तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

गुरुवार, दिसंबर 05, 2019

महाराष्ट्र ने किया नई राजनीतिक दिशा का आगाज

देवेन्द्र फडनवीस ने कर दी बहुत बड़ी चूक
गेम चेंजर के रूप में उभरे शरद पवार
-तेजवानी गिरधर-
सत्ता की खातिर हालांकि धुर विरोधी पार्टियों के एक मंच पर आने की शुरुआत पहले ही हो चुकी है, मगर महाराष्ट्र में जिस प्रकार शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस व कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए एक हो कर जो सरकार बनाई है, उससे देश में राजनीति की नई दिशा का आगाज हो गया है। भाजपा ने केन्द्र में स्पष्ट व प्रचंड बहुमत पा कर एनडीए की मजबूती पर ध्यान देना बंद किया तो अब उसके घटक दल छिटक रहे हैं, वहीं महाराष्ट्र के प्रयोग ने देश के अन्य राज्यों में भाजपा के खिलाफ विभिन्न दलों को एकजुट होने को हवा दे दी है।
बेशक धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस व हिंदूवादी शिवसेना के साथ होने पर इसे नापाक गठबंधन करार दिया जा रहा है, मगर भाजपा आलोचना का अधिकार इसलिए खो चुकी है, क्योंकि वह खुद भी इसी प्रकार जम्मू-कश्मीर में महबूबा मुफ्ती व बिहार में नीतीश कुमार के साथ मिल कर सरकार बना चुकी है। इस मसले पर टीवी डिबेट में सभी दलों के प्रवक्ताओं की बोलती बंद हो जाती है। ऐसे में वे डिबेट को डीरेल करने की कोशिश करते हैं। जब हमाम में सब नंगे हैं तो आप किस पर हंसियेगा। कांग्रेस चूंकि वर्षों तक सत्ता में रही है, इस कारण साम, दाम, दंड, भेद नीति अपनाने को लेकर वह तथाकथित पार्टी विथ द डिफ्रेंस पर गुरूर करने वाली भाजपा के निशाने पर रहती थी, मगर अब जब कि भाजपा ने भी वे ही सारी नीतियां पूरी तरह से अपना ली है, तो उसके नेताओं को आरोपों पर चुप्पी साधनी पड़ती है। कुल मिला कर देश की राजनीति में अब सिद्धांत व वैचारिक मतभिन्नता गड्ड मड्ड हो चुकी है। यह राजनीति का विद्रूप चेहरा है। अब सिर्फ सत्ता को हासिल करने के लिए मनी व मसल्स का पावर गेम खेला जाने लगा है। उसके लिए संवैधानिक मूल्यों का पूरी तरह से परित्याग कर दिया गया है।
महाराष्ट्र में जिस प्रकार प्रधानमंत्री ने बिना मंत्रीमंडल की अनुमति के अपने विशेष अधिकारों का उपयोग कर रातों रात राष्ट्रपति शासन हटवा दिया और राज्यपाल ने बिना ठीक से पुष्टि किए नए मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री को झटपट शपथ दिलवाई, उसने यह साबित कर दिया कि संवैधानिक मर्यादाओं को बड़ी आसानी से तिलांजलि दी जाने लगी है। शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस व कांग्रेस ने जब सुप्रीम कोर्ट की शरण ली तो जैसे ही उसने मामला निपटाने में तीन दिन का समय लिया, उससे वह भी निशाने पर आ गया था, मगर जब उसने विधानसभा में फ्लोर टैस्ट चौबीस घंटे में करवाने का आदेश दिया, तब जा कर उसकी साख बच पाई। उसमें एक भी एक पेच फंस गया कि राज्यपाल प्रोटेम स्पीकर बनाने में परंपरा को तोड़ेंगे और अजित पवार को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी विधायक दल का नेता मानेंगे, जो कि भाजपा के पक्ष में व्हिप जारी देंगे व उसका पालन न करने पर पार्टी के विधायकों की सदस्यता पर तलवार लटक जाएगी। हालांकि पार्टी ने पवार को हटा कर नया नेता चुन लिया, मगर उसे मान्यता न दिए जाने का संदेह था। खेल तो यही था, इस कारण आखिर तक भाजपाई किसी चमत्कार का दावा करते रहे। वो तो खुद पवार ने ही उपमुख्मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, तब मजबूरी में मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस को भी त्यागपत्र देना पड़ गया।
इस पूरे घटनाक्रम में फडनवीस से बहुत बड़ी चूक हुई। शपथ लेने की इतनी जल्दी थी कि केवल पवार की समर्थन की चि_ी पर ही भरोसा कर लिया और इसको सुनिश्चित नहीं किया कि उनके विधायक हैं कहां पर। हालत ये हो गई कि पवार को छोड़ कर सारे विधायक पार्टी अध्यक्ष शरद पवार की शरण में पहुंच गए। अजित पवार निहत्थे हो गए, साथ ही पूरे परिवार का दबाव भी था, इस कारण बेकफुट पर आ गए और फडनवीस चौखाने चित्त हो गए। सबसे ज्यादा किरकिरी उनकी हुई है। उन्होंने मोदी की लहर पर सवार भाजपा की भी भद पिटवा दी। अब पार्टी में ही उनके लिए विपरीत हालात बन सकते हैं। उन पर ये आरोप भी आ गया कि जिस सिंचााई घोटाले के नाम पर उन्होंने अजित पवार सेे जेल में चक्की पिसवाने का ऐलान कर रखा था, सत्ता की खातिर उन्हीं से हाथ मिला लिया और उपमुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवा दी।
राजनीति के इस खेल में पार्टियां ही नहीं, मीडिया भी नंगा हुआ है। पूरे घटनक्रम में वह लगातार भाजपा के प्रवक्ता की सी भूमिका निभाता रहा और जब देखा कि अब तो बाजी पलट गई तो लगा सियापा करने। अब भी उसका सारा ध्यान इस पर है कि यह गठबंधन कब और कैसे टूटेगा?
महाराष्ट्र के इस खेल में जहां राजनीति के चाणक्य कहलाने वाले अमित शाह को झटका लगा है, वहीं शरद पवार गेम चेंजर के रूप में उभर कर आए हैं। जिस किस्म का बेमेल मगर अनोखा गठबंधन उन्होंने बनाया है, उसे राजनीति को नई दिशा मिलने का संकेत माना जा रहा है। रहा सवाल शिवसेना का तो यह देखने वाली बात होगी कि वह अपने आक्रामक हिंदूवाद के कितना दूर रह पाती है। सुखद बात ये है कि उसे भी अब धर्मनिरपेक्षता के साथ समझौता करना पड़ा है। समीक्षक अब मोदी के जादू को कम होता हुआ आंक रहे हैं। हालांकि अभी इस निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। रहा सवाल मुद्दों का तो माना जा रहा है कि धारा 370 व राम मंदिर का मुद्दा भाजपा को कुछ खास लाभ देने वाले नहीं हैं। ऐसे में अब वह नागरिकता के मुद्दे पर जोर देने वाली है, जिसका असर राज्यों की राजनीति पर क्या पड़ेगा,यह आने वाला वक्त ही बताएगा।

शुक्रवार, नवंबर 01, 2019

निकाय प्रमुख के मुद्दे पर सरकार अपने स्टैंड पर कायम

निकाय प्रमुखों के चुनाव की प्रक्रिया को लेकर पिछले दिनों जिस प्रकार विवाद हुआ और जिस तरह से उसका पटाक्षेप हुआ, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ने यूटर्न लिया है, जबकि हकीकत ये है कि सरकार अब भी अपने स्टैंड पर अब भी कायम है। इसको लेकर जारी अधिसूचना अब भी अस्तित्व में है, सिर्फ स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल की ओर से स्पष्टीकरण जारी हुआ है कि निर्वाचित पार्षदों में से ही निकाय प्रमुख चुना जाएगा, लेकिन विशेष परिस्थिति में बिना चुनाव लड़ा नागरिक भी निकाय प्रमुख के चुनाव में भाग ले सकेगा।
असल में पूर्व में जारी अधिसूचना में जैसे ही यह एक नया प्रावधान रखा गया था कि पार्षद का चुनाव लड़े बिना भी कोई व्यक्ति निकाय प्रमुख का चुनाव लड़ सकेगा, उसका अर्थ ये निकाला गया कि सरकार की मंशा निकाय प्रमुख के पदों पर अनिर्वाचित व्यक्तियों को बैठाने की है और चुने हुए पार्षदों से कोई निकाय प्रमुख नहीं बन पाएगा, जबकि अधिसूचना में ऐसा कहीं नहीं कहा गया है। उसमें केवल अनिर्वाचित व्यक्ति के लिए रास्ता खोला गया है। अर्थ का अनर्थ निकला, इसका प्रमाण ये है कि मीडिया ने भी ऐसे नामों पर चर्चा शुरू कर दी कि कांग्रेस व भाजपा में कौन-कौन बिना चुनाव लड़े निकाय प्रमुख पद के दावेदार होंगे। पार्षद पद के दावेदार भी ये मान बैठे कि उनको तो मौका मिलेगा ही नहीं। इससे एक भ्रम ये भी फैला कि शहर से बाहर का व्यक्ति भी चुनाव लड़ सकेगा, जिसकी सफाई देते हुए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने साफ कह दिया कि ऐसा कैसे हो सकता था, पार्षद ही बगावत कर देते।
यह बात सही है कि इस मुद्दे पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के साथ केबिनेट मंत्री रमेश मीणा व प्रताप सिंह खाचरियावास ने विरोध जताया था कि नई व्यवस्था अलोकतांत्रिक है। कांग्रेस में मतभिन्नता के चलते भाजपा को भी हमला बोलने का मौका मिल गया और उसने आंदोलन की रूपरेखा तक तय कर ली। अंतत: धारीवाल को स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा, जिसमें स्पष्ट किया गया कि आगामी निकाय चुनाव में जनता द्वारा चुने हुए पार्षदों में से ही मेयर-सभापति-अध्यक्ष का निर्वाचन होगा। केवल विशेष परिस्थिति में जब एससी, एसटी, ओबीसी, महिला वर्ग के मेयर-सभापति की आरक्षित सीट के लिए अगर किसी पार्टी विशेष का सदस्य नहीं जीत पाया तो राजनीतिक दल की प्रदेश इकाई को यह अधिकार होगा कि वह आरक्षित वर्ग के नेता को खड़ा कर सकेगी। अर्थात निकाय प्रमुख के निर्वाचन को लेकर राज्य सरकार की ओर से 16 अक्टूबर को जारी की गई अधिसूचना में कोई बदलाव नहीं किया गया। मौलिक बदलाव सिर्फ ये है कि पूर्व में सरकार ने निकाय प्रमुख का चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से करने की घोषणा की थी, जिसे बदल कर अप्रत्यक्ष प्रणाली लागू की गई है। उसको लेकर धारीवाल का कहना है कि ऐसा इस कारण किया जा रहा है, क्योंकि भाजपा ने राष्ट्रवाद के नाम पर घृणा, हिंसा व भय का माहौल बनाया है, जबकि कांग्रेस सभी जाति व समुदाय में सद्भाव व भाईचारा बनाए रखना चाहती है।
धारीवाल ने एक तर्क और दिया है, जो कि दमदार है। उन्होंने कहा है कि सरकार ने तो उलटे अच्छा कार्य किया है, वो यह कि उसने राजनीतिक दलों को यह अधिकार दिया है कि विशेष परिस्थिति में अगर जब एससी, एसटी, ओबीसी, महिला वर्ग के मेयर-सभापति की आरक्षित सीट के लिए अगर किसी पार्टी विशेष का सदस्य नहीं जीत पाता है तो दूसरी पार्टी के पार्षदों को तोडऩे के लिए खरीद फरोख्त करने की बजाय अपनी ही पार्टी के आरक्षित वर्ग के किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ा दे और जनहित के काम बिना बाधा के कर सके।
अब जरा इस मसले की बारीकी में जाएं। यदि ये मान लिया जाए कि सरकार अनिर्वाचित को निकाय प्रमुख के रूप में थोपने की कोशिश में थी तो वह कोरी कल्पना है। वो इस प्रकार कि निकाय प्रमुख के चुनाव के दौरान यदि अनिर्वाचित व्यक्ति फार्म भरता तो निर्वाचित पार्षद ही बगावत कर देते।  वे अपनी ओर भी किसी पार्षद को चुनाव लड़वा देते, क्योंकि पार्षदों के चुनाव लडऩे पर रोक थोड़े ही थी। एक बात और गौर करने लायक है, वो यह कि निकाय प्रमुख के चुनाव में जो नया प्रावधान लाया गया, वो कोई बिलकुल नया नहीं है। ऐसा तो प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री अथवा मंत्री पद को लेकर भी है। निर्वाचित सांसद व विधायक उनका निर्वाचन कर लेते हैं और बाद में छह माह में उन्हें किसी सांसद व विधायक से सीट खाली करवा कर चुनाव जीतना होता है। जहां तक निकाय प्रमुख का सवाल है, शायद उसमें इस स्थिति को स्पष्ट नहीं किया गया है, जो कि किया जाना चाहिए।
कुल मिला कर ताजा स्थिति ये है कि पार्षद ही निकाय प्रमुख चुनेंगे, लेकिन विशेष परिस्थिति में अनिर्वाचित व्यक्ति के लिए रास्ता खुला रखा गया है। केवल सामंजस्य की कमी के चलते असमंजस उत्पन्न हुआ, था जिसका निस्तारण हो गया है। जैसा कि नेरेटिव बना है कि सरकार ने विरोध के चलते यू टर्न लिया है, वैसा कुछ भी नहीं है। अधिसूचना अब भी कायम है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
8094767000

बुधवार, अक्तूबर 30, 2019

क्या वाकई मजबूरी का नाम महात्मा गांधी है?

-तेजवानी गिरधर-
जब भी किसी काम की मजबूरी होती है तो महात्मा गांधी को याद किया जाता है। याद है न ये जुमला - मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। यह जुमला कब और किसने फैंका, कैसे ईजाद हुआ, इसका तो पता नहीं, मगर अब यह चरितार्थ हो गया है। संघ व भाजपा की जिस विचारधारा ने सदैव गांधीजी को निशाने पर रखा, वही आज उनकी पूजा करने लगी है। ऐसे में यह चौंकाने वाला सवाल उठता है कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि संघ व भाजपा गांधीजी को सिर पर उठाए घूम रहे हैं? जिन गांधीजी के राष्ट्रपिता होने पर सवाल उठाए जाते रहे, आज बड़े गर्व से उन्हीं को राष्ट्रपिता मान कर अभिनंदन किया जा रहा है? जिन गांधीजी को हिंदुस्तान के विभाजन का जिम्मेदार माना गया, जिन पर मुस्लिम तुष्टिकरण पर आरोप लगाया जाता रहा, वही आज प्रात: स्मरणीय कैसे हो गए? जिस भाजपा सरकार ने गांधीजी के समानांतर अथवा उनसे कहीं बड़ा करके सरदार वल्लभ भाई पटेल को खड़ा करने की भरपूर कोशिश की, आज वही गांधीजी की 150 वी जयंती को धूमधाम से मना रही है, देशभर में पदयात्राएं कर रहे है? गांधीजी की हत्या के लिए जिस विचारधारा पर आरोप लगाए जाते हैं, वही विचारधारा आज गांधीजी के सामने नतमस्तक है? यह बात पब्लिक डोमेन में है कि वर्षों से सत्ता में रही कांग्रेस की वजह से ही गांधीजी की जयंती व पुण्यतिथि मनाई जाती है, भाजपा तो हाल के कुछ वर्षों में ऐसा करने लगी है। आखिर यकायक ऐसा हो कैसे गया? क्या मजबूरी है?
आपको याद होगा कि हाल ही महात्मा गांधी 150 वी जयंती पर आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बकायदा लेख लिखकर गांधी के प्रति अपनी वैचारिक और कार्यशील प्रतिबद्धता को सार्वजनिक किया। संभवत: यह पहला मौका है कि संघ इस प्रकार खुल कर गांधीजी के साथ खड़ा हो गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी स्वच्छता अभियान में गांधीजी को ही आगे रखा।
मसले का दूसरा पहलु ये है कि जहां मजलिसे-इतेहादुल मुसलमीन के नेता असदुद्दीन औवेसी का कहना है कि उन्हें गांधी का नाम लेने का कोई अधिकार नहीं है, तो कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने कहा कि भाजपा वोटों के खातिर गांधी के नाम को भुना रही है।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या गांधी के साथ संघ का कोई जमीनी रिश्ता वास्तव में कायम है? भागवत ने गांधी के भारतीयता के विचार को जिस प्रकार रेखांकित किया है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि संघ कांग्रेस की तुलना में गांधीजी के अधिक नजदीक है। यह सर्वविदित है कि गांधीजी ने अपने पूरे दर्शन में भारतीयता को प्रमुखता प्रदान की। रामराज्य, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, मधनिषेध जैसे आधारों पर अपनी वैचारिकी खड़ी की। ये सभी आधार भारतीयों के लोकजीवन को हजारों साल से अनुप्राणित करते आ रहे हैं। राम भारतीय समाज के आदर्श पुरुष हैं और गांधी के प्रिय आराध्य। अब यह आसानी से समझा जा सकता है कि गांधी किस भारतीयता के धरातल पर खड़े थे। ऐसे में संघ का दावा है कि भले ही उसके बारे में जो भी धारणा हो, मगर संघ ने गांधीजी को अपने दैनिक दिनचर्या में शामिल कर रखा है। इसका प्रमाण ये है कि एक पक्के स्वयंसेवक और एक पक्के गांधीवादी की जीवन शैली लगभग एक समान है।
संघ का दावा है कि जिस प्रकार गांधीजी का सारा जोर सेवा कार्यों पर था, उसी के अनुरूप सेवा कार्यों के मामले में संघ दुनिया का सबसे बड़ा और व्यापक संगठन है। सेवा भारती, वनवासी कल्याण परिषद, एकल विद्यालय, परिवार प्रबोधन, विद्या भारती जैसे बीसियों अनुषांगिक संगठन दिन रात देश भर में सेवा के ऐसे ऐसे प्रकल्पों में जुटे हैं।
तस्वीर का दूसरा पहलु ये है कि संघ व भाजपा औपचारिक व घोषित रूप से भले ही आज गांधीजी की पूजा कर रहे हों, मगर इनकी विचारधारा से इत्तेफाक रखने वाले कई लोग आज भी गांधीजी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के प्रति श्रद्धा रखते हैं। भोपाल की सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के गोडसे के बारे में सार्वजनिक रूप से दिए गए बयान से इसकी पुष्टि होती है। दूसरी ओर इस पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यह तल्ख टिप्पणी कभी नहीं भुलाई जा सकेगी कि वे निजी तौर पर साध्वी को कभी माफ नहीं करेंगे। इस अंतर्विरोध से भाजपा कैसे उबरेगी, यह तो उसी की चिंता का विषय है।
वैसे यह स्थिति वाकई सिर चकरा देने वाली है। तभी तो यह जुमला सामने आया कि भाजपा के मुख में गांधीजी व दिल में गोडसे है। इसी मसले पर एक लेखक का यह कथन भी विचारणीय है- नाथूराम गोडसे के साथ संघ का रिश्ता खोजने और थोपने वाले आलोचक गांधी के संग संघ का नाता भी खोजने की कोशिशें करें।
ऐसा प्रतीत होता है कि सत्ता में आने के लिए राजनीतिक कारणों से जो विचारधारा गांधीजी का विरोध करती रही, सत्तारूढ़ होने के बाद उसे समझ में आ गया कि देश में हम भले ही गांधीजी को गाली देते हैं, मगर पूरी दुनिया में गांधीजी की बड़ी मान्यता है, गांधी दर्शन की बड़ी महत्ता है। उसे नकारा नहीं जा सकता। यदि कोई ऐतिहासिक भूल हो गई तो उसे सुधारने में बुराई क्या है? तभी तो प्रख्यात चिंतक डॉ. वेद प्रताप वैदिक ने एक लेख में लिखा है कि यदि वर्तमान सरकार, भाजपा और संघ गांधी का नाम आज ले रहे हैं तो उन्हें क्यों न लेने दें ? उनकी आंखें खुल रही हैं, दिल बड़ा हो रहा है, समझ गहरी हो रही है तो उसे वैसा क्यों न होने दें ? यह ठीक है कि इस सरकार को मोदी और शाह चला रहे हैं लेकिन हम यह न भूलें कि ये दोनों गुजराती हैं। वे गांधी और सरदार पटेल को कंधे पर उठा रहे हैं तो इसमें बुराई क्या है?
कई लेखक ये मानते हैं कि हम गांधीजी को पूजते जरूर हैं, मगर हमारे में गांधीदर्शन कहां है? ऐसा लगता है कि गांधीजी की प्रासंगिकता, जो मजबूरी के रूप में उभर कर आई है, उसे बड़ी चतुराई से यह कह कर उपयोग किया जाने वाला है कि उन्होंने तो केवल गांधीजी को स्थापित मात्र किए रखा, जबकि हम उन्हें अपने जीवन में उतारने को आतुर हैं।

शनिवार, अक्तूबर 05, 2019

क्या मोदी ट्रंप का चुनाव प्रचार करने ह्यूस्टन गए?

-तेजवानी गिरधर-
अमेरिका के ह्यूस्टन में पचास हजार भारतीयों के बड़े व ऐतिहासिक जलसे में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदगी को भले ही मोटे तौर पर दोनों देशों के संबंध मजबूत होने के रूप में देखा गया हो, मगर मोदी के, अगली बार ट्रंप सरकार, के नारे ने यह संदेह उत्पन्न कर दिया है कि मोदी की इस यात्रा का साइलेंट एजेंडा क्या ट्रंप के लिए प्रवासी भारतीयों के वोट जुटाना था। हो सकता है कि ट्रंप की गरिमामय मौजूदगी में मोदी ने अति उत्साहित हो कर यह जुमला दिया हो, मगर इसकी जम कर मजम्मत हो रही है।
असल में ऐसा होता ही है कि किन्हीं भी दो राष्ट्रों के शासनाध्यक्ष जब एक मंच शेयर कर रहे होते हैं तो शिष्टाचार में एक दूसरे तारीफ ही करते हैं। दोनों देशों के बीच संबंध और बेहतर होने की बात भी कही जाती है। यह एक सामान्य सी बात है। जैसे मोदी ने भारत और अमेरिकी के बीच गहरे मानवीय संबंधों का जिक्र करते हुए दोनों देशों के संबंधों को मजबूत बनाने में 'विशेष शख्सियतÓ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के योगदान की सराहना की, वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में दुनिया मजबूत, फलता-फूलता और संप्रभु भारत देख रही है। मगर जैसे ही मोदी ने यह नारा दिया कि अगली बार ट्रंप सरकार, तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति व कूटनीति के जानकार भौंचक्क रह गए। असल में मोदी को यह समझना होगा कि तारीफ मोदी की नहीं हो रही, बल्कि इसलिए हो रही है कि वे भारत के प्रधानमंत्री हैं। वरना जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो अमेरिका उनको वीजा देने को ही तैयार नहीं था।
जानकारी के अनुसार ऐसा पहली बार हुआ कि किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर आसीन व्यक्ति को अगली बार चुने जाने का नारा दिया हो, मानो वे किसी चुनावी रैली में बोल रहे हों, और ये रैली ट्रंप के लिए जनसमर्थन जुटाने के लिए ही आयोजित की गई हो। यह बात ठीक है कि प्रधानमंत्री के रूप में मोदी को वहां जो सम्मान मिला, वह हम सभी भारतीयों के लिए गर्व की बात है, मगर सम्मान से अभिभूत हो कर इस प्रकार ट्रंप के लिए प्रवासी भारतीयों से वोट की अपील करना अच्छी हरकत नहीं है। न तो नैतिक रूप से न कूटनीतिक रूप से। समझ में नहीं आता कि ऐसा मोदी के सलाहकारों की राय पर हुआ या फिर मोदी ने अपने स्तर पर ही ऐसा कर दिया। ट्रंप के लिए निजी तौर पर अपील करने से भले ही दोनों के बीच व्यक्तिगत दोस्ती प्रगाढ़ हो जाए, मगर सोचने वाली बात ये है कि भारत को इससे क्या मतलब कि अमेरिका में ट्रंप दुबारा सरकार बनाएं या कोई और? क्या ऐसा करके हमने दूसरे देश की भीतरी राजनीति में हिस्सेदारी नहीं निभा दी है? क्या ऐसा करने से चलते रास्ते डमोक्रेट्स व्यर्थ ही हमारे विरोधी नहीं बन जाएंगे? हो सकता है कि मोदी को ये लगा हो कि ट्रंप ही दुबारा चुने जाएंगे, इस कारण ऐसी अपील कर दी हो। अगर उनका अनुमान सही निकलता है तो न केवल अमेरिका में रह रहे भारतीयों के लिए अच्छी बात होगी, अपितु दोनों देशों के संबंधों में और सुधार आएगा। लेकिन यदि डेमोक्रट्स जीते तो  उनका प्रवासी भारतीयों व भारत के प्रति कैसा नजरिया होगा, ये समझा जा सकता है।
जलसे के तुरंत बाद डेमोक्रेट्स की प्रतिक्रिया आ भी गई। डेमोक्रेट्स नेता बर्नी सैंडर्स ने अपने ट्वीट में कहा कि भारत में धर्म स्वातंत्र्य और मानवाधिकारों पर हो रहे हमलों को नजरअंदाज कर ट्रंप, मोदी का समर्थन कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ''जब धार्मिक उत्पीडऩ, दमन और निष्ठुरता पर डोनाल्ड ट्रंप चुप रहते हैं तो वे पूरी दुनिया के निरंकुश नेताओं को यह संदेश देते हैं कि तुम जो चाहे करो तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगाÓÓ। हालांकि सीधे तौर पर उन्होंने वहां की स्थानीय राजनीति के तहत ट्रंप की आलोचना की, मगर अप्रत्यक्ष रूप से हम भी तो आलोचना के शिकार हो गए।
अमरीका में हुए जबरदस्त जलसे के समानांतर कई घटनाएं हुईं। मीडिया, मोदी के कार्यक्रम में भारतीयों की भारी भीड़ उमडऩे के बारे में तो बहुत कुछ कहता रहा, परंतु इससे जुड़ी कई अन्य घटनाओं को नजरअंदाज किया गया। उदाहरण के लिए, मोदी की नीतियों के विरोध में जो प्रदर्शन वहां हुए, उनकी कोई चर्चा नहीं हुई। यद्यपि अधिकांश दर्शकों ने मोदी का भाषण बिना सोचे-विचारे निगल लिया परंतु स्टेडियम के बाहर बड़ी संख्या में विरोध प्रदर्शनकारियों ने मोदी राज में देश की असली स्थिति की ओर ध्यान आकर्षित करवाने का प्रयास किया। बेशक अमरीका में रह रहे भारतीयों का एक बड़ा हिस्सा हिन्दू राष्टवाद का समर्थक और मोदी भक्त है, परंतु वहां के कई भारतीय, भारत में मानवाधिकारों की स्थिति और प्रजातांत्रिक अधिकारों के साथ हो रहे खिलवाड़ से चिंतित भी हैं।
ज्ञातव्य है कि मोदी की मानसिकता को जानने वाले इस बात को रेखांकित करते रहे हैं कि मोदी हर वक्त चुनावी मूड में ही रहते हैं। पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद पूरे पांच साल तक सदैव कांग्रेस को ऐसे ललकारते रहे, मानों कांग्रेस उनको गंभीर चुनाती दे रही हो। खुद के दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में सफल होने से ही यह सिद्ध हो गया था कि मतदाता ने कांग्रेस को पूरी तरह से नकार दिया है, ऐसे में कांग्रेस, जवाहर लाल नेहरू व राहुल गांधी पर ताबड़तोड़ हमलों से यह भ्रम होता रहा कि क्या मोदी अब भी अपने आपको विरोधी दल का नेता मानते हैं। बावजूद इसके वे कांग्रेस को ही कोसते रहे। दूसरी बार केवल और केवल अपने दम पर प्रचंड बहुमत के साथ जीतने के बाद भी वे कांग्रेस की कमियां गिनाते रहते हैं। कुछ इसी तरह की चुनावी मानसिकता के चलते वे ट्रंप के लिए वोट की अपील कर आए।

मंगलवार, सितंबर 10, 2019

चंद्रयान : कौन कहा रहा है कि मोदी फेल हो गए?

चंद्रयान 2 से संपर्क टूटने के बाद इसरो प्रमुख सीवन की पीठ पर हाथ रख कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह कहना कि विज्ञान में कभी असफलतायें नहीं होती, विज्ञान में सिर्फ प्रयोग और प्रयास किये जाते हैं, बिलकुल सही है। ऐसा करके उन्होंने न केवल इसरो के वैज्ञानिकों को निराश न होने की सीख दी है, अपितु हौसला अफजाई का काम किया है। प्रधानमंत्री रूप में उनका यह रुख बेशक सराहनीय है। मगर दुर्भाग्य से हम ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जहां हर चीज को राजनीति से जोड़ कर देखा जाने लगा है। हर सफलता-अफलता के साथ मोदी का नाम जोड़ा जा रहा है। चूक तकनीकी की है, मगर उसे मोदी भक्तों ने अपने दिल पर ले लिया है। अरे भाई, मोदी को असफल कह कौन रहा है? समझ नहीं आता कि वे आखिर किस मानसिकता से गुजर रहे हैं?
सीधी से बात है कि हमारे वैज्ञानिकों ने पूरी ईमानदारी व मेहनत से काम किया, उसमें वे तनिक विफल हो गए तो इसमें मोदी का क्या दोष है? इसे मोदी से जोड़ कर देखना ही बेवकूफी है। अगर जिम्मेदार ठहराया जाना जरूरी हो तो वो हैं, हमारे वैज्ञानिकों की टीम, जिससे कहीं चूक रह गई होगी। या ऐसा भी हो सकता है कि कोई अपरिहार्य गड़बड़ी हो गई होगी। जानबूझ कर तो किसी ने लापरवाही की नहीं होगी। कम से कम इस मामले में प्रधानमंत्री तो कत्तई जिम्मेदार नहीं हैं। यह एक वैज्ञानिक प्रयोग था, जो कि किसी चूक की वजह से कोई और प्रधानमंत्री होता तो भी विफल हो सकता था। इसमें मोदी है तो मुमकिन है, वाला राजनीतिक जुमला लागू नहीं होता।
तेजवानी गिरधर
चूंकि यह मामला ऐसा था ही नहीं कि मोदी की आलोचना की जाती, लिहाजा विपक्ष की ओर से कोई प्रतिक्रिया आई भी नहीं। सोशल मीडिया पर किसी इक्का-दुक्का ने मसखरापन किया हो अलग बात है। शायद उसी पर एक वाट्स ऐपिये ने प्रतिक्रिया दी कि भारत में कुछ लोग मोदीजी की गलती का इंतजार ऐसे करते हैं, जैसे ढ़ाबे के बाहर बैठा कुत्ता जूठी प्लेट का इंतजार करता है। मगर सवाल उठता है कि इस मामले में मोदी जी गलती है ही कहां?
पता नहीं ये नेरेटिव कैसे हो गया है कि देश के हर मसले के केन्द्र में मोदी को रख दिया जाता है। एक प्रतिक्रिया देखिए:-
चंद्रयान 2 से संपर्क टूटने के बाद जहां पूरा देश इसरो के साथ खड़ा है, वहीं कुछ टुच्चे कांग्रेसी इसमें मोदी जी को कोसने का मौका ढूंढ़ रहे हैं। ये लोग वही हैं, जो अपने भाई की भी मौत पर सिर्फ इसलिए खुश होते है कि चलो भाई मरा तो गम नहीं, कम से कम भाभी तो विधवा हुई।
दूसरी प्रतिक्रिया देखिए:- चंद्रयान की सफलता या असफलता को मोदी से जोड़ कर देखने वाले लोग मात्र मनोरोगी ही हो सकते हैं। इसरो के लिए केंद्र में बैठी सरकार मात्र इतने ही मतलब की है कि वो उनके किसी प्रोजेक्ट के लिए फंडिंग करने में दिलचस्पी दिखाती है या नहीं। इससे ज्यादा कुछ नहीं। यह प्रतिक्रिया सटीक व सही है। मगर सवाल उठता है कि चंद्रयान की असफलता को मोदी से जोड़ कर देख कौन रहा है?
कुछ ऐसी प्रतिक्रियाएं भी आई हैं, जो इसरो की हौसला अफजाई करती हैं। यदि ये भी किसी साइलेंट प्रोजेक्ट के तहत एक मुहिम की तरह चलाई जा रही हैं तो भी कोई गिला नहीं।
यथा-
चंद्रयान 2 की कुल लागत लगभग 900 करोड़। देश मे 100 करोड़ देशभक्त हैं। सिर्फ 9-9 रुपये हिस्से में आये। इसरो हम आपके साथ हैं। फिर से जुट जाओ और फिर से चंद्रयान को तैयार करो। देशभक्त धन की कमी नहीं होने देंगे। भारतमाता की जय।
नासा ने ग्यारहवीं बार में सफलता हासिल की थी। ओर इसरो सिर्फ 2 बार में ही 99.99 प्रतिशत सफलता हासिल की है। बधाई हो इसरो।
जिस मिशन पर अमेरिका ने 100 बिलियन डॉलर्स खर्च किये, वही काम हमारे वैज्ञानिकों ने महज 140 मिलियन में कर दिखाया।
मोदी जी से अनुरोध। इसरो के नाम पर एक अकाउंट खुलवा दो। 978 करोड़ तो बहुत छोटी रकम पड़ जाएगी। हमारे देश वासी उस अकाउंट को भर देंगे।
लाखों किलोमीटर का सफर तय करके मैं अपनी गाड़ी से गंतव्य तक तो पहुंचा, लेकिन मुझे पार्किंग नहीं मिली और मैं गाड़ी को पार्क नहीं कर सका तो क्या मेरा सफर अधूरा रह गया? तो क्या मैं गंतव्य तक नहीं पहुंचा? तो क्या मैं फेल हो गया? नहीं, बिलकुल नहीं।
आपकी बेटी या बेटा परीक्षा की कड़ी तैयारी कर 98 प्रतिशत अंक लाए और 2 प्रतिशत अंक नहीं ला पाए तो आप उसे सफल कहेंगे या असफल? बधाई हो। ये वैज्ञानिकों के साथ हर भारतवासी की सफलता है। यात्रा जारी रखिए।
इसरो के मिशन की असफलता अपनी जगह है, मगर उसमें भी मोदी के महिमामंडन को कैसे तलाशा जा रहा है, ये प्रतिक्रियाएं देखिए:-
आज से पहले कभी आपने देखा या सुना था कि कोई प्रधानमंत्री देर रात को अपने वैज्ञानिकों के प्रोत्साहन के लिए उनके साथ बैठा हो?
36 घंटे की रूस यात्रा के बाद। जब चन्द्रयान का संपर्क टूटा, तो कोई और नेता होता तो वहां से चला जाता, पर मोदी जी वहीं रहे, बच्चों से बात की, वैज्ञानिकों का हौसला बढ़ाया। ये भारत में एक अप्रत्याशित बात है। और ये सिर्फ मोदीजी ही कर सकते हैं।
चन्द्रयान-2 ने आज एक चमत्कारिक दृश्य दिखाया है। शीर्ष राजनीतिक और शीर्ष वैज्ञानिक पदों पर आसीन व्यक्ति के बीच हमने तीव्र भावनात्मक सम्बन्ध देखा। दोनों ऐसे गले मिले, मानो एकाकार हो गए हों। सत्ता ने विज्ञान की पीठ थपथपाई। सत्ता ने विज्ञान के कंधे सहलाए। सत्ता ने विज्ञान को भरोसा दिया।
सफलता के सौ बाप होते हैं, असफलता अनाथ होती है। प्रधानमंत्री मोदी भारत के रॉकस्टार हैं। रात भर खुद कंट्रोल रूम में बैठ मिशन देखा और मिशन के अंतिम फेस के असफल होने पर वह सारा दोष वैज्ञानिकों पर छोड़ भाग नहीं गए। उनका साथ दिया।
आज मोदी जी का इसरो को भाषण सुन के बहुत गर्व हुआ है, अपने आप पर कि मैंने देश की कमान एक अच्छे लीडर के हाथ मे दी है क्योंकि अच्छा लीडर वही होता है, जो अपनी टीम का मनोबल टूटने नहीं देता। अगर इसकी जगह कोई कांग्रेसी होता तो मुंह छुपाते घूमता। हमे आप पर गर्व है मोदी जी।
किसी कांग्रेसी ने प्रतिक्रिया दी हो या नहीं, मगर फिर भी कांग्रेस पर हमले जारी रहे। देखिए:-
70 साल हरामखोर अलगाववादियों, पत्थरबाजों, अब्दुल्ला-मुफ्ती फैमिली को मुफ्तखोरी कराने से तो चंद्रयान पर कम ही खर्च आया है।
आज असफल हुआ तो एक दिन सफल भी होगा। ये चंद्रयान-2 है यार कोई राहुल गांधी नहीं।
अगर कांग्रेस की सरकार होती तो विक्रम कभी क्रैश नहीं करता, क्योंकि तब विक्रम के प्रक्षेपण से पहले ही 2-4 वैज्ञानिकों को जहन्नुम प्रक्षेपित कर दिया जाता और मिशन का डब्बा बन्द हो जाता। फिर न विक्रम उड़ता, न क्रैश करता।
चंद्रयान लैंडर के संपर्क टूटने से वही लोग खुश हो रहे हैं, जो गलती से इस धरती पर पड़ोसियों की मदद से लैंड कर गए हैं।
चंद्रयान सफल नहीं हो पाया तो मोदी विरोधी हंस रहे हैं।  अब इनको देख कर ये समझ नहीं आता है कि ये मोदी विरोधी हैं या देश विरोधी?
असल में मोदी मौके पर वैज्ञानिकों का उत्साह बढ़ाने के लिए गए थे। प्रतीत ये भी होता है कि अगर मिशन कामयाब हो जाता तो पूरे देश में मोदी के जयकारे से आसमान सिर पर उठा लिया जाता। दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं। विपक्ष ने कुछ कहा ही नहीं फिर भी मोदी भक्तों को लगा कि कहीं मोदी को ट्रोल न कर दिया जाए, लिहाजा उन्होंने उन्हें डिफेंड करने की मुहिम छेड़ दी, जिसकी कत्तई जरूरत नहीं थी।
चूंकि इस संदर्भ में एक प्रतिक्रिया किसी मोदी विरोधी भी नजर आई, तो उसे भी शेयर किए देते हैं, ताकि सनद रहे:-
चन्द्रयान के जिन महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षणों में इसरो विज्ञानियों का सारा ध्यान अपने मिशन पर केंद्रित होना चाहिए था, तभी वहां मोदी द अंडरटेकर जा धमके। इसरो प्रमुख उनकी आगवानी को लपके। निष्ठावान वैज्ञानियों का ध्यान बंटा। बाहर से आए सुरक्षाकर्मियों ने सुरक्षा की दृष्टि से प्रत्येक वैज्ञानिकों की चेकिंग करनी शुरू कर दी। जरा सोचिए, अपने काम में व्यस्त वैज्ञानिकों के ऊपर क्या प्रभाव पड़ा होगा। भोंपू चैनल पहले ही भीषण मनोवैज्ञानिक दबाव क्रिएट कर चुके थे। तोपों की तरह कैमरे तने थे। अन्यथा मिशन सफल था। यान अपने अंतिम गन्तव्य को छू चुका था। उसे प्रचार प्रियता के हल्केपन ने असफल किया। जटिल ऑपरेशन कर रहे किसी सर्जन की बगल में कोई सेल्फी बाज जा खड़ा हो जाये, तो परिणाम क्या होगा?
-तेजवानी गिरधर
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गुरुवार, सितंबर 05, 2019

क्या संघ प्रमुख मोहन भागवत दरगाह जियारत करेंगे?

हाल ही देश के प्रमुख मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत से मुलाकात हुई। बताया जाता है कि इस दौरान दोनों के बीच हिन्दू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने और भीड़ द्वारा हत्या की घटनाओं (मॉब लिंचिंग) सहित कई मुद्दों पर बातचीत हुई। जानकारी के अनुसार दोनों की मुलाकात की भूमिका लंबे से तैयार हो रही थी और इसके लिए भाजपा के पूर्व संगठन महासचिव राम लाल मुख्य रूप से प्रयासरत थे। मौलाना मदनी ने आरएसएस प्रमुख से कहा कि हिंदू-मुस्लिम एकता और सांप्रदायिक सद्भाव के बिना हमारा देश बड़ी ताकत नहीं बन सकता। उन्होंने भीड़ द्वारा हत्या, घृणा अपराधों की घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत पर भी जोर दिया। एनआरसी और कुछ अन्य मुद्दों पर भी बात हुई।
 दोनों की मुलाकात ने मीडिया में खासी सुर्खियां बटोरीं। मीडिया में इस पर भी बहस हुई कि क्या इस मुलाकात के मायने ये निकाले जाएं कि संघ अब मुस्लिमों के प्रति कुछ उदार होने की दिशा में कदम उठा रहा है, वरना उन्हें मुस्लिम नेता कर क्या हासिल करना था। ज्ञातव्य है कि इससे पूर्व भागवत इस आशय का बयान भी दे चुके हैं कि इस हिंदुस्तान का हर नागरिक हिंदू है, अर्थात वे मुस्लिमों को अलग कर के नहीं देखते। इसके पीछे उनके अपने तर्क हैं। संघ की मूल अवधारणा भी है कि हिंदू कोई धर्म नहीं, अपितु एक संस्कृति है, जीवन पद्धति है, जिसमें यहां पल रहे सभी धर्मावलम्बी शामिल हैं।
इसे इस संदर्भ में भी देखा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में सबका साथ, सबका विकास नारा दिया था, जिसे दूसरे कार्यकाल में बदल कर उसके साथ सबका विश्वास भी जोड़ दिया गया। इसका अर्थ यही निकाला जा रहा है कि वे सभी धर्मों के लोगों का विश्वास भी जीतना चाहते हैं। आपको ख्याल होगा कि किसी जमाने में जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो मंच पर एक मुस्लिम नेता के हाथों टोपी पहनने से इंकार कर दिए जाने के कारण उन्हें कट्टरवादी करार दिया गया। बाद में प्रधानमंत्री बनने पर इस्लामिक देशों की यात्रा के दौरान उनका नरम हुआ रुख सबके सामने है।
हमें यह बात भी ख्याल में रखनी होगी कि मुस्लिमों को मुख्य हिंदूवादी धारा या राष्ट्रवाद से जोडऩे के लिए संघ के ही प्रमुख नेता इन्द्रेश कुमार पिछले कई साल से सतत प्रयास कर रहे हैं। मुस्लिम आत्मिक रूप से कितने जुड़ पाए हैं, इसका तो पता नहीं, मगर उनके सम्मेलनों में भारी तादाद में मुस्लिमों को शिरकत करते देखा गया है।
इसी संदर्भ में संघ के ही एक प्रमुख विचारक ने लिखा है कि आजादी से पूर्व संघ के संस्थापक डॉ0 केशवराव बलिराम हेडगेवार की सबसे बड़ी पीड़ा यह थी कि इस देश का सबसे प्राचीन समाज यानि हिन्दू समाज राष्ट्रीय स्वाभिमान से शून्यप्राय:, आत्म विस्मृति में डूबा था। इसी परिप्रेक्ष्य में संघ का उद्देश्य हिन्दू संगठन यानि इस देश के प्राचीन समाज में राष्ट्रीय स्वाभिमान, नि:स्वार्थ भावना व एकजुटता का भाव निर्माण करना बना। डॉ. हेडगेवार का यह विचार सकारात्मक सोच का परिणाम था। किसी के विरोध में या किसी क्षणिक विषय की प्रतिक्रिया में से यह कार्य नहीं खड़ा हुआ। अत: इस कार्य को मुस्लिम विरोधी या ईसाई विरोधी कहना संगठन की मूल भावना के ही विरुद्ध हो जायेगा।
विषय के विस्तार में जाएं तो हिन्दू के मूल स्वभाव - उदारता व सहिष्णुता के कारण दुनिया के सभी मत-पंथों को भारत में प्रवेश व प्रश्रय मिला। संघ की प्रार्थना में प्रार्थना में मातृभूमि की वंदना, प्रभु का आशीर्वाद, संगठन के कार्य के लिए गुण, राष्ट्र के परम वैभव (सुख, शांति, समृद्धि) की कल्पना की गई है। प्रार्थना में हिन्दुओं का परम वैभव नहीं कहा है, राष्ट्र का परम वैभव कहा है। अर्थात संघ मुसलमानों को अपने से अलग करके नहीं मान रहा, भले ही उनकी पूजा पद्धति भिन्न है।
तेजवानी गिरधर  
तस्वीर का दूसरा रुख ये है कि आज तक अधिकतर मुस्लिमों ने संघ से दूरी बना रखी है। ऐसे में संघ के समक्ष यह चुनौती है कि मोहन भागवत अजमेर की सरजमीं से यह संदेश दें कि संघ मुस्लिमों अथवा उनके धर्मस्थलों के प्रति घृणा का भाव नहीं रखता। विशेष रूप से सूफी मत की इस कदीमी दरगाह के प्रति, जो कट्टरवादी इस्लाम से अलग हट कर सभी धर्मों में भाईचारे का संदेश दे रही है।
प्रचंड बहुमत से सत्ता पर काबिज भाजपा के मातृ संगठन के प्रमुख के नाते उनकी ऐतिहासिक व पौराणिक पुष्कर में गरिमामय मौजूदगी विशेष अर्थ रखती है। तीर्थराज पुष्कर व सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह को अपने आचंल में समेटे ऐतिहासिक अजमेर दुनिया भर को सांप्रदायिक सौहाद्र्र का संदेश देता है। यह शहर इस बात का भी गवाह रहा है कि राजा हो या रंक, हर कोई दोनों अंतर्राष्ट्रीय धर्मस्थलों पर हाजिरी जरूर देता है। ऐसे में आमजन में यह सवाल कुलबुला रहा है कि क्या आप भी पुष्कर के अतिरिक्त दरगाह के प्रति भी अपनी श्रद्धा व्यक्त करेंगे। अजमेर में अपनी मौजूदगी का लाभ उठाएंगे? क्या दरगाह जियारत करके अथवा दरगाह में सिर्फ औपचारिकता मात्र के लिए श्रद्धा सुमन अर्पित करके कोई उदाहरण पेश करेंगे? क्या भाजपा से जुड़े मुस्लिमों को अपनी जमात में गर्व से सिर उठाने का मौका देंगे? या फिर इस सवाल को अनुत्तरित ही छोड़ देंगे?
उल्लेखनीय है कि तकरीबन दस साल बाद भागवत अजमेर की सरजमीं  पर उपस्थित हुए हैं। पूर्व में वे अजयनगर के अविनाश माहेश्वरी पब्लिक स्कूल परिसर में ठहरे थे। तीन दिन के अजमेर प्रवास और अंत में आजाद बाग में उन्होंने संघ कार्यकर्ताओं को संबोधित किया था। ठीक दस साल बाद मोहन भागवत अजमेर की धरती पर आए हैं और इस बार ब्रह्मा की नगरी तीर्थराज पुष्कर की धरा पर प्रवास कर रहे हैं। दस साल पूर्व भी अजमेर आगमन पर ये सवाल उठा था कि क्या वे दरगाह जियारत को जाएंगे? आज भी यह सवाल मौजूं है। विशेष रूप से मौलाना अरशद मदनी से हुई मुलाकात से तनिक उदार होने का संकेत मिलने के बाद।
-तेजवानी गिरधर 
7742067000

शुक्रवार, अगस्त 30, 2019

धारा 370 का विरोध पाक परस्ती कैसे हो गया?

जो काम पिछले सत्तर साल में कोई सरकार नहीं कर पाई, वह भाजपा ने पूर्ण बहुमत हासिल करने के बाद कर दिखाया। जी, बात जम्मू-कश्मीर में धारा 370 व 35 ए को हटाने की है। यह भाजपा का जन्मजात चुनावी मुद्दा था। जाहिर तौर पर वह अपनी पीठ भी थपथपा रही है। पिछले पांच अगस्त को सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठा तो लिया, चक्रव्यूह भेद तो दिया, मगर अब उसमें से कैसे निकला जाएगा, यह भविष्य के गर्भ में है, क्यों कि मामला दिन ब दिन पेचीदा होता जा रहा है। कश्मीर, विशेष रूप से घाटी सेना के पूर्ण कब्जे में है। जनजीवन ठप है। सरकार हालांकि हालात सामान्य जताने की कोशिश कर रही है, मगर मीडिया व संचार माध्यमों पर नियंत्रण के बावजूद छन-छन कर आ रही खबरें इशारा कर रही हैं कि हालात काफी गंभीर हैं।
इस बीच मौलिक अधिकारों के हनन व अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश की कड़ी आलोचना भी होने लगी है। लोकतंत्र में विरोध के इन सुरों को पाकिस्तान परस्ती करार दिया जा रहा है। जो भी खिलाफत कर रहा है, उसके प्रति नफरत फैलाई जा रही है। सवाल ये उठता है कि जब कश्मीर हमारा आंतरिक मामला है तो उस पर पाकिस्तान के रुख व संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका की फिक्र क्यों की जा रही है? कश्मीर निस्संदेह हमारा ही है तो पाकिस्तान के रवैये का कॉग्लीजेशन काहे को ले रहे हैं? कहा जा रहा है कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कश्मीर के हालात पर टिप्पणी करके पाकिस्तान परस्ती का काम किया है। पाकिस्तान को उनकी टिप्पणी को संयुक्त राष्ट्र संघ में कोट करने का मौका मिल गया है। केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने तो यहां तक कह दिया कि राहुल पाक के हाथ खेल रहे हैं।
असल में हुआ ये कि पाकिस्तान के मानवाधिकार मंत्री डॉ. चिरीन मजारी ने यूएनओ को आठ पेज की एक पिटीशन भेजी है, जिसमें न केवल राहुल के बयान का जिक्र है, अपितु हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर व खतौली के भाजपा विधायक विक्रम सैनी के बयान का भी हवाला है। ज्ञातव्य है कि राहुल ने कश्मीर में हालात खराब होने का बयान दिया है। इसी प्रकार खट्टर ने कहा था कि हमारे युवक अब कश्मीर की गोरी लड़कियों से शादी कर सकते हैं। सैनी ने कहा था कि अब हमारे मुस्लिम वर्कर अब कश्मीर में विवाह कर सकते हैं। आठ पेज के पत्र में राहुल का मामूली जिक्र है, मगर भाजपा प्रवक्ता राहुल पर बढ़-चढ़ कर हमले बोल रहे हैं। विपक्ष के धारा 370 को हटाने के विरोध को यूनए में वेटेज मिलेगा। दूसरी ओर खट्टर व सैनी के बयानों को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट में भी इसी मुद्दे पर हुए वाकये से जाहिर होता है कि सरकार प्रकरण यूएन में जाने से घबरा रही है। जब कुछ यचिकाओं की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पांच जजों की एक संविधान पीठ बनाने की मंशा जताई तो सरकार के अटार्नी जनरल के के वेनु गोपाल व सोलिसटिर जनरल तुषार महेता ने कहा कि आपके फैसले को पाकिस्तान यूएन में ले जाएगा।
प्रश्र ये है कि जो भी कश्मीर पर सरकार के कदम से इतर राय रखता है, उसे पाक परस्त बताया जा रहा है, तो क्या सुप्रीम कोर्ट का समीक्षा के लिए संविधान पीठ बनाना भी पाक परस्ती है? सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया की आजादी पर अंकुश को लेकर सरकार को नोटिस जारी किया है, तो वह भी क्या पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र संघ में मुद्दा उठाने का हथियार माना जाए?
घूम फिर कर बात यही है कि राहुल गांधी की टिप्पणी व सुप्रीम कोर्ट के कदम से पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दा उठाने का मौका मिल गया है तो सरकार को चिंता क्यों हो रही है? जब आप कहते हैं कि कश्मीर हमारा है और वहां धारा 370 हटाने का निर्णय हमारा पूर्णत: आतंरिक मामला है तो हम पाकिस्तान के विरोध से क्यों घबरा रहे हैं? पाकिस्तान अगर संयुक्त राष्ट्र संघ में हमारा विरोध करता भी है तो हम उससे क्यों डर रहे हैं? जब हम कह रहे हैं कि पूरी दुनिया के देश हमारे साथ हैं और पाकिस्तान अकेला है तो फिर डर काहे का है।
आपको याद होगा कि जब संसद में बहस के दौरान कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन ने यह सवाल किया था कि क्या कश्मीर द्विपक्षीय मामला है तो उन पर ताबड़तोड़ हमला किया गया था। आज सरकार खुद मामला द्विपक्षीय होते देख चिंतित है। वह यह उम्मीद करती है कि कोई भी सरकार के फैसले के खिलाफ न बोले।
अब बात करते हैं धारा 370 की। बेशक सरकार को यह अख्तियार था कि वह धारा 370 हटा दे। उसने संसद में बहुमत के आधार पर हटा भी दी। मगर क्या यह जरूरी है कि अन्य विपक्षी दल भी सरकार के कदम से सहमत हों। बेशक कुछ कांग्रेसी नेताओं ने सहमति जताई है, मगर धारा 370 को हटाने के तरीके पर सवाल भी उठाए हैं। उनका कहना है कि इसके लिए कश्मीर की जनता व वहां के जनप्रतिधियों को विश्वास में लिया जाना चाहिए था? अहम बात ये है कि धारा 370 हटाने की आलोचना करना पाकिस्तान परस्ती कैसे हो गई? धारा 370 को देशभक्ति व राष्ट्रवाद से जोड़ कर कैसे देखा जा सकता है? जो धारा 370 को हटाए जाने अथवा इसे हटाने के असंवैधानिक तरीके पर सवाल उठा रहे हैं, वे देश विरोधी कैसे हो गए? बेशक पाकिस्तान बिना हक के विरोध कर रहा है, मगर हम उसे दरकिनार भी तो कर रहे हैं। चूंकि धारा 370 पर हमारी राय पाकिस्तान से मेल खा रही है तो इसका मतलब ये तो नहीं हो सकता कि हम पाक के डर से हमारे आंतरिक मसले पर अपनी राय भी जाहिर न करें। कहीं हम पाकिस्तान का डर दिखा कर भारत के आंतरिक विषय को जानबूझ कर राष्ट्रवाद से तो नहीं जोड़ रहे? जब पाकिस्तान हमारे सामने पिद्दी है और उसके विरोध के कोई मायने नहीं हैं तो क्यों पाकिस्तान का हौवा खड़ा कर रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि चूंकि हर आम भारतीय के मन में पाकिस्तान के प्रति नफरत है, इस कारण जानबूझकर पाक खौफ दिखा कर इस मुद्दे को राष्ट्रीय हित का गढ़ रहे हैं?
एक अहम बात और। हाल ही कश्मीर के राज्यपाल ने जो बयान दिया कि चुनाव में लोग धारा 370 का विरोध करने वालों को जूते मारेगी, वह किस बात का संकेत है? यानि कि या तो आप सहमत हो जाएं वरना आपको जूते मारे जाएंगे। ये किस किस्म की तानाशाही है? बाद में क्या आप तो अब भी सवाल खड़े करने वालों को जूते मार रहे हैं। जूते तो बहुत कम बात है, आप तो उन्हें देश विरोधी ही करार दिए जा रहे हैं। समझा जा सकता है कि किसी भी भारतीय के लिए देश विरोधी शब्द डूब मरने के समान गाली है।
लब्बोलआब, मामला उलझता जा रहा है और कैसे सुलझेगा, कश्मीर के हालात कैसे सामान्य होंगे, कुछ कहा नहीं जा सकता।
तेजवानी गिरधर
7742067000

सोमवार, अगस्त 12, 2019

कांग्रेस का परिवारवाद : ऐतराज भी, अनिवार्यता भी

लोकसभा चुनाव में बुरी तरह से पराजित होने के बाद नैतिकता के आधार पर राहुल गांधी के अध्यक्ष पद छोडऩे के पश्चात काफी दिन बाद भी नया पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं बनने से कांग्रेस के नेता व कार्यकर्ता चिंतित हैं। यह स्वाभाविक भी है, क्यों कि इस मसले के साथ उनका राजनीतिक भविष्य जुड़ा हुआ है। मगर ऐसा प्रतीत होता है कि उनसे भी अधिक चिंता मीडिया को है। यह वही मीडिया है जो कि कांग्रेस के परिवारवाद पर लगातार हमले करता है, मगर साथ यह भी कहता है कि नेहरू-गांधी परिवार के बिना कांग्रेस का वजूद ही खत्म हो जाएगा। जब राहुल इस्तीफा देते हैं तो पहले कहते हैं कि वे नौटंकी कर रहे हैं, मगर जब राहुल अपने इस्तीफे पर अड़ ही जाते हैं तो कहता है कि उन्हें रणछोड़दास नहीं बनना चाहिए, इससे आम कांग्रेस कार्यकर्ता हतोत्साहित है और कांग्रेस बिखर जाएगी। गहन चिंतन-मनन के बाद जब पार्टी के अधिसंख्य नेता दबाव बनाते हैं तो सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष बनने को राजी हो जाती हैं, इस पर फिर वही राग छेड़ते हैं कि देखा, आखिर पार्टी परिवारवाद से छुटकारा नहीं कर पा रही। इस मुद्दे पर वाट्स ऐप यूनिवर्सिटी के आदतन टिप्पणीकार बाकायदा मुहिम छेड़ हुए हैं, जिनमें कई अभद्र टिप्पणियां हैं।
चलो मीडिया को तो करंट मुद्दा चाहिए होता है, डिस्कशन करने को, मगर भाजपा नेता भी बड़े परेशान हैं। बात वे यह कह कर शुरू करते हैं कि यह कांग्रेस का आंतरिक मामला है, मगर फिर घूम फिर कर इस बात पर आ जाते हैं कि कांग्रेस परिवारवाद से बाहर नहीं आ पाएगी।
पहले मीडिया की बात। अमूमन कांग्रेस विरोधी व प्रो. मोदी रहे जाने-माने पत्रकार डॉ. वेद प्रताप वैदिक ने हाल ही एक पोस्ट शाया की है। उनकी चिंता है कि कांग्रेस अपना अध्यक्ष कैसे चुने। वे कहते हैं कि कांग्रेस-जैसी महान पार्टी कैसी दुर्दशा को प्राप्त हो गई है ? राहुल गांधी के बालहठ ने कांग्रेस की जड़ों को हिला दिया है। कांग्रेस के सांसद और कई प्रादेशिक नेता रोज-रोज पार्टी छोडऩे का ऐलान कर रहे हैं। मुझे तो डर यह लग रहा है कि यही दशा कुछ माह और भी खिंच गई तो कहीं कांग्रेस का हाल भी राजाजी की स्वतंत्र पार्टी, करपात्रीजी की रामराज्य परिषद, लोहियाजी की समाजवादी पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की तरह न हो जाए।
वे सीधे तौर पर कांग्रेस की हालत बयां कर रहे हैं, मगर साथ ही यह भी स्वीकार कर रहे हैं कि भारतीय लोकतंत्र के लिए यह अत्यंत चिंताजनक चुनौती होगी। इस समय देश को एक मजबूत, परिपक्व और जिम्मेदार विपक्ष की बहुत जरूरत है। उसके बिना भारत एक बिना ब्रेक की मोटर कार बनता चला जाएगा।
इसी प्रकार एक लेखक को चिंता है कि आखिर कौन संभालेगा अब सौ वर्ष से भी ज्यादा पुरानी पार्टी को? विशेष रूप से धारा 370 हटने के बाद जिस प्रकार पार्टी के बड़े नेताओं ने पार्टी लाइन से हट कर निर्णय का स्वागत किया है, उससे बगावत के हालात बन रहे हैं। उन्हें चिंता है कि जब कांग्रेस का स्वयं का नेतृत्व ही कमजोर है, तो विपक्ष की एकता क्या होगा? यानि कि वे कांग्रेस की अहमियत को भी समझ रहे हैं। इसी लिए सलाह देते हैं कि कांग्रेस को अपनी भूमिका जल्द तय करनी चाहिए। साथ ही राहुल गांधी को ये सलाह देते हैं कि वे यह अच्छी तरह समझ लें कि गांधी परिवार के बगैर कांगे्रस का कोई वजूृद नहीं है।
एक लेखक को दिक्कत है कि जिन सोनिया गांधी ने कभी राहुल गांधी को कहा था कि सत्ता जहर है, उन्होंने वापस कांग्रेस अध्यक्ष का पद इसलिए संभाल लिया, क्योंकि उन्हें पता है कि अब कांग्रेस को कई साल तक यह जहर पीना नसीब नहीं होगा। वे घोषित कर रहे हैं कि भले ही सोनिया ने पार्टी के उद्धार के लिए उसे अपने आंचल में समेट लिया है, मगर अब वह शायद जल्द संभव नहीं है। अधिसंख्य पत्रकारों की तरह उनको भी चिंता है कि कांग्रेस हालत देश और लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। ये स्थिति सत्ता पक्ष को बेलगाम और तानाशाह बना सकती है।
कुल जमा निष्कर्ष ये है कि सभी कांग्रेस के परिवारवाद की आलोचना भी कर रहे हैं, साथ ये भी स्वीकार कर रहे हैं कि नेहरू-गांधी परिवार के बिना कांग्रेस खत्म हो जाएगी। साथ ही यह चिंता भी जता रहे हैं कि अगर कांग्रेस की हालत खराब हुई तो मजबूत विपक्ष का क्या होगा, लोकतंत्र का क्या होगा? कैसा विरोधाभास है? अपने तो समझ से बाहर है। अपुन को तो यही लगता है कि मीडिया का जो भी मकसद हो, मगर ये मीडिया ही कांग्रेस के वजूद को कायम करने वाला है।
वैसे असल बात ये है कि भले ही कांग्रेस एक परिवार पर ही टिकी हो, मगर दरअसल यह एक पार्टी से कहीं अधिक एक विचारधारा है। चाहे हिंदूवादी विचारधारा कितनी भी प्रखर हो जाए, मगर धर्मनिरपेक्षता की विचारधारा सदैव कायम रहेगी। किसी भी नाम से। कहते हैं न कि विचार कभी समाप्त नहीं होता। एक जमाना था, जब भाजपा के महज दो ही सांसद लोकसभा में थे। मगर पार्टी हतोत्साहित नहीं हुई। अपने विचार को लेकर चलती रही और आज सत्ता पर प्रचंड बहुमत के साथ काबिज है।
एक बड़ी सच्चाई ये भी है कि आम भारतीय कट्टर नहीं है, कभी हवा में बहता जरूर है, मगर फिर लिबरल हो जाता है, क्यों कि यही उसका स्वभाव है। ठीक वैसे ही, जैसे पानी को कितना भी गरम कर लो, मगर फिर अपने स्वभाव की वजह से शीतल हो जाता है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

गुरुवार, अगस्त 08, 2019

राष्ट्रवाद की खातिर संविधान को ताक पर रखने में क्या ऐतराज है?

ऐसा लगता है कि भारत के संविधान निर्माताओं से एक गलती हो गई।  उन्हें संविधान में यह भी लिख देना चाहिए था कि अगर देश हित का मुद्दा हो तो संविधान को तोडऩे-मरोडऩे में कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए। उनकी इसी गलती का परिणाम ये है कि कश्मीर में धारा 370 व 35 ए हटाने के मसले पर आज कुछ बुद्धजीवी यह हिमाकत कर रहे हैं कि वे केन्द्र सरकार के निर्णय को असंवैधानिक बता रहे हैं।
आज जब अधिसंख्यक भारतीय देशभक्ति के नाम पर सरकार के निर्णय को सही ठहरा रहे हैं, ऐसे में चंद बुद्धिजीवी यह कह कर सरकार की आलोचना कर रहे हैं कि सरकार ने पूरे कश्मीर को नजरबंद करने के साथ वहां के नेताओं व अवाम  को विश्वास में लिए बिना अपना निर्णय थोप दिया है। यह अलोकतांत्रिक है। कानूनी लिहाज से भले ही कश्मीर का मुद्दा संविधान की बारिकियों से जुड़ा हुआ हो, मगर सच्चाई ये है कि आज धारा 370 का मुद्दा राष्ट्रवाद से जोड़ा जा चुका है। जो भी इस धारा को हटाने के खिलाफ है, उसे राष्ट्रद्रोही करार दिया जा रहा है।
तेजवानी गिरधर
उन चंद बुद्धिजीवियों का कहना है कि संविधान में यह स्पष्ट रूप से लिखा है कि राष्ट्रपति धारा 370 को हटा सकते हैं, मगर उससे पहले उन्हें जम्मू कश्मीर विधानसभा से राय मश्विरा करना होगा। चूंकि वर्तमान में जम्मू कश्मीर में विधानसभा अस्तित्व में नहीं है और राज्य पर केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर राज्यपाल का नियंत्रण है, इस कारण सरकार का निर्णय असंवैधानिक है। उनका तर्क ये है कि चूंकि राज्यपाल केन्द्र का ही प्रतिनिधि है, इस कारण उसकी राय के कोई मायने ही नहीं रह जाते। एक तरह से यह एकतरफा निर्णय है, जिसमें कश्मीर की जनता या वहां के प्रतिनिधियों को नजरअंदाज किया गया है। उनके मुताबिक चूंकि इस मामले में संविधान की अवहेलना की गई है, इस कारण इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौति दी जा सकती है। एक व्यक्ति ने चुनौति दे भी दी है। संभव है कुछ और लोग या कांग्रेस की ओर से भी चुनौति दी जाए। मगर उससे भी बड़ा सवाल ये है कि जब भाजपा, जिसके चुनावी एजेंडे में शुरू से इस धारा को हटाने पर जोर दिया जाता रहा है, के साथ अन्य विपक्षी दल भी सरकार के निर्णय से सहमत हैं, तो हमारे महान लोकतंत्र में बहुसंख्यक की राय को गलत कैसे कहा जा सकता है? यहां तक कि पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त जम्मू कश्मीर को केन्द्र शासित प्रदेश बनाए जाने पर भी आम आदमी पार्टी के कर्ताधर्ता अरविंद केजरीवाल, जो कि दिल्ली के मुख्यमंत्री भी हैं, ने निर्णय का स्वागत किया है, जबकि वे जब से मुख्यमंत्री बने हैं, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की पैरवी करते रहे हैं। संभवत: यह पहला मौका है, जबकि किसी पूर्ण राज्य, जो कि विशेषाधिकार प्राप्त भी है, को केन्द्र शासित प्रदेश बनाया गया है। कई बड़े कांग्रेसी नेताओं ने भी सरकार के निर्णय का स्वागत किया है। कुछ लोग कांग्रेस के सरकार के इस ऐतिहासिक निर्णय के खिलाफ खड़े होने को आत्मघाती कदम बताया जा रहा है। कांग्रेस देश के मूड को समझने की बजाय उस पाले में खड़ी है, जहां से वह रसातल में चली जाएगी। समझा जा सकता है कि अरविंद केजरीवाल सहित कुछ कांग्रेसी इस कारण सरकार के निर्णय के साथ खड़े होने को मजबूर हैं, क्योंकि विरोध करने पर बहुसंख्यक हिंदूवादी समाज पूरी तरह से उनके खिलाफ जो जाएगा। केजरीवाल को तो जल्द ही चुनाव का सामना भी करना है। ऐसा सिद्धांत जाए भाड़ में, जिसके चक्कर में सत्ता हाथ से निकल जाए।
वैचारिक रूप से भाजपा से भिन्न बसपा भी सरकार के साथ है। बताया जा रहा है कि चूंकि मायावती का मूलाधार दलित वोट हैं, वे समझती हैं कि फैसले से जम्मू-कश्मीर में दलित हिन्दुओं को नागरिकता एवं अच्छी नौकरी मिल सकेगी। कुछ मानते हैं कि मायावती ने स्वयं और अपने भाई को जेल जाने से बचाने के लिए ऐसा किया है। मायावती ने आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में भाई आनन्द सहित जेल जाने से बचने एवं हाल ही में उनके भाई के लगभग 4 सौ करोड़ रूपए के जब्त किए गए बेनामी प्लाट्स को वापस हासिल करने के लिए यह कदम उठाया है।
असल में धारा 370 का मसला पाकिस्तान से चिर दुश्मनी, देश भक्ति, राष्ट्रवाद और हिंदू-मुस्लिम से जुड़ गया है। उसके अपने अनेक कारण हैं। पाकिस्तान आए दिन सीमा पर गड़बड़ी करता है। अशांति फैलाने के लिए अपने आतंकवादियों को लगातार वहां भेज रहा है। कश्मीर के अनेक अलगाववादी अपने आप को भारतीय ही नहीं मानते। विशेष रूप से घाटी तो कश्मीरी पंडितों से विहीन हो गई है। अलगाववादियों के बहकावे में कश्मीर के युवक सरकारी सैनिकों पर पत्थरबाजी करते हैं। नतीजा ये हुआ है कि आम भारतीयों, विशेष रूप से हिंदूवादियों को मुस्लिम कश्मीरियों से नफरत सी हो गई है। अब तकलीफ इस बात से नहीं कि भारी तादाद में सेना व पैरामिलिट्री फोर्सेस की तैनाती से कश्मीरी कितनी यंत्रणा भुगत रहा है। मतलब इस बात से है कि कश्मीर की जमीन पर हमारा नियंत्रण है। ऐसे माहौल में जो भी कश्मीरियों के नागरिक अधिकारों या संविधान की बात करेगा, वह देशद्रोही व पाकिस्तान परस्त माना जाएगा।
बुद्धिजीवियों का एक तबका ऐसा भी है, जो सरकार के निर्णय के बाद देशभर के सोशल मीडिया पर हो रही छींटाकशी से आशंकित है कि कहीं इससे हालात और न बिगड़ जाएं। एक पोस्ट में लिखा है कि इस ऐतिहासिक फैसले को सही साबित करना भी हमारी जिम्मेदारी है, क्योंकि नोटबंदी भी एक ऐतिहासिक फैसला था, जिसे अपने ही भ्रष्ट तंत्र ने विफल कर दिया था। भाषायी संयम बनाए रखें।  कश्मीरवासियों को भी यह अहसास करवाएं कि हम आपके साथ हैं। प्लॉट खरीदने जैसे लालची उपहास बना कर घृणा मत बोइये। यह कोई कबड्डी का मैच नहीं था, जो कोई हार गया है और उसे हारग्या जी हार ग्या कह कर चिढ़ाओ। फब्तियां कभी भी मोहब्बत के बीज नहीं बो सकती, नफरत ही पैदा करेगी।
एक और बानगी देखिए:-
न कश्मीर की कली चाहिए
न हमें प्लॉट चाहिए
मेरे किसी फौजी भाई का
शरीर तिरंगे में लिपट कर न आये
बस यही हिंदुस्तान चाहिए
इस पोस्ट से समझा जा सकता है कि ये उन लोगों को नसीहत है, जो कश्मीर की लड़की से शादी करने व वहां प्लॉट खरीदने वाली पोस्टें डाल रहे हैं।
मोदी के भक्तों के फैसले के समर्थन तक तो ठीक है, मगर बाकायदा मोदी का महिमामंडन और फारुख अब्दुल्ला व महबूबा मुफ्ती पर तंज कसती अपमानजनक टिप्पणियां करने से माहौल के सुधरने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। कश्मीरी युवतियों के बारे में बेहद अश्लील पोस्टें डाली जा रही हैं, मानों वे इसी दिन का इंतजार कर रहे थे। मोदी भक्त उन बुद्धिजीवियों व कानून विशेषज्ञों को भी ट्रोल कर रहे हैं, जो फैसले की कानूनी व संवैधानिक समीक्षा कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि कोई भी किसी भी प्रकार का विरोध न करे। बस मोदी-शाह ने जो कर दिया, उसे चुपचाप मान जाओ।
फैसले की खिलाफत करने वालों के अपने तर्क हैं, जिनमें दम भी है। वो है:-
आर्टिकल 371 ए नागालैंड, आर्टिकल 371 बी असम, आर्टिकल 371 सी मणिपुर, आर्टिकल 371 एफ सिक्किम और आर्टिकल 371जी मिज़ोरम, इतने स्टेट हैं, वर्तमान गृहमंत्री को केवल जम्मू-कश्मीर का ही आर्टिकल 370 और आर्टिकल 35 ए ही नजऱ आ रहा है। बदलाव करना है, तो सब में करो, दिक्कत क्या है। एक और तर्क ये कि नागालैंड को अलग संविधान, अलग झंडा और विशेष अधिकार आपकी सरकार ने ही दिया है न, तो फिर ये तो दोगलापन ही हुआ न। बदलाव हो रहा है, तो सब में करो।
बहरहाल, अब जब कि सरकार फैसला कर ही चुकी है, तो अब चिंता इस बात की है कि कहीं फोर्स हटाने पर बवाल न हो जाए। फैसले से पहले पूरे कश्मीर को कैद में करने से ही ये जाहिर है कि सरकार को भी उत्पात होने की आशंका है।
रहा सवाल पूर्व सीएम फारुख अब्दुल्ला व महबूबा मुफ्ती के वजूद का तो वह भी अधर में है। आजाद होने पर उनका रुख क्या होगा, कुछ पता नहीं।
कुल जमा बात ये है कि भले ही ताजा फैसले से भाजपा के एजेंडे का एक वादा पूरा हो गया हो, मगर जिस प्रकार मोदी वादी इस मामले में बढ़-चढ़ कर अंटशंट टिप्पणियां कर रहे हैं, उससे माहौल बिगड़ेगा ही।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

सोमवार, जुलाई 15, 2019

क्या भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत का सपना कभी साकार हो पाएगा?

यह एक सर्वविदित सत्य है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल के आखिरी दिनों तक जब प्रमुख विपक्षी दल भाजपा अपनी भूमिका में पूरी तरह से नाकामयाब रहा, तब समाजसेवी अन्ना हजारे का आंदोलन खड़ा हुआ। वह इतना प्रचंड था कि कांग्रेस की जड़ें ही हिला कर रख दीं। अन्ना हजारे की गलती ये थी कि वे व्यवस्था परिवर्तन की जमीन तो बनाने में कामयाब हो गए, मगर उसका विकल्प नहीं दे पाए। अर्थात वैकल्पिक राजनीतिक दल नहीं दे पाए। नतीजतन उनके ही शिष्य अरविंद केजरीवाल को उनसे अलग हो कर नया दल आम आदमी पार्टी का गठन करना पड़ा।  मगर चूंकि वह भ्रूण अवस्था में था, इस कारण खाली जमीन पर भाजपा को कब्जा करने का मौका मिल गया। वह भी तब जबकि उसने नरेन्द्र मोदी को एक ब्रांड के रूप में खड़ा किया। ब्रांडिंग के अपने किस्म के भारत में हुए इस अनूठे व पहले प्रयोग को जबरदस्त कामयाबी मिली और कांग्रेस के खिलाफ आंदोलित हुई जनता ने कांग्रेस मुक्त भारत के नारे के साथ मोदी को प्रतिष्ठापित कर दिया। मोदी ने प्रयोजित तरीके से पूरी भाजपा पर कब्जा कर लिया और अपने से कई गुना प्रतिष्ठित व वरिष्ठ नेताओं यथा लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी सरीखों को सदा के लिए हाशिये पर डाल दिया। पूरे पांच साल के कार्यकाल को उन्होंने एक तानाशाह की तरह जिया और मंत्रीमंडल के अपने समकक्ष सहयोगियों अरुण जेठली, राजनाथ सिंह व सुषमा स्वराज सरीखे नेताओं को दबा कर रखा।
पांच साल तक नोटबंदी व जीएसटी जैसे पूरी तरह से नाकायाब कदमों और महंगाई, रोजगार व धारा 370 जैसे मुद्दों पर रत्तीभर की सफलता हासिल न कर पाने के कारण ऐसा लगने लगा कि मोदी ब्रांड की जीवन अवधि बस पांच साल ही थी। इसके संकेत कुछ विधानसभाओं के चुनाव में भाजपा की हार से मिल रहे थे। मगर चुनाव के नजदीक आते ही संयोग से उन्हें सर्जिकल स्ट्राइक करने का मौका मिल गया और यकायक उपजे नए राष्ट्रवाद ने मोदी की सारी विफलताओं पर चादर डाल दी। चुनाव आयोग सहित अन्य प्रमुख सवैंधानिक संस्थाओं को कमजोर कर उन्होंने बड़ी आसानी ने पहले से भी ज्यादा बहुमत से सत्ता अपने शिकंजे में ली ली। उन्होंने न केवल उत्तर प्रदेश में महागठबंध को धाराशायी कर दिया, अपितु पश्चिम बंगाल में धमाकेदार एंट्री भी की। यहां तक कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी पुश्तैनी सीट तक को नहीं बचा पाए। हार की जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया। ये पंक्तियां लिखे जाने तक गांधी-नेहरू परिवार से बाहर के नए अध्यक्ष को लेकर उहापोह दिखाई दे रही है। ऐसे में भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत का नारा कामयाब होता दिखाई दे रहा है। गोवा व कर्नाटक में हुई उठापटक उसी दिशा में बढ़ते कदम हैं। यहां तक कि राजस्थान व मध्यप्रदेश की बारी आने के दावे किए जा रहे हैं।
इन सब के बावजूद यदि ये कहा जाए कि कांग्रेस मुक्त भारत का सपना कभी साकार नहीं हो पाएगा, वह अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकता है, मगर यह एक सच्चाई है। कोई माने या न माने। हां, प्रयोग के बतौर गांधी-नेहरू परिवार मुक्त कांग्रेस जरूर बनाई जा सकती है, मगर पलेगी वह इसी परिवार के आश्रय में। रहा सवाल कांग्रेस मुक्त भारत का तो वह इसीलिए संभव नहीं है, क्योंकि कांग्रेस महज एक पार्टी नहीं, वह एक विचारधारा है। धर्मनिरपेक्षता की। ठीक वैसे ही जैसे मोदी एक आइकन हैं, मगर उनकी पृष्ठभूमि को ताकत हिंदूवाद की विचारधारा से मिलती है। हिंदूवाद जिंदा रहेगा, और भी बढ़ सकता है, मगर साथ ही धर्मनिरपेक्षता भी सदा जिंदा रहेगी। और सच तो ये है कि देश का आम आदमी लिबरल है। देश में अस्सी फीसदी हिंदुओं के बावजूद हिंदूवाद की झंडाबरदार भाजपा को अपेक्षित कामयाबी इस कारण नहीं मिल पाती, चूंकि हिंदुओं का एक बड़ा तबका धर्मनिरपेक्षता में यकीन रखता है। इसके साथ ही हिंदू जातिवाद व क्षेत्रवाद में भी बंटा हुआ है।  पाकिस्तान के प्रति सहज नफरत के चलते उपजाया गया तथाकथित राष्ट्रवाद उसे प्रभावित तो करता है, नतीजतन भाजपा को 303 सीटें मिल जाती हैं, मगर फिर भी वह धार्मिक रूप से कट्टर नहीं है। कभी उफनता भी है तो फिर शांत भी हो जाता है, जैसे पानी को कितना भी गरम किया जाए, सामान्य होते ही शीतल हो जाता है। अकेली इसी फितरत की वजह से उग्र हिंदूवाद को लंबे समय तक जिंदा रखना आसान नहीं है। ऐसे में धर्मनिरपेक्षता सदा कायम रहने वाली है। भले ही कांग्रेस कमजोर हो जाए, मगर विचारधारा के नाम पर कांग्रेस का वजूद बना रहेगा। अगर कांग्रेस किसी दिन खत्म होने की कल्पना कर भी ली जाए, तब भी धर्मनिरपेक्षता किसी और नाम से जिंदा रहेगी, उसे खत्म करने की किसी में ताकत नहीं है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

बुधवार, जुलाई 10, 2019

मीडिया अब भी हमलावर है कांग्रेस पर

हमने पत्रकारिता में देखा है कि आमतौर पर मीडिया व्यवस्था में व्याप्त खामियों को ही टारगेट करता था। सरकार चाहे कांग्रेस व कांग्रेस नीत गठबंधन की या भाजपा नीत गठबंधन की, खबरें सरकार के खिलाफ ही बनती थीं। वह उचित भी था। यहां तक कि यदि विपक्ष कहीं कमजोर होता था तो भी मीडिया लोकतंत्र में चौथे स्तम्भ के नाते अपनी भूमिका अदा करता था। आपको ख्याल होगा कि जेपी आंदोलन व वीपी सिंह की मुहिम में भी मीडिया सरकार के खिलाफ साथ दे रहा था। जब मनमोहन सिंह का दूसरा कार्यकाल अंतिम चरण में था, और भाजपा विपक्ष की भूमिका ठीक से नहीं निभा पाया तो अन्ना आंदोलन को मीडिया ने भरपूर समर्थन दिया। मगर लगता है कि अब सारा परिदृश्य बदल गया है।
नरेन्द्र मोदी के पिछले कार्यकाल में लगभग सारा मीडिया उनका पिछलग्गू हो गया था। विपक्ष में होते हुए भी जब-तब कांग्रेस ही निशाने पर रहती थी। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले और चुनाव प्रचार के दौरान तो मीडिया बाकायदा विपक्ष में बैठी कांग्रेस पर प्रयोजनार्थ हमलावर था ही, नरेन्द्र मोदी को दूसरी बार मिली प्रचंड जीत के बाद भी उसका निशाना कांग्रेस ही है। न तो उसे तब पुरानी मोदी सरकार के कामकाज की फिक्र थी और न ही नई मोदी सरकार की दिशा व दशा की परवाह है। उसे चिंता है तो इस बात की कि कांग्रेस का क्या हो रहा है? राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा क्यों दिया? पहले कहा कि सब नौटंकी है, मान-मुनव्वल के बाद मान जाएंगे, अब जब यह साफ हो गया है कि उन्होंने पक्के तौर पर इस्तीफा दे दिया है तो कहा जा रहा कि वे कायर हैं और कांग्रेस को मझदार में छोड़ रहे हैं। या फिर ये कि अगर पद पर नहीं रहे तो भी रिमोट तो उनके ही हाथ में रहेगा। रहेगा तो रहेगा। कोई क्या कर सकता है? अगर कांग्रेसी अप्रत्यक्ष रूप से कमान उनके ही हाथों में रखना चाहते हैं तो इसमें किसी का क्या लेना-देना होना चाहिए। कुल मिला कर बार-बार राहुल गांधी का पोस्टमार्टम किए जा रहा है। कभी कभी तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह राहुल को हर दम के लिए कुचल देना चाहता है। मोदी तो कांग्रेस मुक्त भारत की बात करते रहे हैं, जबकि टीवी एंकरों का सारा जोर इसी बात है कि कांग्रेस गांधी-नेहरू परिवार मुक्त हो जाए। एक यू ट्यूब चैनल के प्रतिष्ठित एंकर तो कल्पना की पराकाष्ठा पर जा कर इस पर बहस करते दिखाई दिए कि अगर वाकई राहुल ने पूरी तौर से कमान छोड़ दी तो कांग्रेस नष्ट हो जाएगी।
मीडिया के रवैये को देखना हो तो खोल लीजिए न्यूज चैनल। अधिसंख्य टीवी एंकर कांग्रेसी प्रवक्ताओं अथवा कांग्रेसी पक्षधरों के कपड़े ऐसे फाड़ते हैं, मानो घर में लड़ कर आए हों। साफ दिखाई देता है कि वे भाजपा के प्रति सॉफ्ट हैं, जबकि कांग्रेस के प्रति सख्त। कई टीवी एंकर कांग्रेस प्रवक्ताओं पर ऐसे झपटते हैं, मानो भाजपा प्रवक्ताओं की भूमिका में हों। और ढ़ीठ भी इतने हैं कि कांग्रेस प्रवक्ता उन पर बहस के दौरान खुला आरोप लगाते हैं कि आप ही काफी हो, भाजपा वालों को काहे बुलाते हो।
इलैक्ट्रॉनिक मीडिया भाजपा के प्रति कितना नरम है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पर्दे के पीछे भाजपा की भूमिका की चर्चा करने की बजाय कांग्रेस की रणनीति कमजोरी को ज्यादा उभार रहा है। भाजपा के अश्वमेघ यज्ञ के प्रति उसकी स्वीकारोक्ति इतनी है कि उसे बड़ी सहजता से यह कहने में कत्तई संकोच नहीं होता कि भाजपा का अगला निशाना मध्यप्रदेश व राजस्थान की सरकारें होंगी। वस्तुत: इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की यह हालत इस वजह से है कि एक तो इसका संचालन करने वालों में अधिसंख्य मोदी से प्रभावित हैं और दूसरा ये कि चैनल चलाना इतना महंगा है कि बिना सत्ता के आशीर्वाद के उसे चलाया ही नहीं जा सकता। बस संतोष की बात ये है कि हमारे लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है और सत्ता से प्रताडि़त कुछ दिग्गज पत्रकार जरूर अपने-अपने यू ट्यूब चैनल्स के जरिए दूसरा पक्ष भी खुल कर पेश कर पा रहे हैं।
लब्बोलुआब, मीडिया के इस रूप के आज हम गवाह मात्र हैं, कर कुछ नहीं सकते।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

रविवार, जुलाई 07, 2019

महुआ मोहित्रा के बहाने राहत इंदौरी पर फिर पलटवार

किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है बनाम ये मेरा घर है, मेरी जां, मुफ्त की सराय थोड़ी है
तेजवानी गिरधर
बेशक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दुबारा सत्ता में आने के बाद सबका साथ, सबका विकास नारे के साथ सबका विश्वास जोड़ दिया है, मगर धरातल की सच्चाई ये है कि जिसको विश्वास में लेने की बात कही जा रही है, आज वही तबका मन ही मन भयभीत सा दिखता है। अपने हक-हकूक को लेकर चिंतित है। इसी की प्रतिध्वनि पिछले दिनों लोकसभा में सुनाई दी, जब सपा सांसद आजम खान ने लगभग कातर स्वर में ताजा हालात पर चिंता जाहिर की। तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोहित्रा के भाषण में तो वह और अधिक मुखर नजर आई। उन्होंने राहत इंदौरी के इन दो शेरों को बड़ी शिद्दत के साथ पढ़ कर अपना भाषण समाप्त किया-

जो आज साहिबे मसनद हैं
वो कल नहीं होंगे
किराएदार हैं
जाति मकान थोड़ी है

सभी का खून शामिल है
यहां की मिट्टी में
किसी के बाप का
हिंदुस्तान थोड़ी है

जिस भाव से राहत इंदौरी में ये शेर कहे, ठीक वैसी ही तल्खी महुआ मोहित्रा के अंदाज में नजर आई। जरा दूसरे शेर पर गौर फरमाइये। इसका अर्थ साफ है कि सभी समुदायों का खून इस मिट्टी में है, भारत केवल किसी एक समुदाय का थोड़े ही है।
यह तो हुआ सिक्के का एक पहलु। मगर पलट कर दूसरा पहलु आया तो लगा कि राहत इंदौरी ने जिस हक की बात कर रहे हैं, दूसरा पक्ष उनकी ही शिद्दत से दूसरे समुदाय पर तंज कसने से बाज नहीं आ रहा।
कोई अशोक प्रीतमानी हैं, जिनके नाम से सोशल मीडिया पर दूसरा पहलु वायरल हो रहा है। यह प्रीतमानी ने ही लिखा है या किसी और के लिखे हुए की कॉपी की है, पता नहीं। यहां उसे हूबहू दिया जा रहा है:-
राहत इंदौरी साहब मेरे कुछ पसंदीदा शायरों में से एक शायर हैं। मैं उनकी तहे दिल से इज्जत करता हूं। पर इज्जतदार बने रहना उनकी जिम्मेदारी थी और है। मैंने राहत इन्दौरी के शेर को सुना है, लेकिन इस शेर को पढऩे का उनका अंदाज इतना तल्ख था कि हैरानी हुई और दुख भी। हुआ यूं कि जब उन्होंने मुल्क को अपनी जागीर बनाने की कोशिश की तब मैंने उनके इस रवैये का प्रतिरोध उनके लहजे में कर दिया था। अब दुर्भाग्य यह है कि उसी संदर्भ को ले कर सांसद महुआ मोइत्रा राहत इंदौरी साहब के हवाले से तकरीर पेश कर रही हैं। ऐसे में पेश है मेरी अपनी प्रतिक्रिया-
उनको उन्ही की भाषा में विनम्र जवाब:-

खफा होते हैं हो जाने दो, घर के मेहमान थोड़ी हैं।
जहां भर से लताड़े जा चुके हैं, इनका मान थोड़ी है।

ये कृष्ण-राम की धरती, सजदा करना ही होगा।
मेरा वतन, ये मेरी मां है, लूट का सामान थोड़ी है।

मैं जानता हूं, घर में बन चुके है सैकड़ों भेदी।
जो सिक्कों में बिक जाए वो मेरा ईमान थोड़ी है।

मेरे पुरखों ने सींचा है इसे लहू के कतरे कतरे से।
बहुत बांटा मगर अब बस, खैरात थोड़ी है।

जो रहजन थे, उन्हें हाकिम बना कर उम्र भर पूजा।
मगर अब हम भी सच्चाई से अनजान थोड़ी हैं।

बहुत लूटा फिरंगी तो कभी बाबर के पूतों ने।
ये मेरा घर है, मेरी जां, मुफ्त की सराय थोड़ी है।

आप मेरे पसंदीदा शायर हैं, होंगे पर मुल्क से बढ़ कर थोड़ी हैं।
समझे राहत इंदौरी।
वंदे मातरम .... जय हिंद।
समझा जा सकता है कि भारत पर अपने हक को लेकर दोनों समुदायों के कुछ लोग किस कदर खींचतान करने पर आमादा हैं। बेशक दूसरा पक्ष राहत इंदौरी की तल्खी का प्रत्युत्तर है, मगर यह तो स्पष्ट है कि दोनों ओर विष भरा हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी भले ही सबका विश्वास जीतने की बात कह रहे हों, मगर धरातल पर इस प्रकार का संदेश नहीं पहुंच पाया है। यही चिंता का विषय है। जब तक जमीन पर सदाशयता नहीं होगी, तब तक मोदी की प्रतिबद्धता के कोई मायने नहीं हैं। उससे भी ज्यादा चिंताजनक बात ये है कि उनकी ही विचारधारा के लोगों पर उनका असर नहीं दिखाई पड़ रहा। वे लगातार ऐसी वारदातें कर रहे हैं, बयानबाजी कर रहे हैं, मानों उन्हें किसी बात की परवाह ही नहीं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

गुरुवार, जून 27, 2019

अफसोस कि पत्रकारिता के इतने निकृष्ट दौर का मैं गवाह हूं

गुुरुवार को एबीपी न्यूज चैनल पर चल रही एक बहस देखी। उसे देख कर बहस की एंकर रुबिका पर तो दया आई, मगर खुद आत्मग्लानी से भर गया। पत्रकारिता का इतना मर्यादाविहीन और निकृष्ट स्वरूप देख कर सहसा विश्वास ही नहीं हुआ कि एक प्रतिष्ठित न्यूज चैनल पर अनुभवहीन युवति को कैसे एंकर बना दिया गया है। अपने आप से घृणा होने लगी कि क्यों कर मैने इस पत्रकार जमात में अपनी जिंदगी बर्बाद कर ली। 
असल में बहस इस बात पर हो रही थी कि जेएनयू के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर पुलिस ने देशद्रोह के मामले में चार्जशीट पेश की है। ज्ञातव्य है कि तकरीबन तीन साल बाद यह चार्जशीट पेश की गई है। अब अदालत में बाकायदा मुकदमा चलेगा और वही तय करेगी कि कन्हैया कुमार देशद्रोही है या नहीं। पूरी बहस के दौरान एंकर रुबिका इस तरह चिल्ला चिल्ला कर टिप्पणियां कर रही थीं, मानो कन्हैया को देशद्रोही करार दे दिया गया है। अपने स्टैंड के पक्ष में वे उत्तेजित हो कर लगातार कुतर्क दे रही थीं।  उनका तर्क था कि चार्जशीट को बनाने में क्यों कि तीन साल लगे हैं, इसका मतलब ये है कि उसमें जो चार्ज लगाए गए हैं, वे सही हैं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि एक देशद्रोही कैसे हीरो बन गया और सीपीआई ने उसे लोकसभा चुनाव का टिकट तक दे दिया। उन्होंने इस बात पर बहुत अफसोस जताया कि कोई देशद्रोही कैसे चुनाव लड़ सकता है? कन्हैया कुमार का पक्ष ले रहे एक राजनीतिक समीक्षक कह रहे थे कि किसी के खिलाफ चार्जशीट पेश होने पर आप उसे कैसे देशद्रोही कह सकती हैं, मगर रुबिका उनकी एक नहीं सुन रही थीं। उलटे उन्हें कन्हैया कुमार का अंधभक्त कह कर उन पर पिल पड़ीं। उनकी बॉडी लैंग्वेज ऐसी थी मानो वे ही सबसे बड़ी देशभक्त है और उनका जोर चले तो कन्हैया का पक्ष ले रहे पेनलिस्ट के कपड़े फाड़ दें।
दूसरी ओर जाहिर तौर पर कन्हैया कुमार के खिलाफ वकालत कर रही एक महिला वकील व भाजपा के प्रवक्ता रुबिका के सुर में सुर मिला रहे थे। मगर बहस में बुलाए गए जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार अभय दुबे की रुबिका ने जो हालत की, उसे देख कर बहुत अफसोस हुआ कि वे क्यों कर एक नौसीखिया एंकर के सामने पैनलिस्ट बन कर गए। क्यों अपनी इज्जत का फलूदा बनवाने वहां पहुंचे? वे स्पष्ट रूप से कह रहे थे कि इस बहस को आप कोर्ट न बनाइये, यहां न तो कोई जज बैठा है और न ही कोई सबूत पेश किए जा रहे हैं। आप केवल चार्जशीट के आधार पर किसी को द्रेशद्रोही नहीं कह सकते, यह काम कोर्ट को करने दीजिए। यह सुन कर रुबिका को बहुत बुरा लगा कि वे जिस एजेंडे को चला रही हैं, उसी पर कोई कैसे सवाल खड़ा कर सकता है। वे और ज्यादा भिनक गईं। उन्होंने दुबे जी को बोलने ही नहीं दिया। सवाल ये भी कि एंकर केवल एंकर का ही धर्म क्यों नहीं पालती! पेनलिस्ट को अपनी अपनी राय देने दीजिए, दर्शक खुद फैसला कर लेगा। एकंर खुद ही पार्टी बन रही है, कमाल है।
मुझे तो पत्रकारिता की जो सीख दी गई है उसमें ये सिखाया गया है कि अगर कोई चोरी के आरोप में पकडा जाए तो उसे चोर न लिखें या कोई हत्या के आरोप में पकडा जाए तो उसे हत्यारा पकडा गया ये न लिखें. मगर आज के पत्रकारों को पत्रकारिता के मूलभूत नियम तक का ज्ञान नहीं है, उलटे वे चीख चीख कर पत्रकारिता के कायदों को तार तार कर रहे हैं।
इस बहस को देख कर मन वितृष्णा से भर गया कि आज मैं पत्रकारिता के कैसे विकृत स्वरूप का गवाह बन कर जिंदा हूं। हमने तो पत्रकारिता जी ली, जैसी भी जी, कोई बहुत बड़े झंडे नहीं गाड़े, मगर कभी मर्यादा व निष्पक्षता का दामन नहीं छोड़ा। आज दो-दो कौड़ी के पत्रकारों के हाथ में पत्रकारिता की कमान आ गई है।
सच तो ये है कि वर्तमान में पत्रकारिता का जो दौर चल रहा है, उसमें कोई टिप्पणी ही नहीं करनी चाहिए। कुछ कहना ही नहीं चाहिए। विकृत पत्रकारिता का राक्षस इतना बड़ा व शक्तिशाली हो गया है कि मेरे जैसे पत्रकार को जुबान सिल ही लेनी चाहिए। अपने आपको बहुत रोका, मगर नहीं रोक पाया। मेरी इस टिप्पणी से किसी का मन दुख रहा हो तो मैं क्षमाप्रार्थी हूं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

रविवार, जून 16, 2019

इन्हीं महारानी ने कभी बाबोसा को भी हाशिये पर खड़ा कर दिया था

ऐसी जानकारी है कि रविवार, 16 जनवरी को जयपुर में हुई प्रदेश भाजपा कार्यसमिति की बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की भूमिका अन्य नेताओं की तुलना में कमतर नजर आई। हालांकि वे अब राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दी गई हैं, मगर ऐसा प्रतीत हुआ, मानो वे हाशिये की ओर धकेली जा रही हों। उनमें वो जोश व जज्बा नजर नहीं आया, जैसा कि मुख्यमंत्री पद पर रहते देखा जाता था।
बड़े-बजुर्ग ठीक ही कह गए हैं कि इतिहास अपने आप को दोहराता है। वसुंधरा की ताजा हालत कहीं न कहीं इस कहावत से मेल खाती है। ये वही वसुंधरा हैं, जो राजस्थान में सिंहनी की भूमिका में थीं। उनके इशारे के बिना प्रदेश भाजपा में पत्ता भी नहीं हिलता था। कुछ ऐसा ही राजस्थान का एक ही सिंह, भैरोंसिंह भैरोंसिंह का भी रुतबा रहा है। वे जब स्वयं उपराष्ट्रपति बन कर दिल्ली गए तो प्रदेश की चाबी वसुंधरा को सौंप गए, मगर वे जब रिटायर हो कर लौटे तो उनकी पूरी जमीन वसुंधरा ने खिसका ली थी। राजस्थान का यह सिंह अपने ही प्रदेश में बेगाना सा हो गया। कुछ माह तो घर से निकले ही नहीं। और जब हिम्मत करके बाहर निकले तो उनके कदमों में लौटने वाले भाजपाई ही उन्हें अछूत समझ कर उनसे दूर बने रहे। वसुंधरा का भाजपाइयों में इतना खौफ था कि वे जहां भी जाते, इक्का-दुक्का को छोड़ कर अधिसंख्यक भाजपाई उनके पास फटकते तक नहीं थे। वसुंधरा का आभा मंडल इतना प्रखर था कि उसके आगे संघ लॉबी के नेताओं की रोशनी टिमटिमाती थी। उन्होंने हरिशंकर भाभड़ा सरीखे अनेक नेताओं को खंडहर बता कर टांड पर रख दिया था। राजस्थान में संघ उनके साथ समझौता करके ही काम चला रहा था। एक बार टकराव बढ़ा तो वसुंधरा ने नई पार्टी ही बना लेने की तैयारी कर ली, नतीजतन हाईकमान को झुकना पड़ा।
जब 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का दौर आया तो भी वे झुकने का तैयार नहीं हुईं। पूरे पांच साल खींचतान में ही निकले। विधानसभा चुनाव आए तो एक नारा आया कि मोदी से तेरे से बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं। बताया जाता है कि यह नारा संघ ने  ही दिया था। नतीजा सामने है। आज जब ये कहा जाता है कि भाजपा वसुंधरा के चेहरे के कारण हारी तो इसे समझना चाहिए कि इस चेहरे को बदनाम करने का काम भी भाजपाइयों ने ही किया। यदि ये कहा जाए कि मोदी के कहने पर संघ ने ही वसुंधरा को नकारा करार दिया तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी, जबकि वे इतनी भी बुरी मुख्यमंत्री नहीं थीं। वस्तुत: मोदी जिस मिशन पर लगे थे, उसमें उनको एक भी क्षत्रप बर्दाश्त नहीं था। तो वसुंधरा को निपटा कर ही दम लिया।
जाहिर तौर पर सिंहनी वर्तमान में बहुत कसमसा रहीं होगी, मगर उनके मन में क्या चल रहा है, किसी को जानकारी नहीं है। जानकार मानते हैं कि अब भी वसुंधरा में दम-खम कम नहीं हुआ है, मगर मोदी का कद इतना बड़ा हो चुका है कि वसुंधरा का फिर से उठना नामुमकिन ही लगता है। वसुंधरा की तो बिसात ही क्या है, भाजपा के सारे के सारे दिग्गज नेता मोदी शरणम गच्छामी हो गए हैं। सच तो ये है कि मोदी ने भाजपा को हाईजैक कर लिया है। भाजपा कहने भर को भाजपा है, मगर वह अब अमित शाह के सहयोग से तानाशाह मोदी की सेना में तब्दील हो चुकी है। अगर वसुंधरा हथियार डाल देती हैं तो हद से हद किसी राज्य की राज्यपाल बनाई जा सकती हैं, मगर शायद उनकी इच्छा अब अपने बेटे दुष्यंत सिंह को ढ़ंग की जगह दिलाना होगी, मगर मोदी के रहते ऐसा मुश्किल ही है।
खैर। हालांकि वसुंधरा राजे की स्थिति अभी इतनी खराब नहीं हुई है, उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना कर इज्जत बख्शी गई है। उन्होंने शेखावत की जो हालत की थी, उससे से तो वे बेहतर स्थिति में ही हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से उनकी जो नाइत्तफाकी है, उसे तो देखते हुए यही लगता है कि वे भी उसी संग्रहालय में रख दी जाएंगी, जहां भाजपा के शीर्ष पुरुष लालकृष्ण आडवाणी व मुरली मनोहर जोशी को रखा गया है।
-तेजवानी गिरधर
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शनिवार, अप्रैल 20, 2019

जीत के लिए भाजपा को नैतिकता ताक पर रखने की सलाह

गिरधर तेजवानी
आज जब कि देश लोकसभा चुनाव की दहलीज में प्रवेश कर चुका है तो भाजपा एक बार फिर सत्ता हासिल करने के लिए नरेन्द्र मोदी ब्रांड के ही भरोसे है। जो किसी जमाने में इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा के जुमले पर तंज कसते हुए व्यक्तिवाद पर हमला करते थे, वे ही आज व्यक्तिवाद की राह पर चल चुके हैं। खुद मोदी भी मोदी है तो मुमकिन है का नारा देकर भाजपा की नैया पार लगाने की भरसक कोशिश में हैं। हम लाख दुहाई दें कि हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं, मगर भाजपा को भी अब समझ आ गया है कि नीतियां अपनी जगह, मगर जीत का मंत्र तो ब्रांडिंग में ही निहित है, चाहे अनीति पर ही क्यों न चलना पड़े।
इसी सिलसिले में एक पोस्ट पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर धड़ल्ले से चल रही है, जिसमें साफ तौर पर मोदी से पहले और मोदी के बाद की भाजपा का विश्लेषण करते हुए सलाह दी जा रही है कि सत्ता के लिए नैतिकता ताक पर रखने से गुरेज नहीं करना चाहिए।
इस पोस्ट में बताया गया है कि जब तक भाजपा अटल बिहारी वाजपेयी की विचारधारा पर चलती रही, मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम पर नैतिकता व शुचिता को अपनाए रही, तब तक कभी भी पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर सकी। करोड़ों के बाद भी कांग्रेस बेशर्मी से अपने लोगों का बचाव करती रही, वहीं पार्टी फंड के लिए मात्र एक लाख रुपये ले लेने पर भाजपा ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को हटाने में तनिक भी विलंब नहीं किया, परन्तु चुनावों में नतीजा, वही ढ़ाक के तीन पात। झूठे ताबूत घोटाला के आरोप पर तत्कालीन रक्षामंत्री जार्ज फर्नांडिस का इस्तीफा, परन्तु चुनावों में नतीजा  वही ढाक के तीन पात। कर्नाटक में भ्रष्टाचार के आरोप लगते ही येदियुरप्पा को भाजपा ने निष्कासित करने में कोई विलंब नहीं किया, परन्तु चुनावों में नतीजा, वही ढाक के तीन पात।
फिर  होता है नरेन्द्र मोदी का पदार्पण। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नक्शे कदम पर चलने वाली भाजपा को वे कर्मयोगी कृष्ण की राह पर ले आते हैं। कृष्ण अधर्मी को मारने में किसी भी प्रकार की गलती नहीं करते हैं। छल हो तो छल से, कपट हो तो कपट से, अनीति हो तो अनीति से, अधर्मी को नष्ट करना ही उनका ध्येय होता है। कुल मिला कर सार यह है कि अभी देश दुश्मनों से घिरा हुआ है, नाना प्रकार के षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। इसलिए अभी हम नैतिकता को अपने कंधे पर ढोकर नहीं चल सकते हैं। नैतिकता को रखिये ताक पर। यदि देश को बचाना चाहते हैं, तो सत्ता को अपने पास ही रखना होगा। वो चाहे किसी भी प्रकार से हो, साम दाम दंड भेद किसी भी प्रकार से। इसलिए भाजपा के कार्यकर्ताओं को चाहिए कि कर्ण का अंत करते समय कर्ण के विलापों पर ध्यान न दें। सिर्फ ये देखें कि अभिमन्यु की हत्या के समय उनकी नैतिकता कहां चली गई थी। आज राजनीतिक गलियारा जिस तरह से संविधान की बात कर रही है, तो लग रहा है जैसे हम पुन: महाभारत युग में आ गए हैं। विश्वास रखो, महाभारत का अर्जुन नहीं चूका था, आज का अर्जुन भी नहीं चूकेगा। चुनावी जंग में अमित शाह जो कुछ भी जीत के लिए पार्टी के लिए कर रहे हैं, वह सब उचित है। वाजपेयी की तरह एक वोट का जुगाड़ न करके आत्मसमर्पण कर देना क्या एक राजनीतिक चतुराई थी? अटलजी ने अपनी व्यक्तिगत नैतिकता के चलते एक वोट से अपनी सरकार गिरा डाली और पूरे देश को चोर लुटेरों के हवाले कर दिया। राजनीतिक गलियारे में ऐसा विपक्ष नहीं है, जिसके साथ नैतिक-नैतिक खेल खेला जाए, सीधा धोबी पछाड़ आवश्यक है।
सिक्के का दूसरा पहलु ये है कि जिस हिंदूवाद के नाम पर भाजपा सत्ता पर काबिज हुई, पांच साल में उसी का पोषण न कर पाने पर भी विश्लेषकों की नजर है।
एक पोस्ट में लिखा है कि देश के लोगों ने मोदी-शाह के नेतृत्व में भाजपा के राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को अपने असली रूप में देख लिया है। जब तक पूर्ण बहुमत के साथ यह पार्टी सत्ता में नहीं आई थी, तब तक एक कौतूहल था कि पता नहीं, ये क्या करेंगे, जब ये अपने दम पर सत्ता में आएंगे। वाजपेयी जी के नेतृत्व में भाजपा पहली बार सत्ता में आयी तो जरूर थी, लेकिन बैसाखियों के सहारे। ऊपर से अटल जी का अपेक्षाकृत उदारवादी चेहरा। तो...समर्थकों में एक कसक सी रह गई कि काश, पार्टी कभी अपने दम पर सत्ता में आ पाती। लो जी, वह भी हो गया। मोदी ने इतिहास रच दिया।  कहा गया कि पृथ्वीराज चौहान के पश्चात 900 वर्षों के इंतजार के बाद कोई चक्रवत्र्ती हिन्दू सम्राट दिल्ली के सिंहासन पर बैठा है। और फिर सिर्फ  उन्मादी ही नहीं, प्रायोजित भीड़ के द्वारा अखलाक की निर्मम हत्या के साथ इस हिंदुत्व का पहला परिचय मिला। गौमाता के रक्षकों के उत्पात से देश दहलने लगा। दूसरी ओर हालत ये है कि कॉमन सिविल कोड, धारा 370 और राम मंदिर के एजेंडे को लेकर भाजपा लगातार 32 वर्षों से चल रही थी, उस पर कुछ भी नहीं हुआ। ऐसे में कट्टर हिंदूवादियों की यह चिंता जायज है कि यदि आज अपने बूते पर भाजपा सत्ता में होने के बाद भी कुछ नहीं कर पाई तो  ढ़लती मोदी लहर के दौर में क्या हो पाएगा? कदाचित इसी कारण भाजपा आज फिर रोजगार, गरीबी, महंगाई जैसे मुद्दों को साइड में रख कर, नोटबंदी व जीएसटी जैसे बडे कदमों की सफलता के नाम पर वोट मांगने की बजाय पाकिस्तान को गाली दे कर राष्ट्रवाद के नाम पर वोट हासिल करने की जुगत में लग गई है।

मंगलवार, मार्च 05, 2019

सर्जिकल स्ट्राइक टू पर सवार हो कर ताजपोशी चाहते हैं मोदी

-तेजवानी गिरधर-
एक अनुमान पहले से था कि नोटबंदी व जीएसटी की नाकामी और चुनावी वादे जुमले साबित होने के बाद दुबारा सत्ता पर काबिज होने के लिए मोदी कोई न कोई खेल खेलेंगे। कुछ को आशंका इस बात की भी थी कि इसके लिए वे पाकिस्तान से छेडख़ानी भी कर सकते हैं। हालांकि पाकिस्तान के साथ मौजूदा टकराव को मोदी की सोची-समझी रणनीति कहने का न तो पर्याप्त आधार है और न ही ऐसा कहना उचित है, मगर संयोग से चुनाव से चंद माह पहले हुए घटनाक्रम की आड़ में मोदी को दुबारा प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाने के जतन सरेआम किए जा रहे हैं, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
मौजूदा संकट के वक्त विपक्ष की सदाशयता या मजबूरी ही है कि वह ऐसे मौके पर सरकार का साथ दे रहा है, मगर मोदी भक्तों ने इस अवसर का भरपूर फायदा उठाने की ठान ही ली है। एक ओर पाक के आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किए जाने पर जहां विपक्ष वायु सेना को शाबाशी दे रहा है तो वहीं   भाजपा मोदी के महिमामंडन में जुट गई है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने तो साफ कहा है कि आतंकी ठिकानों को नष्ट करना यह साबित करता है कि नरेन्द्र मोदी के मजबूत और निर्णायक नेतृत्व में भारत सुरक्षित है।
पाक से टकराव के दौर में आरंभ हुए चुनाव प्रचार में इस्तेमाल किया जा रहा नारा 'मोदी है तो मुमकिन हैÓ इस बात का स्पष्ट संकेत देता है कि मोदी को फिर सत्तारूढ़ करने की खातिर उन्हें महान बनाए जाने की मुहिम छेड़ दी गई है। अमित शाह ने बिना मौका गंवाए यह ऐलान कर दिया कि पाकिस्तान को जो सरकार जवाब दे सकती है, उसी आधार पर 2019 का चुनाव लड़ा जाएगा।
एक पोस्ट देखिए:-
रात भर हमले की मोनिटरिंग, सुबह केबिनेट की मीटिंग, फिर राष्ट्रपति भवन में कार्यक्रम, फिर दिल्ली से उड़ कर चुरू में चुनावी रैली, फिर तुरन्त दिल्ली रवाना होकर मेट्रो में बेठ कर इस्कॉन मन्दिर में श्रीमद भगवद गीता का विमोचन....कब आराम, कब नाश्ता, कब लंच किया होगा? ये मानव नहीं, महामानव है। सेल्यूट मोदी जी।
मोदी को महान बताए जाने की पराकाष्ठा देखिए:-सिकंदर पुराना हो गया, अबसे जो जीता, वही नरेंदर है।
मोदी भक्ति की एक नमूना ये भी देखिए:-मोदी जी मेरे 15 लाख ब्याज सहित पाकिस्तान पर गिराए गए बमों के खर्च में एडजस्ट करके मेरा खाता जीरो कर देना। मेरा और आपका अब तक का हिसाब शून्य हो जायेगा।
एक और पोस्ट:-मैसेज फॉर राहुल गांधी
जब तू सो रहा था
चौकीदार पाकिस्तान को धो रहा था
एक और बानगी:-मोदी को अटल बिहारी वाजपेयी समझने की भूल मत करना। क्यूं की ये टेढ़ी ऊंगली से घी ही नहीं निकालता, डब्बा ही गरम कर देता है।
इस पोस्ट में तो सरासर चुनावी लाभ लेने का प्रयास नजर आता है:-
इसका बटन आपने ही 2014 में दबाया था।
2019 में भी वही बटन दबाना मत भूलना।
क्या इसे भारतीय वायु सेना की शौर्यगाथा का राजनीतिकरण करने का प्रयास नहीं माना जाना चाहिए। चुनाव तक अगर यही मुद्दा प्रमुख रूप से चर्चा में रहता है तो निश्चित तौर पर बीजेपी इसका फायदा उठाने में कामयाब हो सकती है। सोशल मीडिया पर चल रही यह पोस्ट कि सिर्फ आतंकी नहीं मरे हैं, कुछ की प्रधानमंत्री बनने की उम्मीदें भी मर गई हैं, यह साफ इंगित करता है कि इस मौके का भाजपा भरपूर फायदा उठाने जा रही है। इसी कड़ी में यह पोस्ट भी आपकी नजर आई होगी-
केवल मोदी को महान ही नहीं बताया जा रहा, अपितु विरोधियों को पाक परस्त बता कर कड़े तंज भी कसे जा रहे हैं। आतंकियों से पहले उनसे निपटने की अपीलें की जा रही हैं। ये पोस्टें देखिए:-
भाजपा को वोट देना मतलब सेना को एक बुलेट प्रूफ जैकेट देना। कांग्रेस को वोट देना मतलब आतंकवादी को ए के-47 देना। फैसला आपका।
गद्दारों की छाती पर एक चोट मैं भी दूंगा। आने वाले चुनाव में फिर से मोदी जी को वोट दूंगा।
साला, आज ऐसा फील हो रहा है, जैसे  2019 का लोकसभा चुनाव, कांग्रेस एडवांस में हार गई।
मोदीजी का सीना अब इंचों में नहीं, बीघा में नापा जाएगा।
बदला-बदला बोलने वाले कांग्रेसियों की एक भी पोस्ट नहीं आ रही। अरे भाई ये हमला पाकिस्तान पर हुआ है तुम पर नहीं।
जाहिर तौर पर विपक्ष को लगने लगा कि मोदी ताजा हालात का चुनाव में फायदा उठाने जा रहे हैं तो उसका काउंटर देने के लिए इस किस्म की पोस्ट सामने आई:-
इससे पहले की पायलट की वापसी का पूरा श्रेय एक व्यक्ति को दिया जाए, भक्त मीडिया 70 साल के भारत के शौर्य को शून्य करके आप को उस काल में ले जाये कि जो हो रहा है, पहली बार हो रहा है, आपकी जानकारी के लिये बता दूं कि 1971 में हमारे पायलट को पाकिस्तान ने भारत के दबाब में छोड़ा, तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं और 1999 में पायलट नचिकेता को छोड़ा, तब प्रधानमंत्री पंडित अटल बिहारी वाजपेयी थे।
एक ओर जहां पहली सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगे जाने का मुद्दे पर सत्ता पक्ष लगातार विपक्ष को उलाहने देता जा रहा है, वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो बीबीसी के हवाले वे बालाकोट में तीन-चार सौ आतंकियों के मारे पर संदेह जाहिर करने लगे हैं।
कुल मिला कर एक ओर जहां विपक्ष को साथ लेकर सरकार पाक से मुकाबला कर रही है, वहीं देशभर में बयान युद्ध छिड़ा हुआ है। मामले का राजीतिकरण नहीं किए जाने की लाख दुहाइयां दी जाएं, मगर सच ये है कि सारे के सारे देशभक्त आपस में तलवारें भांज रहे हैं। इसका असर स्वाभाविक तौर पर आगामी चुनाव में पड़ता दिखाई दे रहा है।

गुरुवार, फ़रवरी 14, 2019

क्या संघ तिवाड़ी को कांग्रेस में जाने से रोकेगा?

राजनीतिक गलियारों में एक सवाल गूंज रहा है कि क्या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भारत वाहिनी पार्टी के अध्यक्ष घनश्याम तिवाड़ी को कांग्रेस में जाने से रोकेगा? यह सवाल इस कारण उठा है कि प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद तिवाड़ी तीन बार मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मुलाकात कर चुके हैं  और कयास ये लगाए जा रहे हैं कि वे कांग्रेस में जा सकते हैं।
ज्ञातव्य है कि तिवाड़ी ने विधानसभा चुनावों से पहले भारत वाहिनी पार्टी का गठन किया था। इससे पहले वे भाजपा में थे। पार्टी ने विधानसभा चुनावों में 62 सीटों पर प्रत्याशी खड़े किए थे, जिसमें से एक भी प्रत्याशी जीतने में सफल नहीं हुआ। यहां तक कि खुद घनश्याम तिवाड़ी भी अपनी सांगानेर सीट से बुरी तरह से हार कर अपनी जमानत जब्त करा बैठे थे। ऐसे में आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर उन्हें कोई तो रुख अख्तियार करना ही होगा, अन्यथा वे व उनकी पार्टी राजनीति में अप्रासंगिक हो जाएगी। इसी सिलसिले में उन्होंने ऐलान किया है कि उनकी पार्टी लोकसभा चुनाव लडऩे की इच्छुक नहीं है, क्योंकि प्रदेश में दो ही दल भाजपा और कांग्रेस की स्वीकारोक्ति है और उनकी पार्टी इन्हीं में से किसी एक में अपना भविष्य देख रही है। किस पार्टी में शामिल होना है, इसको लेकर पार्टी के प्रमुख नेताओं की बैठक के बाद मार्च के पहले ही हफ्ते में एलान कर देंगे कि वे किसके साथ जा रहे हैं।
चूंकि उन्होंने भाजपा छोड़ कर नई पार्टी बनाई थी, इस कारण यह सवाल प्रासंगिक हो गया कि उनका प्रयोग फेल होने के बाद क्या वे भाजपा में लौट सकते हैं, इस पर वे कहते हैं कि उन्हें बीजेपी से निकाला नहीं गया था, बल्कि उन्होंने खुद बीजेपी छोड़ी थी। इसके अतिरिक्त उनकी दो ही मांग थी, एक तो सवर्ण आरक्षण और दूसरा वसुंधरा सरकार को हटाना। दोनों ही मांगें पूरी हो चुकी हैं, ऐसे में अब भारतीय जनता पार्टी क्या सोचती है, प्रस्ताव भेजती है तो उस पर विचार किया जाएगा।
उनके इस बयान से साफ है कि भले ही वे कांग्रेस में शामिल होने के मन से गहलोत से मुलाकातें कर रहे हों, मगर भाजपा में जाने का रास्ता भी बंद नहीं करना चाहते। वैचारिक रूप से भाजपा उनके लिए अधिक अनुकूल है। वे संघ पृष्ठभूमि से हैं और उन्होंने जब नई पार्टी बनाई, तब भी अधिसंख्य समर्थक या तो संघ से जुड़े हुए थे या फिर वसुंधरा के विरोधी। अब जब कि वसुंधरा को राष्ट्रीय राजनीति में ले कर राजस्थान में उनकी भूमिका को सीमित कर दिया गया है, संभावना इस बात की अधिक है कि संघ उन पर भाजपा में लौटने का दबाव बनाए। बस तिवाड़ी को देखना ये है कि उनको कितने सम्मान के साथ वापस लिया जाता है।
जहां तक उनके कांग्रेस में जाने का सवाल है तो कांग्रेस के लिए यह एक उपलब्धि होगी कि संघ विचारधारा से जुड़ी पार्टी उसके साथ आ रही है, मगर सवाल ये है कि ऐसा होने पर क्या पूरी की पूरी पार्टी कांग्रेस में आएगी? तिवाड़ी को भले ही राजनीतिक मजबूरी के कारण कांग्रेस में जाना ठीक लग रहा हो, मगर उनके संघ विचारधारा के कार्यकर्ता भी उनके साथ कांग्रेस में आएंगे, इसमें तनिक संशय हो सकता है। इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि विधानसभा चुनाव और उसके बाद जयपुर महापौर का उपचुनाव हार चुकी भाजपा में भारत वाहिनी पार्टी से जुड़े चार पदाधिकारियों की घर वापसी हो गई। ये चारों प्रत्याशी इससे पहले भाजपा से ही जुड़े थे।
बहरहाल, संघ की खासियत ये रही है कि वह मौलिक रूप से संघ से जुड़े राजनीतिक कार्यकर्ता के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर रखती है, मगर यदि उसे जच जाए कि उसे किल करना है तो उसे भी पूरी निष्ठुरता के साथ अंजाम देता है, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण है लाल कृष्ण आडवाणी। देखते हैं कि तिवाड़ी के कांग्रेस में जाने के कयासों के बीच संघ क्या खेल खेलता है।
-तेजवानी गिरधर
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मंगलवार, फ़रवरी 05, 2019

राजनीति के क्षितिज पर प्रियंका की एंट्री से सनसनी

-तेजवानी गिरधर-
जब से प्रियंका गांधी सक्रिय राजनीति में कांग्रेस महासचिव की हैसियत से आई हैं, राजनीतिक हलकों में सनसनी सी फैल गई है। विशेष रूप से सोशल मीडिया पर जिस तरह से प्रियंका को निशाने पर लेकर बहसबाजी की जा रही है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस ने भले ही नरेन्द्र मोदी को रोकने के लिए यह ब्रह्मास्त्र चला हो, मगर असल में उनको लेकर भाजपा में भारी दहशत है।
वस्तुत: कांग्रेस कार्यकर्ता लंबे अरसे से प्रियंका को राजनीति में लाने की मांग करते रहे थे, मगर कांग्रेस हाईकमान इस हथियार को रिजर्व में रखे हुए था और उसको उचित अवसर की तलाश थी। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे ही यह तथ्य सामने आया कि तीन राज्यों में भाजपा की हार के बाद मोदी का तिलिस्म फीका पडऩे लगा है, आगामी लोकसभा चुनाव में उसे झटका देने के लिए प्रियंका को मैदान में उतार दिया गया है। प्रियंका के सक्रिय राजनीति में आने से भाजपा में खौफ की एक मात्र प्रमुख वजह ये है कि उनमें देश की लोकप्रिय नेता रहीं इंदिरा गांधी का अक्स नजर आता है। जो मीडिया परिवारवाद व व्यक्तिवाद की आलोचना करता है, वही स्वीकार करता है कि प्रियंका की एंट्री धमाकेदार है। वजह है उनका चुंबकीय व्यक्तित्व।  उनका ताजगी से लबरेज रंग-रूप, जनता से संवाद करने का प्रभावोत्पादक तरीका, गांधी-नेहरू परिवार की विरासत और थके-उबाऊ-बदनाम चेहरों से मुक्त होने को तैयार राजनीतिक पृष्ठभूमि। वास्तविकता क्या है, ये तो कांग्रेस हाईकमान के चंद रणनीतिकार जानते हैं, मगर मीडिया की धारणा है कि राजस्थान, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में सरकारों की कमान किसे सौंपी जाए, इसकी व्यूहरचना में प्रियंका की अहम भूमिका रही है।
बहरहाल, लोकसभा चुनाव के नजदीक आते ही जब प्रचार अभियान की तेजी के साथ पूरे राजनीतिक परिदृश्य में जो नई उत्तेजना और नये नजारे सामने आयेंगे, उनमें प्रियंका गांधी की उपस्थिति स्पष्ट दस्तक दे रही होगी। प्रियंका की मौजूदगी न केवल मोदी को अपसारित करेगी, अपितु मायावती और अखिलेश की तरह के दलितों और पिछड़ों के मतों पर एकाधिकार रखने वाले दावेदारों को भी पीछे धकेलेगी। उनकी बोदी पड़ चुकी सूरतों से दलितों-पिछड़ों का चिपके रहना कोई ईश्वरीय अटल सत्य नहीं है, जिसे काफी हद तक 2014 में भी देखा जा चुका है।
इस स्थिति का शब्द चित्र एक लेखक ने कुछ इस तरह चित्रित किया है:- किसी भी जुनून या जिद में यदि मायावती-अखिलेश राहुल के साथ प्रियंका के उतरने से पैदा होने वाली नई परिस्थिति की अवहेलना करते हैं तो हमारे अनुसार ठोस चुनावी परिस्थिति का आकलन करने में वे एक बड़ी भारी भूल करेंगे।
रहा सवाल भाजपा के पलटवार का तो वह कितना अभद्र है, इसका आगाज चंद भाजपा नेताओं की ओर से चाकलेटी चेहरे की उपमा देने से हो गया है। हमले का घटिया स्तर किस स्तर तक जा रहा है, वह मोदी भक्तों की ओर से प्रियंका की तुलना रावण की बहन सूर्पनखा और हिरणकश्यप की बहन होलिका से करने के साथ ही स्पष्ट हो गया है। देश के इतिहास में ऐसा पहली हो रहा हो, ऐसा नहीं है। एक विचारधारा महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी से लेकर सोनिया गांधी व राहुल गांधी तक का चरित्र हनन करने की आदी रही है। यह भी एक निरी सच्चाई है कि जितने निजी हमले इस परिवार पर हुए हैं, उतना ही यह भारतीय जनमानस  में गहरे पैठता गया है।
कांग्रेस विचारधारा के एक ब्लॉगर ने दुष्प्रचार की भयावहता को महसूस करते हुए लिखा है कि भाजपा आईटी सेल से जुड़े हुए सैकड़ों लोगों ने प्रियंका गांधी के चरित्र हनन पर काम करना शुरू कर दिया है। कुछ तस्वीरों  में प्रियंका गांधी को यूपी के दौरे के दौरान ईंट पत्थरों पर चलते हुए दिखाया गया है, जिसके नीचे इतने घटिया अल्फाज लिखे गए हैं, जो कि शायद इस ब्लॉग में लिखने योग्य नहीं हैं। वे कट्टरवादी व उन्मादी युवा पीढ़ी से सवाल करते हैं कि क्या हमारे देश में राजनीति का स्तर अब इतना रसातल तक जाएगा, जहां हम सत्ता की हवस में एक सभ्रांत महिला का चरित्र हनन करने से भी नहीं चूकेंगे। किसी को भी नहीं भूलना चाहिए की प्रियंका गांधी स्व. प्रधानमंत्री भारत रत्न राजीव गांधी की बेटी हैं। उस पिता की, जिसे देश की एकता और अखंडता की रक्षा करने की वजह से बम से उड़ा दिया गया था। क्या हम एक शहीद की बेटी के साथ यह शर्मनाक व्यवहार करेंगे?
ऐसा नहीं कि कांग्रेस विचारधारा के ब्लॉगर ही चिंतित हैं, मोदी समर्थक भी प्रियंका के हाईलाइट होने से परेशान हैं। सोशल मीडिया पर चल रही एक पोस्ट की बानगी देखिए:-
प्रियंका को मैदान में उतारना निश्चित रूप से एक मास्टर स्ट्रोक है और बीजेपी इस जाल में न फंसे, इसलिए भाजपा के थिंकटैंक को इन बातों पर जरूर गौर करना चाहिए-
1. अपने अति उत्साही कार्यकर्ताओं को समझाइश दी देनी चाहिए कि प्रियंका पर अभद्र चुटकुले न बनाएं और न सोशल मीडिया पर फैलायें। प्रियंका के व्यक्तिगत मामलों पर टिप्पणी करके किया गया हमला एक महिला का अपमान प्रचारित होगा, जो बूमरैंग साबित होगा।
2. राहुल और अन्य कांग्रेसियों को उनके पुराने कारनामों पर करारा जवाब दीजिये क्योंकि कांग्रेस की कोशिश यही है कि बीजेपी की तोप का मुंह राहुल, सोनिया और कांग्रेस के 10  साल के कुशासन से हट के प्रियंका की तरफ हो जाये।
3. भाषाई मर्यादा का पालन करें, याद कीजिये 2014 जब हर विपक्षी मोदी विरोध के चक्कर में सारी सामाजिक मर्यादाएं भूल गए थे, जिसके परिणाम स्वरूप वे बहुमत से विजयी हुए।
4. भाजपा कार्यकर्ता और नेता भाषा की मर्यादा रखें और प्रियंका को पूरी तरह नजरअंदाज करने की नीति पर चलें। हां, राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का तड़का बीच-बीच मे जरूर लगाते रहें क्योंकि ये दो मुद्दों पर ही विपक्ष डिफेंसिव हो जाता है। ये एक स्वयंसेवक के विचार हैं, बाकी तो फिर चाणक्य और चंद्रगुप्त सब हैं ही भाजपा में।
लगे हाथ बात राहुल गांधी की करें तो तस्वीर का दूसरा रुख ये है कि जिस मोदी ब्रांड को भगवान के रूप में अवतरित किया गया, अब उसी को राहुल गांधी नामक उस नौजवान ने ललकारना शुरू कर दिया है, जिसे बाकायदा प्रायोजित तरीके से नौसीखिया करार दे दिया गया था। राहुल गांधी की आक्रामक शैली मोदी के चेहरे पर झलकते दंभ, चाल में इठलाहट और जुबान की लफ्फाजी को दिक्कत पैदा करने लगी है। बेशक मोदी ब्रांड अभी जिंदा है और अब भी वे भाजपा के लिए आशा की आखिरी किरण हैं, मगर सत्ता के नग्न दुरुपयोग व भ्रष्टाचार के प्रति नॉन टोलरेंस के तिरोहित होते वादे से उनका राजनीतिक ग्राफ गिरने लगा है। ऐसे में प्रियंका का अवतार तस्वीर में नए रंग भरेगा, इसकी पूरी संभावना नजर आती है।

रविवार, जनवरी 27, 2019

वसुंधरा के हटते ही भाजपा में बिखराव?

tejwani girdhar
राजस्थान विधानसभा चुनाव में भाजपा की पराजय के बाद पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना कर राजस्थान की राजनीति से साइड करने से भाजपा में बिखराव की नौबत आ गई दिखती है। हालांकि बिना किसी हील हुज्जत के जब वे उपाध्यक्ष बनने व धुर विरोधी गुलाब चंद कटारिया को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनने देने को राजी हुईं तो यही लगा कि उनकी खुद की भी अब राजस्थान में रुचि नहीं रही है, मगर हाल ही जब उन्होंने कहा कि वे राजस्थान की बहू हैं और से यहां से उनकी अर्थी ही जाएगी तो ऐसे संकेत मिले कि वे यकायक अपनी दिलचस्पी कम करने वाली नहीं हैं। तो क्या एक ओर उनका राजस्थान के प्रति मोह और दूसरी ओर जयपुर नगर निगम के मेयर के चुनाव में भाजपा की पराजय व जिला परिषद में पेश भाजपा का अविश्वास प्रस्ताव खारिज होने को आपस में जोड़ देखा जाना चाहिए?
बेशक जिस प्रकार इन दोनों मामलों में भाजपा की किरकिरी हुई है, उसका वसुंधरा से सीधा कोई लेना-देना नहीं है, मगर इस मौके पर उनकी अनुपस्थिति भाजपा को खल रही होगी। अगर कमान उनके हाथ होती तो वे इतना आसानी से नहीं होने नहीं देतीं। यह नाकमयाबी साफ तौर पर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मदनलाल सैनी के खाते में ही गिनी जाएगी। इसका अर्थ ये भी निकलता है कि जैसे ही वसुंधरा राज्य की राजनीति से अलग की गई हैं, सैनी कमजोर हो गए हैं। उनका नियंत्रण नहीं रहा है, जैसा कि वसुंधरा के रहते होता था। सिक्के का एक पहलु ये भी है कि भले ही वसुंधरा राज्य की राजनीति से पृथक दी गई हों, मगर संगठन में अधिसंख्य पदाधिकारी उनकी ही पसंद के हैं। तो सवाल उठता है कि क्या वसुंधरा की तरह उन्होंने भी रुचि लेना कम कर दिया है। इसे आसानी से समझा जा सकता है कि अकेले वसुंधरा को दिल्ली भेज दिए जाने से उनका गुट तो समाप्त तो नहीं हो गया होगा। दिल्ली जाने के बाद भी इस गुट के जरिए अपनी अंडरग्राउंड पकड़ बनाए रखना चाहेंगी।
जो कुछ भी है, यह स्पष्ट है कि ताजा हालात ये ही बयां कर रहे हैं कि लोकसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भाजपा बिखराव की स्थिति में आ गई है। हो सकता है कि भाजपा हाईकमान ने वसुंधरा को राजस्थान से रुखसत किए जाने के बाद उत्पन्न होने वाले हालात का अनुमान लगा रखा हो, मगर फिलवक्त लगता है कि हाईकमान को स्थितियों का नए सिरे से आकलन करना होगा। इतना ही नहीं, उसे वसुंधरा के मजबूत गुट के साथ संतुलन बनाने के लिए वसुंधरा को महत्व देना ही होगा। अन्यथा आगामी लोकसभा चुनाव में उसे भारी परेशानी का सामना करना होगा। होना तो यह चाहिए था कि वसुंधरा को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए जाने के साथ यहां की संगठनात्मक चादर को नए सिरे से बिछाना चाहिए था, मगर लोकसभा चुनाव सिर पर ही आ जाने के कारण इतना बड़ा फेरबदल करना आसान भी नहीं था।
यह ठीक है कि स्थानीय इक्का-दुक्का हार की हाईकमान को चिंता नहीं है, मगर देखने वाली बात ये होगी कि वह उसके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण लोकसभा चुनाव में क्या रणनीति अपनाती है।

बुधवार, जनवरी 02, 2019

मोदी की वजह से निपटी वसुंधरा

तेजवानी गिरधर
हाल ही संपन्न विधानसभा चुनाव में हालांकि मोटे तौर पर यही माना जा रहा है कि वसुंधरा राजे की सरकार नाकामियों के कारण हार गई या फिर एंटी इन्कंबेंसी फैक्टर ने काम किया, मगर बारिकी से देखा जाए तो इसकी वजह रही नरेन्द मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां और जनता से की गई वादा खिलाफी। ठेठ आम मतदाता को इतनी समझ नहीं होती है कि सरकार कैसे काम रही है, उसे तो केवल महंगाई से वास्ता होता है या फिर बदलाव की प्रवृत्ति। स्वाभाविक रूप से जो भी सरकार काम करती है तो जनता की सारी अपेक्षाएं पूरी हो नहीं पाती, नतीजतन असंतुष्ट मतदाता एंटी इंन्कंबेंंसी का हिस्सा बन जाता है। उसे ही विपक्षी दल भुनाता है।
ऐसा नहीं कि अकेले मोदी फैक्टर की वजह से ही वसुंधरा हारीं। उनकी सरकार की भी कमजोरियां थीं। कई मोर्चों पर नाकामियां रहीं। राजपूत वोट बैंक खिलाफ हो गया। आखिर में तो कर्मचारी भी नाराज हो गए। मगर आम मतदाता मूल रूप से मोदी की आर्थिक अराजकता के कारण गुस्से में थी। राजस्थान में भी निष्प्राण प्राय: हो चुकी कांग्रेस को प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट ने जीवित करने का प्रयास किया तो उन्होंने स्वाभाविक रूप से वसुंधरा सरकार पर ही हमले बोले। उधर संघ निष्ट भाजपाइयों ने भी सुनियोजित तरीके से यह नारा चला दिया कि मोदी से तेरे से बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं। अर्थात वसुंधरा के प्रति नाराजगी दिखाते हुए भी वे मोदी के नाम पर वोट मांग रहे थे। वे यह जानते थे कि जनता में असल में मोदी की नोटबंदी, जीएसटी व महंगाई की वजह से रोष है, लेकिन अगर यही मुद्दे उभर कर आए तो आगामी लोकसभा चुनाव के लिए सुरक्षित मोदी ब्रांड को खतरा उत्पन्न हो जाएगा, इस कारण गुस्से को वसुंधरा की ओर डाइवर्ट कर दिया गया। एक बारगी तो ऐसा माहौल बना दिया गया कि अगर वसुंधरा को नहीं हटाया गया तो भाजपा बुरी तरह से पराजित हो जाएगी। इसके लिए लोकसभा उपचुनाव में जानबूझ कर संघ ने असहयोग किया, ताकि सारा दोष वसुंधरा पर मढ़ा जाए। वसुंधरा को हटाने व कमजोर करने की कोशिशें भी कम नहीं हुईं, मगर चूंकि वे मजबूत थीं, इस कारण हाईकमान चाह कर भी ऐसा नहीं कर पाया। अगर जबरन हटाने की कोशिश होती तो पार्टी दो फाड़ भी हो सकती थी। प्रदेश अध्यक्ष बदले जाने के दौरान जो कुछ हुआ, वह सर्वविदित ही है। हालत ये हो गई कि उसे वसुंधरा को ही आगे रख कर चुनाव लडऩा पड़ा। हालांकि यह सही है कि अगर भाजपा अपना चेहरा बदलती तो उसका उसे कुछ फायदा होता। उसी ने लगभग साल भर पहले वसुंधरा के खिलाफ माहौल बनाना शुरू कर दिया था। उसे उम्मीद थी कि ऐसा करने से वसुंधरा की जगह किसी और चेहरे पर चुनाव लड़ा जा सकेगा। यदि चेहरा नहीं भी मिला तो मोदी के नाम पर वोट मांगे जाएंगे।
भाजपा हाईकमान जानता था कि महंगाई कम करने का वादा तो पूरा हुआ नहीं, उलटे बढ़ गई, जिससे आम जनता त्रस्त थी। कहां तो बड़े पैमाने पर रोजगार देने का सपना दिखाया गया था और कहां नोटबंदी के चलते बाजार में मंदी आ गई व बेरोजगारी और अधिक बढ़ गई। रही सही कसर जीएसटी ने की। आमतौर पर भाजपा के साथ रहने वाला व्यापारी तबका भी बेहद त्रस्त रहा। गुस्सा इतना अधिक था कि आखिर में मोदी व अमित शाह की ताबड़तोड़ सभाएं भी कुछ नहीं कर पायीं। जमीनी हकीकत यही है। जनता को ये कत्तई भान नहींं था कि वसुंधरा ने अच्छा काम किया या नहीं। अब चूंकि चुनाव राज्य सरकार का था तो स्वाभाविक रूप से मतदाता का रोष वसुंधरा के खिलाफ गिना गया। गिना क्या गया, जानबूझ कर भाजपा खेमे से ऐसा ही गिनवाया गया। भाजपा के नीति निर्धारकों को वसुंधरा के शहीद होने की चिंता नहीं थी, एक राज्य चला भी जाए तो कोई बात नहीं, उन्हें तो फिक्र थी मोदी ब्रांड की, जो यदि डाउन हुआ तो लोकसभा चुनाव में सत्ता में वापस लौटना मुश्किल हो जाएगा।
खैर, अब जबकि यह मान ही लिया गया है कि वसुंधरा राजे की ही वजह से भाजपा पराजित हुई है, समझा जाता है कि उन्हें लोकसभा चुनाव लड़वा कर राजस्थान से रुखसत किया जाएगा। हालांकि यह भी तभी होगा, जबकि वसुंधरा खुद इसके लिए राजी होंगी। वैसे यह पक्का है कि लोकसभा चुनाव में मोदी का चेहरा ही अहम भूमिका में होगा, मगर राजस्थान में वसुंधरा की मौजूदगी समाप्त करने पर विचार किया जा सकता है।
-तेजवानी गिरधर
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