तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

रविवार, सितंबर 18, 2016

भक्त होना बुरा नहीं, मगर अंधभक्ति, लानत है

कोई किसी का भक्त हो, तो इसमें कोई बुराई नहीं। भक्ति निजी आस्था का मामला है, उस पर सवाल खड़ा करना ही गलत है, मगर अफसोस तब होता है कि जब कुछ अंध भक्त अपने भगवान के तनिक विपरीत मगर सच्ची टिप्पणी को भी बर्दाश्त नहीं कर पाते और लगते हैं अनर्गल प्रलाप करने। घटिया टिप्पणियां करते हैं। लानत है ऐसे लोगों पर।
दरअसल प्रकरण ये है कि मैने अपने फेसबुक अकाउंट पर एक विडियो शेयर किया, जिसमें इंडिया टीवी के आप की अदालत शो में तत्कालीन मुख्यमंत्री गुजरात और पीएम इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी बड़े ही आत्मविश्वास के साथ कह रहे हैं कि पाक को पाक की भाषा में जवाब देना चाहिए। मैने इस वीडियो के साथ सिर्फ एक पंक्ति लिखी कि ये वे ही मोदी जी हैं, जो पाक को पाक की भाषा में जवाब देने का उपदेश दे रहे हैं, मगर तब वे विपक्ष में थे। इस पर कुछ मोदी भक्त उबल पड़े। लगे मोदी जी के पक्ष में दलील देने। यहां तक कि मेरी अब तक बेदाग रही पत्रकारिता पर सवाल उठाने लगे। मुझे अफसोस हुआ कि मैं कैसे दोस्तों के साथ घिरा हुआ हूं कि उन्हें मोदी जी की अंधभक्ति में सच नजर ही नहीं आता। भला मेरी पत्रकारिता का मोदी जी के दोहरेपन का क्या संबंध?
असल में उरी में हुई आतंकी वारदात की जब पूरा देश निंदा व आलोचना कर रहा है, गुस्से से भरा है और जवाबी कार्यवाही की अपेक्षा में है, तब मोदी जी के चंद अंधभक्त सच्चाई से आंख फेर कर लगे हैं मोदी जी के गुणगान करने में। वस्तुत: ये मुद्दा बहस का है ही नहीं। यदि मोदी जी ने कांग्रेस की कायरतापूर्ण नीति पर हमला करते हुए ये दंभ भरा उपदेश दिया है कि पाक को पाक की भाषा में जवाब देना चाहिए, और ऐसे ही बयानों के दम पर सत्ता हासिल की है तो आज के हालात में उनके इस बयान को याद किया ही जाएगा। उसे स्वीकार करना ही चाहिए। कुछ मोदी भक्त स्वीकार भी कर रहे हैं, मगर कुछ मोदी जी के खिलाफ एक भी शब्द सुनना नहीं चाहते। उलटा, बेसिरपैर की टिप्पणियां कर रहे हैं। मेरी पोस्ट को छोड भी दीजिए, मगर आप सोशल मीडिया पर ऐसी सैकडों पोस्ट देख सकते हैं, जिसमें मोदी जी के भक्त किस प्रकार बकवास कर रहे हैं।
अरे भाई, अगर आपने विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस को कोई उपदेश दिया है और उसी देशभक्ति के नाम पर वोट बटोरे हैं तो आज सत्ता में रहते आपको स्वयं भी उस उपदेश पर चल कर दिखाना ही होगा। पाक को करारा जवाब देना ही होगा। वरना आपको लोग लफ्फाज कहेंगे।
सच तो ये है कि यह विषय भाजपा, कांग्रेस का है ही नहीं। पाकिस्तान यदि बदमाशी कर रहा है तो उसे सबक सिखाया ही जाना चाहिए। इस मुद्दे पर पूरा देश प्रधानमंत्री के साथ खड़ा है। निजी तौर पर किसी को मोदी जी नापसंद भी हो सकते हैं, मगर वे देश के प्रधानमंत्री हैं और बहादुरी का दावा करके बने हैं तो उसी बहादुरी का परिचय देने का यह उचित वक्त है। वैचारिक भिन्नता अलग बात है, मगर देश की खातिर तो सब एक ही हैं।
लीजिए, वह वीडियो भी देख लीजिए, इस लिंक पर:-
https://youtu.be/pxTzEu7Y9ME

-तेजवानी गिरधर
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बुधवार, अगस्त 24, 2016

राम्या देशद्रोही कैसे हो गई?

कन्नड़ अभिनेत्री और कांग्रेस की पूर्व विधायक राम्या के मात्र इतना कहने पर कि पाकिस्तान जहन्नुम नहीं है, उसे देशद्रोही करार देना हद्द दर्जे की गंदी राजनीति व असहिष्णुता की इंतहा है। इस मामले में होना जाना कुछ नहीं है, ये महज शब्द जुगाली है। कुछ लोगों को अपनी देश भक्ति स्थापित करने का मौका मिल जाएगा तो किसी को देशद्रोही करार दिया जाएगा, मगर हम राजनीति की कैसी नौटंकी के दौर में जी रहे हैं, उसे देख-सुन कर आत्म ग्लानि होती है। राजनीति तो राजनीति, इलैक्ट्रॉनिक मीडिया व सोशल मीडिया पर भी सोम्या के बयान को पाकिस्तान प्रेम की संज्ञा दी जाती है तो साफ नजर आता है कि वह भी प्रयोजन विशेष के लिए काम कर रहे हैं। एक जगह तो यह तक लिखा गया कि राम्या ने कन्नड़ फिल्मों में जिस तरह से अपने शरीर का प्रदर्शन किया है, क्या वैसा प्रदर्शन पाकिस्तान की फिल्मों में कर सकती हैं? अफसोस, अगर किसी की आप से मतभिन्नता है तो आप उसके कपड़े तक उतारने को उतारू हो जाएंगे। लानत है ऐसी सोच पर।
इस मसले की बारीक बात ये है कि राम्या ने ऐसे वक्त में यह बयान दिया, जबकि देश के रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर कह चुके थे कि पाकिस्तान तो नरक है। बस यहीं से विवाद शुरू होता है। बेशक पाकिस्तान हमारा दुश्मन पड़ौसी है, इस कारण उसे गाली देना सुखद लगता है, देशप्रेम नजर आता है, ऐसे में अगर आप ये कहेंगे कि वह जहन्नुम नहीं तो वह देशद्रोहिता की श्रेणी में गिना जाता है। मगर इस किस्म की देशद्रोहिता तब कहां चली जाती है, जबकि हमारे ही प्रधानमंत्री व पर्रिकर की पार्टी के नेता नरेन्द्र मोदी अफगानिस्तान से लौटते समय बिना निर्धारित कार्यक्रम के लाहौर जाकर वहां के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की माता के पैर छू आते हैं। अगर पाकिस्तान नरक है तो मोदी को वहां नहीं जाना चाहिए था। साम्या ने तो केवल इतना भर कहा है कि पाकिस्तान नरक नहीं है, उसमें वह देशद्रोही कैसे हो गईï? अगर आप पाकिस्तान से संबंध सुधारने की खातिर बिना किसी सरकारी कार्यक्रम के शिष्टाचार के नाते नवाज शरीफ से प्यार की पीगें बढ़ाते हैं तो वह स्वीकार्य ही नहीं स्वागत योग्य है, क्योंकि वे आपकी पार्टी के नेता हैं और अगर आपकी विरोधी पार्टी की नेता ये कहे कि पाकिस्तान नरक नहीं है तो वह देशद्रोही हो गई?
मुद्दा ये है कि अगर आप वाकई अपने राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हुए पाकिस्तान को नरक बता रहे हैं तो उससे सारे संबंध विच्छेद क्यों नहीं कर लेते? क्यों द्विपक्षीय वार्ताओं के दौर चलाते हैं? और अगर आपका बयान एक निजी राय है तथा कोई अगर उससे अपनी असहमति जताता है तो वह उसका अभिव्यक्ति का वैयक्तिक अधिकार है। आप उसे छीन नहीं सकते हैं, बेशक चूंकि आप सत्ता में हैं तो उसे दंडित करवा सकते हैं, जलील कर सकते हैं।
वस्तुत: यह वक्त वक्त का फेर है। पाकिस्तान से हमारे रिश्ते बदलते रहे हैं। कभी बनते दिखाई देते हैं तो कभी पटरी से पूरी तरह से उतरते नजर आते हैं। कभी दोस्ती की प्रक्रिया शुरू होती है तो कभी एक दूसरे के देश को गाली देकर दोनों देशों के नेता अपनी अपनी जनता के सामने अपनी देशभक्ति स्थापित करना चाहते हैं। इसमें स्थायी कुछ भी नहीं है। इसका ज्वलंत उदाहरण ये है कि दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान प्रदान के करार के तहत कभी पाकिस्तान के जायरीन अजमेर दरगाह शरीफ की जियारत करने आते हैं तो आपकी विचारधारा के नेता सरकारी जलसा करके उनका इस्तकबाल करते हैं और कभी घटना विशेष के कारण संबंधों में तनिक खटास होती है तो आप उनके अजमेर आने का विरोध करने लगते हैं।
कुल जमा बात ये है कि ताजा मसला न तो देश प्रेम का है और न ही देशद्रोह का, यह केवल और केवल राजनीतिक स्टंट है।
-तेजवानी गिरधर
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मंगलवार, अगस्त 23, 2016

भगवान श्रीकृष्ण पर अभद्र टिप्पणियों से आहत व आक्रोषित हैं धर्म प्रेमी

यह एक विंडबना ही कही जाएगी कि जहां एक ओर हिंदू समाज में भगवान श्रीकृष्ण को सर्वगुण संपन्न, चौसठ कला प्रवीण और योगीराज माना जाता है, वहीं दूसरी ओर उनकी जन्माष्ठमी के मौके पर कई छिछोरे उनके बारे में अनर्गल टिप्पणियां और चुटकलेबाजी करते हैं। इसको लेकर धर्मप्रमियों कड़ा को ऐतराज है। एक तरफ मनचले सोशल मीडिया पर उनको लेकर चुटकले शाया कर रहे हैं, तो दूसरी ओर कुछ लोग प्रतिकार में चेतावनी और सुझाव दे रहे हैं कि भगवान श्रीकृष्ण के बारे में अनर्गल टिप्पणियां न करें।
ये बात समझ से बाहर है कि हिंदू समाज में अपने ही आदर्शों व देवी-देवताओं की खिल्ली कैसे उड़ाई जाती है? एक ओर अपने आपको महान सनातन संस्कृति के वाहक मानते हैं तो दूसरी और संस्कारविहीन होते जा रहे हैं। एक ओर देवी-देवताओं के विशेष दिनों, यथा गणेश चतुर्थी, नवरात्री, महाशिवरात्री, श्रीकृष्ण जन्माष्ठमी इत्यादि पर आयोजनों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि लोगों में धार्मिक भावना बढ़ती जा रही है। हर साल गरबों की संख्या बढ़ती जा रही है, नवरात्री पर मूर्ति विसर्जन के आयोजन दिन प्रति दिन बढ़ते जा रहे हैं, गणपति उत्सव के समापन पर गली गली से गणपति विसर्जन की यात्राएं निकलती हैं, शिव रात्री पर शिव मंदिरों पर भीड़ बढ़ती जा रही है। दूसरी ओर धर्म व नैतिकता का निरंतर हृास होता जा रहा है। साथ ही धार्मिक आयोजनों के नाम पर उद्दंडता का तांडव भी देखा जा सकता है। कानफोड़ डीजे की धुन पर नशे में मचलते युवकों को गुलाल में भूत बना देख कर अफसोस होता है। ये कैसा विरोधाभास है? ये कैसी धार्मिकता है? ये कैसी आस्था है? आखिर ऐसा हो क्यों रहा है? समझ से परे है। स्वाभाविक रूप से इसकी पीड़ा हर धार्मिक व्यक्ति को है, जिसका इजहार दिन दिनों सोशल मीडिया में खूब हो रहा है।
एक बानगी देखिए:-
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आने वाली है...
एक मैसेज अभी सोशल मीडिया में चल रहा है, जिसमें प्रभु श्रीकृष्ण को टपोरी, लफड़ेबाज, मर्डरर, तड़ीपार इत्यादि कहा गया है।
अपने देवताओं को टपोरी बिलकुल भी ना कहें।
कृष्ण जी ने नाग देवता को नहीं बल्कि लोगों के प्राण लेने वाले उस दुष्ट हत्यारे कालिया नाग का मर्दन किया था, जिसके भय से लोगों ने यमुना नदी में जाना बन्द कर दिया था।
कंकड़ मार कर लड़कियां नहीं छेड़ते थे, अपितु दुष्ट कंस के यहां होने वाली मक्खन की जबरन वसूली को अपने तरीके से रोकते थे और स्थानीय निवासियों का पोषण करते थे। और दुष्ट चाहे अपना सगा ही क्यों न हो, पर यदि वो समाज को कष्ट पहुंचाने वाला हो तो उसको भी समाप्त करने में संकोच नहीं करना चाहिए, यह भगवान कृष्ण से सीखा है।
उनके 16000 लफड़े नहीं थे, नरकासुर की कैद से छुड़ाई गई स्त्रियां थीं, जिन्हें सम्भवत: समाज स्वीकार नहीं कर रहा था, उन्हें पत्नी का सम्मानजनक दर्जा दिया। वो भोगी नहीं योगी थे।
इसलिए उन्हें भगवान मानते हैं।
कृपया भविष्य में कभी भी किसी हिन्दू देवी देवता के लिये कोई अपमानजनक बात न तो प्रसारित करें और न ही करने दें। यदि यह संदेश किसी और ने आपको भेजा है तो उसे भी रोकें।
एक और बानगी देखिए, जिसमें एक कविता के माध्यम से श्रीकृष्ण के बारे में भद्दे संदेशों पर अफसोस जताया गया है:-
योगेश्वर श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर कुछ बेहद भद्दे सन्देश प्राप्त हुए, कृष्ण भगवान को लेकर, उन संदेशों को जवाब देती ये कविता

द्वारका के राजा सुनो , हम आज बड़े शर्मिंदा हैं,
भेड़चाल की रीत देखो आज तलक भी जिन्दा हैं

व्हाट्स एप के नाम पे देखो मची कैसी नौटंकी है,
मजाक आपका बनता है, ये बात बड़ी कलंकी है

दो कोड़ी के लोग यहां तुम्हें तड़ीपार बतलाते हैं,
अनजाने में ही सही, पर कितना पाप कर जाते हैं

जिनके मन में भरी हवस हो, महारास क्या जानेंगे,
कांटें भरे हो जिनके दिल, नरम घास क्या जानेंगे

जिनको खुद का पता नहीं, वो तेरा कैरेक्टर ढीला बोलेंगे,
जो खुद मन के काले हैं, वो तुझे रंगीला बोलेंगे

कालिया नाग भी ले अवतार तुझसे तरने आते थे,
तेरे जन्म पे स्वत: ही जेल के ताले खुल जाते थे

तूने प्रेम का बीज बोया गोकुल की हर गलियों में,
मुस्कान बिखेरी तूने कान्हा, सृष्टि की हर कलियों में

दुनिया का मालिक है तू, तुझे डॉन ये कहते हैं,
जाने क्यों तेरे भक्त सब सुन कर भी चुप रहते हैं

गोकुल की मुरली को छोड़, द्वारकाधीश का रूप धरो,
हुई शिशुपाल की सौ गाली पूरी, अब उसका संहार करो

रविवार, जुलाई 24, 2016

क्या अर्जुनराम मेघवाल आगे चल कर वसुंधरा के लिए परेशानी बनेंगे?

राज्य विधानसभा में तगड़े बहुमत और विपक्षी कांग्रेस के पस्त होने के नाते बहुत मजबूत मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे यूं तो बहुत मजबूत मुख्यमंत्री हैं, मगर हाल ही जिस प्रकार केन्द्र में मंत्रीमंडल विस्तार में राजस्थान के चार सांसदों को मंत्री बनाया गया है, उससे यह संकेत मिलते हैं कि उनके और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच ट्यूनिंग और बिगड़ गई है। ज्ञातव्य है कि मोदी ने वसुंधरा राजे की पसंद के अब तक मंत्री रहे निहाल चंद मेघवाल और प्रो. सांवर लाल जाट को हटा कर उनके विरोधी माने जाने वाले अर्जुन राम मेघवाल, पी पी चौधरी, सी आर चौधरी और विजय गोयल को मंत्री बना दिया है। इस बड़े परिवर्तन की सियासी गलियारे में बहुत अधिक चर्चा है। चर्चा इस वजह से भी वसुंधरा की सिफारिश के बाद भी उनके पुत्र दुष्यंत को मंत्रीमंडल में स्थान नहीं दिया गया है।
हालांकि अर्जुन राम मेघवाल को सियासी मैदान में लाने वाली वसुंधरा राजे ही हैं, मगर अब उनको विरोधी लॉबी में गिना जाने लगा है। कुछ लोगों का मानना है कि वसुंधरा राजे को घेरने के लिए मेघवाल को आगे चल कर और मजबूत किया जाएगा। मेघवाल के जातीय समर्थक तो उन्हें अभी से आगामी मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने में लग गए हैं।
राजनीति जानकारों का मानना है कि इस बार बहुत अधिक विधायकों के साथ सत्ता पर काबिज होने के बाद भी वे उतनी मजबूत नहीं हैं, जितनी कि पिछली बार कम विधायकों के बाद भी रहीं। पिछले कार्यकाल में उन्होंने जिस प्रकार एक दमदार मुख्यमंत्री के रूप में काम किया, वैसा इस बार नजर नहीं आ रहा। उनकी हालत ये है कि जिन कैलाश मेघवाल ने उन पर आरोप लगाए, उन्हीं को राजी करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष बनाना पड़ा। इसी प्रकार घनश्याम तिवाड़ी खुल कर विरोध में खड़े हैं और उन्होंने कथित रूप गैर राजनीतिक संगठन खड़ा कर दिया है, फिर भी उनके खिलाफ कार्यवाही नहीं हो पा रही। केन्द्रीय संगठन में लिए ओम माथुर का भी उनसे कितना छत्तीस का आंकड़ा है, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि हाल ही जब वे अजमेर आए तो वसुंधरा के डर से केवल उनकी ही लॉबी के नेताओं ने उनकी आवभगत की। कुल मिला कर राज्य में विरोधी लॉबी के सक्रिय रहते और मोदी की तनिक टेढ़ी नजर के कारण वसुंधरा पहले जैसी सहज नहीं हैं।
-तेजवानी गिरधर
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शनिवार, जुलाई 23, 2016

खुद भाजपाई ही खुश नहीं अपनी सरकार के कामकाज से

केन्द्रीय जलदाय राज्य मंत्री प्रो. सांवरलाल जाट को मंत्रीमंडल से हटाने का गुस्सा तो अपनी जगह है ही, मगर जन समस्याओं को लेकर जिस प्रकार भाजपा कार्यकर्ताओं ने असंतोष जाहिर किया है, वह साफ इंगित करता है कि खुद भाजपाई ही अपनी सरकार के कामकाज से खुश नहीं हैं। सच तो ये है कि वे मन ही मन जान रहे हैं कि यदि यही हालात रहे तो आगामी विधानसभा चुनाव में सत्ता पर कब्जा बरकरार रखना बहुत मुश्किल हो जाएगा।
भले ही पार्टी की अधिकृत विज्ञप्ति में यह कहा गया है कि संगठन व सरकार के कार्यों की समीक्षा सहित जिलों की बूथ समितियों के सम्मेलन सम्पन्न कराकर बूथ इकाइयों के सुदृढ़ीकरण के लिए अजमेर आये मंत्रियों व प्रदेष पदाधिकारियों के समूह के निर्धारित सभी कार्यक्रम सफल व उद्देश्यपूर्ण रहे, मगर सच्चाई ये है कि इस दौरान कार्यकर्ताओं का गुस्सा जिस तरह फूटा, वह स्वत: साबित करता है कि वे पूरी तरह से असंतुष्ट हैं। भले ही चिकित्सा मंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़ कहें कि कार्यकर्ता सरकार से नाराज नहीं हैं, वे तो सहज भाव से अपनी बात रख रहे हैं, मगर भाजपा जैसी अनुशासित पार्टी में जिस तरीके से कार्यकर्ताओं ने अपनी बात रखी है, वह पार्टी हाईकमान के लिए चिंता का विषय है।
उन्होंने कहा कि अजमेर में कार्यकर्ताओं में भारी उत्साह देखा गया। दो दिन में दस हजार से अधिक कार्यकर्ता सम्मेलन में शामिल हुए। उन्हें सरकार की योजनाओं की जानकारी के बारे में बताया गया। साथ ही इन से संबंधित कमियों अन्य समस्याओं के बारे में सुना गया। बैठक के दौरान जो भी सुझाव आए हैं, उनसे मुख्यमंत्री राजे को अवगत कराएंगे। दो दिन के भीतर उन्हें स्थानीय स्तर पर व्यावहारिक कठिनाइयों की जानकारी मिली है, जिन्हें दूर किया जाएगा। सरकार का यह अभियान 13 अगस्त को समाप्त हो जाएगा।
कार्यकर्ताओं के गिले-शिकवे, समस्याओं और उनके मन की बात जानने के साथ भाजपा का दो दिवसीय बूथ स्तरीय कार्यकर्ता सम्मेलन शुक्रवार को संपन्न हुआ। इसमें संदेश दिया गया कि कार्यकर्ता और पदाधिकारियों से हुए सीधे संवाद में समस्या और सुझाव समझ लिए गए हैं, अब यह सब मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को बताएंगे। मंत्रियों ने वैशाली नगर स्थित होटल में जनसंघ के पूर्व कार्यकर्ता, पूर्व विधायक, सांसद, पूर्व वर्तमान पदाधिकारियों की बैठक ली। जनसंघ के पूर्व पदाधिकारियों का सम्मान किया गया। संगठन पदाधिकारियों से फीडबैक लिया। बैठक में प्रदेश मंत्री अशोक लोहाटी, शहर जिलाध्यक्ष अरविंद यादव, देहात जिलाध्यक्ष बीपी सारस्वत, महामंत्री जयकिशन पारवानी, महामंत्री रमेश सोनी, उपाध्यक्ष सोमरत्न आर्य सतीश बंसल, रविंद्र जसोरिया, संजय खंडेलवाल सहित वरिष्ठ कार्यकर्ता उपस्थित थे।
लब्बोलुआब पार्टी नेताओं व कार्यकर्ताओं का एक कविता के माध्यम से ये कहना कि सरकार की अधिकारियों को परवाह नहीं, क्योंकि कार्यकर्ता की हिम्मत नहीं.., संगठन को फुर्सत नहीं, जनप्रतिनिधियों को जरूरत नहीं.., इसलिए अधिकारियों को सरकार की परवाह नहीं..., इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि सत्ता और संगठन में तालमेल का पूरी तरह से अभाव है। किसी सत्तारूढ़ पार्टी का कार्यकर्ता ही ये कहने लगे कि मंत्रियों और विधायकों के पास समय नहीं है, जनता को सरकार की योजनाओं का फायदा नहीं मिल पा रहा है और अधिकारी ही सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं को विफल करने में लगे हैं, तो समझा जा सकता है कि वे अंदर से कितने दुखी हैं। जाहिर सी बात है कि आम जनता के बीच तो इन्हीं कार्यकर्ताओं को वोट मांगने जाना होता है। भला वे जनता को क्या जवाब दें।
यह कम अफसोसनाक नहीं भाजपा नेता कार्यकर्ताओं से यह कह कर पल्लू झाड़ रहे हैं कि राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए, पहले राष्ट्र के बारे में, फिर संगठन और उसके बाद स्वयं के बारे में सोचना चाहिए। कार्यकर्ताओं ने तो अपना सिर ही धुन लिया होगा कि क्या हमने पार्टी के लिए इसलिए खून पसीना बहाया कि हमें खुद को भूल कर राष्ट्रहित की चिंता की सीख दी जाएगी।
बहरहाल, पार्टी की इस कवायद का क्या लाभ होगा, क्या कदम उठाए जाएंगे, मगर इतना तय है कि पार्टी के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है।
-तेजवानी गिरधर
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गुरुवार, जुलाई 14, 2016

कामयाबी मिलेगी या नहीं, मगर शीला का पत्ता चल कर कांग्रेस ने बाजी मारी

कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले पहल करते हुए जिस प्रकार अपने मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को घोषित किया है और प्रदेश अध्यक्ष पद राज बब्बर को सौंपा है, वह दाव कामयाब होगा या नहीं, ये तो चुनाव परिणाम ही बताएंगे, मगर इतना जरूर तय है कि ये कदम उठा कर उसने राजनीतिक चाल चलने में बाजी जरूर मार ली है। हालांकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का जनाधार कितना रह गया है, वह सबको पता है, मगर ताजा कदम उठा कर उसने हार नहीं मानने व अपने आत्मविश्वास का इजहार कर दिया है। सत्ता से बाहर हो चुकी एक राष्ट्रीय पार्टी के लिए यह आत्मविश्वास रखना व जताना जरूरी भी है। इसके अतिरिक्त चुनाव के काफी पहले अपना नेता घोषित करने का भी लाभ मिलेगा। स्वाभाविक रूप से उसी के अनुरूप चुनाव की चौसर बिछाई जाएगी। शीला के दिल्ली के विकास में अहम भूमिका निभा चुकने का भी कांग्रेस को फायदा मिल सकता है।
हालांकि दिल्ली में लगातार तीन बार मुख्यमंत्री रह चुकी वयोवृद्ध शीला को उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद का दावेदार बताना चौंकाने वाला जरूर है, मगर समझा जाता है कि कांग्रेस के पास मौजूदा हालात में इससे बेहतर विकल्प था भी नहीं। ज्ञातव्य है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी  करीब दस प्रतिशत है, जो कि परंपरागत रूप से कांग्रेस के साथ ही रही है। हालांकि बाद में अन्य दलों ने भी उसमें सेंध मारी। विशेष रूप से बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद यह वर्ग कांग्रेस से दूर हो गया। ऐसे में कांग्रेस की ओर से ब्राह्मण चेहरे के रूप में एक स्थापित शख्सियत को मैदान में उतार कर फिर से ब्राह्मणों को जोडऩे की कोशिश की गई है।
जहां तक शीला की शख्सियत का सवाल है, बेशक वे एक अनुभवी राजनीतिज्ञ हैं। देश की राजधानी जैसे राज्य में लगातार पंद्रह साल तक मुख्यमंत्री रहना अपने आप में एक उपलब्धि है। स्पष्ट है कि उन्हें राजनीति के सब दावपेच आते हैं। कांग्रेस हाईकमान से पारीवारिक नजदीकी भी किसी से छिपी हुई नहीं है। इसी वजह से वे कांग्रेस में एक प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित हैं। हालांकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस में जबरदस्त गुटबाजी है, मगर शीला दीक्षित इतना बड़ा नाम है कि किसी को उन पर ऐतराज करना उतना आसान नहीं रहेगा। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि उनके नाम पर सर्वसम्मति बनाना बहुत कठिन नहीं होगा।
शीला दीक्षित का उत्तर प्रदेश से पूर्व का कनैक्शन होना भी उन्हें दावेदार बनाने का एक कारण है। शीला का जन्म पंजाब के कपूरथला  में हुआ है, मगर उनकी शादी उत्तर प्रदेश में हुई। उन्होंने बंगाल के राज्यपाल रहे उमा शंकर दीक्षित के पुत्र आईएएस विनोद दीक्षित से शादी की। विनोद जब वे आगरा के कलेक्टर थे, तब शीला समाजसेवा में जुट गईं और बाद में  राजनीति में आ गईं। 1984-89 के दरम्यान कन्नौज से सांसद भी रही।
जहां तक राज बब्बर को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का सवाल है, वह भी एक नया प्रयोग है। कांग्रेस उनके ग्लैमर का लाभ उठाना चाहती है। लाभ मिलेगा या नहीं, ये तो वक्त ही बताएगा। अन्य दलों में बंटे जातीय समूहों के कारण उत्तर प्रदेश का जातीय समीकरण ऐसा है कि किसी चमत्कार की उम्मीद करना  ठीक नहीं होगा, मगर परफोरमेंस जरूर बेहतर हो सकती है।
-तेजवानी गिरधर
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रविवार, जून 26, 2016

क्या ये मोदी भक्तों की खिसियाहट है?

चीन के अड़ंगे की वजह से एनएसजी के मामले में भारत को मिली असफलता का मुद्दा इन दिनों गरमाया हुआ है। जाहिर तौर पर हर देशवासी को इसका मलाल है। मलाल क्या गुस्सा कहिये कि चीन की इस हरकत के विरोध में उसे सबक सिखाने के लिए चीन से आयातित सामान न खरीदने की अपीलें की जा रही हैं। इन सब के बीच कुछ भाजपा मानसिकता के लोग व्यर्थ ही खिसिया कर उन अज्ञात लोगों को लानत मलामत भेज रहे हैं, जो कि इस असफलता को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से जोड़ कर कथित रूप से जश्न मना रहे हैं।
सवाल ये उठता है कि आखिर भारत की इस असफलता पर कौन जश्न मना रहा है। ऐसा तो अब तक एक भी समाचार नहीं आया। हां, इस असफलता को मोदी की कूटनीतिक कमजोरी के रूप में जरूर गिनाया जा रहा है, वो भी इक्का-दुक्का नेताओं द्वारा, जो कि सामान्यत: हर विरोधी दल सत्तारूढ़ दल पर हमला करते हुए किया ही करता है। इसमें जश्न जैसा कुछ भी नहीं। फिर भी सोशल मीडिया पर मोदी के अनुयायी बड़ा बवाल मचाए हुए हैं। स्वाभाविक रूप से भारत की असफलता का दु:ख सभी को है। होना भी चाहिए। जब हम अदद क्रिकेट मैच में हार पर दुखी होते हैं, तो इस अहम मसले पर दुख होना लाजिमी है। मोदी भक्तों को कदाचित अधिक हो सकता है, क्योंकि वे ही इसे मोदी के चमत्कारिक व्यक्तित्व से जोड़ कर सफलता की पक्की संभावना जाहिर कर रहे थे। कदाचित उनका अनुमान था कि भारत को कामयाबी मिल जाएगी, जिसकी कि थोड़ी संभावना थी भी, तो वे सफलता मिल जाने पर मोदी का गुणगान करते हुए बड़ा जश्न मनाते। अब जब कि अपेक्षा के अनुरूप नहीं हो पाया तो वे खिसिया कर गैर भाजपाइयों पर हमला बोल रहे हैं। उनका आरोप है कि गैर भाजपाइयों को देश की तो पड़ी नहीं है, केवल मोदी की असफलता से खुश हैं। साथ ही वे ये भी जताने की कोशिश कर रहे हैं कि गैर भाजपाई देशभक्त नहीं है। देशभक्ति तो केवल भाजपाइयों का ही जन्मसिद्ध अधिकार है।
समझा जा सकता है कि यह स्थिति क्यों आई। न मोदी भक्त और कुछ मीडिया समूह फैसला होने से पहले ज्यादा उछलते और न ही असफल होने पर इतना मलाल होता। राजनीतिक अर्थों में इसे मोदी की कूटनीतिक असफलता ही माना जाएगा, हालांकि अंतरराष्ट्रीय मसलों में कई बार हमारे हाथ में कुछ नहीं होता। सफलता असलफलता चलती रहती है, उसको लेकर इतनी हायतौबा क्यों। अव्वल तो इसे किसी एक व्यक्ति अथवा सरकार की असफलता मात्र से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। हां, इतना जरूर है कि अगर हमें सफलता हाथ लगती तो सोशल मीडिया पर मोदी को एक बार फिर भगवान बनाने की कोशिश की जाती।
बहरहाल, असफल होने पर पलट कर विरोधियों पर तंज कसना अतिप्रतिक्रियावादिता की निशानी है। मानो उन्होंने ही चीन को भडकाया हो। अब तक तो ये माना जाता रहा है कि भाजपा मानसिकता के लोग अन्य दलों के कार्यकर्ताओं की तुलना में अधिक प्रतिक्रियावादी होते हैं और उन्हें आलोचना कत्तई बर्दाश्त नहीं होती, अर्थात क्रिया होते ही तुरंत प्रतिक्रिया करते हैं, मगर ताजा मामले में तो क्रिया हुई ही नहीं थी, किसी ने जश्न नहीं मनाया, फिर भी वे कड़ी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। इसे क्या कहा जाए? इसके लिए क्या शब्द हो सकता है? पता नहीं। मगर इतना तय है कि ताजा मामले को केवल और केवल मोदी की प्रतिष्ठा से जोड़े जाने, जिसको कि बाद में भुनाया जाना था, असफल होने पर मोदी भक्तों को, सारे भाजपाइयों को शुमार करना गलत होगा, चुप बैठे गैर भाजपाइयों का मन ही मन जश्न मनाया जाना दिखाई दे रहा है।
रहा सवाल चीन की हरकत के विरोध में चीनी वस्तुओं को न खरीदने का तो यह विरोध का एक कारगर तरीका हो सकता है। बेशक अगर ऐसा किया जा सके तो वाकई चीन को सबक मिल सकता है, मगर ऐसा हो पाएगा, इसमें संदेह है। सच तो ये है कि हम भारतीयों के पास शाब्दिक देशभक्ति तो बहुत है, मगर धरातल पर वैसा जज्बा दिखाई नहीं देता। अगर यकीन न हो तो सोशल मीडिया पर चीनी सामान का विरोध करने वालों की निजी जिंदगी में तनिक झांक कर देख लेना, सच्चाई पता लग जाएगी कि क्या स्वयं उन्होंने चीनी सामान खरीदना बंद कर दिया है या फिर वे सोशल मीडिया पर केवल कॉपी पेस्ट का मजा लेते हुए देशभक्ति का इजहार कर रहे थे।
-तेजवानी गिरधर
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