तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

शुक्रवार, फ़रवरी 09, 2018

हार के बाद भी भाजपा को हुआ फायदा

भीलवाड़ा जिले की मांडल विधानसभा सीट सहित अजमेर व अलवर की सभी विधानसभा सीटों को मिला कर कुल सभी 17 सीटों पर भाजपी की करारी हार से बेशक भाजपा को तगड़ा झटका लगा है और उसका मोदी फोबिया उतर गया है, मगर राजनीति के जानकार मानते हैं कि इस उपचुनाव से भाजपा को फायदा ही हुआ है।
जानकारों का मानना है कि दो लोकसभा सीटों व एक विधानसभा सीट के हारने से सीटों की गिनती के लिहाज से केन्द्र व राज्य की सरकारों को कुछ खास नुकसान नहीं हुआ है, मगर इससे ये खुलासा हो गया है कि न तो अब मोदी लहर कायम है और न ही वसुंधरा राजे की लोकप्रियता शेष रही है। एंटी इन्कंबेंसी के फैक्टर ने भी तगड़ा काम किया है। कांग्रेस मुक्त भारत के जुमले की जुगाली करने वाले भाजपाइयों का दंभ भी टूटा है। सब कुछ मिला कर भाजपा को विधानसभा चुनाव से दस माह पहले ही अपनी जमीन खिसकने की जानकारी मिल गई है। अगर ये उपचुनाव नहीं होते तो कदाचित भाजपा भ्रम में ही रहती और सीधे विधानसभा चुनाव हुए होते तो शर्तिया तौर पर सत्ता से बेदखल हो जाती। अब जबकि उसे जमीनी हकीकत पता लग गई है तो उसे संभलने का पूरा मौका मिल गया है। अब वह न केवल अपने पहले से मौजूद सांगठनिक ढ़ांचे को और मजबूत बनाएगी, अपितु चुनाव परिणामों को प्रभावित करने वाले सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार कर लेगी। अब बाकायदा नए सिरे से जाजम बिछाएगी। जातीय समीकरण भी साधेगी और मौजूदा विधायकों की गंभीरता से स्क्रीनिंग करेगी।
उधर कांग्रेस को बड़ा फायदा ये हुआ है कि वह अब पूरी तरह से उत्साह से लबरेज हो गई है। मगर साथ ही यह भी आशंका है कि कहीं सत्ता आने की संभावना में उसका कार्यकर्ता सुस्त न हो जाए। वैसे पहली बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने मेरा बूथ मेरा गौरव अभियान चला कर पार्टी का चुनावी ढ़ांचा मजबूत कर लिया है। इसका लाभ निश्चित रूप से विधानसभा चुनाव में होगा, मगर संदेह ये भी उत्पन्न होता है कि कहीं अति उत्साह में कार्यकर्ता ढ़ीला न पड़ जाए।

बुधवार, फ़रवरी 07, 2018

कांग्रेस के हौसले बुलंद, भाजपा को बिछानी होगी नई जाजम

उपचुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा की करारी हार के साथ कांग्रेस के हौसले बुलंद हो गए हैं। तकरीबन चार साल साल पहले विधानसभा चुनाव में जो कांग्रेस चारों खाने चित्त हो गई थी और मृत प्राय: सी थी, वह प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट के नेतृत्व में पूरे जोश के साथ फिर खड़ी हो गई है। हालांकि  विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं और तब न जाने कौन से समीकरण बनेंगे, मगर जिस तरह मांडलगढ़ सहित अजमेर व अलवर की सभी विधानसभा सीटों पर कांग्रेस ने बढ़त हासिल की है, उससे उसके कार्यकर्ताओं में अगला चुनाव जीत सकने का विश्वास भर दिया है। दूसरी ओर भाजपा इन परिणामों से हतप्रभ है और अगले चुनाव में जीत के लिए उसे मौजूदा जाजम को हटा कर नई जाजम बिछानी होगी, केवल पैबंद लगाने से काम नहीं चलेगा। बेशक उसके पास सशक्त संगठन है, फिर भी प्रत्याशियों के चयन में अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी। इसके अतिरिक्त एंटी इन्कंबेंसी फैक्टर को ध्यान में रखते हुए सरकार की कार्यप्रणाली में सुधार लाना होगा। यदि जनता को राहत नहीं मिली तो वह उसे पलटी खिला देगी। रहा सवाल मोदी लहर का तो वह पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है, अलबत्ता अगला चुनाव मोदी को खुद मोनीटर करना होगा।
वसुंधरा के दिल्ली ट्रांसफर के आसार
राजस्थान में लोकसभा के दो व विधानसभा के एक उपचुनाव में भाजपा की हार के बाद यह पक्के तौर पर माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जल्द ही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को दिल्ली बुला कर केबीनेट मंत्री बनाएंगे, ताकि राजस्थान में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले नए सिरे से जाजम बिछाई जा सके।
हालांकि मोदी काफी समय से इस ताक में थे कि वसुंधरा को राजस्थान से हटाया जाए, मगर वे इतनी मजबूत रही हैं कि उन्हें हिलाने का साहस नहीं कर पाए। अब जब कि भाजपा तीन सीटों के उपचुनाव में बुरी तरह से हार गई है, मोदी को मौका मिल जाएगा। असल में मोदी व वसुंधरा की नाइत्तफाकी काफी समय से है, यही वजह है कि कई बार ये चर्चा हुई कि वसुंधरा को हटा कर ओम माथुर या राज्यवर्धन सिंह अथवा भूपेन्द्र यादव को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। लेकिन हर बार कोई न कोई ऐसा कारण बन जाता था कि अफवाहों पर विराम लग जाता था। अब जब कि यह स्पष्ट हो गया है कि वसुंधरा का चेहरा आगामी विधानसभा चुनाव लड़ाने के लायक नहीं रहा है तो उन्हें हटा कर नए सिरे से जाजम बैठाना भाजपा की मजबूरी हो गया है। यदि उन्हें हटाने में कोई दिक्कत आती है तो इतना तय माना जा रहा है कि कम से कम विधानसभा चुनाव तो उनके नाम पर नहीं लड़ा जाएगा। इतना ही नहीं माना ये भी जा रहा है कि जीत सुनिश्चित करने के लिए मोदी एक सौ बांसठ विधायकों में से तकरीबन एक सौ मौजूदा विधायकों के टिकट काटने जैसा कड़ा कदम भी उठा सकते हैं, जाहिर तौर पर उसमें कई मंत्री भी होंगे।
सचिन पायलट ही होंगे मुख्यमंत्री पद के दावेदार
अजमेर सहित लोकसभा की दो सीटों व एक विधानसभा सीट पर कांग्रेस की शानदार जीत के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट को आगामी विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किए जाने पर मुद्दे पर अंदरखाने मिल रही चुनौती पर विराम लग गया है।
इसमें कोई दो राय यह उपचुनाव सचिन के लिए विधानसभा चुनाव के सेमी फाइनल के रूप में अग्रि परीक्षा सा था। उन्होंने न केवल प्रत्याशियों के चयन में चतुराई बरती, अपितु रणनीति पर भी खूब काम किया। मेरा बूथ मेरा गौरव अभियान चला कर सभी छोटे-बड़े नेताओं को बूथ पर काम कर दिखाने को बांध दिया। नतीजतन अनुकूल परिणाम आए। समझा जाता है कि अब आगामी चुनाव उनके ही नेतृत्व में लड़े जाने की संभावना प्रबल हो गई। यह तो कांग्रेस हाईकमान पर निर्भर है कि वह उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट चुनाव लड़ती है अथवा नहीं, मगर यदि सरकार कांग्रेस की बनती है तो मुख्यमंत्री वे ही होंगे। कुछ लोगों ने उन पर अजमेर लोकसभा सीट का उपचुनाव लडऩे का दबाव बनाया, मगर चूंकि उन्हें राजस्थान की कमान सौंपने के मकसद से प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था और उन्होंने चार साल में दिन-रात एक करके मृतप्राय: कांग्रेस में जान फूंकी, उन्होंने अपने आप को विधानसभा चुनाव के लिए सुरक्षित रख लिया। उनकी यह नीति काम आई और अब आगामी चुनाव उनके ही नेतृत्व में लड़े जाने व सरकार बनने पर मुख्यमंत्री बनने का रास्ता सुगम हो गया है।
-तेजवानी गिरधर-

मंगलवार, दिसंबर 26, 2017

भाजपा : जीत की पुडिय़ा में लिपट कर मिली चेतावनी

चाहे हिमाचल प्रदेश के साथ गुजरात में जीत को लेकर भाजपा प्रसन्न दिखाई दे, मगर सच ये है कि उसे अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सिमटते  तिलिस्म का अहसास हो गया होगा। बेशक गुजरात में भाजपा केवल और केवल मोदी के दम पर ही जीती है, मगर सच ये भी है कि इन चुनावों ने यह साफ कर दिया है कि, जो मोदी लहर पिछले लोकसभा चुनाव व उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों के वक्त चली थी, या चलाई गई थी, वह अब नदारद हो गई है। बेशक कांग्रेस हार गई, मगर चुनाव में भाजपा व कांग्रेस के बीच हुई कांटे की टक्कर ने यह साबित कर दिया है कि भाजपा का कांग्रेस मुक्त का नारा बेमानी है। वस्तुत: भाजपा का जीतना कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है और न ही कांग्रेस का हारना। सबसे बड़ा सवाल ये कि जिस गुजरात मॉडल के नाम पर भाजपा ने पूरा देश जीता, जिस गुजरात में मोदी की डंका बोलता है, वहीं पर कथित रूप से खत्म होती कांग्रेस ने दो-दो हाथ कर लिए। अब भाजपा के लिए कई तरह की चुनौतियां उठ खड़ी हुई हैं तो कई राहतें कांग्रेस को मिल गई हैं।
यह सर्वविदित ही है कि भाजपा आरंभ से मुद्दा आधारित राजनीति करती रही है। जिस मुद्दे पर उसे एक बार सफलता मिलती है, वह दूसरी बार में समाप्त प्राय: हो जाता है और उसे फिर नया मुद्दा तलाशना पड़ता है। पिछले लोकसभा चुनाव तक भाजपा सारे मुद्दे आजमा चुकी थी और उसके पास कोई नया मुद्दा नहीं था। यहां तक कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी विपक्ष के नाते वह नकारा साबित हुई। एक मात्र यही वजह रही कि अन्ना हजारे को जन आंदोलन करना पड़ा। चूंकि उनके पास कोई राजनीतिक विजन नहीं था, इस कारण वे आंदोलन करके अलग हो गए, यह दीगर बात है कि उन्हीं के अनुयायी अरविंद केजरीवाल ने आंदोलन की वजह से कांग्रेस के खिलाफ बने माहौल का लाभ उठा कर दिल्ली विधानसभा पर कब्जा कर लिया। चूंकि उनके पास राष्ट्रीय स्तर पर न तो कोई सांगठनिक ढ़ांचा था और न ही संसाधन, इस कारण भाजपा खड़ी फसल को काटने में कामयाब हो गई। रहा सवाल मुद्दे का तो उसने करोड़ों-अरबों रुपए खर्च कर मोदी को ब्रांड बनाया और उसी ब्रांड पर अभूतपूर्व सफलता भी हासिल की। माहौल ऐसा बनाया गया कि मोदी आगामी बीस साल तक इस देश पर शासन करने को पैदा हुए हैं। यानि कि पार्टी गौण हो गई और व्यक्ति प्रमुख हो गया। बेशक पार्टी की अपनी रीति-नीति है, सिद्धांत हैं, मगर उसके खेवनहार केवल मोदी और उनके हनुमान अमित शाह हैं। इस जोड़ी ने बाद के विधानसभा चुनावों में रणनीतिक जीत हासिल की, मगर बिहार व पंजाब के परिणामों ने इशारा कर दिया था कि मोदी नाम की लहर धीमी पडऩे लगी है। वह अब इतनी धीमी पड़ गई है कि खुद अपने ही गुजरात में मोदी को पसीने आ गए। चुनावी जानकार तो यहां तक कहने लगे हैं कि अगर मोदी धुंआधार रैलियां नहीं करते तो गुजरात हाथ से निकला हुआ ही था। ऐसे में भाजपा को आगामी विधानसभा चुनावों व लोकसभा चुनाव को लेकर चिंताएं पैदा हो गई हैं। परेशानी ये है कि भाजपा के पास मोदी का कोई विकल्प नहीं है। मोदी ही एक मात्र नेता बचे हैं, जिनके नाम पर चुनाव लडऩा मजबूरी है।
गुजरात चुनाव ने मोदी के अहम पर चोट मारी है। जीत के बाद वे जब बोल रहे थे, तो उनमें जीते हुए नेता का भाव नहीं था। जीता हुआ नेता तर्क नहीं करता, जीत तो अपने आप में भाजपा और मोदी के तर्कों का परिणाम है। नए सिरे से तर्कशास्त्र खड़े करके मोदी ने अहंकार और अपने गुजरात से बढ़ते हुए अलगाव को ही व्यक्त किया है। जब आदमी अलगाव में रहता है तो उसे ढंकने के लिए सबसे ज्यादा तर्क गढ़ता है। बहाने बनाता है।
बात अगर कांग्रेस की करें तो यह स्वयं सिद्ध तथ्य है कि वह हारी, मगर उसकी हार में भी जीत का भाव है। वो इसलिए कि उसने मोदी को उनके घर में ही बुरी तरह घेरने में कामयाबी हासिल कर ली।
गुजरात चुनाव का असर आगामी लोकसभा चुनाव तक कितना रहेगा, यह कहना अभी ठीक नहीं, मगर सीधे-सीधे तौर पर यह राजस्थान विधानसभा चुनाव को प्रभावित करेगा। अगर भाजपा गुजरात में प्रचंड बहुमत से जीतती तो राजस्थान भी उसके लिए आसान प्रतीत होता, मगर अब वह गंभीर चिंता से घिर गई है। उसकी एक मात्र वजह ये है कि भाजपा की क्षत्रप मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का आभा मंडल फीका पड़ चुका है। उनके नाम पर चुनाव लडऩा हार को न्यौता देना है। दूसरा ये कि मोदी लहर भी समाप्त हो चुकी है।  हालांकि अब भी उसे मोदी नामक ब्रह्मास्त्र काम में ही लेना होगा, मगर टक्कर कांटे की होगी। उसे एक-एक टिकट बहुत ठोक बजा कर फाइनल करनी होगी। उधर हार के बावजूद कांग्रेस में आये उत्साह से भी उसका पाला पडऩे वाला है। कांग्रेसियों में यह आत्मबल जाग गया है कि जब भाजपा के भगवान मोदी के घर में सेंध मारी जा सकती है तो वसुंधरा के जर्जर हो चुके किले को ढ़हाना कोई कठिन काम नहीं है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

शुक्रवार, अक्तूबर 06, 2017

वसुंधरा को अब समझ आया कि पांच दिन का हफ्ता गलत है

मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे को अपने दूसरे कार्यकाल के आखीर में समझ में आया है कि राज्य सरकार के दफ्तरों में पांच दिन का हफ्ता ठीक नहीं है और छह दिन का हफ्ता किया जाना चाहिए। अजमेर के निकटवर्ती कस्बे में सर्व समाज के प्रतिनिधियों से संवाद करते हुए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने कहा कि सरकारी दफ्तरों में अब जल्द ही सिक्स डे वीक शुरू होगा। उनका कहना था कि मौजूदा समय में पांच दिन का सप्ताह महज चार दिन का रह गया है। हालत ये है कि दफ्तरों में शुक्रवार दोपहर से सोमवार दोपहर तक ज्यादातर कर्मचारी नहीं मिलते। इससे जनता को परेशानी का सामना करना पड़ता है।
यहां उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने अपने पिछले कार्यकाल में सरकार के जाते-जाते कर्मचारियों के वोट हासिल करने के लिए पांच दिन का हफ्ता किया था। सच्चाई ये है कि पांच दिन के सप्ताह का फैसला न तो आम जन की राय ले कर किया गया था और न ही इस तरह की मांग कर्मचारी कर रहे थे। बिना किसी मांग के निर्णय को लागू करने से ही स्पष्ट था कि यह एक राजनीतिक फैसला था, जिसका फायदा तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जल्द ही होने जा रहे विधानसभा चुनाव में उठाना चाहती थीं। उन्हें इल्म था कि कर्मचारियों की नाराजगी की वजह से ही पिछली गहलोत सरकार बेहतरीन काम करने के बावजूद धराशायी हो गई थी, इस कारण कर्मचारियों को खुश करके भारी मतों से जीता जा सकता है। हालांकि दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं पाया। असल बात तो ये है कि जब वसुंधरा ने यह फैसला किया, तब खुद कर्मचारी वर्ग भी अचंभित था, क्योंकि उसकी मांग तो थी नहीं। वह समझ ही नहीं पाया कि यह फैसला अच्छा है या बुरा। हालांकि अधिकतर कर्मचारी सैद्धांतिक रूप से इस फैसले से कोई खास प्रसन्न नहीं हुए, मगर कोई भी कर्मचारी संगठन इसका विरोध नहीं कर पाया।
अब जब कि पांच दिन के सप्ताह की व्यवस्था को काफी साल हो गए हैं, यह स्पष्ट हो गया है कि इससे आम लोगों की परेशानी बढ़ी है। पांच दिन का हफ्ता करने की एवज में प्रतिदिन के काम के घंटे बढ़ाने का कोई लाभ नहीं हुआ है। कर्मचारी वही पुराने ढर्ऱे पर ही दफ्तर आते हैं और शाम को भी जल्द ही बस्ता बांध लेते हैं। कलेक्ट्रेट को छोड़ कर अधिकतर विभागों में वही पुराना ढर्ऱा चल रहा है। कलेक्ट्रेट में जरूर कुछ समय की पाबंदी नजर आती है, क्योंकि वहां पर राजनीतिज्ञों, सामाजिक संगठनों व मीडिया की नजर रहती है। आम जनता के मानस में भी आज तक सुबह दस से पांच बजे का समय ही अंकित है और वह दफ्तरों में इसी दौरान पहुंचती है। कोई इक्का-दुक्का ही होता है, जो कि सुबह साढ़े नौ बजे या शाम पांच के बाद छह बजे के दरम्यान पहुंचता है। यानि कि काम के जो घंटे बढ़ाए गए, उसका तो कोई मतलब ही नहीं निकला। बहुत जल्द ही उच्च अधिकारियों को यह समझ में आ गया था कि छह दिन का हफ्ता ही ठीक था। इस बात को जानते हुए उच्च स्तर पर कवायद शुरू तो हुई और कर्मचारी नेताओं से भी चर्चा की गई, मगर यह सब अंदर ही अंदर चलता रहा। मगर हुआ कुछ नहीं।
बहरहाल, यदि तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो केन्द्र सरकार के दफ्तरों में बेहतर काम हो ही रहा है। पांच दिन डट कर काम होता है और दो दिन मौज-मस्ती। मगर केन्द्र व राज्य सरकार के दफ्तरों के कर्मचारियों का मिजाज अलग है। केन्द्रीय कर्मचारी लंबे अरसे से उसी हिसाब ढले हुए हैं, जबकि राज्य कर्मचारी अपने आपको उस हिसाब से ढाल नहीं पाए। वे दो दिन तो पूरी मौज-मस्ती करते हैं, मगर बाकी पांच दिन डट कर काम नहीं करते। कई कर्मचारी तो ऐसे भी हैं कि लगातार दो दिन तक छुट्टी के कारण बोर हो जाते हैं। दूसरा अहम सवाल ये भी है कि राज्य सरकार के अधीन जो विभाग हैं, उनसे आम लोगों का सीधा वास्ता ज्यादा पड़ता है। इस कारण हफ्ते में दो दिन छुट्टी होने पर परेशानी होती है। यह परेशानी इस कारण भी बढ़ जाती है कि कई कर्मचारी छुट्टी के इन दो दिनों के साथ अन्य किसी सरकारी छुट्टी को मिला कर आगे-पीछे एक-दो दिन की छुट्टी ले लेते हैं और नतीजा ये रहता है कि उनके पास जिस सीट का चार्ज होता है, उसका काम ठप हो जाता है। अन्य कर्मचारी यह कह कर जनता को टरका देते हैं कि इस सीट का कर्मचारी जब आए तो उससे मिल लेना। यानि कि काम की रफ्तार काफी प्रभावित होती है।
खैर, अपने दूसरे कार्यकाल में चुनाव से करीब एक साल पहले वसुंधरा को समझ आ गया है कि सिक्स डे वीक किया जाना चाहिए। देखते हैं, वे ये निर्णय कर लेती हैं और इसकी प्रतिध्वनि क्या होती है?
-तेजवानी गिरधर
7742067000

गुरुवार, अक्तूबर 05, 2017

कांग्रेस के हमले तेज, मोदी का बचाव करने में जुटे समर्थक

-तेजवानी गिरधर-
ऐसा देखा जा रहा है कि पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर कांग्रेस के हमले काफी तेज हो गए हैं। बेशक ये आईटी सेल का ही काम होगा। इसके अतिरिक्त भद्दी टिप्पणियां भी खूब शेयर की जा रही हैं। इन हमलों की तीव्रता ठीक उतनी ही है, जितनी पहले भाजपाइयों के सोनिया गांधी व राहुल गांधी पर हमलों में हुआ करती थी। मोदी की एक-एक हरकत का छिद्रान्वेषण किया जा रहा है। ऐसे में मोदी समर्थक यकायक रक्षात्मक मुद्रा में आने लगे हैं। हालांकि मोदी का आईटी सेल भी कांग्रेस पर हमले जारी रखे हुए हैं, मगर अब मोदी का बचाव करने पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी समर्थक तनिक चिंतित हैं कि कांग्रेस की रणनीति ठीक उसी तरह से काम न कर जाए, जैसी उन्होंने मोदी की ब्रांडिंग करते वक्त अपनाई थी। मोदी का बचाव करते वक्त कई बार तर्कविहीन बातें भी कही जा रही हैं।
पेट्रोल के भावों में आई ताजा तेजी को ही लीजिए। मीडिया में यह स्पष्ट हो चुका है कि विश्व बाजार में क्रूड ऑइल की कीमत काफी घटी है, फिर भी भारत वासियों को बहुत महंगा पेट्रोल लेना पड़ रहा है। इसके लिए पेट्रोल को जीएसटी से बाहर रखने का तर्क दिया जा रहा है। हालांकि इसकी सटीक काट नहीं है, फिर भी जो तर्क दिया जा रहा है, उससे समझा जा सकता है कि उसमें कितना दम है। एक बानगी देखिए:-
तीस रुपए का पेट्रोल सरकार सत्तर में क्यों बेच रही है, ऐसा पूछने वाले एक बार ये भी तो पूछें कि 16 रुपए में गेहूं खरीद कर सरकार दो रुपए में क्यो बेचती है? पचास रुपए का केरोसिन पंद्रह में क्यों बेचती है? चालीस की शक्कर छब्बीस में क्यों बेचती है? पच्चीस का चावल खरीद कर एक रुपए में क्यों बेचती है? लाखों रुपये टीचरों को तनख्वाह देकर बच्चों को मुफ्त क्यों पढ़वाती है? 6 करोड़ शौचालय मुफ्त में क्यों बनवाती है? 3 करोड़ गैस चूल्हे मुफ्त में क्यों बाटती है?
सवाल ये उठता है कि इस प्रकार की सारी सुविधाएं पहले भी थीं, तब पेट्रोल के भाव तनिक बढऩे पर आसमान सिर पर क्यों उठाया जाता था?
मोदी के प्रति हमदर्दी लिए एक टिप्पण देखिए:-
गुजरात के मोहनदास करमचन्द गांधी राष्ट्र के पिता हो सकते हैं...! जवाहर लाल नेहरू सबके चाचा हो सकते हैं...! मायावती सबकी बहन हो सकती है...! ममता बनर्जी सबकी दीदी हो सकती हैं...! जयललिता सबकी अम्मा हो सकती हैं...! सोनिया गांधी देश की बहू हो सकती है...! केवल नरेंद्र मोदी इस देश का बेटा नहीं हो सकता...!! इतनी नफरत क्यों है भाई?
बढ़ती महंगाई के जवाब में तल्खी देखिए-दिक्कत यह नहीं है कि दाल महंगी हो गयी है...! दिक्कत यह है कि किसी की गल नहीं रही है।
मोदी के बचाव का एक और नमूना देखिए:-
आजकल सोशल मीडिया पर अनेक मैसेज चल रहे हैं कि मोदी ने महंगाई बढ़ा रखी है, व्यापार में दिक्कत है, इन्कम रिटर्न भरने में दिक्कत है वगैरह वगैरह। मित्रों, ये सब कांग्रेस द्वारा फैलाए जा रहे हैं। रही मोदी की दुकान बंद कराने की बात, तो आपको यह पता है कि मोदी जी की उम्र अब 67 वर्ष है और उनके पीछे न परिवार है और न ही  बीवी-बच्चे। उन्होंने जिंदगी में जो पाना था वो पा लिया है। अब अगर आप वोट नहीं भी देंगे और वो हार भी जाएंगे, तब भी वो पूर्व प्रधानमंत्री कहलाएंगे, आजीवन दिल्ली में घर, गाड़ी, पेंशन, एसपीजी सुरक्षा, कार्यालय मिलता रहेगा। दस-पंद्रह साल जीकर चले जाएंगे। लेकिन आप क्या करेंगे जब कांग्रेस और आम आदमी पार्टी  इस देश का इस्लामीकरण और ईसाईकरण करने में लगी हुई हैं। रोहिंग्याओं को बसाएगी, अंधी लूट करेगी, हर साल लाखों करोड़ों के  घोटाले करेंगी, हिंदुओं के खिलाफ कानून बनेंगे और आतंकवादी सरकारी मेहमान बनेंगे?
मोदी जी तो संतोष के साथ मरेंगे कि मैंने एक कोशिश तो की अपना देश बचाने की, लेकिन आप लोग तो हर दिन मरेंगे, और अंतिम सांस कैसे लेंगे? जो गलती आपने अटल जी को हरा कर करी थी, वो गलती आप दोबारा न करें।
मोदी के बचाव में कट्टर हिंदूवाद का सहारा भी लिया जा रहा है। देखिए- अटल सरकार की तरह मोदी सरकार का पेट मत चीरो मेरे हिन्दू भाइयों। एक बात गांठ बांध के रख लो कि मोदी ही हम हिन्दुओं की आखिरी उम्मीद  बच गए हैं। बात थोड़ी कड़वी है पर कहावत है कि कुत्तों को घी हजम नहीं होता और सूअरों को बढिय़ा पकवान अच्छे नहीं लगते। अगली बार मोदी नहीं आए तो ये सारे सेक्युलर की खाल में बैठे जेहादी मिल के हम हिन्दुओं का ऐसा हश्र करेंगे कि आने वाले पीढिय़ां अपनी बर्बादी पर आंसू बहायेंगी। फिर किसी मोदी जैसे हिन्दुवादी देश-भक्त को दिल्ली तक पहुंचने का सपना देखने में भी डर लगेगा। याद रहे जब तक मुर्गी जिंदा रहेगी तब तक ही अंडे देगी। अटल जी की तरह उसका भी पेट चीर दोगे तो फिर लड़ते रहना इन टोपी वालों से जिंदगी भर।
हे मोदी का विरोध करने वाले हिन्दुओं, आपके असहयोग और अंधविरोध की वजह से अगर सच में मोदी जी का कुछ अनिष्ट हो गया तो आप सभी खून के आंसू रोओगे। हिन्दू घरों की बहन-बेटियां लव-जिहाद की भेंट चढ़ जाएंगी और भारत को पाकिस्तान और अफगानिस्तान बनते देर नहीं लगेगी। 
कुल मिला कर ऐसी टिप्पणियां ये आभास करवाती हैं कि काला धन, महंगाई, बेराजगारी आदि को लेकर किए गए वादे पूरे न होने से फीके हो रहे मोदी ब्रांड का बचाव करने के लिए ही इस तरह के तर्क काम में लिए जा रहे हैं।

शुक्रवार, सितंबर 29, 2017

क्या यशवंत सिन्हा का बयान मात्र कुंठा है?

हाल ही जब भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने आर्थिक हालात को लेकर एक डरावनी तस्वीर पेश की है, उसको लेकर  सरकार व भाजपा हाईकमान में खलबली मच गई है। विपक्षी अगर आरोप लगाए, जो कि लगाया भी जा रहा है तो उसमें यही माना जाता है कि उसने तो विरोध मात्र के लिए ऐसा किया है, मगर यदि अपनी ही पार्टी का कोई बड़ा नेता सरकार की नीति के खिलाफ बोलता है तो गंभीर होना स्वाभाविक ही है। विशेष रूप से तब जबकि वह आर्थिक मामलों का गहन जानकार हो। निश्चित रूप से सिन्हा के बयान से सरकार दुविधा में आई है, मगर सरकार व भाजपा के पैरोकारों का मानना है कि सिन्हा के बयान में उनकी खीझ और कुंठा अधिक दिख रही है। वे मानते हैं कि उनका इरादा आर्थिक स्थिति की समीक्षा करना कम, वित्त मंत्री अरुण जेटली के खिलाफ भड़ास निकालने का अधिक था।
इस तर्क को मान भी लिया जाए तो सिन्हा ने जो कुछ कहा है, उसे सिरे से भी नहीं नकारा जा सकता। आखिरकार वे भी वित्त मंत्री व आर्थिक मामलों के जानकार रहे हैं। केवल खीज निकालने मात्र के लिए हवाई अथवा अतथ्यात्मक बात नहीं कर सकते। जनता तो सब समझ रही है, क्योंकि वह भोग रही है, मगर वे कुंठा निकालने मात्र के लिए अपनी प्रतिष्ठा को दाव पर नहीं लगा सकते। अगर उनका मकसद केवल वित्त मंत्री को विफल बताना है, तो भी ऐसे ही तर्कों का सहारा लेंगे न, जो कि आसानी से गले उतर जाएं।
यूं भी यह कोई रहस्य नहीं कि जीडीपी में गिरावट दर्ज की गई है और जीएसटी पर अमल के बाद आर्थिक सुस्ती का माहौल बना है। यह पहले से स्पष्ट था भी कि जीएसटी पर अमल के दौरान बाधाएं आएंगी और उसका कुछ न कुछ असर आर्थिक-व्यापारिक गतिविधियों पर पड़ेगा। यह भी पहले से स्पष्ट था कि नोटबंदी का कुछ न कुछ विपरीत असर जीडीपी के आंकड़ों पर दिखेगा। इस परिपेक्ष में भी सिन्हा का बयान उचित प्रतीत होता है।
इसमें कोई दोराय नहीं कि कालेधन की अर्थव्यवस्था पर लगाम लगाने और कर व्यवस्था में सुधार करने की जरूरत के तहत ही नोटबंदी व जीएसटी के प्रयोग किए गए, इसको लेकर सरकार पर सवाल खड़े नहीं किए जा सकते, मगर पुख्ता बंदोबस्त किए बिना ही जल्दबाजी में लागू किए जाने के कारण समस्याएं उत्पन्न हुई है। हुआ ये कि पहले तो बिना सोचे समझे नोटबंदी लागू की, जिससे बाजार का हाल बेहाल हो गया, फिर यकायक जीएसटी भी लागू कर दी, नतीजा ये हुआ कि बाजार संभलता, उससे पहले ही उसे एक और बड़ा झटका लग गया। यह सरकार भी समझ ही रही होगी। विशेष रूप से जीडीपी में गिरावट आने के बाद तो यह स्पष्ट हो ही गया कि त्रुटि हो गई है। हां, भले ही जेटली ने अर्थव्यवस्था को डुबोने के लिए ऐसा सायास नहीं किया हो, जैसा कि सिन्हा के बयान में कहा गया है, मगर इतना तो तय है कि गलत कदम का नुकसान देश भुगत रहा है।
 यदि यह मान भी लिया जाए कि टैक्स देने वालों की संख्या बढ़ी है, सब्सिडी का दुरुपयोग रुका है और वित्तीय समावेशन का दायरा बढ़ा है, मगर दूसरी ओर आर्थिक हालात बिगड़े हैं, इसे नकारा नहीं जा सकता। सिन्हा का बयान कुंठा मान कर यदि सरकार आंख मूंदने की कोशिश करती है तो यह एक और बड़ी गलती होगी।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

मंगलवार, सितंबर 26, 2017

बंपर बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज भाजपा की जमीन खिसकी

किसी भी सरकार के कामकाज की समीक्षा के लिए उसका तीन साल का कार्यकाल पर्याप्त होता है। केन्द्र में स्पष्ट बहुमत व राज्य में बंपर बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज भाजपा सरकारों के तीन-तीन साल पर खुफिया व मीडिया में आ रही रिपोर्टों में इस बात के साफ संकेत सामने आ रहे हैं कि  भाजपा का ग्राफ काफी नीचे गिरा है। हालात इतने बदले बताए जा रहे हैं कि दोनों जगह भाजपा का सत्ता में लौटना कठिन हो जाएगा। इतना ही नहीं खुद भाजपा के ही मातृ संगठन आरएसएस के फीडबैक व इंटरनल सर्वे तक में कहा जा रहा है कि 2019 के आम चुनाव में भाजपा की हालत खस्ता हो सकती है।
अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ में छपी रिपोर्ट के अनुसार संघ ने ज्वलंत मुद्दों पर जो फीडबैक लिया है, उससे जाहिर होता है कि आम लोगों में घोर निराशा है। विशेष रूप से नोटबंदी और उसके बाद जीएसटी की वजह से माहौल खराब हुआ है। यहां तक कि भाजपा मानसिकता का व्यापारी वर्ग भी त्रस्त है और अपनी पीड़ा कानाफूसी के जरिए व्यक्त कर रहा है। जिस काले धन को लेकर नरेन्द्र मोदी ने हल्ला मचा कर सत्ता पर कब्जा किया, उसको लेकर जनता में गहरा रोष है। नोटबंदी के बाद भी जब काला धन सामने नहीं आया तो जनता ठगा सा महसूस कर रही है। सोशल मीडिया पर कांग्रेस के हमले तेज हो गए हैं। जितनी तीखी व तल्ख टिप्पणियां पहले सोनिया गांधी, राहुल गांधी व मनमोहन सिंह के बारे में देखने को मिलती थीं, ठीक वैसी ही अब मोदी के बारे में आ रही हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस ने भी भाजपा की तरह अपना आईटी सेल काफी मजबूत कर लिया है। ऐसा कोई मुद्दा नहीं होता, जिस पर कांग्रेस हमला करने से चुकती हो। यहां तक कि आम तौर पर भाजपा के पक्ष में लिखने वाले ब्लागरों का सुर भी अब बदलने लगा है। ऐसे में जनता के बीच जाने वाले निचले स्तर के भाजपा नेताओं को बहुत परेशानी होती है। उनसे सवालों के जवाब देते नहीं बनता।
अब तो मीडिया रिपोर्टें भी इस बात की ताईद कर रही हैं कि भाजपा की लोकप्रियता कम हुई है। राजस्थान के संदर्भ में बात करें तो जितनी अपेक्षा के साथ जनता के भाजपा को सत्ता सौंपी, उसके अनुरूप कुछ भी नहीं हुआ है। धरातल पर न तो भ्रष्टाचार कम हुआ है और न ही जनता को कोई राहत मिली है। भाजपा हाईकमान के साये में काम रही मुख्यमंत्री वसुंधरा का चेहरा भी चमक खोने लगा है। उनके खाते में एक भी बड़ी उपलब्धि नहीं है। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार भाजपा के 163 विधायकों मेें से करीब एक सौ विधायकों का परफोरमेंस खराब है, जिसका भाजपा को नुकसान उठाना पड़ेगा। कानून-व्यवस्था तो बिगड़ी ही है, मगर जनता पर ज्यादा असर महंगाई का है। मोदी के सत्ता में आने पर जनता को जो उम्मीद थी, वह तो पूरी हुई नहीं, बल्कि उसके विपरीत महंगाई और बढ़ रही है। पेट्रोल के दाम अस्सी रुपए प्रति लीटर तक पहुंचने के बाद तो आम जन की कमर ही टूट गई है। ऐसा माना जा रहा है कि इन सब केलिए जनता केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियों को जिम्मेदार मान रही है।
ऐसा प्रतीत होता है कि जिस प्रकार पिछली बार केन्द्र की कांग्रेस नीत सरकार के खिलाफ अन्ना हजारे द्वारा बनाए गए माहौल के चलते राज्य में कांग्रेस की सरकार गई, ठीक वैसे ही मोदी की नीतियां राज्य में भाजपा के लिए मुश्किल पैदा करने वाली हैं। पहले भाजपा के पास राज्य में वसुंधरा का चेहरा था, मगर अब वह कामयाब होता नहीं दिखाई दे रहा है। अब केवल मोदी ब्रांड पर ही भाजपा की आस टिकी है, वह भी पहले की तुलना काफी फीका हो गया है। जो कुछ भी हो, इतना तो तय है कि पहले की तरह इस बार मोदी लहर की कोई उम्मीद नहीं है।
-तेजवानी गिरधर
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