुट्टी के इन दो दिनों के साथ अन्य किसी सरकारी छुट्टी को मिला कर आगे-पीछे एक-दो दिन की छुट्टी ले लेते हैं और नतीजा ये रहता है कि उनके पास जिस सीट का चार्ज होता है, उसका काम ठप हो जाता है। अन्य कर्मचारी यह कह कर जनता को टरका देते हैं कि इस सीट का कर्मचारी जब आए तो उससे मिल लेना। यानि कि काम की रफ्तार काफी प्रभावित होती है।
खैर, अपने दूसरे कार्यकाल में चुनाव से करीब एक साल पहले वसुंधरा को समझ आ गया है कि सिक्स डे वीक किया जाना चाहिए। देखते हैं, वे ये निर्णय कर लेती हैं और इसकी प्रतिध्वनि क्या होती है?
-तेजवानी गिरधर
7742067000

गुरुवार, अक्तूबर 05, 2017

कांग्रेस के हमले तेज, मोदी का बचाव करने में जुटे समर्थक

-तेजवानी गिरधर-
ऐसा देखा जा रहा है कि पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर कांग्रेस के हमले काफी तेज हो गए हैं। बेशक ये आईटी सेल का ही काम होगा। इसके अतिरिक्त भद्दी टिप्पणियां भी खूब शेयर की जा रही हैं। इन हमलों की तीव्रता ठीक उतनी ही है, जितनी पहले भाजपाइयों के सोनिया गांधी व राहुल गांधी पर हमलों में हुआ करती थी। मोदी की एक-एक हरकत का छिद्रान्वेषण किया जा रहा है। ऐसे में मोदी समर्थक यकायक रक्षात्मक मुद्रा में आने लगे हैं। हालांकि मोदी का आईटी सेल भी कांग्रेस पर हमले जारी रखे हुए हैं, मगर अब मोदी का बचाव करने पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी समर्थक तनिक चिंतित हैं कि कांग्रेस की रणनीति ठीक उसी तरह से काम न कर जाए, जैसी उन्होंने मोदी की ब्रांडिंग करते वक्त अपनाई थी। मोदी का बचाव करते वक्त कई बार तर्कविहीन बातें भी कही जा रही हैं।
पेट्रोल के भावों में आई ताजा तेजी को ही लीजिए। मीडिया में यह स्पष्ट हो चुका है कि विश्व बाजार में क्रूड ऑइल की कीमत काफी घटी है, फिर भी भारत वासियों को बहुत महंगा पेट्रोल लेना पड़ रहा है। इसके लिए पेट्रोल को जीएसटी से बाहर रखने का तर्क दिया जा रहा है। हालांकि इसकी सटीक काट नहीं है, फिर भी जो तर्क दिया जा रहा है, उससे समझा जा सकता है कि उसमें कितना दम है। एक बानगी देखिए:-
तीस रुपए का पेट्रोल सरकार सत्तर में क्यों बेच रही है, ऐसा पूछने वाले एक बार ये भी तो पूछें कि 16 रुपए में गेहूं खरीद कर सरकार दो रुपए में क्यो बेचती है? पचास रुपए का केरोसिन पंद्रह में क्यों बेचती है? चालीस की शक्कर छब्बीस में क्यों बेचती है? पच्चीस का चावल खरीद कर एक रुपए में क्यों बेचती है? लाखों रुपये टीचरों को तनख्वाह देकर बच्चों को मुफ्त क्यों पढ़वाती है? 6 करोड़ शौचालय मुफ्त में क्यों बनवाती है? 3 करोड़ गैस चूल्हे मुफ्त में क्यों बाटती है?
सवाल ये उठता है कि इस प्रकार की सारी सुविधाएं पहले भी थीं, तब पेट्रोल के भाव तनिक बढऩे पर आसमान सिर पर क्यों उठाया जाता था?
मोदी के प्रति हमदर्दी लिए एक टिप्पण देखिए:-
गुजरात के मोहनदास करमचन्द गांधी राष्ट्र के पिता हो सकते हैं...! जवाहर लाल नेहरू सबके चाचा हो सकते हैं...! मायावती सबकी बहन हो सकती है...! ममता बनर्जी सबकी दीदी हो सकती हैं...! जयललिता सबकी अम्मा हो सकती हैं...! सोनिया गांधी देश की बहू हो सकती है...! केवल नरेंद्र मोदी इस देश का बेटा नहीं हो सकता...!! इतनी नफरत क्यों है भाई?
बढ़ती महंगाई के जवाब में तल्खी देखिए-दिक्कत यह नहीं है कि दाल महंगी हो गयी है...! दिक्कत यह है कि किसी की गल नहीं रही है।
मोदी के बचाव का एक और नमूना देखिए:-
आजकल सोशल मीडिया पर अनेक मैसेज चल रहे हैं कि मोदी ने महंगाई बढ़ा रखी है, व्यापार में दिक्कत है, इन्कम रिटर्न भरने में दिक्कत है वगैरह वगैरह। मित्रों, ये सब कांग्रेस द्वारा फैलाए जा रहे हैं। रही मोदी की दुकान बंद कराने की बात, तो आपको यह पता है कि मोदी जी की उम्र अब 67 वर्ष है और उनके पीछे न परिवार है और न ही  बीवी-बच्चे। उन्होंने जिंदगी में जो पाना था वो पा लिया है। अब अगर आप वोट नहीं भी देंगे और वो हार भी जाएंगे, तब भी वो पूर्व प्रधानमंत्री कहलाएंगे, आजीवन दिल्ली में घर, गाड़ी, पेंशन, एसपीजी सुरक्षा, कार्यालय मिलता रहेगा। दस-पंद्रह साल जीकर चले जाएंगे। लेकिन आप क्या करेंगे जब कांग्रेस और आम आदमी पार्टी  इस देश का इस्लामीकरण और ईसाईकरण करने में लगी हुई हैं। रोहिंग्याओं को बसाएगी, अंधी लूट करेगी, हर साल लाखों करोड़ों के  घोटाले करेंगी, हिंदुओं के खिलाफ कानून बनेंगे और आतंकवादी सरकारी मेहमान बनेंगे?
मोदी जी तो संतोष के साथ मरेंगे कि मैंने एक कोशिश तो की अपना देश बचाने की, लेकिन आप लोग तो हर दिन मरेंगे, और अंतिम सांस कैसे लेंगे? जो गलती आपने अटल जी को हरा कर करी थी, वो गलती आप दोबारा न करें।
मोदी के बचाव में कट्टर हिंदूवाद का सहारा भी लिया जा रहा है। देखिए- अटल सरकार की तरह मोदी सरकार का पेट मत चीरो मेरे हिन्दू भाइयों। एक बात गांठ बांध के रख लो कि मोदी ही हम हिन्दुओं की आखिरी उम्मीद  बच गए हैं। बात थोड़ी कड़वी है पर कहावत है कि कुत्तों को घी हजम नहीं होता और सूअरों को बढिय़ा पकवान अच्छे नहीं लगते। अगली बार मोदी नहीं आए तो ये सारे सेक्युलर की खाल में बैठे जेहादी मिल के हम हिन्दुओं का ऐसा हश्र करेंगे कि आने वाले पीढिय़ां अपनी बर्बादी पर आंसू बहायेंगी। फिर किसी मोदी जैसे हिन्दुवादी देश-भक्त को दिल्ली तक पहुंचने का सपना देखने में भी डर लगेगा। याद रहे जब तक मुर्गी जिंदा रहेगी तब तक ही अंडे देगी। अटल जी की तरह उसका भी पेट चीर दोगे तो फिर लड़ते रहना इन टोपी वालों से जिंदगी भर।
हे मोदी का विरोध करने वाले हिन्दुओं, आपके असहयोग और अंधविरोध की वजह से अगर सच में मोदी जी का कुछ अनिष्ट हो गया तो आप सभी खून के आंसू रोओगे। हिन्दू घरों की बहन-बेटियां लव-जिहाद की भेंट चढ़ जाएंगी और भारत को पाकिस्तान और अफगानिस्तान बनते देर नहीं लगेगी। 
कुल मिला कर ऐसी टिप्पणियां ये आभास करवाती हैं कि काला धन, महंगाई, बेराजगारी आदि को लेकर किए गए वादे पूरे न होने से फीके हो रहे मोदी ब्रांड का बचाव करने के लिए ही इस तरह के तर्क काम में लिए जा रहे हैं।

शुक्रवार, सितंबर 29, 2017

क्या यशवंत सिन्हा का बयान मात्र कुंठा है?

हाल ही जब भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने आर्थिक हालात को लेकर एक डरावनी तस्वीर पेश की है, उसको लेकर  सरकार व भाजपा हाईकमान में खलबली मच गई है। विपक्षी अगर आरोप लगाए, जो कि लगाया भी जा रहा है तो उसमें यही माना जाता है कि उसने तो विरोध मात्र के लिए ऐसा किया है, मगर यदि अपनी ही पार्टी का कोई बड़ा नेता सरकार की नीति के खिलाफ बोलता है तो गंभीर होना स्वाभाविक ही है। विशेष रूप से तब जबकि वह आर्थिक मामलों का गहन जानकार हो। निश्चित रूप से सिन्हा के बयान से सरकार दुविधा में आई है, मगर सरकार व भाजपा के पैरोकारों का मानना है कि सिन्हा के बयान में उनकी खीझ और कुंठा अधिक दिख रही है। वे मानते हैं कि उनका इरादा आर्थिक स्थिति की समीक्षा करना कम, वित्त मंत्री अरुण जेटली के खिलाफ भड़ास निकालने का अधिक था।
इस तर्क को मान भी लिया जाए तो सिन्हा ने जो कुछ कहा है, उसे सिरे से भी नहीं नकारा जा सकता। आखिरकार वे भी वित्त मंत्री व आर्थिक मामलों के जानकार रहे हैं। केवल खीज निकालने मात्र के लिए हवाई अथवा अतथ्यात्मक बात नहीं कर सकते। जनता तो सब समझ रही है, क्योंकि वह भोग रही है, मगर वे कुंठा निकालने मात्र के लिए अपनी प्रतिष्ठा को दाव पर नहीं लगा सकते। अगर उनका मकसद केवल वित्त मंत्री को विफल बताना है, तो भी ऐसे ही तर्कों का सहारा लेंगे न, जो कि आसानी से गले उतर जाएं।
यूं भी यह कोई रहस्य नहीं कि जीडीपी में गिरावट दर्ज की गई है और जीएसटी पर अमल के बाद आर्थिक सुस्ती का माहौल बना है। यह पहले से स्पष्ट था भी कि जीएसटी पर अमल के दौरान बाधाएं आएंगी और उसका कुछ न कुछ असर आर्थिक-व्यापारिक गतिविधियों पर पड़ेगा। यह भी पहले से स्पष्ट था कि नोटबंदी का कुछ न कुछ विपरीत असर जीडीपी के आंकड़ों पर दिखेगा। इस परिपेक्ष में भी सिन्हा का बयान उचित प्रतीत होता है।
इसमें कोई दोराय नहीं कि कालेधन की अर्थव्यवस्था पर लगाम लगाने और कर व्यवस्था में सुधार करने की जरूरत के तहत ही नोटबंदी व जीएसटी के प्रयोग किए गए, इसको लेकर सरकार पर सवाल खड़े नहीं किए जा सकते, मगर पुख्ता बंदोबस्त किए बिना ही जल्दबाजी में लागू किए जाने के कारण समस्याएं उत्पन्न हुई है। हुआ ये कि पहले तो बिना सोचे समझे नोटबंदी लागू की, जिससे बाजार का हाल बेहाल हो गया, फिर यकायक जीएसटी भी लागू कर दी, नतीजा ये हुआ कि बाजार संभलता, उससे पहले ही उसे एक और बड़ा झटका लग गया। यह सरकार भी समझ ही रही होगी। विशेष रूप से जीडीपी में गिरावट आने के बाद तो यह स्पष्ट हो ही गया कि त्रुटि हो गई है। हां, भले ही जेटली ने अर्थव्यवस्था को डुबोने के लिए ऐसा सायास नहीं किया हो, जैसा कि सिन्हा के बयान में कहा गया है, मगर इतना तो तय है कि गलत कदम का नुकसान देश भुगत रहा है।
 यदि यह मान भी लिया जाए कि टैक्स देने वालों की संख्या बढ़ी है, सब्सिडी का दुरुपयोग रुका है और वित्तीय समावेशन का दायरा बढ़ा है, मगर दूसरी ओर आर्थिक हालात बिगड़े हैं, इसे नकारा नहीं जा सकता। सिन्हा का बयान कुंठा मान कर यदि सरकार आंख मूंदने की कोशिश करती है तो यह एक और बड़ी गलती होगी।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

मंगलवार, सितंबर 26, 2017

बंपर बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज भाजपा की जमीन खिसकी

किसी भी सरकार के कामकाज की समीक्षा के लिए उसका तीन साल का कार्यकाल पर्याप्त होता है। केन्द्र में स्पष्ट बहुमत व राज्य में बंपर बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज भाजपा सरकारों के तीन-तीन साल पर खुफिया व मीडिया में आ रही रिपोर्टों में इस बात के साफ संकेत सामने आ रहे हैं कि  भाजपा का ग्राफ काफी नीचे गिरा है। हालात इतने बदले बताए जा रहे हैं कि दोनों जगह भाजपा का सत्ता में लौटना कठिन हो जाएगा। इतना ही नहीं खुद भाजपा के ही मातृ संगठन आरएसएस के फीडबैक व इंटरनल सर्वे तक में कहा जा रहा है कि 2019 के आम चुनाव में भाजपा की हालत खस्ता हो सकती है।
अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ में छपी रिपोर्ट के अनुसार संघ ने ज्वलंत मुद्दों पर जो फीडबैक लिया है, उससे जाहिर होता है कि आम लोगों में घोर निराशा है। विशेष रूप से नोटबंदी और उसके बाद जीएसटी की वजह से माहौल खराब हुआ है। यहां तक कि भाजपा मानसिकता का व्यापारी वर्ग भी त्रस्त है और अपनी पीड़ा कानाफूसी के जरिए व्यक्त कर रहा है। जिस काले धन को लेकर नरेन्द्र मोदी ने हल्ला मचा कर सत्ता पर कब्जा किया, उसको लेकर जनता में गहरा रोष है। नोटबंदी के बाद भी जब काला धन सामने नहीं आया तो जनता ठगा सा महसूस कर रही है। सोशल मीडिया पर कांग्रेस के हमले तेज हो गए हैं। जितनी तीखी व तल्ख टिप्पणियां पहले सोनिया गांधी, राहुल गांधी व मनमोहन सिंह के बारे में देखने को मिलती थीं, ठीक वैसी ही अब मोदी के बारे में आ रही हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस ने भी भाजपा की तरह अपना आईटी सेल काफी मजबूत कर लिया है। ऐसा कोई मुद्दा नहीं होता, जिस पर कांग्रेस हमला करने से चुकती हो। यहां तक कि आम तौर पर भाजपा के पक्ष में लिखने वाले ब्लागरों का सुर भी अब बदलने लगा है। ऐसे में जनता के बीच जाने वाले निचले स्तर के भाजपा नेताओं को बहुत परेशानी होती है। उनसे सवालों के जवाब देते नहीं बनता।
अब तो मीडिया रिपोर्टें भी इस बात की ताईद कर रही हैं कि भाजपा की लोकप्रियता कम हुई है। राजस्थान के संदर्भ में बात करें तो जितनी अपेक्षा के साथ जनता के भाजपा को सत्ता सौंपी, उसके अनुरूप कुछ भी नहीं हुआ है। धरातल पर न तो भ्रष्टाचार कम हुआ है और न ही जनता को कोई राहत मिली है। भाजपा हाईकमान के साये में काम रही मुख्यमंत्री वसुंधरा का चेहरा भी चमक खोने लगा है। उनके खाते में एक भी बड़ी उपलब्धि नहीं है। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार भाजपा के 163 विधायकों मेें से करीब एक सौ विधायकों का परफोरमेंस खराब है, जिसका भाजपा को नुकसान उठाना पड़ेगा। कानून-व्यवस्था तो बिगड़ी ही है, मगर जनता पर ज्यादा असर महंगाई का है। मोदी के सत्ता में आने पर जनता को जो उम्मीद थी, वह तो पूरी हुई नहीं, बल्कि उसके विपरीत महंगाई और बढ़ रही है। पेट्रोल के दाम अस्सी रुपए प्रति लीटर तक पहुंचने के बाद तो आम जन की कमर ही टूट गई है। ऐसा माना जा रहा है कि इन सब केलिए जनता केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियों को जिम्मेदार मान रही है।
ऐसा प्रतीत होता है कि जिस प्रकार पिछली बार केन्द्र की कांग्रेस नीत सरकार के खिलाफ अन्ना हजारे द्वारा बनाए गए माहौल के चलते राज्य में कांग्रेस की सरकार गई, ठीक वैसे ही मोदी की नीतियां राज्य में भाजपा के लिए मुश्किल पैदा करने वाली हैं। पहले भाजपा के पास राज्य में वसुंधरा का चेहरा था, मगर अब वह कामयाब होता नहीं दिखाई दे रहा है। अब केवल मोदी ब्रांड पर ही भाजपा की आस टिकी है, वह भी पहले की तुलना काफी फीका हो गया है। जो कुछ भी हो, इतना तो तय है कि पहले की तरह इस बार मोदी लहर की कोई उम्मीद नहीं है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

शनिवार, सितंबर 16, 2017

मोदी के साम, दाम, दंड, भेद को जस्टीफाई किया जा रहा है

एक समय में पार्टी विथ द डिफ्रेंस का तमगा लगाने वाली भाजपा जब से अपनी रीति-नीति बदल कर सत्ता में आई है, उसके कार्यकर्ताओं को लग तो ये रहा है कि अब वे उस पार्टी के नहीं रहे हैं, जिसकी वे दुहाई दिया करते थे। वे सब समझ रहे हैं कि जिन बातों को लेकर वे कांग्रेस की आलोचना करते नहीं थकते थे, आज वही बातें खुद की पार्टी में हो रही हैं, मगर उन्हें लगता है कि सत्ता में बने रहने का यही फंडा है। यहां तक कि कांग्रेस मुक्त  भारत का नारा देने वाले अपनी ही पार्टी को कांग्रेस युक्त होता देख रहे हैं तो उन्हें उसमें कुछ भी गलत नजर नहीं आता। स्वभाविक रूप से अब जबकि भाजपा निशाने पर है तो उसके कार्यकर्ताओं को लगता है कि बचाव का एक मात्र तरीका यही है कि मौजूदा रीति-नीति को जस्टीफाई किया जाए। ढ़ीठ हो लिया जाए।
एक बानगी देखिए:-
जब तक भाजपा वाजपेयी जी जैसों की विचारधारा पर चलती रही, वो राम के बताये मार्ग पर चलती रही। मर्यादा, नैतिकता, शुचिता इनके लिए कड़े मापदंड तय किये गये थे, परन्तु आज तक कभी भी पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर सकी। मात्र एक लाख रुपये लेने पर भाजपा ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्षमण को हटाने में तनिक भी विलंब नहीं किया, परन्तु चुनावों में नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात...। ताबूत घोटाले के आरोप पर जार्ज फर्नांडिस का इस्तीफा, परन्तु चुनावों में नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात...। कर्नाटक में येदियुरप्पा पर भ्रष्ट्राचार के आरोप लगते ही येदियुरप्पा को भाजपा ने निष्कासित करने में कोई विलंब नहीं किया, परन्तु चुनावों में नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात...। आखिरकार मोदी के कार्यकाल वाली भाजपा ने अपनी नीति बदल दी और अब साम, दाम, दंड, भेद वाली नीति अपना कर सत्ता पर काबिज है। काबिज ही नहीं है, तोड़-फोड़ कर लगातार विस्तार करती जा रही है।
जो भाजपा भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस को पानी पी पी कर कोसती थी,  उसी के कार्यकर्ता अब नई भाजपा को यह कह कर जस्टीफाई कर रहे हैं कि हमारी रंगों में पूर्ववर्ती सरकारों ने ऐसे भ्रष्टाचार के वायरस डाल दिये हैं कि हम स्वयं भ्रष्ट हो गये हैं। हमें जहां मौका मिलता है, हम भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने से नहीं चूकते हैं। पुलिस का चालान हो, या सरकारी विभागों में काम हो, हम कुछ ले देकर अपने काम को निपटाने में ही यकीन रखते हैं।
भाजपा के नए अवतार पर एक कार्यकर्ता ने लिखा है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नक्शे कदम पर चलने वाली भाजपा को मोदी कर्मयोगी कृष्ण के राह पर ले आये हैं। कृष्ण अधर्मी को मारने में किसी भी प्रकार की गलती नहीं करते हैं। छल हो तो छल से, कपट हो तो कपट से, अनीति हो तो अनीति से। अधर्मी को नष्ट करना ही उनका ध्येय होता है। इसलिए वो अर्जुन को सिर्फ मछली की आंखों को ही देखने को कहते हैं।
भाजपा कार्यकर्ता की मानसिकता में आए परिवर्तन की बानगी देखिए:-
येदियुरप्पा को फिर से भाजपा में शामिल किया गया, नतीजा लोकसभा चुनावों में सामने है। पीडीपी से गठबंधन करके कम से कम काश्मीर के अंदरूनी हालात से रूबरू तो हो रहे हैं..। कुल मिलाकर सार यह है कि, अभी देश दुश्मनों से घिरा हुआ है, नाना प्रकार के षडयंत्र रचे जा रहे हैं। अभी भी हम नैतिकता को अपने कंधे पर ढ़ोकर नहीं चल सकते हैं। नैतिकता को रखिये ताक पर, और यदि इस देश के बचाना चाहते हैं तो सत्ता अपने पास ही रखना होगा। वो चाहे किसी भी प्रकार से हो। साम दाम दंड भेद, किसी भी प्रकार से.... । बिना सत्ता के आप कुछ भी नहीं कर सकते हैं। इसलिए भाजपा के कार्यकर्ताओं को चाहिए कि कर्ण के अंत करते समय के विलापों पर ध्यान न दें (येदियुरप्पा, पीडीपी, ललित मोदी), सिर्फ ये देखें कि.......अभिमन्यु की हत्या के समय उनकी नैतिकता कहां चली गई थी?
कुल मिला कर भाजपा कार्यकर्ताओं में एक नई सोच जन्म ले रही है, कि सत्ता में रहना है तो उसके लिए कुछ भी करना जायज है। महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी इत्यादि को लेकर आसमान सिर पर उठाने वाले भाजपा कार्यकर्ता इन समस्याओं के पहले से ज्यादा हो जाने पर भी आंख मूंदने को मजबूर हैं, क्योंकि सत्ता पर सवार हैं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

रविवार, सितंबर 10, 2017

क्या केवल बाबा राम रहीम ही जिम्मेदार है?

अपनी ही शिष्या साध्वी के साथ बलात्कार करने के मामले में दोषी ठहराये जाने के बाद हुई हिंसा, आगजनी, तोडफ़ोड़ को लेकर कोर्ट तो सख्त है ही, पूरा मीडिया भी बाबा राम रहीम की जम कर मजम्मत कर रहा है। यह स्वाभाविक भी है। धर्म व आस्था की आड़ में यौन शोषण कोई निराधम प्राणी ही कर सकता है, जिसकी जितनी निंदा की जाए कम है। इस घटना के कारण एक ओर जहां इसी किस्म के बाबाओं को लानत दी जा रही है, वहीं देश की राजनीति, धर्म और हमारी सामाजिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
सबसे पहले बात राजनीति की। इस घटना के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में कहा कि आस्था के नाम पर हिंसा को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसी पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। यह बात ठीक है कि प्रधानमंत्री को ऐसा ही वक्तव्य देना चाहिए, मगर आस्था के नाम पर राजनीति के सहारे पनपने वाले व बाद में राजनीतिज्ञों को ही सहारा देने वाले ऐसे मठ व डेरे क्यों बर्दाश्त किए जा रहे हैं? क्या ये सही नहीं है कि वोटों की खातिर ऐसे बाबाओं को पनपाने में राजनीतिज्ञों का ही हाथ है? बाबा राम रहीम के मामले में तो जानते बूझते हुए भी राजनीतिक संरक्षण दिया जाता रहा। यह हरियाणा सरकार की की नरमी का ही नतीजा रहा कि राम रहीम के समर्थकों को सिरसा, पंचकूला और अन्य शहरों में एकत्रित होने से रोकने के लिए उपयुक्त कदम नहीं उठा सकी। इसके दुष्परिणाम सबके सामने हैं। यदि हम बाबाओं के प्रति अंध भक्ति रखने वालों को दोषी ठहराते हैं तो बाबाओं के मंचों पर जा कर उनकी ब्रांडिंग करने वाले राजनीतिज्ञों को निर्दोष कैसे मान सकते हैं? सच तो ये है कि बाबाओं का सहारा लेने और उन्हें संरक्षण देने के मामले में भाजपा ही सबसे आगे नजर आती है। डेरा समर्थकों की राजनीति में इतना अहमियत उनके वोट के कारण है, जो हार जीत तय कराती है। सिरसा के अलावा हरियाणा के कई जिलों में डेरा का प्रभाव है, जिसका फायदा 2014 के चुनाव में बीजेपी को कई सीटों पर मिला और जीत हासिल हुई। जीत हासिल होने के बाद गुरमीत रामरहीम को धन्यवाद अदा करने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव के साथ बीजेपी के उम्मीदवार सिरसा गए थे। जब सत्ताधारी पार्टी के विधायक और मंत्री किसी संत के आगे माथा टेकता है तो अधिकारियों को क्या सन्देश जाएगा?
वहीं मीडिया जो, आज चिल्ला चिल्ला कर बाबाओं का पोस्टमार्टम कर रहा है, क्या उनका ऐसे बाबाओं को स्थापित करने में मीडिया की भूमिका नहीं है? सोशल मीडिया पर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की जम कर आलोचना हो रही है। एक बानगी देखिए:-
आज हर न्यूज़ चैनल पर दिखाया जा रहा है- बाबा की अय्याशी का अड्डा, गुफा का रहस्य, दत्तक पुत्री का सच इत्यादि। ऐसी कितनी ही कहानियां और गुफा के आभासी वीडियो, जिन्हें दिखा कर लोगों को भ्रमित किया जा रहा है। प्रश्न उठता है कि इतने खोजी मीडिया चैनल अब तक कहां थे? न तो बाबा नया है न ही गुफा रातों-रात बन गई है, फिर ये कैसी पत्रकारिता? जो अब तक सो रही थी, अब बाबा के जेल जाते ही मुखरित होने लगी। इन अवसरवादी चैनलों पर भी जानबूझकर जुर्म छिपाने का आरोप लगना चाहिए।
सोशल मीडिया, जो कि पूरी तरह से स्वच्छंद है, उस पर तो बाबाओं के चक्कर में पडऩे वाली महिलाओं पर भी तंज कसे जा रहे हैं-
बाबा राम रहीम को गालियां दे लो या आशाराम को। उन मूर्ख महिलाओं को भी कुछ बोलो, जो अपने सास, ससुर, घर-परिवार की सेवा को छोड़ कर बाबाओं के चरण दबाती हैं। उन महिलाओं का क्या जो, पति परेमश्वर को छोड़ कर बाबाओं को पूजती हैं, माता-पिता समान सास-ससुर का प्रताडि़त करती हैं? सच तो ये है कि इन बाबाओं की सेवा में लगी महिलाएं अगर दस प्रतिशत भी अपने परिवार की सेवा में मन लगा लें तो उनका जीवन धन्य हो जाए।
बाबाओं के प्रति अंध भक्ति रखने वालों की मूर्खता की भी खूब मजम्मत हो रही है। देखिए- अंधभक्त श्रद्धा से सुनते हैं, वे सोचते नहीं हैं। बाबा जी दौलत के ढ़ेर पर बैठ कर बोलते हैं कि मोह-माया छोड़ दो, लेकिन उत्तराधिकारी अपने बेटे को ही बनायेंगे। भक्तों को लगता है कि उनके सारे मसले बाबा जी हल करते हैं, लेकिन जब बाबा जी मसलों में फंसते हैं, तब बाबा जी बड़े वकीलों की मदद लेते हैं, अंधभक्त बाबा जी के लिये दुखी होते हैं, लेकिन सोचते नहीं हैं। भक्त बीमार होते हैं, डॉक्टर से दवा लेते हैं, मगर बाबाओं के आगे भी सिर झुकाते हैं, जब ठीक हो जाते हैं तो कहते हैं, बाबा जी ने बचा लिया, जबकि बाबा जी बीमार होते हैं तो बड़े डॉक्टरों से महंगे अस्पतालों में इलाज करवाते हैं। अंधभक्त अपने बाबा को भगवान समझते हैं, उनके चमत्कारों की सौ-सौ कहानियां सुनाते हैं, लेकिन जब बाबा किसी अपराध में जेल जाते हैं, तब वे कोई चमत्कार नहीं दिखाते।
एक के बाद एक बाबा के जेल जाने के बाद कुल जमा बात ये सामने आती है कि वे बाबा भले ही सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं, मगर हमारी अंध श्रद्धा और राजनीतिक व्यवस्था भी उतनी ही दोषी है। इस पर गंभीर चिंतन की जरूरत है।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
8094767000

गुरुवार, अगस्त 10, 2017

कोई टपोरी ही श्रीकृष्ण को दुनिया का सबसे बड़ा डॉन बता सकता है

आगामी 15 अगस्त को महायोगी, सर्वगुणसंपन्न भगवान श्रीकृष्ण की जन्माष्ठमी है। उसे मनाने के लिए तैयारियां शुरू हो गई हैं। उसी सिलसिले में  कुछ सिरफिरे एक पोस्ट सोशल मीडिया पर कट-पेस्ट कर रहे हैं।
आइये, पहले वह पोस्ट देख लें:-
15-08-2017 तारीख को  दुनिया के सबसे
बड़े डॉन का बर्थडे है!

कोई ऐसा गुनाह नहीं, जो उन्होंने नहीं किया हो.....
जेल में जन्म.....
मां-बाप की हेराफेरी...
बचपन से लड़कियों का चक्कर.....
नाग देवता को भी मार दिया......
कंकर मार कर लड़कियों को छेडऩा....
16108 लफड़ा........
दो-दो बीवियां......
अपने मामू का मर्डर......
मथुरा से तड़ीपार.......
फिर भी भाई कभी पकड़े नहीं गए...
इसलिए तो उसे मैं भगवान् मानता हूं

जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं
जय श्रीकृष्ण

आप देखिए, भगवान श्रीकृष्ण की जय भी कर रहे हैं, उनके जन्म की शुभकामनाएं भी दे रहे हैं, यानि कि उनके प्रति श्रद्धा भी है, फिर भी कैसी उपमाएं दी हैं? निश्चित ही यह काम किसी टपोरी का है। उसे श्रीकृष्ण की लीलाओं में सांसारिक कृत्य नजर आ रहे हैं। अर्थात जैसा वह है, या होना चाहता है, वैसा ही श्रीकृष्ण को देख रहा है। जैसे हम मानव ईश्वर की कल्पना महामानव के रूप में करते हैं, ठीक वैसे ही टपोरी उसे महाटपोरी मान रहा है। नैतिकता का पतन देखिए कि वह ऐसा कह कर अपने कृकृत्यों को जायज करार दे रहा है। ...कि उसने किया या अब करे तो क्या हुआ, श्रीकृष्ण भी तो ऐसा करते थे। ऐसा भ्रष्ट बुद्धि की वजह से ही हो सकता है। मगर अफसोस जिस महान संस्कृति ही हम दुहाई देते हैं, हमारे जिन महापुरुषों की बदोलत भारत को विश्व गुरू मानते हैं, उसी संस्कृति में ऐसे लोग भी हैं, जो कुसंस्कृत होने का प्रमाण दे रहे हैं। ऐसा नहीं है कि उनकी श्रीकृष्ण के प्रति अश्रद्धा होगी, वे भी श्रीकृष्ण की मूर्ति के आगे वैसे ही नतमस्तक होते होंगे, जैसे आम श्रद्धालु, मगर उन्हें अपने ही भगवान की मजाक बनाने में तनिक भी शर्म नहीं आती। चलो, उनकी श्रद्धा न सही, मगर वे इतने बेखौफ हैं कि उन्हें अन्य की श्रद्धा का भी डर नहीं। ऐसा अन्य धर्मों में नहीं। चाहे मुसलमान हों या ईसाई, बौद्ध हों या जैन, किसी को भी अपने भगवान या ईष्ट के प्रति ऐसी घटिया टिप्पणी करते नहीं देखा होगा। अव्वल तो कोई ऐसा करता ही नहीं, खुदानखास्ता गलती से कर भी दे तो समझो उसकी खैर नहीं। मगर हिंदू धर्म को मानने वालों में ऐसे भ्रष्टबुद्धि लोग मौजूद हैं, जो कि न केवल बेहद शर्मनाक है, अपितु असहनीय है। केवल भगवान श्रीकृष्ण ही क्यों, जिनकी मति मारी हुई है, वे भगवान राम, माता सीता, हनुमान जैसे देवी देवताओं तक पर चुटकले बनाते हैं। राजनीतिक कारणों से महात्मा गांधी पर भी अभद्र टिप्पणियां करने से लोग बाज नहीं आते। और तो और गणेश चतुर्थी, नवरात्र आदि के जुलूस या कावड़ यात्रा के दौरान मद्यपान व अन्य मादक पदार्थों का सेवन किए हुए लोग मिल जाएंगे। आस्था व नैतिकता का यह हृास बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। फिर भी यदि हम फिर विश्व गुरू बनने का ख्वाब देखते हैं तो यह कोरी कल्पना ही है।
ऐसा नहीं कि टपोरियों की पोस्ट को लेकर सज्जन चिंतित नहीं, वे खूब अपील करते हैं कि जन्माष्टमी आ रही है, सभी से विनम्र निवेदन है कि भगवान श्रीकृष्ण के बारे में उलटे-सीधे मेसेज पोस्ट न करें और कोई भी गलत पोस्ट करके धर्म का अपमान न करे, मगर उनकी सुनता कौन है?
-तेजवानी गिरधर
7742067000