ज्ञातव्य है कि उठावना मृत्यु के बाद तीसरे दिन परिवार और समाज के सदस्यों द्वारा मृत आत्मा की शांति के लिए किया जाने वाला एक धार्मिक अनुष्ठान है। इसमें मृतक के उत्तराधिकारी को पगडी पहनाई जाती है। इस लिहाज से यह एक सामाजिक कर्म भी है। इसके बाद लोग अपने प्रतिश्ठान खोल कर दैनिक कार्य फिर से आरंभ करते हैं।
बारहवां मृत्यु के बारहवें दिन किया जाने वाला कर्मकांड है, जिसमें पिंडदान, तर्पण और भोज का आयोजन होता है। इसे मृत आत्मा की सद्गति और परिवार की शुद्धि के लिए किया जाता है। जो परिवार परंपराओं को गहराई से मानते है, तो वे दोनों को अलग-अलग दिन करते हैं। इससे हर अनुष्ठान को पूरी श्रद्धा से निभाने का समय मिलता है।
आधुनिक समय में कई परिवार एक साथ उठावना और बारहवां संपन्न करते हैं। यह समय और संसाधनों की बचत के लिए किया जाता है। लेकिन विद्वान कहते हैं कि दोनों कर्मकांड अलग अलग ही करने चाहिए। दोनों अलग अलग महत्व है। यदि समयाभाव है तो बारहवां छोटे स्तर पर किया जा सकता है।
उक्त सभी के पीछे बहुत गहरा विज्ञान छुपा हुआ है। वैज्ञानिक कहते हैं कि मृत व्यक्ति का दिमाग तीन दिन तक सक्रिय रहता है। हिन्दू धर्मानुसार, ज्यादा से ज्यादा व्यक्ति की चेतना तीन दिन में लुप्त होकर नया जन्म ले लेती है। यदि कोई बहुत ही स्मृतिवान है तो वह तेरह दिन में दूसरा जन्म ले लेता है या फिर सवा माह में। यदि आसक्ति ज्यादा है तो वर्षभर लगता, लेकिन तब तक व्यक्ति पितरों में शामिल हो जाता है। फिर उस व्यक्ति की आत्मा से छुटकारा पाने हेतु गया में उसकी मुक्ति हेतु पिंडदान किया जाता है। गरुड़ पुराणानुसार, व्यक्ति मरने के बाद ऊपर के लोक में सफर करता है, जिससे कि उसको आपके द्वारा दिए गए तर्पण से ही आगे बढऩे की शक्ति मिलती है।
