तीसरी आंख

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मंगलवार, मार्च 17, 2026

अगरबत्ती जलाना अनुचित है?

हमारे यहां धर्म स्थलों व घर के मंदिरों में अगरबत्ती जलाने का चलन है। यह आम बात है। मगर कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि ऐसा करना अनुचित है। आइये, जानते हैं कि उसकी क्या वजह है?

वे शास्त्रों के हवाले से सवाल खड़ा करते हैं कि जिस बांस की लकड़ी को चिता में भी जलाना वर्जित है, हम उस बांस से बनी अगरबत्ती को मंदिर में कैसे जला सकते हैं? वे कहते हैं कि शव को भले ही बांस व उसकी खपच्चियों से बनी सीढ़ी पर रख कर श्मशान पहुंचाते हैं, लेकिन जलाते वक्त उसे अलग कर देते हैं, क्यों कि बांस जलाने से पितृ दोष लगता है। उनका तर्क है कि शास्त्रों में पूजन विधान में कहीं पर भी अगरबत्ती का उल्लेख नहीं मिलता। सब जगह धूप करने का ही जिक्र है। ज्ञातव्य है कि जिस प्रकार हिंदू अगर का धूप करते हैं, वैसे ही मुस्लिम लोबान का धूप जलाते हैं। इससे वातावरण शुद्ध होता है और सकारत्मकता आती है।

अगरबत्ती नहीं जलाने के बारे में वैज्ञानिक तर्क ये है कि बांस में सीसा प्रचुर मात्रा में होता है और उसके जलने पर लेड आक्साइड बनता है, जो कि एक खतरनाक नीरो टॉक्सिक है, वह खतरनाक है। इसके अतिरिक्त अगरबत्ती के जलने से उत्पन्न हुई सुगन्ध के प्रसार के लिए फेथलेट नाम के विशिष्ट केन्मिकल का प्रयोग किया जाता है। यह एक फेथलिक एसिड का ईस्टर होता है। यह भी स्वांस के साथ शरीर मे प्रवेश करता है, जिससे फेफड़ों को नुकसान होता है। इस प्रकार अगरबत्ती की तथाकथित सुगन्ध न्यूरोटॉक्सिक एवम हेप्टोटोक्सिक को भी स्वांस के साथ शरीर में पहुंचाती है। इसकी लेश मात्र उपस्थिति कैंसर अथवा मस्तिष्क आघात का कारण बन सकती है। हेप्टो टॉक्सिक की थोड़ी सी मात्रा लीवर को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है। इसी कारण अनेक लोग अगरबत्ती की जगह धूप व विभिन्न प्रकार की धूप बत्तियां काम में लेते हैं।

अगरबत्ती नहीं जलाने के खिलाफ तर्क देने वाले कहते हैं कि यह केवल एक भ्रान्ति है कि बांस की लकड़ी को नहीं जलाया जाता। देश के बहुत से प्रांतों में बांस की लकड़ी के अंदर भोजन बनाया जाता है, जिसमे बांस की लकड़ी ही जलती है।