कथा है कि एक बार भगवान शंकर की अर्धांगिनी माता पार्वती द्वारा अपने पुत्रों कार्तिकेय तथा गणेश को सांसारिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए पृथ्वी का एक चक्कर लगा कर उनके पास वापस लौटने का आदेश दिया गया। यह सुन कार्तिकेय अपनी सुंदर सवारी मोर पर सवार हुए तथा पृथ्वी का चक्कर लगाने के लिए निकल पड़े। उन्हें यह भ्रमण समाप्त करने में युग लग गए, लेकिन दूसरी ओर गणेश द्वारा माता की आज्ञा को पूरा करने का तरीका काफी अलग था, जिसे देख सभी हैरान रह गए। भगवान गणेश ने अपने दोनों हाथ जोड़े तथा माता पार्वती के चक्कर लगाना शुरू कर दिया। जब कार्तिकेय पृथ्वी का चक्कर लगाकर वापस लौटे और गणेश को अपने सामने पाया तो वह हैरान हो गए। उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि कैसे गणेश उनसे पहले दौड़ का समापन कर सकते हैं। गणेश जी ने बताया कि उनका संसार तो स्वयं उनकी माता हैं, इसलिए उन्हें ज्ञान प्राप्ति के लिए विश्व का चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं है। पुराण में दर्ज इस कथा के बाद ही हिन्दू धर्म में परिक्रमा करने की रीति का आरंभ हुआ। तब से लेकर आज तक विभिन्न धार्मिक स्थलों पर परिक्रमा करने का रिवाज है।
हिंदू धर्म के अनुसार देवी-देवताओं की पूजा के लिए पेड-पौधों की परिक्रमा का विधान है। वस्तुतः भिन्न-भिन्न पेड-पौधों में अलग-अलग देवी-देवता का वास माना जाता है। आम तौर पर बेल, केले, तुलसी, बरगद, पीपल कर परिक्रमा की जाती है। प्रदक्षिणा घड़ी की सुई की दिशा में करने प्रावधान है। वह इसलिए कि इस तरह से चलते हुए प्रभु हमेशा हमारे दाईं ओर रहते हैं, जिससे हमें सही दिशा में रहने की ही सीख मिलती है।
प्रत्येक देवता के लिए की जाने वाली प्रदक्षिणाओं की न्यूनतम संख्या अलग अलग होती है। गणेश जी की 1, हनुमान जी की 3, शिव जी की आधी, विष्णु जी की 3, अयप्पा जी की 5, कार्तिकेय जी की 6, देवी दुर्गा जी की 9, पीपल के पेड़ की 7 परिक्रमा की जाती है। शिव मंदिर में परिक्रमा करते समय यदि रास्ते में शिवलिंग पर अर्पित किया गया जल, दूध, घी आदि निकासी आती है, तो उसे पार नहीं करना किया जाता। यानि परिक्रमा आधी ही की जाती है। फिर घड़ी की सुई की उल्टी दिशा में घूम जाना चाहिए। एक मान्यता है कि शिवजी की जटा से गंगा प्रवाहित होती है, अतः उसे कैसे पार किया जा सकता है।
प्रदक्षिणा का प्राथमिक कारण सूर्यदेव की दैनिक चाल से संबंधित है। जिस तरह से सूर्य प्रातः पूर्व में निकलता है, दक्षिण के मार्ग से चलकर पश्चिम में अस्त हो जाता है। इसका एक दार्शनिक महत्व यह भी है कि संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रत्येक ग्रह-नक्षत्र किसी न किसी तारे की परिक्रमा कर रहा है। यह परिक्रमा ही जीवन का सत्य है। व्यक्ति का संपूर्ण जीवन ही एक चक्र है। इस चक्र को समझने के लिए ही परिक्रमा जैसे प्रतीक को निर्मित किया गया।