तीसरी आंख

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गुरुवार, मार्च 26, 2026

तुलसी वास्तु दोष भी दूर करती है

क्या आपने कभी इस बात पर ध्यान दिया कि आपके घर, परिवार या आप पर कोई मुसीबत आने वाली होती है तो उसका असर सबसे पहले आपके घर में स्थित तुलसी के पौधे पर होता है। आप उस पौधे का कितना भी ध्यान रखें धीरे-धीरे वो पौधा सूखने लगता है। तुलसी का पौधा ऐसा है जो आपको पहले ही बता देगा कि आप पर या आपके घर परिवार को किसी मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है।

पुराणों और शास्त्रों के अनुसार माना जाए तो ऐसा इसलिए होता है कि जिस घर पर मुसीबत आने वाली होती है उस घर से सबसे पहले लक्ष्मी यानी तुलसी चली जाती है। क्योंकि दरिद्रता, अशांति या क्लेश जहां होता है, वहां लक्ष्मी जी का निवास नहीं होता। अगर ज्योतिष की माने तो ऐसा बुध के कारण होता है। बुध का प्रभाव हरे रंग पर होता है और बुध को पेड़ पौधों का कारक ग्रह माना जाता है। बुध ऐसा ग्रह है जो अन्य ग्रहों के अच्छे और बुरे प्रभाव जातक तक पहुंचाता है। अगर कोई ग्रह अशुभ फल देगा तो उसका अशुभ प्रभाव बुध के कारक वस्तुओं पर भी होता है। अगर कोई ग्रह शुभ फल देता है तो उसके शुभ प्रभाव से तुलसी का पौधा उत्तरोत्तर बढ़ता रहता है। बुध के प्रभाव से पौधे में फल फूल लगने लगते हैं। शास्त्रानुसार तुलसी के विभिन्न प्रकार के पौधे मिलते हैं, उनमें श्रीकृष्ण तुलसी, लक्ष्मी तुलसी, राम तुलसी, भू तुलसी, नील तुलसी, श्वेत तुलसी, रक्त तुलसी, वन तुलसी, ज्ञान तुलसी मुख्य रूप से विद्यमान है। सबके गुण अलग अलग है।

विद्वान बताते हैं कि प्रतिदिन चार पत्तियां तुलसी की सुबह खाली पेट ग्रहण करने से मधुमेह, रक्त विकार, वात, पित्त आदि दोष दूर होने लगते है। घर में तुलसी के पौधे की उपस्थिति एक वैद्य समान तो है ही यह वास्तु के दोष भी दूर करने में सक्षम है। 

शास्त्रों के अनुसार वास्तु दोष को दूर करने के लिए तुलसी के पौधे अग्नि कोण अर्थात दक्षिण-पूर्व से लेकर वायव्य उत्तर-पश्चिम तक लगा सकते हैं। तुलसी का गमला रसोई के पास रखने से पारिवारिक कलह समाप्त होती है। पूर्व दिशा की खिडकी के पास रखने से पुत्र यदि जिद्दी हो तो उसका हठ दूर होता है। यदि घर की कोई सन्तान अपनी मर्यादा से बाहर है, अर्थात नियंत्रण में नहीं है तो पूर्व दिशा में रखे तुलसी के पौधे में से तीन पत्ते किसी ना किसी रूप में सन्तान को खिलाने से सन्तान आज्ञानुसार व्यवहार करने लगती है। कन्या के विवाह में विलम्ब हो रहा हो तो अग्नि कोण में तुलसी के पौधे को कन्या नित्य जल अर्पण कर एक प्रदक्षिणा करने से विवाह जल्दी और अनुकूल स्थान में होता है। यदि कारोबार ठीक नहीं चल रहा तो दक्षिण-पश्चिम में रखे तुलसी कि गमले पर प्रति शुक्रवार को सुबह कच्चा दूध अर्पण करे व मिठाई का भोग रख कर किसी सुहागिन स्त्री को मीठी वस्तु देने से व्यवसाय में सफलता मिलती है।

समानांतर ब्रह्मांड का वजूद है?

पिछले दिनों सपने के दौरान ऐसा महसूस हुआ कि एक और दुनिया में विचरण कर रहा हूं। मगर ठीक वैसी ही, जैसी कि हमारी दुनिया है। वहां घटनाएं ठीक वैसी घट रही हैं, जैसी इस दुनिया में घट चुकी हैं। फर्क सिर्फ यही है कि वह दुनिया कुछ और रंगीन है, कुछ और सजीव। तब ख्याल आया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी दुनिया की तरह, ठीक इस जैसी दुनिया भी कहीं और मौजूद है? यानि कि इसकी कॉपी है। इस सिलसिले में कुछ विद्वानों से चर्चा की। साथ ही इंटरनेट पर सर्च किया तो पाया कि कुछ वैज्ञानिक पेरेलल यूनिवर्स की अवधारणा रखते हैं, लेकिन उसे अब तक साबित नहीं किया जा सका है। वैज्ञानिक संदर्भ में पेरेलल यूनिवर्स उस विचार को कहते हैं, जिसमें हमारा ब्रह्मांड एक मात्र नहीं है, बल्कि कई ब्रह्मांड मौजूद हैं, जिनमें अलग-अलग नियम, अवस्थाएं या इतिहास हो सकते हैं।

यह विचार मुख्य रूप से कुछ उन्नत भौतिक सिद्धांतों, जैसे स्ट्रिंग थ्योरी, क्वांटम मैकेनिक्स के कुछ व्याख्याओं से आता है। इसे सार्वभौमिक रूप से सिद्ध या मान्यता प्राप्त नहीं माना जाता। कुछ प्रमुख सिद्धांतों में यह संभावित व्याख्या के रूप में स्वीकार किया जाता है। अभी तक प्रत्यक्ष रूप से कोई अनुभवजन्य सबूत नहीं मिला है कि समानांतर ब्रह्मांड सच में मौजूद हैं। असल में क्वांटम मल्टीवर्ल्ड इंटरप्रिटेशन क्वांटम भौतिकी की एक व्याख्या है, जिसमें हर क्वांटम घटना के लिए ब्रह्मांड विभाजित हो जाता है। इससे बहु-ब्रह्मांड का ख्याल आता है। लेकिन, यह व्याख्या सत्यापित नहीं हुई है।

कुछ ब्रह्मांड शास्त्रियों ने सुझाव दिया है कि बिग बैंग जैसी घटनाओं से अलग-अलग बबल यूनिवर्स बन सकते हैं। फिर भी अब तक कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं। वैज्ञानिक समुदाय में तीन मुख्य स्थितियाँ पाई जाती हैं। कुछ वैज्ञानिक इसे संभव मानते हैं, पर असिद्ध। कुछ कहते हैं कि यह व्यर्थ कल्पना है, जब तक कोई परीक्षण नहीं मिल जाता। कुछ मानते हैं कि यह क्वांटम और ब्रह्मांड शास्त्र की बेहतर समझ की दिशा में एक वैध विचार है। कुल मिलाकर वैज्ञानिकों ने इसे विचार के रूप में लिया है। कुछ सिद्धांत इसे संभावित मानते हैं। लेकिन इसे अभी तक वैज्ञानिक रूप से सिद्ध या मान्यता प्राप्त नहीं माना जाता। इस सिलसिले में ब्रह्माकुमारीज का एक प्रमुख सिद्धांत कालचक्र से जुड़ा है। उनके अनुसार यह सृष्टि एक निश्चित, चक्रीय क्रम में चलती है और हर चक्र के बाद वही घटनाएँ, वही आत्माएँ और वही भूमिकाएँ फिर से बिल्कुल उसी प्रकार दोहराई जाती हैं। उनके मतानुसार सृष्टि का एक पूरा चक्र 5000 वर्ष का होता है। इस चक्र में चार युग आते हैं। सतयुग पूर्ण शांति और पवित्रता का युग, त्रेतायुग थोड़ी कमी, पर अभी भी उच्च अवस्था, द्वापरयुग भक्ति और पतन की शुरुआत और कलियुग नैतिक पतन और अशांति का समय। कलियुग के अंत में एक छोटा-सा संगमयुग माना जाता है, जब परमात्मा (उनके अनुसार शिव) ज्ञान देकर आत्माओं को शुद्ध करते हैं और फिर पुनः सतयुग आरंभ होता है। कुल मिला कर ब्रह्माकुमारीज का दावा है कि हर 5000 वर्ष बाद इतिहास हूबहू दोहराया जाता है। आप और मैं भी वही आत्माएँ हैं जो पिछले चक्र में भी थे। हमारी भूमिकाएँ भी बिल्कुल वैसी ही रहती हैं, न कम, न ज्यादा। इसे वे “ड्रामा का सिद्धांत” कहते हैं, जैसे एक फिल्म निश्चित स्क्रिप्ट के अनुसार चलती है।

वैसे परंपरागत पुराणों के अनुसार चारों युगों की अवधि लाखों वर्षों की मानी जाती है, न कि 5000 वर्ष। आधुनिक इतिहास और विज्ञान सृष्टि को अरबों वर्ष पुराना मानते हैं और घटनाओं के हूबहू दोहराव का समर्थन नहीं करते। कुछ दार्शनिक परंपराएँ, जैसे बौद्ध और सांख्य भी चक्रीय सृष्टि की बात करती हैं, लेकिन ठीक वैसी ही पुनरावृत्ति का विचार उतना स्पष्ट नहीं है।