तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

गुरुवार, मार्च 22, 2012

श्रीश्री इतने तो समझदार हैं ही कि कौन सी बात कहां कहनी है


आध्यात्मिक गुरू श्रीश्री रविशंकर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था के केन्द्र हैं। बेवजह उनके प्रति असम्मान का भाव होने का सवाल ही नहीं उठता। मगर हाल ही उन्होंने एक ऐसा बयान दे दिया कि यकायक विवादास्पद हो गए। जब शिक्षक और सामाजिक संगठनों के अलावा जनप्रतिनिधियों ने उनके बयान को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है, राजस्थान भर में में कई जगह श्रीश्री के पुतले फूंके गए और जयपुर में सांगानेर न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट में उनके खिलाफ इस्तगासा भी दायर किया गया, तो उन्हें सफाई देनी पड़ गई कि हम इतने मूर्ख भी नहीं जो ऐसा बयान दें। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने तो उनके बयान पर हैरानी जताते हुए कहा कि मुझे नहीं लगता कि कोई भी व्यक्ति संतुलित मस्तिष्क से ऐसी कोई बात कह सकता है। इस पर श्रीश्री ने दी सफाई मानसिक संतुलन बिगडऩे की बात कहने वाले मेरे बयान को दोबारा पढ़ें। हमने ये नक्सली क्षेत्रों के लिए कहा था। वहां कुछ रुग्ण विद्यालय हैं। उन विद्यालयों के निजीकरण पर मैंने जोर दिया है। मैं बहुत सोच-समझ कर बोलता हूं। हम इतने मूर्ख नहीं जो यह कहें कि सारे सरकारी स्कूलों में नक्सलवाद पैदा हो रहा है। श्रीश्री ने कहा कि जो क्षेत्र नक्सलवाद से ग्रस्त हैं, वहां सरकारी स्कूलों में पढ़े बच्चे अक्सर हिंसा से ग्रस्त पाए गए हैं। पूर्वांचल और यूपी के क्षेत्रों में ऐसा पाया गया। अच्छा है राजस्थान में नक्सली प्रभाव नहीं है।
श्रीश्री की सफाई से यह स्पष्ट है कि वे सही बात गलत जगह कह गए। राजस्थान में जब नक्सलवाद नाम की कोई चिडिय़ा है ही नहीं तो यहां नक्सल प्रभावित इलाकों की समस्या का जिक्र सार्वदेशिक रूप से करने पर तो हंगामा होना ही था। इतना पक्का है कि वे इतने भी मूर्ख नहीं कि देश की सारी सरकारी स्कूलों के बारे में ऐसा कह दें, मगर इतने समझदार तो हैं ही कि कौन सी बात कहां पर कहनी है। माना कि वे दीन दुनिया से दूर हैं और यह संतों की मौज है कि वे समाज के भले के लिए कुछ भी कह दें, मगर उन्हें अब तो समझ में आ ही गया होगा कि संदर्भहीन बात करना कितना भारी पड़ जाता है। बात न बात, बेबात का बतंगड़ हो गया।
वैसे एक बात है श्रीश्री का बयान में कुछ ज्यादा की अतिरेक हो गया, मगर यह भी कम सच नहीं कि सरकारी स्कूलों की पढ़ाई इतनी लचर हो गई है कि औरों की छोडिय़े खुद सरकारी स्कूलों के अध्यापकों तक के बच्चे महंगी प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे हैं। उन्हें पता है कि उनके हमपेशा शिक्षक क्या पढ़ा रहे हैं। हालत ये है कि सरकारी स्कूल में बच्चे को वही पढ़ाता है, जो या तो गरीब है और या फिर जिसे अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा की कोई फिक्र नहीं। श्रीश्री रविशंकर के बयान पर तुरंत प्रतिक्रिया कर बवाल मचाने वाले शिक्षा कर्मियों के पास क्या इस बात का जवाब है कि बोर्ड परीक्षाओं व प्रतियोगी परीक्षाओं में सरकारी स्कूलों में पढ़े बच्चे फिसड्डी क्यों रह जाते हैं? हम भले की सरकारी स्कूलों के इन्फ्रास्ट्रक्चर की महत्ता जताने के लिए यह कह दें कि इनसे कई नेता, विद्वान, बड़े व्यापारी भी निकलते हैं, मगर सच यही है कि जब कभी किसी सरकारी स्कूल का बच्चा बोर्ड की मेरिट में स्थान पाता है तो वह उल्लेखनीय खबर बन जाती है। स्पष्ट है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई पर ठीक से ध्यान नहीं दिया जाता। चूंकि सरकार स्कूलों के शिक्षक संगठित हैं, इस कारण उन्होंने तौहीन होने पर तुरंत बवाल खड़ा कर दिया, मगर तब तौहीन नहीं लगती, जब अपने बच्चों को हरसंभव प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने की कोशिश करते हैं।
बहरहाल, जब सरकारी स्कूलों की बात चलती है तो वहां के हालात यकायक स्मृति में आ ही जाते हैं। स्कूलों की ही क्यों सरकारी नौकरी के कुछ और ही मजे हैं। इस बात पर एक एसएमएस याद आ गया। हमारे यहां सरकारी नौकरी का अजीबोगरीब हाल है। लोग अपने बच्चों को पढ़ाएंगे प्राइवेट स्कूल में, इलाज करवाएंगे प्राइवेट अस्पताल में, मगर नौकरी करेंगे सरकारी। सवाल उठता है क्यों? जवाब आपको पता ही है।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति| नवसंवत्सर २०६९ की हार्दिक शुभकामनाएँ|

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